Thursday, February 15, 2024

बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ

 बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ 

         'संसार दुःखमय है’, जानते हुए भी हम सुख की कामना करते हुए कर्म करते हैं । ये कर्म हमें संसार के साथ बाँधते हैं । कामनाएँ और कर्म, हमें संसार-चक्र (संसृति) से मुक्त नहीं होने देते । कामनाओं को पूरा करने के लिए केवल एक जन्म ही पर्याप्त नहीं होता । उनके पूरी होने की आशा में हम शरीर पर शरीर लेते जा रहे हैं फिर भी कामनाएँ पूरी नहीं हो रही और फिर से एक नया शरीर लेना पड़ता है । हमारे साथ युग-युगों से ऐसा होता आया है और जब तक नहीं सँभलेंगे तब तक होता रहेगा ।

           क्यों होता है हमारे साथ ऐसा ?  क्योंकि हम मन के कहे अनुसार चलने लगे हैं । कबीर कहते भी हैं कि “मन के मते न चालिए, मन के मते अनेक”, फिर भी हम कबीर की नहीं सुनते, मन की ही सुनते हैं । मन चंचल है । अभी यहाँ है, पल भर में चाँद पर चला जाएगा, चाँद से और कहीं और फिर वापस आपके पास । मन कहता है “ ऐसा करना चाहिए”, फिर थोड़ी देर में कहेगा “ऐसा नहीं, वैसा करना चाहिए” । इसी ऐसे-वैसे के चक्कर में जो होना चाहिए वह नहीं होता । 

        मन को छोड़ बुद्धि का आश्रय लेने से मन की चंचलता कम की जा सकती है । मन पर अंकुश लगते ही कामनाओं की गति भी मन्द पड़ जाती है और हम संसार से मुक्त होकर योग की ओर अग्रसर हो जाते हैं । इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा है - “बुद्धौ शरणमन्विच्छ” अर्थात् तू बुद्धि का आश्रय ले ।

        सृष्टि का सृजक परमात्मा है । परमात्मा स्वयं ही सृष्टि के रूप में अवतरित हुआ है । वही सृजक, वही सृजन । संसार को सागर कहा गया है । इस संसार-सागर को पार करने के लिए जिस नाव की आवश्यकता है, वह नाव है - यह मानव शरीर । संसार से पार होना क्यों आवश्यक है ? क्योंकि यहाँ आकर हम संसार और शरीर के मोह में फँस गए हैं । जैसे नदी से पार जाने के लिए नाव की आवश्यकता होती है उसी प्रकार संसार से पार होने के लिए मानव शरीर आवश्यक है । नदी से पार हो जाने के बाद जिस प्रकार नाव अनावश्यक हो जाती है उसी प्रकार संसार से मुक्त होने के लिए शरीर का उपयोग करते हुए उसका भी मोह छोड़ना होता है । 

       मानव का दिखलाई दे रहा यह शरीर, स्थूल शरीर कहलाता है । पाँच भौतिक तत्वों से निर्मित इस स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर के रूप से अंतःकरण स्थित है । अंतःकरण को चार भागों में विभाजित किया गया है - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । मन और चित्त में बहुत अधिक अंतर नहीं है । जिस मन में कामना उत्पन्न होती है और उस कामना को पूरा करने के लिए कर्मेन्द्रियों से कर्म करवाने के निर्देश दिए जाते हैं, वह मुख्य मन है । जिस मन में अपूर्ण कामनाओं और फल की प्रतीक्षा करते कर्मों का संचय होता है, मन का वह भाग चित्त कहलाता है ।

          इस प्रकार मुख्य रूप से शरीर में कुल आठ तत्व हुए - पाँच भौतिक तत्त्व (भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश) और तीन सूक्ष्म तत्व (मन, बुद्धि और अहंकार) । इस प्रकार इस देह को अष्टधा प्रकृति भी कहा जाता है । यह अपरा प्रकृति है । पाँच भौतिक तत्त्व के अन्तर्गत पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । ये सभी स्थूल शरीर के अंग और उससे सूक्ष्म हैं । इन इंद्रियों से सूक्ष्म मन को बताया गया है । मन से सूक्ष्म है बुद्धि और बुद्धि से भी सूक्ष्म है अहंकार । अहंकार इस भौतिक  शरीर की सर्वोच्च सीढ़ी है । 

            अहंकार शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, अहं और आकार । जीवात्मा जब किसी आकार (शरीर) को अपना लेता है, उसके साथ तादात्म्य कर लेता है, तब अहं पैदा होता है अर्थात् जीवात्मा ही अहं बन जाती है । अहं जब अपने आपको आकार तक सीमित कर उसके साथ अपनी एकता होना मान लेता है, तब अहंकार का जन्म होता है । वास्तव में जीवात्मा की एकता परमात्मा से है संसार से नहीं । जब जीवात्मा को इस बात का ज्ञान हो जाता है, तब उसे अहं शब्द से भी मुक्ति मिल जाती है ।

                  संसार के साथ जीवात्मा की एकता भ्रम मात्र है । इस एकता का कारण केवल संसार से सुख लेने की अपेक्षा है । जीवात्मा संसार और शरीर (माया) के आकर्षण के वश में होकर उसमें फँस जाती है । संसार का आकर्षण मनुष्य में सुख उपलब्ध कराने का एक छद्म विश्वास पैदा करता है । वास्तव में देखा जाए तो परमात्मा निर्मित संसार में सुख-दुःख कहीं भी नहीं है । यह संसार सदैव उदासीन अवस्था में रहता है, केवल हमारी कामनाएँ ही हमें सुख-दुःख पहुँचाती है ।

            सुख की लालसा ही मनुष्य के दुःख का कारण बनती है । जब दुःख, सहन करने की सीमा को लांघने लगता है, तब जीव संसार-चक्र से बाहर निकलने के लिए छटपटाता है । ऐसा नहीं है कि जीवात्मा संसार से मुक्त होने का प्रयास नहीं करती, वह प्रयास तो करती है परंतु संसार के रस-भोग का आकर्षण उसे अपने साथ बांधे रखता है और उसे मुक्त नहीं होने देता । संसार और शरीर से मुक्त होने के लिए उसे क्या करना चाहिए ? चलिए ! यह जानने का प्रयास करते हैं । 

        इस मानव देह में वही सब कुछ है जो सृष्टि के प्रत्येक जीव में है । अष्टधा प्रकृति से यह शरीर बना है । इन आठ में पाँच तो भौतिक तत्त्व है, जिनसे यह स्थूल शरीर (gross body) बना है । ये पाँच भौतिक तत्व हैं - पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश । 

छिति जल पावक गगन समीरा । पंच रचित अति अधम शरीरा ।। मानस - 5/11/4 ।।

शेष तीन तत्व सूक्ष्म शरीर (subtle body) का निर्माण करते हैं । ये तीन तत्व हैं - मन (चित्त), बुद्धि और अहंकार । 

   अष्टधा प्रकृति अपरा प्रकृति कहलाती है, जिसके अन्तर्गत यह स्थूल शरीर और इसमें स्थित अंतःकरण (सूक्ष्म शरीर) आते हैं । गीता में इन आठ तत्वों के बारे में भगवान अर्जुन को बता रहे हैं -

भूमिरापोऽनलोवायु: खं मनोबुद्धिरेव च । 

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृति रष्टधा ।। गीता-7/4 ।।

   पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश; ये पाँच महाभूत और मन, बुद्धि और अहंकार - इस प्रकार के आठ भेदों वाली मेरी यह अपरा प्रकृति है ।

      शरीर से भिन्नता लिए हुए जो परा-प्रकृति है, वह जीव (जीवात्मा) कहलाती है और वह नित्य है, वह कभी नष्ट नहीं होता । शरीर के मरने पर भी वह मरता नहीं है ।  

   प्रगट सो तनु तव आगे सोवा । जीव नित्य केहि लगि तुम्ह रोवा ।। 5/11/5 ।।

      शरीर से प्राण निकल जाने के पश्चात् वह शरीर जो प्रत्यक्ष रूप से तुम्हारे सामने सोया हुआ है, वह नाशवान है और इसमें जो निवास करता था, वह जीव नित्य है । फिर तुम किसके लिए रो रहे हो ?

        गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं - 

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।

जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ।। गीता - 7/5 ।।

    हे महाबाहो ! अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत् धारण किया जाता है ।

           इस श्लोक (गीता- 7/5) में भगवान एक बात बड़ी ही महत्वपूर्ण कह रहे हैं कि जीव ने ही इस जगत् को धारण किया है न कि जगत् ने जीव को । जगत् सदैव गतिमान बना रहता है जैसे कोई झूला अपने निर्धारित पथ पर एक धुरी के चारों ओर घूमता रहता है । ऊपर-नीचे, आजू-बाजू घूमता झूला हम सब के लिए एक आकर्षण का विषय हो जाता है । 

       जैसे घूमते झूले पर हम स्वयं चढ़ते हैं, न कि झूला हमें पकड़कर अपने ऊपर चढ़ाता है वैसे ही जगत् के आकर्षण में आकर हम स्वयं जाकर फँसते है, जगत् हमें नहीं फँसाता है । फिर हम संसार में उलझकर कहते हैं कि यह संसार हमें छोड़ता नहीं है । वास्तव में हमने संसार को पकड़ा है, हम संसार में आसक्त हुए हैं और  इससे मुक्त भी हमें ही होना है ।

          संसार में हमारी आसक्ति उससे मिले छद्म सुख के कारण होती है । संसार में आकर उन सुखों को बारम्बार प्राप्त करने की कामनाओं को पूरा करने के लिए हम सकाम कर्म करते हैं । सकाम कर्म का अर्थ है फल प्राप्त करने की कामना मन में रखते हुए कर्म करना । ऐसे किए जाने वाले प्रत्येक कर्म का सुख-दुःख के रूप में कोई न कोई एक परिणाम अवश्य ही निकलता है । उस परिणाम में आसक्त होकर मनुष्य फिर एक नई कामना के वशीभूत होकर और अधिक कर्म करने को उद्यत हो जाता है । इस प्रकार कामना और कर्म के चक्र से उसका बाहर निकलना असंभव हो जाता है ।

          कामना और कर्म का चक्र ही सुख-दुःख का सांसारिक चक्र है, इसे ही संसृति कहते हैं, जिसमें फँसकर जीव आवागमन से मुक्त नहीं हो पाता । मुक्त होने के लिए उसे कर्म के आश्रय को त्यागना आवश्यक है । कर्म इंद्रियों से होते हैं । इंद्रियाँ स्थूल शरीर का अंग है । इसका अर्थ हुआ कि केवल स्थूल शरीर का आश्रय ले संसार से मुक्त नहीं हुआ जा सकता । 

         प्रश्न उठता है कि इस शरीर की अष्टधा प्रकृति में ऐसा कौन सा तत्व है, जिसका सहारा लेकर हम इस संसार से मुक्त हो सकते हैं ? प्रकृति के आठ तत्वों में से स्थूल शरीर के पाँच तत्व तो इंद्रियों के कारण कर्म से संबंधित है । सकाम कर्म करते हुए संसार से मुक्त नहीं हुआ जा सकता, यह भी स्पष्ट है । ‘करना’ (कर्ताभाव) तो फिर से एक नया बंधन पैदा करेगा, वह बंधन अहं (मैं) और मम (मेरा) का ही होगा । इसलिए सबसे पहले ‘करना’ का त्याग होना आवश्यक है । ‘करना’ का त्याग करना जितना सोचते हैं, उतना सरल भी नहीं है । 

           स्थूल शरीर के पाँच तत्वों के अकेले अपने स्तर पर मुक्ति में अनुपयोगी सिद्ध हो जाने के बाद शेष बचते हैं, सूक्ष्म शरीर के तीन तत्व - मन, बुद्धि और अहंकार । मन चंचल है । उसकी चंचलता दृढ़ता पूर्वक निर्णय लेने में बाधक है । सूक्ष्म शरीर के दूसरे तत्व अहंकार के कारण ही तो जीवात्मा ने संसार के साथ तादात्म्य स्थापित किया है । अतः अहंकार का आश्रय लेने से केवल संसार के साथ बंधन को ही दृढ़ता मिलेगी, मुक्ति नहीं । मुख्य बात यही तो है कि अहं को संसार से अलग करना है और यह कार्य अहंकार की शरण में जाने से नहीं होगा । 

        अपरा प्रकृति के आठ तत्वों में से उपरोक्त सात तत्व संयुक्त रूप से भी संसार से मुक्ति के लिए इतने उपयोगी नहीं है । इसका अर्थ यह न लें कि मुक्ति में इनकी कोई भूमिका नहीं है । प्रत्येक तत्व मुक्ति के लिए महत्वपूर्ण है । जैसे शरीर के सभी अंग सामूहिक रूप से भी तब तक अनुपयोगी बने रहते हैं जब तक उन्हें मस्तिष्क का साथ नहीं मिलता । मस्तिष्क की मृत्यु होते ही सारा शरीर भी मृत हो जाता है । वैसे ही स्थूल शरीर के पाँच तत्व और सूक्ष्म शरीर के मन और अहंकार तब तक अनुपयोगी हैं, जब तक बुद्धि सक्रिय नहीं है ।              आठवें तत्व के रूप में सूक्ष्म शरीर का जो एक तत्व शेष बचता है, वह सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है - बुद्धि । हाँ, बुद्धि यह कार्य बखूबी कर सकती है क्योंकि दृढ़ता पूर्वक निर्णय केवल उसी के स्तर पर लिया जा सकता है । 

              बुद्धि अकेली भी कुछ नहीं कर सकती, जब तक स्थूल शरीर साथ न दे और साथ ही मन और अहंकार को बुद्धि अपने नियंत्रण में न ले ले । बुद्धि की विशेषता यही है कि वह अहंकार और मन पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकती है । जब मन और अहंकार पर बुद्धि का नियंत्रण स्थापित हो जाये और साथ ही स्थूल शरीर भी स्वस्थ हो, तो फिर मुक्ति सहज हो जाती है । इसीलिए गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बुद्धि का आश्रय लेने का कह रहे हैं -

दूरेण   ह्यवरं   कर्म   बुद्धियोगाद्धनंजय ।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: ।। गीता - 2/49 ।।

अर्थात् बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यंत ही दूर (निम्न श्रेणी का) है । अतः ही धनंजय ! तू बुद्धि का ही आश्रय ले; क्योंकि फल के हेतु (कारण) बनने वाले अत्यंत दीन (कृपण) हैं ।

                 कर्म की मुख्य रूप से तीन श्रेणियाँ हैं - कर्म, निष्काम कर्म और अकर्म । इनके बारे में पूर्व में भी कई बार विस्तार से विवेचन किया जा चुका है । बुद्धि का उपयोग कर हम कर्म की श्रेणी में परिवर्तन ला सकते हैं । सकाम कर्म के कारण ही सांसारिक बंधन पैदा होते हैं । सकाम कर्मों का मुक्ति से दूर-दूर तक का सम्बन्ध नहीं है अर्थात् संसार से मुक्ति चाहते हैं तो वह मुक्ति सकाम कर्म से नहीं हो सकती । सकाम कर्म संसार से सुख प्राप्त करने की आशा से किए जाते हैं । यह फलेच्छा ही मनुष्य के बंधन का कारण है । संक्षेप में यह समझना आवश्यक है कि जब निष्काम कर्म होते हैं, तब व्यक्ति संसार के साथ नहीं बंधता है, बल्कि मुक्ति की ओर ही अग्रसर होता है ।

         प्रश्न उठता है कि बुद्धि कर्म की श्रेणी कैसे परिवर्तित कर देती है ? संसार में आसक्त मनुष्य के कर्म शरीर से होते हैं और शरीर मन के निर्देशानुसार कार्य करता है । मन चंचल होता है, जिससे शरीर से कर्म भी अनियंत्रित रूप से होते हैं । अगर बुद्धि मन की चंचलता पर अपना अंकुश लगा देती है तो उससे स्थूल शरीर का नियंत्रण सीधा बुद्धि के पास आ जाता है । निर्णय लेने की क्षमता केवल बुद्धि के पास ही है, अपनी चंचलता के कारण मन निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता । 

           बुद्धि के तीन प्रकार हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक । बुद्धि के अनुसार ही कर्ता होता है और कर्म कर्ता ही करता है । कर्म कभी भी सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक नहीं होते बल्कि जैसा कर्ता होता है उसी अनुसार कर्म होते हैं । इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्ता केवल बुद्धि से ही नियंत्रित होता है । कर्ता जीवात्मा को कहा जाता है । वास्तव में देखा जाए तो जीवात्मा परमात्मा का अंश होने के कारण ‘न करोति न लिप्यते’ होनी चाहिए अर्थात् न तो वह कुछ करती है और न ही कहीं लिप्त होती है । परंतु संसार और शरीर को अपना मान लेने के कारण वह कर्ता बन जाती है ।

             जीवात्मा जब स्वयं को कर्ता मानने लग जाती है तब केवल बुद्धि ही उसका संसार से लगाव छुड़ा सकती है । इस स्थिति में आकर बुद्धि की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है । जीवात्मा परा प्रकृति है और बुद्धि अपरा । परा स्वतंत्र और नित्य है परंतु अपरा का साथ पाकर वह स्वयं को अपरा ही मानने लग जाती है जोकि परतंत्र और अनित्य है । अंततः परा का अपरा से सम्बन्ध विच्छेद कराने के लिए अपरा का ही आश्रय लेना पड़ता है । जीवात्मा को मनुष्य शरीर इसीलिए मिला है कि वह संसार से मुक्त हो सके और इसके लिए भगवान ने इस शरीर में स्थित बुद्धि को एक सशक्त माध्यम बनाया है ।

               बुद्धि में ज्ञान और विवेक पहले से ही रहता है । उनको सतह पर लाने में परिस्थितियों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है । जिस परिस्थिति में व्यक्ति दुःख का अनुभव करता है, केवल उसी परिस्थिति में ज्ञान का उदय हो सकता है अन्यथा तो सुख की परिस्थिति में तो अज्ञान से ज्ञान ढका रहता है । अज्ञान से ज्ञान ढका रहने पर इस स्थूल शरीर और इंद्रियों पर बुद्धि से अधिक मन का नियंत्रण रहता है । मन के नियंत्रण के कारण इंद्रियों द्वारा संपादित होने वाले कर्म व्यक्ति के समक्ष अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ पैदा करते हैं । विपरीत परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए मनुष्य बुद्धि का आश्रय लेता है जिससे अज्ञान से आच्छादित ज्ञान सतह पर आने लगता है जिसको सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचाने में सत्संग की भूमिका उत्प्रेरक की होती है । इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति का सदुपयोग करना चाहिए । अनुकूल परिस्थिति में उदार हो जाना चाहिए और प्रतिकूल परिस्थिति में इच्छाओं का त्याग कर देना चाहिए । यही परिस्थितियों का सदुपयोग करना है ।

            ज्ञान कहता है कि इस शरीर से होने वाला प्रत्येक कर्म प्रकृति के गुणों के कारण होता है । इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य के अहं अथवा मन की कर्म के संपादित होने में कोई भूमिका नहीं होती । गुणों की प्रत्येक  क्रिया को स्वयं द्वारा करना मान लेना ही उसे कर्म बनाता है । जब यह ज्ञान मनुष्य को हो जाता है तब उसका कर्ताभाव समाप्त हो जाता है । कर्तापन से स्वयं को अलग कर लेना संसार से मुक्त होने की ओर प्रथम कदम होगा ।

        बुद्धि का दूसरा कदम होता है कि फल की इच्छा का त्याग करना । जब कर्म करना मनुष्य के नियंत्रण में है ही नहीं, तो फल भी उसके नियंत्रण में नहीं रहेगा । इस बात का ज्ञान होते ही मनुष्य फल की इच्छा का भी त्याग कर देता है । फल की इच्छा ही मनुष्य के बंधन का एक मुख्य कारण है । फल की इच्छा का त्याग करते ही जो भी कर्म होंगे वे सभी निष्काम कर्म ही होंगे । निष्काम कर्म संचित नहीं होते और समय पाकर वे अकर्म हो जाते हैं, जिनका कोई भी फल नहीं होता ।

           बुद्धि का तीसरा कदम है, मनुष्य का अनासक्त हो जाना । इंद्रियों के जितने भी विषय हैं वे सब क्षणिक सुख-दुःख प्रदान करते हैं । सुख के प्रति व्यक्ति आसक्त हो जाता है और वह बार-बार उसी सुख को प्राप्त करने  की कामना करता है । यह भोग के प्रति आसक्ति उसको कर्म से मुक्त नहीं होने देती । सुख के प्रति राग ही संसार से मुक्ति में बाधक है । इसलिए यह आवश्यक है कि संयोगवश मिले विषय-भोग में मनुष्य रमण न करे बल्कि उसे त्याग पूर्वक भोगें । फिर उस रस के प्रति राग उत्पन्न ही नहीं होगा ।

            मुक्ति की ओर चौथा कदम - मन की चंचलता पर नियंत्रण । सोचा-विचारी में मन की भूमिका रहती है । सोचा-विचारी के कारण संकल्प-विकल्प होते हैं । संकल्प-विकल्प मुक्ति में बाधक हैं । बुद्धि में उपजे ज्ञान-विवेक मनुष्य को स्पष्ट करते हैं कि भविष्य में क्या होना अथवा क्या नहीं होना है, वह सब पूर्वनिर्धारित हैं । पूर्वनिर्धारित होने में व्यक्ति की स्वयं की भूमिका होती है क्योंकि यह सब उसका ही प्रारब्ध है । यह प्रारब्ध बनता है, पूर्व-जन्म के संचित कर्मों से । ज्ञान से मनुष्य का मन शान्त अर्थात् अमन हो जाता है जिससे उसके सभी संकल्प- विकल्प मिट जाते हैं ।

            पाँचवा कदम है, व्यक्ति की अहंकार से मुक्ति । अहंकार का सबसे बड़ा कारण है,मनुष्य का कर्तापन । ज्ञान होने पर व्यक्ति समझ जाता है कि वह किस बात का अहंकार करे ? जब सभी कर्म गुणों के कारण होते हैं, फल भी स्वयं की इच्छानुसार नहीं मिल सकता और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए वह स्वयं उत्तरदायी है, तो मनुष्य किस बात का अहंकार रखे । अहंकार के समाप्त होते ही मनुष्य का विवेक पूर्णरूपेण जाग्रत हो जाता है ।

           विवेक का सदुपयोग करना मनुष्य के हाथ में है । विवेक का सदुपयोग है, की गयी भूल को नहीं दोहराना, साथ ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति में शांत रहकर उनको सहना, सबमें परमात्मा को देखना, जिससे किसी के प्रति द्वैष पैदा नहीं होगा । विवेक का सबसे महत्वपूर्ण सदुपयोग है, स्वयं को परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना । यही प्रभु के प्रति शरणागति है । विवेकहीन मनुष्य इस अवस्था को उपलब्ध नहीं हो सकता ।

             इतने विवेचन से स्पष्ट है कि बुद्धि भले ही अपरा प्रकृति का एक तत्व है, परन्तु यह आपको परमात्मा के द्वार तक पहुँचा सकती है । ऐसा होना तभी संभव होगा, जब बुद्धि का उपयोग सही दिशा में किया जाए । सात्विक बुद्धि से ज्ञान और विवेक को आचरण में लाना ही उसका सदुपयोग है । बुद्धियोग का अर्थ कर्मयोग से ही है । जैसा पूर्व में बताया गया है कि बुद्धि से कर्मों का प्रकार (कर्मों की श्रेणी) परिवर्तित किया जा सकता है, जिसका अर्थ ही कर्मों को निष्काम की श्रेणी में लाने से है । इस प्रकार बुद्धियोग का सीधा सम्बन्ध कर्मों से है, न कि ज्ञान से । ज्ञान की भूमिका केवल इतनी ही है कि इससे मनुष्य को कर्म की होने वाली प्रक्रिया समझ में आ जाती है जिससे वह सकाम कर्मों को करने से बच जाता है और नैष्कर्म्यता को उपलब्ध हो जाता है ।

          बुद्धि का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है - समता । संसार से मुक्ति के लिए जितने भी सोपान पूर्व में बताए गए हैं, वे व्यक्ति की स्थिर बुद्धि के कारण ही संभव होते हैं । स्थिर बुद्धि ही समबुद्धि है । समबुद्धि के कारण व्यक्ति के आचरण में समता आ जाती है । समता के कारण उसके कर्म भी निष्काम हो जाते हैं । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने समता को ही योग कहा है ।

योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनंजय ।

सिद्ध्यऽसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।। गीता - 2/48 ।।

    हे धनंजय ! तू आसक्ति का त्याग करके, सिद्धि-असिद्धि में सम होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है ।

    जितने भी द्वंद्व है (सुख-दुःख, हानि-लाभ, सिद्धि-असिद्धि, राग-द्वेष आदि) उनके न रहने से जीवन में जो समता आती है, उस समता में स्थित होकर कर्म करने चाहिए । समता को ही ‘योग’ कहा जाता है ।

                             संसार के सभी जीव कर्म करने में लगे हुए हैं । कर्म शरीर के सुख के लिए किए जाते हैं । जो कर्म स्वयं के सुख के लिए किए जाते हैं, वे सकाम कर्म हैं । सकाम कर्म परमात्मा से विमुख करते हैं, इसलिए उनको निम्न श्रेणी का कहा गया है । बुद्धि की स्थिरता जीवन में समता लाती है । समता से कर्म की प्रकृति परिवर्तित हो जाती है । फिर कर्म स्वार्थ के लिए न होकर परमार्थ के लिए होते हैं । ऐसे कर्म बँधनकारी नहीं होते ।

        फलेच्छा से किए जाने वाले कर्मों से जीवन में समता नहीं लाई जा सकती । प्रत्येक कर्म का फल मिलना निश्चित है और वह फल बंधन पैदा करता है । संसार का निर्माण क्रियाओं से ही हुआ है अर्थात् संसार में क्रिया ही क्रिया है । क्रिया का फल पदार्थ है । पदार्थ में होने वाली क्रिया ही कर्म बनकर विषय-भोग उपलब्ध कराती है । प्रत्येक क्रिया का आरंभ और अंत होता है । इससे सिद्ध होता है कि कर्म, पदार्थ और विषय-भोग सभी आदि-अंत वाले हैं । इसलिए कर्मों का आश्रय लेना ही नहीं चाहिए ।

               परमात्मा ने अर्जुन को कर्म की बजाय बुद्धि का आश्रय लेने का कहा है क्योंकि मनुष्य के पास एकमात्र बुद्धि तत्व ही ऐसा हो जो उसके जीवन में समता ला सकता है । समता ही योग है और योग अविनाशी है । जो व्यक्ति बुद्धि का आश्रय लेता है वह पाप-पुण्य से दूर हो जाता है । समतापूर्वक कर्म करने से फलेच्छा समाप्त होकर कर्म से संबंध विच्छेद हो जाता है । जब कर्म से किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रहता तो फिर पाप अथवा पुण्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता । 

              गीता में भगवान ने कर्मफल के त्याग को सबसे बड़ा त्याग बताया गया है । कर्मफल के त्याग से अर्थ है, फल की इच्छा का त्याग । फल की इच्छा मनुष्य में कामना पैदा कर उसको कर्म करने को विवश करती है । समता में रहने वाला कर्म को मात्र प्रकृति के गुणों की क्रिया मानता है । क्रियाएँ मनुष्य को तभी प्रभावित करती है, जब वह उनमें आसक्त होता है । समता सदैव अनासक्त रखती है जिससे जीवन में किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति विचलित नहीं होता ।

           जीवन में जो भी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं, वे सब हमारे कर्मों  का ही परिणाम होती हैं । उन परिस्थितियों के लिए किसी दूसरे को दोष, यहाँ तक कि परमात्मा को भी दोष देना अनुचित है । हमारा स्वार्थ ही हमें उन परिस्थितियों तक ले जाता है । जीवन में समता आते ही परमार्थ भावना का जीवन में आगमन होता है, जो हमें शान्ति को उपलब्ध कराता है । बुद्धि का उपयोग जीवन को समत्व की स्थिति तक ले जाने में ही है । तुलाधार वैश्य समता का पालन करते हुए अपना व्यावसायिक कर्म करता था और केवल इसी आधार पर वह जीवन-मुक्त हो गया था ।

                बुद्धि की भूमिका कर्मयोग के साथ साथ ज्ञानयोग में भी रहती है । ज्ञानयोग परमात्मा को जानने में सहायक है । जितना भी ज्ञान मनुष्य अर्जित करता है वह सब उस परमात्मा को जान पाने के लिए अपर्याप्त है । इसीलिए सन्तजन कहते हैं कि परमात्मा बुद्धि का विषय नहीं है । यह जिस दिन हमारे समझ में आ जाएगा हम बुद्धि से भी परे चले जाएँगे और परमात्मा को उपलब्ध हो जाएँगे । बुद्धि से परे चले जाने का अर्थ है, प्राप्त ज्ञान को विस्मृत कर देना । यह विस्मृति स्मृति में तभी परिवर्तित होती है, जब परमात्मा के द्वार खुल जाते हैं । फिर वह ज्ञान अहंकार रहित होगा क्योंकि परमात्मा स्वयं ज्ञान स्वरूप हैं ।

            परमात्मा के प्रति शरणागत होने के लिए बुद्धि का आश्रय लेना आवश्यक है । जब तक मनुष्य मन के कहे अनुसार चलता रहेगा तब तक वह बंधनमुक्त नहीं हो सकता । स्थिर बुद्धि, मन को नियंत्रित कर सकती है । मन के नियंत्रित होते ही परमात्मा की ओर दृष्टि हो जाती है । संसार की नश्वरता का ज्ञान बुद्धि के माध्यम से ही हो सकता है । समत्व बुद्धि संसार की आसक्ति से दूर कर परमात्मा की और उन्मुख कर देती है । इसीलिए समता को योग कहा गया है । योग अर्थात् परमात्मा के साथ योग ।

           विवेचन के अन्त में प्रश्न उठता है कि भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बुद्धि का आश्रय लेने के लिए ही क्यों कहते हैं, मन का आश्रय भी तो लिया जा सकता है ?  

           मनुष्य के अंतःकरण जिसे सूक्ष्म या लिंग शरीर भी कहा जाता है, वह संसार के आवागमन में भूमिका निभाता है । इस संसार-चक्र के लिए मुख्य रूप से मन ही उत्तरदायी है क्योंकि मन की चंचलता के कारण कामनाओं और सकाम कर्मों से मनुष्य जीवन भर मुक्त नहीं हो पाता । इस मुक्त न हो पाने की अवस्था को ही संसार का बंधन कहा जाता है । संसार से मुक्ति के लिए अंतःकरण के तीनों तत्वों को भगवान को समर्पित करना होता है । अहंकार को बुद्धि में उपजे ज्ञान विवेक से समाप्त किया जा सकता है परंतु मन को नहीं । मन को बुद्धि के माध्यम से परमात्मा में स्थापित किया जा सकता है, जिससे उसकी चंचलता समाप्त हो जाती है । भगवान गीता में स्वयं कह रहे हैं - 

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।

निवासिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय: ।। गीता - 12/8 ।।

अर्थात् तू मुझमें मन को स्थापन कर और मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद तू मुझमें ही निवास करेगा - इसमें संशय नहीं है ।

        मन चंचल है, इसको स्थापन (fix) करना पड़ता है जबकि बुद्धि को परमात्मा में प्रवेश कराना होता है । बुद्धि मन के स्थापन में सहयोगी है, इसलिए भगवान श्रीकृष्ण बुद्धि का आश्रय लेने की बात कह रहे हैं । बुद्धि अंतःकरण का वह तत्व है जिसका आश्रय ले मनुष्य संसार-चक्र से मुक्त हो सकता है ।

       इस जगत् में जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, नेत्रों से देखा जाता है और श्रवण आदि इंद्रियों से अनुभव किया जाता है, वह सब नाशवान है । सब स्वप्न की तरह मन का विलास मात्र है ।  मन चंचल है । जिस मनुष्य का मन अशांत, असंयत है, उसको ही संसार में अनेकता दिखलाई पड़ती है । वास्तव में यह चित्त का भ्रम ही तो है । नानात्व (अनेकता) का भ्रम हो जाने पर ही ‘यह गुण है’ और ‘ यह दोष है’ इस प्रकार की कल्पना करनी पड़ती है । जिसकी बुद्धि में गुण और दोष का भेद बैठ गया है, उसी के लिए कर्म, अकर्म और विकर्म रूप में कर्मों के भेद कहे गए हैं । जिस बुद्धि में गुण-दोष का भेद बैठ गया है, वह सांसारिक बुद्धि है । मनुष्य को इस सांसारिक बुद्धि को आध्यात्मिक बुद्धि में बदलना होगा, तभी संसार से मुक्त होना संभव होगा अन्यथा नहीं ।

         आध्यात्मिक बुद्धि का विकास कैसे होगा ? भागवतजी में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को इसके बारे में बताते हैं । वे कह रहे हैं -

         तस्माद् युक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदं जगत् ।

         आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधीश्वरे ।। भागवत - 11/7/9 ।।

      हे उद्धव ! तुम पहले अपनी समस्त इंद्रियों को अपने वश में कर लो, उनकी बागडोर अपने हाथ में ले लो और केवल इंद्रियों को ही नहीं, चित्त की समस्त वृत्तियों को भी रोक लो और फिर ऐसा अनुभव करो कि यह सारा जगत् अपनी आत्मा में फैला हुआ है और आत्मा मुझ सर्वात्मा इन्द्रियातीत ब्रह्म से एक है, अभिन्न है ।

          इस प्रकार का अनुभव केवल बुद्धि से ही हो सकता है । इस प्रकार जो अनुभव करने वाली बुद्धि है, वही आध्यात्मिक बुद्धि कहलाती है । इसलिए भगवान ने अर्जुन को बुद्धि का आश्रय लेने का कहा है ।

          अंतःकरण चतुष्ट्य में मन, चित्त और अहंकार, ये तीन तो परमात्मा के अंतर्यामी स्वरूप के विभाग हैं । मन और इंद्रियों के माध्यम से वे सांसारिक विषयों के भोक्ता बनते हैं । वे हालाँकि विषय-भोगों में लिप्त नहीं होते परन्तु देहाभिमान (अहंकार) के कारण जीव स्वयं को ही कर्ता और भोक्ता मानकर शरीर में आसक्त हो जाता है । आसक्ति के कारण मन अपने भीतर फल की इच्छा रखते हुए इंद्रियों से सकाम कर्म कराता है । इस बात को भागवतजी में नौ योगीश्वरों में तीसरे योगेश्वर अंतरिक्षजी स्पष्ट करते हैं ।

        एवं सृष्टानि भूतानि प्रविष्ट: पञ्चधातुभि: ।

        एकधा दशधाऽऽत्मानं विभजञ्जुषते गुणान् ।। भागवत -11/3/4 ।।

     अर्थात् पञ्च महाभूतों के द्वारा बने प्राणी शरीर में परमात्मा ने अंतर्यामी रूप से प्रवेश किया और स्वयं को ही पहले मन के रूप में और इसके पश्चात् पाँच ज्ञानेंद्रिय तथा पाँच कर्मेन्द्रिय - इन दस रूपों में विभक्त कर दिया तथा उन्हीं के माध्यम से विषयों का भोग करने लगे ।

          इस प्रकार देहभिमानी जीव अंतर्यामी द्वारा प्रकाशित इंद्रियों के द्वारा विषयों का भोग करता है और इस पञ्चभूतों के द्वारा निर्मित शरीर को आत्मा अर्थात् अपना स्वरूप मानकर उसी में आसक्त हो जाता है । इसी कारण से उससे सकाम कर्म होते हैं और वह शरीर और संसार के साथ बंध जाता है ।

        परमात्मा ने जीवात्मा के रूप में आकर स्वयं को मन और दस इंद्रियों में विभाजित कर लिया और उनसे विषय-भोग के भोक्ता बने परंतु इस भोक्तापन से अंतःकरण चतुष्ट्य के चौथे अंश बुद्धि को अलग रखा । बुद्धि यदि मन की अनुगामी बन गई तो फिर जीव का संसार से मुक्त होना असंभव है । अतः बुद्धि को एक ही दिशा में रखते हुए उसको मन की अनुगामी न बनाएँ, तभी मुक्ति सहज हो सकेगी । स्थितप्रज्ञ में यही विशेषता होती है । अतः जीवन में बुद्धि को तीक्ष्ण और मन पर प्रभावशाली बनाएं ।

        कठोपनिषद् में कहा गया है कि यह शरीर एक रथ है । यह रथ जिन घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है, वे हमारी इंद्रियाँ है । इन घोड़ों की बाग (लगाम) को मन बताया गया है । यह लगाम जिस सारथी के हाथ में है, वह सारथी हमारी बुद्धि है । इस रथ का मालिक जीवात्मा है । जीवन रूपी इस चलते हुए रथ (शरीर) को देखें तो स्पष्ट है कि रथ को सारथी (बुद्धि) चलाता है, वह भी बाग को अपने नियन्त्रण में रखते हुए । जीवात्मा शरीर का मालिक बनी हुई इस रथ के पिछले भाग में बैठी है । कहने का अर्थ है कि इस शरीर में मन और जीवात्मा के मध्य बुद्धि है । जीवात्मा ने शरीर के साथ अपनापन कर लिया है और वह बुद्धि को उपेक्षित करते हुए सीधे मन और इन्द्रियों से विषय -भोग प्राप्त कर रहा है ।

           विभिन्न प्रकार के विषय इस शरीर से बाहर संसार में है । इंद्रियों का जब संपर्क विषयों से होता है तब उनके प्रति राग-द्वेष पैदा हो जाता है । जिस विषय के प्रति राग होता है, उसको जीवात्मा बार-बार पाने का प्रयास करती है । मन इंद्रियों को उन्हें पाने के लिए प्रेरित करता है । मन का नियंत्रण बुद्धि के पास भले ही हो, उसकी अवहेलना कर जीवात्मा सीधे मन को आदेश देने लगता है । इसीलिए जीवात्मा को सब विषयों की भोक्ता कहा जाता है ।

         बुद्धि अगर मनोमुखी है तो वह मन पर नियन्त्रण नहीं रख सकती और जीवात्मा के द्वारा चाहे गए भोग मन और इन्द्रियों के माध्यम से उसे उपलब्ध करवाती रहती है । यही बुद्धि अगर परमात्मा की ओर दृष्टि रखे तो वह जीवात्मा के आदेश की उपेक्षा कर सकती है । परंतु कैसे ?

           बुद्धि अगर जीवात्मा को मन से अलग कर दे तो इंद्रियों का नियंत्रण सीधा बुद्धि के पास आ सकता है । यह कार्य कठिन अवश्य है, असंभव नहीं है । मन की चंचलता के कारण जो बुद्धि बहुशाखाओं वाली हो गई है उसको केवल एक दिशा में लगाना आवश्यक है । 

         अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए चलिए ! कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में चलते हैं । कौरव और पाण्डव सेना के मध्य युद्ध प्रारम्भ होने जा ही रहा है कि रथ में बैठे अर्जुन को मोह हो गया है । भगवान उसके रथ के सारथी हैं, जो न तो युद्ध करेंगे और न ही इस युद्ध में वे लिप्त होंगे । अर्जुन कर्तव्य विमुख होकर विषाद कर रहे हैं । उसका मन विचलित है परंतु श्रीकृष्ण उसके मन (रथ की लगाम) को थामे हुए हैं । वे अर्जुन को ज्ञान देते हैं और उसे विषाद-मुक्त करते हुए कर्तव्य पथ की ओर मोड़ देते हैं ।

        अर्जुन जीवात्मा है और भगवान श्री कृष्ण बुद्धि है । जीवात्मा (अर्जुन) के विषाद का कारण उसका चंचल मन है । मन सामने की सेना में अपने संबंधियों को देखकर मोहग्रस्त हो गया है और इस कारण जीवात्मा युद्ध से होने वाले परिणाम का आकलन कर रही है । जीवात्मा (अर्जुन) की दृष्टि केवल अपने मन पर लगी है परंतु उसकी दृष्टि रथ की लगाम (मन) को थामे भगवान श्री कृष्ण (बुद्धि) की ओर नहीं है । श्रीकृष्ण तो साक्षात परमात्मा हैं, वे सभी बुद्धियों के स्वामी हैं, सभी बुद्धियों के दृष्टा हैं ।

      जब जीवात्मा जो अपने आप को शरीर और मन मान बैठी है, की दृष्टि बुद्धि पर जाती है तथा वह बुद्धि का आश्रय ले लेती है, तब जीवन के सभी विषाद समाप्त होने की संभावना बढ़ जाती है l बस, आवश्यकता है कि बुद्धि को विचलित न होने दें । श्री कृष्ण स्थिर और सम्यक बुद्धि के प्रतीक हैं । मन के अधीन हुई जीवात्मा बुद्धि को विचलित करने का बहुत प्रयास करती है, परन्तु बुद्धि से अर्जुन की तरह प्रश्न - प्रतिप्रश्न करते रहना चाहिए जिससे विषाद से निकलने के लिए सही मार्ग मिल सके, फिर किसी भी परिस्थिति में विचलित होना सम्भव ही नहीं होगा ।

बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ - 19

       जीवात्मा सभी भोगों की भोक्ता है, इसलिए वह सुखी-दुःखी होना अनुभव करती है । वास्तव में वह सुखी-दुःखी नहीं होती बल्कि शरीर सुखी-दुःखी होता है । इस बात का अनुभव मन को होता है, जीवात्मा को नहीं । यही वह अवसर है, जब मन पर बुद्धि प्रभावी हो सकती है । यदि इस अवसर का सदुपयोग कर बुद्धि मन को नियंत्रण में ले लेती है तो फिर इंद्रियाँ बुद्धि के अनुरूप चलने लगती है । ऐसी अवस्था में विषय-भोगों और कर्मों के प्रति आसक्ति धीरे-धीरे समाप्त होती जाती है और जीवात्मा को शरीर से अलग होने का अनुभव होने लगता है । फिर शरीर से कर्म स्वतः ही बिना फलेच्छा के होने लगते हैं ।

       भगवान स्वयं अर्जुन के सारथी बने हैं, जिससे अर्जुन युद्ध जैसी विपरीत परिस्थिति में विचलित न हो सके । ज्ञान देते हुए भगवान ने ही अर्जुन को बुद्धि का आश्रय लेने का कहा है । बुद्धि को स्थिर रखते हुए स्थितप्रज्ञ बनना है, तो श्री कृष्ण के जीवन को देखें, आपको सब बात समझ में आ जाएगी ।

       वसुदेवजी ने विपरीत परिस्थिति में भी भगवान के अवतरण को समझ लिया था क्योंकि सलाखों के पिछे रहते हुए, एक -एक कर अपनी सात संतानों के दुःख को सहते हुए भी वे कभी विचलित नहीं हुए क्योंकि वे स्थिर बुद्धि के स्वामी थे । स्थिर बुद्धि के स्वामी होने के कारण ही उनके घर परमात्मा पधारे ।

      इतने विवेचन का सार एक ही है कि हमें अपरा प्रकृति के एक मात्र तत्व, बुद्धि का आश्रय लेना है, जिससे हम अपने मूल सच्चिदानंद स्वरुप तक पहुंच सकें अन्यथा मन के सहारे तो चौरासी में भटकना ही निश्चित है ।

सार - संक्षेप  

        परमात्मा स्वयं ही सृष्टि के रूप में अवतरित हुए हैं । सृष्टि का संचालन करने के लिए परमात्मा ही जीवात्मा बने है । जीवात्मा का इस सृष्टि से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है । जीवात्मा तो स्वयं सृष्टि के सृजनकर्ता का अंश है परन्तु वह स्वयं को ही सृष्टि (शरीर) समझ सुख भोगने के लिए अपने एक संसार का अलग से सृजन कर लेता है । फिर उसी संसार के आश्रित होकर वह सुख - दुःख भोगता रहता है ।

      सृष्टि में जो भी परिवर्तन होते हैं, उससे परमात्मा पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता परंतु सृष्टि के जीव विचलित होते रहते हैं । जीवात्मा स्वयं परमात्म-स्वरुप है परंतु सृष्टि के परिवर्तन को अपने में होना मान कर सुखी -दुखी होता रहता है ।

       इस दुःख की निवृति के लिए उसे संसार और शरीर का आश्रय छोड़ बुद्धि का आश्रय ग्रहण करना होगा तभी वह शान्ति के साथ परमात्मा तक पहुंच सकता है । बुद्धि को भी उसे एक ही दिशा में स्थिर रखना होगा अन्यथा संसार और शरीर में आसक्त होकर मन का पुनः आश्रय ले लेगा । परमात्मा ही सभी बुद्धियों के दृष्टा हैं । उसी बुद्धि के माध्यम से वे सुखी दुखी न होकर सृष्टि से केवल आनन्द लेते हैं । हम उन्हीं के अंश हैं, फिर हम बुद्धि का आश्रय लेकर शान्ति को उपलब्ध क्यों नहीं हो सकते ?

         इस प्रकार अपरा प्रकृति के श्रेष्ठतम तत्व बुद्धि का सदुपयोग कर व्यक्ति शांति को उपलब्ध हो सकता है । भगवान ने गीता में इसीलिए बुद्धि का आश्रय लेने का कहा है । बुद्धि का आश्रय लेने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे स्वतः ही भगवान के आश्रय में चला जाता है । परमात्मा बुद्धि से भी परे हैं और बुद्धि से उनको जाना भी नहीं जा सकता। बुद्धि का आश्रय लेने से केवल संसार और शरीर से ममता छूट जाती है । इस प्रकार संसार से विमुख हुआ मनुष्य स्वतः ही परमात्मा के सम्मुख हो जाता है। आप भी बुद्धि का आश्रय लेते हुए योग में स्थित होकर कर्म करने से निश्चित ही परमात्मा को उपलब्ध होंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल

Thursday, January 25, 2024

संसृतिर्न निवर्तते

 संसृतिर्न निवर्तते 

          परमात्मा की सृष्टि यह जगत् है । जो सतत परिवर्तित हो रहा है, निरन्तर गतिमान है, वही जगत् है । इस जगत् में प्रत्येक प्राणी ने अपना एक संसार बना रखा है । उस संसार में उसकी ममता है । अपने संसार  का निर्माता वह स्वयं है, इसी बात की उसमें अहंता है । ‘मैं और मेरा’ की भावना के कारण ही भय और शोक ने उसके जीवन में स्थाई निवास बना लिया है । स्वनिर्मित संसार से जीव अपने जीवन में  सुखी-दुःखी होता रहता है । अन्य सभी जीव तो सुख-दुःख भोगने के लिए ही पैदा हुए हैं परंतु मनुष्य नामक जीव सुख-दुःख रूपी इस संसार में आवागमन के चक्र (संसृति) से बाहर निकलने के लिए छटपटाता रहता है ।

         मनुष्य के जीवन की वास्तविकता है कि जो कुछ भी उसे यहाँ मिला है वह एक निश्चित ऋणानुबंध के अनुसार मिला है, चाहे वे व्यक्ति हो अथवा भोग-पदार्थ । उनमें आसक्ति कर लेना ही मनुष्य को दुःखी करता है क्योंकि जिनसे मिलना निश्चित हुआ है उनसे एक दिन बिछड़ना भी निश्चित है । आसक्ति बिछड़ने को स्वीकार नहीं कर पाती इसलिए मनुष्य दुःख का अनुभव करता है । जब मनुष्य दुःखी होता है, तब उसे संसार दुखालय प्रतीत होता है और वह उससे निवृत्त होना चाहता है ।

           मनुष्य की इस संसार-चक्र से बाहर निकलने की इच्छा तो बहुत होती है परन्तु अहंता-ममता के कारण वह निकल नहीं पाता । अहंता-ममता के कारण मनुष्य को शरीर पर शरीर लेकर बार-बार इस दुःख भरे संसार में आना पड़ता है । हमारे संत और शास्त्र इस विषय पर बहुत कुछ समझाते हैं परंतु विडंबना है कि मनुष्य की इस आवागमन से निवृत्ति नहीं हो पाती । क्यों नहीं हो पाती हमारी निवृत्ति इस आवागमन के चक्र से ? 

          इस संसार में पदार्पण करने वाला प्रत्येक प्राणी यहाँ आकर इस भाँति उलझ जाता है कि यहाँ से निकल जाने की उसकी इच्छा तक नहीं होती । प्रत्येक प्राणी की इच्छा उसकी अपनी होती है । एक प्राणी की इच्छा जैसी ही इच्छा दूसरे प्राणी की हो, असम्भव है । यही कारण है कि इन जीवों के मध्य कुछ न कुछ पाने के लिए सदैव प्रतिस्पर्धा बनी रहती है । मनुष्य भी इसी संसार का शरीरधारी एक जीव है, इसलिए वह भी इस स्तर पर अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है । फिर भी मनुष्य और अन्य जीवों में एक स्तर पर भिन्नता अवश्य है । उस भिन्नता के कारण ही मनुष्य को सभी जीवों में विशिष्ट स्थान मिला है ।

                 मनुष्य और अन्य जीवों में जो भिन्नता है, वह भिन्नता है; संसार-चक्र से मुक्त होने की इच्छा के कारण । अन्य प्राणियों ने तो केवल भोग भोगने के लिए शरीर धारण किए हैं परंतु मनुष्य का शरीर केवल विषय-भोग के लिए ही नहीं बना है । वह शरीर संसार-चक्र से मुक्त होने के लिए भी बना है । संसार से मुक्त होने की इच्छा मनुष्य के अधीन है क्योंकि प्रत्येक इच्छा का जनक वह स्वयं ही है । जो मनुष्य संसार से मुक्त होने की इच्छा नहीं रखता उसका जीवन अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं हो सकता । कुछ मनुष्य संसार से निवृत्त होने की इच्छा तो रखते हैं फिर भी उनकी निवृत्ति हो नहीं पाती । क्योंकि उनकी यह इच्छा मात्र दिखावे के लिए है अन्यथा कोई कारण नहीं है कि व्यक्ति मुक्त न हो सके । 

           मुक्ति तो स्वतः सिद्ध है । बस, जो बेड़ियाँ उसने ख़ुद पहनी है, उन बेड़ियों को उतार फैंकना होगा । इन बेड़ियों से उसे कोई दूसरा मुक्त न कर सकेगा । जिन कारणों के कारण व्यक्ति की संसार से निवृत्ति नहीं हो पाती उन कारणों पर जब तक दृष्टिपात नहीं करेंगे, निवृत्ति स्वप्न बनकर ही रह जाएगी ।

        इस संसार को दु:खालय कहा जाता है । जीवन में दुःख ही दुःख होने के कारण इस संसार को दुःखमय कहा गया है । प्रकृति किसी को सुखी-दुःखी नहीं करती । परमात्मा ने प्रकृति के कुछ नियम बनाए हैं, उन नियमों की अवहेलना करने से ही मनुष्य दुःखी होता है । परमात्मा का बनाया संसार सुख-दुःख के द्वन्द्व से मुक्त है परन्तु मनुष्य द्वारा अपने सुख के लिए बनाया संसार दुःख से भरा पड़ा है । इसके लिए मनुष्य स्वयं उत्तरदायी है क्योंकि उसने अपने जीवन में केवल सुख की ही कामना की है । उसे जीवन में केवल सुख ही सुख चाहिए क्योंकि वह दुःख से सदैव दूर रहना चाहता है । सुख प्राप्त करने के लिए उसने अपना एक संसार बसाया । इस संसार के अन्तर्गत पत्नी, संतान, मित्र, घर, परिवार, धन-सम्पति आदि आ जाते हैं ।

         चूँकि उसने सुख के लिए अपना संसार बनाया है, अतः उसमें अहंता और ममता का होना अवश्यंभावी है । अहंकार इस बात का कि मेरे पास इतना धन है, इतने मकान हैं, मेरे पुत्र आज्ञाकारी है आदि आदि । जब अहंकार आता है तब व्यक्ति अपना मूल स्वरूप भूल जाता है । संसार और शरीर को अपना मान लेना ही अहंकार है । अहंता का अर्थ है - “मैं” । “मैं” ही सब कुछ हूँ । मैंने ही इतना धन इकट्ठा किया है, मैं सब कुछ कर सकता हूँ, ऐसी अहंता रखना ही संसृति से निवृत्ति में बाधक है । उसकी यह अहंता स्वनिर्मित संसार में ममता पैदा कर देती है । ममता का अर्थ है - “ मेरा” । यह “ मैं-मेरा” की भावना उसे संसार के साथ बाँध देती है । एक बार जो इस स्वनिर्मित संसार के साथ बंध जाता है, वह जीवन भर सुखी-दुःखी होता रहता है । केवल दुःखी ही नहीं होता बल्कि बार-बार इस संसार में नए-नए शरीर धारण कर आता-जाता रहता है ।

        'सब कुछ मैंने प्राप्त किया है’, यह व्यक्ति की अहंता है । प्राप्त वस्तु को अपना और अपने लिए मान लेने का नाम ममता है । अप्राप्त को प्राप्त करने की भावना रखना कामना कहलाती है । प्राप्त वस्तु को और अधिक प्राप्त कर भविष्य को सुरक्षित करने के लिए संग्रहित कर लूँ, यह व्यक्ति की स्पृहा है । व्यक्ति में जितने भी विकार प्रवेश करते हैं, उनके पीछे उसकी अनन्त कामनाएँ हैं । प्राप्त वस्तु के कारण उत्पन्न हुई अहंता से राग पैदा होता है । राग से उस वस्तु में आसक्ति, आसक्ति से उसके प्रति ममता और ममता से कामना पैदा होती है । कामनाओं से ही अनेक प्रकार के विकारों की उत्पत्ति होती है । एक कामना पूरी होती है तो मनुष्य लोभी हो जाता है और फिर नई कामना के वशीभूत होकर संग्रह करने में लग जाता है । जिसकी कामना पूरी नहीं होती, उसे क्रोध आने लगता है । क्रोध उन परिस्थितियों और व्यक्तियों पर जिनको वह कामनाओं के पूर्ण होने में बाधक समझता है ।

       इतने विवेचन से स्पष्ट है कि हमारे सुख-दुःख का कारण परमात्मा का बनाया संसार न होकर अपना बनाया संसार ही है । इस अपने बनाए संसार में अहंता-ममता हो जाने के कारण हम इसमें उलझ जाते हैं । इस प्रकार अहं और मम के कारण मनुष्य में बार-बार सुख-भोग की कामना पैदा होती है जोकि बढ़कर स्पृहा में परिवर्तित हो जाती है । जब कोई कार्य हमारे अनुरूप नहीं होता तब अहंता को चोट पहुँचती है और हम दुःखी हो जाते हैं । ममता की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । जगत् का कोई अन्य व्यक्ति हमारी कामना के अनुसार कोई कार्य नहीं करता तो हम दुःखी नहीं होते क्योंकि उस व्यक्ति के प्रति हमारी ममता नहीं है । “मैं”, “मेरा” और “मेरे लिए” की भावना ही संसार-चक्र में व्यक्ति को बांधकर रखती है । इस संसृति से निवृत्ति के लिए, आवगमन के चक्र से बाहर निकलने के लिए इन सबका त्याग करना आवश्यक है ।

          अहंता, ममता, कामना और स्पृहा; ये चारों आपस में संबंधित और एक दूसरे की पोषक है । इनके उद्भव के मूल में जो है, उसको जानना महत्वपूर्ण है । इनकी जनक को नियंत्रित करने से इन चारों पर नियंत्रण स्वतः ही हो जाएगा । इन चारों की जनक है हमारी आसक्ति । आसक्ति जब कर्मफल और उससे मिलने वाले भोग के प्रति होती है, तब कामना का जन्म होता है । कामना के कारण ही व्यक्ति संसार में उलझ जाता है । 

             कामना के कारण इंद्रियों के माध्यम से कर्म संपन्न होते हैं । इंद्रियों से कर्म होते हैं, सुख पाने की कामना से । यह सुख मिलता है विषय और इंद्रिय के संयोग से । सुख मिलने पर व्यक्ति उस विषय-भोग में आसक्त हो जाता है । यह भोग और भोग प्रदान करने वाले पदार्थ/व्यक्ति के प्रति उसकी ममता को दर्शाता है । 

सुख मिलने पर व्यक्ति स्वयं को उस कर्म का कर्ता मान लेता है । यह कर्ताभाव उसमें अहंकार पैदा करता है । अहंकार उसे स्वरूप से दूर कर देता है ।

             अहंता के कारण मनुष्य में ‘मैं’ की भावना पैदा होती है । ‘मैं’ के कारण ‘मेरा” का जन्म होता है । यह ‘ मेरा’ ही ममता है ।’ मैं’, ‘ मेरा’ के बाद जन्म होता है, ‘ मेरे लिए’ का । ‘ मेरे लिए’ मनुष्य के स्वार्थ का द्योतक है । इस प्रकार कामना के कारण बात बढ़कर ममता और अहंता तक पहुँच जाती है । सुखासक्ति के कारण भविष्य के लिए जब व्यक्ति को सुख में सम्भावित कमी आना लगता है, तब वह सुख के साधनों के संग्रह में लग जाता है । यह उसकी स्पृहा है । स्पृहा एक प्रकार से भविष्य में जीवनयापन की सोच रखते हुए कामनाओं को विस्तार देना है । “जब यह शरीर वृद्ध हो जाएगा, शरीर की कार्य क्षमता में कमी आने लगेगी तब इस शरीर का निर्वाह कैसे होगा ?” व्यक्ति की यही सोच उसकी स्पृहा है, जिसके वशीभूत होकर वह और अधिक संग्रह करने में जुट जाता है ।

                यह शरीर क्षणभंगुर है, यह प्रत्येक मनुष्य जानता है, फिर भी मनुष्य अपने जीवन को सदैव के लिए सुरक्षित करना चाहता है । वह इस संसार के पदार्थों का सुख प्राप्त करते हुए उन्हीं साधनों का संग्रह करता है, जो स्वयं क्षणभंगुर है । जिस दिन यह बात उसके मनोमस्तिष्क में स्पष्ट हो जाएगी, तब वह अपरिग्रह के रास्ते को पकड़ेगा, उससे पहले नहीं ।

           अहंता, ममता, कामना और स्पृहा के पीछे संयोगजन्य सुख के प्रति आसक्ति और मनुष्य का स्वार्थ, मुख्य रूप से ये दो ही हैं । मनुष्य के जीवन में प्रथम सुख उसे संयोगवश ही मिलता है । यह संयोग हालाँकि उसके प्रारब्ध के कारण ही बनता है, परंतु उसे इस जीवन में उसका ज्ञान नहीं रहता । इस प्रथम संयोग के कारण ही वह सुख के प्रति आसक्त होता है और फिर उसके भीतर उसी सुख को पुनः और बार-बार प्राप्त करने की कामना पैदा होती है ।

        जिसने इस आसक्ति के दुष्परिणाम को समय रहते समझ लिया वह संसार में नहीं उलझता । परन्तु विषय और इंद्रियों का बार-बार होने वाला संयोग उसे संयोगजन्य सुख के प्रति आकर्षित करता रहता है । इस आकर्षण में कोई बिरला ही फँसने से बच सकता है, प्रायः तो लोग इस सुख का रसास्वादन करने को विवश हो ही जाते हैं ।

         संयोगजन्य सुख के कारण जब अहंता घर करती है, तब मनुष्य स्वार्थी हो जाता है और संसार के सुखों को केवल अपने लिए ही मानने लगता है । स्वार्थ की भावना मनुष्य में कामनाओं की वृद्धि करने में सहायक होती है । इस प्रकार ‘मैं’, ‘ मेरा’ और ‘ मेरे लिए’ इन तीनों से दूर रहना आवश्यक है, तभी संसृति से निवृत्ति होगी अन्यथा आवागमन कभी भी नहीं मिट पाएगा ।

       स्वनिर्मित संसार को किसी भी प्रकार की क्षति से दूर रखने के लिए मनुष्य सदैव भयग्रस्त रहता है । इसको तनिक सी क्षति पहुँचते ही वह शोकग्रस्त हो जाता है । धन इस स्वनिर्मित संसार का एक महत्वपूर्ण अंग है । स्वनिर्मित संसार के जन-धन की क्षति कोई भी मनुष्य स्वीकार नहीं कर पाता इसलिए वह जीवनभर भय और शोक से मुक्त नहीं हो पाता । भय और शोक से मुक्त रहने के लिए एक बात सदैव अपनी स्मृति में रखें कि इस संसार में कुछ भी स्थाई नहीं है, यहाँ तक कि धन और जन भी । यह सत्य है फिर हम भोग और संग्रह में लगे हुए हैं । एक दृष्टान्त के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट करते हुए विवेचन में आगे बढ़ते हैं ।

           एक धनी व्यक्ति अपने घर से बाहर निकल ही रहा था कि उसे सामने से एक फ़क़ीर आता हुआ दिखाई दिया । फ़क़ीर को देखकर कि वह उससे कहीं कुछ माँग न ले, सोचकर धनी वापस घर में घुसने लगा । तभी पीछे से फ़क़ीर ने एक स्वर्ण मुद्रा उछालकर सड़क पर फैंकी । लोभी व्यक्ति को गरीब की चीत्कार भले ही सुनाई न दे, सिक्के की तनिक सी खनखनाहट उसका ध्यान आकर्षित कर ही लेती है । इस धनी व्यक्ति के साथ भी यही हुआ । स्वर्ण मुद्रा से निकली टन्न की आवाज़ धनी के कानों तक भी पहुँची । उसने पीछे मुड़कर देखा । 

             मुद्रा के गिरने से उठी टन्न की ध्वनि ने सेठ को उस दिशा में देखने को मजबूर कर दिया । सेठ को इस प्रकार देखते हुए देखकर फ़क़ीर हंस पड़ा । बोला - “सेठ ! मैं तुमसे कुछ माँगने नहीं आया हूँ बल्कि आज कुछ देने आया हूँ । मैं आज यह स्वर्ण मुद्रा तुम्हें देता हूँ परन्तु मेरी एक शर्त है ।”

 “ क्या शर्त है?” धनी बोला ।

 फ़क़ीर ने कहा - “मैं तुम्हारा ख़ज़ाना केवल एक घण्टे के लिए जी भर कर देखना चाहता हूँ । उसको छूकर अवश्य देखूँगा परंतु उसमें से कुछ भी साथ लेकर नहीं जाऊँगा । इतना सब करने के लिए मैं यह स्वर्णमुद्रा तुम्हें अग्रिम दे रहा हूँ । मुझे न तो तुम्हारे ख़ज़ाने से एक पाई लेनी है और न ही यह मुद्रा वापिस चाहिए । यह शर्त स्वीकार हो तो ठीक है, नहीं तो मैं किसी और सेठ की तलाश में आगे जाता हूँ ।”

       फ़क़ीर तो फ़क़ीर होते हैं । उन्हें रुपए-पैसे का लोभ नहीं होता और न ही जीवन-यापन की कोई फ़िक्र । वे तो मस्तमौला होते हैं, खाना मिला तो ठीक नहीं तो भूखे ही सो गए । वे तो अपनी अजीब सी हरकतों से अज्ञानियों की आँखें खोलने का प्रयास करते हैं । सेठ लालची तो था ही । उसने सोचा कि एक घण्टे के लिए ख़ज़ाने को देखना, छूना और बदले में कुछ भी न लेना, एक स्वर्णमुद्रा में यह घाटे का सौदा तो कदापि नहीं है । फिर भी फ़क़ीर ऐसा क्यों करना चाहता है ? कहीं इसमें कोई राज़ तो नहीं है ? एक स्वर्णमुद्रा का लोभ सेठ के मस्तिष्क पर इस सीमा तक हावी था कि उसने तत्काल ही हाँ कर दी । 

         सेठ ने उस फ़क़ीर से एक स्वर्ण मुद्रा ली और उसके साथ अपने घर में प्रवेश किया । तलघर के ताले खोलकर उसने फ़क़ीर को अपना ख़ज़ाना दिखलाया । ख़ज़ाने में पड़े हीरे-मोती के गहने, स्वर्ण की ईंटे, रजत के सैंकड़ों थाल और असंख्य स्वर्ण मुद्राएँ देखकर फ़क़ीर उछल पड़ा । कहने लगा - “ आह ! मेरे पास आज कितनी अकूत सम्पति है । आज मैं संसार का सबसे धनी व्यक्ति हूँ ।” 

          फ़क़ीर के मुँह से यह सुनकर सेठ हक्का-बक्का रह गया और फ़क़ीर से बोला - “यह सम्पति तुम्हारी कहाँ से हुई, यह तो मेरी है ।” फ़क़ीर ज़ोर से बोला - “ सेठ ! चुप कर यह  ‘मेरी- मेरी’ । अभी एक घण्टे के लिए यह ख़ज़ाना मेरा है । ऐसा कहने के लिए मैंने तुम्हें एक स्वर्ण मुद्रा दी है ।” 

          सेठ की तो सिट्टीपिट्टी गुम हो गई । एक स्वर्ण मुद्रा के लालच में आकर कहीं वह ठगा तो नहीं गया । फिर सोचा कि यह तो फ़क़ीर है । इसके लिए तो धन मिट्टी के समान है । हो सकता है फ़क़ीर केवल मज़ाक़ के लिए ऐसा कह रहा हो । सिर पर झलक आए पसीने को उसने कंधे पर लटक रहे तौलिए से पोंछा और अपने दिल को थोड़ी तसल्ली दी ।

          सेठ थोड़ा शान्त हुआ और बोला - “ लेकिन वह मुद्रा तो केवल ख़ज़ाने को एक घण्टे तक देखने और छूने के लिए दी है, लेकर जाने के लिए नहीं ।” फ़क़ीर बोला - “ कौन कमबख़्त इसे लेकर जा रहा है ? किसको चाहिए तेरा यह धन ? हम तो फ़क़ीर हैं । हमारा इन सब में कोई मोह नहीं है । मोह होता तो क्या फ़क़ीर होते ? तेरा ख़ज़ाना तुम्हें मुबारक । पर मेरी एक बात ध्यान से सुन, न तो तू इस ख़ज़ाने को अपने साथ ले जा सकता है और न ही मैं लेकर जाऊँगा । जैसे यह सम्पति एक घण्टे के लिए मेरी है, वैसे ही इस शरीर के रहने तक तुम्हारी रहेगी । वास्तव में यह न तो तेरी है और न ही मेरी । तू व्यर्थ में ही इसको मेरी-मेरी कह रहा है । सेठ ! ले सम्भाल अपनी सम्पति, एक घण्टा हो गया है, मैं तो जा रहा हूँ । परंतु मेरी एक बात याद रखना, यह सम्पति किसी की नहीं है । तू व्यर्थ ही इस पर इठला रहा है ।”

         सेठ की धन-सम्पति में ममता थी । उसी ममता के कारण उसकी लोभ प्रवृति हो गई । ऐसी ममता उसे संसृति से कभी निवृत नहीं होने देगी । अपने उसी ख़ज़ाने को सँभालने के लिए सेठ को विभिन्न रूपों में बार-बार इस संसार में आना होगा, कभी साँप बनकर और कभी कुत्ता बनकर । संसार-चक्र ऐसा ही है । जो इसको शरीर रहते नहीं समझ पाता वह अपना मनुष्य जीवन व्यर्थ ही खो रहा है । बैंक का कर्मचारी भी सेठ की तरह ही दिनभर रुपयों का आदान-प्रदान करता है परन्तु उन रुपयों में उसकी ममता नहीं है और न ही उसमें आसक्ति होती है क्योंकि वह जानता है कि ये सब मेरे नहीं है । जहां “ मेरा” शब्द आ गया वहीं ममता हो गई, फिर आवागमन से मुक्त होना असंभव हो जाता है ।

             इस संसार में जो अहंता, ममता आदि रखते हुए कामना और स्पृहा को पूरा करने के प्रयास में दिन-रात एक कर रहे हैं, उनको समझ लेना चाहिए कि यह जगत् नीन्द में देखे जाने वाले स्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं है । हम सपने को जंजाल (भ्रम) कहकर सुबह उठते ही उसे त्याग देते हैं लेकिन अपने बनाए संसार के बारे में ऐसा न तो कहते हैं और न ही करते हैं । वास्तव में स्वप्नवत् इस संसार को त्यागना बड़ा ही मुश्किल है । इसका त्याग करना मुश्किल हो सकता है परंतु असंभव नहीं है । कब इस शरीर की आँखें सदैव के लिए बन्द हो जाएगी, कहा नहीं जा सकता । तभी तो इस संसार को स्वप्नवत् बताया गया है । संतजन और शास्त्र सभी यही बात कहते हैं । शिवजी मानस में पार्वती को कह रहे हैं -

        उमा कहऊँ मैं अनुभव अपना । 

        सत हरि भजन जगत सब सपना ।।

                           राजा जनक के जीवन का एक वृतांत है । एक रात को नींद में राजा जनक ने स्वप्न देखा कि वे राजा न होकर भिखारी हैं और एक शमशान में भूखे-प्यासे पड़े हैं । उनका कृशकाय शरीर भूख से बिलबिला रहा है । शरीर में इतनी शक्ति भी नहीं बची है कि भीख मांगने के लिए इधर-उधर कहीं जा सके । हाथ में कोई कटोरा भी नहीं था जिसमे वे भिक्षा का कुछ अन्न भी ले सके । उन्होंने आस पास मिट्टी से बने एक टूटे फूटे पात्र की तलाश की परन्तु वे ऐसे किसी भी पात्र को ढूंढ पाने में असफल रहे । अंत में उन्हें एक मानव कपाल नज़र आया । उन्होंने उसे ही अपना भिक्षा पात्र बना लिया । अब तक उनकी भूख और अधिक तीव्र हो चुकी थी । उन्होंने किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश शुरू की, जो उन्हें भिक्षा के रूप में कुछ खाने को दे सके । अंत में उनकी तलाश पूरी हुई । एक साधारण सी महिला ने रात के खाने में से बचा हुआ थोडा सा रूखा सूखा बासी भोजन उनके खप्पर में डाल दिया । 

        जनक ने इतना सा भोजन पाकर भी यूँ महसूस किया मानो पूरे विश्व की धन-सम्पति उन्हें प्राप्त हो गयी हो । वे उसको उदरस्थ करने की सोच ही रहे थे कि आसमान से एक चील ने उनके खप्पर, उनके भिक्षा पात्र को झपट्टा मारा । उनके हाथ से भिक्षा पात्र नीचे कीचड़ में गिर पड़ा । भिक्षा में प्राप्त सारा अन्न कीचड़ से सनकर खाने योग्य नहीं रह गया था । भिखारी जनक की हिम्मत टूट गई । अब उनका बचा खुचा धैर्य भी जवाब दे चूका था । उनके मुंह से चीत्कार निकल गयी । बदहवास से होकर वे भोजन के लिए इधर उधर दौड़ने लगे । अचानक एक पत्थर की ठोकर लगी और भिखारी जनक धरती पर गिर पड़े । भिखारी जनक के पत्थर की ठोकर से उठे दर्द के कारण राजा जनक का सपना टूट गया । उन्होंने पाया कि वे अपने राज-महल में  आरामदायक पलंग पर सो रहे हैं । 

            उन्हें बड़ा ही अचरज हुआ कि अभी कुछ पल पहले वे अपने आपको किस रूप में देख रहे थे और दूसरे ही पल वे क्या से क्या हो गए हैं ? अभी थोड़ी देर पहले स्वप्न में वे एक रोटी के छोटे से टुकडे के लिए तरस रहे थे और इधर नींद से जागते ही वे राजा हैं और उनके पास सभी प्रकार की भोग सामग्री भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं । स्वप्न भ्रम है, यह जानते हुए भी वे अपने स्वप्न को चाहकर भी भूला नहीं पा रहे थे । वे शेष रात्रि की अवधि को करवटें बदलते हुए व्यतीत कर रहे थे । आखिर रात्रि ने विदा ली और प्रभात वेला में राजा जनक उठकर तैयार होने लगे । उनको जल्दी थी, अष्टावक्रजी के पास जाने की, उनसे अपने स्वप्न के बारे में जानने की और अपनी वास्तविकता को जानने की । वे जानना चाहते हैं कि दोनों में से कौन सी अवस्था सत्य है और कौन सी असत्य ?

             अष्टावक्र, (जिनका शरीर आठ स्थानों से मुड़ा हुआ था) राजा जनक के गुरु थे । उनकी बुद्धि-विवेक का विकास गर्भावस्था में भी उच्च अवस्था तक पहुँच चुका था । गर्भावस्था के दौरान एक दिन उन्होंने पाया कि उनके ऋषि पिता वेद मंत्रों और श्लोकों का गलत उच्चारण कर रहे हैं । उन्होंने अपने पिता को गर्भ के भीतर से ही आवाज़ देकर बार-बार आगाह किया । उन्होंने आठ बार अपने पिता को उनके उच्चारण में हुई अशुद्धियों के बारे में बताया । प्रत्येक बार उनके पिता ने अहंकारवश इसे अनुचित मानते हुए उनके एक-एक अंग को टेढ़ा हो जाने का श्राप दिया । इस प्रकार कुल आठ बार ऐसा होने पर उनके शरीर के विभिन्न भाग आठ स्थानों से टेढ़े यानि वक्रता लिए हुए हो गए । जब वे पैदा हुए तब उनका शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था इसी कारण से उनका नाम अष्टावक्र पड़ गया । वे अद्वेतवादी थे । 

           अद्वेतवादी अर्थात् संसार में एक मात्र शक्ति या परम ब्रह्म को मानना, किसी अन्य के अस्तित्व को नकारना । सब कुछ परमात्मा ही है , प्रत्येक सजीव, प्रत्येक निर्जीव सब कुछ । एक  परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य का अस्तित्व ही नहीं है । जो कुछ भी इस संसार में है, हो रहा है या भविष्य में होने वाला है, वह सब कुछ उस एक का ही खेल है और एक मात्र वही सब कुछ है, वही करता है और वही व्यक्त होता है । प्रकृति भी वही है, व्यक्ति भी वही है, वही सब करता है और वही करवाता है । वह अपनी मर्जी से सारा खेल चलाता है और अपनी मर्जी से उस खेल को समेट भी लेता है । आज के इस युग में अद्वेतवादी बहुत कम ही देखने को मिलते है । आदिगुरू शंकराचार्य अद्वेतवादी थे । अष्टावक्र भी मात्र एक परमब्रह्म को ही मानने वाले अद्वेतवादी ही थे ।

                    राजा जनक अपने रात को देखे स्वप्न से इतने उद्वेलित थे कि उन्होंने देरी करना उचित नहीं समझा और शीघ्रता से तैयार होकर पहुँच गए अपने गुरु अष्टावक्र के पास । अष्टावक्र ने उनको समय से पहले आया देखकर उन्हें आदर सहित बिठाकर आने का प्रयोजन पूछा । राजा जनक ने रात को देखे गए स्वप्न को विस्तार से बताकर पूछा - "हे आचार्य ! जो कुछ भी मैंने रात को सपने में देखा वह असत्य है या सत्य तथा जो मैं वर्तमान में हूँ वह सत्य है या असत्य ?" अष्टावक्र महाराज ने उन्हें शांति के साथ उनके प्रश्न का उत्तर दिया- "राजन ! न तो स्वप्न सत्य है और न ही वह जो आप वर्तमान में है । यहाँ संसार में जो कुछ भी आप जागते हुए देख रहे हो अथवा निद्रावस्था में जो कुछ भी अनुभव करते हो, सब कुछ स्वप्नमात्र है । सत्य केवल एक परमात्मा ही है, जो दोनों ही अवस्थाओं को निरपेक्ष भाव से देखता है । दोनों ही अवस्थाओं में जो कुछ आप स्वयं के साथ होना अनुभव कर रहे हैं वह सब स्वप्न ही है, स्वप्न के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । अतः आपको किसी भी परिस्थिति में विचलित होने की आवश्यकता नहीं है ।”

           यह सुनकर राजा जनक आश्चर्यचकित रह गए । उनकी उलझन सुलझने के स्थान पर और अधिक बढ़ गयी । उन्होंने पुनः अष्टावक्र से पूछा -"गुरुदेव ! मैं कुछ समझा नहीं । कृपा करके इस बात को और अधिक विस्तार देकर स्पष्ट करने की कृपा करें ।”  अष्टावक्र ने उत्तर दिया - "राजन ! इस संसार में कोई भी व्यक्ति राजा से भिखारी कभी भी हो सकता है और एक भिखारी कभी भी राजा बन सकता है, आपका ऐसा सोचना सत्य है ।" राजा जनक ने सहमति में अपना सिर हिलाया और स्वीकार किया कि आप सत्य कह रहे हैं । 

                अष्टावक्र ने आगे कहा -"यह सपना और वर्तमान आपके नियंत्रण में कदापि भी नहीं है जबकि आप सोच रहे हैं कि वर्तमान आपके नियंत्रण में है और स्वप्न आपके नियंत्रण से बाहर है । आप ऐसा समझ रहे हैं कि सपना असत्य है और वर्तमान सत्य | अगर आप ऐसा सोच रहे हैं तो गलत सोच रहे है । स्वप्न और वर्तमान, इन दोनों पर आपका नियंत्रण नहीं है । आप कुछ भी नहीं करते हैं और न ही आपके वश में कुछ करने को है । ऐसे में आपका इस प्रकार सोचना सत्य है । अगर आप स्वप्न और वर्तमान, दोनों में से किसी एक को भी असत्य मानते हैं तो फिर दूसरे को भी भी असत्य ही है, ऐसा मानें ।

              राजा जनक उनके इस उत्तर से कुछ संतुष्ट हुए | आगे कई दिनों तक वे अष्टावक्र जी से अद्वेत पर चर्चा करते रहे । सब कुछ स्पष्टतः जानकर और आत्मसात कर वे "विदेह" हो गए अर्थात जीवन मुक्त होकर समस्त को परमब्रह्म का खेल ही मानते रहे । इस प्रकार सत, असत जानकर उनसे भी ऊपर उठ गए । यही अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था है, जो व्यक्ति को "विदेह" होने की ओर ले जाती है ।

                 राजा जनक मिथिला नरेश थे । अध्यात्म में उनकी रुचि का इसी बात से पता चलता है कि उनके दरबार में संतों का बड़ा सम्मान था । वे समय-समय पर संतों से मार्गदर्शन लिया करते थे । राजकार्य करते हुए भी वे सत्संग का लाभ लेते रहते थे । उनके जीवन को “विदेह” की अवस्था तक पहुँचाने में अष्टावक्र मुनि का महत्वपूर्ण योगदान था । अष्टावक्र का गर्भावस्था में बुद्धि का इतना विकास हो गया था कि वह अपने पिता कहोड को भी कई बार मंत्रों के ग़लत उच्चारण पर टोक दिया करते थे, जिसके परिणाम में उन्हें शारीरिक वक्रता का श्राप तक झेलना पड़ा था । 

         अष्टावक्र के पिता कहोड भी कोई कम ज्ञानी नहीं थे । उद्दालक जैसे महान ऋषि से उन्होंने ब्रह्म विद्या प्राप्त की थी । कहोड की विद्वता से प्रसन्न होकर उद्दालक मुनि ने अपनी पुत्री सुजाता का विवाह उनके साथ कर दिया था । विवाह के उपरान्त कहोड दंपति उद्दालक के आश्रम में ही रहते हुए छात्रों को शिक्षा देने लगे थे । सुजाता भी कम विद्वान नहीं थी । दो महान विद्वजनों की संतान भी विद्वान हो तो भला इसमें आश्चर्य क्या करना ? अष्टावक्र अपने पिता के नाम तक से परिचित नहीं था । वह अपने नाना उद्दालक को ही पिता समझ रहा था । बहुत ज़िद्द करने पर सुजाता ने उसे बताया कि उसके पिता कहोड हैं, जो कुछ धनप्राप्ति की आशा से राजा जनक के पास गए थे । वे आज तक लौटे नहीं हैं । यह जानकर अष्टावक्र ने मिथिला के राजदरबार में जाने का निश्चय किया ।

               अष्टावक्र ने जनक के दरबार में जब प्रथम बार प्रवेश किया, तब विद्वान सभा में उनके वक्र शरीर को देखकर उनकी हंसी उड़ाई गई । तब अष्टावक्र ने जनक की सभा को चर्मकारों की सभा तक कह दिया था । जो शरीर की चाम को ही देखकर व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण कर लेता है, वह भला चर्मकार के अतिरिक्त और कौन हो सकता है ? अष्टावक्र के पिता कहोड भी पूर्व में कभी जनक की सभा में आए थे और राज दरबार के विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में पराजित हो चुके थे । आज अष्टावक्र अपने पिता की खोज में जनक के राज़दरबार तक पहुँचे हैं । जनक अष्टावक्र द्वारा कही गयी बातों से प्रभावित होते हैं, परंतु यह सब बंदी को अच्छा नहीं लगता । अंततः बंदी से शास्त्रार्थ होता है जिसमें बंदी पराजित होते हैं । बंदी से अपने पिता का पता लगाकर अष्टावक्र उनको मुक्त करा लेते हैं और अपने साथ लेकर आश्रम लौट आते हैं । 

            बंदी की अष्टावक्र से हुई पराजय ने राजा जनक को कुछ सोचने को विवश कर दिया । वे अभी तक उस ज्ञान से वंचित थे जो संसृति से उनकी निवृत्ति करा सकता हो । अष्टावक्र में उनको वह क्षमता नज़र आई । उन्होंने अष्टावक्र के आश्रम में जाकर कई दिनों तक सत्संग किया । वह ज्ञान “अष्टावक्र गीता” के नाम से अभी भी हमारा मार्गदर्शन कर रहा है । 

       अष्टावक्र-गीता में दो व्यक्तियों के मध्य संवाद है, मुमुक्षु और ब्रह्मज्ञानी के मध्य संवाद । मुमुक्षु है, राजा जनक और ब्रह्मज्ञानी है, अष्टावक्र मुनि ।अष्टावक्र-गीता में वह ज्ञान समाहित है, जिसको पकड़ मिथिला नरेश जनक संसार और शरीर की आसक्ति से मुक्त होकर विदेह हो गए थे । संसार और शरीर की आसक्ति ही व्यक्ति के दुःख की जनक है । इस दुःखालय संसार के चक्र को ही शास्त्रों में संसृति कहा गया है । राजा जनक की संसृति से निवृत्ति कैसे हुई ? उस पर दृष्टि डालने हेतु आइए ! कुछ समय के लिए अष्टावक्र-गीता में प्रवेश करते हैं ।

        राजा जनक अष्टावक्र मुनि से प्रश्न करते हैं -

      कथं ज्ञानवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।

      वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो ।। अ. गीता - 1/1 ।।

           अष्टावक्र मुनि से जनकजी प्रश्न कर रहे हैं कि कोई ज्ञान को कैसे प्राप्त होता है, उसकी कैसे मुक्ति होती है और किसी के द्वारा वैराग्य को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?

     राजा जनक के ये तीन प्रश्न बड़े महत्वपूर्ण हैं । इन प्रश्नों की महत्त्वता हमारे लिए भी कम नहीं है । ज्ञान से ही वैराग्य को उपलब्ध हुआ जा सकता है और वैराग्य ही मुक्ति के द्वार खोलता है । ज्ञान से ही परमात्मा के अस्तित्व पर विश्वास दृढ़ होता है । ज्ञान ही भक्ति को पुष्ट करता है । प्रश्न यह उठता है कि ज्ञान को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? जिस दिन किसी ब्रह्मज्ञानी का हमारे जीवन में प्रवेश होता है और हमारी बुद्धि उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान को ग्रहण करने योग्य होती है, तभी ऐसा होना संभव हो पाता है अन्यथा नहीं ।

           राजा जनक का प्रश्न उचित था । राज्य का संचालन करते हुए जो विषमताएँ किसी शासक के भीतर प्रवेश कर सकती है उनको बाहर निकालकर जीवन में समता का प्रवेश कराना आवश्यक होता है । एक शासक के लिए प्रजा में सभी अपने होते हैं, अतः उनके जीवन में अपने-पराये का भेद कदापि नहीं होना चाहिए । किसी अपराध की सज़ा जो आम नागरिक के लिए होती है, वही सज़ा शाही परिवार के सदस्य को भी उसी अपराध के लिए मिलनी चाहिए ।

            जीवन में वैराग्य आवश्यक है । वैराग्य का अर्थ है, प्रत्येक प्रकार के राग-द्वेष से परे । राग-द्वेष से ऊपर उठने के लिए ज्ञान होना आवश्यक है । ज्ञान उन बातों का होना चाहिए जो व्यक्ति में राग-द्वेष उत्पन्न करते हैं । हमारा राग उन वस्तुओं और व्यक्तियों में होता है, जिनसे हमें सुख मिल रहा हो अथवा सुख मिलने की आशा हो । जिससे सुख मिलने में बाधा उत्पन्न होती हो अथवा होने की संभावना हो, उनसे हमारा स्वाभाविक द्वेष होता है ।  ज्ञान देना प्रारंभ करते ही अष्टावक्र मुनि जनक को स्पष्ट कर देते हैं कि विषय-भोग ही जीवन में संसार से मुक्ति में बाधक हैं । अष्टावक्रजी राजा जनक को कह रहे हैं -

        मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्यज ।

        क्षमार्जवदयातोषंसत्यं पियूषवद्भज ।। अ. गीता - 1/2 ।।

   अगर तू मुक्ति को चाहता है तो विषयों को विष के समान त्याग दे और क्षमा, सरलता, दया, संतोष और सत्य का अमृत के सदृश सेवन कर ।

       विषयों को विष के समान छोड़ देना, हर किसी के वश में नहीं है । जब तक विषय का संपर्क इंद्रिय के साथ नहीं होता तब तक यह अनुभव ही नहीं होता कि वह हमारे लिए विष है अथवा अमृत । विषय और इंद्रिय के प्रथम संयोग से जो सुख अनुभव में आता है, उसी को जीवन का आनंद समझ लेना मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम है । कुत्ता जब सूखी हड्डी चबाता है तब वह समझता है कि उसे वह रस उस हड्डी से मिल रहा है । वास्तव में वह रस सूखी हड्डी को ज़ोर-ज़ोर से और लगातार चबाते रहने से, मसूड़ों के छिल जाने से निकल रहा रक्त होता है ।

             यही मनुष्य का हाल है । वास्तव में देखा जाए तो किसी भी विषय में कोई रस नहीं है । विषय-रस जो भोग प्रदान करते हैं, वे शनैः-शनैः व्यक्ति के शरीर का क्षरण ही करते हैं । यह बात जब तक हमारे समझ में आती है, तब तक न तो जीवन में कुछ करने के लिए हमारे पास समय बचता है और न ही शक्ति । ऐसे में भला हमारी इस संसृति से निवृत्ति कब और कैसे हो ?

               “वैराग्य-शतक” में राजा भृर्तहरि कहते हैं - 

      भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता: 

                तपो न तप्तं वयमेव तप्ता: ।

       कालो न यातो वयमेव याता: 

                तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णा: ।। भृर्तहरि शतक -7 ।।

    अर्थात् भोगों को हमने नहीं भोगा बल्कि भोगों ने हमें ही भोग लिया । तपस्या हमने नहीं की बल्कि हम स्वयं तप गए । काल (समय) कहीं नहीं गया बल्कि हम स्वयं ही काल कलवित हो गए । इतने के बाद भी तृष्णा जीर्ण नहीं हुई बल्कि हम स्वयं ही जीर्ण हो गए ।

                  असुरों के गुरु शुक्राचार्य के दामाद राजा ययाति ने भले ही शर्मिष्ठा पुत्र पूरु से उसकी युवावस्था ले ली हो, फिर भी वे देवयानी को भोगने से कहाँ संतुष्ट हो पाए थे ? ये वही ययाति हैं जिनके पुत्र यदु के नाम से यदुवंश चला है, जिसमें आगे जाकर भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था । ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था । विवाह के उपरांत असुर राजकुमारी शर्मिष्ठा को देवयानी अपने साथ दासी के रूप में लेकर आयी थी । 

                परंतु वाह रे मनुष्य ! तू भला कब एक ही स्त्री से संतुष्ट हुआ है ? तुम्हें तो प्रत्येक स्त्री विशिष्ट नज़र आती है और तुम्हारा मन उसको भोगने को मचल उठता है । ययाति ने देवयानी के साथ-साथ शर्मिष्ठा को भी भोगा । जब इसका पता शुक्राचार्य को लगा तो उन्होंने ययाति को तत्काल ही वृद्ध हो जाने का श्राप दे दिया । ययाति ने शुक्राचार्य से बहुत अनुनय-विनय की कि इस श्राप से आपकी पुत्री देवयानी का ही अहित है, तब असुर गुरु ने किसी युवा से युवावस्था लेकर शापमुक्त होने का कह दिया । ययाति यहाँ आकर संभल जाते तब भी ठीक था परंतु वे समझे नहीं । अपने पुत्रों के पास जाकर उनसे युवावस्था देने की याचना करने लगे । एक-एक कर सभी ने मना कर दिया । आख़िर में उनके और शर्मिष्ठा के पुत्र पुरु ने उनसे वृद्धावस्था लेकर अपनी युवावस्था दे दी । 

          यह विषय-भोग ही मनुष्य को अतृप्त बनाए रखते हैं जिसके फलस्वरूप अनंत कामनाएँ पैदा होती है । संसार में एक भी जीव ऐसा नहीं मिलेगा, जिसके जीवन में उसकी समस्त कामनाएँ पूरी हो गयी हों । न तो ययाति की कामनाएँ उनके जीवन में पूरी हुई और न ही भृर्तहरि की । हम भी उनसे भिन्न नहीं है । भृर्तहरि को तो यह बात शीघ्र ही समझ में आ गई जबकि ययाति को भोगों से अतृप्ति के बने रहने पर जाकर समझ में आया । हमारे कब समझ में आएगी, कहा नहीं जा सकता । संसृति से निवृत्ति न हो पाने के मूल में विषय-भोग ही हैं । अष्टावक्र-गीता के प्रारंभ में ही अष्टावक्र  राजा जनक को विषयों को विष के समान छोड़ देने की बात कह रहे हैं ।

         राजा जनक और अष्टावक्र मुनि के मध्य संवाद बहुत लंबा है, उसको संदर्भ के रूप में फिर कभी लेंगे । मुख्य बात जो इनके मध्य हुए संवाद से निकल कर आती है वह यही है कि इस शरीर और संसार की आसक्ति मनुष्य को भोग और संग्रह में लगा देती है जिससे उसकी संसृति से निवृत्ति नहीं हो पाती । सत्य,  शरीर और संसार से बहुत ऊपर है । संसार को छोड़ने के लिए देह की आसक्ति छोड़नी होगी और जनकजी की तरह कहना होगा - 

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।

कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ।। अ.गीता - 11/6 ।।

अर्थात् मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर भी मेरा नहीं है, ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वही पुरुष कैवल्य को प्राप्त होकर कृत अकृत कर्म का स्मरण नहीं करता । 

          राजा जनक तो सत्य और असत्य जानने के जंजाल से मुक्त होकर जीते जी ही "विदेह" हो गए, परन्तु यह मनुष्य न तो सत्य को और न ही असत्य को आज तक समझ पाया है । यही सत-असत का द्वंद्व उसे निर्द्वंद्व नहीं होने दे रहा है | आज जिसे हम सत्य कह रहे हैं, जरा गंभीरता के साथ विचार कीजिये, क्या वास्तव में वही सत्य है ?

            असत् संसार को सत्य मानना और जानना मात्र सांसारिकता और स्वप्न के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । आध्यात्मिकता के लिए इन शब्दों के कोई मायने नहीं है । जिस दिन हमें संसार के स्वप्न मात्र होने का अनुभव हो जाएगा, तत्क्षण ही हमारी संसृति से निवृत्ति हो जाएगी ।

         यह स्वप्न जिस दिन टूट जाएगा वह व्यक्ति की जाग्रत अवस्था होगी । नींद से जागना जाग्रत होना नहीं है बल्कि संसार रूपी स्वप्न से परिचित हो जाना ही जाग्रति है । अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लेना स्वप्न है और ज्ञान के प्रकाश में रस्सी के साँप होने का भ्रम मिट जाना जागरण है । ज्ञान के आलोक में इस भ्रम के मिट जाने पर हैरानी होती है यह जानकर कि इतने दिनों तक हम व्यर्थ ही भ्रम में जी रहे थे । भगवान शंकर गिरिजा को मानस में यही कह रहे हैं -

        झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें । जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें ।।

        ज़ेहि जानें जग जाइ हेराई । जागें जथा सपन भ्रम जाई ।। मानस - बालकाण्ड-112/1-2।।

           स्वप्न की तरह ही हम इस संसार के प्रति मोहित होकर अज्ञान में जी रहे है । अज्ञान के कारण ही हम अहंता, ममता के दलदल में आकंठ फँसे पड़े है । धन-जन की तनिक सी प्राप्ति-क्षति हमें सुखी-दुःखी कर रही है । मानस में शंकर भगवान कह रहे हैं कि सुन गिरिजे ! सपने में सिर कटने से हम रोने लगते हैं परंतु हमारा यह दुःख तभी दूर होता है जब हम नींद से जाग जाते हैं । परंतु जीवन में जागरण का होना परमात्मा की कृपा से ही संभव होता है । परमात्मा की कृपा से ही सद्गुरू का सानिध्य और सत्संग मिलता है और अनुभवी और शास्त्रज्ञ गुरु ही शास्त्रों की सही व्याख्या करते हुए आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों को बदल देता है ।

            जागरण के बिना जीवन की वास्तविकता का अनुभव होना असंभव है । असत्य को सत्य समझ लेना ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है । भगवान शंकर मानस में पार्वतीजी को कह रहे हैं -

          जौं सपनें सिर काटै कोई । बिनु जागें न दूरि दुख होई ।। 

          जासु कृपां अस भ्रम मिट जाई । गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई ।। मानस -बालकाण्ड -118/2-3।।

         परमात्मा की कृपा से हमें शास्त्र और संत मिल जाते हैं । उन्हीं से हमें संसार-चक्र से निवृत्ति के लिए उचित मार्गदर्शन मिलता है । परन्तु सबसे महत्वपूर्ण है, हमारी मुक्ति के लिए इच्छा होना । हमारी इच्छा के अभाव में संत और शास्त्र भी हमारी कोई सहायता नहीं कर सकते ।

          स्वामीजी कहते हैं कि संसार-चक्र से मुक्ति हमारी इच्छा के अधीन है । जब तक हम अपने लक्ष्य के प्रति गम्भीर नहीं होंगे, उसके प्रति हमारी तीव्र लगन नहीं होगी तब तक यह संसार ही हमें सत्य प्रतीत होता रहेगा । संसार को सपना मान लेना ही सुख-दुःख के चक्र से बाहर निकलने के लिए हमारा प्रथम कदम होगा । 

         इसी प्रकार श्रीमद्भागवत महापुराण में संसार को स्वप्न की भाँति बताते हुए कपिल भगवान अपनी माँ देवहूति को कह रहे हैं -

        अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।

        ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ।। भागवत -3/27/4।।

           जिस प्रकार स्वप्न में भय-शोक आदि का कोई कारण न होने पर भी स्वप्न के पदार्थों में आस्था हो जाने के कारण दुःख उठाना पड़ता है, उसी प्रकार भय-शोक, अहं-मम एवं जन्म-मरण आदिरूप संसार की कोई सत्ता न होने पर भी अविद्यावश विषयों का चिंतन करते रहने से जीव का संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता ।

         मनुष्य के जीवन की यही वास्तविकता है कि वह परमात्मा में आस्था छोड़ संसार के पदार्थों में आस्था रखता है । इस आस्था के कारण वह संसार में आसक्त होकर अहंता-ममता में पड़कर सुखी-दुःखी होता रहता है । जीवनभर कामनाओं के दुष्चक्र में फँसकर संसार-चक्र से कभी निवृत्त नहीं हो पाता । इस संसृति से निवृत्त होने के लिए उसे अपनी बुद्धि में विवेक जाग्रत करना होगा । सांसारिक बुद्धि को परमात्मा की ओर मोड़ना होगा क्योंकि सभी बुद्धियों के एक मात्र दृष्टा वे ही हैं । सांसारिक बुद्धि को परमात्मा की ओर ले जाने में सत्संग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है ।

             स्वप्न को देखते हुए हम सुखी-दुःखी होते रहते हैं परंतु जब स्वप्न टूटता है, तब वास्तविकता का ज्ञान होता है । फिर हम स्वप्न में देखे जाने वाले दुःख से दुःखी नहीं होते । हम जानते है कि स्वप्न का वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है ।इसे विडम्बना ही कहा जा सकता है कि फिर भी हम संसार को ही वास्तविक समझ लेते हैं । जो परिवर्तनशील है, जो प्रतिपल बदल रहा है, जो आज है वह कल नहीं रहेगा, इतना सब जानते हुए भी संसार को सत्य समझ लेना हमारा अज्ञान ही है । इस अज्ञान के कारण ही हमें संसार के सत्य होने का भ्रम हो गया है । इस भ्रम से बाहर तभी निकला जा सकता है, जब हमें ज्ञान हो जाये । ज्ञान तभी हो पाएगा, जब बुद्धि का उपयोग कर उसके भीतर सोये विवेक को जाग्रत किया जायेगा । इसके लिए ज्ञानी संतजनों का सान्निध्य मिलना आवश्यक है ।

         बुद्धि का भी सदुपयोग मनुष्य कहाँ कर पाता है । संसार में जीवनयापन के रास्ते बड़े कठिन और टेढ़े-मेढ़े हैं । मनुष्य उनमें उलझकर बुद्धि का दुरुपयोग करने लगता है । बुद्धि का दुरुपयोग उसकी संसार से निवृत्ति में बाधक बन जाता है । बुद्धि में सोये हुए विवेक को जगाना ही बुद्धि का सदुपयोग करना है ।

            परमात्मा की ओर बुद्धि लगाने को ही विवेक का जाग्रत होना कहते हैं । मानस में गोस्वामीजी लिखते हैं - 

  बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ।।

  होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ।।

                  सत्संग बिना परमात्मा की कृपा के नहीं मिलता । आज के समय में कुसंग चाहे अनचाहे सभी जगह  मिल जाता है  परंतु सत्संग मिलना अत्यंत दुर्लभ है । सही सत्संग से ही बुद्धि में विवेक का अभ्युदय हो सकता है । विवेक से हमें आत्म-अनात्म का ज्ञान होता है । विवेक का सदुपयोग करते हुए हमें संसार से भिन्न होना होगा, तभी आत्म-अनात्म का ज्ञान होगा । संसार से भिन्न होने का अर्थ है संसार की नश्वरता को समझकर उसको अपना न मानना । संसार कभी अपना था ही नहीं, इसको अपना मान लेना ही हमारी सबसे बड़ी भूल है ।

          एक आकार (शरीर) में आकर स्वयं को उस आकार तक ही सीमित मान लेना, कहाँ तक उचित है ? शरीर का एक निश्चित आकार है, संसार की एक निश्चित सीमा है जबकि हम स्वयं निराकार और असीम हैं । यह सत्य जब समझ में आ जाता है, संसार को अपना मानना स्वतः ही बंद हो जाएगा । संसार को अपना न मानने से अहंता, ममता, कामना और स्पृहा, इन सबसे मुक्त हुआ जा सकता है । इनसे मुक्त होना ही संसृति से निवृत्ति है ।

        अतः बुद्धि को परमात्मा में लगायें अन्यथा सांसारिक बुद्धि व्यक्ति को स्वप्नवत् संसार में सुखी-दुखी करती रहेगी और संसृति से निवृत्ति लेना असंभव हो जाएगा । बुद्धि को परमात्मा में लगाना तब तक मुश्किल है, जब तक संसार हमें अच्छा लगता रहेगा । संसार भ्रम के अतिरिक्त, एक स्वप्न से अधिक कुछ भी नहीं है । इसे भ्रम अथवा स्वप्न मान लेना, आज के युग में असंभव है क्योंकि जो दिखता है उसे असत्य कैसे मानें ? तभी तो संसृति से निवृत्ति नहीं हो पा रही है ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल