Sunday, July 3, 2016

नवधा-भक्ति-4

 गीता में नवधा भक्ति-
[
1 ] श्रवण - भगवान के प्रेमी भक्तों द्वारा कथित भगवान के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, लीला, तत्त्व  और रहस्य की अमृतमयी कथाओं का श्रद्धा और प्रेमपूर्वक श्रवण करना एवं प्रेम में मुग्ध हो जाना श्रवणभक्ति का स्वरूप है | गीता (4/34; 13/25) में भगवान कहते हैं ' हे अर्जुन ! उस ज्ञान को तू समझ;  ब्रह्मनिष्ठ आचार्य के पास जाकर उनको दंडवत प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से तत्त्व को जानने वाले वे ज्ञानी - महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे |'
[
2 ] कीर्तन - भगवान के नाम, रूप, गुण, प्रभाव, चरित्र, तत्त्व और रहस्य का श्रद्धा और प्रेमपूर्वक उच्चारण करते - करते शरीर में रोमांच, कंठावरोध, अश्रुपात, हृदय की प्रफुल्लता, मुग्धता आदि का होना कीर्तन - भक्ति का स्वरूप है | गीता (9/30-31; 18/68-69) में कीर्तन - भक्ति का महत्त्व बताया गया है |
[
3 ] स्मरण - भगवान को स्मरण करना ही भक्ति के ' प्राण ' है | केवल स्मरण - भक्ति से सारे पाप , विघ्न , अवगुण , और दुखों का अत्यंत अभाव हो जाता है | गीता (6/30 ; 8/7-8 व 14; 9/22; 12/6-8; 18/57-58) में भगवान ने स्मरण - भक्ति का ही महत्त्व बताया है |
[
4 ] पाद सेवन - जिनके ध्यान से पाप राशि नष्ट हो जाती है , भगवान के उन चरणकमलों का चिरकाल तक चिंतन करना चाहिए | भगवान की चरणकमल रुपी नौका ही संसार - सागर से पार उतारने वाली है |
[
5 ] अर्चन - जो लोग इस संसार में भगवान की अर्चना - पूजा करते हैं वे भगवान के अविनाशी आनंद स्वरूप परमपद को प्राप्त हो जाते हैं | गीता (18/46 ) में बताया है की भगवान की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है | गीता (9/26) में भगवान कहते हैं ' शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ पत्र, पुष्प, फल और जल आदि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीत सहित खाता हूँ |'
[
6 ] वन्दन - समस्त चराचर भूतों को परमात्मा का स्वरूप समझकर शरीर या मन से प्रणाम करना और ऐसा करते हुए भगवतप्रेम में मुग्ध होना वन्दन - भक्ति है | गीता(11/40) में इसका स्वरूप बताया गया है |                                                
 [ 7 ] दास्य - भगवान के गुण, तत्त्व, रहस्य और प्रभाव को जानकर श्रद्धा - प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करना और उनकी आज्ञा का पालन करना दास्य -भक्ति है |                      
[ 8 ] सख्य - भगवान के तत्त्व , रहस्य , महिमा को समझकर मित्र भाव से उनमें प्रेम करना और प्रसन्न रहना, [गीता (4/3; 18/64)] सख्य - भक्ति है |                           
[ 9 ] आत्मनिवेदन - जिस मनुष्य ने भगवान का आश्रय लिया है उसका अंत:करण शुद्ध हो जाता है एवं वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, गीता (7/14; 9/32 व 34; 18/62 व 66 ) में शरणागति का महत्त्व बताया गया है
क्रमशः
                       || हरिः शरणम् ||

Saturday, July 2, 2016

नवधा-भक्ति-3

श्री मद्भागवत महापुरण में नवधा भक्ति-
श्री मद्भागवत महापुराण में भक्त प्रह्लाद द्वारा अपने पिता हिरणकश्यपु को भक्ति के 9 प्रकार बताए गए हैं जिसे नवधा भक्ति कहते हैं । प्रह्लाद के पिता ने जब उससे पूछा कि गुरु पुत्रों से तुमने क्या सीखा है तब प्रह्लाद उनको नवधा भक्ति के बारे में जो सीखा है, वह बताते हैं |
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् || भागवत-7/5/23 ||
श्रवण: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।
कीर्तन: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
स्मरण: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।
पाद सेवन: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।
अर्चन: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
वंदन: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
दास्य: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।
सख्य: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।
आत्म निवेदन: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।
क्रमशः
|| हरिःशरणम् ||

Friday, July 1, 2016

नवधा-भक्ति-2

रामचरितमानस में नवधा भक्ति-
         त्रेता युग में भगवान श्री राम और शबरी का जब मिलन होता है, तब भगवान शबरी को इसी नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं | गोस्वामीजी ने बहुत ही सुन्दर रूप से इसका चित्रण मानस में किया है |
गोस्वामी तुलसीदास जी मानस के अरण्य काण्ड में भक्ति के बारे में कहते हैं-
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा | दूसरि रति मम कथा प्रसंगा ||
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान |
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान ||35||
मन्त्र जाप मम दृढ बिस्वासा | पंचम भजन सो बेद प्रकासा ||
छठ दम सील बिरति बहु करमा | निरत निरंतर सज्जन धरमा ||
सातवं सम मोहि मय जग देखा | मोतें संत अधिक कर लेखा ||
आठवं जथालाभ संतोषा | सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा ||
नवम सरल सब सन छलहीना | मम भरोस हियँ हरष न दीना ||
नव महुं एकउ जिन्ह कें होई | नारि पुरुष सचराचर कोई ||
सोइ अतिसय प्रिय भामिनी मोरें | सकल प्रकार भगति दृढ तोरें ||

           प्रथम भक्ति- संत महात्मा और तत्व ज्ञानी गुरु की सेवा में रहना | दूसरी भक्ति- परमात्मा की ही चर्चा करना | तीसरी भक्ति- अभिमान रहित होकर गुरु की सेवा करना | चौथी भक्ति- सब कपट त्यागकर परमात्मा का गुणगान करना | पांचवीं भक्ति- परमात्मा में दृढ विश्वास रखते हुए उसके मन्त्र का जाप करना | छठी भक्ति- इन्द्रिय निग्रह, अच्छा चरित्र और सज्जन पुरुषों जैसा आचरण करना | सातवीं भक्ति – संसार को सम भाव से देखना और सब में परमात्मा को ही देखना | आठवीं भक्ति- जो मिल जाये उसी में संतोष करना और सपने में भी दूसरों के दोष न देखना | नौवीं भक्ति- सरलता, सबके साथ कपट रहित व्यवहार, ह्रदय में परमात्मा का विश्वास और किसी भी बात से हर्ष या विषाद न होना | इन में से कोई भी एक भक्ति भी जिस किसी में होती है, वह परमात्मा को अतिशय प्रिय होता है |
क्रमशः 
                                       || हरिः शरणम् ||

Thursday, June 30, 2016

नवधा भक्ति-1

नवधा भक्ति – प्रस्तावना -
         भक्ति के बारे में हम विस्तृत रूप से विवेचन पूर्व में कर चुके हैं | नवधा भक्ति वैसे भक्ति से अलग हटकर कोई विषय नहीं है बल्कि भक्ति को विस्तृत रूप से समझने के लिए विभिन्न शास्त्रों में भक्ति के ही नौ प्रकार बताए गए है | वैसे भक्ति को नौ विभागों में बांटा नहीं गया है बल्कि भक्ति की विभिन्न नौ अवस्थाओं को बताया गया है | भक्ति तो केवल एक ही प्रकार की होती है और वह है-परमात्मा से प्रेम | जिस प्रथम द्वार से भक्ति में प्रवेश किया जाता  है और अंत में नौवें द्वार तक पहुंचा जाता है उन नौ द्वारों को ही नवधा भक्ति नाम से कहा जाता है | जिस प्रकार एक विशाल कपड़े को कई परतों में समेटा जाता है और पुनः खोलने के लिए उन परतों को एक एक कर खोला जाता है तभी उस कपड़े की भीतरी और मुख्य सतह तक पहुंचा जा सकता है उसी प्रकार भक्ति की विशालता को इसी प्रकार नौ परतों में समेटा गया है | अगर अंग्रेजी भाषा में कहें तो हम कह सकते हैं कि ‘Navdha bhakti is the nine folds of the Devotion’| अतः यह स्पष्ट है कि नवधा भक्ति कोई अलग अलग नौ प्रकार की भक्ति नहीं है बल्कि भक्ति के विभिन्न रूप हैं, चरण है - प्रथम चरण से लेकर नौ चरण तक | सभी भक्ति के चरणों को सामूहिक रूप से नवधा भक्ति कहा जाता है |
        नवधा भक्ति के बारे में हमारे सनातन धर्म के लगभग प्रत्येक ग्रन्थ में किसी न किसी रूप में वर्णन किया गया है | वर्तमान काल में इनमें से तीन शास्त्र मुख्य रूप से पढ़े जाते हैं | हमारे ये शास्त्र हैं- श्री मद्भागवत महापुराण, श्री मद्भागवत गीता और गोस्वामी तुलसीदास कृत श्री रामचरित मानस | इनमें सरलतम रूप से श्री रामचरितमानस में नवधा भक्ति का वर्णन किया गया है |  सर्वप्रथम इन ग्रंथों में वर्णित एक एक ग्रन्थ से नवधा भक्ति का वर्णन प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिससे इसे समझने में आसानी रहेगी |
क्रमशः

                 || हरिः शरणम् ||

Wednesday, June 29, 2016

प्रेय से श्रेय की ओर-14 समापन कड़ी

प्रेय से श्रेय की ओर-14 समापन कड़ी-
               सब कुछ पश्चिम की भोगवादी संस्कृति को अपनाने का परिणाम है और इसके लिए हम स्वयं दोषी है | हम ज्ञान बहुत उड़ेलते हैं परन्तु अपने बच्चे के लालन पालन में इस ज्ञान का उपयोग नहीं करते हैं | जब भी यह प्रश्न हमारे सामने आता है, हम आधुनिक भागदौड़ वाले युग होने का कहकर मुंह मोड़ लेते हैं | परन्तु वास्तविकता यह है कि हमें स्वयं को श्रेय मार्ग से अच्छा प्रेय मार्ग लगता है और दोषारोपण आधुनिक व्यवस्था पर करते फिरते हैं  | किसी के कहने पर अगर हम किसी कुएँ में जाकर नहीं गिर सकते तो फिर आपको श्रेय मार्ग पर चलने से कौन रोक सकता है ?आज की आवश्यकता है कि माता-पिता स्वयं श्रेय मार्ग का अनुगमन करते हुए बचपन से ही अपने पुत्र/पुत्री के सामने एक  आदर्श प्रस्तुत करें | तभी इस व्यवस्था में सुधार संभव है |
                  अंत में मैं आपको पुनः महर्षि शांडिल्य की भक्ति की अनुरक्तियों वाली अवधारणा की और ले जाना चाहूँगा | परा और अपरा अनुरक्तियां दोनों ही परमात्मा की देन है | अपरा अर्थात सांसारिक अनुरक्ति में उलझ जाना प्रेय-मार्ग है और परा अनुरक्ति आध्यात्मिक अनुरक्ति है और इसको अपनाना ही श्रेय मार्ग है | प्राणियों की चौरासी लाख प्रजातियाँ प्रेय-मार्ग पर चलने का ही परिणाम है और मनुष्य की प्रजाति में जन्म लेकर श्रेय-मार्ग पर चलना ही परमात्मा से प्रेम करना है | निर्णय करना केवल और केवल आपके हाथ में है | मैं तो आप सब के लिए परमात्मा से यही प्रार्थना कर सकता हूँ कि वह आपको इतना विवेक अवश्य प्रदान करे जिससे आप ‘प्रेय से श्रेय की ओर’ चल सकें | अगर आप श्रेय मार्ग पर चलेंगे तो आपका, आपके परिवार, आपके समाज और आपके देश का भला होगा और भारत पुनः इस संसार में सभी देशों में अग्रणी बन जायेगा |
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||
पुनश्चः
इस विवेचन के मध्य में श्री पंकज अग्रवाल का पूरक प्रश्न मिला है | उन्होंने नचिकेता के तीन में से मांगे गए दो वर पूछे हैं | पहला वर था कि जब मैं वापिस अपने पिता उद्दालक के पास लौटूं तो वे मुझे पूर्व की भांति प्रेमपूर्वक पुत्र रूप में स्वीकार कर ले | उनके मन में मेरे लिए किसी प्रकार का दुःख का भाव और मुझे मृत्यु (यम) को देने के प्रति अपराध बोध न रहे | दूसरा वर था कि जहाँ न जरा हो, न दुःख हो, न आपका यानि मृत्यु का भय हो, न भूख लगे और न ही प्यास ऐसी जगह स्वर्ग है, वहां पहुँचने के लिए अग्नि विद्या को जानना आवश्यक है | अतः हे यम ! मुझे आप अग्नि विज्ञान प्रदान करें | यह अग्नि विज्ञान बाद में नचिकेता के नाम से प्रसिद्ध हुआ |

      || हरिः शरणम् ||

Tuesday, June 28, 2016

प्रेय से श्रेय की ओर-13

                 अब बात करते हैं कि आधुनिक युग में श्रेय मार्ग पर चलना कठिन क्यों होता जा रहा है ? इसका सबसे बड़ा कारण है-धर्म से विमुखता | प्राचीन काल में बच्चे का लालन पालन जिस वातावरण में होता था, वह आज के समय में कहाँ उपलब्ध है ? स्वयं माता-पिता की दिनचर्या तक अस्त-व्यस्त है | पहले शैशव काल के बाद जब बाल्यावस्था में बालक प्रवेश करता था तब उसे ब्रह्मचर्य आश्रम के अनुसार गुरुकुल में भेज दिया जाता था | ब्रह्मचर्य का अर्थ है, ब्रह्म की चर्या और ब्रह्मचारी अर्थात ब्रह्म के जैसे आचरण करने वाला | ब्रह्मचर्य का अर्थ आजकल अलग रूप से प्रस्तुत किया जा रहा है, वह मात्र दिग्भ्रमित करने वाला अर्थ है | गुरुकुल में केवल ब्रह्म के बारे में शिक्षा दी जाती थी | वहां पर जाकर बालक को श्रेय-मार्ग पर ही चलना होता था | ब्रह्म में स्त्री और पुरुष का कोई भेद नहीं है | अतः आज के बालक की तरह ऐसे भेद को पालकर वहां गुरुकुल में कोई भी बालक कभी कुंठित नहीं होता था | वास्तविक ब्रह्मचर्य का जीवन तो गुरुकुल का जीवन ही था |
           आज के विद्यालयों में स्त्री-पुरुष भेद प्रारम्भ से ही बालक के मन में प्रवेश कर जाता है | इस लिंग-भेद की अग्नि में घी डालने का कार्य करती है, आधुनिक तकनीक जैसे दूरदर्शन और मोबाइल आदि | अति विकसित देश अमेरिका में आये दिन विद्यालयों में हो रहे गोली कांड और विद्यार्थी जीवन में ही कम उम्र में बच्चियों द्वारा गर्भ धारण कर लेना विद्यार्थियों में पैदा हो रही मानसिक कुंठा का ही तो परिणाम है | मैं आज दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर हम अभी भी नहीं चेते तो निकट भविष्य में हमारे देश में भी ऐसी घटनाएँ होने लगेगी | आज सब कुछ सुविधाएँ है, विद्यार्थी के पास | ऐसे में वह प्रेय-मार्ग पर चलना अपने जीवन के प्रारम्भ में ही सीख जाता है | ऐसी स्थिति से बाहर वह वानप्रस्थ आश्रम के अंत तक भी नहीं निकल पाता | वानप्रस्थ में समय और ऊर्जा उसका साथ छोड़ रहे होते हैं और फिर नए जन्म के लिए वही वासना भोग वाली चौरासी लाख योनियां उसका इंतजार कर रही होती हैं |
कल समापन कड़ी-

|| हरिः शरणम् ||

Monday, June 27, 2016

प्रेय से श्रेय की ओर-12

                 प्रेय मार्ग पर चलना ही सबको अच्छा लगता है | इसका मुख्य कारण यह है कि वह शारीरिक सुख को आत्मिक सुख पर प्राथमिकता देता है | शारीरिक सुख इन्द्रियों से ही प्राप्त किया जा सकता है | मनुष्य शरीर में दस इन्द्रियां हैं । इन इन्द्रियों के द्वारा हम इस संसार  का भोग करते हैं । इन सबके अतिरिक्त एक मन है । मन इन इन्द्रियों का स्वामी है, इनका संचालन करता है । मन के अतिरिक्त एक बुद्धि और एक आत्मा है । आत्मा इस बुद्धि और मन सहित समस्त शरीर का स्वामी है । इसे एक रथ की भांति समझा जा सकता है । रथ शरीर है। उसमें घोड़े इन्द्रियां हैं, मन इन घोड़ों की लगाम है और बुद्धि इनकी सारथी है ।आत्मा इस रथ और सारथी दोनों का स्वामी है ।
                इन्द्रिय अश्व शरीर रथ, मन को मानो बाग ।
                बुद्धि सारथी ले चला, भोग विषय अनुराग ।।
         आत्मा इस रथ में बैठा हुआ एक मार्ग पर जा रहा है । यह रथ उस मार्ग पर चलता जाये ,जिस पर उसे जाना है , इसके लिए यह आवश्यक है की घोड़े सारथी के वश में रहें और सारथी स्वामी के वश में रहे ।सारथी अर्थात बुद्धि के हाथ में लगाम (मन) है |अगर लगाम (मन) सारथी (बुद्धि) पर अधिक प्रभावी है तो घोड़े (इन्द्रियां) भटकेंगे ही और अगर सारथी (बुद्धि) लगाम (मन) को नियंत्रण में रखता है तो घोड़े (इन्द्रियां) स्वतः ही उसके नियंत्रण में आ जायेंगे | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में मन, बुद्धि पर अधिक प्रभावी रहता है जिससे वह प्राणी इन्द्रियों और मन के अनुसार ही कार्य करता है और मन पूर्व मनुष्य जन्म के कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए ही तो उक्त योनि में आया है | परन्तु मनुष्य में अगर बुद्धि के साथ विवेक भी जाग्रत है, तो फिर मन आत्मा और विवेक के नियंत्रण में रहता है और इन्द्रियों को गलत मार्ग पर जाने नहीं देता है |
         मालिक अर्थात स्वामी को श्रेय मार्ग पर चलना है ।  मन अगर वश में न रहेगा तो इन्द्रियां प्रेय मार्ग पर चल पड़ेंगी । इसलिए घोड़े चलते हुए भी सारथी (बुद्धि, विवेक) और मन की आज्ञा के अधीन ही चलें । इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि घोड़े अपनी मनमानी उतनी ही कर सकें, जितने से उनका जीवन और स्वास्थ्य चलता रहे । इन्द्रियों को अपने विषयों का उतना ही भोग करने दो, जितने में इन्द्रियां अर्थात शरीर का स्वस्थ जीवन रह सके।
क्रमशः

                       || हरिः शरणम् ||