Sunday, March 29, 2026

ज्ञान -22

 ज्ञान -22 - सार-संक्षेप

        सीखे और सुने हुए ज्ञान की क़ीमत दो कौड़ी की नहीं है । ज्ञान के मात्र दो शब्द जब विवेक बनकर जीवन में उतरते हैं तब वह जीवन भी अनमोल बन जाता है । आज इस संसार में सभी लोग एक दूसरे को ज्ञान बांट रहे हैं परन्तु एक भी व्यक्ति उस ज्ञान के अनुसार जी नहीं रहा है । सब ज्ञान देकर एक दूसरे को बदलने में लगे है, परंतु स्वयं को बदलना नहीं चाहते । मित्र, अपने मित्र को बदलना चाहता है और पति अपनी पत्नी को । ऐसा ज्ञान बंधन है, बोझ है । 

         ऋषि याज्ञवल्क्य और गार्गी के मध्य हुआ संवाद वास्तविक ज्ञान को स्पष्ट करता है । उन्होंने ज्ञान को अपने जीवन में उतारा है, साथ ही ज्ञान से ब्रह्म को भी जाना है । याज्ञवल्क्य ऋषि के गृहस्थ जीवन में दो-दो पत्नियों के होते हुए भी जो समरसता दिखलाई पड़ती है, उसके पीछे उच्च कोटि के ज्ञान के अनुसार उनका जीना ही है । ज्ञान जब विवेक बन जाता है, तब व्यक्ति के जीवन में अशांति का प्रवेश हो ही नहीं सकता । ज्ञान को विवेक में परिवर्तित करने के लिए सत्संग आवश्यक है । गोस्वामीजी मानस में लिखते हैं - 

बिनु सतसंग बिबेक न होई । रामकृपा बिनु सुलभ न सोई ।।

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ।।

       अन्त में मैं आचार्यजी द्वारा कहे गए शब्दों का पुनः स्मरण करना चाहूँगा । वे कहते हैं - “सीखे हुए ज्ञान में ही अनुभव छिपा हुआ है । खोज करें ।” खोज तभी होगी, जब उस ज्ञान का जीवन में प्रयोग करेंगे । प्रयोग से ही उस ज्ञान की उपयोगिता सिद्ध होगी । ज्ञान को आत्मसात् करने के लिए परमात्मा की कृपा मानकर सत्संग कीजिए । फिर संसार से आसक्ति परमात्मा के प्रति अनुरक्ति में परिवर्तित हो जाएगी । ऐसा ज्ञान बंधन नहीं है बल्कि मुक्ति का साधन है ।

    इसी के साथ इस लेख को पूर्ण करने की आज्ञा चाहूँगा । फिर मिलते हैं, किसी ज्ञानपूर्ण विषय पर चर्चा करने के लिए ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

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