भोग, रोग और योग -10
योग का अर्थ है - जोड़ अर्थात् शरीर, मन और आत्मा का संतुलन । योग भोग को नकारता नहीं है बल्कि उसे शुद्ध करता है । योग हमें सिखाता है कि कैसे इंद्रियों का उपयोग हो । मनुष्य को चाहिए कि वह इंद्रियों का सदुपयोग करें, न कि उनका दास बन जाए । जब मन जागरूक होता है, तब इंद्रियों का भोजन भी संयमित होता है, विचार भी शान्त होते हैं और जीवन अपने आप सरल, सहज और स्वस्थ होने लगता है ।
योग केवल आसन और प्राणायाम तक ही सीमित नहीं है । वह एक जीवन-दृष्टि है - सजगता (चैतन्यता), समता और स्वीकार्यता की दृष्टि । जहां योग है वहाँ भोग सीमा में रहता है । भोग सीमा में रहेगा तो रोग प्रथम तो आएगा ही नहीं है और अगर आ भी जाएगा तो धीरे-धीरे विदा होने लगेगा ।
महर्षि पतञ्जलि के योग-सूत्रों में एक सूत्र कहता है -
योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: (1.2)
अर्थात् योग का अर्थ है - चित्त की चंचल वृत्तियों का शमन ।
इन्द्रियों का संयमित आहार, उनका संतुलित विहार और चैतन्य- जीवन (होशपूर्वक जीवन) - यही योग है और यही दुःखों का नाश करने वाला है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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