Sunday, April 6, 2025

अदृश्य 'है'

 अदृश्य ‘है’

             जो ‘नहीं’ होते हुए भी ‘है’ प्रतीत होती है, वह माया है । इसके ठीक विपरीत कहा जा सकता है कि जो ‘है’ है उसका होना हमें ‘नहीं’ होना प्रतीत होता है,वास्तव में वही 'है' सत्य है । इसी कारण से हमें ऐसी प्रतीति होती है कि जो ‘नहीं’ है वह तो हमें प्राप्त है और जो ‘है’ है वह अप्राप्त है । जबकि सत्यता यह है कि ‘नहीं’ के प्राप्त होते हुए भी वह अप्राप्त ही है क्योंकि उसकी प्राप्ति हमें सदैव अधूरी ही लगती है । उसको हम चाहे जितना प्राप्त कर लें, जीवन में सदा असंतुष्ट ही बने रहेंगे । इसीलिए कहा जाता है कि ‘नहीं’ का ‘है’ प्रतीत होना भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, वह तो ‘नहीं’ ही है ।

         जो वास्तव में ‘है’ है, वह दिखलाई नहीं देकर भी उसका होना प्रत्येक संदेह से परे है । हमें एक ‘है’ ही सदैव के लिए प्राप्त है और केवल उसी की प्राप्ति से हम संतुष्ट हो सकते हैं । उस ‘है’ के अप्राप्त होने का अनुभव तभी तक है जब तक हम ‘नहीं’ का प्राप्त होना मान रहे हैं । जिस दिन ‘नहीं’ का नहीं होना सिद्ध कर लेंगे, ‘है’ स्वतः ही प्राप्त हो जाएगा । इसीलिए ‘है’ की प्राप्ति को ‘प्राप्त की प्राप्ति’ कहा जाता है ।

           ‘नहीं’ तो दिखलाई दे रहा है और ‘है’ हमारी दृष्टि में आता नहीं है । इसका कारण ‘है’ पर पड़ा ‘नहीं’ का आवरण है । ‘नहीं’ को नहीं होना स्वीकार करते ही ‘है’ प्रकट हो जाता है ।’नहीं’ सदैव सामने होता है उस नहीं में भी ‘है’ उपस्थित है । ‘नहीं’ में ‘है’ को देखना ही सर्वत्र वासुदेव को देखना है ।‘नहीं’ का सत्तावान दिखना भी उस ‘है’ के कारण ही है । 

     कहा जाता है कि -

        ‘है’ सो सुन्दर है सदा, ‘नहीं’ सो सुन्दर नाहीं ।

        ‘नहीं’ को प्रकट देखिए, ‘है’ सो दिखे नाहीं ।।

             वास्तव में ‘नहीं’ कहीं है ही नहीं, सब कुछ एक ‘है’ ही है । आइए ! जानने का प्रयास करते हैं कि ऐसा क्यों है ? कैसे ‘नहीं’ में छिपे ‘है’ को देखा जा सकता है ? 

                 बचपन में श्री सियाराम शरण की लिखी एक कविता पढ़ी थी - “मैं तो वही खिलौना लूँगा, मचल गया दीना का लाल” । इस कविता में दीना नाम की एक ग़रीब महिला होती है । उसके बच्चे के पास मिट्टी का एक खिलौना होता है, जिससे खेलकर वह अपना मन बहला लिया करता है । उसी राज्य के राजकुमार के पास स्वर्ण से बना खिलौना है, जिससे वह खेलता रहता है । एक दिन दोनों बच्चे खेलते हुए एक दूसरे के खिलौने को देख लेते हैं । अपने अपने घर जाकर वे क्या और कैसी ज़िद्द करते हैं, यह कविता हमें आगे उसी ओर ले जाती है ।

          घर लौटकर दीना का बच्चा अपना मिट्टी का खिलौना फैंक देता है और ज़िद्द करता है कि जिस खिलौने से राजकुमार खेल रहा है, मुझे तो वही खिलौना चाहिए । इसी प्रकार राजकुमार भी अपने स्वर्ण खिलौने को फैंक देता है क्योंकि उसे भी वैसा ही मिट्टी का खिलौना चाहिए । दोनों का रोना बंद नहीं होता । राजा की हैसियत के सामने मिट्टी का खिलौना नगण्य है और दीना की क्षमता अपने बच्चे को स्वर्ण खिलौना दिलाने की नहीं है ।

         खिलौना चाहे मिट्टी का हो अथवा सोने का, उससे केवल खेल कर मन बहलाया जाता है । जो एक के पास नहीं है और दूसरे के पास दिखलाई पड़ रहा है, इस संसार में उसे ही प्राप्त करने की होड़ मची है । दीना के बच्चे और राज्य के राजकुमार, दोनों की दौड़ भी उस अप्राप्त को पाने की है जो खेलने के लिए खिलौने के रूप में उन्हें पहले से ही प्राप्त है । हमारा जीवन भी इसी प्रकार चल रहा है । दूसरे के पास जो है, वही अच्छा प्रतीत होता है और उसी को पाने के लिए हम सब दौड़ रहे हैं । अप्राप्त सदैव अप्राप्त ही रहता है और जो पहले से ही प्राप्त है उस ओर हमारी दृष्टि जाती नहीं है ।

             जो मिट्टी और स्वर्ण के मूल में है, जिसके कारण ये दोनों ही खिलौने के रूप में ढले हैं, उस मूल को कोई नहीं देख पा रहा है क्योंकि वह दिखलाई नहीं पड़ रहा । 

           वास्तविकता तो यह है कि जो दिखलाई पड़ रहा है, वह सब व्यर्थ है चाहे वह मिट्टी हो अथवा स्वर्ण । अन्तर केवल इतना सा है कि स्वर्ण तिजोरियों को सुशोभित करता है और मिट्टी गलियों की ख़ाक छानती है । जड़ दोनों ही हैं, एक तिजोरी में बंद जड़ है तो दूसरी राह में पड़ी जड़ है । मनुष्य के मन ने स्वर्ण को मिट्टी से क़ीमती मानते हुए महत्ता दे दी है । दोनों ही मानव जीवन के आध्यात्मिक उत्थान में कोई भूमिका नहीं निभाते । इसीलिए इनको व्यर्थ कहा गया है । जो जीवन के लिए व्यर्थ है, उसका होते हुए भी वास्तव में नहीं होना ही है । मिट्टी और स्वर्ण तो फिर भी स्थूल है परन्तु इस स्थूल से भी सूक्ष्म और सूक्ष्म से भी परे जो कुछ है, उसका अनुभव हुए बिना सत्य तक पहुँचना असंभव है । अतः उसको जानना भी आवश्यक है ।

        इस संसार में जो कुछ भी दिखलाई पड़ता है, उससे भी कहीं बहुत अधिक छुपा हुआ है । दिखलाई पड़ने वाले को ही सत्य समझ लेना सबसे बड़ी मानवीय भूल है । स्थूल, सूक्ष्म और उससे भी परे जो अदृश्य है, इन तीनों का जो अनुभव एक साथ कर लेता है, वह सत् को जान जाता है । स्थूल को तो हम छूकर भी अनुभव कर सकते है, अतः उसके होने पर कोई विवाद नहीं हो सकता । सूक्ष्म को हम भले ही देख नहीं पाते परंतु उसका अनुभव ही उसके होने को प्रमाणित कर देता है । सूक्ष्म का अनुभव इंद्रियों के माध्यम से होता है । इंद्रियाँ भी स्थूल हैं परंतु उनको नियंत्रण में रखने वाला अंतःकरण (मन, बुद्धि, अहंकार) सूक्ष्म है । सूक्ष्म अंतःकरण से भी जो परे है, वह अदृश्य है । साधारण रूप से इसको आत्मा कहा जाता है । उस अदृश्य आत्मा को तो इंद्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता ।

              जीव का जो शरीर हमें हिलता-डुलता, बोलता-सुनता, खाता-पीता, सोचता-विचारता, सोता-जागता दिखलाई पड़ता है, वास्तव में वह इन तीन का मिश्रण है - स्थूल शरीर (बाह्यकरण), मन (अंतःकरण) और आत्मा । यदि इन तीनों में से केवल एक आत्मा को ही निकाल दिया जाए तो शेष बचने वाले स्थूल और सूक्ष्म शरीर अनुपयोगी हो जाते हैं और उसकी समस्त क्रियाएँ बंद हो जाती है । शरीर की क्रियाओं का बंद हो जाना ही उसका मरना है । स्थूल शरीर का जब कोई अंग ख़राब हो जाता है, सड़ जाता है अथवा रोगग्रस्त हो जाता है तो एक शल्य चिकित्सक उस अंग को काटकर शरीर से अलग कर सकता है । उस अंग के अभाव में भी स्थूल शरीर कार्य कर सकता है । इससे स्पष्ट होता है कि स्थूल शरीर को नियन्त्रित किया जा सकता है ।

           सूक्ष्म शरीर (अंतःकरण) को भी नियंत्रित किया जा सकता है । बुद्धि में विवेक पैदा हो जाए तो मन का मिटना (अमन हो जाना) भी संभव हो सकता है । मन के अमन हो जाने से अर्थ है, मन का शरीर (संसार) से अलग हो जाना । 

        स्पष्ट है कि स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है । प्रश्न उठता है कि जो सूक्ष्म से भी परे है, जिसका अनुभव नहीं हो सकता, क्या उस आत्मा पर भी नियंत्रण हो सकता है ? प्रश्न का उत्तर देना इतना सरल नहीं है । स्थूल को पकड़ा जा सकता है, सूक्ष्म को भी पकड़ पाना संभव है परन्तु जिसका अस्तित्व होना भी भौतिक और सूक्ष्म दृष्टि की पकड़ में नहीं आता, उस पर नियंत्रण पाना भला कैसे संभव हो सकता है ? साथ ही उसका होना भी सत्य है क्योंकि उसकी अनुपस्थिति में केवल सूक्ष्म शरीर ही नहीं, स्थूल शरीर भी अस्तित्व विहीन हो जाता है ।

           इसे मनुष्य जीवन की विडम्बना ही कहा जा सकता है कि वह स्थूल और सूक्ष्म से आगे देख ही नहीं पा रहा है । उसके पास वह दृष्टि है ही नहीं, जो इन दोनों के आवरण को भेदकर एक मात्र सत् (आत्मा) तक पहुँच सके । इन दोनों का जो आवरण जीव पर पड़ा है, उसी को माया कहा जाता है । माया का अर्थ ही है - “जो नहीं है” । जो दिखलाई पड़ रही है वह होते हुए भी “नहीं” है क्योंकि उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है ही नहीं । स्थूल और सूक्ष्म शरीर का स्वतंत्र अस्तित्व होता तो आत्मा के अभाव में भी उनका “होना” होता परंतु ऐसा होना संभव ही नहीं है । कहने का अर्थ है कि शरीर का अस्तित्व अर्थात् उसका होना जिसके कारण संभव हुआ है, वह “है” (आत्मा) है । 

                   जिस किसी ने इस माया के आवरण को भेद डाला है वह उस सत् के द्वार तक पहुँच गया है । परन्तु यह माया भी इतनी जल्दी हार मानने वाली कहाँ है ? माया फिर से कोई नया आवरण जीव पर डालकर उसे भ्रमित कर देती है । रह-रहकर वह जीव को विचलित करते हुए स्थूल में फँसाती रहती है । इस माया से साधारण जीव की तो बात ही क्या करें, नारद मुनि भी यहाँ तक कि ब्रह्माजी तक भी फँस चुके हैं । ब्रह्मा और नारद तो परमात्मा के अति निकट हैं, वे तो माया में फँसकर तत्काल ही उससे मुक्त हो जाते हैं परंतु इस मनुष्य जीव को माया का खेल समझ में आ भी जाता है, तो भी उससे मुक्त नहीं होना चाहता, उसी में फँसा रहना चाहता है ।

       देखिए ! माया के इस आवरण को भेद डालने वाले ऐसे ही एक सन्त के साथ माया ने पुनः फाँसने के लिए क्या किया ?

            एक संत को किसी भक्त ने सोने की ईंट भेंट स्वरूप दे दी । केवल एक लँगोटी और कमण्डलु को अपने साथ रखने वाले के लिए चाहे दूसरी कोई भी वस्तु हो, वह बोझ बन ही जाती है और फिर स्वर्ण तो सभी वस्तुओं में सबसे भारी है । संत के हृदय में जहां शिव बसते थे, अब स्वर्ण बस गया । शिष्य के साथ जहां कहीं भी जाते, उस स्वर्ण ईंट को झोले में रख सिर पर उठाए चलते । शिष्य को पता नहीं था कि गुरु के पास सोने की ईंट है । सदैव भयमुक्त रहने वाले संत स्वर्ण पाकर भयग्रस्त रहने लगे । भय का कारण केवल एक ही कि कहीं कोई इस ईंट को चुरा न ले ।

          एक बार गुरु-शिष्य किसी दूरस्थ स्थान की यात्रा पर जा रहे थे । पहले तो शाम होने से पहले गाँव हो या जंगल, कहीं पर भी ठहर जाते और प्रातःकाल फिर आगे की यात्रा पर निकल पड़ते थे । परंतु स्वर्ण ईंट मिलने के बाद संत शिष्य को सूर्यास्त होने से पहले किसी गाँव में पहुँचकर विश्राम करने का कह रहे थे । शिष्य ने कहा कि गुरुजी , गाँव अभी बहुत दूर है, क्यों न हम आज यहीं ठहर जाएँ ? गुरु ने कहा - ‘नहीं ! आज रात तो किसी बस्ती में ही रुकेंगे ।’

      ख़ैर ! तेज चाल से चलते हुए वे सूर्यास्त तक एक गाँव में पहुँच ही गए । संत अपनी पोटली शिष्य को सम्हला कर दैनिक कर्म से निवृत होने लगे । शिष्य ने चुपके से पोटली खोली । पोटली के खुलते ही स्वर्ण ईंट सामने आ गई । शिष्य को गुरु की तेज चाल का रहस्य समझ में आ गया । संत दैनिक क्रियाओं से मुक्त होकर लौटे, शिष्य से पोटली लेकर ईंट को टटोला और सो गए । 

             अगले दिन ब्रह्म मुहूर्त में संत उठकर दैनिक क्रियाओं में लग गए । शिष्य भी उठ गया । उसने देखा कि संत अभी दैनिक क्रिया से निवृत नहीं हुए हैं । शिष्य ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया । उसने चुपके से स्वर्ण ईंट को पोटली में से निकाला और पास के कुएँ में फ़ैंक दिया तथा समान आकार और भार की मिट्टी की एक ईंट उनकी पोटली में रख दी । गुरु ने आते ही पोटली को सम्भाला । उन्होंने टटोलकर ईंट को अनुभव किया और आगे की यात्रा पर निकल पड़े ।

         शिष्य ने बहुत आग्रह किया कि पोटली भारी है, इसे उसे दे दे परंतु संत के लिए तो पोटली में कुछ भी वजन नहीं था । आज तो पोटली उनके प्राण बन गई थी । वह तो उनको फूल से भी हल्की लग रही थी । आसक्ति और ममता इसी तरह से हमारे जीवन में आती है । प्रत्येक ममता सिर पर बोझ होती है परन्तु वस्तु/व्यक्ति में मोह हमें उसके बोझ का अनुभव नहीं होने देता । ज्योंही आसक्ति/ममता हटती है कि मोह दूर हो जाता है । फिर तो संसार का प्रत्येक सम्बन्ध बोझ बन जाता है । सम्बन्ध बनता ही आसक्ति से है । अनासक्त व्यक्ति के लिए सभी जीव समान है, कोई निकट नहीं कोई दूर नहीं । आसक्ति से उत्पन्न मोह के कारण बनने वाली निकटता ही व्यक्तियों में आपसी सम्बन्ध बनाती है ।

              प्रत्येक सम्बन्ध अस्थाई होता है । अस्थाई को स्थाई मान लेना ही हमारा भ्रम है । अस्थाई का होना वास्तव में “नहीं” होना है । जो “नहीं” है, उसको “है” मान लेना ही मोह है । संत ऐसे तो प्रत्येक प्रकार के मोह से मुक्त थे परंतु स्वर्ण ने फिर से उन्हें मोह ग्रस्त कर दिया । शिष्य ने भले ही मिट्टी की ईंट रख दी हो परंतु संत तो उसे अभी भी स्वर्ण की ईंट ही समझ रहे हैं । 

          संत और शिष्य बिना किसी वार्तालाप के तेज चाल से चले जा रहे थे । अन्य दिनों में तो सन्त शिष्य को सारे रास्ते उपदेश देते हुए चलते थे परंतु आज जैसे उनका समस्त ज्ञान स्वर्ण की ईंट के नीचे दब गया था । दिन ढलने को आया, शाम धीरे-धीरे उतर रही थी । सूर्यास्त निकट जानकर संत ने पास के गाँव की दूरी का आकलन किया और तेज़ कदमों से चलने लगे । शिष्य ने कहा कि गाँव बहुत दूर है, सूर्यास्त तक वहाँ पहुँचना असंभव है । उसने संत को जंगल में ही विश्राम करने को कहा । गुरु ने जंगली जानवरों का भय दिखलाते हुए तेज चाल से आगे बढ़ने को कहा । वास्तव में उन्हें भय था स्वर्ण के पास होने का, उसके चोरी हो जाने का । जिसको व्यक्ति बहुमूल्य समझता है, उसके खोने का भय ही सबसे बड़ा भय है । जिसमें मोह अधिक होता है, वही हमारे लिए बहुमूल्य होता है । 

             शिष्य ने शांत भाव से कहा कि अब इस जंगल में शिकारी जानवर रहे ही कहाँ है ? परंतु संत की दृष्टि में ख़ूँख़ार जानवर तो वह काल्पनिक चोर था जो उसकी पोटली में समाए स्वर्ण को चुराना चाहता है । शिष्य ने उनके भय को देखकर आगे कहा कि कोई चोर-लुटेरा आएगा भी तो हमसे क्या छीन लेगा ? हमारे पास तो कुछ बचा ही नहीं । चाहे तो आप अपनी पोटली खोलकर देख सकते हैं, उसमें चुराने को अब कुछ भी नहीं है । 

             संत शिष्य की गूढ़ बात को समझ गए । उन्होंने पोटली खोलकर देखी । तुरंत ही उन्होंने पोटली में से मिट्टी की ईंट को निकालकर फेंकते हुए कहा कि अब कोई चोर आएगा भी तो हमारा क्या बिगाड़ लेगा ? आज तो चलते-चलते बहुत थक गए हैं, अब तो इस रात यहीं इसी जंगल में विश्राम करेंगे ।

            मिट्टी और स्वर्ण में क्या भेद है ? दोनों ही माया है । जिसने स्वर्ण को मिट्टी समझ लिया, वह माया को भी जान चुका है । माया से मोहित वही हो सकता है जो इन दोनों (मिट्टी और स्वर्ण) में भेद करता है । इसी भेद के कारण ही तो संत स्वर्ण के आकर्षण में फँस गए थे । माया के पड़े आवरण से ही जीव ‘नहीं’ को ‘है’ समझ लेता है । माया भ्रम है । भ्रम अर्थात् जो सत्य दिखलाई दे रहा है, वह वास्तव में सत्य नहीं है । माया के इस आवरण को भेदने से ही सत् सामने आ सकता है । माया के आवरण को भेदने से अर्थ है, ‘नहीं’ को जान लेना । ‘नहीं’ को जान लेते ही ‘है’ स्वतः प्रकट हो जाता है । जब तक हम ‘नहीं’ को ही ‘है’ समझते रहेंगे, तब तक भययुक्त नहीं हो सकते । ‘नहीं’ से दूर होते ही समझ में आ जाता है कि ‘नहीं’ कभी ‘है’ था भी नहीं और हम भयमुक्त हो जाते है जैसे संत के साथ स्वर्ण से दूर होते ही हुआ था ।

            आधुनिक विज्ञान के अनुसार प्रत्येक वस्तु की एक अर्द्ध-आयु (Half life) होती है अर्थात् उस वस्तु या धातु के अस्तित्व में आने के पश्चात् उस अवधि तक आते-आते वह आधी समाप्त हो चुकी होती है । शेष बची आधी आयु भी पहले से ही कम समय में समाप्त हो जाती है । इसका अर्थ है कि स्वर्ण, जिसको हम क़ीमती धातु समझकर तिजोरी में बंद करके बैठे है, कुछ समय पश्चात् वह भी अपनी आयु समाप्त कर एक दिन मिट्टी हो जाएगा । हाँ, ऐसा होने में करोड़ों वर्ष लग जाते हैं । जब स्वर्ण को भी एक दिन मिट्टी हो जाना है, तो फिर उसमें और मिट्टी में भेद कहाँ रहा ? 

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि स्वर्ण भी प्रतिदिन अपना अस्तित्व खोते हुए विनाश की ओर जा रहा है । इसलिए स्वर्ण में आसक्ति रखना, उसको अहमियत देना हमारी बहुत बड़ी भूल है । न तो तिजोरी में पड़ा स्वर्ण काम आ रहा है और न ही राह में पड़ी मिट्टी । फिर स्वर्ण में इतनी ममता क्यों ? क्योंकि स्वर्ण सुंदर दिखता है और मिट्टी कुरूप । स्वर्ण के आभूषण बनाकर उस शरीर को सजाया जाता है, जिस शरीर को भी एक दिन नष्ट होना है । दिखने वाली वस्तु सुंदर हो अथवा कुरूप, सभी विनाशशील है । विनाश की ओर जाने वाली प्रत्येक वस्तु को “नहीं” ही कहा जाएगा क्योंकि अभी जिस रूप में वह हमारे समक्ष है उसका वह रूप भी प्रतिपल बदल रहा है । रूप में यह परिवर्तन इतना मद्धम गति से हो रहा है कि हम उस परिवर्तन को पकड़ नहीं पाते और ‘नहीं’ को ही ‘है’ समझ बैठते हैं ।

            हम सब ‘नहीं’ के पीछे ही तो दौड़ रहे हैं । यह नहीं समझ रहे हैं कि जो ‘नहीं’ है, उसको कैसे पकड़ पाएंगे ? ‘नहीं’ को पकड़ने का केवल भ्रम ही होता है । ज्यों ही ‘नहीं’ हमारी पकड़ में आया हुआ लगता है कि तत्क्षण वह हाथ से फिसल जाता है । फिसलने का भी केवल भ्रम ही है क्योंकि जिसका अस्तित्व होगा तभी तो वह हाथ में आकर फिसलेगा । फिर भी हम ‘नहीं’ को पाने के लिए जीवन भर एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाते है । जीवन का संध्याकाल आ जाता है, शरीर की शक्ति चूक जाती है परन्तु हाथ कुछ भी नहीं आता । जो ‘नहीं’ है वह सदैव अप्राप्त ही रहेगा । उस ‘नहीं’ के दिखलाई पड़ने के पीछे जो सत्ता है, वह ‘है’ की है। ‘है’ के होते हुए भी हमारी भौतिक दृष्टि की उससे दूरी बनी रहेगी । आख़िर भौतिक/स्थूल दृष्टि भी तो शरीर की तरह ‘नहीं’ ही है, वह भला ‘है’ को कैसे देख पाएगी ?

          स्थूल दृष्टि की पकड़ से सूक्ष्म वस्तु दिखलाई नहीं पड़ती । दृष्टि को किसी यंत्र के द्वारा सूक्ष्म कर लें तो सूक्ष्म वस्तुएँ तो दिखलाई पड़ जाएगी, फिर भी बहुत कुछ दिखने से छूट भी जाएगा । उस छूट जाने वाले को देखने के लिए दिव्य दृष्टि चाहिए । जब स्थूल और सूक्ष्म को पीछे छोड़कर आगे बढ़ेंगे तभी अनुभव होगा कि हम ‘नहीं’ को पाने के लिए व्यर्थ ही प्रयास कर रहे थे । जो दिव्य दृष्टि की पकड़ में आता है, वही ‘है’ है जोकि नित्य प्राप्त है । उस प्राप्त की प्राप्ति का अनुभव करने के लिए हमें ‘नहीं’ की प्राप्ति का प्रयास छोड़ना होगा ।

            सांसारिक वस्तुएँ जो अप्राप्त हैं, वे सदैव अप्राप्त ही रहेंगी क्योंकि वे दिखलाई पड़ते हुए भी “नहीं” ही है । जो इन सबको देखने वाला है, वह दिखलाई नहीं पड़ रहा है, वही तो “है” है । उसको हम अप्राप्त मान रहे हैं, जबकि वह पहले से ही प्राप्त है ।

              जीवन में पाने के लिए कुछ न कुछ खोना पड़ता है । जिसको खोना है वह भी प्रतिपल हमसे छूट ही रहा है । हमारे जीवन की यह सबसे बड़ी त्रासदी है कि निरंतर छूट रहे को हम पकड़े रखना चाहते हैं । चाहे जितना प्रयास कर लें, निरंतर छूटते जा रहे को हम पकड़ कर रख ही नहीं सकते । जो प्रतिपल परिवर्तित होता जा रहा है, भला वह हमारे पास सदैव के लिए कैसे टिका रह सकता है ? इसलिए जीवन में उसी को पाने का प्रयास करना चाहिए, जो स्थाई है, जो सदैव अपरिवर्तित रहता है । 

            प्रश्न उठता है कि फिर जीवन में किसे पाने का प्रयास करना चाहिए ? केवल एक परमात्मा ही है, जोकि अपरिवर्तनशील, अविनाशी है । जिस दिन उसको पकड़ लेंगे उस दिन प्रतिपल खो रहे को बचाने का प्रयास स्वतः ही छूट जाएगा । यह जगत् विनाशशील है । प्रतिक्षण वह मिटता जा रहा है, परंतु इसका भान हमें हो नहीं पा रहा है । तभी तो हम संसार को प्राप्त करने के लिए हो रही प्रतियोगिता की दौड़ में सम्मिलित हो गए हैं । यह दौड़ एक दूसरे को पीछे छोड़ आगे निकल जाने की दौड़ है । यह दौड़ अनंत है जिसमें आज तक कोई विजयी नहीं हो पाया है । इस दौड़ से जिसने स्वयं को अलग कर लिया उसकी दृष्टि अविनाशी की ओर हो जाती है ।

              पाने-खोने की इस दौड़ में संसार से सम्मुखता या विमुखता मुख्य बात है । संसार के सम्मुख होकर उसे पाने की दौड़ में सम्मिलित होंगे तो सिवाय कुण्ठा के कुछ भी नहीं मिलेगा । कुण्ठा इस बात की कि जो चाहा वह मिला नहीं । अगर चाहा वह किसी कारण से मिल भी गया तो वह आपकी दृष्टि में सदैव अपर्याप्त ही रहेगा । चलो, अपर्याप्त ही सही, कुछ तो मिला लेकिन जो अल्प सा मिला भी, वह टिकता कहाँ है ? ऐसे में भीतर कुंठा जन्म नहीं लेगी तो क्या होगा । हम उसको प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं जो कभी प्राप्त नहीं हो सकता, वह सदैव अप्राप्त ही रहेगा ।

            ध्यान देने योग्य एक ही बात है कि जिसे हम पाना चाहते हैं, वह मृग-मरीचिका है । मृग को प्यास लगी है, दूर कहीं जल दिखलाई पड़ रहा है परंतु जब वहाँ दौड़कर पहुँचता है तो पता चलता है कि जल पहले से ही और आगे खिसक गया है । मृग-मरीचिका में केवल जल होने का भ्रम होता है, जल नहीं होता । इसी प्रकार जीवन में भी संसार से प्राप्त होने का केवल भ्रम ही होता है, कुछ प्राप्त नहीं होता है । संसार अप्राप्त है और सदैव अप्राप्त ही रहेगा क्योंकि वह “है” है ही नहीं । वह तो “नहीं” है ।

         मनुष्य के सामने दो प्रश्न खड़े हैं । पहला - क्या आप अप्राप्त को प्राप्त करना चाहते हैं ? दूसरा - क्या आप पहले से ही प्राप्त को प्राप्त करना चाहते हैं ? प्रायः सभी की ‘हाँ’ प्रथम प्रश्न के उत्तर में होगी । भला कौन प्राप्त को प्राप्त करना चाहेगा क्योंकि वह तो उसे पहले से ही प्राप्त है । वह तो सदैव अप्राप्त को ही प्राप्त करना चाहेगा । वह नहीं जानता कि अप्राप्त तो सदैव ही अप्राप्त ही रहता है जबकि प्राप्त की अप्राप्ति का उसे छद्म अनुभव हो रहा है अर्थात् जिस प्राप्त को वह अप्राप्त मान रहा है, वास्तव में उस प्राप्त की ओर उसकी दृष्टि ही नहीं है । जब तक जो पहले से ही प्राप्त है, उस ओर दृष्टि नहीं होगी तब तक वह अप्राप्त ही लगेगा । इसलिए पहले से ही प्राप्त को वही प्राप्त करना चाहेगा जिसको वह अप्राप्त लग रहा है ।

              हम अपने भीतर कभी झांकते ही नहीं है । आँखें सदैव बाहर की ओर ही देखती है क्योंकि वह भौतिक तत्वों से बनी है । जो भीतर बैठा (अहम्) शरीर की भौतिक आँखों से देख रहा है, वह भी बाहर के पदार्थों को देखकर उसके आकर्षण में फँस जाता है । इस आकर्षण का कारण है, दृश्य में प्रतिपल होने वाला परिवर्तन । हम सिनेमा देखते हैं । सिनेमा की रील में स्थिर चित्र होते हैं । स्थिर चित्र कभी भी व्यक्ति को बाँधते नहीं है । परंतु जब ये चित्र एक-एक कर बड़ी तेज गति से लेंस के सामने से गुजरते हैं तो पर्दे पर चलायमान दिखलाई पड़ते है । इस प्रकार दृश्य में एक प्रकार की छद्म निरंतरता आ जाती है । उस निरंतरता के आकर्षण में ही मनुष्य खो जाता है । सतत हो रहे परिवर्तन में खो कर उसको ही “है” मान लेना हमारा भ्रम है, वास्तव में वह “है” न होकर “नहीं” ही है । सिनेमा सत्य नहीं है वह तो एक स्वप्न की तरह है । 

            जब बाहर से दृष्टि भीतर प्रवेश करती है, तब अनुभव होता है कि बाहर देखना भी व्यर्थ था । संसार की दृष्टि से देखें तो ‘नहीं’ ही ‘है’ रूप में दिख़लाई पड़ता है । यह बाहरी दृष्टि है । जब स्वयं के भीतर झांकेंगे तो अनुभव होगा कि बाहर जो भी ‘है’ रूप में दिखता है, उसे इस रूप में दिखाने की क्षमता जिसकी है, वह तो यहाँ बैठा है । भीतर बैठा ‘है’ अगर नहीं रहे तो फिर बाहर दिखलाई पड़ने वाले ‘है’ की वास्तविकता प्रकट हो जाएगी और स्पष्ट हो जाएगा कि वह ‘है’ न होकर ‘नहीं’ ही था । सत्ता केवल सत् की है और उसी का भाव होता है । असत् की सत्ता सत् के कारण होती है परन्तु बाह्य दृष्टि से वह सत् (है) नज़र नहीं आता, उसको तो असत् (नहीं) ही सत् (है) दिखता है ।

          जिसकी सत्ता नहीं है उसका सदैव अभाव ही रहेगा, इसलिए कभी भी असत् को भाव नहीं देना चाहिए । अगर हमने असत् को भाव दे दिया तो जिस दिन उसका अभाव होगा, हमें बड़ा दुःख होगा । असत् का एक न एक दिन अभाव होना निश्चित है । असत् के अभाव को जानकर भी उसका भाव होना मान लेना ही हमारा भ्रम है । इसी भ्रम में परमात्मा की कृपा से मिला दुर्लभ मनुष्य जीवन भी बह जाता है और संसार-चक्र में घूमते हुए सुखी-दुःखी होना पड़ता है । 

          जिसका सदैव अभाव है, उसको पकड़ना दिवास्वप्न के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । इसलिए ‘नहीं’ को ‘है’ मानने से बाहर निकलें और ज्ञान-दृष्टि से देखें तो अदृश्य ‘है’ भी स्पष्ट रूप से नज़र आ जाएगा । यह ‘है’ उस प्रकार नहीं दिखेगा, जैसा हम चर्म चक्षुओं से कोई वस्तु अथवा व्यक्ति को देखते हैं बल्कि अदृश्य ‘है’ की उपस्थिति का केवल अनुभव होगा ।

कठपुतली का खेल आप सबने देखा होगा । खेल में एक मंच होता है, जिस पर कठपुतलियाँ नाचती है, विभिन्न करतब दिखाती है । मंच के पीछे एक पर्दा लगा होता है । प्रत्येक कठपुतली से तीन-चार बड़े बारीक धागे बंधे होते हैं, जिनका दूसरा छोर पर्दे के पीछे खड़े कलाकार की अंगुलियों में लिपटा रहता है । वही कलाकार अपनी अंगुलियों के इशारों से कठपुतलियों को मंच पर नचाता है । बच्चे उन लकड़ी से बनी पुतलियों को नाचते देखकर आश्चर्य करते हैं । ये कठपुतलियाँ मंच पर नाचती है परंतु पर्दे के पीछे खड़ा कलाकार दर्शकों को दिखलाई नहीं पड़ता । 

       मंच भी उसी कलाकार का है और पर्दा भी उसी का है । कठपुतलियाँ भी उसी की है और वही इनको अंगुलियों के इशारों से नचाता है । कहने का अर्थ है कि सब कुछ एक कलाकार ही है । परंतु दर्शकों को भ्रम होता है कि कठपुतलियाँ नाच रही है क्योंकि नचानेवाला पर्दे के कारण उनको दिखलाई नहीं पड़ रहा है । पर्दा माया है और मंच संसार । परमात्मा ही वह कलाकार है, जो पर्दे के पीछे रहकर संसार के मंच पर जीवों को अपनी अंगुलियों के इशारों पर नचा रहा है । परंतु हम जैसी कठपुतलियों (जीवों) को भ्रम हो गया है कि हम स्वयं नाच रहे हैं । 

        कठपुतलियाँ और मंच तभी तक सत् प्रतीत होते हैं जब तक पीछे लगा पर्दा हट नहीं जाता । पर्दे के हटते ही ‘है’ (सत्) प्रतीत होने वाली कठपुतलियाँ ‘नहीं’ (असत्) हो जाती है । पर्दे के पीछे छिपा कलाकार, जिसको अब तक हम देख नहीं पा रहे थे, पर्दे के हटते ही उसके सत् होने का अनुभव तत्काल हो जाता है ।

             प्रश्न उठता है कि उस ‘है’ का अनुभव कैसे हो सकता है ? ‘है’ दिख़लाई नहीं पड़ता और जो दिखलाई पड़ता है वह ‘है’ न होकर ‘नहीं’ है । ‘नहीं’ में ‘है’ को देख लेना ही ‘है’ का अनुभव होना है । संसार एक विशाल मंच है, जिसमें करोड़ों ब्रह्मांड है । प्रत्येक ब्रह्मांड में उसके अपने सौर मंडल है । प्रत्येक सौर मंडल के केन्द्र में एक सूर्य है । यह सूर्य विभिन्न ग्रहों और उनके उपग्रहों को साथ लेकर अपने ब्रह्मांड के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है । इस प्रकार समस्त सृष्टि का संचालन एक व्यवस्थित प्रकार से हो रहा है । न कभी कोई उपग्रह अपने ग्रह से टकराता है और न ही ग्रह की गति में कभी विचलन होता है । सब अपने-अपने परिभ्रमण पथ पर निश्चित गति से चक्कर लगा रहे हैं ।

            संपूर्ण ब्रह्मांडों को आप कठपुतलियों के खेल का मंच माने । मंच पर जितने भी सूर्य, ग्रह, उपग्रह और उन पर रहने वाले जीव हैं, सब उस खेल को खेल रहे हैं । यह खेल ही एक अभिनय है । जिसको जैसा अभिनय करने का आदेश मिला है, सब उसी के अनुसार अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं । भूमिका निभाना स्वयं के स्तर पर नहीं हो रहा परंतु निर्देशक के स्तर पर निश्चित होता है । वह निर्देशक भले ही दिख नहीं रहा है परंतु वह ‘है’, यह निश्चित है । वह ‘है’ कल्पना मात्र नहीं है । जगत् को गतिमान बनाये रखने में किसी की तो भूमिका होगी, यह निश्चित है । उस निर्देशक की उपस्थिति को ‘मानना’ और स्वीकार करना ही उस ‘है’ के होने की पुष्टि है ।

        संसार उन्हीं के लिए असत् है जिनकी इस संसार के पदार्थों में आसक्ति है । आसक्ति का मूल कारण है, संसार के पदार्थों में सुख खोजना । संसार दुःखालय और अशाश्वत है, इसमें दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । दुःख में आई तनिक सी कमी हमें सुख का अनुभव अवश्य कराती है परन्तु थोड़े समय बाद यह सुख भी दुःख में परिवर्तित होने लगता है । सुख संसार का स्थाई भाव है ही नहीं । संसार स्वयं अशाश्वत है, ऐसे में भला इससे मिलने वाला सुख सदैव के लिए कैसे हो सकता है ? यह परिवर्तनशीलता ही संसार को “नहीं” होने की श्रेणी में ला खड़ा करती है । फिर भी हमें यह “है” रूप में दिखलाई पड़ रहा है क्योंकि हमारी इससे सुख लेने की कामना जो है । 

         “नहीं” से जो सुख प्राप्ति हो रही है उसके पीछे संसार की कोई भूमिका नहीं है क्योंकि संसार की सत्ता है ही नहीं । जिसकी सत्ता होती है वही कुछ दे सकता है, शेष तो देने के माध्यम मात्र हैं । जिस दिन सत्ता ने संसार से हाथ हटा लिया कि संसार को निष्क्रिय हो जाना है । फिर उससे कुछ भी नहीं मिल सकता । इसलिए दिखलाई पड़ने वाले संसार के पीछे सदैव उस सत्तावन को देखेंगे तो संसार के प्रति हमारी आसक्ति नहीं रहेगी । यही “नहीं” में “है” को देखना है ।

             संसार सुंदर तभी तक दिखता है जब तक हमें उससे सुख मिलता है और हमारी प्रत्येक कामना पूरी हो रही है । जिस दिन ऐसा नहीं होगा, यही संसार हमें कुरूप और दुखदाई लगने लगेगा । संसार सुखालय कभी था ही नहीं और न ही कभी हो सकता है । संसार से क्षणिक सुख मिलने का अनुभव होने का कारण केवल दुःख का कुछ समय के लिए कम हो जाना है ।

                शरीर और संसार नाशवान है, इनको एक न एक दिन समाप्त होना है । विनाशशील का होते हुए भी दिखना वास्तव में उसका ‘नहीं’ होना है । जो पहले नहीं था, बाद में भी नहीं होगा, उसका बीच में भी नहीं होना है । यह संसार हमें सुंदर दिख रहा है परंतु जो कभी भी रहता नहीं है उसका सुंदर दिखना भी असत्य है । हमें संसार से शरीर का सुख चाहिए इस कारण से यह सुंदर लगता है । यह सुख भी संसार की तरह नाशवान है अतः इसको भी एक दिन चले जाना है । जो सदैव के लिए हमारे साथ नहीं रह सकता उसे सुंदर कहना हमारा भ्रम है ।

           स्वामीजी कहते हैं कि संसार का सुख लेना व्यभिचार है । स्वयं अविनाशी है, पर सुख लेता है नाशवान से । हम अविनाशी हैं तभी तो हमें सुख के आने-जाने का अनुभव होता है । यदि हम भी संसार और शरीर की तरह नाशवान होते तो इनमें हो रहे परिवर्तन का हमें भान तक नहीं होता । जिसको परिवर्तन का भान होता है, निश्चय ही वह उस नाशवान से भिन्न है अर्थात् अविनाशी है । अविनाशी होकर नाशवान से सुख की आशा रखना अनुचित है ।

          वास्तविक सुख तो वही है, जो सदैव के लिए रहता है । वह सुख तभी उपलब्ध हो सकता है, जब हम स्वयं को नाशवान से अलग कर लें । नाशवान से भिन्न होते ही अनुभव होगा कि जो सुंदर है वह दिखलाई नहीं दे रहा और जो सुंदर दिखलाई पड़ रहा है वह सुंदर नहीं है । 

          सृष्टि के सृजन से पूर्व केवल एक परमात्मा ही थे । परमात्मा अविनाशी हैं । उनके संकल्प से ही सृष्टि बनी है । उस सृष्टि को सत्ता स्वयं परमात्मा ने दी है । सृष्टि परमात्मा से अलग नहीं है बल्कि जिस शक्ति से इसका सृजन हुआ है, वह परमात्मा की शक्ति से ही हुआ है । कहने का अर्थ हुआ कि सृष्टि जिस शक्ति से संचालित होती है, वह परमात्मा से अभिन्न है । सृष्टि में निहित शक्ति नेत्रों की पकड़ में नहीं आती । नेत्र पकड़ते हैं सृष्टि को, पदार्थ को, संसार को, शरीर को । इससे केवल सृष्टि को ही हम सब कुछ समझ बैठे हैं ।

         यह जानना बड़ा ही महत्वपूर्ण है कि शक्ति विहीन सृष्टि भी शरीर को संसार में नहीं ला सकती । शरीर की शक्ति में भी आयु अनुसार सघनता-दुर्बलता आती है । शरीर में जो शक्ति बालपन में थी वह युवावस्था में सघन हो जाती है, वही वृद्धावस्था में घट जाती है और एक दिन शरीर की सारी शक्ति चूक जाती है । यही इस शरीर की वास्तविकता है । जब यह शक्ति शरीर की है ही नहीं, तो फिर शरीर का अभिमान क्या करना । जिसको एक दिन समाप्त हो जाना है, उस शरीर को सजाना-संवारना अर्थहीन है । जिस दिन यह बात हमारी समझ में आ जाएगी, अविनाशी-विनाशी का भेद समझ में आ जाएगा । 

                जो दृश्य जगत् है, वह सारा का सारा विनाश की ओर जा रहा है, वह असत् है और जो अविनाशी है, अदृश्य है, वही सत् है । विनाशशील से प्रेम करना सदैव दुःख ही देता है । इसलिए अविनाशी से प्रेम करें, जोकि हम स्वयं है, हम शरीर नहीं है बल्कि परमात्मा के अंश हैं । प्रेम ही सबसे सुंदर है, जो होते हुए भी मौन है, वह दिखलाई नहीं देता ।

            ‘है’ को प्रकट होने के लिए ‘नहीं’ का सहारा लेना पड़ता है । ‘नहीं’ माया है और ‘है’ वह शक्ति है, जिसने माया को बनाया है अर्थात् ‘नहीं’ तो माया है और ‘है’ मायापति । चूँकि ‘नहीं’ में तीनों गुण है, जिनके कारण इसमें सदैव विभिन्न क्रियाएँ चलती रहती है । इन क्रियाओं के कारण विभिन्न पदार्थ बनते-बिगड़ते रहते है । इस बनने-बिगड़ने में ही मुख्य आकर्षण है, तभी तो मनुष्य सुख-दुःख के चक्कर में कोल्हू का बैल बनकर एक ही घेरे में (संसार-चक्र में) घूमता रहता है । 

             जो पदार्थ स्वयं किसी क्रिया से बना है, वह पदार्थ क्रियाओं के चलते प्रतिपल परिवर्तित भी हो रहा है । जो कुछ क्षण पूर्व कुछ है, वह अगले ही क्षण कुछ और हो जाता है । स्थायित्व के अभाव के कारण ही इसे होते हुए भी ‘नहीं’ कहा गया है । जिसमें स्थायित्व का अभाव है, वह नाश की तरफ़ प्रति क्षण बढ़ता जाता है । अंततः एक दिन इसका पूरा नाश हो जाता है । जो नाशवान है, उसका होते हुए भी यथार्थ में ‘नहीं’ होना ही है ।

            इस ‘नहीं’ के पीछे ‘है’ की सत्ता ही है । जो इस ‘नहीं’ में हो रहे परिवर्तन को देख रहा है, उसको अनुभव कर रहा है, वह ‘है’ है । जिस दिन ‘है’ ‘नहीं’ से अलग हो जाएगा, उस दिन ‘नहीं ’भी नहीं रहेगा, वह ‘है’ में विलीन हो जाएगा । इससे सिद्ध होता है कि ‘नहीं’ की स्वतंत्र सत्ता नहीं है बल्कि उसको सत्ता देने वाला ‘है’ ही है । प्रत्येक ‘नहीं’ में ‘है’ को देखने से ही हमें ‘है’ का अनुभव होगा अन्यथा ‘नहीं’ को ही सत्य मानकर सदैव भ्रमित ही होते रहेंगे ।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘नहीं’ में ‘है’ को देखने के लिए अर्जुन को एक श्लोक कहा है -

          समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

          विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥

                             ॥गीता-13/27॥

         इस श्लोक पर प्रवचन करते हुए स्वामीजी कहते हैं कि भगवान ने इस ब्रह्मांड में कोई दो वस्तु अथवा व्यक्ति एक समान नहीं बनाए हैं । जितने भी प्राणी इस पृथ्वी पर हमारे देखने में आते हैं, वे सब एक-दूसरे की अपेक्षा से विषम हैं । शरीर, मन, बुद्धि, योग्यता आदि की प्राप्ति में किन्हीं दो में तनिक सी भी समानता नहीं है । इनमें विषमता होते हुए भी सबमें एक ही परमात्म-तत्त्व परिपूर्ण रूप से व्याप्त है । प्रत्येक प्राणी जन्म लेता है, बढ़ता है, रहता है, क्षीण होता है और मर जाता है । इसी प्रकार दृश्यमात्र में भी निरन्तर परिवर्तन होता ही रहता है, लेकिन 'है' तत्त्व में कभी कोई परिवर्तन होता ही नहीं है । प्राणी और पदार्थ, सब निरन्तर ही नाश की तरफ जा रहे हैं, लेकिन 'है' तत्त्व सनातन है, इसका आदि-अन्त नहीं है ।

          जो 'है' तत्व है, वह क्रिया-पदार्थ से अतीत है, वहाँ तक क्रिया-पदार्थ पहुँचते ही नहीं, कभी पहुँचे ही नहीं । जिसकी दृष्टि बदलने वाले शरीर-संसार की तरफ ही रहती है, वह ठीक नहीं देखता है, उसका पतन हो जाता है और जिसकी दृष्टि बदलने वाले के आधार, प्रकाशक परमात्मा ('है') की तरफ है, वह ठीक देखता है, उसे परमात्म-तत्त्व का अनुभव हो जाता है ।

           स्वामीजी ‘है’ और ‘नहीं’ को स्पष्ट करते हुए आगे कहते हैं कि 'रहता रूप सही कर राखो, बहता संग न बहीजे।' अपनी प्रियता सदा रहने वाले (है) में ही हो जाय; बहने वाले (नहीं) में हमारी ममता, आसक्ति, महत्त्व-बुद्धि नहीं रहे । स्वत: स्वाभाविक सबकी स्थिति तत्त्व (है) में ही है, उस तत्त्व से विलग कोई हो सकता ही नहीं, लेकिन दृष्टि नाशवान् (नहीं) की तरफ ही रहने से, नाशवान् में महत्त्व-बुद्धि होने से तत्त्व का, आनन्द-रूपता का अनुभव नहीं हो रहा है । सुखदायी परिस्थिति आती है, दुःखदायी परिस्थिति आती है, लेकिन इनके ज्ञान में क्या फर्क पड़ा ? 'है' में स्थित रहते हुए हम नाशवान् में आकृष्ट होकर, नाशवान् के लिए लोलुप होकर बिना बात के ही दुःख पा रहे हैं ।

             शरीर-संसार की प्राप्ति आज तक किसी को हुई ही नहीं । शरीर-संसार किसी को प्राप्त हो सकते ही नहीं और भगवान् सबको नित्य प्राप्त हैं; भगवान् की अप्राप्ति किसी को हो सकती ही नहीं । मान मिल गया, धन मिल गया, सम्पत्ति मिल गई, पद मिल गया— मिलता कुछ है ही नहीं, कोरा मिलने का वहम है । यदि ये चीजें मिल जाती, तो अब तक हमारी तृप्ति हो गई होती, लेकिन हमारा अनुभव है कि जैसे-जैसे भौतिक संसाधन बढ़ते हैं, वैसे-वैसे ही अशान्ति बढ़ती है, असन्तोष बढ़ता है; हम अपने-आपसे और भगवान् से दूर होते जाते हैं । अपने को नहीं बदलने वाले परमात्मा के साथ अनुभव करना ही मुक्ति है और बदलने वाले शरीर-संसार के साथ अनुभव करना ही बन्धन है ।

       स्वामीजी ने बहुत ही कम और स्पष्ट शब्दों में ‘है’ और ‘नहीं’ के अंतर को समझाया है । आसक्ति के कारण ही ‘नहीं’ को हम ‘है’ मान लेते हैं । चमकदार दिखलाई पड़ने वाली प्रत्येक वस्तु सोना नहीं होती । हम संसार की चमक को देखकर भ्रमित हो रहे हैं और उसी को सत् समझ रहे हैं । सत् केवल वही है जो सदा के लिए है । संसार तो प्रतिपल बदल रहा है, ऐसे में उसे सत् क्यों कर कहा जा सकता है । वह तो होते हुए भी ‘नहीं’ ही है । संसार का बदलना जिस कारण से संभव होता है, वह कभी भी नहीं बदलता है और जो कभी भी नहीं बदलता वही सत् है, वही ‘है’ है । 

               नदी बहती है, ऐसा देखने वाला स्वयं स्थिर है । बहने वाले के साथ अर्थात् नदी में बहने वाले को नदी का बहना दिखलाई नहीं देगा । इसी भ्रम के कारण बह रहे संसार के साथ बहने वाले को यह संसार स्थिर और सदैव के लिए रहने वाला दिखाई देता है । संसार से अलग होते ही संसार बहता दिखलाई देने लगेगा । 

       ‘नहीं’ के साथ हो जाने पर ही ‘है’ की विस्मृति हो जाती है और ‘नहीं’ ही ‘है’ प्रतीत होने लगता है । वास्तव में ‘नहीं’ है ही नहीं, जो कुछ है वह ‘है’ ही है । यह ‘है’ अदृश्य है क्योंकि वह ‘नहीं’ के रूप में दृश्यमान हुआ है और हम ‘नहीं’ के पीछे छिपी ‘है’ की सत्ता को नहीं देख पा रहे हैं । यह ‘है’ हमें तभी दिखलाई पड़ेगा जब ‘नहीं’ में हमारी ममता नहीं रहेगी । 

            ‘वासुदेव सर्वम्’ का अर्थ है कि एक ‘है’ के अतिरिक्त कोई दूसरा है ही नहीं । फिर ‘है’ क्यों कर ‘नहीं’ हो जाता है ? परमात्मा ही ‘है’ है । यह ‘है’ निराकार है, जिसके कारण वह दिखलाई नहीं देता । साकार रूप ही दृष्टि की पकड़ में आता है, निराकार नहीं । निराकार अपने आनंद के लिए साकार रूप ग्रहण करता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि निराकार मिट जाता है । मिटना अथवा परिवर्तित होना साकार में ही संभव है, निराकार में नहीं । कहने का अर्थ है कि निराकार परमात्मा ही साकार रूप ग्रहण कर जगत् के रूप में प्रकट हुआ है । इसलिए जगत् में परिवर्तन होना अवश्यंभावी है ।

              अक्रियता निराकार का स्वभाव है और सक्रियता साकार का । निराकार से साकार की यात्रा में अक्रियता सर्वप्रथम सक्रियता में परिवर्तित होती है । इस प्रकार क्रिया से पदार्थ का निर्माण होता है । क्रिया से बने पदार्थ के भीतर भी सदैव क्रिया चलती रहती है । क्रिया ही साकार में हो रहे सतत परिवर्तन का आधार है । जगत् इसी क्रिया के कारण सदैव गतिमान बना रहता है ।

                अक्रियता अविनाशी है जबकि सक्रियता विनाशशील है । इस प्रकार सिद्ध होता है कि विनाशशील के मूल में अविनाशी ही है । जब हम शरीर में हो रही क्रियाओं से स्वयं को मुक्त कर लेते हैं, हमें अपने आप का अविनाशी होना अनुभव में आ जाता है । हम अविनाशी ही हैं परंतु शरीर में हो रही क्रियाओं को अपने द्वारा होना मान लेना ही हमें विनाशशील बना देता है । ऐसा क्यों होता है ?

             अविनाशी के द्वारा अपने आपको विनाशशील समझ लेना ही मनुष्य को संसार के साथ बांध देता है । संसार और शरीर एक ही जाति के हैं अर्थात् दोनों ही पदार्थ से निर्मित है । पदार्थ अपने में हो रही क्रियाओं के कारण सतत परिवर्तित होता रहता है । यह परिवर्तन उसमें उपस्थित त्रिगुणी व्यवस्था के कारण होता है । गुणों के अभाव में क्रियाएँ होना संभव ही नहीं है । निराकार में कोई सक्रिय गुण नहीं है अर्थात् वह निर्गुण होता है । निराकार में गुणों का अभाव नहीं होता बल्कि उसमें गुणों की सक्रियता नहीं रहती अर्थात् वे गुणातीत हैं, गुणों से परे हैं । गुणातीत होने के कारण ही उसमें क्रियाओं का अभाव है । निराकार में गुणों के सक्रिय होते ही उसमें क्रियाएँ होने लगती है और वह साकार रूप ग्रहण कर लेता है ।

          क्रियाओं के कारण पदार्थ विभिन्न रूपों में प्रकट होता है । ये पदार्थ एक दूसरे की तरफ़ आकर्षित होते हैं, इस कारण वे अपने मूल स्वरूप ( निर्गुण निराकार) को लगभग विस्मृत कर बैठते हैं । मनुष्य शरीर भी इसी प्रकार एक दूसरे शरीर व पदार्थों के प्रति आकर्षित हो जाते हैं । विभिन्न क्रियाओं के संपर्क में आने से शरीर को जो सुख-दुःख का अनुभव होता है वह मनुष्य अपने में होना अनुभव करता है । यही अविनाशी का स्वयं को शरीर (विनाशशील) होना मानना है ।

          स्वामीजी कहते हैं कि संसार और शरीर जड़ है । जड़ ही जड़ के प्रति आकर्षित होता है और उससे सुख पाने की कामना करने लगता है । सुख की कामना उसे अपने मूल स्वरूप अविनाशी से दूर कर देती है और मनुष्य स्वयं को शरीर मानते हुए उसका मरना जीना स्वयं का मरना जीना मानने लगता है ।

          निराकार में कोई आकार नहीं है । आकार न होने का अर्थ है, पदार्थ और क्रिया का अभाव । पदार्थ न होने का अर्थ है दृश्यमान न होना । साकार में पदार्थ है और पदार्थ होने के कारण उसमें क्रियाएँ भी है । दृष्टि केवल साकार को ही पकड़ती है निराकार को नहीं । पदार्थ में चल रही क्रियाओं के कारण साकार में परिवर्तन होते रहते हैं अर्थात् उसमें स्थाई भाव नहीं है । जो स्थाई नहीं है वह वास्तव में होते हुए भी ‘नहीं’ ही है। इसीलिए संसार को ‘नहीं’ कहा जाता है । 

         इतने विवेचन से स्पष्ट है कि निराकार ही ‘है’ है जबकि साकार ‘नहीं’ है । हमारा मूल स्वरूप निराकार है और हमें स्वयं का निराकार होना स्वीकार करना होगा तभी हम ‘नहीं’ को ‘है’ कह पाएंगे । वास्तव में ‘नहीं’ है ही नहीं, सब कुछ ‘है’ ही है । इस अवस्था तक पहुँचने के लिए हमें प्राकृतिक गुणों से परे जाना होगा । साकार रूप में रहते हुए गुणों से ऊपर उठ जाना ही गुणातीत होना है । गुणातीत होने पर ही हमें साकार होते हुए भी स्वयं के निराकार होने का अनुभव होगा । यही ‘नहीं’ में ‘है’ को देखना है ।

          ‘है’ का आकार लेना और ‘नहीं’ के रूप में दिखने का उद्देश्य केवल आनंद का अनुभव करना है न कि ‘नहीं’ में आसक्त होकर सुखी-दुःखी होना । ‘है’ का सुखी-दुःखी होना संभव ही नहीं है । शरीर और विषयों के प्रति आसक्त भाव केवल ‘नहीं’ को ही सुखी-दुःखी कर सकता है । ‘है’ के द्वारा ऐसा अनुभव करना मात्र भ्रम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।

       बीज के अंकुरित होने से ही पौधा बनता है और वही पौधा पनपकर एक दिन वृक्ष बनता है । वृक्ष सबको दिखलाई पड़ता है परंतु भूमि में दबा बीज किसी को नहीं । मूल तो बीज ही है । वृक्ष का आधार वही बीज है क्योंकि बीज के अभाव में वृक्ष हो ही नहीं सकता । वृक्ष पर पत्ते आते-जाते रहते हैं, फूल खिलते-मुरझाते रहते हैं परंतु जब तक वृक्ष का मूल सुरक्षित है अर्थात् वृक्ष जब तक मूल से जुड़ा है, तब तक सब कुछ ‘है’ ही है । मूल के अभाव में वृक्ष जिसका ‘है’ होना प्रतीत हो रहा है, वह भी ‘नहीं’ होने में चला जाएगा । जो एक दिन ‘नहीं’ में चला जाएगा वास्तव में वह पहले भी ‘नहीं’ ही था । वृक्ष में उसके मूल बीज को देखेंगे तो वृक्ष भी ‘है’ ही है अन्यथा वह दिखलाई देते हुए भी ‘नहीं’ ही है ।

         साकार संसार और शरीर का मूल बीज सब कुछ निराकार परमात्मा ही है । संसार-शरीर के प्रति आसक्ति रखना और मूल बीज को विस्मृत कर देना ही उनको ‘नहीं’ होने की श्रेणी में ला खड़ा कर देता है । आसक्ति हटते ही वह ‘नहीं’ का भी ‘है’ होना अनुभव में आ जाता है । स्मरण रहे, दृष्टि सदैव उस अदृश्य की ओर रहनी चाहिए जिसके कारण ‘नहीं’ दृश्यमान हुआ है । अदृश्य को अनुभव करने वाली ऐसी दृष्टि ही दिव्य-दृष्टि कहलाती है ।

           दिव्य दृष्टि से सब ओर केवल ‘है’ ही दिखलाई देगा । महाभारत युद्ध के उपरांत जब बर्बरीक के शीश से पूछा गया कि युद्ध में आपने क्या देखा ? उत्तर मिला - ‘केवल कृष्ण और उनका सुदर्शन चक्र । वही युद्ध कर रहे थे, वही मार रहे थे और वही मर रहे थे । युद्धभूमि में केवल श्रीकृष्ण ही थे, कोई अन्य था ही नहीं ।’ कहने का अर्थ है, ‘नहीं’ कहीं नहीं है, सब कुछ ‘है’ ही है । यही गीता का सार है - वासुदेव सर्वम् ।

               ‘है’ दिखाई नहीं पड़ता परंतु उसको अनुभव किया जा सकता है । प्रश्न उठता है - कैसे ? स्वामीजी कहते हैं कि एक तो दृश्यमान संसार है और एक है उस दृश्य को देखने वाला द्रष्टा । जो दृश्य को स्वयं से अलग देखता है, वह दृश्य नहीं हो जाता । दृश्य को दृश्य के रूप में देखने वाला द्रष्टा ही ‘है’ है । संसार को जब तक हम स्वयं से भिन्न नहीं देखेंगे तब तक ‘है’ का अनुभव नहीं होगा ।

          परमात्मा ‘है’ रूप है और संसार ‘नहीं’ रूप है । यदि ‘नहीं’ से ‘है’ को देखने का प्रयास करेंगे तो शुद्ध ‘है’ नहीं दिखेगा । ‘नहीं’ को ‘नहीं’ रूप से देखने पर ही शुद्ध ‘है’ दीखता है । ‘है’ को सीधे देखने के लिए हमें मन-बुद्धि को लगाना पड़ता है, जो स्वयं ‘नहीं’ रूप है । उनसे ‘है’ शुद्ध रूप से न दिख कर ‘नहीं’ के साथ मिला दिखलाई पड़ेगा । आख़िर मन-बुद्धि भी तो ‘नहीं’ ही है । ‘नहीं’ से ‘है’ देखने से ‘नहीं’ भी ‘है’ रूप के साथ मिला हुआ दिखलाई पड़ेगा । इसे ही शुद्ध ‘है’ होना मान लेना भ्रमित ही करेगा । इससे स्पष्ट होता है कि ‘नहीं’ से शुद्ध ‘है’ देखा ही नहीं जा सकता । 

        जब हम ‘नहीं’ को ‘नहीं’ रूप में देखने लगेंगे तब स्वतः ही शुद्ध ‘है’ रूप का अनुभव हो जाएगा । ‘नहीं’ को ‘नहीं’ रूप से देखने पर ‘नहीं’ तो तिरोहित हो जाएगा और शेष केवल ‘है’ रह जाएगा । झाड़ू से कूड़े-करकट को हटाते ही जैसे कूड़े के साथ झाड़ू का भी त्याग हो जाता है वैसे ही ‘नहीं’ को ‘नहीं’ स्वीकार करते ही ‘नहीं’ का भी त्याग हो जाता है और शेष केवल ‘है’ रह जाता है ।

           स्वामीजी कहते हैं कि संसार को अभाव रूप से देखने पर संसार और उसकी वृत्ति, दोनों से ही संबंध विच्छेद हो जाता है और भावरूप शुद्ध परमात्म-तत्व स्वतः शेष रह जाता है ।

       संसार ‘नहीं’ रूप है । संसार में यह भौतिक शरीर भी ‘नहीं’ ही है । शरीर में मन-बुद्धि हैं, वे भी ‘नहीं’ हैं । मन-बुद्धि की अपनी वृत्तियां है जिनके कारण मनुष्य सदैव संशयात्मक स्थिति में बना रहता है । अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश मन की वृत्तियां है । तर्क-वितर्क बुद्धि की वृत्ति है । मन- बुद्धि से ‘है’ को देखने से ‘है’ का अनुभव तो हो जाता है, परंतु यह ‘है’ अशुद्ध होता है क्योंकि मन-बुद्धि की वृत्तियां उसके साथ मिली होती है । इन्हीं वृत्तियों के कारण शुद्ध ‘है’ से हमारी दूरी बनी ही रहती है । जब तक इन वृत्तियों से मुक्त नहीं होंगे तब तक शुद्ध ‘है’ के अनुभव से दूरी बनी रहेगी ।

         साधक अपने जीवन में यही गलती करता है कि वह अपने मन-बुद्धि से ‘है’ को पकड़ने का प्रयास करता है । मन स्वयं चंचल है, वह ‘है’ को भला कैसे पकड़ पाएगा । मन-बुद्धि से जो सूक्ष्म है, वह अहम् है । मन-बुद्धि के स्थान पर अहम् को ‘है’ में लगाएंगे तो मन-बुद्धि की वृत्तियां स्वतः ही हट जाएँगीं । स्वामीजी कहते हैं कि अपने आप में स्थित तत्व (है) का अनुभव अपने आप (अहम्) से ही हो सकता है, इन्द्रियां, मन, बुद्धि (नहीं) आदि से बिलकुल नहीं । अपने आप में स्थित तत्व (है) का अनुभव करने के लिए किसी दूसरे की सहायता लेने की आवश्यकता भी नहीं है । 

        मूल बात है स्वयं को ही भगवान में लगाना है न कि मन को भगवान में लगाने का प्रयास करना । मन-बुद्धि को ‘है’ में लगाने से अर्थ है ‘नहीं’ से ‘है’ का अनुभव करना । इससे ‘है’ के साथ ‘नहीं’ का मिश्रण अंत तक बना रहेगा और ‘नहीं’ से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं हो पाएंगे । जब तक संसार से पूर्ण रूप से मुक्त नहीं होंगे, तब तक परमात्मा के दर्शन नहीं होंगे ।

         ‘है’ और ‘नहीं’ को विभिन्न प्रकार से समझाने के पश्चात् भी यह एक पहेली ही है कि संसार जो दीख रहा है, उस दीखते हुए को ‘है’ न मानकर ‘नहीं’ कैसे मानें ? यदि सामने दीवार दिख रही है, उसको ‘नहीं’ मानते हुए जाकर उससे टकरा जाएं तो क्या हमें चोट नहीं लगेगी ? निश्चित ही चोट लगेगी । इसका अर्थ हुआ कि दीवार ‘नहीं’ न होकर ‘है’ है । दीवार की तरह ही संसार को ‘नहीं’ नहीं मानकर ‘है’ क्यों नहीं मान सकते ?

        यह प्रश्न एक पाठक का है । मैं भी उनकी बात से सहमत हूँ कि दिखलाई देने वाला ही ‘है’ है, वह ‘नहीं’ हो ही नहीं सकता । यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका देखना किस प्रकार का है, आप किस दृष्टि से संसार को देख रहे हैं ? बर्फ में व्याप्त जल को देखोगे, जल के अतिरिक्त किसी को नहीं देखोगे तो वह बर्फ ‘है’ है और यदि बर्फ को चौकोर है या तिकोनी है, पीली है अथवा सफ़ेद है या वह ‘ठण्डी और सुख देने वाली है’ इस दृष्टि से देखेंगे तो बर्फ ‘नहीं’ है क्योंकि वह प्रतिपल पिघलते हुए परिवर्तित हो रही है । न तो वह स्थाई रूप से ठण्डी रहेगी और न ही वह सदैव सुख देगी । इसी प्रकार संसार दीखता है तो भी वह ‘है’ नहीं है क्योंकि वह परिवर्तित हो रहा है । 

         ‘है’ अथवा ‘नहीं’ होना आपकी दृष्टि की गुणवत्ता पर निर्भर करता है । परमात्मा का बनाया संसार तो परमात्मामय ही है, वह ‘है’ ही है । आपने सुखासक्ति के कारण अपना अलग संसार बना लिया जिससे संसार ‘नहीं’ हो गया है । 

           स्वामीजी कहते हैं कि संसार एकरूप कभी रहा नहीं, रहेगा नहीं, रहता नहीं, रह सकता नहीं । ऐसे में फिर वही प्रश्न उठता है कि प्रत्यक्ष दीखते हुए भी क्या संसार को न दीखता हुआ मान लेना चाहिए ? स्वामीजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि प्रत्यक्ष दीखते हुए भी संसार का आदर नहीं करना है । आदर विवेक का करना है । सत्-असत् का जो विवेक है, उसमें सत् अंश का आदर करना है, असत् अंश का आदर नहीं करना है । ऐसा करते-करते असत् की निवृत्ति हो जाएगी और बोध हो जाएगा ।

         हमारे अंतःकरण में जो असत् की सत्ता पड़ी है, उसको दूर करने के लिए ‘संसार है ही नहीं’ ऐसा मानना ही होगा । जैसे दो आदमी हैं । एक आदमी को रस्सी में साँप दिखा तो वह भयभीत हो गया और इस डर से काँपने लगा कि साँप काट खाएगा । दूसरा आदमी धैर्यवान है, इसलिए वह डरा नहीं कि साँप दीख गया तो क्या हुआ, अपने तो उससे बच जाओ । जो आदमी साँप से डर गया उसको दो बातें कहनी पड़ेगी - पहले बात कि यह साँप नहीं है और दूसरी बात कि यह रस्सी है । जो डरा नहीं उसको केवल इतना ही कहना पड़ेगा कि यह रस्सी है ।

       इसी तरह जिस व्यक्ति की संसार में आसक्ति, राग, ईर्ष्या, द्वेष आदि है, उसको कहना पड़ता है कि संसार है ही नहीं बल्कि केवल उसकी प्रतीति है, यह रस्सी में साँप की तरह है, मृगतृष्णा की तरह है, यह स्वप्न की तरह है, यह दर्पण में दीखने वाले दृश्य की तरह है । ऐसा कहने का केवल तात्पर्य व्यक्ति की संसार में आसक्ति मिटाने से है । आसक्ति मिटते ही संसार ‘नहीं’ न दिखकर ‘है’ दीखने लगेगा ।

                   ‘है’ का शुद्ध रूप से अनुभव करने के लिए संसार और शरीर को ‘नहीं’ रूप में देखना ही होगा । सांसारिक गतिविधियों में हम आकंठ डूबे हुए हैं । यही कारण है कि हम संसार का ‘नहीं’ होना स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हैं । ‘नहीं’ सदैव नहीं ही रहेगा क्योंकि जो आदि में भी नहीं था, अंत में भी नहीं रहेगा वह वर्तमान में भी ‘नहीं’ ही है । ‘नहीं’ की ‘है’ रूप में जो प्रतीति हो रही है उसका कारण हमारी आसक्ति और ममता है । सुख प्राप्त करने की कामना ही ‘नहीं’ को ‘है’ मानने का आधार बनती है, जबकि वास्तव में वह 'है' नहीं है । जब हम प्रत्येक कामना से मुक्त हो जाते हैं तब ‘नहीं’ का स्वतः ही नहीं होना अनुभव में आ जाएगा । फिर जो शेष बचेगा वह ‘है’ ही है ।

       ‘नहीं’ का नहीं होना ही ‘है’ का अनुभव है । ‘नहीं’ को नहीं स्वीकार करते ही ‘नहीं’ में भी ‘है’ के दर्शन होंगे क्योंकि सत्ता केवल एक की होती है, दो की नहीं । सत्ता केवल ‘है’ की है । ‘नहीं’ को नहीं मानना ही ‘है’ की सत्ता स्वीकारना है । इसलिए संसार से आसक्ति, ममता और कामना को हटाते ही संसार ‘है’ से भिन्न नहीं रह सकता । जिस संसार को हम ‘नहीं’ कह रहे हैं, वह भी ‘है’ हो जाता है । दृश्य तभी तक दृश्य है जब तक वह स्वयं को द्रष्टा से अलग अनुभव करता है । द्रष्टा की दृष्टि जैसी होगी दृश्य का दर्शन भी उसी अनुरूप होगा । दृश्य के समाप्त होते ही केवल एक द्रष्टा ही रह जाता है और यह द्रष्टा ही ‘है’ है ।

        सार बात यह है कि ‘है’ को ‘नहीं’ से भिन्न मानने में हमारी आसक्ति, ममता और कामना की भूमिका रहती है अन्यथा सब कुछ ‘है’ ही है, ‘है’ के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं है ।

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त मूर्तिना” (9/4) मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् परिपूर्ण है अर्थात् यह जगत् भी ‘है’ है । स्वामीजी कहते हैं कि बर्फ में जल की तरह संसार में सत्ता (‘है’) रूप से एक सम, शान्त, सद्ज्ञन, चिद् घन और आनंदघन परमात्म-तत्व परिपूर्ण है । हम जिस प्रकार से सोचते हैं, उसी अनुसार जगत् को देखते हैं । यदि हम सोचते हैं कि संसार और परमात्मा दो अलग-अलग हैं तो यह मानना चाहिए कि संसार में परमात्मा है और परमात्मा में संसार है ।

            संसार और परमात्मा दो है ही नहीं । संसार को परमात्मा से अलग मानने का कार्य जीव ने किया है । हम मनुष्यों ने ही संसार को परमात्मा से भिन्न मानते हुए उसे सत्ता दी है । देखा जाए तो सत्ता दो हो ही नहीं सकती, सत्ता केवल एक की ही होती है । संसार की जो स्वतंत्र सत्ता दिखलाई पड़ती है, उसके मूल में परमात्मा की ही सत्ता है । 

           ‘नहीं’ का ‘है’ रूप में दिखना मन की कामना के कारण होता है । मन में कामना जन्म ही न ले तो ‘नहीं’ भी कहीं नहीं टिकेगा और सब जगह ‘है’ ही दिखलाई पड़ेगा । ‘नहीं’ के आकर्षण में फंसकर मनुष्य ‘नहीं’ को ही सत्य समझ लेता है । सर्वत्र ‘है’ की अनुभूति करने के लिए मन का कामना रहित होना आवश्यक है ।  

         मनुष्य संसार से सुख चाहता है जिसके कारण उसके भीतर अहंता, कामना और ममता घर कर चुकी है । जब तक मनुष्य अहंता, ममता और कामना से मुक्त नहीं होता तब तक संसार में परमात्मा है और परमात्मा में संसार है । वास्तव में न तो संसार में परमात्मा है और न ही परमात्मा में संसार है, केवल परमात्मा ही परमात्मा है अर्थात् “वासुदेव सर्वम्” । 

सार - संक्षेप 

              सत् के ऊपर असत् का आवरण है । यह आवरण स्वयं सत् का ओढ़ा हुआ है । सत् एक ही है, दो नहीं, आनन्द की प्राप्ति के लिए उसे एक से अनेक होना पड़ा । आनन्द की खोज में निकले सत् ने विभिन्न नाम और रूप धारण किए । उन नाम-रूप के केन्द्र में वह स्वयं बैठ गया । अपने आकर्षक नाम-रूप को देखकर वह भ्रमित हो गया और स्वयं को भूल गया । इस प्रकार दृश्यमान तो नाम-रूप (संसार) ही रहे और मूल तत्व (परमात्मा) अदृश्य हो गया । शरीर की सभी इंद्रियां और मन असत् को ही पाने की कामना करते हैं । इस प्रकार असत् के आकर्षण से मुक्त होना उसके लिए असंभव हो जाता है ।

           ‘है’ ही वह मूल तत्व है, जो दिखलाई नहीं पड़ रहा । कृष्ण-मृग की नाभि में कस्तूरी रहती है । कस्तूरी की गंध के प्रति आसक्त होकर मृग वन में इधर-उधर घास सूंघता डोलता रहता है । वह यह नहीं जानता कि जिसे वह खोज रहा है, वह उसकी नाभि में ही है । हम भी कृष्ण-मृग की तरह ही हैं, जो संसार में परमात्मा को ढूँढते फिर रहे हैं, जबकि वह हमारे केंद्र में पहले से ही मौजूद है । 

       इंद्रियों से जो प्राप्त हो सकता है, वह वास्तव में शरीर की तरह ही नाशवान होता है । जो नाशवान है, उसका होना भी ‘नहीं’ होना है । वह सदैव अप्राप्त ही रहेगा क्योंकि उसकी प्राप्ति सदैव ही अपर्याप्त रहेगी । जो ‘है’ है, वह हमें नित्य प्राप्त है परंतु हमारी दृष्टि उधर जाती ही नहीं है क्योंकि भौतिकता की चकाचौंध ने हमें भ्रमित कर दिया है जिससे वह दिखलाई नहीं दे रहा । भौतिकता की चकाचौंध झूठी है, वह दिखलाई पड़ते हुए भी ‘नहीं’ है और जो सत्य है, शिव है, सुन्दर है, वह ‘है’ हमें दिखलाई नहीं पड़ता । ‘है’ के दिखलाई नहीं पड़ने का अर्थ यह नहीं है कि वह ‘नहीं’ है । ‘नहीं’ दिखलाई देते हुए भी सदैव नहीं ही रहेगा, वह ‘है’ नहीं हो सकता । 

 इसीलिए स्वामीजी बार-बार कहते हैं -

       ‘है’ सो सुन्दर है सदा, ‘नहीं’ सो सुन्दर नाहीं ।

       ‘नहीं’ को प्रगट देखिए, ‘है’ सो दिखे नाहीं ।।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

Monday, March 3, 2025

काम

 काम  

                   अभी हमने पिछले लेख में ‘माया’ पर विस्तार से चर्चा की है । इस लेख में ‘काम’ को माया का अस्त्र बताया गया है । बहुत से पाठकों ने इसी ‘काम’ को और अधिक स्पष्ट करने का आग्रह किया है । ‘काम’ शब्द जहां भी आ जाता है, वहाँ एक प्रकार का आकर्षण हो ही जाता है ।

        ओशो कहते हैं कि विकृत मानसिकता के लोगों ने 'काम' को लेकर भारतीय समाज में जो भ्रम फैलाया है, वह अनुचित है । इसलिए आज आवश्यकता है कि ‘काम’ को सही रूप से जाना जाय । बिना ‘काम’ के संसार गतिमान बना नहीं रह सकता । परमात्मा ने इस संसार को बनाया ही अपने आनन्द के लिए है । उस आनंद की अनुभूति तभी हो सकती है, जब ‘काम’ को वासना के रूप में न लेकर प्रेम के रूप में लिया जाय । ऐसा होने से ‘काम’ मनुष्य को ‘राम’ तक ले जाता है और प्रेम ही उसके लिए आनन्द बन जाता है ।

              माया की रचना परमात्मा ने की है । माया का आकर्षण मनुष्य को अपनी ओर खींचता है ।  मनुष्य के माया की ओर आकर्षित होने में केवल ‘काम’ की ही भूमिका है । अगर 'काम' की दिशा बदल दें तो यही आकर्षण 'राम' के प्रति हो सकता है। कहने का अर्थ है कि बिना ‘काम’ के आकर्षण हो ही नहीं सकता । 

         ‘काम’ शब्द का अर्थ है - कामना, इच्छा अर्थात् इंद्रिय सुख की इच्छा । स्वामीजी कहते हैं कि जैसा मैं चाहूँ, वैसा हो ज़ाय - यही काम है । किसी भी क्रिया, वस्तु और व्यक्ति का अच्छा लगना अथवा उससे कुछ भी सुख चाहना ‘काम’ है । जब भीतर किसी वस्तु अथवा व्यक्ति से इंद्रिय सुख पाने की चाहना होती है, तब कामना का जन्म होता है । उस कामना के कारण ही मनुष्य कर्म करने को विवश होता है । कर्म के फलस्वरूप इंद्रियों के माध्यम से व्यक्ति को सुख का अनुभव होता है ।

            सुख सात प्रकार के बतलाए गए हैं । पहला सुख - निरोगी काया । दूसरा सुख - घर में माया (धन, सम्पति) । तीसरा सुख - घर में कुलवंती नारी । चौथा सुख - पुत्र आज्ञाकारी । पाँचवाँ सुख - स्वदेश में वासा अर्थात् अपने ही देश में निवास करना । छठा सुख - राज में पासा । सातवाँ सुख - संतोषी जीवन ।

           एक से छः तक प्राप्त होने वाले सुख प्राप्ति की कामना प्रत्येक के मन में रहती है परंतु संतोषी जीवन के लिए प्रत्येक प्रकार की कामना का नाश होना आवश्यक है । जब तक भीतर एक भी कामना है, तब तक जीवन में संतोष आ ही नहीं सकता । शांतिपूर्ण जीवन के लिए संतोष धारण करना आवश्यक है । मनुष्य की कामनाएँ कभी पूरी नहीं होती क्योंकि ज्योंही एक कामना पूरी होती है कि दूसरी कामना जन्म ले लेती है । इन्हीं कामनाओं के बियाबान में भटकते हुए जीव चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है फिर भी किसी जन्म में उसको शांति प्राप्त नहीं होती ।

         पौराणिक कथाओं के अनुसार कामदेव भगवान विष्णु और लक्ष्मी के पुत्र हैं । कुछ कथाओं में इन्हें ब्रह्माजी का पुत्र बतलाया गया है और इनका सम्बन्ध भगवान शिव से भी है । कुछ ग्रंथों ने इनका आविर्भाव धर्म की पत्नी श्रद्धा से हुआ माना है । गीता में भगवान कहते हैं कि मैं ‘प्रजनश्चास्मि कन्दर्प:’ हूँ (गीता-10/28) अर्थात् मैं शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ । शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव, कैसे ?

         मुख्य कथा कहती है कि एक समय ब्रह्माजी प्रजा की वृद्धि के लिए ध्यानमग्न थे । उसी समय उनके अंश से तेजस्वी पुत्र ‘काम’ उत्पन्न हुआ । कामदेव ने उत्पन्न होते ही ब्रह्माजी से कहा - ‘पिताजी, मेरे लिए क्या आज्ञा है ?’  ब्रह्माजी बोले कि मैंने सृष्टि के विस्तार के लिए प्रजापतियों को उत्पन्न किया किंतु वे सृष्टि रचना में समर्थ नहीं हुए । अतः मैं तुम्हें इस कार्य की आज्ञा देता हूँ ।

           सुनकर कामदेव वहाँ से विदा होकर अदृश्य हो गए । यह देख ब्रह्माजी बड़े क्रोधित हुए और उन्होंने कामदेव को श्राप दे डाला कि तुम्हारा शीघ्र ही नाश हो जाएगा । शाप सुनकर कामदेव भयभीत हो गए और ब्रह्माजी से क्षमा माँगने लगे । तब ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उन्हें क्षमा कर दिया । उन्होंने सृष्टि को आगे बढ़ाने के लिए कामदेव को बारह स्थान रहने के लिए दिए । ये वे स्थान हैं जहां कामदेव सदैव रहते हैं - स्त्रियों के कटाक्ष, केश, जंघा, वक्ष, नाभि, जंघमूल, अधर, कोयल की कूक, चाँदनी, वर्षाकाल,चैत्र और वैशाख का महीना । साथ ही ब्रह्माजी ने कामदेव को पुष्प-धनुष और पाँच बाण भी दिए । ये पाँच बाण हैं - मारण, स्तम्भन, जृंभन, शोषण और उम्मादन अर्थात् मन्मथ ( मन को मथने वाला ) इसीलिए कामदेव का एक नाम मन्मथनाथ भी है ।

             ब्रह्माजी से मिले वरदान की सहायता से कामदेव तीनों लोकों में भ्रमण करने लगा और भूत, पिशाच, गंधर्व, यक्ष सभी को अपने वश में कर लिया । कामदेव की पत्नी है, रति । रति को प्रेम और आकर्षण की देवी माना जाता है । रति का अर्थ है - रत होने का भाव । किसी कार्य में रत हो जाना, इतना डूब जाना कि आस-पास क्या घटित हो रहा है, उसका भी पता न चलना । रति का दूसरा अर्थ है - प्रेम, आनंद । 

         भगवान दत्तात्रेय ने अपने चौबीस गुरु बताए हैं । इनमें एक गुरु बाण बनाने वाला भी है । बाण बनाने वाले ने अपने आपको कार्य में ऐसा रत कर लिया था कि पास से दल-बल के साथ राजा की सवारी निकली और उसे इसका भान तक नहीं हुआ । मन को एकाग्र कर एक विशेष कार्य में लग जाना ही तन्मय हो जाना है । यह काम-रति है । मन को वश में कर, वैराग्य धारण कर मन को परमात्मा में लगा देना प्रेम-रति है । रति एक ही है, उसको किस प्रकार उपयोग में लेना है, यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है ।

          रति के पिता का नाम था - दक्ष जोकि सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के पुत्र थे । कहा जाता है कि रति का जन्म दक्ष के पसीने की एक बूँद से हुआ था । दक्ष की एक पुत्री सती थी, जोकि भगवान शंकर की पत्नी थी ।  ब्रह्माजी ने ही कामदेव को पत्नी के रूप में रति दी जिससे सृष्टि का विस्तार हो सके । रति इसके लिए कामदेव के लिए एक सहायक की भूमिका में है । यहीं से मैथुनी सृष्टि का आविर्भाव हुआ ।

                मैथुनी सृष्टि के लिए आवश्यक है - परमात्मा की माया । इस माया के गुणों ने ‘काम’ को जन्म दिया । बिना ‘काम’ के सृष्टि का विस्तार असंभव है । इस ‘काम’ के कारण ही स्त्री और पुरुष एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं । ‘काम’ के कारण बने आकर्षण से स्त्री-पुरुष में संयोग होता है, जिसके परिणामस्वरूप सृष्टि विस्तार को एक आधार मिलता है ।

      गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुण से हुई है ।

         काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ।

         महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।। गीता - 3/37।।

अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न यह ‘काम’ अर्थात् कामना ही पाप का कारण है । यह ‘काम’ ही क्रोध में परिणत होता है । यह बहुत अधिक खाने वाला और महापापी है । इस विषय में तू इसको ही वैरी जान ।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘काम’ की उत्पत्ति माया के एक गुण - रजोगुण से हुई है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य माया से मुक्त होकर परमात्म-अवस्था को प्राप्त होना है । माया से मुक्त होने के लिए ‘काम’ पर नियंत्रण कर उसको जीतना आवश्यक है । यह ‘काम’ इतना प्रभावशाली है कि कोई भी व्यक्ति जीते-जी नहीं कह सकता कि उसने ‘काम’ को जीत लिया है । काम को जीतने का अर्थ है, जीवन में काम से निष्प्रभावी बने रहना ।

      रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ आपको संसार के साथ बाँधता है । इसी बंधन के कारण जीव संसार के आवागमन में पड़ा रहता है और मुक्त नहीं हो पाता । इसीलिए ‘काम’ को माया का अस्त्र कहा गया है, जिसका उपयोग करते हुए माया सृष्टि-चक्र को रूकने नहीं देती ।

        माया का सबसे बड़ा अस्त्र यह ‘काम’ ही है, जिसके कारण मनुष्य कंचन और कामिनी के आकर्षण से कभी मुक्त नहीं हो पाता । यह आकर्षण जीव के भीतर पल रहे ‘काम’ के कारण है । आकर्षित होकर जीव माया (काम) से मिलने वाले शारीरिक सुख का भोग करने लगता है । वास्तव में यह सुख प्रकृति के गुणों की क्रियाओं का परिणाम होता है ।

            प्रकृति में हो रही क्रियाएँ मनुष्य को इंद्रियों के माध्यम से सुख-दुःख प्रदान करती है । यथार्थ में इस संसार में सुख-दुःख है ही नहीं । प्रकृति में हो रही क्रियाएँ जीव के समक्ष केवल परिस्थितियों का निर्माण करती है, जैसे वातावरण में तापक्रम का बढ़ना अथवा कम होना । स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से व्यक्ति को वातावरण में हो रहे परिवर्तन से गर्मी अथवा शीत का अनुभव होता है । हम इस परिस्थिति को सहन करने की क्षमता पैदा कर लेते है तो फिर हम वातावरण में हो रहे परिवर्तन से सुखी-दुःखी नहीं होंगे । इसका अर्थ है कि सुख-दुःख का अनुभव करना हमारी मानसिक दशा पर निर्भर है अर्थात् यथार्थ में सुख-दुःख नहीं है बल्कि प्रकृति में होने वाली क्रियाओं से केवल परिस्थितियाँ परिवर्तित होती हैं ।

            काम-रति का युगल सृष्टि को चलाने के लिए आवश्यक है । काम है कामना और रति है आसक्ति । आसक्ति और कामना एक दूसरे के सहयोगी है । जहां आसक्ति है वहाँ कामना जन्म लेगी ही और कामना जहां है वहाँ सुखासक्ति पैदा होगी ही ।

                    सुखासक्ति होने से जीव प्रकृति के गुणों के साथ बंध जाता है । एक बार मिले शारीरिक सुख को बार-बार भोगने की इच्छा होती है । बार-बार भोग भोगने के लिए ‘काम’ की ज्वाला भड़कती जाती है जिससे नई नई कामनाएँ जन्म लेती है । कामनाओं की पूर्ति का एक मात्र साधन यह माया निर्मित शरीर ही है, जिससे कर्म करते हुए व्यक्ति मनोवांछित फल को प्राप्त करने का प्रयास करता है । 

              इस प्रकार स्पष्ट है कि माया का अस्त्र ‘काम’ है । काम के कारण ही जीव संसार में फँसता है । काम इंद्रियों के द्वारा, मन के माध्यम से जीव को भोग उपलब्ध कराता है । शारीरिक सुख-भोग की इच्छा जीव की होती है क्योंकि वह शरीर के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है और यह तादात्म्य बनता भी इसी काम के कारण है । यह काम, जीव और शरीर के संधि-स्थान पर रहता है अर्थात् माया निर्मित शरीर में काम इंद्रियों, मन और बुद्धि से होते हुए अहम् (अहंकार) के माध्यम से जीव को जकड़ता है और उसे शरीर के साथ बांध देता है । संतों ने इस संधि को चिज्जड़-ग्रंथि कहा है अर्थात् चैतन्य जीव और जड़ शरीर का जोड़, जिसके मूल में ‘काम’ ही है । 

               भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं - ‘जहि शत्रुम् महाबाहो कामरूपं दुरासदम्’, (गीता - 3/43) “अर्जुन ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल” । परंतु काम को मार डालना इतना आसान नहीं है । काम एक है और उसके कारण उत्पन्न होने वाली कामनाएँ असंख्य है, जिन्हें वासनाएं भी कहा जाता है । जब तक जीव की समस्त कामनाएँ समाप्त नहीं होगी, तब तक काम नहीं मरने वाला और कामनाएँ कभी समाप्त होने वाली नहीं है । एक के पूरी होने से पहले ही दूसरी कामना जन्म ले लेती है ।

        भगवान श्रीकृष्ण जिस ‘काम’ को नष्ट करने की बात कह रहे हैं वह आसक्ति से पैदा हुई वे असंख्य कामनाएँ है, जिनका पूरा होना संभव ही नहीं है । इंद्रियों का निग्रह करने से सतही (ऊपरी) तौर पर ‘काम’ नष्ट हुआ प्रतीत अवश्य होता है परन्तु किसी भी एक इंद्रिय के माध्यम से कोई एक विषय शरीर में प्रवेश कर सुषुप्त पड़े काम को पुनः पूर्ण रूप से सक्रिय कर सकता है । इसलिए इंद्रियों पर हर समय नियंत्रण रखना बहुत आवश्यक है । 

            ‘काम’ को जीतना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है । जिसने ‘काम’ को जीत लिया वह ईश्वरतुल्य हो जाता है । ‘काम’ शब्द कामदेव से लिया है जिसको परमात्मा ने अपनी एक विभूति भी बताया है । भगवान कहते हैं कि मैं ‘प्रजनश्चास्मि कन्दर्प:’ हूँ (गीता-10/28) अर्थात् मैं शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ ।

        ‘काम’ अदृश्य रूप से शरीर में रहता है इसीलिए उसको जीतना असंभव लगता है । ‘काम’ शब्द कामदेव से लिया गया है । कामदेव तो ‘काम’ के साकार रूप थे, रति उनकी पत्नी थी फिर उनके साथ ऐसा क्या घटित हो गया जो वे अनंग हो गए और ‘काम’ बनकर प्रत्येक जीव के भीतर प्रवेश कर उसे संसार में उलझा रहे हैं । जानने के लिए चलते हैं, त्रेता युग में ।

          त्रेता में भगवान शंकर ने अपनी पत्नी सती का त्याग कर दिया था । परमात्मा के प्रति संदेह और शंकर की बात पर अविश्वास, इस त्याग का कारण था । थोड़े दिनों बाद सती के पिता ने यज्ञ का आयोजन किया । भगवान शिव से वैमनस्य के कारण दक्ष ने सती को भी आमंत्रित नहीं किया । सती परित्याग से दुःखी तो थी ही, बिना बुलाए अपने पिता के घर चली गई । यज्ञ में अपने पति शंकर का भाग/स्थान न देखकर अपने पिता पर बड़ी क्रोधित हुई और स्वयं को अपनी योगाग्नि से जला डाला । शरीर छोड़ते हुए एक ही कामना थी कि अगले जन्म में उसे शंकर ही पति रूप में मिले ।

          सती का हिमाचल के घर पार्वती के रूप में जन्म हुआ । नारद के निर्देशानुसार शंकर को पाने के लिए दीर्घकालीन तप किया । देवताओं ने देखा कि शंकर तो समाधिस्थ है, ऐसे में उनका पार्वती से विवाह कैसे संपन्न होगा ?  विवाह होना इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि शिव-पार्वती के पुत्र (कार्तिकेय) के ही हाथों तारकासुर का वध होना पूर्व निश्चित है ।

       देवताओं की सभा में प्रश्न उठा कि शिव की समाधि भंग कैसे हो ? कौन अपने प्राणों की बाज़ी लगाएगा इस कार्य के लिए ? कामदेव को बड़ी मुश्किल से इस कार्य के लिए राज़ी किया गया । कामदेव जानता था कि इस कार्य के लिए उसे अपने प्राणों को हथेली पर रखकर जाना होगा । कामदेव डरते-डरते कैलाश की ओर चला । उसकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण काममय हो गया । सभी चर-अचर, जीव-निर्जीव में काम बढ़ने के लक्षण स्पष्ट दिखाई देने लगे । कामदेव ने दूर से ही देखा कि शंकर समाधिस्थ हैं और उन पर उत्पन्न किए गए वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है । 

              तभी कामदेव छोटे से जंतु जितना सूक्ष्म रूप लेकर कर्ण के छिद्र से भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर गए । इससे शिवजी का मन चंचल हो गया । उन्होंने विचार कर अपने चित्त में देखा कि कामदेव उनके शरीर में स्थित है । इतने में ही इच्छा शरीर धारण करने वाले कामदेव भगवान शिव के शरीर से बाहर आ गए और आम के एक वृक्ष के नीचे जाकर खड़े हो गए । फिर उन्होंने शिवजी पर मोहन नामक बाण छोड़ा, जो शिवजी के हृदय पर जाकर लगा । इससे क्रोधित हो शिवजी ने अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से कामदेव को भस्म कर दिया ।

              कामदेव को जलता देख उनकी पत्नी रति विलाप करने लगी। तभी आकाशवाणी हुई जिसमें रति को रुदन न करने और भगवान शिव की आराधना करने को कहा गया ।  फिर रति ने श्रद्धापूर्वक भगवान शंकर की स्तुति की । रति की प्रार्थना से प्रसन्न हो शिवजी ने कहा कि कामदेव ने मेरे मन को विचलित किया था इसलिए मैंने इन्हें भस्म कर दिया । अगर ये अनंग रूप में ही महाकाल वन में जाकर शिवलिंग की आराधना करेंगे तो इनका उद्धार होगा ।

               अनंग (कामदेव) महाकाल वन आए और उन्होंने पूर्ण भक्तिभाव से शिवलिंग की उपासना की । उपासना के फलस्वरूप शिवजी ने प्रसन्न होकर कहा कि तुम अनंग अर्थात् शरीर के बिना रहकर भी समर्थ रहोगे । द्वापर में कृष्णावतार के समय तुम रुक्मणि के गर्भ से जन्म लोगे और तुम्हारा नाम प्रद्युम्न होगा ।

            जब शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया तब ये देख रति विलाप करने लगी तब जाकर शिव ने कामदेव के पुनः कृष्ण के पुत्र रूप में धरती पर जन्म लेने की बात बताई । शिव के कहे अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणि को प्रद्युम्न नाम का पुत्र हुआ, जो कि कामदेव का ही अवतार था । इस अवधि में रति शम्बरासुर के यहाँ जाकर रसोईघर में कार्य करने लगी और अपना नाम मायावती रख लिया ।

               कहते हैं कि श्रीकृष्ण से दुश्मनी के चलते राक्षस शम्बरासुर नवजात प्रद्युम्न का जब वे मात्र दस दिन के शिशु थे, अपहरण करके ले गया और उसे समुद्र में फेंक आया । उस शिशु को एक विशाल मछली ने निगल लिया और वो मछली मछुआरों द्वारा पकड़ी जाने के बाद शम्बरासुर के रसोई घर में ही पहुंच गई ।

                    रति, मायावती के नाम से शम्बरासुर के यहाँ रसोईघर में पहले से ही काम कर थी । रसोईघर में आई मछली को उसने ही काटा और उसमें से निकले बच्चे को मां के समान पाला-पोसा । जब वो बच्चा युवा हुआ तो उसे पूर्व जन्म की सारी याद दिलाई गई । इतना ही नहीं, वे सारी कलाएं भी सिखाईं जिससे प्रद्युम्न ने शम्बरासुर का वध किया और फिर मायावती (रति) को ही अपनी पत्नी रूप में द्वारका ले आए ।

         कामदेव के अनंग होने और प्रद्युम्न बनकर रति से उसके मिलन की यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम् स्कन्ध के पचपनवें अध्याय में वर्णित है । अनंग होने के बाद काम-रति प्रत्येक जीव के शरीर धारण करते समय उसके भीतर छिपे रहते हैं । अनुकूल समय आने पर वे कामना और आसक्ति के रूप में सक्रिय होकर जीव को संसार के साथ बांध देते हैं । इस प्रकार जीव ‘काम’ के सांसारिक रूप कामना-आसक्ति से भ्रमित होकर सुख-दुःख में उलझ जाता है । ‘काम’ का दूसरा रूप भी है, जो जीव को वैराग्य की ओर ले जाते हुए प्रेम और आनंद की उपलब्धि भी करा सकता है । ‘काम’ के इस दूसरे रूप को पुरुषार्थ कहा जाता है ।

     ‘काम’ को मनुष्य जीवन का पुरुषार्थ कहा गया है । जीवन के चार पुरुषार्थों में काम तीसरे नंबर का पुरुषार्थ है, शेष तीन पुरुषार्थ हैं - धर्म, अर्थ और मोक्ष । आहार, निद्रा, भय और मैथुन में रत तो सभी प्राणी रहते हैं । मनुष्य केवल पुरुषार्थ के कारण प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है ।

            पुरुषार्थ-एक छोटा सा मात्र चार अक्षरों से मिलकर बना शब्द परन्तु है बड़ा गूढ़ । पुरुषार्थ, एक संस्कृत शब्द है,जो दो शब्दों के योग से बना है - पुरुष+अर्थ = पुरुषार्थ । अतः इस शब्द का तात्पर्य हुआ – पुरुष होने का मंतव्य, पुरुष होने उद्देश्य । अंग्रेजी में इसको कह सकते हैं- Purpose of human being or objects of human pursuit. पुरुष का अर्थ है पुर यानि शरीर में रहने वाला । इस भौतिक शरीर को जो अधिग्रहित करता है वह है, चेतन्य अर्थात आत्मा । मनुष्य मात्र शरीर ही नहीं है ,वह शरीर से अलग भी कुछ है , उसी को हम जीवात्मा कहते है | यह भौतिक शरीर जीवात्मा के कारण ही चेतनता को उपलब्ध होता है । अतः इस छोटे से शब्द पुरुषार्थ का अर्थ हुआ चेतन्य होने का उद्देश्य ।

         इस प्रकार पुरुषार्थ की परिभाषा हुई - “अपने अभीष्ट (Desirable) की प्राप्ति के लिए, अपने कल्याण (Well being) के लिए जो मानसिक (Mental), वाचिक (Verbal) और कायिक (Somatic) चेष्टायें (Efforts) की जाती है, उन्हीं चेष्टाओं को पुरुषार्थ कहते हैं ।”

          स्वामी शरणानन्द जी महाराज कहते हैं कि प्रारब्ध का सदुपयोग करना ही मनुष्य का पुरुषार्थ है । अर्थ और काम का सदुपयोग धर्म के आचरण से ही हो सकता है अन्यथा नहीं । यही कारण है कि धर्म को मनुष्य का प्रथम पुरुषार्थ कहा गया है ।

           मनुष्य जीवन का तीसरा पुरुषार्थ है काम । काम का शाब्दिक अर्थ है ‘इच्छा’ अथवा ‘कामना’ । सामान्य रूप से कामना का मंतव्य होता है - शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करना । पुरुषार्थ के रूप में काम से अभिप्रायः मनुष्य की उन सभी शारीरिक, मानसिक आदि कामनाओं की पूर्ति से है, जो उसके सम्पूर्ण विकास और जीवन के परम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त करने में सहायक है । इच्छा सभी कार्यों की प्रेरक शक्ति (Motivational power) है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रत्येक कार्य के पीछे ‘काम’ का होना एक आवश्यक शर्त है ।

           चार पुरुषार्थों में से अर्थ और काम तो पूर्व मनुष्य जीवन के पुरुषार्थ हैं और धर्म तथा मोक्ष वर्तमान जीवन के । पूर्व मानव जीवन में अधूरी रही कामनाओं और कर्मों से बना प्रारब्ध वर्तमान जीवन में फलीभूत होता है । धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ को मनुष्य केवल अपने वर्तमान जीवन में ही प्राप्त कर सकता है, इसमें प्रारब्ध की कोई भूमिका नहीं है । 

    मोक्ष, जोकि मनुष्य का अंतिम पुरुषार्थ है, उस तक पहुँचने के लिए जीवन में धर्मयुक्त काम और अर्थ के लिए प्रयास किए जाने चाहिए । प्रत्येक प्रयास के लिए मन में कामना का जन्म लेना आवश्यक है । धर्म और अर्थ प्राप्ति के लिए भी मनुष्य के भीतर उनकी प्राप्ति की कामना होना आवश्यक है । इस प्रकार समझ में आता है कि चारों पुरुषार्थ आपस में एक दूसरे से किस प्रकार जुड़े हुए हैं । 

               इतने विवेचन से स्पष्ट है कि  मनुष्य के जीवन में कामनाओं का महत्वपूर्ण स्थान है । अगर मन में कामना ही न उठे तो फिर अर्थ कैसे प्राप्त होगा ? अर्थ, धर्म के एक आवश्यक अंग -‘दान’ के लिए आवश्यक है । अतः जीवन में काम का होना धर्म और अर्थ, दोनों की तरह ही महत्वपूर्ण है । बिना ‘काम’ के हमारा जीवन एक भार ढोने वाले प्राणी से बिलकुल भी भिन्न नहीं होगा । जीवन बोझ तभी बन जाता है, जब कामनाएं पूरी न हो । अतः कामनाओं का जीवन में उठना, उनको पूरा करने का प्रयास करना और फिर सुख प्राप्त करना ही जीवन को गतिमान बनाए रखने के लिए आवश्यक है ।

                  जीवन में कामनाएं होना / रखना किसी भी प्रकार से अनुचित नहीं है परन्तु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि जीवन में कामनाएं कैसी रखनी चाहिये ? सांसारिक सुख क्षणिक सुख से अधिक कुछ भी नहीं है जबकि परमात्मा का सुख अखंड और अनन्त (Infinity) है । हमारे जीवन में कामनाएं प्रायः सांसारिक सुख की होती है । सांसारिक सुख अस्थाई (Temporary) है जोकि अंततः दुःख में परिवर्तित होता है । अतः जीवन में ऐसे काम को महत्त्व (Importance) देना चाहिए जो हमें स्थाई सुख दे सके । स्थाई सुख परमात्मा में ही मिल सकता है, संसार में नहीं । अतः हमारी कामना परमात्मा का प्रेम पाने के लिए होनी चाहिए, संसार से प्रेम पाने की नहीं । परमात्मा से प्रेम करने पर हमें प्रेम ही प्रत्युतर में मिलता है जबकि संसार से प्रेम करने पर अंततः दुःख की प्राप्ति होती है ।

           इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि एक सिक्के की तरह ‘काम’ के भी दो पहलू हैं । ‘काम’ संसार के सुखों की ओर ले जाता है, जिसके कारण मनुष्य ममता और आसक्ति के जाल में उलझकर संसार के बियाबान में भटकता रहता है । यही ‘काम’ अगर प्रेम और आनंद की दिशा पकड़ लेता है तो मनुष्य को परमात्मा तक ले जा सकता है । यह निर्णय तो स्वयं मनुष्य को ही करना है कि वह संसार से सुख चाहता है अथवा परमात्मा का प्रेम । फिर ‘काम’ स्वतः ही अपनी दिशा उसी प्रकार निर्धारित कर लेगा । ‘काम’ वर्जनीय नहीं है, मनुष्य की मानसिकता ही उसे विकृत बना देती है । अतः ‘काम’ को राम की दिशा में लगा देना ही उचित है ।

            भारतीय मनीषियों ने काम को तीन श्रेणियों में रखा है - सात्विक, राजसिक और तामसिक । गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं –

 बलं बलवंता चाहं कामरागविवर्जितम् ।

धर्मविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।। गीता-7/11 ।।

अर्थात् हे भरत श्रेष्ठ ! मैं बलवानों का कामना और आसक्ति रहित बल यानि सामर्थ्य हूँ तथा सभी प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम अर्थात् धर्मयुक्त हूँ ।

                सात्विक काम में कर्म, फल की कामना के बिना अर्थात किसी प्रत्याशा/अपेक्षा (Expectancy) के बिना और स्व-धर्मानुसार (विवेकानुसार) संपन्न किया जाता है । सात्विक काम धर्म सम्मत होता है । राजसिक काम विषय, वासना और इन्द्रिय संयोग से पैदा होने वाला अहंकारयुक्त और फल की इच्छा रखते हुए किया जाने वाला काम है । इस प्रकार के काम को भोगते समय तो सुखकारी प्रतीत होता है किन्तु इसका परिणाम दुखकारी होता है । तामसिक काम में मनुष्य मोह पाश में बंधा हुआ होता है , वह न तो वर्तमान का और न ही भविष्य का कोई विचार करता है । आलस्य(Laziness), निद्रा (Lethargy) और प्रमाद(Negligence) इस काम के जनक कहे गए हैं । इस प्रकार का काम न तो भोगते समय सुख देता है और न ही इसका परिणाम सुखकारी होता है । इन तीनों कामों में सात्विक काम श्रेष्ठ है जो भोगते समय तो विषकारी हो सकता है लेकिन परिणाम सदैव आनंददायी और मुक्तिकारक होता है, अन्य काम तो केवल बंधन ही पैदा करते हैं । यही कारण है कि भारतीय मनीषियों ने स्वीकार किया है कि यौन (Sexual) सम्बन्धी इच्छाओं की तृप्ति (Satiety) जीवन का एक सहज (Effortless), स्वाभाविक (Natural) अथवा मूल प्रवृत्यात्मक अंग (Part) है । इसकी संतुष्टि के लिए हमारी संस्कृति में विवाह (marriage) का विधान है ।

             गीता में इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते हुए काम को तृप्त करने के लिए कहा गया है । प्रश्न उठता है कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए ‘काम’ की तृप्ति कैसे हो सकती है ? प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ईशावास्योपनिषद के प्रथम मंत्र पर दृष्टि डाल लेते हैं । यह मंत्र कहता है -

          ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्या जगत् ।

          तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृध: कस्य स्विद् धनम् ।।

अखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतन स्वरूप जगत् है, यह समस्त ईश्वर से व्याप्त है । उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगते रहो, इसमें आसक्त मत होओ, यहाँ धन (पदार्थ) किसका है ? अर्थात् किसी का नहीं है ।

            मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना है कि वह पदार्थों को भोगते हुए यह बात भूल जाता है कि जीवन में जो कुछ मिला है, वह स्थाई नहीं है । इस संसार में आते समय कुछ भी लेकर नहीं आए थे और न ही कुछ साथ ले जा सकते हैं । इसका अर्थ है कि जो कुछ भी मिला है, यहीं और इसी संसार से मिला है । मिले धन (पदार्थ) को इसी संसार की सेवा में लगा देना ही इसे त्यागपूर्वक भोगना है । त्याग के लिए इंद्रियों पर नियंत्रण पाना होता है तभी हम जगत् को त्यागपूर्वक भोगकर तृप्त हो सकते हैं । जगत् के पदार्थों में आसक्त रहते संसार के चक्र से बाहर निकलना असंभव है ।

       गीता के दूसरे अध्याय के 62 और 63 वें श्लोक में कहा गया है कि विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की इन विषयों के साथ आसक्ति (Attachment) हो जाती है, आसक्ति से काम पैदा होता है और काम की तृप्ति न होने से क्रोध (Anger) पैदा होता है । क्रोध से मोह (fascination) पैदा होता है, मोह से स्मृति-भ्रम (Delusion) और अविवेक (Indiscriminate) पैदा होता है । अविवेक से बुद्धि (Intelligence) का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य का नष्ट हो जाना निश्चित है अर्थात मनुष्य पुरुषार्थ के योग्य नहीं रह जाता है ।

             मनुष्य के जीवन में कामनाओं का कभी भी अंत नहीं होता क्योंकि संसार के सभी प्राणियों का अस्तित्व ही कामनाओं पर टिका हुआ है । मनुष्य की सांसारिक सुख प्राप्त करते रहने की कामनाएं जीवन भर पूरा नहीं हो सकती इसीलिए उसे विभिन्न प्राणियों के रूप में जन्म लेना पड़ता है । इससे सिद्ध होता है कि कामनाएं ही इस संसार के सतत (Continuous) गतिमान रहने का आधार है ।

                  कामनाएं चाहे परमात्मा को पाने की हो अथवा सांसारिक सुख की, दोनों ही प्रकार की कामनाओं का छूट जाना आवश्यक है । परमात्मा को पाने की कामना आध्यात्मिक कामना है जिसे धर्म के मार्ग पर चलते हुए सात्विक कर्म करके पाया जा सकता है और अंत में इस कामना का भी त्याग करना होता है । सांसारिक कामनाओं को पूरा करने के लिए सात्विक कर्म करें अर्थात धर्माचरण करते हुए शास्त्रोक्त कर्म करें । धर्माचरण करना और शास्त्रोक्त कर्म करना, दोनों एक ही बात है । 

               धर्म कहता है कि प्रत्येक परिस्थिति में व्यक्ति को अहिंसा, सत्य,अस्तेय(चोरी न करना),अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । ये पांचो समाज और संसार के हित के लिए पालनीय धर्म है । ब्रह्मचर्य के दो अर्थ हैं – चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना और सभी इन्द्रिय जनित सुखों में संयम बरतना । साथ ही साथ शौच अर्थात बाहर भीतर की शुद्धि, संतोष, तप अर्थात स्वयं से अनुशासित रहना, स्वाध्याय अर्थात आत्मचिंतन करना और ईश्वर प्रणिधान अर्थात ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण के भाव का पालन करना चाहिए । यह सभी निजी धर्म है । अगर हम सांसारिक सुख के लिए धर्म का त्याग करते हैं तो हम अपने जीवन में आध्यात्मिक कभी हो ही नहीं सकते ।

                  हमारे जीवन में सांसारिक कामनाओं का अंत कभी भी नहीं आता है । इस बात को स्पष्ट करने के लिए एक दृष्टान्त देना चाहूँगा । एक व्यक्ति मोक्ष की कामना के साथ घने जंगल में तप कर रहा था । उस व्यक्ति की कुटिया के पास ही एक मीठे जल का तालाब था । गाँव की महिलाएं तालाब से जल लेने आया करती थी । एक दिन एक सुन्दर बाला ने विचार किया कि तपस्वी को कुटिया में तालाब से जल ले जाने में असुविधा होती होगी, क्यों न इनकी कुटिया में प्रतिदिन मैं ही जल भर कर रख दिया करूँ ? अगले दिन से नियमित रूप से वह ऐसा करने लगी । एक दिन तपस्वी जब अपनी साधना से उठा ही था कि उसकी दृष्टि उस कन्या पर पड़ गयी । उसकी सुन्दरता देख कर वह मंत्रमुग्ध हो गया। वह उस कन्या पर मोहित हो गया । उसके मन में कन्या से विवाह करने की कामना जगी परन्तु एक तपस्वी की गरिमा को ध्यान में रखते हुए उसने यह बात अपने भीतर ही रखी । प्रतिदिन कन्या आती, उसकी कुटिया में जल भरकर रख देती । तपस्वी उसको निहारता रहता परन्तु उससे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सका ।

            एक बार उस कन्या को लम्बी अवधि के लिए गाँव से दूर किसी नगर में जाना पड़ा जिससे उसका वन में आना न हो सका ।  इस प्रकार तपस्वी की कुटिया में जल भरकर रखने का क्रम भी टूट गया । तपस्वी को जल भरने की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी उस कन्या को लेकर थी कि आखिर उसके मन को चुराकर वह कहाँ चली गयी ? उस कन्या को देखे बिना तो तपस्वी का हाल बेहाल हो गया । वह तप छोड़कर रात-दिन केवल उस कन्या का ही चिंतन करने लगा । एक दिन उसने गाँव की किसी अन्य महिला से उस कन्या के बारे में पूछा । महिला ने बताया कि वह तो यहाँ से बहुत दूर किसी नगर में चली गयी है और निकट भविष्य में उसका लौटना संभव नहीं है । थक हारकर आखिर तपस्वी ने उस कन्या की राह देखना छोड़ दिया और पुनः तप में लग गया ।

            तपस्वी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर अंततः एक दिन परमात्मा प्रकट हो ही गए ।  प्रकट होते ही उन्होंने तपस्वी से वर मांगने को कहा । परमात्मा ने तपस्वी से पूछा -‘कहो वत्स, तुम्हे मोक्ष चाहिए अथवा मेरी भक्ति । क्या कामना है तुम्हारी ? तुम्हारे अति कठोर तप से प्रसन्न होकर मैं आज तुम्हारी सब इच्छाएं पूरी कर दूंगा ।’ तपस्वी हाथ जोड़कर परमात्मा के समक्ष खड़ा हो गया और क्षुब्ध होकर कहने लगा -‘न तो मुझे आपकी भक्ति चाहिए और न ही मोक्ष । अगर आपको कुछ देना ही है, तो गाँव की उस सुन्दर कन्या को तत्काल यहाँ बुलाकर उसका विवाह मेरे साथ करा दीजिये ।’ 

           तपस्वी की यह बात सुनकर परमात्मा ने उसकी यह कामना पूरी की अथवा नहीं, अपने को इससे कुछ भी लेना देना नहीं है । हमें तो इस दृष्टान्त से एक ही बात ग्रहण करनी चाहिए कि मनुष्य की सांसारिक कामनाओं का कहीं भी कोई अंत नहीं है । अतः हमें सांसारिक कामनाओं में उलझना नहीं है क्योंकि वे अनन्त है और एक के पूरी होते ही दूसरी कामना का मन में जन्म हो जाता है ।

               हमें जीवन में अर्थ और काम, दोनों की ही उपलब्धि पूर्व मानव जीवन के कर्मों और अधूरी रही कामनाओं के कारण बने प्रारब्ध के अनुसार होती है । इसी प्रकार वर्तमान जीवन में मन में पैदा हुए काम के अनुसार भावी जीवन में अर्थ और काम की प्राप्ति होगी । अतः इस जीवन में हमारे लिए ‘काम’ का एक ही उद्देश्य होना चाहिए- अंतिम पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ को प्राप्त करने का ।

               इसलिए ‘काम’ को नई दृष्टि दीजिए, इसको केवल भोग के रूप में न लें, यह योग भी कराने में सक्षम है । गोस्वामीजी अपने कालजयी ग्रंथ श्रीरामचरितमानस का समापन करते हुए कहते हैं -

 कामिहि नारी पिआरि जिमि, लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।

   तिमि रघुनाथ निरंतर, प्रिय लागहु मोहि राम ।।

      जैसे ‘काम’ में अन्धे को स्त्री प्रिय लगती है, लोभी को धन प्रिय लगता है, वैसे ही हे रघुनाथ ! हे राम !! आप मुझे सदैव प्रिय लगिए ।

          तुलसी के जीवन को देखेंगे तो पाएंगे की ‘काम’ की दिशा को कैसे बदला जा सकता है ।

        संसार में अनेकों संत ऐसे हुए हैं, जो जीवन की युवावस्था में ‘काम’ के कारण स्त्री के प्रति बुरी तरह से आसक्त थे । कोई अपनी प्रेयसी का मुख मण्डल देखते हुए उल्टे पांव चला करता था । उन्होंने जब भगवान का सौंदर्य देखा तो प्रेयसी का सौंदर्य भूल गए और संतत्त्व को उपलब्ध हो गए । एक अन्य तो जल लेकर अपने घर लौट रही नवयौवना के रूप पर आसक्त होकर उसके द्वार तक पहुँच गए थे । तत्क्षण ही उनके भीतर के ‘काम’ ने दिशा बदली और वे महान संत की श्रेणी में जा बैठे । तुलसीदासजी महाराज तो अपनी नवविवाहिता रत्नावली को एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं होने देते थे ।वही रत्नावली एक दिन उनकी आध्यात्मिक गुरु भी बन गई । कैसे ? आइए ! जानते हैं ।

                  एक बार रत्नावली किसी कार्य वश अपने पीहर चली गयी । प्रथम दिन तो कैसे ही गुजर गया परन्तु गोस्वामीजी से रात गुज़ारना भारी हो गया । अर्धरात्रि को उठकर वे अपने ससुराल के लिए चल पड़े । रात को नदी पार करने के लिए कोई नाव उपलब्ध नहीं थी । उन्होंने नदी में बहते शव को नदी में तैरता लकड़ी का तख्ता समझा और उस पर बैठकर नदी पार कर गए । ससुराल का घर भीतर से बंद था । दीवार के सहारे लटक रही एक रस्सी को पकड़ कर अंदर प्रवेश कर गए । जिसको उन्होंने रस्सी समझा था, वास्तव में वह दीवार के सहारे लटक रहा साँप था । सच है, ‘काम’ आदमी को अंधा बना देता है । वह न तो शव को देख पाता है और न ही साँप को ।

         तुलसीदास जी घर के भीतर पहुँचकर सीढ़ियों से होते हुए पत्नी के कमरे में जा पहुँचे और उसे जगाया । पत्नी अचानक अर्धरात्रि में आए पति को देखकर हतप्रभ रह गई । उसको सारा माजरा समझ में आ गया । वह तुलसीदास जी से बड़ी नाराज़ हुई । यह क्या ? एक दिन के लिए भी इस शरीर से दूर नहीं रह सकते । गोस्वामीजी ने बहुत अनुनय-विनय की और अपने प्रेम का वास्ता दिया परंतु पत्नी तो उनके इस व्यवहार से बड़ी क्षुब्ध थी । वह दुःखी होकर रोने लगी । 

        रत्नावली ने रोते-रोते गोस्वामीजी को कहा -

       अस्थि चर्म मय देह मम, तामे ऐसी प्रीति ।

       होती जो श्रीराम सौं, ना होती भवभीति ।।

           यह शरीर तो हड्डी, चमड़ी से बना एक ढाँचा है, जिसको एक दिन मिट जाना है । नाशवान शरीर में इतनी प्रीति क्यों ? इतना प्रेम अगर परमात्मा से करते तो जन्म-मरण का भय मिट जाता ।

          सच कहा रत्नावली ने । नाशवान शरीर को एक न एक दिन नष्ट होना ही है, फिर उसमें अनुराग क्यों रखना । प्रेम करना है तो परमात्मा से करें, जो संसार के सभी भयों का नाश करने वाला है । गोस्वामीजी को पत्नी की बात लग गई । ‘काम’ की दिशा संसार की ओर से बदलकर ‘राम’ की ओर हो गई । तत्काल ही ससुराल छोड़कर निकल पड़े, अपने निवास की ओर नहीं बल्कि ‘राम’ की ओर । गुरु भी मिल गए, ज्ञान भी हो गया और ‘राम’ के द्वार तक पहुँच भी गए । श्रीरामचरितमानस जैसी कालजयी रचना इस बात का जीता-जागता प्रमाण है ।

         प्रकृति (माया) के कारण ही सृष्टि का निर्माण और संचालन होता है । प्रकृति ऊर्जा का व्यक्त रूप है । गुणों से ही यह ऊर्जा संसार में अभिव्यक्त होती है। सृष्टि के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका प्रकृति के गुणों की रहती है । इन गुणों से प्रकृति में विभिन्न क्रियाएँ होती है और पदार्थों का निर्माण, उनमें परिवर्तन और उनका नाश होता रहता है । जिस गुण की प्रधानता होती है, उसी के अनुसार पदार्थ का व्यवहार होता है । मनुष्य का शरीर भी एक पदार्थ है । प्रकृति के तीन गुण - सत्व, रज और तम । शरीर भी गुण प्रधानता के अनुसार व्यवहार करता है ।

           पदार्थ की ऊर्जा इन तीन गुणों में ही समाहित है । इन गुणों के कारण ही क्रियाएँ होती है । वे क्रियाएं ही मनुष्य को आकर्षित कर उसके भीतर ‘काम’ को जन्म देती है । रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ मनुष्य में कामनाएँ पैदा करता है । उन कामनाओं के वशीभूत होकर व्यक्ति कर्म करता है । कर्म उसके सामने अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति बनाता है जिससे व्यक्ति को सुख-दुःख का अनुभव होता है । यही ‘काम’ सत्वगुण से उत्पन्न हो तो व्यक्ति सुख-दुःख से ऊपर उठ जाता है । इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रकृति के गुणों की तरह ‘काम’ भी ऊर्जा का एक रूप है ।

         स्पष्ट है कि ‘काम’ वह ऊर्जा है, जो जन्म के साथ हमें मिली है । इस ऊर्जा को हम संसार के सुख खोजने में लगाकर व्यर्थ कर देते हैं । यह अधोगामी ‘काम’ है । धर्मयुक्त  ‘काम’ उर्ध्वगामी होता है, जो हमें परमात्मा तक ले जा सकता है । ‘काम’ संसार प्रवाह के लिए अपरा प्रकृति का केंद्रीय तत्व है । भौतिक शरीर में जब तक ‘काम’ का वास है तब तक आवागमन का चक्र निर्बाध गति से चलता रहेगा ।

            लेख का समापन करने से पहले जानते हैं कि ‘काम’ मनुष्य को किस सीमा तक प्रभावित कर सकता है ? ‘काम’ से उत्पन्न हुए इस संसार ने ‘काम’ का उपयोग करते हुए मनुष्य को कामना के भँवर-जाल में उलझाकर रख दिया है । संसार में उलझकर ‘काम’ की परिधि पर चक्कर लगाता हुआ सृष्टि का सर्वोत्तम जीव, मनुष्य इससे मुक्त नहीं हो पा रहा है । उसके मुक्त न हो पाने का कारण ‘काम’ की दिशा को बदल नहीं पाना है ।

          ‘काम’ की दो दिशाएँ है । एक दिशा संसार की ओर है और दूसरी दिशा परमात्मा की ओर । जिस दिशा में ‘काम’ अपना प्रभाव डालता है, उस दिशा के प्रति मनुष्य का अनुराग बढ़ जाता है । संसार की दिशा पकड़ने पर ‘काम’ का असंख्य कामनाओं के रूप में विस्तार हो जाता है । इसके ठीक विपरीत दिशा में ‘काम’ की दृष्टि हो तो वह मिटकर प्रेम में परिवर्तित हो जाता है । इसी को गीता में भगवान ने ‘काम’ को मार डालना कहा है ।

        ‘काम’ के उप-उत्पाद है - क्रोध, लोभ और मोह । ‘काम’ में डूबा व्यक्ति अंधा हो जाता है फिर उसे अपनी कामनाओं की पूर्ति में अनुचित-उचित का ज्ञान नहीं रहता । ‘काम’ विफल हो जाए तो क्रोध पैदा होता है । क्रोध में व्यक्ति बहरा हो जाता है । ऐसी स्थिति में वह किसी के द्वारा कही गई बात को सुन नहीं पाता है । ‘काम’ सिद्ध हो जाए तो लोभ पैदा होता है । लोभ व्यक्ति को गूँगा बना देता है । लोभ से घिरा व्यक्ति अनुचित तरीक़े से लाभ होता देखकर भी चुप्पी साधे रहता है । ‘काम’ मोह का जनक है । मोह में व्यक्ति पंगु बन जाता है । घर में मोह रखने वाला व्यक्ति घर से बाहर नहीं निकलता । इसी प्रकार पुत्र-पोत्र के मोह में पड़ा व्यक्ति चाहकर भी उनसे दूर नहीं हो सकता ।

सार - संक्षेप 

     ‘काम’ शरीर के भीतर छिपी वह शक्ति है, जिसका सदुपयोग कर हम परमात्मा तक पहुँच सकते हैं । ‘काम’ से उत्पन्न हुए इस शरीर को सांसारिक ‘काम’ में ही डूबा दिया तो फिर बेड़ा गर्क होना अवश्यंभावी है । ‘काम’ हमारे अहम् में रहता है । इसकी अधोमुखी गति ही कामनाओं को जन्म देती है जिनको पूरा करने के लिए मनुष्य दिन-रात कोल्हू के बैल की भाँति अपने संसार के एक ही घेरे में सतत घूमता रहता है । ‘काम’ के कारण ही हमारे अहम् में कामनाएँ जन्म लेती है और दोष हम मन को देते हैं ।

          ‘काम’ की ऊर्ध्व गति व्यक्ति को संसार से मुक्त करती है जिसके कारण परमात्मा के प्रति प्रेम बढ़ता है । ‘काम’ को ऊर्ध्व गति देने में अहम् की ही भूमिका रहती है  । आसक्त व्यक्ति ‘काम’ पर नियंत्रण नहीं कर सकता । प्रत्येक प्रकार की आसक्ति का त्याग ही हमें कामनाओं से मुक्त करता है । कामनाओं से मुक्त होना ही ‘काम’ को मार डालना है ।

      ‘काम’ से ‘राम’ तक की यात्रा मनुष्य के विवेक पर निर्भर है । विवेक का सदुपयोग करने पर अनुभव होता है कि संसार सदैव अप्राप्त ही रहेगा क्योंकि इसमें स्थायित्व का अभाव है । परिवर्तन की निरन्तरता के कारण उसको पकड़ पाना असंभव है । यह समझ में आते ही ‘काम’ की दिशा ‘राम’ की ओर हो जाती है जिससे यह मनुष्य की समस्त कामनाओं का नाश हो जाता है । कामनाएँ तो संसार के लिए ही हैं, परमात्मा के लिए तो भीतर प्रेम होना चाहिए और यह प्रेम ‘काम’ से उत्पन्न वासनाओं के अंत से ही प्रस्फुटित होता है ।

        आइए !  ‘काम’ के कारण भीतर उत्पन्न हुई समस्त कामनाओं से मुक्त होकर हम ‘राम’ की ओर चलें, जोकि अनंत प्रेम और आनंद के धनी हैं ।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।