ज्ञान उदय जब होत है …..33
इतने विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान, कर्म और भक्ति, तीनों का मुख्य उद्देश्य कर्मों के प्रति आसक्ति को समाप्त करना है । उद्देश्य रहता है कि येन केन प्रकारेण मनुष्य कर्तापन के भाव से मुक्त हो । मनुष्य के जीवन की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि वह कहता है कि ‘मैं कर्ता हूँ ‘ यानि सब कुछ करने वाला मैं ही हूँ । ‘मैं नहीं होता तो यह काम कौन करता ?’ संसार में इसी वहम को पालते पालते करोड़ों लोग चले गए फिर भी संसार के सभी कार्य यथावत हो रहे हैं । यह हमारा अज्ञान नहीं है तो और क्या है ?
अज्ञान है - ‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा मानना । इस अज्ञान के नीचे ज्ञान दबा पड़ा है जो कहता है कि तू कुछ भी नहीं कर रहा है, सब कुछ प्रकृति के माध्यम से हो रहा है । प्रकृति को यह भी ख़्याल नहीं है कि वो भी कुछ कर रही है । वह तो यही जानती है कि जिसने उसे सृजित किया है, वही जाने कि कौन ‘कर्ता’ है ? प्रकृति भी परमात्मा की तरह अनादि है । परमात्मा भी ‘कर्ता’ नहीं है ? प्रश्न उठता है कि फिर ‘कर्ता’ कौन है ? सब कुछ एक निश्चित व्यवस्था के अनुसार हो रहा है । इस व्यवस्था का नाम है - गुण-कर्म विभाग । जो इस व्यवस्था को समझ जाता है वह इस कर्मप्रधान संसार चक्र से बाहर निकल जाता है अन्यथा तो सब इस चक्र में घूमते रहने को विवश हैं ही ।
ज्ञान से कर्ता होने के अभिमान को तोड़ा जा सकता है, जिससे सारे कर्म भस्मीभूत हो जाते हैं । फिर केवल प्रारब्ध कर्म शेष रहते हैं, जिनका फल भोग कर मनुष्य जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है । कर्मयोग में ज्ञान की भूमिका बस इतनी ही है ।
कल सार-संक्षेप
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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