Monday, September 29, 2014

मन की एकाग्रता |

                    मन के सभी संकल्पों-विकल्पों का किसी एक केंद्र पर स्थित हो जाना एकाग्रता है। दीपक का लौ पर ठहर जाना एकाग्रता है। भंवरे का फूल पर फिदा हो जाना ही एकाग्रता है। गीता में अर्जुन ने भी भगवान श्रीकृष्ण से यही प्रश्न किया कि मन अत्यंत चंचल है, दृढ़ है, बलवान है। आंधी से भी ज्यादा वेगवान है।
                   भगवान ने बताया कि लगातार अभ्यास से हम स्थितप्रज्ञ मन वाले बन सकते हैं। स्वयं को एकाग्र कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता ही एकाग्रता है। हमने जो लक्ष्य जीवन में निर्धारित किया, उसके लिए हम मन व प्राणों से समर्पित हों और तब तक उसमें लगे रहें जब तक कि अभीष्ट की प्राप्ति न हो जाए। एकाग्रता के लिए मन पर नियंत्रण आवश्यक है, जो स्वयं एक साधना है। मन को वश में करना इतना आसान भी नहीं है।
                  हमें एकाग्र होने के लिए कुछ बातों का विशेष ध्यान देना होगा। हम सीधे दसवीं मंजिल पर चढ़ने की बात करें, यह ठीक नहीं होगा। इसके लिए मैं तो कहूंगा कि क्रमश: आगे बढ़ने का प्रयास करें। अभ्यास करते समय अपनी स्थिति उस कछुए की तरह बनाएं, जिसे मारने पर भी वह अपने हाथ और पैर अंदर सिकोड़ कर बैठा रहता है, बाहर नहीं निकालता। उसका इंद्रियों पर अद्भूत नियंत्रण होता है। साधक को 'स्व' की चिंता करते हुए यह विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि मन को साधते समय उसका चित्त, शांत व निर्मल हो। बाहर चाहे कितना ही कोलाहल क्यों न हो, समुद्र का ज्वार ही क्यों न उमड़ आए।
                 सबसे पहले तन को साधें, तन की एकाग्रता आसन के स्थिर होने से आएगी। प्राणायाम श्वास को एकाग्र करने में मदद करता है। एकाग्रता में मौन संजीवनी का काम करता है। साथ ही विचारों को भी एकाग्र करने का प्रयास करें। सांसों की लयबद्धता मन की गहराई तक ले जाती है। मन के लयबद्ध होते ही जीवन में एक अनूठी लय बन जाती है। एकाग्र बुद्धि वाला व्यक्ति हर निर्णय सोच समझकर सटीक लेता है। मन रूपी झील में दुनियादारी का कंकड़ पड़ने से जो हलचल आ गई थी वह भी प्राणायाम से धीरे-धीरे शांत होने लगती है। लगातार प्रयास से कुछ नियमों का पालन करके व्यक्ति आसानी से एकाग्रता के रथ पर सवार हो सकता है।
                                ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Sunday, September 28, 2014

मौन - मन की आदर्श अवस्था |

                  अधिक बोलना हमारे व्यक्तित्व पर ग्रहण लगने के समान है। जरूरत से ज्यादा बोलने पर शिष्टता-शालीनता की मर्यादाओं का उल्लंघन होता है। इससे मानसिक शक्तियां कमजोर और दुर्बल होती हैं, स्नायुतंत्र पर विपरीत असर पड़ता है। यदि लंबे समय तक ऐसी स्थिति बनी रहे तो कई प्रकार की मानसिक विकृतियां और शारीरिक रोगों का पनपना प्रारंभ हो जाता है।
                  वाचाल व्यक्ति का व्यक्तित्व उथला माना जाता है। कोई भी उस पर विश्वास नहीं करता। अविश्वास एक ऐसी सजा है कि जिसे झेल पाना अत्यंत कठिन है। मौन मन की आदर्श अवस्था है। मौन का अर्थ है-मन का निस्पंद होना। मन की चंचलता समाप्त होते ही मौन की दिव्य अनुभूति होने लगती है। मौन मन का अलंकार है, जो इसके स्थिर होते ही सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। मौन से मानसिक ऊर्जा का क्षरण रोककर इसे मानसिक शक्तियों के विकास में नियोजित किया जाना संभव है। मौन में मन शांत, सहज व उर्वर होता है और सृजनशील विचारों को ग्रहण कर पाता है।
                 इसलिए मौन चुप रहने की अवस्था नहीं है। मौन से वाणी पर अंकुश लगाया जा सकता है। मौन का अभ्यास करके निरर्थक और बेलगाम प्रलाप से निजात पाई जा सकती है। इससे मन स्थिर और प्रशांत होता है। प्रशांत मन समस्त मानसिक शक्तियों का द्वार होता है।
                मौन चुप या शांत रहना नहीं है बल्कि अनावश्यक विचारों की उधेड़बुन से मुक्ति पाना है। चुप रहने को यदि मौन की संज्ञा दी जाए तो समझना चाहिए कि इस के मर्म और तथ्य से हम बहुत दूर हैं। सामान्यत: व्यक्ति बोलकर जितनी मानसिक ऊर्जा बर्बाद करता है, उससे कहीं ज्यादा विवशतावश चुप रहकर करता है। ऐसी अवस्था में विचारों की आड़ी टेढ़ी लकीरें मन में आपस में टकराने लगती हैं और अपने को अभिव्यक्त करने के लिए मन का संधान करती है। चुप रहते हैं और मन की इस व्यथा को भी सहते हैं। बोलना चाहते हैं और बोलते भी नहीं।
               इस कशमकश से तो अच्छा है कि बोलकर अपने को हल्का कर लिया जाए। इसके अभाव में मानसिक शक्तियां कुंठित हो जाती हैं। उनमें गांठें पड़ जाती हैं और अंतत: ये गांठें हमारे अचेतन मन को जख्मों से छलनी कर देती हैं। ऐसा मौन संघातक होता है। मौन की शक्ति असीमित और अनंत है। मौन मनुष्य की ही नहीं संपूर्ण प्रकृति की अमोघशक्ति है।
                                                   ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Saturday, September 27, 2014

बुद्धि और ज्ञान |

                 बुद्धि का विकास आवश्यक है। बुद्धि के विकास से ही ज्ञान का प्रकाश पुंज फैलता है। समस्त जानकारी हमें बुद्धि के द्वारा ही प्राप्त होती है। बुद्धि ही ज्ञान को प्रकाशित करती है। हम बुद्धि का विकास किस ओर करते हैं, यह बात विचारणीय है। बुद्धि का विकास हम दो दिशा में कर सकते हैं। प्रथम, हम बुद्धि को सही दिशा देकर उसे ज्ञान की उच्चतम अवस्था की उपलब्धि करा सकते हैं।दूसरी तरह से हम बुद्धि का उपयोग मात्र अपने स्वार्थ के लिए कर सकते हैं । 
                 कहने का आशय यह कि हम बुद्धि को वाह्य जगत से मोड़कर अपने अंतर्मन की ओर अग्रसारित करा सकते हैं, जिससे वह अपनी आत्मा के आलोक को प्राप्त कर ले और यही मनुष्य जन्म प्राप्त करने का सच्चा व यथार्थ उद्देश्य है। देश में इसी दिशा की ओर सभी महापुरुष चले हैं। उनके द्वारा वह उन्नति प्राप्त की गई है जिसके कारण उन्होंने समाज व संसार को सही रास्ता दिखलाया। बुद्धि भावना से जुड़कर आत्मिक उन्नति को प्राप्त कर पाती है। इसके विपरीत बुद्धि जब भावना का परित्याग करते हुए मात्र बुद्धिवादी बनकर आगे बढ़ती है, तब वह इंद्रियों के सुखों की पोषक होती है। वह इस ओर लग जाती है कि किस प्रकार से शरीर के सुख के लिए अधिक से अधिक योगदान किया जा सके।
                 शरीर सुख ही मुख्य उद्देश्य रह जाता है। आज समाज बिखर रहा है। क्यों? इसलिए कि लोग केवल बुद्धिवादी होकर रह गए हैं। भावना का परित्याग कर दिया गया है। बुद्धि की बाजीगरी चल रही है। लोग कैसे-कैसे, झूठ, फरेब, छल, कपट को ओढ़ते चले जा रहे हैं। हर तरफ बिखराव की स्थिति दिखाई पड़ती है। सब एक दूसरे को दोष देते रहते हैं। मगर वे क्यों नहीं समझ पाते कि भाव का परित्याग कर केवल बुद्धिवादी बनकर वैतरणी नहीं पार की जा सकती।
               आज बुद्धि की समस्त चेष्टाएं संसार की ओर अग्रसर हो चुकी हैं। ठगी का बाजार गर्म है। वे इस बात को भूल गए हैं कि हम किस देश के रहने वाले हैं, जहां बुद्धि का विकास अपने चरमोत्कर्ष पर रहा है। बुद्धि को संसार में उतना ही प्रयुक्त किया जाता रहा है जिससे सही जीवनयापन हो सके। अब पुन: बाहर की दौड़ पर लगाम लगाकर अपने यथार्थ सुख की प्राप्ति की ओर बुद्धि को ले जाना होगा। तभी समाज और पूरे विश्व को शांति व आनंद की राह पर लाया जा सकता है।
                      ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Friday, September 26, 2014

चरित्र |

                   चरित्र एक ऐसी मशाल के समान होता है जिसका प्रकाश दिव्य और पावन होता है। चरित्र बल के आलोक से अनेक लोगों को प्रेरणा मिलती है, एक नई राह मिलती है। चरित्र एक ऐसा आकर्षण केंद्र होता है, जिसकी ओर सभी अनायास खिंचे चले आते हैं। चरित्र से व्यक्तित्व आकार पाता है, उसे एक पहचान मिलती है।
                  वस्तुत: आमतौर पर अच्छी आदतों व गुणों के समूह को चरित्र में शामिल किया जाता है। चरित्र का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक व विस्तृत है। इसे हमने संकीर्णता की सीमाओं में सीमित कर दिया है। चरित्र के संबंध में हम अनेक भ्रांत धारणाओं से ग्रस्त हैं, जबकि यह हमारे समूचे व्यक्तित्व को गढ़ता है और विकसित करता है। यह अपने गुणों के बीजों का हमारे अंतस् में रोपण करता है और कालांतर में इन गुणों के विकास से हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है। चरित्र के आधार पर व्यक्ति की पहचान होती है। चरित्र के बीज सही और प्रखर हों, सत्य से आवृत्त हों, तो व्यक्तित्व सशक्त होगा। इसके विपरीत दुर्गुण से शिकार हों, तो व्यक्तित्व दोषयुक्त होगा। इसलिए चरित्र को व्यक्तित्व के गुणों का समुच्य कहा जा सकता है। इसमें अच्छे-बुरे और सद्गुण-दुर्गुण दोनों को ही शामिल किया जाता है। ये गुण हमारे समूचे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। इसके आधार पर हम जाने व समझे जाते हैं। हम क्या हैं, हमारा अस्तित्व क्या है, हमारी वर्तमान स्थिति क्या है और कहां पर विद्यमान हैं? इसकी समूची जानकारी चरित्र के इर्द-गिर्द घूमती नजर आती हैं।
                अध्यात्म व्यक्तित्व ढालने की टकसाल है और चरित्र-निर्माण की प्रयोगशाला है। ऐसे अनेक, असंख्य जीवंत प्रमाण हैं, जिनका व्यक्तित्व कोयले के समान अनगढ़ व कुरूप था, परंतु बाद में वे ही विद्वान, ज्ञानी और महापुरुष बने। चरित्र से ही व्यक्तित्व की व्याख्या-विवेचना संभव है। व्यक्तित्व निर्माण चिंतन की प्रेरणा प्रदान करता है। चरित्र एक पात्र है, जिसमें चिंतन विकसित होता है। चरित्र की उपजाऊ भूमि पर ही चिंतन का बीजारोपण होता है। यह वह भूमि है, जहां से अध्यात्म की कोंपलें फूटती हैं, परंतु विडंबना है कि आज की तथाकथित आध्यात्मिकता में अध्यात्म की मूलभूत विशेषता चरित्र विलुप्त हो रही है। यही कारण है कि आज तमाम आध्यात्मिक व धार्मिक व्यक्ति बाहर से जैसे दिखते हैं, वैसे अंतर्मन से होते नहीं हैं।
                       ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Thursday, September 25, 2014

आत्म-सुधार |

                    कुछ भारतीय मनीषियों ने विनोदप्रियता का सहारा लेते हुए पर-छिद्रान्वेषण यानी निंदा को निंदा-रस कहा है। कारण स्पष्ट है। दूसरे की निंदा या दूसरे की बुराई करने में तमाम लोगों को बहुत अच्छा लगता है। अनेक लोग उन लोगों की निंदा करते हैं, जिनके प्रति शत्रुभाव रखते हैं। वे मित्रों को भी नहीं बख्शते और पीठ पीछे उनकी आलोचना करते रहते हैं।
                   दूसरे के चरित्र पर बना सुई के नोक के बराबर छिद्र भी हमें तत्काल नजर आ जाता है और हम पूरी तत्परता से उसे चौड़ा करने में यानी बढ़ा-चढ़ाकर दूसरों से कहने में व्यस्त हो जाते हैं। इस बात की परवाह किए बगैर कि सामने वाले से कई गुना अधिक कमियां उनमें हो सकती हैं, किंतु इस ओर हमारा ध्यान जाता भी नहीं और हम निंदा-रसपान में व्यस्त रहते हैं। निंदारस की व्यापकता यत्र-यत्र सर्वत्र नजर आती है। ऐसा क्यों होता है? दूसरों की निंदा करके बहुधा लोगों को सुखानूभूति क्यों होती है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे मन में स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ दर्शाने की भावना उस समय सूक्ष्म अहंकार के रूप में मौजूद रहती हो? निश्चय ही ऐसा ही है। अहंकार सूक्ष्म-सूक्ष्मतर व छद्मवेशी होता है। इसीलिए हम उसे पहचान नहीं पाते। परिणाम स्वरूप उसके मकड़जाल में हम उलझ जाते हैं। वैसे भी किसी भी वस्तु को देखने के लिए हमें फासले की जरूरत होती है। आईने में हमें अपनी शक्ल तभी नजर आती है जब थोड़ा फासला हो। चूंकि हमारा स्वयं से फासला रंचमात्र भी नहीं होता, इसलिए हमें अपनी शक्ल प्राय: नजर नहीं आती। अगर कोई इस बात की ओर ध्यानाकर्षण भी करे तो हम अपने ही पक्ष में उल्टे-सीधे तर्क जुटा लेते हैं। जबकि दूसरा व्यक्ति फासले पर होता है। इसलिए उसकी कमियां हमें नजर आ जाती हैं और अहंकार के वशीभूत होकर हम उन्हें निर्ममतापूर्वक उधेड़ने में लग जाते हैं, जबकि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। किंतु सावधान! कहीं ऐसा न हो कि सामने वाला बुद्धिमान हमसे और अपनी कमियों के प्रति सजग होकर आत्म-सुधार में जुट जाए और हम निंदा करके आत्मपतन के मार्ग पर अग्रसर रहें। मनीषी वही है, जो दूसरों की कमियों पर ध्यान देने के बजाय अपनी कमियों पर ध्यान दे। तभी आत्म-सुधार संभव है।
                         नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें ।
                                ॥ हरिः शरणम् ॥ 


Wednesday, September 24, 2014

गुरु |

                 भारतीय संस्कृति में गुरु का पद सर्वोच्च माना गया है। शास्त्रों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के तुल्य कहा गया है। प्रथम स्तर पर गुरु बालक को शिक्षा देकर इस योग्य बनाता है कि वह अपने कर्मक्षेत्र में सफल हो सके। द्वितीय स्तर पर गुरु अपने शिष्य के अंतर्मन में व्याप्त अंधकार (अज्ञान व अविद्या) और विकारों को नष्ट कर प्रकाश (ज्ञान) की अनुभूति कराता है।
                 गुरु शिष्य को ज्ञान का मार्ग दिखाने के साथ-साथ उसकी चेतना का विस्तार भी करता है। गुरु वह सेतु है जिस पर चलकर शिष्य परमात्मा तक पहुंचता है, तभी तो कबीर कहते हैं कि गुरु जी आप धन्य हैं कि आपने भगवान के बारे बता दिया। इसी तरह सूफी महाकवि जायसी भी मानते हैं कि इस संसार में गुरु के बगैर कोई भी उस परब्रह्म को प्राप्त नहीं कर सकता है। 'बिनु गुरु जगत को निरगुन पावा।' गोस्वामी तुलसीदास भी 'हनुमान चालीसा' में हनुमान जी से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि गुरुदेव की तरह मुझ पर कृपा करो- 'जै जै हनुमान गोसाईं, कृपा करौ गुरुदेव की नाई।' विचारणीय प्रश्न यह है कि सच्चा गुरु मिले कैसे? क्योंकि आज के इस परिवेश में सच्चा गुरु मिलना सहज नहीं है। यदि गुरु ही अज्ञानी है, तो वह शिष्य को कैसे मार्ग दिखा सकेगा? वह तो स्वयं को भी और शिष्य को भी पतन के गर्त में ढकेल देगा। संत कबीर ने भी गुरु की महत्ता का प्रतिपादन अपने तरीके से किया है। गुरु सच्चा ज्ञानी हो और शिष्य में ज्ञान पाने की ललक हो, तभी गुरु और शिष्य दोनों धन्य हो उठते हैं। इस संबंध में ओशो कहते हैं- 'गुरु-शिष्य संबंध संयोग मात्र भी है और एक होशपूर्ण चयन भी। जहां तक गुरु का सवाल है, वह पूर्णत: होशपूर्ण (जागरूकतापूर्ण) चयन है। जहां तक शिष्य का प्रश्न है, यह संयोग ही हो सकता है, क्योंकि अभी होश उसके पास है ही नहीं। ओशो के कहने का अर्थ यह है कि यदि सच्चा गुरु आसानी से नहीं मिलता है तो गुरु को ऐसा शिष्य भी मुश्किल से मिलता है, जो उसके द्वारा प्रदत्त ज्ञान की लौ को प्रज्जवलित कर सके। गुरु ऐसे शिष्य को मात्र एक बीज देता है और शिष्य भूमि बनकर उस बीज को अंकुरित और पल्लवित करता है। इस प्रकार सच्चा गुरु शिष्य को सही मार्ग निर्देशित करके न केवल उसके जीवन-मार्ग को प्रशस्त करता है बल्कि उसे आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर ले जाने में सहायक होता है।
                            ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Monday, September 22, 2014

धर्माचरण |

                 साधना परक धर्म के साथ रचनापरक धर्म वर्तमान की सबसे बड़ी जरूरत है। रचनात्मक धर्म का मतलब परोपकार से है, सेवा-भावना से है। ऐसे कार्यों में तकनीक और युवा शक्ति का सामंजस्य बिठाकर समाज को एक नई दिशा दी जा सकती है। जरूरत मन: स्थिति बदलने की है, मन: शक्ति से हर परिस्थिति को बदला जा सकता है। एक विचारक ने ठीक कहा है कि वृद्ध वह है, जो अतीत के अनुभवों में जीता है। युवा वह है, जो वर्तमान ठोस धरातल पर खड़ा होकर भविष्य के सपने बुनता है। एक स्वप्नद्रष्टा युवक को तैयार करने के लिए हमें उसे वर्तमान की कठोर सच्चाइयों से रूबरू कराना है। हमें एक ऐसी युवा शक्ति की जरूरत है, जो समय की चाल के साथ बराबर तालमेल बिठा सके।
               इतिहास के आंगन में खड़े होकर देखते हैं तो पता चलता है कि महावीर, बुद्ध, कृष्ण, मोहम्मद और जीसस ने जब प्रसुप्त समाज को जगाया था, तब वे न केवल आयु से युवा थे, बल्कि उनकी सोच भी समय से आगे की थी। आज की स्थिति में धर्म-जगत पर दृष्टि डालें, तो एक धुंध और कुहासा दिखाई देता है। आज युवकों ने धर्म और अध्यात्म को वृद्धों के लिए सुरक्षित और आरक्षित मान लिया है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तीर्थकर महावीर ने कहा है- जब तक बुढ़ापा पीड़ित नहीं करता हो, व्याधि जब तक नहीं बढ़ती हो, जब तक इंद्रियां क्षीण न हों, तब तक धर्माचरण करें। क्षण मात्र का भी आलस्य मत करें और समय के अनुरूप चलते रहें। आज के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या युवक धर्म से दूर जा चुके हैं? मेरी दृष्टि में युवक धर्म से दूर नहीं हैं, बल्कि धर्म की पुरातन व्याख्या नूतन युवक से दूर खड़ी है। आज के युवक को एक ऐसी धार्मिक आस्था की तलाश है, जो उसके दौड़ते-भागते जीवन के साथ कदम-ताल कर सके। हर काल का युवा वर्ग जीवन में कुछ नयापन चाहता है। वह नए कपड़े पहनता है, वह नए तरीके से खाता है, नई दिशा में सोचता है, फिर वह पुरानी परंपरा को धर्म के संदेश के रूप में कैसे आत्मसात करेगा?
                 यह प्रश्न धर्माचार्यों के लिए विचारणीय है। सामाजिक क्षेत्र में हो रहे बदलावों की आहट धर्म जगत में भी सुनाई देना स्वाभाविक है। कोई भी आस्था बदलते सामाजिक बदलावों के साथ गतिशील नहीं होती है तो वह प्रगतिशील युवकों को कैसे तैयार करेगी?
                      ॥ हरिः  शरणम् ॥