Saturday, March 28, 2026

ज्ञान -21

 ज्ञान - 21

             गुरु की शरण, आत्म-ज्ञान को उपलब्ध होने का सर्वोत्तम साधन है । परन्तु गुरु से ज्ञान प्राप्त कर उसको केवल वाणी और लेखनी के माध्यम से प्रस्तुत करते रहने से भी कुछ नहीं होना है । आवश्यक है कि गुरु-प्रदत्त ज्ञान को हम अपने जीवन में उतारें । ज्ञान जीवन में कितना उतरा है, इसको हम निम्न बातों के माध्यम से जान सकते हैं -

नैतिक जीवन - ज्ञान के अनुसार जीने पर हमारे जीवन में नैतिकता आती है । नैतिकता का अर्थ है - सत्य, अहिंसा और करुणा के मार्ग पर चलना । जिसके जीवन में नैतिकता नहीं है, उसका जीवन ज्ञान होने के पश्चात् भी मूल्यहीन है । 

वैराग्य - ज्ञान हो जाने पर संसार से मोह समाप्त हो जाता है और व्यक्ति वैराग्य को उपलब्ध हो जाता है । शरीर और संसार का निरंतर त्याग हो रहा है । आप चाहकर भी उनको बदलने से नहीं रोक सकते । ज्ञान इस बदलने को स्वीकार करता है, जिससे मनुष्य संसार और शरीर से मुक्त हो जाता है ।

प्रेम और भक्ति - ज्ञान से जब संसार और शरीर मूल्यहीन हो जाते हैं तब परमात्मा के प्रति प्रेम और भक्ति का उदय होता है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य भी यही है कि वह अपने वास्तविक स्वरूप को पहिचाने जोकि परमात्मा का स्वरूप ही है अर्थात् सच्चिदानंद स्वरूप । स्वरूप तक पहुंचने की राह प्रेम और भक्ति से ही निकलती है ।

          इतने विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान मुक्ति का मार्ग है । ज्ञान को प्राप्त करने के उपरान्त भी संसार में आसक्त बने रहना बंधन है । बन्धन से मुक्त न करने वाला ज्ञान, ज्ञान न होकर अज्ञान है । मुक्ति के लिए आवश्यक है कि हम ज्ञान के अनुसार अपना जीवन बनाएं । 

कल सार-संक्षेप 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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