Friday, November 16, 2018

अजगर करै न चाकरी .....

अजगर करै न चाकरी…
शुरू में संत मलूकदास नास्तिक थे अर्थात ईश्वर के होने में उनका कतई विश्वास नहीं था। उन्हीं दिनों की बात है, उनके गांव में एक साधु आकर टिक गया। प्रतिदिन सुबह सुबह गांव वाले साधु का दर्शन करते और उनसे राम-कथा सुनते।
एक दिन मलूकदास भी पहुंचे। उस समय साधु ग्रामीणों को राम की महिमा बता रहा था- "राम दुनिया के सबसे बड़े दाता हैं। वे भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देते हैं।"
साधु की बात मलूकदास के पल्ले नहीं पड़ी। उन्होंने तर्क पेश किया, ”क्षमा करें महात्मन! यदि मैं चुपचाप बैठकर राम का नाम लूं, काम नहीं करूं, तब भी क्या राम भोजन देंगे?"
”अवश्य देंगे।“ साधु ने विश्वास दिलाया
”यदि मैं घनघोर जंगल में अकेला बैठ जाऊं, तब भी ?“
”तब भी राम भोजन देंगे।“ साधु ने दृढ़तापूर्वक उत्तर दिया।
बात मलूकदास को लग गई। पहुंच गए जंगल में और एक घने पेड़ के ऊपर चढ़कर बैठ गए। चारों तरफ ऊंचे ऊंचे पेड़ थे। कंटीली झाड़ियां थीं। जंगल दूर दूर तक फैला हुआ था।
धीरे धीरे खिसकता हुआ सूर्य पश्चिम की पहाड़ियों के पीछे छुप गया। चारों तरफ अंधेरा फैल गया। मगर न मलूकदास को भोजन मिला न वे पेड़ से ही उतरे। सारी रात बैठे रहे। दूसरे दिन दूसरे पहर घोर सन्नाटे में मलूकदास को घोड़ों की टापों की आवाज सुनाई पड़ी। वे सतर्क बैठ गए। थोड़ी देर में चमकदार पोशाकों में कुछ राजकीय अधिकारी उधर आते हुए दिखे, वे सभी पेड़ के नीचे घोड़ों से उतर पड़े, लेकिन ठीक उसी समय, जब एक अधिकारी थैले से भोजन का डिब्बा निकाल रहा था, शेर की भयंकर दहाड़ सुनाई दी। दहाड़ का सुनना था कि घोड़े बिदक कर भाग गए। अधिकारियों ने पहले तो स्तब्ध होकर एक दूसरे को देखा फिर भोजन छोड़कर वे भी भाग गए।
 मलूकदास पेड़ से यह सब देख रहा था। वह शेर की प्रतीक्षा करने लगा। मगर दहाड़ कर शेर दूसरी तरफ चला गया।
मलूकदास को लगा, राम ने उसकी सुन ली है, अन्यथा इस घोर जंगल में भोजन कैसे पहुंचता? मगर मलूकदास तो मलूकदास ठहरे! डतरकर भला भोजन क्यों करने लगे।
तीसरे पहर के लगभग डाकुओें का एक दल उधर से गुजरा। पेड़ के नीचे चमकदार चांदी के बरतनों में विभिन्न व्यंजनों के रूप में पड़े हुए भोजन को देखकर वे ठिठक गए।
डाकुओं के सरदार ने कहा, ”भगवान की लीला देखो, हम लोग भूखे हैं और इस निर्जन वन में सुंदर डिब्बों में भोजन रखा है। आओ, पहले इससे निपट लें।“
डाकू स्वभावतः शक्की होते हैं, एक साथी ने सावधान किया, ”सरदार, इस सुनसान जंगल में भोजन का मिलना मुझे तो रहस्मय लग रहा है, कहीं इसमें विष न हो।“
”तब तो भोजन लाने वाला आसपास ही कहीं छिपा होगा। पहले उसे तलाशा जाए।“ सरदार ने आदेश दिया।
डाकू इधर उधर बिखरने लगे, तब तक एक डाकू की नजर पेड़ पर बैठे मलूकदास पर पड़ गई। उसने सरदार को बताया।
सरदार ने सिर उठाकर मलूकदास को देखा तो उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल हो गईं। उसने घुड़क कर कहा, ”अरे दुष्ट! भोजन में विष मिलाकर तू ऊपर बैठा है। चल नीचे उतर।“
सरदार की कड़कती आवाज सुनकर मलूकदास डर गया, मगर उतरा नहीं। वहीं से बोला, ”व्यर्थ दोष क्यों मढ़ते हो? भोजन में विष नहीं है।“
”यह झूठा है।“ सरदार के एक साथी ने कहा, ”पहले पेड़ पर चढ़कर इसे भोजन कराओ, झूठ सच का पता अभी चल जाता है।“
आनन फानन में तीन चार डाकू भोजन का डिब्बा उठाए पेड़ पर चढ़ गए और छुरा दिखाकर मलूकदास को खाने के लिए विवश कर दिया।
मलूकदास ने भोजन कर लिया। फिर नीचे उतरकर डाकुओं को पूरा किस्सा सुनाया। डाकुओें ने उन्हें छोड़ दिया। इस घटना के बाद वे ईश्वर के पक्के भक्त हो गए।
गांव पहुंचकर मलूकदास ने सर्वप्रथम जिस दोहे की रचना की, वह आज भी प्रसिद्ध है-
अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Thursday, November 15, 2018

धर्म की सार्थकता-3


महाभारत के वनपर्व (३१३/१२८) में कहा है-
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
         मरा हुआ धर्म मारने वाले का नाश, और रक्षित धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी न करना, इस डर से कि मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले।दूसरे शब्दों में, जो पुरूष धर्म का नाश करता है, उसी का नाश धर्म कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी धर्म भी रक्षा करता है। इसलिए मारा हुआ धर्म कभी हमको न मार डाले, इस भय से धर्म का हनन अर्थात् त्याग कभी न करना चाहिए।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।



Wednesday, November 14, 2018

धर्म की सार्थकता-2

धर्मस्य ह्याप वर्ग्यस्य नार्थोSर्थायोपकल्पते ।
नार्थस्य धर्मैकान्तस्यकामो लाभाय हि स्मृत:।।
        -भागवत-1/2/9
धर्म का फल है,मोक्ष।धर्म की सार्थकता अर्थ प्राप्ति में नहीं है।अर्थ केवल धर्म के लिए है।भोगविलास उसका फल नहीं मन गया है।
      धर्म मार्ग पर चलते हुए अर्थ प्राप्त कर उस अर्थ को धर्म के उपयोग में लगा देना ही अर्थ का समुचित उपयोग है।अर्थ को आप भोगविलास में भी लगा सकते हैं और उससे दान भी कर सकते हैं।अर्थ का दान करना, धर्म की सार्थकता सिद्ध करता है। अर्थ की तीन गतियां है- दान, भोग और नाश।अर्थ का केवल भोग ही न करें बल्कि उसे नाश होने से भी बचाएं और पात्रता रखने वाले स्थान और व्यक्तियों को दान करते रहना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि धर्म की सार्थकता केवल अर्थ प्राप्ति में नहीं है बल्कि प्राप्त हुए अर्थ को पुनः धर्म के लिए उपयोग में लेने में है।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Tuesday, November 13, 2018

धर्म की सार्थकता-1

धर्म: स्वनुष्ठित:पुंसां विष्वक्सेनकथासु यः।
नोत्पादयेद्यदि रतिं श्रम एव हि समृत:।।
                ।।भागवत-1/2/8।।
धर्म का ठीक ठीक अनुष्ठान करने पर भी यदि मनुष्य के हृदय में भगवान की लीला कथाओं के प्रति अनुराग का उदय न हो तो वह निरा श्रम ही श्रम है।
     जैसा कि हम जानते हैं कि धर्म एक पुरुषार्थ है और उसको प्राप्त करने के लिए श्रम करना पड़ता है।अगर इस श्रम से हम अर्थ और काम प्राप्त कर केवल उनके उपभोग में ही लग जाते हैं,तो ऐसे धर्म को प्राप्त करके भी इस जीवन में कुछ भी लाभ नहीं होने वाला।धर्म परमात्मा के प्रति हमारी श्रद्धा और अनुराग पैदा करने में सहायक होता है । अगर ऐसा न हो पाता है तो फिर ऐसे धर्म को प्राप्त कर लेने से भी क्या लाभ । फिर तो यह निरा श्रम ही श्रम है अर्थात ऐसे धर्म उद्देश्यहीन होता है।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, November 12, 2018

शरणागति

शरणागति
एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक  सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।
            एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया।                  आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, "बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।" कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''
        एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे।
दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन  करें। वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं।
मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।" आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में  होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था। मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था,  बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें  दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे  विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।
वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।
वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, '' कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है? आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''
काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू  महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"
वैद्यजी ने आगे कहा, "जब से होश सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।सदैव उसी एक की शरण में रहो।"
 प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, November 10, 2018

न चोराहार्यम् न च राजहार्यम्,
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं,
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
भावार्थः- जिसे न चोर चुरा सकते हैं, न राजा हरण कर सकता है, न भाई बँटा सकते हैं, जो न भार स्वरुप ही है, जो नित्य खर्च करने पर भी बढ़ता है, ऐसा विद्या धन सभी धनों में प्रधान है।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Friday, November 9, 2018

पुरुषार्थ-45-मोक्ष-5-समापन कड़ी


पुरुषार्थ-45 -मोक्ष-5-समापन कड़ी 
             सभी दर्शन और सिद्धांतों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद स्पष्ट है कि जड़ पदार्थों में आसक्ति त्याग देने से जड़ शरीर जो कि स्वयं एक पदार्थ है, की पुनः प्राप्ति नहीं होती अर्थात पुनर्जन्म नहीं होता | भले ही कोई मुक्त होकर परमात्मा को उपलब्ध हुआ हो अथवा नहीं, परन्तु यह सत्य है कि पुनर्जन्म से मुक्ति पा लेना ही मोक्ष है | पुनर्जन्म से मुक्ति तभी मिल सकती है, जब व्यक्ति को आत्म-ज्ञान हो जाये | आत्म-ज्ञान हो जाना ही संभवतः परमात्मा से मिलन है | इस बारे में गीता का ज्ञान सबसे अधिक स्पष्ट है | गीता में एक  ही सन्देश है-परमात्मा के शरणागत हो जाने का | गीता हमें कहती है-स्थितप्रज्ञ होने से (दूसरे अध्याय में ) लेकर शरणागत (अंतिम, 18 वें अध्याय में) होने को | स्थितप्रज्ञ से शरणागत होने के मध्य में कर्म, ज्ञान, ध्यान और भक्ति आदि सभी आ जाते हैं और ये सभी आत्म-ज्ञान के मार्ग हैं और आत्म-बोध हो जाना ही संसार से मुक्त हो जाना है और यही मोक्ष है |
                    जीवन में यह कामना कभी भी नहीं करनी चाहिए कि हमें मोक्ष मिले | मोक्ष का अर्थ है, स्वयं को सुख-दुःख के भाव से पूर्णतया मुक्त कर संसार से विरक्त हो जाना | इस जीवन में लक्ष्य परमात्मा का प्रेम पाना होना चाहिए, मोक्ष प्राप्त करना नहीं | हममें में से किसी ने भी इस नश्वर शरीर की मृत्यु के बाद जीवन के होने अथवा न होने को नहीं देखा है | अतः किसी भी प्रकार के मोक्ष की कल्पना किया जाना संभव ही नहीं है | एक परम पिता का आश्रय पाकर उससे प्रेम करना और उससे प्रेम पाना ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए | इस प्रकार के जीवन को जीने के लिए गीता एक आधार प्रदान करती है | कहा जाता है कि गीता भगवान् श्री कृष्ण जो कि साक्षात् परम ब्रह्म थे, के श्रीमुख से निकली हुई वाणी है | अतः इस पर विश्वास कर श्रद्धा पूर्वक ईश्वर से प्रेम करना चाहिए |
                 इस श्रृंखला का समापन करते हुए मैं भी परमात्मा से गोस्वामीजी की तरह यही कहना चाहता हूँ कि हे परम पिता ! न तो मुझे अर्थ चाहिए, न काम , न धर्म और न ही मोक्ष | मुझे केवल यही वरदान दीजिये कि प्रत्येक जन्म में आपके प्रति मेरा प्रेम कभी भी कम नहीं हो |
अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहउं निरबान |
जनम जनम रति राम पद, यह वरदानु न आन ||अयोध्याकाण्ड/204||
                आपको यह श्रृंखला कैसी लगी, अपने विचारों से अवगत कराएँ | “पुरुषार्थ” जैसे विषय पर लिखना और संतोषप्रद लिखना बड़ा ही मुश्किल कार्य है | इस विषय पर चाहे जितना लिख दिया जाए, संतुष्टि मिलना असंभव है | फिर भी एक क्षुद्र प्रयास किया है, आपको पसंद आया होगा | आप सभी का साथ बने रहने पर आभार |
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||