Thursday, July 2, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -39

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -39 

               तपस्वी से विवाह-प्रस्ताव सुनकर वह कुमारी कन्या शर्म से लाल हो गयी । उसने अपने जीवन में कल्पना तक नहीं की थी कि किसी दिन एक तपस्वी उसके समक्ष विवाह का प्रस्ताव भी रख सकता है । गाँव की इस बाला को और क्या चाहिए था, उसने तत्काल ही विवाह के लिए स्वीकृति देते हुए ‘हाँ’ कर दी और अपने घर लौट गयी । उस कन्या के द्वारा विवाह प्रस्ताव पर ‘हाँ’ कहते ही स्वर्ग लोक में बैठा इंद्र प्रसन्न हो गया और साथ ही साथ आश्वस्त भी कि अब निकट भविष्य में उसके सिंहासन को कोई खतरा नहीं है ।

       काम-वासना से ग्रस्त तपस्वी अपने स्तर से नीचे गिरने लगा था । दिन-रात परमात्मा का ध्यान करने वाला तपस्वी आज तप करना भूलकर गाँव की एक साधारण सी कन्या के सौन्दर्य-जाल में उलझ कर रह गया था । उस तपस्वी से हम जरा से भी अलग नहीं है । हमारा भी यही हाल है, जहाँ कोई कामना पूरी होती नज़र आती है, जीवन का उद्देश्य तक भूला बैठते हैं । 

           इधर जंगल में स्थित उस कुटिया में तपस्वी को नींद नहीं आ रही है, रह-रह कर करवटें बदल रहा है और निकट भविष्य में होने जा रहे विवाह की मधुर कल्पना में खोया हुआ है । उधर गाँव में लड़की का भी यही हाल है, उसे भी नींद नहीं आ रही है परन्तु लड़की को नींद न आने का कारण तपस्वी को नींद न आने के कारण से एकदम भिन्न है । लड़की यह सोचकर व्यथित है कि मेरे कारण उस तपस्वी के तप में बाधा आ गयी है । मुझे विवाह का प्रस्ताव तत्काल ही अस्वीकार कर देना चाहिए था परन्तु अब क्या हो सकता है ? उसने रात भर विचार किया और तत्काल ही एक महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुँच गयी । 

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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