Sunday, February 2, 2014

अमृत-धारा |रसखान-२

                                             गीता में भगवान श्री कृष्ण ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए जो मार्ग बताएं है उनमे एक मार्ग ज्ञान का है |ज्ञान ,परमात्मा को जानने का ही दूसरा नाम है |ज्ञान सबसे अच्छा रास्ता है क्योंकि इसमें परमात्मा को सम्पूर्ण रूप से जान लेने के कारण उससे सम्बंधित सभी भ्रांतियां दूर हो जाती है |परन्तु इस मार्ग की सबसे बड़ी कमी यह है कि ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति अहंकार ग्रस्त हो सकता है |कोई बिडला ही ऐसा होगा जो ज्ञान प्राप्त कर के भी अहंकार से मुक्त हो |
                                             ज्ञान प्राप्त होने के बाद भी अहंकार न आने पाये,यह केवल तभी संभव है जब आप प्रेमपूर्ण हो |प्रेम और अहंकार दोनों एक दूसरे के विपरीत है |जहाँ प्रेम है वहाँ अहंकार और घमंड का कोई स्थान नहीं है |हो सकता है कि बिना प्रेम पूर्णता के आप ज्ञान से सत्य को प्राप्त कर ले परन्तु जो आनंद प्रेम के साथ सत्य को पाने में है वह अकेले ज्ञान से सत्य पाने में नहीं है |इसलिए जितने भी संत महापुरुष हुए हैं वे सब ज्ञान के साथ साथ प्रेम से भी परिपूर्ण थे |इसी लिए उनके ह्रदय से काव्य प्रस्फुटित हुआ है |
                                              रसखान ने इसी ज्ञान और प्रेम के बारे में कहा है-
                                    भले वृथा करि पचि मरौ,ज्ञान गरूर बढ़ाय |
                                    बिना प्रेम फीको सबै,कोटिन कियो उपाय ||
                          आप चाहे कितना ही प्रयास करलें,आपके सब प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे अगर आप केवल अपना ज्ञान ही बढ़ा रहे है और आपके भीतर प्रेम नहीं है |बिना प्रेम के ज्ञान केवल आपका भार ही बढ़ाएगा |अहंकार आपके जीवन का सबसे बड़ा बोझ है |और जब आप बोझिल होते हैं तब आपके भीतर परमात्मा का प्रवेश कैसे संभव है ?बिना प्रेम के सारा संसार ही फीका है |आप करोड़ों उपाय करलें,आप बिना प्रेम के स्वयं में मधुरता नहीं ला सकते|रसखान आगे कहते हैं-
                                   कमलतंतु सो छीन अरु,कठिन खड़ग की धार |
                                    अति सूधो टेढो बहुरि,प्रेम पंथ अनिवार ||
                            ज्ञान-मार्ग के साथ प्रेम -मार्ग का संगम आपको परमात्मा की सुखद अनुभूति करता है |यह प्रेम का रास्ता कमल की डंडी के रेशे जितना सूक्ष्म है |कमल पुष्प की डंडी कई सूक्ष्म तंतुओं से बनी होती है |उसका प्रत्येक तंतु बहुत ही महीन होता है |रसखान कहते है कि प्रेम मार्ग इतना ही सूक्ष्म और संकडा व तंग है |प्रेम के रास्ते पर चलना ऐसे ही है जैसे तलवार की तेज धार पर चलना हो |संकडे और तेज धार वाले मार्ग पर चलना संसार में सबसे कठिन कार्य है |यह प्रेम का रास्ता सीधा भी है और टेढा भी |सीधा उनके लिए जो प्रेम में मिट जाते हैं और टेढा उनके लिए जो स्वयं को मिटा नहीं पाते |रसखान कहते हैं कि इस प्रेम के मार्ग पर सोच समझ कर चलना पड़ता है |और बिना प्रेम के सब कुछ फीका है |प्रेम ही आपके जीवन को मधुरता प्रदान कर सकता है |बिना प्रेम यह जीवन शुष्क मरुस्थल जैसा है और प्रेम के साथ अत्यंत ही मधुर |
                                           || हरिः शरणम् ||

Saturday, February 1, 2014

अमृत-धारा |रसखान -१

                                          रसखान,वाकई रस की खान ही है |मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे कृष्ण के परम भक्त थे |जितनी भी उन्होंने रचनाएँ की है,सब में कृष्ण के प्रति उनका प्रेम दृष्टिगोचर होता है |भक्ति-काल की इस विभूति ने रहीम और कबीर की तरह ही प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया है |परमात्मा की प्रार्थना में प्रेम अगर शामिल नहीं है तो वह प्रार्थना परमात्मा कैसे स्वीकार कर सकता है ?रसखान ने कृष्ण के जीवन के प्रेम-पक्ष को अपनी रचनाओं में प्राथमिकता दी है |प्रेम के बारे में रसखान कहते हैं कि-
                                            प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत,प्रेम न जानत कोइ |
                                            जो जन जानत प्रेम जो , मरे जगत क्यूँ रोइ ||
                      रसखान भी यहाँ कबीर कि तरह ही प्रेम के बारे में कहते हैं कि सारा संसार प्रेम,प्रेम ,प्रेम ....कहता जरूर है ,परन्तु प्रेम क्या होता है यह बात कोई जानता तक नहीं है |सब लोगों ने प्रेम का नाम सुन जरूर रखा है परन्तु उनके जीवन में प्रेम परिलिक्षित कहीं भी नहीं होता है |आप प्यासे हो और केवल पानी ,पानी की रट लगाते रहोगे तो केवल क्या पानी का नाम लेते रहना ही आपकी प्यास  बुझा देगा ?अगर प्यास बुझानी है तो फिर पानी पीना ही होगा |इसी प्रकार  केवल प्रेम का नाम रटते रहने से प्रेम का अवतरण आपके जीवन में नहीं हो पायेगा |जिस दिन प्रेम का प्रादुर्भाव हो जायेगा उस दिन के बाद आपके जीवन से सारा रोना-धोना स्वतः ही मिट जायेगा |इसी को रसखान कहते हैं -"जो जन जानत प्रेम जो , मरे जगत क्यूँ रोइ "|अगर प्रेम को जानते हैं तो फिर यह संसार रो रो कर क्यों मर रहा है ?प्रेम में किसी भी प्रकार का दुःख-दर्द नहीं होता |प्रेम के साथ ही इन सब विकारों का अदृश्य होजाना भी स्वाभाविक है |प्रेम के बारे में रसखान समझते हैं कि -
                                        अति सूक्ष्म कोमल अतिहि ,अति पतरौ अति दूर |
                                         प्रेम कठिन सब ते सदा,नित इकरस भरपूर ||
                      प्रेम बहुत ही सूक्ष्म और कोमल है |सूक्ष्म इस दृष्टि से कि यह प्रेम केवल प्रेमपूर्ण ह्रदय वाले को ही नज़र आ सकता है,बिना ऐसे ह्रदय के प्रेम को देख पाना असंभव है |प्रेम जब महसूस हो जाता है तब लगता है कि यह बहुत ही पास है और जब इसका आभास किसी को नहीं हो पता तो उसके लिए प्रेम बहुत ही दूर की बात है |प्रेम ,इसी कारण से सदैव ही कठिन कहा गया है ,क्योंकि प्रेम करने के लिए व्यक्ति को खुद को मिटाना होता है |इस संसार में हर कोई दूसरे को ही मिटाने पर तुला  है,स्वयं मिटने को तैयार ही नहीं है |ऐसे में प्रेम कहाँ से प्रकट होगा ?इसी कारण से प्रेम को सबसे कठिन कहा गया है |प्रेम का पदार्पण जब हो जाता है तो वह अस्थाई कभी भी नहीं होता |वह असीम ,सनातन और आनंदित करने वाला होता है |प्रेम सदैव ही एक समान रस प्रदान करने वाला है और यह रस भी कम नहीं,भरपूर प्रदान करता है |
                                        || हरिः शरणम् ||

Friday, January 31, 2014

अमृत-धारा |रहीम-३

                           भक्ति और प्रेम कोई अलग अलग नहीं है |जितने भी भक्ति-रस के काव्य हैं ,उनमे प्रेम को प्रमुखता सदैव ही मिली है |आप मीरा का काव्य देख लें चाहे कबीर का ,रसखान का देख लें या सूरदास का |सभी ने प्रेम को परमात्मा के समकक्ष माना है |इससे रहीम भी अछूते नहीं रहे |रहीम का जिक्र हो और उनके प्रेम से सम्बंधित काव्य की चर्चा नहीं हो तो यह उनके साथ अन्याय होगा |प्रेम से सम्बंधित उनके कुछ दोहों ने मुझे प्रभावित किया है |वे ऐसी रचनाएँ है जो प्रेम करने वालों को अपने ह्रदय तक पहुंचती महसूस होती है |यही रहीम की विशेषता है |
                                               कहाँ करों बैंकुठ ले,कल्पवृक्ष की छाँह |
                                           रहिमन ढाक सुहावनो,जो गल प्रीतम बाँह ||
                       रहीम कहते हैं कि अगर परमात्मा  मेरी भक्ति से प्रसन्न हो जाता है और मुझे बैंकुठ में आने के लिए कहता है,तो मैं उसे कदापि स्वीकार नहीं करूँगा |बैंकुठ वह स्थान है जहाँ परमात्मा स्वयं निवास करते हैं |यह एक स्थान है जहाँ कोई दुःख नहीं है,किसी प्रकार की कुंठा नहीं है ,चारों ओर आनंद ही आनंद बरसता है |रहीम परमात्मा के इस सर्वोत्तम प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं |कहा जाता है कि बैकुंठ में कल्पवृक्ष है |उसकी छांह में बैठकर व्यक्ति जिस किसी की भी कल्पना करता है,वह वस्तु उसे तुरंत बिना किसी परिश्रम के उपलब्ध हो जाती है |रहीम कहते हैं कि मैं बैंकुठ और कल्पवृक्ष की छांह लेकर भी क्या करूँगा ?मेरे को तो किसी भी वस्तु की चाह है ही नहीं |मैं तो सिर्फ प्रेम चाहता हूँ |मेरे गले में अगर मेरे प्रीतम की बांह हो तो छोटा सा पौधा ढाक यानि बेर का पौधा भी मुझे सुहावना प्रतीत होगा |बेर की झाड़ी होती है ,देखने में बिलकुल भी सुन्दर नहीं होती है और काँटों से भरी भी होती है |नीचे बैठने की जगह भी नहीं होती क्योंकि उसकी डालियाँ जमीन तक झुकी होती है |एक कहावत है न कि "ढाक के तीन पात" |इतना छोटा सा ,काँटों युक्त बेर का पौधा भी रहीम को सुन्दर लगेगा अगर उसके गले में अपने प्रीतम की बांह होगी |
                                                  यह न रहीम सराहिये,लन -देन की प्रीति |
                                                    प्रानन बाजी राखिये,हार होय के जीति ||
                                यह जो प्रेम के नाम पर लेना-देना चल रहा है,उसकी कभी भी सराहना मत करो |रहीम प्रेम में ऐसे लेन-देन को महत्वहीन करार देते हैं |वे कहते हैं कि अगर कुछ लेना देना करना ही है तो अपने प्राण को दांव पर लगाइए |यह बिलकुल भी नहीं सोचना कि आपके इस दांव में आपकी जीत होगी या हार |प्रेम करने वाले हार-जीत की परवाह बिलकुल भी नहीं करते हैं |प्राण की बाज़ी लगाकर ही प्रेम प्राप्त कर सकते हो |बिना प्रेम के परमात्मा कहाँ ?प्रेम में तो स्वयं को ही मिटना होता है |
                                          रहिमन मैन तुरंग चढ़ी,चलिबो पावक मांही |
                                         प्रेम-पंथ ऐसो कठिन , सब कोऊ निबहत नांही ||
                                बड़ा ही सुन्दर दोहा कहा है ,रहीम ने |प्रेम के रास्ते पर चलना आसन कहीं से भी नहीं है |इस पर हर कोई नहीं चल सकता |और अगर कोई चलना शुरू भी करता है तो गंतव्य तक पहुँचना मुश्किल है |"रहिमन मैन तुरंग चढ़ी "-मैन कहते हैं मोम को और तुरंग कहते हैं घोड़े को |अगर कोई व्यक्ति मोम के घोड़े पर चढ कर आग लगे रास्ते पर चलना चाहे तो क्या वह उस रास्ते से पार जा सकेगा ?  बहुत ही मुश्किल है,ऐसे अग्नियुक्त रास्ते पर मोम के  घोड़े पर बैठकर चलना |मोम स्वयं ज्वलनशील है,वह आग को और अधिक तेज कर देता है |जिस कारण से व्यक्ति का भभकती आग से बाहर निकलना ही दुष्कर हो जाता है,पार होना तो अति कठिन है | प्रेम के रास्ते पर भी चलना इसी प्रकार से चलने के समान है |प्रेम करके उसे निबाहना ,उसको ऊंचाई तक ले जाना बहुत ही मुश्किल है |इसी लिए रहीम ने प्रेम-पथ को सबसे कठिन पथ बताया है |
                                         रहिमन प्रीती सराहिये,मिले होत रंग दून |
                                         ज्यों जरदी हरदी तजै,तजै सफेदी चून ||
                              अंत में रहीम कहते है कि प्रेम वही सराहा जाता है,उसी प्रेम की प्रशंसा की जाती है जिसमे दोनों प्रेमी मिलकर एक हो जाते हैं |दोनों के ही रंग मिलकर एक दूसरे में समाकर दुगुने हो जाते हैं |"मिले होत रंग दून "-दोनों एकाकार होकर भी अपने अपने अनुसार दुगुने महसूस करते हैं |दोनों ही अपना स्वभाव छोड़ देते हैं |फिर जो स्वभाव पैदा होता है ,वह पहले से ही कही ज्यादा बेहतर होता है |रहीम ने इसको बड़ी ही शानदार उपमा दी है |
                   "ज्यों जरदी हरदी तजै,तजै सफेदी चून"|जो लोग अंडे का सेवन करते हैं वो जानते हैं कि अंडे को फोड़ने पर अंदर सफ़ेद हिस्से का एक आवरण होता है जो पीले रंग के yolk sac को घेरे रहता है |अंडे के इस भीतरी पीले भाग को रंग के कारण जरदी कहा जाता है |जरदी का अर्थ होता है-पीला रंग |हल्दी को पानी में घोला जाये तो उसका रंग पीला होता है और चूने का घोल सफ़ेद रंग का होता है |अगर दोनों के घोल को मिलाया जाये तो जो मिश्रण बनता है वह लाल रंग का होता है |कभी सब्जी खाते समय कपड़ों पर गिर जाती है तो पीला सा एक दाग कपड़ों पर लग जाता है ,यह रंग सब्जी में डाली हुई हल्दी के कारण होता है |जब उस दाग को साबुन से धोने का प्रयास करते हैं तो पहले वह सुर्ख लाल रंग में परिवर्तित होता है |ऐसा साबुन में उपस्थित चूने के कारण होता है |रहीम कहते है कि दो प्रेमी जब एकाकार होते हैं तब भी ऐसा ही होता है |जैसे हल्दी और चूने के घोल के मिलाने से होता है |मिलाते ही हल्दी अपना पीला रंग और चूना अपना सफ़ेद रंग त्याग देते है और अधिक सुहावना रंग लाल में परिवर्तित हो जाते है |इसी प्रकार प्रेम में जब दोनों प्रेमी मिलते हैं तो दोनों को असीम आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है |प्रेमी भक्त जब प्रेमवश परमात्मा का आलिंगन करता है तब भी ऐसा ही उसे अनुभव होता है |आखिर प्रेम ,परमात्मा का ही तो एक नाम है |
                                                     || हरिः शरणम् ||

Thursday, January 30, 2014

अमृत-धारा |कबीर-६

                               कबीर का प्रेम यहाँ पर आकर प्रार्थना बन जाता है |साधारण लोग शारीरिक आकर्षण को प्रेम का नाम दे देते हैं ,लेकिन यह सत्य नहीं है |प्रेम तो सबके लिए एक उपासना है |प्रेम को न तो किसी तराजू में तोला जा सकता है न ही किसी अन्य माप से मापा जा सकता है |न तो प्रेम समय के बंधन को मानता है और न ही किसी विशेष स्थान पर ही किया जा सकता है |प्रेम तो सतत और सनातन है |प्रेम है ,इसका अर्थ एक ही है कि प्रेम है |कम या अधिक नहीं |कबीर स्वयं कहते हैं-
                               प्रेम प्रेम कोई सब कहे,प्रेम ना बुझे कोय |
                               आठ पहर भीगा रहे ,प्रेम कहाए सोय ||
                चाह के मिटते ही मन का निर्मल हो जाना होता है |प्रेम का अर्थ एक ही है-मन में किसी भी प्रकार का मोह,ममता,इर्ष्या और कामनाओं का अभाव |ऐसे मन को साफ और स्वच्छ कहा जा सकता है |बिलकुल दूध की तरह पाक और साफ,बगुले की तरह बेदाग और सफ़ेद |कबीर का एक दोहा है ,जो इस बात का प्रमाण है कि निर्मल मन ही परमात्मा के साथ एकाकार हो सकता है |और निर्मल मन बिना प्रेम के उपलब्ध होना संभव नहीं है |कबीर कहते हैं-
                            उठा बगुला प्रेम का,तिनका चढा आकाश |
                          तिनका तिनके से मिला,तिन का तिन के पास ||
                   "उठा बगुला प्रेम का "-यह निर्मल मन एक बगुले के समान है जिसमें प्रेम के जागृत होते ही आत्मा एकदम से स्वतन्त्र हो जाती है | मन का निर्मल होना और आत्मा का स्वतन्त्र होजाना एक ही प्रक्रिया है |प्रेम के प्रादुर्भाव के साथ ही यह तिनके रुपी आत्मा एक दम हल्की होकर शून्य में उड़ चलती है |आत्मा के साथ जब मन का संयोग होता है तभी वह मन अपने भीतर छुपी कामनाओं की पूर्ति हेतु आत्मा को शरीर की मृत्यु होने के उपरांत नए शरीर में ले आता है |मन में प्रेम जागृत होते ही समस्त कामनाएं समाप्त हो जाती है,और ऐसी स्थिति में मन का आत्मा के साथ योग भी |यह तिनका (आत्मा)शून्य में जाकर तिनके (परमात्मा )से मिल जाती है -"तिनका तिनके से मिला "|आत्मा के परमात्मा से मिलन का अर्थ यही है कि जो जिसका अंश था वह उसके पास ही पहुँच गया |इस प्रकार कबीर अंत में कहते है कि यह आत्मा ,परमात्मा के पास पहुँच ही गयी |"तिन का तिन के पास "-अर्थात यह आत्मा जिसका अंश है उस परमात्मा के पास पहुँच ही गई |कबीर के अनुसार यह सब प्रेम के कारण ही संभव हुआ है |अतः सबसे प्रेम करते रहें यही कबीर का कहना है |कबीर के लिए सबसे प्रेम करना ही एक मात्र परमात्मा की प्रार्थना है |
                         || हरिः शरणम् ||  

Wednesday, January 29, 2014

अमृत-धारा |कबीर-५

                               कबीर एक ऐसा नाम है जिसको लेते ही व्यक्ति का मन प्रफुल्लित हो जाता है |कबीर की हर वाणी एक नए आयाम लिए हुए होती है |प्रेम की भाषा संसार को कबीर ने समझाई|कबीर ने प्रेम और परमात्मा के मध्य सीधा सम्बन्ध होना सिद्ध किया |प्रेम के बारे में कबीर ने जितनी खोज की,शायद ही अब तक किसी ने की होगी |प्रेम से इतर संसार में कोई वस्तु न तो थी और न ही कभी होगी |प्रेम से संसार में सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है,परमात्मा भी |प्रेम की अगर सबसे बड़ी विरोधी कोई है तो वह है व्यक्ति के मन की अनगिनत,कभी भी समाप्त न होने वाली इच्छाएं और कामनाएं|जहाँ किसी से भी हम कोई उम्मीद रखते हैं तो वहाँ प्रेम का स्वतः ही अभाव हो जाता है |व्यक्ति की वह इच्छा या चाह पूरी न होने तक उसका मन उद्विग्न रहता है |दिन रात उसे चिंता घेरे रहती है  |और यह चिंता उसे प्रेम और परमात्मा की तरफ जाने से रोकती है |कबीर कहते हैं-
                                              चाह मिटी चिंता मिटी ,मनवा बेपरवाह |
                                               जिसको कछु न चाहिए,वह है शंहंशाह ||
                जब व्यक्ति के मन की सभी चाह मिट जाती है तो उसकी समस्त चिंताएं स्वतः ही मिट जाती है |समस्त चिंताएं मिटते ही मन को किसी भी बात की परवाह नहीं रहती |ऐसे में मनुष्य अपने आपको दीन-हीन और असहाय समझना बंद कर देता है | यह एक राजा या शहंशाह की स्थिति है |
                 एक बार एक साधू  को एक रूपये का सिक्का कहीं पर पड़ा मिल गया |उस दिन के लिए उसकी दैनिक आवश्यकता की पूर्ति का इंतजाम हो चूका था | साधू पूरा अपरिग्रही था,एकत्रित करने में विश्वास नहीं रखता था | उसने सोचा कि यह सिक्का किसी जरूरतमंद को दे देना चाहिए |उसने एक भिखारी को देने की सोची |भिखारी ने यह कह कर लेने से इंकार कर दिया कि उसका भी आज की आवश्यकता पूरी हो चुकी है |साधू ने सोचा-यह सिक्का उस व्यक्ति को देना चाहिए जिसे उसकी अत्यधिक आवश्यकता हो |वह ऐसे ही किसी जरूरतमंद की तलाश करने लगा |वह एक बाज़ार से गुजर रहा था |उसने देखा कि राज्य के अफसर व्यापारियों से जबरन कर वसूल रहे है |साधू के दिमाग में एक विचार कौंधा और तुरंत राज दरबार में चला गया |उसने राजा को वह सिक्का भेंट करते हुए कहा कि मैं आपके राज्य में घूमता रहा ,यह सिक्का देने के लिए |परन्तु मुझे आपके सिवाय कोई अन्य व्यक्ति जरूरतमंद  नहीं मिला जिसे मैं यह सिक्का दे सकूँ |आपके पास अकूत दौलत होते हुए भी आप करों की वसूली कर रहे है |आप से अधिक गरीब इस राज्य में मिलना मुश्किल है |राजा ने यह सुनकर क्या किया और कहा होगा ,मैं नहीं जानता |परन्तु यह कहानी हमें बताती है कि दौलत पाकर ही कोई व्यक्ति बादशाह नहीं हो जाता |अगर बादशाहत ही चाहिए तो धन-दौलत और सभी चाह-इच्छाओं से ऊपर उठना होगा |
                                कबीर भी यही कहता है |चाह के मिटते ही मन की समस्त चिंताएं मिट जाती है ,मन निर्मल हो जाता है ,साफ हो जाता हो |निर्मल ह्रदय से ही प्रेम की खुशबू निकल सकती है |और प्रेम जहाँ है,परमात्मा वहाँ स्वतः ही है |
                               मन ऐसा निर्मल भया,जैसे गंगा नीर |
                               पाछे पाछे हरि फिरे,कहत कबीर कबीर ||  
     एक बार पुनः कबीर और प्रेम को नमन |
                                 || हरिः शरणम् ||  

Tuesday, January 28, 2014

अमृत-धारा |रहीम-२

                  रहीम ने समाज सुधार के लिए जितने प्रयास  किये ,प्रंशसनीय है |उस समय मुग़ल काल में इस्लाम कट्टरपंथ अपने चरम पर था |इन सब के बावजूद रहीम अपने प्रयास करते रहे और अपनी रचनाओं के माध्यम से जनता को शिक्षित करते रहे |उन्होंने इसके लिए कभी भी धर्म का सहारा नहीं लिया |उन्होंने उन बातों को आमजन तक उनकी भाषा में ही पहुँचाने का अनुकरणीय प्रयास किये |जिसका लाभ आज भी उन्हे पढकर उठाया जा सकता है |
                                सामाजिक स्तर पर सभी प्रकार के व्यक्तियों से आपका दिन-प्रतिदिन सामना होता रहता है |उनमे से कई उच्च स्तर के होते है,कई आपके समकक्ष होते है और कई निम्नतम स्तर के |आपको सबके साथ अपना तालमेल बैठाना पड़ता है |कई ऐसे व्यक्ति होते हैं जिनके साथ आपका व्यवहार मित्रवत होता है |कुछ लोग ऐसे भी हो सकते हैं ,जिनको आप पसंद नहीं करते हो और आप उनका सानिध्य भी पसंद न करते हो |आपको ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना है,यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है |उच्च स्तर के व्यक्ति तो आप कैसा भी व्यवहार करें ,आपके साथ कोई निम्न स्तर  की हरकत नहीं करेंगे |परन्तु निम्न स्तर के व्यक्तियों के साथ ऐसा नहीं है |इस बारे में रहीम कहते हैं -
                                              रहिमन औछे नरन सूं,बैर भलो ना प्रीत |
                                              काटे चाटे श्वान के ,दोऊ भांति विपरीत ||
                               रहीम कहना चाहते हैं कि जो हल्के स्तर के व्यक्ति होते है उनके साथ आपकी दुश्मनी  और दोस्ती दोनों ही प्रकार का व्यवहार अच्छा नहीं है |चूँकि ऐसे व्यक्ति कि मानसिकता ही सामने वाले के प्रति इतने निम्न स्तर की होती है कि ऐन केन प्रकारेण वह उस व्यक्ति को हानि पहुँचाने की ही सोचता रहेगा |रहीम ने ऐसे स्तर के लोगों की तुलना एक कुत्ते से की है |वे समझाते हैं कि जैसे अगर आप कुत्ते से प्रेम प्रदर्शन करते हैं तो वह आपको अपनी जीभ से चाटता है|और अगर आप उसको गुस्से में डाँटते है अथवा मारते है तो वह आपको  काट भी सकता है |कुत्ते की लार में पागलपन के विषाणु होते हैं |वह आपको चाहे चाटे अथवा आपको काटे,आपके शरीर में पागलपन के विषाणु छोड़ ही देता है |इससे आपको रेबीज नामक बीमारी हो सकती है जिसका अंत केवल मौत है |इस बीमारी का कोई ईलाज आज तक नहीं खोजा जा सका है |इसलिए कुत्ते से दूरी बनाये रखने में ही आपकी भलाई है |
                         लाइलाज बीमारी से बचाव के लिए जिस प्रकार आप एक कुत्ते से दूरी बनाये रखते हैं ,ठीक उसी प्रकार आपको निम्नतम स्तर के व्यक्तियों से दूरी बनाये रखनी होगी ,जिससे सामाजिक स्तर पर वह आपको कोई क्षति न पहुंचा सके |
                                 || हरिः शरणम् ||    

Sunday, January 26, 2014

अमृत-धारा |रहीम-१

                        रहीम ,जन्म से मुस्लिम ,परन्तु मन से सभी धर्मों को बराबर समझने वाले |कबीर की ही भांति आत्म निरीक्षण के समर्थक |परमात्मा को स्वयं से अलग न समझने वाले एक आदर्श "अद्वैतवादी"|काव्य ऐसा कि पढने वाले और सुननेवाले सोचने को मजबूर हो जाये | अपने दोहों से सबको हैरान कर देते है |कट्टर आलोचक भी उनकी इस विधा की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं |रहीम कहते हैं-  
                            बिंदु भी सिंधु समान,को अचरज कासों कहे |
                              हेरनहार  हैरान,  रहिमन  अपने  आपने ||
               "बिंदु भी सिंधु समान " अर्थात् पानी की एक छोटी सी बूँद, एक महासागर के समान है |दोनों में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं है |ऐसा होना अचरज की बात नहीं है तो क्या है ?और यह आश्चर्य भी ऐसा कि किसी से कैसे कहें?यह एक ऐसे अचरज की बात है कि अगर किसी को कहें भी तो वह विश्वास ही नहीं करेगा |वह यह सोचता ही रहेगा कि ऐसा होना कैसे संभव है ?और जब वह इस अचरज पर गहराई से विचार करेगा तो वास्तविकता जानकर वह भी हैरान रह जायेगा ,क्योंकि वह जान जायेगा कि यह सब सत्य है |
                 यहाँ पर बिंदु अर्थात् पानी की एक बूंद तो स्वयं है और परमात्मा समुद्र है |परमात्मा और मनुष्य में किसी भी प्रकार का भेद नहीं है |परमात्मा अव्यक्त है और परमात्मा का व्यक्त स्वरूप ही व्यक्ति है |और ऐसा होना ही वास्तविकता में सत्य है |इसीलिए ऐसा जानकर ही मनुष्य आश्चर्य करता है कि परमात्मा उसके स्वयं के भीतर आत्मा के रूप में उपस्थित है |अचरज इस बात का होता है कि वह इतने दिनों तक यह सत्य क्यों कर समझ नहीं पाया ?"हेरनहार"अर्थात् इस सत्य को खोजने वाला भी इस सत्य को जानकर हैरान रह जाता है कि जिसको वह खोजने गया था ,वह तो उसके भीतर ही है |उसमे और परमात्मा में कोई भिन्नता है ही नहीं |इस को जानकर वह ऐसे अचरज की बात को किससे कहे?यही उसकी एक मात्र दुविधा है |
                    कबीर भी इसी बात को अलग अंदाज़ में कहते हैं-
                                                   हेरत हेरत हे सखी,रहा कबीर हेराय |
                                              बूँद समाई समुद्र में,अब कित हेरत जाय ||
                          कबीर कितनी मासूमियत के साथ कहते हैं कि हे मित्र,मैं भी ढूँढते ढूँढते अंत में  उसे खोज  कर और उसे जानकर हैरान रह गया कि यह बूंद (आत्मा)जब समुद्र (परमात्मा)में समा जाती है तब उसे ढूँढना बड़ा ही मुश्किल है |जब आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन हो जाता है तब दोनों में अंतर करना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है कि कौन परमात्मा है और कौन आत्मा है?कहा जाता है कि जब कबीर ने यह जान लिया कि परमात्मा ही आत्मा के रूप में इस शरीर में विद्यमान है तब उसने दोहे में थोडा सा परिवर्तन करके कहा है-
                                                  हेरत हेरत हे सखी,रहा कबीर हेराय |
                                                 समुद्र समाया बूँद में ,अब कित हेरत जाय ||
                    यहाँ आकर कबीर और रहीम में कितनी समानता है,इसका पता चलता है |यही आध्यात्मिक व्यक्तित्व की पहचान है |
                                    || हरिः शरणम् ||