Tuesday, April 16, 2019

रामकथा51-समापन कड़ी-

रामकथा-51-
       गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने श्री रामचरित मानस में भगवान श्रीराम की लीला का अनुरक्ति पूर्ण वर्णन किया है। उनके इस ग्रंथ को पढ़ने और मनन करने से अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है। यह ग्रंथ उत्तर भारत में बहुत प्रसिद्ध है। इस ग्रंथ का अध्ययन करने का अवसर हम सब को प्रायः मिलता ही रहता है। इसका विवेचन चाहे जितना करें, किया जा सकता है। जिस दृष्टि से गोस्वामीजी ने अपने आराध्य प्रभु को देखा है वह दृष्टि हम सबको मिले, तभी इस ग्रंथ के पाठ करने की सार्थकता है।आप सभी इस ग्रंथ को पढ़ते ही रहते हैं इसलिए मैं रामकथा को और अधिक विस्तार में नहीं जाना चाहूंगा।अतः इस श्रृंखला को यहीं विराम देना चाहूंगा।
        भगवान श्रीराम त्रेता में हुए और श्रीकृष्ण द्वापर में।हमें श्रीकृष्ण अपने अधिक निकट प्रतीत होते हैं क्योंकि उन्होंने जो लीला की वह आज के मनुष्य जीवन के अनुरूप ही की है। भगवान श्रीराम की लीला मनुष्य के जीवन से कुछ भिन्न प्रतीत होती है इसका कारण है, भगवान राम का मर्यादित जीवन। भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में मर्यादा का कभी उल्लंघन नही किया इसीलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का काल हमारे अतिनिकट है, उनके और हमारे मध्य मात्र 5000 वर्ष के लगभग का समयांतर है।इसलिए उनकी लीला को देखने से हमें वह अधिक उचित जान पड़ती है। मर्यादा सीखनी हो तो श्रीराम से सीखें और निर्णय लेने की क्षमता, सत्य-असत्य में अंतर तथा कर्तव्य कर्म, कर्म से पलायन न करना, विषाद से निकलने की राह दिखाना और आनंद को उपलब्ध होना हो तो श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया ज्ञान आत्मसात करना होगा। इसलिए श्री हरि के इन दोनों ही अवतारों के जीवन की  शिक्षा हमारे अवसाद रहित और मर्यादित जीवन के लिए उपयोगी हैं।
आप सभी का साथ बने रहने के लिए आभार।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, April 15, 2019

रामकथा-50

रामकथा-50
विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु  माया गुन गो पार।।1/192।।
        कौशल्या के श्रीहरि राम रूप में आये हैं। भरत श्रीहरि के शंख, लखन शेषनाग और रिपुदमन श्रीहरि के पद्म रूप हैं।इस प्रकार श्रीहरि ने त्रेता में अपने भक्तों को अभय करने के लिए और जय विजय जो कि रावण और कुम्भकरण के रूप में असुर हैं, उनको असुर शरीर से दूसरी बार मुक्त करने के लिए अवतार लिया है। चाहे श्रीहरि सभी शक्तियों से युक्त होते हों, उन्हें अपनी शक्ति का उपयोग करने के लिए मनुष्य रूप में ही अवतरित होना पड़ता है। परमपिता सभी प्रकार की शक्तियों के स्रोत होने के उपरांत भी "न करोति न लिप्यते" हैं और इस बात का पूर्ण रूप से पालन भी करते हैं। इसीलिए उनको इस पृथ्वी पर भक्तों को भयमुक्त करने के लिए अवतार लेना पड़ता है।
         श्री हरि के अवतार रूप भगवान श्री राम ने भी मानवोचित व्यवहार करते हुए लीला की है। इस लीला को करने की पृष्ठभूमि अवतरित होने से पहले ही तैयार कर ली गई थी।नारद ने ही उनके त्रेता के अवतरित जीवन की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी हालांकि इसको तैयार करने के पीछे श्रीहरि की ही इच्छा थी। वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं साथ ही वे भक्तों के पतन को भी रोकते हैं। श्रीराम के मनुष्य जीवन की लीला अब सनकादिक ऋषियों के द्वारा जय विजय को दिए गए श्राप और परम भक्त नारद द्वारा स्वयं को मिले श्राप के अनुसार चलेगी क्योंकि भक्तों के कथन को भगवान सदैव सत्य ही सिद्ध करते हैं।
       भगवान अपनी लीला बाल्य काल से प्रारम्भ करते हैं और ऋषि मुनियों को राक्षसों के भय से मुक्त करते हुए असुरों तक पहुंचकर अपने जय विजय पार्षदों को दूसरी असुर योनि से मुक्त कर अपनी लीला का संवरण करते हैं।
कल समापन कड़ी-
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Sunday, April 14, 2019

रामकथा-49-

रामकथा-49
यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं
                 ते न परहिं भव कूपा।।
       राम जन्म का चरित्र जो कोई भी मनुष्य गाता है, वह उस परम पद को प्राप्त कर लेता है, जिसको प्राप्त कर लेना ही इस जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। परम पद पाने का अर्थ है, जीवन मुक्त हो जाना।यहां आकर एक प्रश्न खड़ा होता है कि क्या केवल प्रभु के चरित्र का गान ही मुक्ति के लिए पर्याप्त है? नहीं, हम सब गान का अर्थ मुंह से उच्चारित शब्दों से ले रहे हैं। मुंह से उच्चारित शब्द अगर मुक्त कर सकते तो संसार के सभी पिंजरे में बंद तोते कभी के मुक्त हो गए होते। वे भी तो पिंजरे के बंधन में जीते हुए  राम राम बोलते रहते हैं। राम का चरित्र गाने का अर्थ केवल बोलने की क्रिया से ही न लें, वह क्रिया तो एक आडंबर के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।जब राम का चरित्र आप अपने जीवन में उतार लेते हैं,तब आपके भीतर से जो स्वर फूटते हैं, वास्तव में वही उन प्रभु के चरित्र का गान है। इस गान में आपकी जिव्हा साथ दे अथवा नहीं, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। केवल भीतर से उठने वाला स्वर ही आपको आनंदित कर सकता है अन्यथा एक तोते और आपमें कोई अंतर नहीं है। 
        राम के चरित्र को अपनाने का अर्थ है स्वयं के जीवन को राम के जीवन जैसा बना लेना है।राम साक्षात श्रीहरि हैं जो कि वैकुंठ के वासी है। वैकुंठ इस ब्रह्मांड से अन्यत्र कोई स्थान नहीं है। हम हाथ उठाकर ऊपर की ओर संकेत अवश्य करते हुए कह देते हैं कि वो ऊपर बैठा सब कुछ  देख रहा है। कोई नहीं है वैकुंठ यहां से ऊपर।वैकुंठ का अर्थ है, बिना कुंठा (frustration) का जीवन। कुंठा पैदा होती है मन चाहा न होने के कारण अर्थात कामनाएं ही कुंठाओं की जननी है। वैकुंठ अर्थात जिसके भीतर कोई कामना नहीं है।अतः जिसके जीवन में कुंठा नहीं है, उसके लिए यहीं इस संसार में ही वैकुंठ है। इसी को हरि पद पाना कहते हैं। जिसके जीवन में कुंठाएं भरी पड़ी है, उसके लिए यह संसार ही एक कुआं है अर्थात भवकूप। कुआं भी इतना गहरा की मेंढक की तरह छलांग पर छलांग लगाते रहो, बाहर निकल नहीं पाओगे, इस जन्म में ही क्या अनंत जन्मों में भी नहीं।आप भगवान राम के जीवन को देख लीजिए, न कोई कामना न कोई कुंठा। उनके जैसा जीवन जो मनुष्य जीने लग जाता है वही हरि पद का अधिकारी हो सकता है।जिसके मन में कोई कामना नहीं है, उसका मन ही वैकुंठ है और वहीं परमात्मा भी निवास करते हैं।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, April 13, 2019

रामकथा-48

रामकथा-48-रामजन्म-
नौमी तिथि मधुमास पुनीता।
शुक्ल पच्छ अभिजीत हरि प्रीता।।
मध्य दिवस अति सीत न घामा।
प्रगटे अखिल लोक बिश्रामा।।
      चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, दोपहर का समय, न अधिक शीत और न ही अधिक गर्मी, सुहावनी ऋतु, बयार मंद मंद गति से बह रही है, कौशल्या प्रसव पीड़ा में है और श्रीहरि संसार को भयमुक्त करने हेतु प्रकट हो रहे हैं।
"भये प्रकट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी..."
        अचानक  कौशल्या का कक्ष प्रकाश से भर जाता है।कौशल्या की आंखे चौंधिया जाती है।कौशल्या धीरे धीरे अपने नयन पट खोलती है। सामने चतुर्भुज रूप में साक्षात श्रीहरि दिखलाई पड़ते हैं।चतुर्भुज स्वरूप श्रीहरि का सौम्य रूप है।
"माते, अपने नयन खोलिये, मैं आ गया हूँ आपका पुत्र बनने के लिए। आपने कहा था न कि पुत्र रूप में आने से पहले मैं आपको चतुर्भुज रूप में दर्शन दूँ। आपको स्मरण नहीं है परंतु मैंने अपने कथन को विस्मृत नही होने दिया है।"श्री हरि बोले।
      इतना सुनते ही मानो कौशल्या के भीतर पूर्वजन्म की शतरूपा जीवित हो उठी हो। उनकी स्मृति में अपने तपस्या काल की एक एक बात सक्रिय हो उठी। "हाँ, वरदान में आप जैसा ही पुत्र मांगा था मैंने। आपने ही तो कहा था, मेरे जैसा पुत्र आपके लिए कहाँ से लाऊं, मुझे स्वयं को ही आपका पुत्र बनने के लिए आना होगा।मेरी तपस्या सफल हो गई। मैं कृतार्थ हो गई।परंतु यह क्या, मैंने जी भर कर आपके चतुर्भुज रूप के दर्शन कर लिए हैं। अब शीघ्र ही अपनी शिशु लीला प्रारम्भ कीजिये प्रभु।
"सुनी बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।"
       इस प्रकार कौशल्या के वचन सुनकर श्रीहरि गर्भ में प्रवेश कर गए और उनके गर्भ से पुत्ररूप में जन्म ले लिया। कौशल्या के साथ ही साथ कैकयी ने भी एक पुत्र को जन्म दिया और सुमित्रा भी उसी समय दो पुत्रों की मां बनी। राजा दशरथ की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा । वे अपने मुख से कह तो रहे हैं कि मेरे घर साक्षात प्रभु आये हैं परंतु उन्हें अपने पूर्व जन्म की स्मृति अभी तक नहीं है कि वास्तव में साक्षात परमात्मा ही उनके घर पुत्र रूप में अवतरित हुए हैं।
         संसार में जब भी कोई शिशु जन्म लेता है निश्चित मानिए, प्रत्येक बार परमात्मा ही अवतरित होते हैं। प्रत्येक जननी कौशल्या ही है, प्रसवपीड़ा में केवल और केवल श्रीहरि का स्मरण ही करे तो भला परमात्मा अवतरित क्यों नहीं होंगे? संसार में जन्म लेकर ही परमात्मा अपने अलग अलग स्वरूप में प्रत्येक शिशु में प्रकट होते हैं।हमारी भेद दृष्टि ही उनको कुछ का कुछ देखने लगती है, परमात्मा तो सबमें समान रूप से विराजमान हैं।
   आप सभी को रामजन्म की बधाई और रामनवमी के पुनीत अवसर पर शुभकामनाएं।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Friday, April 12, 2019

रामकथा-47-

रामकथा-47-अयोध्या की ओर-
       अयोध्या में सूर्यवंश का शासन है। रघुवंश की चौथी पीढ़ी के राजा दशरथ अभी सत्तासीन हैं। उनके तीन महारानियाँ हैं-कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा। राजा दशरथ पूर्वजन्म में वही मनु और शतरूपा थे, जिन्होने श्रीहरि जैसा पुत्र तपस्या के फल स्वरूप मील वरदान में मांगा था। श्रीहरि अपने जैसा पुत्र कहाँ से लाते? हम अपने जीवन में इतनी अधिक आसक्तियों, अधूरी कामनाओं और कर्मों से भरे होते हैं कि श्रीहरि के समकक्ष तो क्या, दूर दूर तक इनके आसपास तक पहुँचने की संभावना तक नहीं होती।ऐसे में भला श्रीहरि वर में अपने जैसा पुत्र देने का आश्वासन दे भी कैसे सकते थे?इसीलिए परमात्मा ने तुरंत ही कह दिया कि मेरे जैसा पुत्र कहाँ से लाऊं, मुझे ही आपका पुत्र बनकर आना होगा।
     तीन तीन महारानियाँ होते हुए भी राजा दशरथ संतान सुख से अभी तक वंचित हैं। आखिर अपनी व्यथा एक दिन मुनि वसिष्ठ के समक्ष व्यक्त कर दी। पुत्र प्राप्ति की कामना पूर्ण करने के लिए यज्ञ और अनुष्ठान संपन्न किया गया। यज्ञ में रखे पात्र के जल को महारानियों को पीने के लिए दिया गया।तीनों रानियों ने प्रसन्नतापूर्वक जल ग्रहण किया। समय पाकर तीनों रानियां गर्भवती हुई। समय अपनी गति से दौड़ा चला जा रहा था।सभी रघुवंश के उत्तराधिकारी के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। दशरथ कौशल्या को पूर्वजन्म की स्मृति नहीं है कि स्वयं श्रीहरि उनके घर पुत्र बनकर अवतरित होने वाले हैं।उनको तो केवल अपने वंश के नए उत्तराधिकारी के आने का इंतज़ार है जबकि देवतागण, धरा,ब्रह्माजी, ऋषि मुनि सभी आतुरता से अयोध्या की ओर देख रहे हैं। देखे भी क्यों नहीं, आखिर उनके रक्षक, जगत के पालनहार अवतार जो लेने वाले हैं।
        महारानियों के गर्भकाल की अवधि पूर्ण होने की ओर अग्रसर है। अंततः वह समय भी आ ही गया। प्रसव पीड़ा प्रारम्भ हुई, किसी भी समय राजा दशरथ को शुभ समाचार मिल सकता है। अवध को यह अवधि बड़ी धीमी गति से चलती नज़र आ रही है।सत्य है, प्रतीक्षा में समय की गति मंद हुई प्रतीत होती ही है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Thursday, April 11, 2019

रामकथा-46-रामावतार के हेतु-


रामकथा-46-रामावतार के हेतु-
      असुर किसको कहते हैं?असुरों के कोई सींग पूंछ नहीं होते, यह सब जो चित्रों में दिखाया जाता है,सब काल्पनिक है।असुर भी दिखने में साधारण मनुष्यों की भांति ही होते हैं। केवल गुण और अवगुण की मनुष्य में उपस्थिति ही उसे सुर अथवा असुर दोनों में से किसी एक श्रेणी में रखती है। इसी आधार पर गोस्वामी जी ने मानस में असुरों की परिभाषा स्पष्ट की है-
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा।
जे लंपट परधन परदारा।।
मानहिं मातु पिता नहीं देवा।
साधुन्ह सन करवाहिं सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी।
ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।1/184/1-3।।
खल,चोर, जुआरी,पराए धन और पराई स्त्री पर दृष्टि रखना, माता-पिता की अवहेलना करना, सज्जन पुरुषों से अपनी सेवा करवाना आदि प्रकार के आचरण करने वाले सभी व्यक्ति असुरों की श्रेणी में आते हैं।त्रेता में ऐसे प्राणी जब बढ़ने लगे तब धरा के लिए उनका बोझ असहनीय हो गया।पृथ्वी भी उस टीम में शामिल थी जिसमें देवता आदि सभी ब्रह्माजी के पास सहायता के लिए पहुंचे थे।ब्रह्माजी ने इसके लिए श्रीहरि के पास प्रार्थना पत्र देने को कहा। परंतु कहाँ मिलेंगे श्रीहरि?
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहि मैं जाना।।
     ब्रह्माजी सहित सभी देवता,पृथ्वी आदि सामूहिक रूप से सस्वर मन से श्रीहरि को पुकारने लगे।जय जय सुरनायक जन सुख दायक प्रनत पाल भगवंता.....।श्रीहरि को आना तो था ही, वे तो केवल अपने भक्तों की पुकार सुनने को ही आतुर थे। तत्काल ही आकाशवाणी हुई-"कश्यप अदिति, मनु शतरूपा को मैंने पूर्व में वरदान दिया था जोकि अभी अयोध्या में दशरथ कौशल्या के रूप में हैं, कि मैं उनका पुत्र बनकर अवतार लूंगा। साथ ही मुझे अपने परम भक्त नारद के वचनों को भी सत्य सिद्ध करना है।ऋषियों के दिये श्राप से बने असुर भूमि के लिए भार बन चुके हैं, उनसे भी मुक्ति दिलानी है।आप सभी निर्भय होकर अपने निवास और कार्य पर जाओ।आपका कार्य शीघ्र ही सिद्ध होगा।"श्रीहरि ने सभी को भयमुक्त करने के लिए ये वचन कहे। सभी उनके द्वारा हुई आकाशवाणी को सुनकर बड़े प्रसन्न हुए। ब्रह्माजी अपने लोक को चले गए।शेष सभी भी अपने अपने स्थान पर लौट गए और प्रभु के अवतरण की प्रतीक्षा करने लगे।
    तो आइए, हम भी चलते हैं, अयोध्या की ओर, जहां परमब्रह्म साकार रूप लेकर राम के नाम से अवतरित होने वाले हैं।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Wednesday, April 10, 2019

रामकथा-45-रामावतार के हेतु-

रामकथा-45-रामावतार के हेतु-
        जय विजय के असुर हो जाने की यात्रा हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यप के प्रथम पड़ाव को पार कर रास्ते में प्रतापभानु,अरिमर्दन होते हुए अपने दूसरे पड़ाव रावण कुम्भकरण को पहुँच चुकी है।जहां से उन्हें श्रीहरि एक बार फिर असुर योनि से मुक्त कर  तृतीय पड़ाव शिशुपाल और दन्तवक्त्र होने की ओर धकेलेंगे।असुरों की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि वे तपस्या बहुत करते हैं, देवताओं की तुलना में तो कहीं बहुत ही अधिक। देवता तो केवल भोगों में रत ही रहते हैं, उनके पास हरि को भजने का समय ही कहाँ है? हाँ,पूर्व मानव जन्म के सद्कर्मों का ही यह प्रभाव है कि संकट पड़ने पर सभी देवता श्रीहरि के दरबार में तत्काल ही पहुंच भी सकते हैं।
     देवता भोग में रत रहते हैं और असुर तपस्या कर ब्रह्माजी आदि से वरदान प्राप्त कर अहंकार पाल बैठते हैं।रावण ने आशीर्वाद लिया ब्रह्माजी से कि हम असुर केवल मनुष्य और वानर के अतिरिक्त किसी अन्य से न मारे जाएं। ब्रह्माजी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा होगा कि असुरों को ऐसा आशीर्वाद को दे देने से कहीं उनका पहला आक्रमण संत पुरुषों, ऋषि मुनियों और देवताओं पर ही तो नहीं हो जाएगा? जो ब्रह्मा जी ने नहीं सोचा वही असुरों ने किया।वर पाकर असुरों ने साधु, ब्राह्मण, ऋषि, मुनि किसी को नहीं छोड़ा और लगे सबका संहार करने। जब दावानल धधकती है तो जंगल में कोसों दूर रहने वाले पक्षी भी चिंतित होकर अपना घोंसला छोड़ देते हैं।ऐसा ही देवताओं के साथ भी हुआ।ऋषि,मुनि, साधु जन,ब्राह्मणों आदि का संहार देखकर देवताओं में चिंता व्याप गई। उन्हें यह सीधा सीधा अपने ऊपर आक्रमण लगा।भोगों में रत रहने के कारण देवता लोग प्रतिरोध करना तक भूल गए थे।इधर ब्राह्मण, ऋषि-मुनि, साधु,संसार के सभी प्राणी राक्षसों से त्रस्त।क्या किया जाए?पहुंच गए ब्रह्माजी के पास। "अरे, मैं भी क्या करूँ?मैंने ही राक्षसों के तप से उपजी प्रसन्नता के अतिरेक में आशीर्वाद दे दिया था।अब तो हम सबका केवल एक ही आश्रय है, श्रीहरि। श्रीहरि को आर्तभाव से पुकारो, वे ही अब कुछ कर सकते हैं।" ब्रह्माजी ने तो इतना कहकर एक बार के लिए अपना पीछा छुड़ा लिया।
          हाँ, इस संसार में सबका आश्रय एक ही तो है, श्रीहरि । परंतु न जाने हमें सुख के दिनों में यह आश्रय क्यों दिखलाई नहीं पड़ता? संकट आया तो श्रीहरि, सुख मिला तो 'मैं, मैंने और मेरा'। श्रीहरि तो परमपिता है, संतान कुपात्र हो सकती है, पिता नहीं।उनको तो अपनी सभी त्रस्त संतानों को संकट से मुक्ति दिलानी ही पड़ती है।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।