ज्ञान उदय जब होत है …..32
भक्ति में भक्त भगवान के प्रति पूर्ण समर्पित होता है । वह अपने संपूर्ण कर्म भगवान को अर्पित करता है । ऐसे कर्म जो परमात्मा के लिए किए जाते हैं और साथ ही उनका फल परमात्मा को अर्पण कर दिया जाता है तो उन कर्मों का परिणाम भक्त को भुगतना नहीं पड़ता । आसक्ति का त्याग किए बिना कोई भी कर्म परमात्मा के लिए नहीं किया जा सकता अर्थात् परमात्मा के लिए कर्म करने से अर्थ है कि कर्मों के प्रति अब कोई आसक्ति नहीं रही है ।
स्वामीजी कहते हैं कि कर्मयोगी अपने सम्पूर्ण कर्मों को संसार के अर्पण करता है, ज्ञानयोगी प्रकृति के अर्पण करता है और भक्तियोगी भगवान के अर्पण करता है । तीनों योगों का परिणाम एक ही है अर्थात् फिर कोई भी कर्म फल देने में सक्षम नहीं रहता । तीनों योगों में सबसे महत्वपूर्ण एक ही बात है, ‘अपने लिए कुछ भी न करना’ ।
जो कर्म अपने लिए किए जाते हैं, उन्हीं में मनुष्य आसक्त होता है । संसार की सेवा के लिए किए जाने वाले कर्म मनुष्य को मुक्त करते हैं । कर्मों से आसक्ति हटाने के दो ही मार्ग हैं - ज्ञान और भक्ति । ज्ञान से कर्मों का विज्ञान समझ में आता है और भक्ति से कर्मों को करने में परमात्मा की भूमिका समझ में आती है । परमात्मा की भूमिका अर्थात् यह स्वीकार करना कि सभी कर्म परमात्मा के द्वारा हो रहे हैं और मैं कुछ भी नहीं कर रहा हूँ । ऐसा मानने से फिर आप कर्म के फल से प्रभावित नहीं होंगे ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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