Sunday, July 31, 2022

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे

 धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे 

         मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्तम कृति है | परमात्मा ने मनुष्य को दो प्रकार की दृष्टि दी है - बाह्य दृष्टि और आन्तरिक दृष्टि | बाह्य दृष्टि से वह संसार को देखता है और आन्तरिक दृष्टि से स्वयं का अवलोकन करता है | प्रायः मनुष्य बाह्य दृष्टि का ही सर्वाधिक उपयोग करते हैं | कोई कोई बिरला मनुष्य ही आन्तरिक दृष्टि का उपयोग कर पाता है | इन दोनों दृष्टियों से अलग एक तीसरी दृष्टि भी होती है – दिव्य दृष्टि | दिव्य दृष्टि किसी संत महात्मा की अनुकम्पा से ही प्राप्त होती है | इस दृष्टि को पाकर मनुष्य ब्रह्मांड में सब कुछ देख सकता है | कोई भी वस्तु, किसी प्रकार के शब्द उससे अपरिचित नहीं रह सकते | वह किसी दूरस्थ स्थान पर हो रही घटनाओं को भी देख और सुन सकता है |

            हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र के एक मंत्री थे – संजय | संजय महर्षि वेदव्यासजी के शिष्य थे | वैसे संजय विद्वान गावाल्गण नामक सूत के पुत्र थे और जाति से बुनकर | धृतराष्ट्र के मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण स्थान रखने के कारण एक बार राजा ने महाभारत युद्ध से ठीक पहले पांडवों के पास उन्हें वार्तालाप के लिए भी भेजा था | एक-एक कर युद्ध को रोकने के जब सभी प्रयास विफल होते गए और युद्ध होना अवश्यम्भावी हो गया था, तभी एक दिन महर्षि वेदव्यास का हस्तिनापुर आगमन हुआ | राजा धृतराष्ट्र को उन्होंने बहुत प्रकार से समझाया कि युद्ध होना किसी के भी हित में नहीं है | परन्तु राजा ने उनके समक्ष दुर्योधन को युद्ध से रोक पाने में अपनी विवशता प्रकट कर दी |

           पुत्र मोह में अंधे राजा को युद्ध का परिणाम जानने की बहुत उत्सुकता थी | दुर्योधन के क्रियाकलापों को देखते हुए वे जानते थे कि युद्ध का परिणाम क्या होगा ? परन्तु हृदय के किसी कोने में एक आशा की किरण भी होती है, जो व्यक्ति को जीवन भर आशान्वित बनाये रखती है कि परिणाम उसके मनोनुकूल ही होगा | महर्षि वेदव्यासजी उन्हें राजमहल में बैठे-बैठे ही युद्ध देखने के लिए दिव्यदृष्टि प्रदान करना चाहते थे परन्तु धृतराष्ट्र ने यह कहकर मना कर दिया कि जीवन भर वे अंधे ही बने रहे तो अब ज्योति मिल भी जाए तो क्या लाभ ? क्योंकि युद्ध की विभीषिका को देखने में वे अपने आपको असमर्थ समझ रहे थे | धृतराष्ट्र की युद्ध के प्रति उत्सुकता को देखते हुए अंततः व्यासजी महाराज ने अपने शिष्य संजय को वह दिव्यदृष्टि दे दी, जिससे वह राजा धृतराष्ट्र को युद्ध का सत्य और तत्काल विवरण दे सके |

       दिव्यदृष्टि से दूर बैठकर भी युद्धभूमि का हाल जानना और स्वयं युद्धभूमि में उपस्थित रहकर युद्ध को देखना, दोनों में बड़ा अंतर होता है | वह वैसे ही है जैसे दूरदर्शन के सामने बैठकर खेल का सीधा प्रसारण देखने के स्थान पर खेल मैदान में उपस्थित रहकर खेल देखना | संजय युद्धभूमि में उपस्थित रहकर युद्ध को प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहता था | इसलिए वह युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही कुरुक्षेत्र चला गया | युद्ध का क्या परिणाम होगा ? युद्ध के 9 वें दिन तक यह संजय को स्पष्ट नहीं हो सका था | 10 वें दिन जब महाप्रतापी भीष्म शरशायी हो गए, तब संजय को युद्ध का परिणाम स्पष्ट रूप से दिखने लगा था | वह जान चूका था कि जिनके साथ स्वयं परमात्मा श्री कृष्ण है, उनकी विजय होना निश्चित है | यह जानकर वह तत्काल ही हस्तिनापुर लौट आया |  

       संजय जब हस्तिनापुर लौटा तो राजा धृतराष्ट्र मानो उनकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे | संजय के व्यवहार को लेकर धृतराष्ट्र कई बार उससे पहले भी क्षुब्ध हो चुके थे, फिर आज तो उनके पास क्षुब्ध हो जाने का पर्याप्त कारण भी था | जो व्यक्ति धर्म के मार्ग का अनुसरण करता हो और भगवान् के प्रति पूर्णरूपेण समर्पित हो वह सत्य से कभी भी विमुख नहीं हो सकता | संजय भी सदैव सत्य के मार्ग पर चलता था इसलिए कई बार राजा धृतराष्ट्र, उसकी सत्य बात सुनकर उससे नाराज हो जाते थे | धृतराष्ट्र जानते थे कि संजय सही कह रहा है परंतु मोह में अंधे व्यक्ति को सत्य सुनना भी अच्छा नहीं लगता | मोहित व्यक्ति को केवल वही बात सुनने में अच्छी लगती है, जो उसके मोह को तुष्टि और पुष्टि प्रदान करने वाली हो | राजा धृतराष्ट्र ऐसे ही व्यक्ति थे परन्तु साथ ही उनकी संजय को सुनने की विवशता भी थी |

            एक राजा अपने मंत्री के समक्ष विवश कैसे हो सकता है ? पुत्रमोह ने राजा को विवश कर दिया था क्योंकि वे युद्धभूमि का सही सही हाल जानना चाहते थे | संजय ही इस सम्बन्ध में एक मात्र व्यक्ति था जो उनकी यह इच्छा पूरी कर सकता था | एक तो संजय सत्यभाषी थे और दूसरी बात, दिव्यदृष्टि केवल उसके पास ही थी ।

         युद्ध को प्रारम्भ हुए भले ही दस दिन बीत गए हों परन्तु धृतराष्ट्र तो युद्ध का हाल पहले दिन से ही अर्थात युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व का भी हाल जानना चाहते थे | चूंकि संजय ने दस दिन तक का युद्ध अपनी भौतिक दृष्टि से प्रत्यक्ष होकर देखा था इसलिए प्रारम्भ से ही युद्ध का वर्णन करने में उन्हें किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होनी थी | पास में दिव्यदृष्टि होने से वह युद्ध के शेष आठ दिनों का हाल भी बता देगा |

      श्री मद्भगवद्गीता का प्रारम्भ ही धृतराष्ट्र के एक प्रश्न से ही होता है | धृतराष्ट्र जन्मांध तो थे ही, साथ में पुत्रमोह ने उनकी आन्तरिक दृष्टि भी छीन ली थी | इस प्रकार हस्तिनापुर नरेश के पास न तो बाह्य दृष्टि थी और न ही आंतरिक दृष्टि | इसलिए अब उनका एक मात्र सहारा केवल संजय ही था क्योंकि संजय के पास स्वयं की बाह्य और आन्तरिक दृष्टियाँ तो थी ही, साथ में अपने गुरु द्वारा प्रदत्त दिव्यदृष्टि भी थी |

         गीता का शुभारम्भ धृतराष्ट्र के एक प्रश्न से होता है, जो वे संजय से कर रहे हैं –

      धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव: |

      मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ||गीता-1/1|| 

        युद्ध के प्रारम्भ होने से पहले अर्जुन के मन में अपने कुटुम्बियों के प्रति जो मोह पैदा हो गया था, उसके बारे में सुनकर राजा धृतराष्ट्र बड़े प्रसन्न हुए | उन्होंने संजय को पूछा कि क्या अर्जुन ने युद्ध करने से स्पष्ट मना कर दिया है ? संजय ने कहा –“महाराज ! थोडा धैर्य रखिये, अभी युद्ध प्रारम्भ नहीं हुआ है | अभी तो में आपको युद्ध के प्रारम्भ होने से पहले श्री कृष्ण और अर्जुन के मध्य होने जा रहा वार्तालाप सुना रहा हूँ | इस वार्तालाप को सुनकर आप समझ जायेंगे कि युद्ध होगा अथवा नहीं | साथ ही यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि युद्ध का परिणाम क्या होगा ?” परन्तु धृतराष्ट्र के पास इतना धैर्य था ही कहाँ ? वे तो चाहते थे कि अर्जुन मोहवश अपने हथियार डाल दे, जिससे उनके पुत्र का विजयी होना सुनिश्चित हो जाये |

         ”मेरे और पांडु पुत्रों ने युद्धभूमि में क्या किया?” ऐसा प्रश्न करने से ही स्पष्ट हो जाता है कि राजा के मन में ‘मेरे-तेरे’ की भावना कितनी प्रबल है । मेरे तेरे की इस  भावना के कारण वह मन ही मन केवल अपने पुत्र को ही विजयी होता देखना चाहता है |

           सम्पूर्ण गीता संजय और धृतराष्ट्र के मध्य हुए वार्तालाप में ही सिमटी हुयी है | गीता के बारे में स्वामीजी द्वारा कहा गया है कि वेदों का सार उपनिषद् है और उपनिषदों का सार गीता है | इतना महान ग्रन्थ है गीता और यह सम्पूर्ण ग्रन्थ केवल राजा धृतराष्ट्र के द्वारा संजय से किये गए एक प्रश्न पर आधारित है | संजय के द्वारा अपने राजा के प्रश्न का उत्तर देने के अंतर्गत ही श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद आ जाता है जो कि गीताजी के प्राण है | गीता का प्रारम्भ ही धर्म शब्द से होता है | 

      धृतराष्ट्र द्वारा धर्म शब्द का उपयोग करने के बाद, अर्जुन ने भी भगवान् श्री कृष्ण से धर्म के विषय में ही प्रश्न पूछा था कि मैं धर्म को लेकर संशयग्रस्त हूँ |  उसके बाद सारी गीता ज्ञान, कर्म और भक्ति पर विवेचन करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य’ पर अर्थात धर्म शब्द पर ही आकर समाप्त हो जाती है |

        महाभारत कुरुक्षेत्र की भूमि पर ही होना क्यों निश्चित हुआ ? कुरुवंश के दो परिवार अपने-अपने अधिकार के लिए आज इस स्थान पर एकत्रित हुए हैं | महाराज कुरु ने कभी इस भूमि पर हल चलाते हुए अपने कर्म को सर्वोच्च वरीयता दी थी | कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र में प्राण त्यागने वाला स्वर्ग की गति प्राप्त करता है | महाभारत में असंख्य प्राणियों के प्राण जाने वाले थे, यह निश्चित था | उनकी मरणोपरांत होने वाली गति को ध्यान में रखते हुए कुरुक्षेत्र की भूमि का चयन युद्ध के लिए किया गया था |

              कुरु शब्द का एक अर्थ करना भी होता है | करने का अर्थ है, कर्म करना। कर्म करने से सम्बधित होने के कारण इस भूमि को कुरुक्षेत्र कहा जाता है | दो पक्षों की आपसी अनबन से उनके मध्य होने वाली संघर्ष की स्थिति को युद्ध कहा जाता है | युद्ध में दोनों में से कोई एक पक्ष धर्म के विपरीत अवश्य ही होता है | अगर दोनों ही पक्ष धर्मानुकूल हो तो फिर युद्ध होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता | इसलिए कहा जाता है कि धर्म की पुन: स्थापना करने के लिए युद्ध होता है | इससे स्पष्ट है कि धर्म का पक्ष ही प्रत्येक युद्ध में विजयी होता है और भविष्य में भी होता रहेगा | अतः धर्मक्षेत्र का अर्थ हुआ धर्म का क्षेत्र और कुरुक्षेत्र का अर्थ हुआ कर्म का क्षेत्र |इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रत्येक युद्ध में धर्म की विजय होना निश्चित है और धर्म की स्थापना के लिए कर्म (युद्ध) करने आवश्यक है |

           हमारी दृष्टि में ‘धर्म क्या है ?’ सर्वप्रथम यह स्पष्ट होना आवश्यक है | धर्म को जब तक हम नहीं जान पाएंगे तब तक कर्म की बात नहीं समझ सकते | धर्म और कर्म, ये दो शब्द ऐसे हैं जो एक दूसरे से गहरे सम्बंधित है | हमारे ऋषि-मुनियों ने कर्म करने और उसके मिलने वाले परिणाम पर बहुत शोध किए हैं | कौन से कर्म व्यक्ति को पतन की ओर ले जाते हैं और किस प्रकार के कर्म उसे उत्थान की ओर उन्मुख कर देते हैं ? उन पर उन्होंने बहुत माथापच्ची की है | जो कर्म व्यक्ति को परमात्मा की ओर ले जाए, वे सभी कर्म, धर्म के अंतर्गत आ जाते हैं | जो कर्म पतन की ओर ले जाते हैं, वे सब धर्मविरुद्ध माने जाते हैं और अधर्म कहलाते हैं |

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि कर्म से ही धर्म का निर्धारण होता है | एक बार धर्म का निर्धारण कर दिया गया है तो फिर धर्म के अनुसार जो कर्म किये जाते हैं वे ही कर्म मनुष्य के लिए कर्तव्य कर्म बन जाते हैं | हमारे पूर्वजों ने इस शोध में स्पष्ट करते हुए प्रत्येक व्यक्ति का एक धर्म निश्चित कर दिया है | उस धर्म का आचरण करते हुए ही मनुष्य अपने जीवन में प्रगति करता रहता है | धर्म के विरुद्ध चलने वाले का पतन होना अवश्यम्भावी है |

          गीता में धर्म शब्द से आशय कर्तव्य कर्म से ही है | अर्जुन एक क्षत्रिय वंश में पैदा हुआ था | उसका धर्म अर्थात कर्तव्य-कर्म था युद्ध करना | परन्तु वह अपने परिवारजनों को युद्धभूमि में देखकर मोहग्रस्त हो गया था और युद्ध से पलायन करने की सोचने लगा था | यह तो उनके साथ भगवान् श्री कृष्ण थे, नहीं तो अर्जुन युद्धभूमि छोड़ कभी का भाग खड़ा होता | श्री कृष्ण ने उसे उसका धर्म स्मरण कराया | जब अर्जुन को अपने कर्तव्य का बोध हुआ तब वह समझ गया कि कर्तव्य कर्म से विमुख होना ही अधर्म है | गीता को इसीलिए कर्मयोग का ग्रन्थ कहा जाता है क्योंकि यह स्पष्ट करती है कि कर्तव्य-कर्म करना ही वास्तव में धर्म का पालन है |

      धर्म शब्द ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ है, धारण करना | शास्त्रों में भी कहा गया है –‘धार्यते इति धर्मः” अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है | सनातन धर्म के अनुसार लोक परलोक के सुखों की सिद्धि हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और धर्मों का धारण व सेवन करना ही धर्म है |

         धर्म के स्वरुप के बारे में मनु अपने ग्रन्थ मनुस्मृति में कह रहे हैं कि –

  कर्मणां च विवेकार्थं धर्माधर्मौ व्यवेचयत् |

  द्वन्दैरयोजयच्चेमाः सुखदुःखादिभिः प्रजाः || मनुस्मृति-1/28||

                 अर्थात अनादि परमेश्वर ने कर्मों के विवेक (करणीय-अकरणीय कर्मों में विचार करने तथा करणीय कर्मों में प्रवृति और अकरणीय कर्मों से निवृति) के लिए एक ओर धर्म-अधर्म का स्वरुप निश्चित किया और दूसरी ओर अपने द्वारा सृष्ट प्रजा को यह जतलाया कि धर्म से सुख की और अधर्म से दुःख की प्राप्ति होती है | इस प्रकार परब्रह्म परमेश्वर ने प्रजा को सुख-दुःख आदि (हानि-लाभ, यश-अपयश, जीवन-मरण तथा मान-अपमान) द्वंद्वों से युक्त कर दिया |

           धर्म का स्वरुप कर्मों से निर्धारित होता है | जिस कर्म को करने से जो भी परिणाम निकल कर सामने आता है, वह अगर सुखदाई है तो वे सभी कर्म, धर्म के अंतर्गत आ जाते हैं और अगर उन कर्मों के परिणाम में दुःख मिलता है, तो वे सभी कर्म अधर्म कहलाते हैं | इससे निश्चित होता है कि धर्म का मूल कर्म है | आदिकाल से हमारे ऋषि-मुनियों को कर्म करने से जैसा अनुभव हुआ उसी अनुसार उन्होंने धर्म का निर्धारण कर दिया | धर्म के निर्धारण के बाद एक साधारण मनुष्य को केवल सुख प्रदान करने वाले कर्म करने में सुविधा हो गयी | जो धर्म के आधार पर कर्म नहीं करता और अधर्म के मार्ग पर चलते हुए कर्म करता है, वह दुःख को प्राप्त होता है |

       हमारे ऋषि-मुनि जीवन भर केवल क्रियात्मक पूजा-पाठ में ही नहीं लगे रहे थे | उन्होंने विज्ञान के उच्चतम स्तर तक पहुँचने का सतत प्रयास किया और सभ्यता को सर्वोच्च स्तर तक ले जाने में सफलता प्राप्त की | आज मानव सभ्यता जिस स्तर पर है, उसमें हमारे इन पूर्वजों का महत्वपूर्ण योगदान है | आज मानव सभ्यता का जो पतन होता हम देख रहे हैं, उसका एक मात्र कारण मनुष्य का धर्म को छोड़कर अधर्म के मार्ग पर चल पड़ना है |

           मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं –       

धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः |

 धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ||

       अर्थात धैर्य, क्षमा, दम (अपनी वासनाओं पर नियंत्रण रखना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (आतंरिक व बाह्य शुद्धि), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), धी (बुद्धिमता का प्रयोग), विद्या (ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन, वचन और कर्म से सत्य का पालन करना) और क्रोध न करना, ये धर्म के दस लक्षण हैं | धर्म के ये दस लक्षण स्पष्ट करते हैं कि स्वयं पर नियंत्रण रख कर जो भी कर्म किये जायेंगे, वे सभी कर्म धर्म के अंतर्गत आ जायेंगे | इस प्रकार हमारे पूर्वजों ने कर्मों के आधार पर धर्म का निर्धारण किया, जिससे फिर धर्म के आधार पर कर्म निश्चित हो गए |

           जितने भी कर्तव्य कर्म हैं, वे सभी कर्म धर्म के अनार्गत आ जाते हैं | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि व्यक्ति द्वारा अपने जीवन में कर्तव्य कमों का निर्वहन करना ही उसका धर्म है | हमारी जीवन पद्धति धर्म के लक्षणों पर आधारित हो और हमारे जीवन में कर्म धर्म के अनुसार हों | इस प्रकार अपने कर्तव्य को निभाने के लिए कर्म करना ही धर्माचरण है |  

            शास्त्रों में धर्म के चार चरण बतलाये गए हैं जिनका अनुसरण करके ही मनुष्य को जीवन में सुख प्राप्त होता है | ये चार चरण हैं- तप, ज्ञान, यज्ञ और दान | कहा जाता है कि चार युगों के अंतर्गत प्रथम सतयुग में धर्म अपने चारों चरणों – तप, ज्ञान, यज्ञ और दान – से युक्त सदैव सत्य रूप में रहता है | इसका कारण यह है कि इस युग में लोगों को अधर्म द्वारा धन की प्राप्ति नहीं होती | मनुष्य न्यायपूर्वक अर्जित धन का ही उपभोग करते हैं | अतः उनके दुराचरण में प्रवृत होने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता |

      अन्य तीन – त्रेता, द्वापर और कलि-युगों में मनुष्यों के द्वारा क्रमशः चोरी, झूठ और माया को अपनाने के कारण वेद-प्रतिपादित धर्म एक-एक चरण से रहित होता जाता है | त्रेता युग में मनुष्य चौर्यकर्म में प्रवृत हो जाता है, तब धर्म का एक चरण ‘तप’ नष्ट हो जाता है और धर्म ‘त्रिपाद’ रह जाता है | द्वापर युग में मनुष्य चोरी के साथ-साथ झूठ अर्थात असत्य भाषण को भी अपना लेता है, इस कारण से धर्म का दूसरा चरण ‘ज्ञान’ भी चला जाता है और धर्म ‘द्विपाद’ रह जाता है | कलियुग में मनुष्य चोरी और असत्य के साथ-साथ माया (छल-कपट) को भी अपना लेता है, जिससे धर्म का तीसरा चरण ‘यज्ञ’ भी चला जाता है और धर्म ‘एकपाद’ रह जाता है |  

           धर्म के इन चार चरणों में से प्रत्येक युग में एक चरण प्रधान होता है | सतयुग के प्राणियों का मुख्य धर्म ‘तप’ है, त्रेता युग का प्रधान धर्म ‘ज्ञान’ है, द्वापर में ‘यज्ञ’ ही मुख्य धर्म है और कलियुग का प्रधान धर्म ‘दान’ है | अभी कलियुग चल रहा है | इस युग में दान देते हुए धर्म का पालन करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है | आज चोरी, झूठ और छल-कपट में प्रायः सभी लोग लगे हुए हैं | आधुनिक युग में मनुष्य ने जीवन का एक ही उद्देश्य बना रखा है कि जैसे- तैसे, कैसे भी हो, अधिक से अधिक धन अर्जित कर लें | इसके लिए उसने चोरी, झूठ और छल-कपट का मार्ग अपना लिया है, जोकि अधर्म की श्रेणी में आते हैं | इसीलिए आज के युग में तप और यज्ञ मात्र क्रियात्मक बनकर रह गए है | ज्ञान से तो हमने बहुत पहले से ही कोसों दूरी बना रखी है ।

          जिस प्रकार प्रत्येक युग के अनुसार धर्म का निर्धारण किया गया है उसी प्रकार चारों वर्णों के भी धर्म, कर्मों के आधार पर निर्धारित किये गए हैं | भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि मैंने ही चारों वर्णों की सृष्टि गुण और कर्मों के अनुसार की है | जिन गुण और कर्मों के अनुसार भगवान् ने वर्ण बनाये हैं, वे ही कर्म उस वर्ण के धर्म कहलाते हैं |

            एक ब्राह्मण का धर्म है - वेदों का पठन-पाठन, यज्ञों का करना-कराना तथा दान लेना और देना आदि | ये सभी ब्राह्मण के कर्तव्य-कर्म हैं, जिनका पालन करना ही उसका धर्म है | इसी प्रकार एक क्षत्रिय का धर्म है - प्रजा की रक्षा करना, ब्राह्मणों और दीन-दुखियों को दान देना, यज्ञानुष्ठान में प्रवृत होना, सद्ग्रंथों का अध्ययन करना तथा विषय-भोगों में आसक्त न होना | एक वैश्य का धर्म है – पशुपालन, कृषि व्यापार, साहूकारी करना और इसके अतिरिक्त दान देना, यज्ञ करना तथा स्वाध्याय – वैश्य के लिए निर्धारित कर्तव्य-कर्म हैं | एक शूद्र का धर्म है - निर्द्वंद्व तथा निर्विकार भाव से तीनों वर्णों की सेवा करना |

             आज के युग में कोई सा भी वर्ण अपने धर्म के अनुसार कर्म करता दिखलाई नहीं पड़ रहा है | यही कारण है कि सनातन धर्म अपने पतन की ओर धीरे-धीरे अग्रसर होता जा रहा है | सनातन धर्म का अर्थ सनातन सत्य से न लें | सनातन सत्य पर ही धर्म आधारित है और जब सत्य का पालन नहीं होगा तो फिर सनातन धर्म कहाँ से बचेगा ? आज जो सनातन धर्मियों की दुर्दशा होती दिखलाई पड़ रही है, उसका एक मात्र कारण अपने धर्म से विमुख हो जाना है | शास्त्रों में कहा गया है ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ अर्थात धर्म की रक्षा करने पर रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है | दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि रक्षित धर्म ही रक्षक की रक्षा करता है | अतः आज की विपरीत परिस्थतियों से बाहर निकलना है तो हम सभी को अपने अपने धर्म के अनुसार चलना होगा |

           धर्म और अधर्म का विभाजन एक सूक्ष्म रेखा द्वारा होता है | इस कारण से कई बार एक संशय की सी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि धर्म का निर्णय किस आधार पर हो अर्थात किसी भी प्रकार की संशय की स्थिति पैदा होने पर अपने धर्म को कैसे पहिचाने ? महर्षि मनु ने धर्म के निर्णय के बारे में कहा है -   

   वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीत्ने च तद्विदाम् |

     आचारश्चैव साधुनामात्मनस्तुष्टिरेव च ||मनुस्मृति-2/6||

             वेद ही सम्पूर्ण धर्मों का मूल आधार है अर्थात धर्म का पूर्ण प्रतिपादन वेदों में हुआ है और उसकी प्रतीति भी वेद से ही होती है, फिर भी धर्म के तत्व को जानने वाले शास्त्रों, चरित्र की उत्कृष्टता, साधू पुरुषों का आचरण तथा आत्मा की संतुष्टि को भी धर्मतत्व का आधार मानते हैं |

      कहने का अर्थ है कि सर्वप्रथम धर्म-अधर्म का निर्णय वेदों के आधार पर करना चाहिए | वेदों से इसकी प्रतीति नहीं होती हो तो फिर शास्त्रों को प्रामाणिक मानना चाहिए | फिर भी यदि किसी तत्व का निर्णय शास्त्र से नहीं हो पाता तो अतीत के महापुरुषों के चरित्र का अध्ययन करना चाहिए | यदि वहां से भी सफलता नहीं मिलती तो साधू पुरुषों के आचरण को देखकर निर्णय करना चाहिए | यदि फिर भी धर्म की स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती है तो अपनी आत्मा को साक्षी मानकर सत्य का निश्चय कर लेना चाहिए |

       पुरुष के लिए अभीष्ट चार पदार्थ (पुरुषार्थ) – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, में से प्रायः पुरुष धर्म और मोक्ष की उपेक्षा करते हैं और अर्थ-लाभ और काम-भोग में आसक्त हो जाते है | अर्थ और काम में आसक्त प्राणियों के लिए ही धर्मोपदेश का विधान किया गया है | धर्म के तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए तो वेद ही अंतिम प्रमाण है |

           गीता में भी स्वधर्म के पालन करने को कहा गया है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को युद्धभूमि में उपदेश करते हुए कहते हैं –

            श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |

           स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||18/47||

       अर्थात अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरे धर्म से गुणरहित होते हुए भी अपना धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभाव से नियत किये हुए स्वधर्म रूप कर्म को करते हुए मनुष्य पाप (अधर्म) को प्राप्त नहीं होता |

           दोष युक्त होते हुए भी सहज कर्म का कभी त्याग नहीं करना चाहिए | सहज कर्म जन्म के साथ ही मनुष्य के स्वभाव में आते है और उसी अनुसार उसको कर्म करने चाहिए | स्वभाव पूर्वजन्म के संचित कर्म से बनता है, जो जीवन में कर्मों के प्रारभ का कारण बनते हैं | इसलिए इनको सहज कर्म कहा जाता है | सहज कर्म को किये बिना व्यक्ति पूर्वजन्म की शेष रही कामनाओं से मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि पूर्व मानव जीवन में रही अधूरी कामना को पूरा करने के लिए ही सहज कर्म का नए शरीर के साथ आगमन हुआ है | भगवान् तो गीता में यहाँ तक कह गए हैं कि स्वधर्म का पालन करते हुए मर जाना भी कल्याणकारी है जबकि दूसरे का धर्म भय को देने वाला है (गीता-3/35) |

          आज जो धर्म के समक्ष चुनौती है, वह धर्म का पालन न करने के कारण से ही उपस्थित हुई है | हमें दूसरे का धर्म अधिक श्रेष्ठ लगता है और हम स्वधर्म छोड़कर दूसरे के धर्म के अनुसार कर्म करने लगे हैं | आज ब्राह्मण अँगुलियों पर गिनने लायक बचे है, सभी धनोपार्जन और संग्रह के लिए वैश्य बन गए हैं | क्षत्रिय अपना धर्म छोड़कर अहिंसा के नाम पर प्रजा की रक्षा करने से बच रहे हैं | ऐसे में जरा सोचिये ! सनातन धर्म का भविष्य कैसा होगा ?

         हमारे लिए निर्धारित धर्म ही हमें स्वकर्म करने के लिए प्रेरित करता है | स्वकर्म करने में आप किस प्रकार की रुचि रखते हैं, उससे आपको सिद्धि किस प्रकार मिल सकती है, इसको गीता में भगवान् स्पष्ट करते हुए कहते हैं –

       स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |

       स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||18/45|||

         अर्थात अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में प्रीतिपूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक-सिद्धि अर्थात भगवत्प्राप्ति को उपलब्ध हो जाता है | साथ ही भगवान् कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके सिद्धि को प्राप्त होता है; उस विधि को सुन |  

        इस श्लोक के अनुसार मनुष्य स्वकर्म में प्रीतिपूर्वक रत तो है और उससे परमात्म तत्व की प्राप्ति भी हो जाती है परन्तु यह प्राप्ति केवल प्रीतिपूर्वक कर्म करने मात्र से ही नहीं होती | फिर अपने अपने कर्म में लगे हुए व्यक्ति को परमात्मा की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?

       स्वाभाविक कर्म को निःस्वार्थ भाव से करना कर्म योग के अंतर्गत है | इससे भी परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है | ज्ञान और कर्म योग दो ऐसे लौकिक साधन हैं, जिससे परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है परन्तु जो कार्य अथवा कर्म परमात्मा की पूजा समझ कर किया जाता है, उससे सिद्धि शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है | इस बात को भगवान् ने इससे आगे के श्लोक में स्पष्ट किया है |

    यतः प्रवृतिर्भूतानां यें सर्वमिदं ततम् |

    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||18-46||

     अर्थात जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।

       भगवान् कहते हैं कि जो भक्त अपने स्वाभाविक कर्मों से मेरी अर्चना करता है वह परमसिद्धि को प्राप्त कर लेता है | परमात्मा की अपने स्वाभाविक कर्मों से पूजा करना संभव तभी हो सकता है, जब हम सम्पूर्ण सृष्टि में केवल एक परमात्मा को ही देखें | जब तक हम यह स्वीकार नहीं करते कि सम्पूर्ण सृष्टि में केवल एक परमात्मा ही व्याप्त है, तब तक अपने स्वाभाविक कर्मों से उस परमेश्वर की पूजा होना लगभग असंभव है | इसलिए प्रथमतः समस्त संसार में परमात्मा को देखते हुए अपने कर्मों से उनकी पूजा करना आवश्यक है और वैसी पूजा ही हमें परमसिद्धि तक ले जा सकती है |

         भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में प्रत्येक प्राणी के लिए कर्म करने आवश्यक हैं | प्रत्येक कर्म में अग्नि में धुएं की उपस्थिति की तरह दोष भी रहते है | इसके बाद भी कर्म का त्याग करने की सलाह भगवान् ने गीता में कहीं पर भी नहीं दी है | कर्म इस प्रकार करने चाहिए कि कर्म करने वाले को अनुभव ही नहीं हो कि कोई कर्म उसके द्वारा किया भी जा रहा है | स्वधर्म के अनुसार कर्म करने में तो मनुष्य को ध्यान रहता है कि वह धर्मानुसार कर्म कर रहा है | यह मनुष्य को सात्विक अवस्था तक तो ले जा सकता है परन्तु गुणातीत नहीं होने देता | गुणातीत की अवस्था को उपलब्ध हुए बिना मनुष्य मुक्त नहीं हो सकता |

            भगवान् ने कर्म की अभिरत अवस्था में जिस सिद्धि प्राप्ति की बात कही है वह नैष्कर्म्यसिद्धि है | यह ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है, जिसमें व्यक्ति को पता ही नहीं रहता कि कोई कर्म उसके द्वारा किया भी जा रहा है | वह कर्म जिसका कोई फल उत्पन्न नहीं होता वह कर्म-अवस्था  नैष्कर्म्यता की अवस्था कहलाती हैं | यह कर्मों की सर्वोच्च अवस्था है जिसको प्राप्त करना बिना भक्ति के संभव नहीं है | भगवान् जिस ‘स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः’ की बात कर रहे हैं, वही मनुष्य की  नैष्कर्म्य सिद्धि की अवस्था है |

         बड़ी जटिल अवस्था में पहुँच गए हैं हम | क्या करें, यह धर्म-कर्म का विषय कुछ ऐसा ही है | कर्म भी करने पड़ेंगे और वे भी स्वधर्म का पालन करते हुए और महत्वपूर्ण बात तो यह है कि कर्म को त्यागा भी नहीं जा सकता | ऐसे में प्रश्न उठता है कि हमारे द्वारा न चाहते हुए भी कर्म क्यों होते जाते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें जरा अपनी इन्द्रियों की ओर चलकर देखना होगा | बाह्य दृष्टि से यह अनुभव नहीं हो सकता कि कर्म होते क्यों हैं ? जरा अपनी आंतरिक दृष्टि से भीतर झांकें, तभी कर्म के कारण को स्पष्ट रूप से जान पाएंगे |

       भगवान् ने प्रत्येक प्राणी को दस इन्द्रियां दी है | इनमें से पांच तो ज्ञानेन्द्रियाँ है और पांच ही कर्मेन्द्रियाँ | ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के मध्य एक सेतु है, जिसका नाम है मन | इसको भी इन्द्रियों के साथ जोड़ लिया जाये तो समस्त इन्द्रियों की संख्या हो जाती है, ग्यारह | ज्ञानेन्द्रियाँ बाह्य वस्तुओं के बारे में ज्ञान तो करा सकती है परन्तु उस ज्ञान के अनुसार अपने द्वारा किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दे सकती | इसी प्रकार कर्मेन्द्रियाँ प्रतिक्रिया तो दे सकती है पर उसे जब तक ज्ञान का संकेत नहीं मिले तब तक वे भी निष्क्रिय बनी रहती हैं | ज्ञानेन्द्रियों से बाह्य ज्ञान का अनुभव मन करता है और मन कर्मेन्द्रियों से उस ज्ञान के अनुसार प्रतिक्रिया करवाता है, जिसको हम कर्म करना कहते हैं |

       मन को अगर वास्तविक ज्ञान उपलब्ध हो जाये कि बाहर के विषय विष के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है तो फिर कर्मेन्द्रियों द्वारा की जाने वाली प्रतिक्रिया का स्वरुप भी परिवर्तित हो सकता है | सांसारिक विषय का ज्ञान हमें हमारी ज्ञानेन्द्रियों से मिलता है | अगर हमें स्वधर्म का ज्ञान है तो फिर कर्मेन्द्रियाँ उसी धर्म के अनुसार प्रतिक्रिया व्यक्त करेगी | इसलिए स्वधर्म का ज्ञान होना प्रत्येक परिस्थिति में मनुष्य के लिए आवश्यक है |

        कर्मेन्द्रियाँ कर्म करती है, मन के आदेश पर | ज्ञानेन्द्रियों की कर्म करने में प्रत्यक्ष रूप से किसी प्रकार की भूमिका नहीं होती | धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह अहम् जानता है अर्थात हम स्वयं को इनका ज्ञान है | धर्म का समुचित ज्ञान होने के लिए और धर्म को दृढ़ता भक्ति से मिलती है | जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति में रत रहता है, वह सदैव धर्म का पालन करते हुए ही कर्म करेगा | भक्ति में रत मनुष्य के मन का आचरण भी धर्मानुकूल हो जाता है |

            बार-बार प्रश्न आता है कि मन को परमात्मा में कैसे लगायें ? जब तक हमें धर्म और अधर्म का ज्ञान नहीं होगा तब तक परमात्मा में मन लगना कठिन है | धर्म का ज्ञान कैसे हो सकता है ? पूर्व में इसका विवेचन किया जा चूका है, फिर भी विस्मृत हो गया हो तो एक बार फिर से बतला देता हूँ | वेद ही धर्म के बारे में निर्णायक है | वेद से अगर स्थिति स्पष्ट नहीं होती तो शास्त्रों से धर्म का निर्णय किया जा सकता है | शास्त्रों से भी अगर धर्म स्पष्ट नहीं हो सके तो महात्माओं के जीवन और उनके आचरण से धर्म का ज्ञान ले सकते हैं | फिर भी कोई संशय रह जाए तो संतों के साथ सत्संग कर धर्म का निर्णय किया जा सकता है | इन चारों से ही आपकी धर्म के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं होती तो मनु महाराज कहते हैं कि आपके भीतर हृदय में बैठी आत्मा से पूछो | वह अगर प्रथम बार में ही किसी कर्म को करने की स्वीकृति दे देती है तो फिर उसी कर्म को अपना धर्म समझें |

            मनु महाराज ने बहुत ही सुगम उपाय बताएं हैं, धर्म के बारे में निर्णय करने में | परन्तु मनुष्य जीवन की विडंबना है कि वह अपने शारीरिक सुख के लिए आत्मनिर्णय की भी अवहेलना कर देता है | जीवन में पहली बार शराब के गिलास को हाथ लगाने पर भीतर से एक आवाज़ आती है – “नहीं” | तत्काल ही मनुष्य अगर उस आवाज़ को आत्मा की आवाज़ मानकर आचरण कर लेता है तो फिर शराब को जीवन में कभी भी हाथ नहीं लगाएगा | एक छद्म मानसिक सुख के लिए अगर अंतर्मन के कहे की अवहेलना कर दी जाती है तो फिर भगवान ही मालिक है | इसलिए अपनी आत्मा की आवाज़ को सुनकर जो व्यक्ति धर्म का निर्णय कर लेता है, वह फिर जीवन में कभी भी दुःख को प्राप्त नहीं हो सकता |  

            इस विषय पर ही कुछ स्पष्टीकरण चाहा गया है अतः यहाँ आकर उनका निराकरण करना आवश्यक है | स्वामीजी ने गीता प्रबोधनी में एक श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा है कि सहज कर्म और स्व-कर्म ही स्व-धर्म है | स्व-कर्म और सहज कर्म ही हमारा स्व-धर्म निर्धारित करते हैं | सहज कर्म वे कर्म होते हैं जिनको सम्पादित करने के लिए जन्म के साथ ही प्राकृतिक गुण हमें मिले हैं | इन कर्मों को करने में विशेष परिश्रम की आवश्यकता नहीं होती है | जिस वर्ण में हमारा जन्म हुआ है उसी वर्ण के अनुसार हमारे भीतर प्रकृति के तीनों गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता अवश्य रहती है | उसी प्रधान गुण के अनुसार जो कर्म करना हम प्रारम्भ करते हैं, वही हमारे लिए सहज कर्म है और उस गुण के अनुसार जीवन के प्रारम्भ में किये जाने वाले वे कर्म ही हमारे स्व-कर्म हैं | इस प्रकार जीवन के प्रारम्भ में सहज कर्म और स्व-कर्म में किसी प्रकार का अंतर नहीं है और ये ही हमारे स्व-धर्म होते हैं |

            पूर्व मानव जीवन में अधूरी रह गयी कामना के अनुसार हमें उसी वर्ण में जन्म मिलता है, जिस वर्ण में जन्म लेने से वह अधूरी कामना पूरी हो सकती हो | पूर्व मनुष्य जीवन में किसी कामना की पूर्ति के लिए किये गए कर्मों से जब वह कामना पूर्ण नहीं होती है तो वे सभी कर्म हमारे चित्त में संचित हो जाते हैं | मनुष्य जीवन में किये जाने वाले कर्म के आधार पर ही मनुष्य का स्वभाव बनता है | शरीर के छूट जाने पर नया मनुष्य जीवन मिलने पर उसी स्वभाव के अनुसार सहज कर्म होने प्रारम्भ होते हैं, जो जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में स्व-कर्म भी कहलाते हैं | जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, वे कर्म जो सहजता और बिना अधिक परिश्रम किये हो जाते हैं वे ही सहज कर्म हैं | सहज कर्म बिना अधिक परिश्रम किये संपन्न इसलिए हो पाते हैं क्योंकि उन कर्मों को करने की भूमिका पूर्व मानव जीवन में पहले ही निर्धारित कर दी गयी थी | अब अपनी बात को कुछ उदाहरण देकर स्पष्ट करूँगा |

                 कुछ उदाहरणों के माध्यम से अपनी बात को स्पष्ट करता हूँ | जैसे कि वैश्य वर्ण में जन्म लेने वाले मनुष्य के लिए सहज कर्म है- कृषि, गौरक्षा और व्यापार करना | यही इस वर्ण के धर्म भी हैं | इन कर्मों को उसे अपने जीवन में सदैव करते रहना चाहिए, कभी भी छोड़ना नहीं चाहिए | हाँ, वह अपने स्वभाव को परिवर्तित कर अपने स्व-कर्म अवश्य ही बदल सकता है | स्व-कर्म चाहे तो जीवन में हम कभी भी परिवर्तित कर लें परन्तु सहज कर्म को तो उनके साथ-साथ फिर भी करते रहना चाहिए | अर्जुन वर्ण से क्षत्रिय था | युद्ध से मोहवश पलायन करने जा रहा था | उस समय भगवान् श्री कृष्ण ने उससे क्या कहा ? यही कहा कि तू मोहवश जिस युद्ध को नहीं करना चाहता एक दिन तेरा क्षत्रिय स्वभाव ही तुम्हें युद्धभूमि में खींच ले आएगा |      

                  गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को सहज कर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए चाहे उनमें कितना ही दोष प्रतीत होता हो | सहज कर्म जन्म के वर्ण से सम्बंधित है, इसलिए उनको तो कभी भी परिवर्तित नहीं किया जा सकता | सहज कर्म जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में स्व-कर्म बनते अवश्य ही हैं परंतु अपने स्वभाव को बदलते हुए जीवन में कभी भी इनको परिवर्तित किया जा सकता है | कहने का अर्थ है कि स्व-कर्म मनुष्य के स्वभाव से सम्बंधित है और स्वभाव को नए कर्म करते हुए परिवर्तित किया जा सकता है | इससे स्पष्ट है कि मनुष्य को जन्म-वर्ण से जो स्वभाव मिला है, उसे वह नए कर्म करते हुए परिवर्तित कर सकता है | भगवान् श्री परशुराम ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेकर भी क्षत्रिय के कर्म करते थे | विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे फिर भी अपना स्वभाव परिवर्तित कर वे ब्रह्म ऋषि बन गए थे |

           महर्षि वाल्मीकिजी का उदाहरण हमारे सामने है | ब्राह्मण वर्ण में रत्नाकर के रूप में उनका जन्म हुआ था | बाल्यकाल में ही उनका अपहरण एक भीलनी द्वारा कर लिया गया था | भीलनी ने उनका पुत्रवत लालन-पालन किया | उसके साथ पलते-बढ़ते रत्नाकर का स्वभाव भी परिवर्तित हो गया था | वे एक डाकू बन गए थे और आते-जाते लोगों को लूटा करते थे | सत्व गुण प्रधान कुल में जन्म लेने के उपरांत भी उनका स्वभाव तमस प्रधान कुल के अनुसार परिवर्तित हो गया था | एक संत के सानिध्य के मिलते ही उनका स्वभाव फिर एक बार बदल गया और वे सत्व प्रधान स्वभाव के बन गए | इस परिवर्तन में उनके सहज कर्म की भूमिका भी अवश्य रही होगी, तभी वे एक झटके के साथ अपने अपने पूर्व के स्वभाव में सहजता से लौट आये |

           आधुनिक युग में मनुष्य चाहे किसी भी वर्ण में पैदा हुआ हो वह अपना स्वभाव परिवर्तित कर स्व-कर्म को बदलने में लगा हुआ है | प्रायः सभी वैश्य वर्ण के अनुसार आचरण करने लगे हैं और व्यापार के क्षेत्र में उतरने लगे हैं | वैश्य वर्ण के अतिरिक्त शेष तीनों वर्णों की व्यापार क्षेत्र में सफलता संदिग्ध अवश्य हो सकती है परन्तु व्यापार में सतत रत रहकर उसे ही स्व-कर्म बना लेने से सफलता भी सुनिश्चित की जा सकती है | परन्तु ध्यान रहे, सहज कर्म वे ही रहेंगे जो जन्म से उसे मिले हैं | भिखारी से महारानी बनी कन्या का स्वभाव भी परिवर्तित होना असंभव होता है | एक राजा ने एक भिखारी की सुन्दर कन्या से विवाह तो कर लिया था परन्तु वह कन्या राजमहल में आकर भी दिन प्रतिदिन कृशकाय होती गयी | राजा ने राजवैद्य से उसका कारण पूछा | वैद्यजी ने बताया कि इसका भीख मांगकर खाने का स्वभाव है | आप राजभवन में ऐसी व्यवस्था करवा दें कि यह प्रत्येक दरवाजे पर आवाज लगाकर कुछ मांगे | फिर वही माँगा हुआ भोजन खाकर यह पुनः अपना वही रूप-रंग प्राप्त कर स्वस्थ हो जाएगी | राजा ने ऐसा ही किया और इस प्रकार महारानी के स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार दृष्टिगोचर होने लगा |   

           अब आते हैं एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पर | स्व-कर्म ही कर्तव्य-कर्म हैं तो क्या उन कर्त्तव्य कर्मों का निर्वहन करते हुए भी परमात्मा को पाया जा सकता है ? भगवान् श्री कृष्ण ने गीता के 18 वें अध्याय के 45 वें और 46 वें श्लोक में इसको स्पष्ट किया है कि हाँ, स्व-कर्म करते हुए भी परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है | इस श्लोकों का मैंने इसी श्रृंखला में पूर्व में भी विवेचन किया है | भगवान् कहते हैं कि जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्मों द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त हो जाता है | इसलिए सिद्धि के लिए महत्त्व कर्मों को परमात्मा की पूजा समझ करने का है |

             प्रायः लोग उस श्लोक का अर्थ अलग प्रकार से ले लेते हैं जिसमें कहा गया है कि सहज कर्मों का त्याग कभी भी नहीं करना चाहिए | सहज कर्म का त्याग तो कोई चाह कर भी नहीं कर सकता | अगर ऐसा होता तो अर्जुन कभी भी युद्ध के लिए तैयार नहीं होता | एक ब्राह्मण जिसने अपने व्यापार को ही स्व-कर्म बना लिया है उसे या तो कर्म-योग के अनुसार उस वाणिज्य-कर्म को परमात्मा की पूजा करने की तरह करना चाहिए अथवा अपने सहज कर्म को अपनाते हुए अपने धर्म का निर्वाह करना चाहिए | दोनों ही प्रकार से वह परमात्मा को प्राप्त कर लेगा |

          जिस प्रकार वर्ण के धर्म-कर्म निश्चित है उसी प्रकार आश्रम के भी धर्म-कर्म निश्चित किये हुए हैं | हमें अपने वर्ण और आश्रम के अनुसार अपने धर्म का निर्वहन करना चाहिए | ब्रह्मचर्याश्रम जिस प्रकार विद्याध्ययन के लिए है, उसी प्रकार गृहस्थाश्रम जीविकोपार्जन और अपने कर्तव्य कर्मों में लगे रहने का है | वानप्रस्थ आश्रम परमात्मा में लगने का है और चौथा आश्रम परमात्मा तक पहुँच जाने का है | 

           प्रथमो नार्जितो विद्या द्वितीये नार्जितं धनम् |

           तृतीये नार्जितं पुण्यं चतुर्थे किम् करिष्यते ||

अर्थात जीवन के प्रथम आश्रम में जिसने विद्या नहीं पायी, दूसरे में धन नहीं पाया, तीसरे आश्रम में पुण्य नहीं कमाया, ऐसे में वह भला चौथे आश्रम में आकर भी क्या कर लेगा ?

            अब प्रश्न उठता है कि जब सब व्यापार में ही लगे हुए हैं तो क्या आश्रम के धर्म के अनुसार उन्हें व्यापार छोड़ उससे अलग होकर भगवान् की आराधना में लग जाना चाहिए ? मेरा उत्तर है कि सब कुछ मनुष्य की प्रकृति पर निर्भर करता है | गृहस्थाश्रम में तो कर्म और परमात्मा की उपासना साथ-साथ चल सकती है | इससे भी हम कर्म में प्रीतिपूर्वक लगे रहकर और कर्मों से परमात्मा की पूजा करते हुए उन तक पहुँच सकते हैं परन्तु गृहस्थाश्रम में व्यापार करते हुए हमारा आचरण तुलाधार वैश्य की तरह होना चाहिए |

                 भगवान् बुद्ध के पास एक व्यापारी आया | उसने पूछा कि मैं व्यापार करते हुए भी मुक्त कैसे हो सकता हूँ ? बुद्ध ने उसको तुलाधर वैश्य के पास भेज दिया और कहा कि उसके पास जाकर इस प्रश्न का उत्तर ले लो | व्यापारी पहुँच गया तुलाधर वैश्य के पास | तुलाधर आगंतुक ग्राहकों को सौदा तौलकर दे रहा था और इस बात का पूरा ध्यान रख रहा था कि तुला की डंडी साम्यावस्था में आ जाये | तभी वह सौदा ग्राहक को देता था, उससे पहले नहीं |

                      आगंतुक व्यापारी ने वहां आने का प्रयोजन बताया और अपने प्रश्न का उत्तर चाहा | वैश्य तुलाधर ने कहा कि मैं ज्यादा तो नहीं जानता परन्तु इतना कह सकता हूँ कि तुला की डंडी को साम्यावस्था में रखते रखते मैं स्वयं भी समता में आ गया हूँ | जीवन में आई  इस समता के कारण मैं सदैव आनंद में रहता हूँ। 

     ब्रह्म ही निर्दोष और सम है | इस प्रकार तुलाधार वैश्य भी परमात्मा के पास तक पहुँच गया है, ऐसा कहा जा सकता है | भगवान् श्री कृष्ण गीता में कहते हैं –

इहैव तैर्जितं सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः |

निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि स्थिताः || गीता-5/19 ||

अर्थात जिनका अंतःकरण समता में स्थित है, उन्होंने इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार को जीत लिया है अर्थात वे जीवन्मुक्त हो गए हैं ; क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित है |            

             इस प्रकार यदि व्यापार करने को ही अपना कर्तव्य कर्म मानते हैं और उसे छोड़ने में अपने आपको असमर्थ पाते हैं तो फिर वैश्य तुलाधार की तरह व्यापार करना चाहिए | इस प्रकार व्यापार करने से ही समता आ पायेगी अन्यथा तो लोभ अपना जोर लगाएगा और परमात्मा से दूरी बनी रहेगी।इस युग में अवसर का लाभ न उठाते हुए किसी ने एक भी व्यापारी को देखा है क्या ?

            कुछ कर्तव्यकर्म ऐसे अवश्य हैं जिनको वास्तव में कर्तव्य कर्म कहा जा सकता है | जैसे चिकित्सक, अभियंता, वकील, राजनीतिज्ञ आदि | इनको अवश्य ही अपने कर्तव्य को परमात्मा की पूजा समझते हुए करना चाहिए केवल धन अर्जित करने की दृष्टि से नहीं | परन्तु आज ऐसी बात कहाँ देखने को मिलती है, जहाँ सेवा को अपने कर्तव्य कर्म निभाने में महत्वपूर्ण स्थान मिला हो | आज तो चारों ओर धन लूटने की होड़ मची हुई है, जिसमें समाज के प्रमुख मार्गदर्शक राजनीतिज्ञ तो अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखलाई पड़ रहे हैं |

                     इसीलिए वानप्रस्थ आश्रम की अवस्था में आकर सभी कर्मों का त्याग करते हुए एक परमात्मा को पाने का उद्देश्य रखते हुए सक्रिय रहना चाहिए | कर्म अवश्य करें लेकिन वे कर्म केवल परमात्मा के लिए ही हों और जिनसे संसार की सेवा हो रही हो | शेष सभी प्रकार के कर्मों से विमुख हो जाना चाहिए | पुरातन काल में 50 वर्ष की अवस्था पार करते ही हमारे पूर्वज वन का रुख कर लेते थे,उसके पीछे एक मात्र कारण भी यही था कि सांसारिक मोह से सुगमता से दूर हो सकें | इस वानप्रस्थ की अवस्था में भी अगर हम अपना व्यापारिक कार्य करते रहेंगे तो फिर परमात्मा की प्राप्ति कैसे होगी ?

             एक राजा का दायित्व प्रजा को सुख देना है, उसकी रक्षा करना है | वह अपने कर्तव्य कर्म से पलायन नहीं कर सकता | वह अपना राज कार्य करते हुए भी आध्यात्मिक हो सकता है | राजा जनक इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं | इसलिए अपने वर्ण के अनुसार धर्म का पालन करते हुए परमात्मा को पाने का उद्देश्य रखें, चाहे इसके लिए हमें अपनी आजीविका के लिए किये जाने वाले कर्मों का त्याग भी क्यों न करना पड़े |  

              जब एक गृहस्थ अपने कर्तव्य कर्म से निवृत हो जाता है फिर वह अपने परिवार के लिए किसी प्रकार का कर्म करने को बाध्य नहीं है | फिर भी अगर कोई जीवन भर कर्म में रत ही रहना चाहता है तो उसको सांसारिक आवागमन से मुक्ति भला कैसे मिल सकती है ?

                          गीता में कहा गया है –

          आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारण मुच्यते |

          योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते || गीता-6/3||

       अर्थात जो योग अर्थात समता में आरूढ़ होना चाहता है, ऐसे मननशील योगी के लिए कर्म करना कारण कहा गया है और उसी योगरूढ़ हुए मनुष्य का शम अर्थात शांति धारण कर लेना परमात्मप्राप्ति में कारण कहा गया है |

          इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि कर्म आपको समत्व तक अवश्य ले जाते हैं परन्तु कर्म करने की ओर से शांत हो जाना अर्थात कुछ करने से सम्बन्ध तोड़ लेना ही आपको परमात्मा की प्राप्ति कराएगा | स्वामीजी कहते हैं कि कर्म करने का सम्बन्ध प्रकृति से है और प्रकृति के साथ सम्बन्ध रखने से आपका सम्बन्ध क्रिया से बना रहेगा | परमात्मा अक्रिय है जबकि प्रकृति क्रियाशील है | क्रियाशील से समता को तो प्राप्त किया जा सकता है परन्तु परमात्मा को नहीं | अक्रियता से अक्रिय प्राप्त हो जायेगा | व्यवसाय को सहज कर्म मानते हुए उससे सम्बन्ध विच्छेद नहीं करेंगे तो परमात्मा से दूरी ही बनी रहेगी | इस प्रकार स्पष्ट है कि परमात्मा को पाने के लिए अक्रिय होना आवश्यक है | अतः व्यापार को कर्तव्यकर्म मानकर करते रहने को वानप्रस्थ में उचित नहीं ठहराया जा सकता |

         आइये ! अब  पुनः चलते हैं श्री मद्भगवद्गीता की ओर, जिसमें संजय-धृतराष्ट्र के मध्य वार्तालाप हो रहा है | दूसरे अध्याय में आगे अब संजय अपने राजा को कहते हैं कि अपने अनुसार बहुत सी धर्मयुक्त बाते कहकर अर्जुन श्री कृष्ण के सामने दुखी होकर खड़े हो गए हैं | तब श्री कृष्ण असमय इस मोह के आ जाने का कारण अर्जुन से पूछते हैं और साथ ही कहते हैं कि आसन्न युद्ध के समय तुम्हारे द्वारा ऐसा व्यवहार करना उचित नहीं है | तब अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण, जो कि उनका सखा है, का शिष्यत्व स्वीकार कर उनकी शरण ले लेता है | भले ही 18 अध्यायों तक गीता चलती हो परन्तु गंभीरता से देखें तो अर्जुन दूसरे अध्याय में ही परमात्मा की शरण ले लेता है | अंततः भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को भलीभांति समझा कर  18 वें अध्याय के 66 वें श्लोक में उसको शरणागत होने का कह देते हैं |

         युद्ध के प्रारम्भ होने से पहले ही अर्जुन में ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः’, अर्जुन में कृपणता रुपी दोष आ गया है | कृपण कौन है ? कृपण वह है जो सब कुछ होते हुए भी अपने पास में कुछ भी होना नहीं मानता अर्थात वह कंजूस होता है | कंजूस प्रायः कायर भी होता है।अर्जुन के पास युद्धभूमि में आने से पहले पराक्रम के रूप में सब कुछ था | अपने समय का वह विश्व का एक मात्र श्रेष्ठ धनुर्धर था | अपने परिवारजनों को युद्ध में खड़ा देखकर अर्जुन मोह के कारण युद्ध से हटने का मन बना रहा है | युद्धभूमि में आज उसकी निर्बलता ही उसका कृपण स्वभाव बन गयी है | इस कृपणता का कारण है कि वह अपनी वास्तविक क्षमता को विस्मृत कर चूका है |

      ‘पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः’- यहाँ भी अर्जुन धर्म के विषय में मोहग्रस्त है | मोह के कारण 'धर्म क्या है और अधर्म क्या है', इस बारे में वह सही निर्णय नहीं कर पा रहा है | ‘यच्छ्रेय स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’- अर्जुन भगवान् को पूछ रहा है कि मेरे लिए जो भी साधन उचित हो, कल्याणकारी हो, वह कहिये | ‘शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’- यहाँ आकर शरणागत हो गया है अर्जुन और भगवान् श्री कृष्ण का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया है | यहाँ अर्जुन भगवान् के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाते हैं | इसी प्रकार गुरु के सामने समर्पित होने पर धर्म के बारे में हमारे भी सारे द्वंद्व मिट जाते हैं |

       अर्जुन का दूसरे अध्याय में जो भगवान् के प्रति समर्पण भाव है, वह विपरीत और द्वंद्वात्मक परिस्थितियों में हुआ है | अन्तिम अध्याय में जब वे कहते हैं कि ‘करिष्ये वचनं तव’, तब उनका निर्द्वंद्व अवस्था में आकर परमात्मा को किया हुआ समर्पण है | दूसरे अध्याय में अर्जुन धर्म के सम्बन्ध में मोहित है, जबकि अंतिम अध्याय में वह 'धर्म के आश्रय' को युद्धभूमि के एक कोने में रख चूका है अर्थात धर्म-अधर्म के बारे में कोई विचार तक नहीं कर रहा है | वास्तव में देखा जाये तो धर्म ही कर्म है और कर्म का आश्रय वही व्यक्ति लेता है जिसको भगवान् से अधिक स्वयं की क्षमता, स्वयं के करने पर अधिक विश्वास होता हो अन्यथा जीवन में कर्म तो सभी करते ही हैं | परन्तु जब परिस्थितियां बदलती है तब वह वैसे ही मोहित हो जाता है, जैसा कि अर्जुन अपने सगे सम्बन्धियों को युद्धभूमि में अपने सामने खड़ा देखकर हुआ था |

         स्वयं की क्षमता पर विश्वास करना किसी भी प्रकार अनुचित नहीं है | अनुचित है केवल स्वयं की शक्ति पर ही विश्वास रखना | यह अहंकार की स्थिति है | तीनों लोक पर अधिकार कर लेने के बाद दैत्यराज बलि के साथ भी तो यही हुआ था।परमात्मा के शरणागत होकर, सब कुछ उन पर छोड़ देना ही मनुष्य को अहंकार से मुक्त रख सकता है |

           ‘स्व-कर्म’ का आश्रय ही धर्म का आश्रय है | इसलिए गीता में भगवान् कहते हैं कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ अर्थात हे अर्जुन ! जिसे तू ‘धर्म-धर्म’ कहकर व्यथित हो रहा है, उसका आश्रय छोड़ दे और एक मेरी शरण में आ जा | मेरी शरण में आने के बाद जिसको तू अधर्म अर्थात पाप कह रहा है, वह तुझे तनिक सा भी छू न सकेगा | फिर भी तुम्हें जरा सा भी संदेह है कि इन सभी को मारने से तुम्हें पाप लगेगा तो यह मान ले कि मेरी शरण में आये को मैं सभी पापों से मुक्त कर देता हूँ | इस प्रकार सारी गीता का सार ही एक परमात्मा की शरण में चले जाना है | सभी धर्म-अधर्म और कर्म आदि तभी तक प्रभावशाली प्रतीत होते हैं, जब तक हम परमात्मा की शरण नहीं होते | शरण होने के बाद न तो कोई पाप आपको प्रभावित कर सकता है और न ही धर्म | ऐसे में कर्ताभाव से कर्म करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता |

             गीता में अर्जुन का भगवान् का शिष्यत्व ग्रहण कर उनकी शरण में चले जाने का कारण ही धर्म है | धर्म-अधर्म के द्वंद्व के कारण ही तो अर्जुन मोहग्रस्त हो गया था | इसीलिए धर्म-अधर्म के बारे में विभिन्न कोणों से भगवान् को ज्ञान देना पड़ा | सांख्य-योग से प्रारम्भ किये गए ज्ञान को अंततः सभी धर्मों के आश्रय के त्याग तक ले जाना पड़ा | ज्ञान-योग नहीं कहते तो अर्जुन की मोहग्रस्त हुई बुद्धि में कोई बात तनिक सी भी नहीं घुसती | कर्म योग इसलिए कहना पड़ा क्योंकि धर्म का आधार कर्म है और कर्म से विमुख व्यक्ति स्वयं का पतन ही करता है | जब जीवन में कर्म करने आवश्यक है, तो फिर क्यों न परमात्मा को समर्पित होकर कर्म किये जाएँ |

           प्रत्येक कर्म को करने में कामना की मुख्य भूमिका होती है, जो जीवन में किसी की भी पूरी नहीं होती | मन ही उस कामना के पीछे एक मात्र कारण होता है | उस मन पर नियंत्रण करने के लिए आत्मसंयम योग भी अर्जुन को भगवान् ने बतलाया है | ज्ञान विज्ञान योग में इस सृष्टि के सृजन को भगवान् ने स्पष्ट किया है और दिव्य दृष्टि प्रदान करते हुए अपने विश्वरूप दर्शन कराने की अवस्था तक अर्जुन को ले कर गए हैं |

        जब अर्जुन की बुद्धि ज्ञान को ग्रहण करने की अवस्था में आ गयी तब भगवान् ने प्रकृति और पुरुष का ज्ञान भी दिया जो अक्षर-ब्रह्म योग, राज विद्या राज गुह्य योग, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ योग से होता हुआ पुरुषोत्तम योग तक चलता गया | बीच में भक्ति योग भी अर्जुन को कहा है जिसमें बताया गया है कि कौन से लक्षणों से युक्त भक्त भगवान् को प्रिय होते हैं | सभी विषयों पर ज्ञान देते हुए भगवान् अंततः अर्जुन को कह देते हैं कि इतना सब कुछ जानकर भी सबसे महत्वपूर्ण एक बात सदैव ध्यान में रखना - "सब कुछ जान जाने का अहंकार न रखकर एक मेरी शरण में आया व्यक्ति ही कभी भी बार-बार मोहग्रस्त नहीं होता |" कितना ही जान लो, उस एक को जाने बिना सब जानना व्यर्थ है | धर्म-कर्म तब कोई मायने नहीं रखते हैं, जब आप परमात्मा की शरण लेकर कर्म करते हैं |

        गीता का प्रारम्भ धृतराष्ट्र ने ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ कह कर किया है और संजय से युद्ध का प्रतिपल का विवरण चाहा है | इसी प्रकार अर्जुन ने भी भगवान् श्री कृष्ण को अपना गुरु मानते हुए उनकी शरण होकर ‘धर्मसम्मूढचेताः’ कहते हुए ज्ञान चाहा है | दोनों ने ही ‘धर्म’ का नाम लिया है | एक ओर राजा है जो अपने पुत्र मोह में अँधा होकर उस बात की कामना कर रहा है जोकि उसके लिए पूरी होना संभव नहीं है | दूसरी ओर अर्जुन है जो युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अपने सगे सम्बन्धियों के मारे जाने को लेकर, धर्म-अधर्म का विचार कर मोहग्रस्त हो रहा है | इस प्रकार दोनों के साथ ही मोह रुपी बंधन है, जिसमें बंधकर वे इस संसार में उलझे हुए हैं |

        संसार की इस उलझन को सुलझाने का बीड़ा भगवान् ने उठाया है | एक तरफ संजय के पास दिव्य दृष्टि है, जिसके माध्यम से राजा धृतराष्ट्र को युद्ध का हाल सुनाया जा रहा है और दूसरी तरफ अर्जुन है जिसको दिव्यदृष्टि भगवान् ने दी है और वह उस दृष्टि का उपयोग ज्ञान प्राप्त करने में कर रहा है | लेकिन धृतराष्ट्र और अर्जुन, दोनों में इस दिव्यदृष्टि का उपयोग कर पाने में भिन्नता है | संजय की दिव्यदृष्टि राजा के लिए थी, जिसका सदुपयोग उनको करना चाहिए था | धृतराष्ट्र भी धर्म की बात कर रहे हैं कि कुरुवंश का वरिष्ठ पुत्र होने के बाद भी जन्मांध होने के नाम पर कभी पूर्व में उसका यह अधिकार उससे छीन लिया गया था | पुत्र मोह होते हुए भी वह युद्ध को टालने में विश्वास तो करता है परन्तु स्वयं इसके बारे में अपने स्तर पर किसी प्रकार का प्रयास नहीं करता | वह तो अर्जुन के हथियार डालकर रथ के पीछे के भाग में बैठ जाने से बड़ा प्रसन्न होता है कि अब यह युद्ध नहीं होगा | इधर युद्ध भूमि में अर्जुन भी धर्म की बात कर रहा है | वह भी युद्ध नहीं करना चाहता क्योंकि उसके सम्बन्धी और मित्र के मारे जाने को वह स्वीकार नहीं कर सकता | जबकि सत्य यह है कि आज तक कोई भी युद्ध बिना नरसंहार के कभी समाप्त नहीं हुआ है और न ही कभी भविष्य में होगा |

      सम्पूर्ण गीता धर्म-कर्म का विवेचन करते हुए अंततः इस बात पर आकर अपना समापन करती है कि धर्म-कर्म का आश्रय लेने से भी कोई लाभ नहीं होना है | मनुष्य को केवल एक परमात्मा का आश्रय ही स्वीकार करना चाहिए जिसके आश्रय से बड़ा और कोई आश्रय नहीं है | परमात्मा की शरण में चले जाने पर आपके सभी कार्य देखना, केवल उस एक के अधिकार क्षेत्र में आ जाता है | फिर जैसा और जो भी उसने आपको दिया है, वह प्रसाद मानकर ग्रहण कर लेना चाहिए अर्थात जिस स्थिति में भी परमात्मा आपको रखे, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए |

           धर्म से प्रारम्भ हुई गीता उस धर्म का भली-भांति विवेचन करते हुए जब समाप्त होती है तब उस ज्ञान को किसने किस प्रकार लिया ? यह जान लेना भी आवश्यक है | गीता सीधे तौर पर भगवान् के द्वारा अर्जुन को कही गई और  धृष्टराष्ट्र को सुनाने के लिए माध्यम बना संजय । इस प्रकार गीता कही गयी भगवान के द्वारा और इसको सुनने वाले तीन व्यक्ति थे – अर्जुन, संजय प्रत्यक्षतः और परोक्ष रूप से धृतराष्ट्र | युद्धभूमि में दोनों ओर अठारह अक्षौहिणी सेना खड़ी थी, युद्ध के लिए तत्पर | इन तीन के अतिरिक्त किसी और ने गीता क्यों नहीं सुनी ? जबकि इसे सुनने केलिए किसी को प्रतिबंधित नहीं किया गया था। सबकी दृष्टि युद्ध के प्रारम्भ होने पर लगी हुई थी, इसलिए किसी का ध्यान इस ओर तनिक भी गया ही नहीं कि युद्धभूमि में दोनों सेनाओं के मध्य खड़े अर्जुन और श्री कृष्ण आपस में किस विषय पर बात कर रहे हैं ? कल्पना कीजिये कि सभी ने युद्धभूमि में गीता ज्ञान को सुन लिया होता तो क्या युद्ध होता ? प्रश्न आपके विचारार्थ छोड़े जा रहा हूँ, उत्तर जानने का प्रयास कीजिये |

         धृतराष्ट्र ने इस गीता-ज्ञान को कोई महत्त्व नहीं दिया क्योंकि वे प्रारम्भ से ही श्री कृष्ण के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त थे | यह उनकी सोच थी कि श्री कृष्ण पांडवों का पक्ष ले रहे है | जब आप पूर्वाग्रह से ग्रस्त होते हैं तब कोई भी ज्ञान आपको प्रभावित नहीं कर सकता | पूर्वाग्रह से ग्रस्त व्यक्ति को अगर भगवान् स्वयं भी ज्ञान देने आ जाये तो वह उनकी भी एक न सुनेगा | अर्जुन ने उस ज्ञान को आत्मसात किया था परन्तु कब तक ? हाँ, युद्धभूमि में अवश्य ही उसने इस ज्ञान का सदुपयोग किया था |

      गीता ज्ञान को ध्यान से सुना - अर्जुन के साथ-साथ संजय ने भी | मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि संजय ने उस ज्ञान को अर्जुन से अधिक सही अर्थ में लिया क्योंकि उसकी जिम्मेवारी इस बात की अधिक थी कि वह धृतराष्ट्र को युद्धभूमि की पल-पल की सत्य जानकारी उपलब्ध कराएगा | इसलिए संजय ने अधिक ध्यान देकर इस ज्ञान को सुना | हाँ, युद्ध के परिणाम के बारे में संजय प्रारम्भ में संशयग्रस्त अवश्य ही था, तभी तो वह युद्धभूमि में दस दिन तक युद्ध देखता रहा | जब महाप्रतापी भीष्म शर-शैया पर आ गए तब उनको सहज ही विश्वास हो गया कि युद्ध का परिणाम किस ओर जाने वाला है ? उसको तत्काल ही वह बात स्मरण हो आई जोकि युद्धभूमि के मध्य में भगवान् ने उस दिन युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व ही अर्जुन को कही थी । वह महत्वपूर्ण बात थी- ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’। भगवान अर्जुन को कह रहे थे कि ये सभी योद्धा पूर्व में ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं इसलिए तू तो केवल इनको मारने में निमित्त मात्र बन जा |

        संजय को इस बात पर उस समय तो विश्वास नहीं हुआ था परन्तु जब 10 वें दिन महाप्रतापी भीष्म, बाणों की शैया पर आ गए तब वह समझ चूका था कि युद्ध का परिणाम तो पाडवों के पक्ष में ही जा रहा है | तत्काल ही वह युद्धभूमि छोड़कर वहां से राजमहल लौट आया । आते ही पहले तो उसने 10 दिनों का हाल सुनाया और फिर युद्ध समाप्त होने तक का |

       संजय समझ चूका था कि धर्म-कर्म की बात करने वाले भले ही महान योद्धा हों परन्तु जिसके साथ परमात्मा होते हैं, अंततः जीत उसी की होनी निश्चित है | ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ से प्रारम्भ होने वाली गीता संजय की इसी भविष्यवाणी के साथ समाप्त होती है कि -

      यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः |

      तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ||18/78||

    संजय कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर श्री कृष्ण है और जहां धनुर्धर अर्जुन है, वहीँ पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है-ऐसा मेरा मत है | अपना मत वही दे सकता है जिसने ज्ञान को बड़ी लगन के साथ सुना हो और जिसने परमात्मा को पहिचान लिया हो |

            युद्धभूमि में जाने से पहले क्या भीष्म नहीं जानते थे कि श्रीकृष्ण ही परमात्मा हैं ? भीष्म ने श्रीकृष्ण को बहुत पहले ही जान लिया था कि ये साक्षात परमात्मा हैं फिर भी वे स्व-धर्म के आधार पर कौरवों के साथ खड़े रहे। कौरवों के साथ खड़े रहने का कारण उनका स्वार्थ नहीं था बल्कि अपने पिता शान्तनु को दिए गए वचन के कारण वे हस्तिनापुर राज्य के सिंहासन से बंधे हुए थे। जब तक राज्य पर संकट था, तब तक उसकी रक्षा करना उनका कर्तव्य कर्म था। सतही तौर पर देखें तो भीष्म पितामह का यह निर्णय उचित जान पड़ता है परंतु अपने पिता को दिए केवल एक वचन की आड़ में उन्होंने  सत्य-धर्म की अनदेखी भी की। भरी राजसभा में उनके सामने द्रोपदी का चीरहरण होता रहा और वे विवश होकर सब कुछ देखते रहे। 

        युद्धभूमि में अर्जुन ने भगवान को पहिचान लिया था और पहिचानते ही वे शरणागत की मुद्रा में आ गए। युद्ध प्रारम्भ होने से पहले भले तो वे धर्म-अधर्म में द्वंद्वग्रस्त होकर समर्पित हुए थे परंतु अंततः ज्ञान प्राप्त कर वे निर्द्वन्द्व होकर परमात्मा की शरण हो गए थे। शरण तो भीष्म भी ले सकते थे परंतु अपने कर्तव्य-कर्म को अपना धर्म मानते हुए उन्होंने उसे परमात्मा पर वरीयता दे दी थी। परमात्मा को पाना है और कर्तव्य कर्म को भी निभाना है, तो ऐसी द्वंद्वात्मक अवस्था में परमात्मा के प्रति समर्पण को वरीयता देनी चाहिए। युद्ध मनोयोग से भीष्म भी लड़े लेकिन फिर भी वे राज सिंहासन की रक्षा न कर सके । 

         सारा खेल परमात्मा का है, वे चाहेंगे तभी आपके वचन की रक्षा होगी, वे चाहेंगे तभी आपके धर्म की रक्षा होगी। अतः अपने कर्मों का आश्रय न लेकर उस एक के प्रति समर्पित हो जाएं, उनकी इच्छा में अपनी इच्छा मिला दें फिर सब कुछ सही ही होगा। 

सार संक्षेप -

       कर्म हमारा धर्म निर्धारित करता है और फिर उस धर्म के आधार पर हम कर्म करते हैं। प्रत्येक वर्ण और आश्रम का धर्म पूर्व निर्धारित  है जिसका निर्धारण हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने गहन शोध करके किया है। धर्म का अर्थ है, कर्तव्य कर्म। जो कर्म हमारे वर्ण और आश्रम के अनुसार करने निश्चित है, उनको करने से ही हम सही राह पर चल सकते हैं।आज के युग मे हम अपने वर्ण और आश्रम व्यवस्था को तिलांजलि देकर दूसरे प्रकार के ही कर्मों को करने में उलझ गए हैं।इसी का परिणाम जीवन में असंतोष और दुःख के रूप में सामने आ रहा है।

       द्वंद्व की स्थिति में हमें इन कर्तव्य कर्मों के आश्रय को छोड़कर एक परमात्मा का आश्रय ले लेना चाहिए, फिर हम निर्द्वन्द्व होकर अपने कर्म भलीभांति कर सकते हैं।

          श्रृंखला का सारांश यह है कि एक परमात्मा की शरण ले लेने के बाद धर्म-कर्म की बात करने का कोई औचित्य नहीं रह जाता है | जिसने भी परमात्मा का आश्रय लिया है, वे धर्म मार्ग पर ही चलेंगे यह भी निश्चित है | उनसे कोई अधार्मिक कर्म जीवन में कभी हो ही नहीं सकता | इसलिए परमात्मा की शरण लेकर पूर्ण रूप से धार्मिक हो जाएँ और पाप-पुण्य की चिंता छोड़ दें |

     इसी के साथ यह श्रृंखला समाप्त होती है। आप सभी का साथ बने रहने के लिए आभार।

प्रस्तुति –डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, July 19, 2022

 धर्म क्या है ? कर्म क्या है ? धर्म के अनुसार कर्म निर्धारित किये गए हैं अथवा कर्म से धर्म का निर्धारण हुआ है ? सनातन संस्कृति में प्रत्येक कर्म को धर्म अथवा अधर्म से जोड़ा गया है।धर्म पुण्य का द्योतक है तो अधर्म पाप का। पुण्य का परिणाम स्वर्ग और सुख की प्राप्ति है तो पाप का परिणाम नरक और दुःख भोगना है। 

    बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से कर्मों को दो श्रेणियों में हमारे ऋषि-मुनियों ने बांटा है । इसी वैज्ञानिक आधार पर वर्ण, आश्रम आदि के धर्म निर्धारित किये गए हैं। धर्माचरण करते हुए कैसे व्यक्ति अपने गुणों में सुधार करते हुए सत्व की अवस्था तक पहुंच सकता है और फिर कैसे वह गुणातीत होकर परमात्मा तक पहुंच जाता है, बड़ी ही सरलता से इस बात को हमारे पूर्वजों ने परिभाषित किया है। और अंत में जब परमात्मा की शरण में जाने की बात आती है तो फिर धर्म का आश्रय पीछे छोड़ देना पड़ता है और पाप-पुण्य की सोच से भी मुक्त हुआ जा सकता है। है न आश्चर्य की बात ! धर्म-कर्म हमें तभी तक नचाते हैं, जब तक हम उनके आश्रय में अपना सुख खोजते हैं अन्यथा जीवन के आनंद के लिए तो केवल उस एक का आश्रय ही पर्याप्त है।

   धर्म-कर्म पर संक्षिप्त विवेचन के लिए हम कल मिलते हैं - "धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे" विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए।

प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल 

।। हरि:शरणम्।।

Monday, June 27, 2022

ते न परहिं भवकूपा

 ते न परहिं भवकूपा 

       मनुष्य भी अजीब प्राणी है | संसार के सभी जीवों का एक निश्चित जीवन होता है परन्तु मनुष्य अपने जीवन में कई उतार चढाव देखता है | अमीबा इस संसार का सबसे छोटा जीव है, क्षुद्र जीव है | केवल एक कोशिका में उसका सम्पूर्ण जीवन सिमट कर रह जाता है | अमीबा के अतिरिक्त शेष सभी प्राणियों के शरीर बहुकोशीकीय होते हैं और मनुष्य शरीर तक आते आते तो शरीर की रचना करोड़ों कोशिकाओं के कारण बहुत अधिक जटिल हो जाती है | यह जटिलता ही मनुष्य के जीवन को उलझाकर रख देती है | जो इस उलझन से बाहर निकलना जान गया, समझो उसने अपना कल्याण कर लिया | बहुधा लोग तो इस शरीर के दायरे से भी बाहर निकल नहीं पाते |

             बात को एक कहानी से प्रारम्भ करते हैं | बचपन में आधारभूत शिक्षा प्राप्त करते समय यह कहानी पढ़ी थी | एक कुआं था जिसमें मेंढकों का एक परिवार रहा करता था | एक दिन कुएं से जल निकालने के लिए आयी बाल्टी में जल के साथ एक मेंढक भी चला गया | बाल्टी में जल के साथ वह मेंढक भी कुएं से बाहर निकल आया | कुएं से बाहर के संसार को देखकर उस मेंढक को बड़ा अचरज हुआ | उसने आज से पहले कुएं के सीमित संसार के अतिरिक्त कुछ देखा भी नहीं था | वह फुदकते फुदकते चारों ओर के संसार को आश्चर्य से देख रहा था | यकायक उसे अपने कुएं के संसार का ध्यान आया | वह लौट चला उस कुएं की ओर, अपने साथियों को बाहर के संसार के बारे में बताने के लिए | कुएं के पास आकर उसने एक लम्बी छलांग लगाई और पुनः अपने संसार में लौट आया |

          कुएं में लौटते ही मेंढकों की भीड़ ने उसे चारों ओर से घेर लिया | उसको सभी मेंढक आश्चर्य से देख रहे थे | तभी उस मेंढक समुदाय का मुखिया जो कि अपने आपको सबसे बड़ा ज्ञानी समझ रहा था, उसके पास आया | बाहर के संसार को देखकर आया मेंढक अपने मुखिया को बाहर के संसार की असीमता (एक मेंढक के लिए तो कुएं से बाहर का संसार असीम ही है) के बारे में समझाने लगा | अहंकार में डूबा मुखिया बार-बार अपने शरीर में पहले से अधिक वायु भरकर उस मेंढक से बाहर के संसार की विशालता से तुलना करने को कहता |

         मुखिया मेंढक प्रत्येक बार पहले से अधिक हवा को अपने शरीर में भरता गया और प्रत्येक बार वह मेंढक इंकार करते हुए कहता रहा कि नहीं, बाहर का संसार आपके इस बढे हुए शरीर से भी बहुत बड़ा है | आखिर मेंढक के शरीर की भी स्वयं को विस्तारित करने क्षमता होती है | शरीर की क्षमता से अधिक वायु भर लेने के कारण उस मुखिया का शरीर फट गया | यह देखकर सभी मेंढक भयभीत होकर बाहर के संसार की विशालता की कल्पना करते हुए डर गए | अपने मुखिया की मृत्यु से भयभीत होकर एक भी मेंढक बाहर के संसार को देखना नहीं चाहता था | सभी मेंढक उस कुएं के संसार को ही अपना भविष्य मान कर उसमें ही संतुष्ट रहने लगे | एक भी मेंढक उस कुएं से बाहर के संसार को देखने के लिए आतुर नहीं था परंतु एक मेंढक जिसने एक बार कुएं से बाहर का संसार देख लिया था, वह बाहर जाने को बड़ा आतुर था | प्रत्येक मेंढक उसे कुएं से बाहर न निकलने के लिए समझा रहा था फिर भी वह सदैव उस कुएं से बाहर निकलने का प्रयास करता रहा | अंततः एक दिन उसको अवसर मिल ही गया | जल भरने के लिए कुएं में उतरी एक बाल्टी में छलांग लगाकर बैठ गया और कुएं से बाहर निकल गया |

              इस कहानी के कुएं के मेंढकों की तरह ही इस संसार में प्रायः मनुष्य जी रहे हैं | किसी के मन में भी इस सांसारिक कुएं से बाहर निकलने की इच्छा नहीं है | अगर कोई कोई बाहर निकलने का प्रयास भी करता है तो उसको या तो बीच रास्ते से ही पुनः इस संसार में अन्य लोग लौटा लाते हैं या फिर वह स्वयं ही अनिश्चितता के कारण लौट आता है | हम सब कूप मंडूक बने बैठे हैं | इस संसार से बाहर की कभी-कभी कल्पना अवश्य कर लेते हैं परन्तु इससे बाहर निकलने का पूर्ण प्रयास कभी नहीं करते | गोस्वामीजी मानस में कहते हैं कि संसार रुपी इस भवकूप से केवल बाहर निकलना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि पुनः इस भवकूप में आकर न गिरना सबसे महत्वपूर्ण है | इस संसार में कौन मनुष्य ऐसा है जो इस सांसारिक कुएं से बाहर निकलने का प्रयास करते हुए पुनः इस कुएं में नहीं गिरता ? दुबारा इस संसार में न आने के लिए हमें प्रयास करना होगा | इसके लिए हमें क्या करना चाहिए और हम वैसा क्यों नहीं कर पाते हैं, वह जानना अधिक आवश्यक है | इस बात पर हम चिंतन करेंगे हमारी इस नयी श्रृंखला “ते न परहिं भवकूपा” में । 

       श्रीमद्भागवत महापुराण में इस संसार को भगवान् का आदि-अवतार कहा गया है | ऐसा कहने का अर्थ हुआ कि यह संसार जिससे हम बाहर निकलकर पुनः लौटना नहीं चाहते, वह भगवान् का ही रूप है | जब यह संसार परमात्म-स्वरुप है तो फिर ऐसे कौन से कारण है कि हमारा इस संसार से बाहर निकलने का एक बार नहीं कई-कई बार मन करता है | हम सब इस संसार में आकर दुःख को प्राप्त हुए हैं, यह संसार दुखालय है | भगवान् का प्रथम अवतार है तो फिर भला यह संसार दुखालय कैसे हो सकता है ? संसार भगवान् का आदि-अवतार है, इसका अर्थ हुआ कि फिर हम भी भगवान् के ही अंश हैं | सही बात तो यह है कि हमारी सोच ने इस संसार को दुखालय बना दिया है अन्यथा भगवान् की कोई भी कृति दुखपूर्ण अथवा दुखदायी नहीं है | भगवान् स्वयं सच्चिदानंद है और हम भगवान् के अंश होने के कारण हम भी चिदानंद है | स्वयं के आनंद स्वरुप होने के बाद भी इस संसार में हमें दुःख क्यों भोगने पड़ रहे हैं ? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें अपनी दृष्टि सृष्टि के निर्माण की ओर ले जानी होगी |

        श्रुति कहती है –“सोSकामयात | बहुस्याम् प्रजायेयेति | स तपोSतप्यत | स तपस्तप्त्वा | इदं सर्वमसृजत ||”(तैत्तरीयोपनिषद-2/6/4) अर्थात परमात्मतत्व ने आदिकाल में कामना की - “मैं अपनी  प्रजा के जन्म हेतु बहुरूप हो जाऊं |” अतः उन्होंने स्वयं को पूर्णरूप से एकाग्र किया और अपने चिंतन की शक्ति से तथा तप से उसने समस्त ब्रह्मांड की सृष्टि की | आगे श्रुति कहती है सृजन के पश्चात् वह उसमें प्रवेश कर गया | प्रविष्ट होकर यहाँ वह “है” (सत) बन गया तथा वहां संभाव्य (कल्पनीय, probable)बन गया |  इस प्रकार दो बन कर वह अनिरुक्त (अनिर्वचनीय) और निरुक्त(निर्वचनीय), बन गया, वह निलयन अर्थात आवासभूत तत्व तथा अनिलयन अर्थात आवासरहित तत्व बन गया | वही ज्ञान बन गया और वही अज्ञान भी बन गया | वही सत्य भी बन गया और वही अनृत (असत्य) भी बन गया | अल्प शब्दों में इन दो अंशों को प्रकृति और पुरुष भी कहा जा सकता है | इस प्रकार दो दिखलाई पड़ते हुए भी वह एक ही है | वह सम्पूर्ण सत्य है, जो कुछ भी विद्यमान है वह सब कुछ ‘वही’ बन गया | इसीलिए ‘उसके’ विषय में कहा जाता है कि वह ‘सत्य-स्वरुप’ है |

              ‘एकोहं बहुस्याम’ (छान्दोग्योपनिषद्) अर्थात भगवान् ने मन में कामना की कि मैं एक हूँ, मैं एक से अनेक होना चाहता हूँ | क्यों चाहा भगवान् ने एक से अनेक होना ? जीवन में अकेला बैठा व्यक्ति चिंतन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर सकता और फिर चिंतन की भी तो अपनी एक सीमा होती है | जिस विषय पर चिंतन की आवश्यकता होती है, उस आवश्यकता के समाप्त होते ही चिंतन भी स्वतः ही समाप्त हो जाता है | जीवन में चिंतन अपना एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है | साथ ही यह भी सत्य है कि केवल चिंतन ही करते रहने से मनुष्य एकाकी और रूखा सूखा स्वभाव का हो जाता है, जैसा कि एक ज्ञानी के साथ होता है | दो होकर, आपस में एक दूसरे से प्रेम करते हुए ‘एक’ हुआ जा सकता है | इसी को आनंद की अवस्था कहते हैं | जीवन में प्रफ्फुलित रहने के लिए आनंद का होना आवश्यक है और यह आनंद एक के अकेले रहने से उपलब्ध नहीं हो सकता | आनंद उठाने के लिए भी कम से कम एक से दो होना आवश्यक है |

            उपरोक्त श्रुति के अनुसार परम पिता भगवान् ने अपने में ही अपने आपको दो में विभाजित किया – प्रकृति और पुरुष | कामना के कारण उन्होंने पुर का निर्माण किया और उस पुर में प्रवेश कर पुरुष कहलाये | यह पुरुष प्रकृति से घिरा रहता है, जिसे माया भी कहा जाता है | फिर सृष्टि का विस्तार हुआ और वह विस्तार अभी भी अनवरत हो रहा है | ये अलग अलग दो न होकर एक में ही दो हुए हैं | इस प्रकार कहा जा सकता है कि एक से दो होकर ही भगवान् आनंद में डूब सके | अकेले तो वे केवल सत्य थे और चैतन्य स्वरुप थे परन्तु सच्चिदानंद स्वरुप को उपलब्ध होने के लिए उन्हें एक से दो होना पड़ा | यहाँ इस बात को सदैव स्मरण में रखें कि वे एक से दो स्वयं में ही हुए हैं, स्वयं से बाहर नहीं |

         भगवान् जब एक से दो हो जाते हैं और इस धरा पर किसी रूप में (पुरुष) अवतरित होते हैं तब साथ में प्रकृति अर्थात माया भी शरीर ग्रहण करती है | राम के साथ सीता, कृष्ण के साथ राधा और शंकर के साथ गौरी का शरीर धारण करना इसी का उदाहरण है | राधा को तो भगवान् श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति तक कहा गया है, जिससे वे आनंद को उपलब्ध हुए हैं | चलिए ! भगवान् ने अपने आनंद के लिए दो स्वयं में बनाये । अब हम अपने द्वारा बनाये दो की ओर चलते हैं |

            पुरुष और प्रकृति, दो होकर भी दो नहीं है, साथ ही दोनों एक होते हुए भी क्रियाशीलता के स्तर पर एक दूसरे से भिन्न हैं | पुरुष अक्रिय है जबकि प्रकृति सक्रिय | प्रकृति की सक्रियता भी पुरुष की अक्रियता के कारण ही संभव होती है | इस बात का पुरुष को ज्ञान तो रहता है परन्तु जब पुरुष शरीर धारण करता है तब प्रकृति की सक्रियता देखकर उसके प्रति आकर्षित हो जाता है | प्रकृति में स्थित होकर पुरुष स्वयं के होने के ज्ञान को विस्मृत कर देता है | प्रकृति का चंचल होना उसका स्वभाव है | चंचल होते हुए भी प्रकृति उदासीन है | उदासीन होते हुए भी प्रकृति में आकर्षण होता है | उसके इस आकर्षण के कारण पुरुष का ज्ञान विस्मृत हो जाता है और वह स्वयं के मूल स्वरुप को भूल जाता है | उसे शरीर की इन्द्रियों से जो अनुभव होता है, उसे ही सत्य समझ लेता है और प्रकृति के आकर्षण में बन्ध जाता है | प्रकृति का आकर्षण उसे ऐसा अनुभव कराता है मानो वह स्वयं शरीर (प्रकृति) ही है | उसका ऐसा मान लेना ही सत प्रकृति को भी  असत बना देता है | वास्तव में सत से आयी प्रकृति असत है ही नहीं | उसको असत बना देता है पुरुष का उसके प्रति आसक्ति का भाव | इस अवस्था में अर्थात प्रकृति में स्थित हो जाने से उसे दुःख के अतिरिक्त जीवन में कुछ भी नहीं मिल सकता  क्योंकि वह स्वाधीन न रहकर प्रकृति के अधीन हो गया है | परमात्मा भी शरीर धारण करते हैं, फिर भी वे अपने सांसारिक जीवन में प्रकृति के अधीन नहीं होते बल्कि प्रकृति को अपने अधीन ही रखते हैं |

           परमात्मा जब अवतार लेते हैं, तब उनके शरीर में स्थित पुरुष को स्वयं के होने का ज्ञान विस्मृत नहीं होता | उन्हें सदैव यह ध्यान में रहता है कि वे अक्रिय हैं परन्तु फिर भी अपने देह काल में बाह्य रूप से अर्थात संसार के स्तर पर रहते हुए मनुष्योचित्त व्यवहार करते रहते हैं | व्यवहार रूप से परमात्मा में और साधारण मनुष्य में कोई भिन्नता नज़र नहीं आती परन्तु मानसिक स्तर पर वे एक साधारण मनुष्य से भिन्न बने रहते हैं | अवतार काल में कोई भी सांसारिक परिस्थिति उनको विचलित नहीं कर सकती | भगवान् श्री राम को जिस दिन राजतिलक होकर राज्य मिलना था, उसी दिन उनको वनवास मिला फिर भी वे विचलित नहीं हुए | न राज्य मिलने की बात सुनकर उन्हें ख़ुशी हुई और न ही वनवास मिलने पर उन्हें कोई दुःख हुआ | वनवास की अवधि में पत्नी सीता का अपहरण हो जाने पर वे विलाप करते हैं, उनकी इस दशा को देखकर सती को मोह हो जाता है | सती उनकी परिक्षा लेने के लिए सीता का रूप धरकर उनके पास जाती है परन्तु श्री राम उनको पहिचान लेते है | वे छद्म रूप से सीता बनी सती को पहिचान जाते हैं | वास्तव में देखा जाये तो उस समय पत्नी वियोग में उनका विलाप करना मात्र मनुष्योचित्त व्यवहार था | इस सांसारिक विपरीत परिस्थिति में भी वे ज्ञान-शून्य नहीं हुए थे, तभी तो उन्होंने सीता का रूप धरे सती को तत्काल पहिचान लिया था | हम तो छोटी सी बात पर ही ज्ञान-शून्य हो जाते हैं और विवेकशक्ति का विपरीत परिस्थितियों में उपयोग करने से चूक जाते हैं |

           प्रकृति में आकर्षण है परन्तु उसमें आकर्षित पुरुष ही होता है | संसार में हम जब शरीर धारण करते हैं तब उस शरीर के केंद्र में आत्मा स्थित होती है, परिधि पर हमारी इन्द्रियाँ और शरीर के बाहर रहते हैं, सभी इन्द्रियों के विषय | शरीर, इन्द्रियां और विषय सब प्रकृति के अंग है जबकि केंद्र में बैठी आत्मा ही वास्तव में परमात्मा है | शरीर के भीतर बैठी आत्मा के कारण हमारा शरीर उसके निकट है और शरीर के बाहर रहने वाले विषय-भोग उससे बहुत दूर | परन्तु प्रकृति के आकर्षण के कारण बाहर दिखने वाले विषय तो हमें निकट प्रतीत होने लगते हैं और केंद्र में बैठी आत्मा यानि परमात्मा को हम भूल जाते हैं | निकट लगने वाले विषय हमें सांसारिक भोगों में लगा देते हैं और उन भोगों को बार-बार भोगने के लिए हम अपना एक संसार बना लेते हैं | यह स्वनिर्मित संसार ही हमारे बंधन का कारण बनता है |

         स्वनिर्मित संसार से हमारा क्या आशय है ? एक तो वह संसार है जो परमात्मा ने बनाया है और दूसरा संसार वह है जो मनुष्य स्वयं बना लेता है | जिस प्रकार परमात्मा के बनाये संसार में परमात्मा की कोई आसक्ति नहीं रहती उसी प्रकार हमारी भी परमात्मा के द्वारा बनाये हुए संसार में कोई आसक्ति नहीं रहती | परमात्मा ने इतना विशाल जगत बनाया है जिसमें अनेकों ब्रह्मांड है | उस ब्रह्मांड में अनेकों सौर मंडल है | प्रत्येक सौर मंडल में अनेकों ग्रह है | इन ग्रहों में हमारी पृथ्वी भी एक है | इस पृथ्वी पर अरबों मनुष्य है, खरबों जीव जंतु और पेड-पौधे हैं | इनके अतिरिक्त सृष्टि के निर्जीव पदार्थ जैसे पहाड़, मरुस्थल, धातुएं आदि भी इस धरा पर परमात्मा ने सृजित किये हैं |

            इनमें से कौन अपना है और कौन पराया ? देखा जाये तो सभी अपने हैं क्योंकि सभी परमात्मा द्वारा निर्मित है | दूसरे शब्दों में कहूँ तो कहा जा सकता है कि सभी ब्रह्मांडों में एक परमात्मा ही उपस्थित हैं | परन्तु हम केवल आसक्त उन्हीं के प्रति हैं, जिनसे हमें सुख प्राप्त होने की सम्भावना नज़र आती है, जिनको हम भोग सकते हैं | हमारी अपनी कामनाओं की पूर्ति के जो भी माध्यम है, जिनके द्वारा हमें सुख मिलने की जरा सी भी सम्भावना नज़र आती है, हम उस साधन और उस माध्यम को अपना और अपने लिए मानकर उसमें आसक्त हो जाते हैं | ये साधन और माध्यम ही हमारा स्वनिर्मित संसार बनाते है |

          स्वनिर्मित संसार हमें परमात्मा से दूर कर देता है और हम अपने ही बनाये इस संसार में उलझकर बन्ध जाते है, उसके अधीन हो जाते हैं | यह पराधीनता हमें अपने स्वरुप से दूर ले जाती है | सुख की कामना हमें उस कर्म के प्रति आसक्त करती है, जिस कर्म को करने से ये भोग सुलभ होते हैं | जिस व्यक्ति या प्राणी अथवा माध्यम से हमें वे भोग मिल सके हैं/मिल सकते हैं, उस माध्यम को हम अपना और अपने लिए मान लेते हैं | विभिन्न प्रकार के भोगों की कामना हमसे कर्म करवाती है | जिस व्यक्ति के माध्यम से हमें भोग सुगमता से मिलने की सम्भावना होती है, उस व्यक्ति से हमारी एक अपेक्षा बन जाती है | जब अपेक्षा के अनुरूप उस व्यक्ति से सुख नहीं मिल पाता तब हमें दुःख पहुंचता है, और वही हमारा उससे द्वेष का कारण बनता है |

           कामनाएं किसी की भी एक जीवन में पूरी नहीं हो सकती | साथ ही यह भी सत्य है कि एक कामना पूरी होती है तो फिर दूसरी कामना पैदा हो जाती है | इस प्रकार अनेकों कामनाएं हमें अपने इस संसार में उलझा देती है और कामनाओं के जाल में जकड़े हुए हम एक शरीर से दूसरे शरीर में आते-जाते रहते हैं | इस प्रकार अपना बनाया संसार ही हमारे लिए वह कुआँ बन जाता है जिसमें हम बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं | परमात्मा का बनाया हुआ ही यह कुआँ है परन्तु परमात्मा इस कुएं के प्रति तनिक भी आसक्त नहीं है | वे तो इस भवकूप के बाहर बैठे, दृष्टा भाव से अपनी कृति में चल रही क्रियाओं का आनंद ले रहे हैं | वे कर्म नहीं करते बल्कि क्रियाओं के जनक हैं | क्रियाएं चलती रहती है और वे देखते रहते हैं | उनको न तो क्रियाओं के कारण कोई दुःख मिलता है और न ही सुख | वे प्रत्येक परिस्थिति में सम रहते है, निर्विकार रहते हैं |

             जिन्होंने इस संसार की रचना की है, वही रचियता इस संसार के अंग अंग में बसे हैं | उनके लिए सभी अपने हैं, फिर भी उनका न कोई अपना है और न कोई पराया | आसक्ति ही अपना और पराये का भेद करती है | जब पराया कोई नहीं है तो सभी अपने हुए | जब सभी अपने हैं तो फिर इस शब्द "अपना" का उपयोग करना ही व्यर्थ प्रतीत होता है | जब तक ‘मैं’ की उपस्थति है तब तक ‘तुम’ के भी उपस्थित होने की सम्भावना है | जब तक ‘मैं’ उपस्थित है, तब कोई कोई ‘मेरा’ भी अवश्य उपस्थित है, यह निश्चित बात है | इसलिए हमें विचार करना चाहिए कि इस ‘मैं’ और ‘मेरा’ के चक्र से कैसे बाहर निकला जा सकता है ? जब हम इस चक्रव्यूह को तोड़ देंगे तो फिर इस भवकूप में बार-बार नहीं गिरेंगे | ‘मैं’ और ‘मेरा’ को तोड़ डालना ही वह छलांग है, जो हमें इस भवकूप से बाहर निकाल देगी और हम जगत की वास्तविकता को समझ पाएंगे |

          संसार के सृजन का ज्ञान हो जाने के बाद हमें संसार में अपनी तात्कालिक स्थिति का अवलोकन करना होगा | हम किस दशा में रहते हुए इस संसार का सुख-दुःख क्यों झेल रहे हैं ? हमारी किनसे क्या अपेक्षाएं हैं और उनसे कैसे मुक्त हुआ जा सकता है ? हमारी कौन सी कामनाएं हैं, जो आज तक पूरी नहीं हुयी है ? हमने आज तक इस संसार से जो भी चाहा है क्या वह आज तक हमें मिल पाया है ? मिल गया तो वह कैसे मिला और नहीं मिला तो क्यों नहीं मिला ? क्या इन के मिलने अथवा न मिलने के पीछे मेरी अपनी कोई भूमिका थी ? कौन से कार्य ऐसे हैं जो आपने किये और अगर आप नहीं करते तो वे नहीं होते ? इनके अतिरिक्त भी अन्य कई प्रश्न और भी हो सकते हैं क्योंकि इस सांसारिक जीवन से असंतुष्ट रहने के कई कारण हो सकते हैं | अतः हमें इन सभी बातों और कारणों पर विचार कर स्वयं को इस संसार से बाहर निकालने के लिए तैयार करना होगा |  

          गंभीरता से विचार करने पर हम पाएंगे कि जीवन में हमारी व्यक्तिगत रूप से सुख-दुःख  मिलने में किसी भी प्रकार की कोई भूमिका नहीं रही | जब भी हम कोई कर्म करते हैं तो उसका फल मिलना निश्चित है | परन्तु सब कर्मों के फल हमारी इच्छानुरूप ही मिलें, यह निश्चित नहीं है | जब यह सत्य है तो फिर कामना पूर्ति के लिए कर्म करने में हमारी भूमिका ही कहाँ रह जाती है ? संसार में लाखों विषय-भोग बिखरे पड़ें है और वे आपको सुगमता से उपलब्ध तभी तक हैं जब तक आपके मन में उनको प्राप्त करने की कोई कामना नहीं है | सुगमता से उपलब्ध हुए विषय को एक बार जब आप भोग लेते है तब आपके भीतर उस विषय-भोग को फिर से पाने की कामना पैदा हो जाती है | उस कामना के वशीभूत होकर आप कर्म करते हैं | कर्म करने से जब वह भोग मिल जाता है तो आपकी उस कर्म के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है | इस प्रकार बार-बार ऐसा होने से विषय-भोग आपसे दूर जाने लगते हैं परन्तु आप इस बात को स्वीकार नहीं करते और फिर अपनी क्षमता से अधिक कर्म करते हुए उसे पाने का प्रयास करते हैं | एक अवस्था ऐसी आती है जब आप उस भोग को पर्याप्त कर्म करके भी प्राप्त करने में विफल हो जाते हैं | शरीर साथ छोड़ रहा होता है और भोग को भोगने की कामना अभी तक भी बलवती बनी हुई है | तो जाइए ! भोग चाहिए तो नए-नए शरीर लेते रहिये और कूपमंडूक बन जाइये | जन्म-जन्मान्तर से हमारी यही तो नियति बनी हुयी है |

           कूप मंडूक ? वह मेंढक जिसने एक छोटे से कुए को ही अपना संसार मान लिया और उसमें ही संतुष्ट है | इसी प्रकार मनुष्य ने भी अपना संसार रचकर उसको ही अपने जीवन का ध्येय  मान लिया है | उसे अपने संसार में जो सुख मिलता है, उसे ही जीवन में मिलने वाला चरम सुख मान लिया है | जीवन का आनंद क्या है ? इसको समझने के लिए संसार के चक्रव्यूह को तोड़कर उससे बाहर निकलना होगा | जब बाहर निकलोगे तब आपका बनाया यह संसार आपके लिए बेमानी हो जायेगा, अर्थहीन हो जायेगा | तब आप सोचेंगे कि इतने वर्ष जीवन के आपने व्यर्थ ही गँवा दिए |

           कुत्ता अनायास मिली सूखी हड्डी चबाते हुए सोचता है कि हड्डी बड़ी रसदार है | वह नहीं जानता कि जिसे वह रस समझ रहा है वह सूखी हड्डी चबाने के कारण उसके मुंह की झिल्ली से उसी का रक्त निकलकर उसे मिल रहा है | वह सुखकारी रस उसे स्वयं के रक्त से ही मिल रहा है | यही हाल मनुष्य के जीवन का है | जिसे वह संसार से मिलने वाला सुख समझ रहा है, वास्तव में वह उसके स्वयं का शोषण है जोकि संसार से सुख पाने के स्वार्थ के कारण हो रहा है | संसार के सभी सम्बन्ध स्वार्थ के सम्बन्ध हैं | बिना स्वार्थ के यहाँ कोई किसी को घास तक नहीं डालता और इधर हमारा यह हाल है कि ‘मेरा-मेरा’ कहते सबका मुख सूखा जा रहा है |

          जीवन के धरातल पर सब एक दूसरे के ऊपर तब तक आश्रित है जब तक एक दूसरे का स्वार्थ पूरा हो रहा है | जिस दिन स्वार्थपूर्ति की अपेक्षा समाप्त हो जाती है, फिर कोई किसी को नहीं पूछता | इसलिए संसार के सम्बन्धों को ‘मेरा-मेरा’ कहना छोड़ दो और एक परमात्मा का आश्रय ले लो, जिससे बड़ा आपका सम्बन्धी इस संसार में अन्य कोई नहीं है | संसार बंधन है और बंधन पराधीनता का प्रतीक है | मुक्त जीवन ही वास्तव में जीवन है | केवल शरीर को छोड़ देना ही मुक्ति नहीं है | शरीर तो रुग्ण और जीर्ण-शीर्ण होकर आपके न चाहने पर भी एक दिन स्वतः ही समाप्त जायेगा लेकिन मुक्ति फिर भी नहीं होगी | मनुष्य अपने जीवन में ही मुक्त होना चाहता है और हो भी सकता है परन्तु संसार के बंधन तोडना नहीं चाहता | ये बंधन स्वयं को ही तोड़ने पड़ते है क्योंकि आप स्वयं अपनी इच्छा से इस संसार के साथ बंधे है |

             मुक्ति का मार्ग कठिन नहीं है परन्तु संसार के बंधन तोड़ने में सबको भय लगता है | भय किस बात का ? जो जीवन में मिला है, उसके खो जाने का | इस शरीर के समाप्त हो जाने का भय अर्थात मृत्यु का भय | शरीर के समाप्त हो जाने के बाद इस संसार का क्या होगा ? आगे मुझे यह सब मिलेगा अथवा नहीं | याद रखें, परमात्मा द्वारा सृजित इस संसार में कभी भी कुछ भी नहीं खोता है | आपने जो भी जीवन में कामना की है, परमात्मा ने उस कामना को पूरा करने के लिये सब साधन बनाये हैं | परन्तु जब कामना ही आपकी अनुचित हो तो इसमें परमात्मा का क्या दोष ? आपने पत्नी मांगी परमात्मा ने आपको दे दी | आपने पुत्र मांगे, परमात्मा ने आपको दे दिए | धन माँगा, धन मिल गया | आपने कामनाओं को विस्तार दे दिया, परिवारजनों से अपेक्षाएं करने लगे, यह आपका संसार हो गया, अब यह परमात्मा के बनाये संसार से भिन्न हो गया | अब आपकी सभी अपेक्षाएं एक-एक कर टूटने लगी, आपको दुःख पहुंचा | धन का आपने सदुपयोग नहीं किया, धीरे-धीरे वह भी नष्ट होने लगा, आपको दुःख पहुंचा |

             जब तक आप परमात्मा के सृजित संसार के लिए जियेंगे, तब तक आपकी समस्त कामनाएं पूरी होगी क्योंकि यह शरीर संसार की सेवा के लिए ही मिला है | संसार की सेवा आपको आनंद देती है | जिस दिन आप स्वयं के स्वार्थ के लिए जीने लगेंगे, सुखी नहीं रह सकेंगे | स्वयं के लिए सुख चाहना ही संसार के साथ आपको बांधता है जबकि संसार की सेवा आपको मुक्त करती है | सेवा ही आपको परमत्मा की तरफ ले जाती है | इसलिए ‘मैं’, 'मेरा’ और ‘मेरे लिए’ के बंधन को तोड़ दो और मुक्त होकर जीओ | कबीर कहते हैं -

      मैं मेरे की जेवड़ी, गल बंधा संसार |

      दास कबीरा क्यूँ बंधे, जा के राम अधार ||

            ‘मैं और मेरा’ वह रस्सी है, जो आपके गले में पड़ी हुयी है। यही आपको संसार के साथ बांधे रखती है | संसार का आश्रय लेना ही आपको बंधन में डालता है | एक परमात्मा का आश्रय लेने से यह बंधन समाप्त हो जाता है | जरा सोचिये ! जीवनभर हमने इस संसार से ही कुछ पाने की इच्छा रखी है, क्या मन में कभी परमात्मा को पाने की भी कामना की है ? नहीं, की न | जिस दिन परमात्मा को पाने की आपके भीतर मुमुक्षा पैदा हो जाएगी, उस दिन आपके जीवन की दशा और दिशा, दोनों ही बदल जाएगी |

        एक राजा था | उसने अपने राज्य में मुनादी करवा दी कि कल सुबह से शाम तक जो भी निश्चित किये गए स्थान पर आएगा, वह वहां से अपने मनपसंद की वस्तु नि:संकोच वहां से ले जा सकता है | शर्त यह है कि एक व्यक्ति एक बार ही वहां आएगा और वहां से कोई भी अच्छी लगने वाली एक वस्तु ही वहां से ले जा सकेगा | मुनादी सुनकर राज्य की प्रजा बड़ी हर्षित हुई | रात को उस राज्य के किसी भी निवासी की आँखों में नींद नहीं थी | सब कल्पना कर रहे थे, वहां प्रदर्शित की जाने वाली वस्तुओं की और वहां से कौन सी वस्तु लानी है उसकी | राजा के यहाँ भला किस वस्तु की कमी हो सकती है |

            निश्चित किये हुए स्थान पर राज-कर्मचारियों ने खजाने में पड़ी बहुमूल्य वस्तुएं लाकर करीने से सजा दी | प्रातः होते ही निश्चित समय पर उस स्थान के द्वार खोल दिए गए | एक एक कर प्रजा अन्दर जा रही थी और जिस वस्तु पर उनकी दृष्टि जाती वह वस्तु उठाकर बाहर ले आते | पहरेदारों की तेज़ नज़र द्वार पर लगी हुई थी | कोई भी व्यक्ति न तो एक से अधिक वस्तु बाहर लेकर आ सकता था और न ही दुबारा उस मंडप में प्रवेश कर सकता था | किसी की दृष्टि स्वर्ण निर्मित हार पर पड़ी तो उसने उसी को लेना अपना सौभाग्य समझा | किसी की दृष्टि मोतियों की माला पर पड़ी, वह उसी को पाकर संतुष्ट था |

          उसी भीड़ में एक नन्हीं सी बालिका भी थी | वह मंडप में प्रवेश कर धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी | वह एक-एक वस्तु का अवलोकन कर रही थी | उसको किसी भी वस्तु ने अपनी और आकर्षित नहीं किया | आगे बढ़ते बढ़ते वह ऐसे स्थान पर पहुंची जहां पर न तो कोई वस्तु थी और न ही कोई प्रजाजन | फिर भी वह आगे बढ़ती रही | मंडप के अंतिम छोर पर उसने राजा को बैठे देखा | उसके चेहरे पर मुस्कान की लकीरें खिंच आयी | वह दौड़कर राजा की गोदी में जा बैठी | तत्काल ही राजा ने समय समाप्ति की घोषणा करवा दी | अब शर्त के अनुसार राजा उस नन्हीं मुन्नी बालिका के हो गए थे |

           राजा ने बालिका को गोद में उठाया और धीरे-धीरे मंडप के मुख्य द्वार तक पहुंच गए | बाहर प्रजा खड़ी राजा के जयकारे लगा रही थी | सबको अपनी मनपसंद की वस्तु मिल गयी थी, इसलिए सब खुश थे | क्या आप जानते हैं कि सबसे अधिक खुश कौन था ? हाँ, वह बालिका जिसने सभी बहुमूल्य वस्तुओं को छोड़ राजा को पाना उचित समझा | अब उसको कोई भी वस्तु नहीं चाहिए थी क्योंकि राजा उसको मिल गए थे | जिसको राजा मिल गए फिर उसके पास क्या कमी हो सकती है ? जो राजा का, वह सब अप्रत्यक्ष रूप से उसका ही तो हुआ |

         यह कहानी कहती है कि हम क्षुद्र सांसारिक वस्तुओं के लिए परमात्मा की उपेक्षा कर रहे हैं | जब सब कुछ परमात्मा द्वारा ही सृजित है फिर सब कुछ परमात्मा का ही तो है | सांसारिक वस्तुएं हमें तात्कालिक सुख अवश्य प्रदान कर सकती है परन्तु एक न एक दिन उन सबका समाप्त हो जाना निश्चित है क्योंकि वे सभी विनाशशील है | संसार का विनाश हो सकता है परन्तु परमात्मा अविनाशी है | अविनाशी के अंतर्गत संसार की सभी विनाशशील वस्तुएं आ जाती है परन्तु संसार की सभी विनाशशील वस्तुओं से उस एक अविनाशी को प्राप्त नहीं किया जा सकता | इसलिए प्राप्त करना हो तो फिर संसार की भौतिक वस्तुओं को छोड़ कर, क्यों न एक परमात्मा को ही प्राप्त कर लें ? अविनाशी की कामना आपको मुक्त करती है जबकि विनाशशील की प्राप्ति/कामना आपको बंधन में डालती है | दिन प्रति दिन परिवर्तित होता जा रहा यह अपना संसार ही वह कूप है जिसमें हम बार बार गिरते रहते है | केवल शरीर बदलते हैं परन्तु कुआं वही रहता है और हम वहां के कूपमंडूक बने रहते हैं | ऐसी परिस्थिति को देखकर कबीर मुक्त होने के लिए कह उठते हैं -

     कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ |

     गलै राम की जेवड़ी, जित खेंचे तित जाऊँ ||

           मुझे संसार की नाशवान वस्तुओं की कोई कामना नहीं है | संसार की कामना से नहीं बंधा हूँ, मैं | मेरे गले में ये जो बंधन पड़ा हुआ है, वह राम को पाने की कामना का बंधन है | अब तो जहां राम ले जायेंगे, मैं उनके पीछे-पीछे खिंचता हुआ वहीँ चला जाऊंगा |

         शरीर मरणधर्मा है परन्तु मन नहीं मरता है | मन के कारण जो कर्म किये हैं, वे सभी कर्म हमें बार-बार इस संसार में नया शरीर लेने को विवश करते हैं | कर्म का हमने क्या बुरा किया जो वे हमें इस भवकूप से मुक्त नहीं होने देते ? कर्म जब तक क्रिया की अवस्था में रहता है तब तक वह तत्काल फल दे देता है और वह फल इस शरीर द्वारा स्वीकार भी कर लिया जाता है | परन्तु जब उसी क्रिया का फल हम अपनी इच्छानुसार चाहने लग जाते हैं, तब वह कर्म बन जाती है और उसका फल कब, कहाँ और कैसे मिलना है, यह सब प्रकृति के नियमानुसार निश्चित किया हुआ होता है | फल की कामना से किये जाने वाले कर्म, फल दिए बिना नहीं रह सकते और ऐसे कर्म कभी नष्ट भी नहीं होते | ऐसे कर्मों के फल के लिए ही हमें भिन्न-भिन्न समय पर और अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न शरीर धारण करने पड़ते हैं |

            उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि हमारे कर्म अगर क्रिया में परिवर्तित हो जाते हैं तो प्रकृति के नियमानुसार वे हमें व्यथित नहीं कर सकेंगे | इसके लिए हमें कर्मों का ज्ञान होना आवश्यक है | कर्म स्वयं के लिए और स्व-निर्मित संसार के लिए करना, सुख और दुःख दोनों को ही देने वाले होते हैं | साथ ही साथ ये कर्म हमें अपने संसार के साथ बांध भी देते हैं | हमें ऐसे कर्मों से मुक्त होने के लिए सभी कर्म केवल संसार की सेवा के लिए ही करने चाहिए | सेवा के लिए किये जाने वाले कर्म स्वार्थरहित और बिना कर्ताभाव के होते हैं | अगर सेवा के लिए किये जाने वाले कर्मों में तनिक भी स्वार्थ भाव अथवा कर्तृत्व का अभिमान आ गया, तो ऐसे कर्म भी बंधन का कारण बन जाते हैं |

           देह को बनाये रखने के लिए सभी प्राणियों को भोजन की आवश्यकता होती है | अतः केवल शरीर को चलाने के लिए किये जाने वाले कर्म हमें बाँधते नहीं हैं परन्तु संग्रह की दृष्टि से किये जाने वाले कर्म अवश्य ही बांधने वाले होते हैं | इसलिए जीवन में संतुष्ट होना, मुक्त होने के लिए बहुत आवश्यक है | इस प्रकार कर्मों के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान रखते हुए कर्म करेंगे तो फिर बार-बार इस संसार में आना नहीं पड़ेगा | गीता तो यहाँ तक कहती है कि ज्ञान की अग्नि आपके सम्पूर्ण कर्मों को भी जला देती है क्योंकि ज्ञान हो जाने से सभी कर्म मात्र प्रकृति की क्रिया बन कर रह जाते हैं | उस क्रिया का फल मात्र इतना सा ही होता है, जितना जले हुए कर्मों की शेष रही भस्म से हो सकता है |

           हम बात कर रहे थे, मनुष्य के मन की | मन पर नियंत्रण स्थापित करना बड़ा ही मुश्किल कार्य है | ‘मन को जिसने जीत लिया, उसने संसार को भी जीत लिया’ ऐसा कहा जाता है | “मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:” अर्थात मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है | अगर मन विषयों मे आसक्त न होकर इन्द्रियों को उस ओर न दौड़ाये तो फिर जीवन में बंधन का कोई कारण नहीं रह जाता है | बंधन हमारे मन के कारण है क्योंकि मन विभिन्न शरीरों (इन्द्रियों) के माध्यम और कई जन्मों से अनेक विषयों का स्वाद चखता आ रहा है | विभिन्न विषयों में स्वाद की आसक्ति ही मनुष्य को कर्म करने के लिए विवश करती है और फिर उसके द्वारा किये गये कर्म ही संसार में आवागमन का कारण बनते हैं |

           मन का निरोध तब तक असफल है, जब तक कि भीतर से विषय-रस की निवृति नहीं होती | प्रायः व्यक्ति इन्द्रियों को बल पूर्वक रोक तो लेता है परन्तु भीतर ही भीतर उस इन्द्रिय से सम्बंधित विषय का रस लेता रहता है | शरीर और मन के माध्यम से प्रकृति में स्थित पुरुष ही इस रस का भोक्ता बनता है परन्तु वृद्धावस्था आते-आते शरीर की भोगने की क्षमता भी धीरे-धीरे चुकती जाती है | शरीर भले ही बुढा हो जाता हो परन्तु मन कभी भी बुढा नहीं होता | मन बुढा नहीं होता इसी कारण से रस से निवृति नहीं हो पाती | इसलिए अगर रस से निवृति लेनी है तो इसका प्रयास शरीर के सशक्त रहते हुए ही करना होगा | एक चिकित्सक होने के नाते मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि रस में आसक्ति बुढ़ापे में ओर अधिक तीव्र हो जाती हैं | मुंह में दांत नहीं, पेट में आंत काम नहीं करती, पाचन शक्ति दगा दे रही होती है फिर भी स्वादिष्ट भोजन से किसी प्रकार का परहेज नहीं है, रसदार भोजन से मोह छूटता ही नहीं है | आँखों में मोतियाबिंद उतर रहा है फिर भी पडौस की नयी बहू कैसी दिखाई देती है, उसके सौन्दर्य को निहारने का रस मन से नहीं जा रहा | अगर आर्थिक रूप से सक्षम है तो फिर कहना ही क्या ? प्रत्येक रस को शरीर के निर्बल होते हुए भी भोगने की इच्छा बलवती होती जाती है | स्वामीजी इसीलिए कहते थे कि भोग और संग्रह की वृति के कारण ही जीवन में सारी समस्या है | रस की निवृति फिर भला कैसे हो ? कहाँ तक गिनाऊं, रस से निवृति वृद्धावस्था में भी संभव नहीं हो पा रही है | रस से निवृति नहीं तो फिर मुक्ति भी नहीं | ऐसे में कूपमंडूक बनकर इसी सांसारिक कुएं में बार-बार गिरना पड़ेगा |

        हम मन को भला दोष कितना ही दे दें, आधुनिक युग में तो बुद्धि तक भी भ्रष्ट होती जा रही है | भौतिक संसार में दृश्य-श्रवण के इतने अधिक साधन है कि विवेक खोकर, भले मानुष भी उन्हें देख-सुन कर पतन को प्राप्त हो रहे हैं | बुद्धि का नियंत्रण मन पर होना चाहिए परन्तु इन आधुनिक साधनों के कारण मन का बुद्धि पर एकाधिपत्य स्थापित होता जा रहा है | जो भी इस संसार में दृष्टिगत है, उसको ही हम अपनी कुंद हुई बुद्धि के कारण सत्य मान बैठे हैं | कोई विवेकी महापुरुष ऐसे व्यक्ति को समझाने का तनिक भी प्रयास करता है तो उसको बड़ा बुरा लगता है | यही कारण है कि आज हो रहे सामाजिक पतन को रोकने का उपाय करते हुए कोई भी भला व्यक्ति दिखलाई नहीं पड़ रहा है | अंधों के शहर में दर्पण को बेचने का कोई औचित्य भी नहीं है |

          बुद्धि में परिवर्तन होना तो तभी संभव हो सकता है, जब व्यक्ति स्वयं परिवर्तित होना चाहे | गीता में कहा गया है कि बुद्धि से परे अर्थात सूक्ष्म अहम् है, जहां काम निवास करता है | अहम् बुद्धि को नियंत्रित करता है | कामना के अहम् में रहने के कारण हम अपनी बुद्धि पर भी नियंत्रण खो देते हैं, जिससे हम भ्रम की अवस्था में चले जाते हैं और अपने वास्तविक स्वरुप को भूल जाते हैं | वास्तविक स्वरुप की विस्मृति होते ही जो कुछ भी इन्द्रियों से अनुभव में आता है, उसी संसार में ही हमें सत्यता नज़र आने लगती है |  सत हमारा वास्तविक स्वरुप है परन्तु इस संसार में आसक्ति के कारण उस सत्य को तो भूल जाते हैं और जो असत संसार है, वही हमें सत नज़र आने लगता है |

      इसलिये आवश्यक है कि हम सर्वप्रथम अहम् को काम से मुक्त करें | इसके लिए ज्ञान प्राप्त कर विवेक को जगाना होगा जिससे बुद्धि मन को अपने नियंत्रण में ले ले | मन के नियंत्रित होते ही फिर काम से मुक्त होकर अपने स्वरूप तक पहुँचने में देर नहीं लगेगी |जब हम ज्ञानयुक्त होकर इस संसार की रचना को समझ लेंगे तब फिर बार-बार शरीर धारण करने के चक्रव्यूह को तोड़कर बाहर भी निकल जायेंगे | यही व्यक्ति की शरीर रहते हुए जीवन-मुक्त हो जाने की अवस्था है |

          प्रश्न उठता है कि ज्ञान क्या है ? श्रृंखला के प्रारम्भ में हमने परमात्मा के स्वरुप की चर्चा करते हुए स्वयं को अपने में ही दो रूप में विभाजित कर लेने की चर्चा की थी | पुरुष और प्रकृति | प्रकृति क्रियाशील है और इसे माया भी कहा जाता है | माया को ही सत्य मान लेने के कारण जीवन में सारी समस्याएं पैदा होती है | माया मृगमरीचिका की तरह होती है, जिसमें जल होने का आभास तो होता है परन्तु जल कहीं भी नहीं होता है | इसी प्रकार संसार से सुख मिलने का आभास तो होता है परन्तु यहां सुख होता नहीं है | जिस प्रकार मृगमरीचिका की ओर प्यास बुझाने के लिए मृग दौड़ता है परन्तु जल न मिलने के कारण वह प्यासा ही रह/मर जाता है उसी प्रकार संसार में व्याप्त माया से सुख मिलने की कामना कभी भी पूरी नहीं होती और देह छूट जाती है | यह अतृप्त रह जाने की अवस्था ही मनुष्य को भवकूप में बार-बार गिराती रहती है | जिस दिन हम इस माया को पहिचान लेंगे उस दिन हम सुख प्राप्त करने की कामना को भी त्याग देंगे | सुख की कामना ही क्यों, फिर तो प्रत्येक कामना से मुक्त हो जायेंगे |

              मृगमरीचिका के बारे में मृग को कितना ही समझा दें कि वहां जल नहीं है, जल का भ्रम है फिर भी मृग उस बात को कभी भी स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि उसे जल दिखलाई जो पड़ रहा है | ज्ञानीजन कितना ही समझा दें कि संसार में दुःख के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है फिर भी मनुष्य कहेगा – ‘जी नहीं, सुख इसी संसार से मिलेगा' क्योंकि संसार उसे आकर्षक लग रहा है | यही उसका अज्ञान है | गीता कहती है कि जो मनुष्य अध्यात्म-ज्ञान में सदैव स्थित रहता है, तत्वज्ञान के रूप में परमात्मा का दर्शन करता है, केवल यही ज्ञान है, शेष सारा अज्ञान है | अध्यात्म ज्ञान में स्थित रहने का अर्थ है, स्वयं के वास्तविक रूप को स्मृति में सदैव बनाये रखना और तात्विक ज्ञान वह है जिसमें ऐसा अनुभव किया जाता है कि जो कुछ भी दिखलाई पड़ रहा है, वह परमात्मा का सृजन होने के कारण परमात्मा ही है | है भी यही सत्य, संसार में जो कुछ दृष्टिगत है अथवा अदृश्य है, वह सब कुछ एक परमात्मा ही है, परमात्मा के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है | यह ज्ञान जब तक स्मृति में बना रहेगा तब तक ईश्वर की माया होते हुए भी उसमे हम उलझेंगे नहीं, आसक्त नहीं होंगे बल्कि उसका अनासक्त भाव से आनंद लेते हुए उसमें भी परमात्मा को ही देखेंगे |

           ज्ञान की अवस्था प्राप्त कर लेने के बाद भी व्यक्ति की स्मृति माया के आकर्षण में कई बार भ्रमित हो जाती है | इसलिए ज्ञान पर दृढ़ता बनाए रखना आवश्यक है | ज्ञान की दृढ़ता भक्ति से होती है और जब एक बार भक्ति में उतरते हैं तब अनुभव होता है कि इतने दिन बेमतलब ही इधर-उधर भटक रहे थे | भक्ति व्यक्ति को शीघ्र ही ज्ञान का अनुभव करा देती है | फिर व्यक्ति कर्मों और विषयों में आसक्त न होकर निष्काम हो जाता है | निष्काम व्यक्ति स्वार्थ रहित होता है | निस्वार्थता उसे निर्भय कर देती है | परन्तु कहना जितना सरल है, उतना भगवान् की भक्ति में उतरना सरल नहीं है | अनेक जन्मों से मनुष्य के अंतःकरण में पड़ी यह करने और जानने की ग्रंथि सुगमता से खुलती नहीं है | इसलिए कर्म और ज्ञान आदि का अनुभव करने के पश्चात् ही एक दिन विवेक जाग्रत होता है और व्यक्ति संत और शास्त्र के माध्यम से भक्ति को उपलब्ध होता है |

           गीता में भगवान् स्पष्ट करते हैं कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं | जो इनको तत्व से भलीभांति जान लेता है, वह अपने शरीर को त्यागने के बाद नया शरीर लेकर इस संसार में वापिस नहीं लौटता | श्रृंखला के प्रारम्भ में ही हमने परमात्मा के संसार-सृजन पर बात की थी | उसी अनुरूप इस सृष्टि का निर्माण हुआ | भगवान् भी अनेकों बार इस संसार में शरीर धारण कर अवतरित हुए हैं | उनके शरीर धारण करने की प्रक्रिया और कर्मों का हम गहनता से अध्ययन करें तो पाएंगे कि उन्होंने कितने सुन्दर तरीके से अपने जीवन में कर्म किये हैं और हमारे लिए नए मापदंड स्थापित करके गए हैं | उस मापदंड के अनुरूप अगर हम अपना जीवन बना लें और आचरण करने लगें तो हम भी परमात्मा हो सकते हैं | 

              इस संसार में आकर परमात्मा ने भी सबको अपने जैसा ही देखा, इसका अर्थ है कि हम सब परमात्मा से अभिन्न हैं | केवल संसार के विषय-भोगों में आसक्त होकर ‘मेरा-तेरा’ में उलझकर रह गए हैं | जिस दिन इस तात्विक ज्ञान का हमें अनुभव हो जायेगा कि एक परमात्मा ही सब जगह और सबमें है, फिर ‘अपना-पराया’ का सारा भेद समाप्त हो जायेगा | सत्य भी यही है कि संसार में परमात्मा से अलग कुछ भी नहीं है।

          गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि जो मुझे सब जगह देखता है, सबमें मुझे देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और न वह मेरे लिए अदृश्य होता है | इतनी स्पष्टता से भगवान् कह रहे हैं तो फिर बताने को शेष क्या रह जाता है ? मनुष्य की विडंबना यही है कि वह शास्त्रों के ज्ञान और सांसारिक जीवन में अंतर कर देता है | शास्त्रीय ज्ञान को जीवन में उतारकर उसे संसार में रहते हुए उपयोग में लीजिये, फिर देखें कि दुखदाई संसार कितना अलग प्रतीत होता है | संसार में आकर दुखी इसलिए होते हैं कि हम स्वयं को परमात्मा से अलग मानने लगे हैं | ज्ञान कितना ही पढ़ लें, सुन लें अथवा लिख लें, आचरण में लाये बिना वह बंधनकारी है, ऐसा ज्ञान हमें मुक्त नहीं कर सकता | परमात्मा को सर्वत्र देखना ही नहीं बल्कि सर्वत्र उसकी उपस्थिति का अनुभव भी होना चाहिए |

         सर्वत्र परमात्मा को देखना कितना मुश्किल है, हम सब जानते हैं | आपकी दृष्टि अपने चारों ओर रस को खोजने की, रस को देखने की और उस रस को अनुभव करने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि परमात्मा को देखना लगभग असंभव हो जाता है | शास्त्र और सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त कर दिखावे के तौर पर भले ही हम साधू होने का ढोंग कर लें परन्तु जब तक रस के प्रति आसक्ति नहीं छूटेगी, तब तक सर्वत्र परमात्मा दिखलाई नहीं देंगे | रस मिलने के मूल स्थान से दूर चला जाना भी रस से छूटने का कोई उपाय नहीं है क्योंकि विषय भले ही शरीर के बाहर बैठे हों, रस तो मन के भीतर बैठा है | मन को निर्मल बनाये बिना संसार से भागकर जंगल में चले जाने से भी कुछ नहीं होगा | जिस रस को संसार में रहते हुए बाहर देख रहे हो जंगल में जाकर वही विषय-रस अपने शरीर के भीतर देखते रहोगे | जंगल में जाने का उद्देश्य अगर विषयों से मुक्त होना ही है, तो इस उद्देश्य में तभी सफलता मिलेगी जब भीतर का रस समाप्त हो अन्यथा घर और वन में कोई अंतर नहीं रहेगा | रस समाप्त हो जाने पर फिर आप वन में रहो अथवा संसार में, कोई फर्क नहीं पड़ेगा | फिर तो चारों ओर परमात्मा के ही दर्शन होंगे |

       रस की निवृति कुछ करने अथवा जानने से समाप्त नहीं होगी | हाँ, ये दोनों एक सीमा तक इसमें सहायक हो सकते हैं परन्तु सम्पूर्ण रूप से कारगर नहीं हो सकते | इसके लिए तो स्वयं को परमात्मा में लगाना होगा | भगवान् में लगते ही सभी दुविधाएं मिट जाएगी और एक स्थिति ऐसी आएगी जब चहुँ ओर परमात्मा के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आएगा | इस स्थिति में आकर भक्त ही भगवान् हो जाता है | भगवान् होते ही सभी भेद मिट जाते हैं | भेद संसार करता है, परमात्मा में कोई भेद नहीं है | भेद जहाँ दो रहते हैं वहां होता है | एक तो एक ही होता है, वहां किसी दूसरे का कोई स्थान ही नहीं रहता |

         स्वामीजी से किसी ने प्रश्न पूछा कि भक्त जब अपने आपको भगवान् मानने लगता है तो अपने को शरीर सहित मानता है अथवा शरीर रहित ? स्वामीजी ने बड़ा ही सटीक उत्तर दिया कि स्वयं को भगवान् मानने से शरीर भी साथ में हो जाता  है अर्थात शरीर और स्वयं में कोई भेद नहीं रहता है | परन्तु अगर भक्त शरीर को मुख्य मानता है और स्वयं भगवान् के साथ नहीं होगा तो फिर वह भगवान् कैसे हो सकता है ? भक्ति में सत के साथ असत हो जाता है और सांसारिक भोग भोगने में असत के साथ सत हो जाता है | असत के साथ सत हो जाने से सब कुछ असत ही होकर रह  जाता है | इसलिए शरीर को मुख्य न मानें और स्वयं को ही मुख्य मानें तो फिर दो का भेद नहीं रहेगा और सब कुछ सत ही सत हो जायेगा |

          विषय-भोग में आसक्ति के कारण सत अर्थात भगवान् को हम अलग मान लेते हैं और संसार को अलग | संसार असत है और हम असत के साथ बन्ध जाते हैं और मूल को भूल जाते हैं | मूल को जान लेंगे तो फिर असत का अस्तित्व ही नहीं रहेगा और सब कुछ सत हो जायेगा | इसलिए भगवान् में श्रद्धा और विश्वास रख भक्ति करें तो असत से मुक्त हो जायेंगे और जन्म-मरण के चक्कर से निकल जायेंगे |

          मनु और शतरूपा ने अपने पुत्र उत्तानपाद को राज्य सौंपकर परमात्मा को पाने के लिए जंगल में जाकर साधना की थी | उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान् ने उनका पुत्र होना स्वीकार किया था | नया शरीर पाकर मनु अवध के सम्राट दशरथ बने और शतरूपा महारानी कौशल्या बनी | अपने दिए वरदान को सफल बनाने हेतु स्वयं भगवान् श्रीराम के रूप में इन दोनों के पुत्र बने | रानी कौशल्या को जब प्रसव पीड़ा होना प्रारम्भ हुई तब चतुर्भुज रूप धरकर स्वयं परमात्मा उनके सामने प्रकट हुए | तब माता कौशल्या ने उनकी स्तुति की है जिसको गोस्वामीजी ने श्री रामचरितमानस में बहुत ही सुन्दर रूप से प्रस्तुत किया है |

        कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता |

        माया गुण ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता ||

        करुना सुख सागर सब गुण आगर जेहि गावहिं श्रुति संता |

        सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता ||

        दोनों हाथ जोड़कर कौशल्या कह रही है - हे अनन्त ! मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? वेद और पुराण तुम को माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाण रहित बतलाते हैं | श्रुतियां और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करने वाले श्रीपति भगवान् मेरे लिए प्रकट हुए हैं |

             जिसका कोई ओर-छोर न हो, आदि-अंत पकड़ में नहीं आये वे अनन्त हैं | एक परमात्मा ही अनन्त है, अन्य कोई नहीं | जिसको मापा नहीं जा सकता, जिनका परिमाण अर्थात आकार, भार, मात्रा आदि ज्ञात नहीं की जा सके उसको परिमाण रहित कहा जाता है | इसलिए उनको ज्ञान से परे कहा गया है | सनातन धर्मशास्त्रों ने उन्हें माया और माया के गुणों से अतीत कहा है | संत जिनको दया का सागर कहते हैं अर्थात वे दयावान है |

      अवध की महारानी कौशल्या भगवान् की स्तुति करते हुए कहती है कि- 

            ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै |

            मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहे ||

           उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै |

           कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै ||

    वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्मांडों के समूह भरे हैं | जिसने इस संसार की रचना की है वह असीम एक मां के गर्भ में भला कैसे समा सकता है ? यह हंसी की बात नहीं है तो और क्या है ? तुम एक मां के गर्भ में रहो, इस हंसी की बात सुनने पर धीर विवेकी पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती | अनन्त ब्रह्मांडों के स्वामी के गर्भ में रहने की बात सुन और जान कर ही विवेकी मनुष्य भ्रमित हो सकते हैं | विवेकी पुरुष की बुद्धि भी तो आखिर असत ही तो है | परमात्मा ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में भी है और सम्पूर्ण ब्रह्मांडों के स्वामी भी है |

        जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुस्कुराए | जब कौशल्या को ज्ञान की स्मृति हो आई कि परमात्मा प्रत्येक स्थान पर हैं, एक सुई की नोंक जितना स्थान भी भगवान् से रिक्त नहीं है, तब उनको सारा रहस्य समझ में आ गया कि परमात्मा मनुज रूप धरकर बहुत से चरित्र करना चाहते हैं | भगवान ने फिर पूर्वजन्म की सुन्दर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो अर्थात भगवान् के प्रति माता के मन में पुत्र भाव पैदा हो जाये | मनु और शतरूपा ने पूर्वजन्म में तपस्या करते हुए परमात्मा जैसा ही पुत्र तो चाहा था | तब भगवान् साक्षात् प्रकट हुए थे और कहा था कि सम्पूर्ण जगत में मैं अपने जैसा कहाँ ढूँढने जाऊंगा ? इसलिए अगले जन्म में मैं स्वयं ही तुम्हारा पुत्र बनकर आऊंगा | आज कौशल्या को भगवान् उसी बात का स्मरण करा रहे हैं | कौशल्या जान गयी है कि साक्षात् भगवान् ही उनके पुत्र बन रहे हैं | यह सुनकर कौशल्या के मन में उनके प्रति वात्सल्य भाव पैदा हो गया |

       कौशल्या के भीतर भगवान् के प्रति वात्सल्य भाव तो पैदा हो गया परन्तु पुत्र को सांसारिक रूप से प्रेम करना तभी संभव है जब भगवान् अपना चतुर्भुज रूप समेटकर मां के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म ले | तब कौशल्या ने कहा कि अब आप अपना यह रूप छोड़कर आप मेरे गर्भ से शिशु बनकर प्रकट हों | मैं आपको पुत्र रूप में तभी प्रेम कर सकूंगी | मुझे परम सुख तभी मिलेगा जब आप पुत्र के रूप में जन्म लेंगे |  

          माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा |

          कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा ||

          सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा |

          यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ||

          माता की वह बुद्धि परिवर्तित गयी, तब वह बोली - हे तात ! यह रूप छोड़कर अत्यंत प्रिय बाललीला करो, यह सुख मेरे लिए परम अनुपम होगा | यह वचन सुनकर भगवान् ने बालक रूप धरकर रोना शुरू कर दिया | गोस्वामीजी कह रहे हैं कि जो इस चरित्र का गान करते हैं, वे हरि के पद को प्राप्त करते हैं और फिर संसार रुपी कुएं में नहीं गिरते | 

       प्रभु जब जब मानव रूप धरकर इस धरा पर आये हैं और विभिन्न प्रकार की लीलाएं की है, उसका आनंद लेना ही एक भक्त के जीवन की अभिलाषा होती है | भगवान् के विभिन्न चरित्रों का गान करने से मनुष्य स्वयं ही भगवान् के समकक्ष हो जाता है | फिर उसे इस संसार में बार-बार नए नए शरीर धारण कर आना नहीं पड़ता |

          विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार |

          निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ||मानस-1/192||

ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के लिए भगवान् ने मनुष्य रूप में अवतार लिया | वे माया और उसके तीनों गुणों तथा इन्द्रियों से परे हैं | उनका दिव्य शरीर उनकी अपनी इच्छा से बना है |

          श्री मद्भागवत महापुराण के दूसरे स्कंध के 9 वें अध्याय में 32 से लेकर 35 श्लोक अर्थात इन चार श्लोकों को भागवतजी के प्राण कहा गया है | कहा जाता है कि परमात्मा का ज्ञान इन चार श्लोकों में समाहित है | इन श्लोकों को चतुःश्लोकी भागवत भी कहा जाता है | इन श्लोकों में भगवान् स्वयं कहते हैं कि –

         सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही मैं था | मेरे अतिरिक्त न तो स्थूल था और न ही सूक्ष्म और न ही दोनों का कारण अज्ञान | जहां सृष्टि नहीं है, वहां मैं ही मैं हूँ और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ भी प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ; और जो कुछ बच रहेगा, वह भी मैं ही हूँ |

       वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मंडल के नक्षत्रों में राहू की भांति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिए | 

        राहू को एक ग्रह कहा जाता है परन्तु वह ग्रह नहीं भी है क्योंकि उसे देखा नहीं जा सकता | इस के कारण सूर्य और चन्द्र ग्रहण होते हैं और यह ग्रहण होना भी परमात्मा की माया है क्योंकि कभी किसी पूर्णिमा के दिन सूर्य और चंद्रमा के मध्य पृथ्वी आ जाती है (चन्द्र ग्रहण) और कभी किसी अमावस्या के दिन सूर्य और पृथ्वी के मध्य चन्द्रमा (सूर्य ग्रहण) | इन्हें आप प्रकृति का रहस्य कहें अथवा परमत्मा की लीला, कोई फर्क नहीं पड़ता, अंततः प्रकृति भी तो परमात्मा का सृजन ही है |

      आगे भगवान कहते हैं कि जैसे प्राणियों के पंचभूत रचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप में प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ |

        यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं - इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है - इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वरूप भगवान् ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है, वे ही वास्तविक तत्व हैं | जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है |

           इसी प्रकार भागवतजी में श्रुतियों के द्वारा भगवान् की स्तुति का वर्णन भी आता है | श्रुतियां इस स्तुति में कह रही हैं कि भगवन ! आप समस्त ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं और आपही समस्त प्राणियों को फंसाने वाली माया का नाश कर सकते हैं | आपके मिटाए बिना यह माया नष्ट नहीं हो सकती | श्रुतियां कहती हैं कि हम आपके स्वरुप का पूर्ण रूप से वर्णन करने में सक्षम नहीं हैं परन्तु जब कभी आप माया के द्वारा जगत की सृष्टि करके सगुण हो जाते हैं या उसका निषेध कर स्वरुप में स्थित हो जाते हैं तभी हम कुछ कुछ आपका वर्णन करने में समर्थ होती हैं | आप एक रस और निर्विकार हैं | भगवन् ! लोग तीन गुणों की माया से बने हुए अच्छे-बुरे भावों या अच्छी-बुरी क्रियाओं में उलझ जाया करते हैं परन्तु आप तो मायानटी के स्वामी हैं अर्थात माया को भी नचाने वाले हैं |

         भगवन् ! प्राणीधारियों के जीवन की सफलता इसी में है कि वे आपका भजन करे, आपकी आज्ञा का पालन करें; यदि वे ऐसा नहीं करते तो उनका जीवन व्यर्थ है | फिर तो उनका शरीर उस लोहार की धौंकनी के समान है जो मृत है, फिर भी श्वांस लेती है | मनुष्य का शरीर पञ्च कोशों से बना है – अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय | इन पञ्च कोशों में पुरुष रूप से रहने वाले और “मैं-मैं” की स्फूर्ति करने वाले भी आप ही हैं | आपके अस्तित्व से इन पञ्च कोशों की अनुभूति होती है और उनके न रहने पर भी आप ही रहते हैं | वास्तव में जो कुछ अस्ति अथवा नास्ति के रूप में अनुभव होता है, उन समस्त कार्य और कारणों से आप परे हैं | ‘नेति-नेति’ के द्वारा इन सबका निषेध हो जाने पर भी आप ही शेष रहते हैं, क्योंकि आप उस निषेध के भी साक्षी हैं और वास्तव में आप ही एकमात्र सत्य हैं |

       भगवन् ! परमात्म तत्व का ज्ञान प्राप्त करना बड़ा कठिन है | उसी का ज्ञान करने के लिए आप विविध प्रकार के अवतार ग्रहण कर लीला करते हैं | जो आपकी लीला का गान करते हैं और मोक्ष की कामना तक नहीं करते, वे परमानन्द में मग्न हो जाते हैं | लम्बी स्तुति के अंत में श्रुतियां कहती हैं कि हम श्रुतियां भी आपके स्वरुप का साक्षात् वर्णन नहीं कर सकती, आपके अतिरिक्त वस्तुओं का निषेध करते करते अंत में हम अपना भी निषेध कर देती है और अंततः आप में ही अपनी सत्ता खोकर सफल हो जाती हैं |

        श्रुतियों द्वारा भगवान् के बारे में वर्णन श्री मद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के 87 वें अध्याय में विस्तार से दिया गया है | इस श्रृंखलामें श्रुतियों का कथन केवल भगवान् के चरित्र के गान के लिए अल्प रूप से उद्घृत किया है | इस जगत में एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है, श्रुतियों का यह कथन महत्वपूर्ण है | जब हम इस बात का अनुभव करते हैं, तब अपना-पराया का समस्त भेद मिट जाता है | मायातीत की माया के कारण यह मनुष्य उसमें उलझकर संसार के आवागमन में फंस जाता है और बार-बार इस सांसारिक कुएं में गिरता रहता है | परमात्मा का ज्ञान और उसके अस्तित्व को स्वीकार कर लेना ही हमें इस आवागमन से मुक्त कर सकता है |

       इसी प्रकार कठोपनिषद में भी परमात्मा के बारे में वर्णन आता है | जब यम अपने शिष्य नचिकेता को ब्रह्म विद्या देते हैं, तब परमात्मा के बारे में वे सम्पूर्ण ज्ञान देते हैं | यम कहते हैं कि जो परमात्मा यहाँ है, वो वहां भी हैं और जो वहां है, वह यहाँ भी है | सब जगह एक वही है, दूसरा कोई नहीं | केवल वही मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है जो जगत में परमात्मा को नाना रूपों में देखता है | इस शरीर में स्थित; एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने वाले; जीवात्मा के देह से निकल जाने पर इस मृत शरीर में, सबमें वही रहता है | जिसका जैसा कर्म होता है और शास्त्रादि के कारण जो जिस भाव को प्राप्त हुआ है, उनके अनुसार कितने ही जीवात्मा तो नाना योनियों को प्राप्त हो जाते हैं |

      जो नित्यों का भी नित्य है और चेतनों का भी चेतन है; अकेला ही इन अनेक जीवों के कर्मफल भोगों का विधान करता है; उस अपने भीतर रहने वाले को जो ज्ञानी निरंतर देखते रहते हैं उन्हीं को शाश्वत शांति प्राप्त होती है | इस प्रकार स्पष्ट है कि जो परमात्मा के स्वरुप को जान लेता है वह फिर इस संसार में पुनः जन्म नहीं लेता | सर्वत्र परमात्मा को देखने का अर्थ है कि इस जगत में एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई भी नहीं है | गीता में “वासुदेव सर्वम्” कहने का अर्थ भी यही है |

          संसार में केवल उस एक को ही देखना, परम सिद्धि है | ऐसा सिद्ध पुरुष बार-बार जन्म नहीं लेता | वह इस भवकूप से निकलने के बाद पुनः उसमें लौटकर नहीं आता | इसलिए एक परमात्मा का ही आश्रय लें | उसके चरित्र का गान करें | वही इस जगत में नाना रूपों में दिखलाई पड़ रहा है | आप में, मुझ में, चर-अचर में, सजीव-निर्जीव में | अपना अहंकार लिए हम बेमतलब ही बौराए फिर रहे हैं | उससे अलग मान लेने पर ही हम अस्तित्वहीन और क्षुद्र हैं | उसमें अपने को मान लेने से हम भी वही हो जाते हैं | फिर हम भी असीम और अपरिमेय हो जाते हैं | हाँ, यह सत्य है | समुद्र से बूँद जब अलग हो जाती है तब वह सिमट कर रह जाती है | वही बूँद जब समुद्र में समा जाती है फिर वह समुद्र में खो नहीं जाती बल्कि समुद्र ही हो जाती है |

          प्रिज्म से निकला प्रकाश सात वर्णों (रंगों) में बंट जाता है | जिससे वही वर्णहीन प्रकाश भी सात रंग का होकर अलग-अलग दिखलाई पड़ने लगता है | ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रत्येक वर्ण में उस वर्णहीन प्रकाश की उपस्थिति सदैव बनी रहती है | इसी प्रकार परमात्मा द्वारा सृजित इस जगत के प्रत्येक भाग में, कण-कण में वह उपस्थित है | हमें इस बात को कभी भी नहीं भूलना है | स्मृति में सदैव जब परमात्मा रहेंगे तो यही कहा जायेगा कि हम भी परमात्मा है | फिर कोई हमसे भिन्न नहीं - कोई और नहीं, कोई गैर नहीं |

           ज्ञान से जब यह बात स्पष्ट हो जाती है तो मनुष्य में भक्ति का प्रवेश होता है | भक्ति का अर्थ है, दो दिखलाई पड़ते हुए भी दो नहीं | कर्म में हम कुछ करते हैं, ज्ञान में हम कुछ जानते हैं जबकि भक्ति में कुछ करना और जानना, दोनों ही नहीं होते बल्कि केवल एक परमात्मा को मानना होता है | एक परमात्मा की शरण में चले जाने से स्वत: ही करना और जानना दोनों भी हो जाते हैं | कोई व्यक्ति कितना ही प्रयास कर ले परमात्मा को पूर्ण रूप से जाना नहीं जा सकता क्योंकि जानना बुद्धि का विषय है | इसी प्रकार करना भी इन्द्रियों का विषय है | इन्द्रियां और बुद्धि असत है | असत से सत को नहीं जान सकते जबकि सत से असत को जाना जा सकता है | इसलिए आवश्यक है कि हम असत का संग छोड़कर सत का संग करें |

           असत का संग हमें भवकूप में ही डाले रखता है | असत के संग से हमें केवल हमारा संसार ही सत्य प्रतीत होता है | बाह्य दृष्टि केवल असत के अवलोकन के लिए होती है, उसके साथ बंधने के लिए नहीं | अवलोकन करते-करते उनमें आसक्त हो जाना, इन्द्रियों का इस प्रकार का उपयोग हमें सत से दूर ले जाता है | चर्म चक्षु से केवल चर्म ही दिखलाई पड़ सकता है क्योंकि भौतिक दृष्टि की भी एक सीमा होती है | इसी प्रकार सभी इन्द्रियों की एक निश्चित सीमा होती है | उस सीमित क्षेत्र के ज्ञान को सत का ज्ञान नहीं कहा जा सकता | सत का ज्ञान प्राप्त करने के लिए सभी इन्द्रियों, मन और बुद्धि को छोड़कर अहम् की ओर आना होगा | जब अहम् से इन सबको अलग कर दिया जाता है तब हमें अपने वास्तविक स्वरुप का ज्ञान हो जाता है | दर्पण पर जमी धूल को जब तक हटाया नहीं जाता है तब तक हम अपने वास्तविक रूप से अनभिज्ञ ही बने रहते हैं | इसलिए इन्द्रियों, मन और बुद्धि रुपी असत की धूल से अहम् के दर्पण को मुक्त करना होगा |

            हमारा स्वरुप अजन्मा, अजर, अमर, अपरिमेय है | स्वरुप तक पहुंचते ही हम निश्चिंत, निर्भय, नि:शंक, नि:शोक हो जाते हैं | फिर न तो मरना पड़ता है और न ही जन्म लेना पड़ता है | यह संसार हमें तभी तक प्रिय लगता है, जब तक हमारी इसमें आसक्ति है | आसक्ति का अर्थ है यहाँ से कुछ पाने की कामना करना | इस संसार से कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता और न ही यहाँ कुछ करना पड़ता है | प्रकृति में सदैव सब कुछ संतुलित ही रहता है | प्रकृति में जितना आज है, कल भी उतना ही रहेगा | बस अंतर इतना ही है कि कल जो हमारे पास था, आज वह किसी ओर के पास है और परसों किसी ओर के पास होगा परन्तु प्रकृति में सदैव उतना ही बना रहेगा | हमारे पास होने को हम अपना होना मान लेते है, यही बड़ी भारी भूल है | इसी भूल के कारण हम भवकूप से बाहर निकल नहीं पाते हैं और इसी संसार को सब कुछ मान लेते हैं | संसार के सारे सम्बन्ध स्वार्थ के हैं | यहाँ इसे भी हम अपना मानते हैं, वे अपने तब तक ही हैं जब तक हमसे उनका अथवा उनसे हमारा स्वार्थ सिद्ध हो रहा है | स्वार्थ सिद्ध होते ही सभी अपने पराये हो जाते हैं | अपने जब पराये हो जाते हैं, तब यह संसार हमें दुःखपूर्ण लगता है।

          इस संसार में न तो कुछ खोया जा सकता है और न ही इससे कुछ पाया जाता है | सब हमारे मन का वहम है | जब यह वहम दूर हो जाता है, तब परमात्मा की यात्रा प्रारम्भ होती है | इस संसार में चाहे कितने ही अपने प्रतीत होते हों, एक परमात्मा के सिवाय कोई अपना नहीं है | इस संसार में अपने संसार को पाने के लिए केवल हम अपना शरीर ही खो रहे हैं और बदले में पाते कुछ भी नहीं है | जिस दिन हमें स्वयं को परमात्मा में खोना आ जायेगा, इस संसार में रहते हुए भी सब कुछ पा लेंगे | वह सब कुछ है, परमात्मा | इसलिए परमात्मा को पाना है तो स्वयं को खोना पड़ेगा | स्वयं के खोते ही सीमित संसार दृष्टि से ओझल हो जायेगा और आप उसी विशालता का अनुभव करने लगेंगे जो अनुभव एक बूँद को समुद्र में खोने से होता है |

          कुआँ सीमित है | उसमें चाहे जन्मों तक पड़े रहें अपनी असीमता का अनुभव हमें कभी भी नहीं हो पायेगा | कुएं के संसार को विस्मृत करना ही होगा | इस विस्मृति की ओर ले जायेगा हमारा गुरु, जो बाहर खड़ा कुएं में बाल्टी डाले हमें उससे मुक्त करने का प्रयास कर रहा है | परन्तु उस बाल्टी में स्वयं को ही प्रवेश करना होगा | जिस दिन हम उस कुएं से बाहर निकल जायेगे फिर कभी भी उसमें वापिस लौटना नहीं चाहेंगे | कुआँ तभी तक अच्छा लगता है जब तक उससे बाहर के दिव्य प्रकाश का अनुभव नहीं किया जाता | जिस दिन उस दिव्य प्रकाश का अनुभव हो जायेगा, हम भी कुएं के गुणगान करना छोड़ उस दिव्य स्वरुप के चरित्र का गान करने लगेंगे | फिर वापिस उस कुएं की ओर झांकने तक का प्रयास नहीं करेंगे | तभी मानस में गोस्वामीजी कहते हैं कि जो प्रभु के चरित्र का गान करता है उसे परम पद की प्राप्ति होती है और फिर वह इस भवकूप में नहीं गिरता |

           “यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा”

प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||

Friday, June 17, 2022

 कई सुधि पाठक कहते हैं - ‘महाभारत होने के पीछे द्रोपदी एक महत्वपूर्ण कारण थी | “अंधे का बेटा अँधा” कहना ही दुर्योधन को चोट पहुंचा गया | फिर कुरुक्षेत्र में हुए युद्ध ने न जाने कितने लोगों के प्राण ले लिए | रक्तरंजित कुरुक्षेत्र की भूमि क्या कभी द्रोपदी को क्षमा कर सकेगी ?’ यह किसी भी घटना को देखने का एक नजरिया हो सकता है परन्तु सत्य कदापि नहीं है | दूसरे कई कारण आप इस युद्ध के पीछे देख सकते हैं जैसे धृतराष्ट्र का पुत्र मोह, दुर्योधन की महत्वाकांक्षा, द्रुपद द्वारा द्रोणाचार्य का किया गया अपमान, युद्धिष्ठिर का द्युत क्रीड़ा करना, द्रोपदी का चीरहरण इत्यादि | एक लम्बी सूची हो सकती है परन्तु फिर भी सभी मिलकर कुरुक्षेत्र में हुए रक्तप्रवाह के पीछे का सत्य नहीं हो सकते | सत्य तो केवल एक ही है, श्री कृष्ण के द्वारा कुरुक्षेत्र में कहा गया यह वाक्य कि अर्जुन ! तू तो इन सब योद्धाओं को मारने का श्रेय ले ले, ये सब योद्धा तो मेरे द्वारा पहले से ही मारे जा चुके हैं |

               रामायण के घटनाक्रम को देखें तो क्या भगवान् श्री राम के वनगमन के लिए कैकेयी दोषी थी ? आप कह सकते हैं कि कैकेयी ने ही दशरथ से वर माँगा था – “चौदह बरिस रामु बनबासी “| क्या राम वनगमन के पीछे का यही एक मात्र सत्य है | सतही दृष्टि से देखें तो कई और कारण भी इसके पीछे गिनाये जा सकते हैं परन्तु सत्य इनमें से कोई सा भी नहीं है | इसी प्रकार क्या सीताहरण के लिए स्वर्णमृग का चर्म लाने का सीता का आग्रह दोषी है ? लक्ष्मण द्वारा सीता को अकेले छोड़कर श्री राम की सहायता के लिए चले जाना भी तो इसके लिए उत्तरदायी हो सकता है | नहीं, राम-वनगमन और सीता-हरण दोनों को होना ही था क्योंकि प्रभु राम स्वयं ऐसा चाहते थे | “मरम बचन जब सीता बोला | हरि प्रेरित लछिमन मन डोला || इस चौपाई में “हरि प्रेरित” पर ध्यान चाहूँगा | श्री हरिः की प्रेरणा से ही लक्ष्मण श्री राम की सहायता के लिए दौड़ पड़े थे, न कि मात्र सीता के कहने से | नारदजी को जब विश्वमोहिनी नहीं मिलती तब श्री हरिः को वे श्राप दे देते हैं | श्राप देने के बाद नारदजी को जब दुःख होता है, तब उत्तर में भगवान् क्या कहते हैं ? गोस्वामीजी लिखते हैं - “मृषा होउ मम श्राप कृपाला | मम इच्छा कह दीनदयाला ||”

            “हरि अनंत हरि कथा अनंता | कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ||” इसलिए श्री हरिः की कथा सुनानी-सुननी चाहिए, उनके चरित्र का गान करना चाहिए | कथा पर प्रश्न उठाकर उसमें उलझना नहीं है बल्कि कथा सुन और गाकर संसार सागर की उलझन से मुक्त होना है | भगवान् अवतार लेने पर विभिन्न चरित्र करते हैं जिसका आनंद उठाकर हम आवागमन से मुक्त हो सकते हैं | तभी तो गोस्वामीजी मानस में कहते है – “यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा ||” कल मिलेंगे –“ते न परहिं भवकूपा” विषय के साथ |

प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||