आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -36
सनातन धर्म की सोच सदैव ही इसी प्रकार की रही है । सनातन धर्म अर्थात् वह धर्म, जो पहले भी था, आज भी है और भविष्य में भी रहेगा क्योंकि इस धर्म में सभी विचारधाराओं का समावेश किया गया है । जो भी परमात्मा की ओर जाने का रास्ता दिखलाता है, वही हमारे लिए पूजनीय बन जाता है ।
हम सगुण साकार की भी उपासना करते हैं, साथ ही निर्गुण निराकार में भी विश्वास रखते हैं । और तो और हमने नास्तिकता को भी कभी महत्वहीन नहीं कहा है । सहिष्णुता की भावना तो हमें विरासत में मिली है । यही एक मात्र कारण है जो सदियों से यहाँ इस देश में हम सभी धर्मों और उनके अनुयाइयों के आगमन का सम्मान करते आए हैं । हमारी दृष्टि में यहाँ कोई पराया नहीं है, सभी अपने हैं । यहाँ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ मूलमंत्र ही सबके जीवन में रचा - बसा है। सभी एक दूसरे के पूरक हैं, कहीं किसी प्रकार का कोई भेद नहीं ।
केवल एक सहिष्णु व्यक्ति ही मध्य में रह सकता है । न तो आसक्त और न ही विरक्त, बस केवल अनासक्त । कबीर ने सहनशील बनने का उपाय बताते हुए बहुत ही सुन्दर बात कही है -
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छुवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।
स्वभाव को निर्मल बना लेना ही आसक्त से अनासक्त होना है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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