आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -23
एक दिन सायंकाल बड़ा भाई दो आम लेकर घर लौटा । छोटा भाई उससे पूर्व ही घर लौट आया था और आँगन में हाथ-मुंह धो रहा था । बड़े भाई ने आँगन में प्रवेश करते ही दोनों बच्चों को आवाज लगाई । दोनों बालक तुरंत उनके पास पहुंचे । बड़े भाई ने थैले में से दो आम निकले । उनमें से एक थोड़ा बड़ा आम देखकर अपने पुत्र को दे दिया और दूसरा जरा सा छोटा आम अपने भाई के पुत्र को दे दिया । आज से पूर्व दोनों में से किसी भी भाई ने इस प्रकार का कोई भेदभाव वाला कार्य नहीं किया था । छोटा भाई सब कुछ देख रहा था । वह अपने बड़े भाई के पास पहुंचा और बोला कि भैया, अब हमें अलग हो जाना चाहिए । बड़े भाई ने पूछा - ‘क्यों’ ? छोटा बोला - ‘क्योंकि अब आपके भीतर ‘मैं और मेरा’ की भावना ने जन्म ले लिया है ।’
बात यह नहीं है कि जरा सा कम अथवा अधिक बड़ा आम खा लेने से किसी बच्चे पर क्या प्रभाव पड जाता ? मुख्य बात यह है कि आज और अभी ही इस ‘मैं और मेरा’ की भावना ने किसी एक व्यक्ति के मन में जन्म लिया है और भविष्य में इस भावना का अन्य व्यक्तियों और क्षेत्रों में भी विस्तार होना निश्चित है ।
जहां ‘मैं मेरा’ होगा वहाँ ‘तू तेरा’ भी रहेगा । इस प्रकार बनी स्थिति पारमार्थिक मार्ग में बाधा बनती है । इसलिए आसक्ति के त्याग के लिए हमें ‘मैं मेरा’ से दूरी बनानी होगी । तभी हमारा अनासक्त होना संभव होगा । इस दृष्टान्त से हमारे समक्ष अनासक्ति का तीसरा सूत्र प्रकट होता है – “मैं और मेरा” की भावना का त्याग ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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