ज्ञान उदय जब होत है …..31
कर्म और ज्ञान का इतना गहरा सम्बन्ध है कि एक का दूसरे पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता । ज्ञान कर्म पर भारी पड़ता है क्योंकि कर्म का सम्बन्ध इंद्रियों से है और ज्ञान का सम्बन्ध बुद्धि से । शरीर से सूक्ष्म इंद्रियाँ है और इंद्रियों से सूक्ष्म मन । मन से भी सूक्ष्म है बुद्धि । बुद्धि की दिशा सही हो तो उसमें उपजा ज्ञान विवेक में परिवर्तित हो जाता है जो मनुष्य के लिए आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त कर देता है ।
बुद्धि में विवेक को जाग्रत करने में कर्म की भी भूमिका रहती है । यदि कर्म बिना किसी स्वार्थ और कामना के किए जाएँ तो वे मनुष्य को रागरहित कर देते हैं । जब राग-द्वेष नहीं रहते तब बुद्धि में निवास करनेवाला ज्ञान भी करवट लेते हुए विवेक में परिवर्तित होने लगता है । विवेक से मनुष्य को अनुचित-उचित का ज्ञान हो जाता है, जिससे सकाम कर्म तो होते नहीं हैं और निष्काम कर्म भी अकर्म हो जाते हैं । ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कुछ नहीं करता और नहीं करते हुए भी सब कुछ करता है । कहने का अर्थ है कि ज्ञानी भक्त का न तो कर्मों को करने में राग रहता है और न ही वह कर्मों का त्याग ही करता है ।
विवेक से मनुष्य के सभी कर्म निष्प्रभावी हो जाते हैं अर्थात् परिणाम नहीं देते । इस अवस्था को उपलब्ध व्यक्ति अपने स्वभावानुसार भक्ति की राह भी पकड़ सकता है । विवेक ही मनुष्य को आत्म-ज्ञान होने की अवस्था तक ले जाता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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