भोग, रोग और योग -13
योग को स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान कहते हैं -
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम् ।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 6/23 ।।
जिसमें दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नाम से जानना चाहिए । उस ध्यान योग का अभ्यास न उकताये हुए चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिए ।
दुःख के संयोग का वियोग होना ही योग है । जीवन में दु:ख आता ही तभी है जब बहने वाले का संग कर उसके साथ हम भी बहने लगते हैं । इस प्रकार दुःख के साथ हुए संयोग का जब वियोग हो जाता है, तब मनुष्य योग में स्थित हो जाता है । इसलिए दुःख के संयोग का वियोग हो जाना ही योग कहलाता है ।
संयोग और वियोग प्रकृति में होते हैं अर्थात् संसार और शरीर में होते हैं जबकि योग परमात्मा के साथ होता है । परमात्मा के साथ हुए योग का वियोग होना संभव ही नहीं है । संसार और शरीर अस्थिर हैं । परिवर्तनशील होने के कारण केवल इन्हीं में संयोग और वियोग होते रहते हैं । परमात्मा शाश्वत और अपरिवर्तनशील है । इनके साथ योग होने पर पुनः वियोग होने का प्रश्न ही नहीं उठता ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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