भोग, रोग और योग -12
उपनिषद् कहती है -
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्य-
स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ।। मुण्डक उ.- 3/2/3 और कठ. उ.-1/2/23 ।।
यह आत्मा (परमात्मा) न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न ही बार-बार सुनने से ही प्राप्त हो सकता है । यह परमात्मा जिसको स्वीकार कर लेता है, उसके द्वारा ही प्राप्त हो सकता है और उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
परमात्मा से योग को उपलब्ध होने के लिए न तो शास्त्रों को पढ़ कर ज्ञानी होने की आवश्यकता है, और न ही बहुत सुनने की आवश्यकता है । योग को उपलब्ध होने के लिए तो समस्त भोगों की इच्छा का त्याग करके परमात्मा का ध्यान करना ही पर्याप्त है । भोगों की इच्छा के त्याग से असंयमित और अनुचित भोग होंगे ही नहीं । भोग संयमित होंगे तो रोगों से भी दूरी बनी रहेगी । स्वस्थ शरीर की परमात्मा के योग में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका है । सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता ।
भोग, रोग और योग नामक इस लेख का सारांश है कि आत्मा (परमात्मा) न भोग से मिलता है और न ही संग्रह से - वह तो योगमय जीवन से प्रकट होता है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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