Wednesday, June 1, 2022

करिष्ये वचनं तव -61से85

 करिष्ये वचनं तव-61से 85

                  सभी सजीव प्राणियों में एक बात की समानता अवश्य होती है-भूख की | सभी जीवित प्राणियों को भूख लगती ही है, चाहे वह चर हो अथवा अचर | भूख पर विजय पाने के लिए आहार (Food) की आवश्यकता होती है | आहार पाने के लिए ही पेड़-पौधों में वृद्धि होती है | उसकी जड़ें (Roots) भूमि की गहराई को नापते हुए भोजन के लिए जल व आवश्यक तत्व जुटाती है | तना (Stem) बढ़कर आकाश की ऊँचाइयों को छूने लगता है, जिससे पत्तियों (Leaves) को अधिक से अधिक सूर्य का प्रकाश (Sunlight) उपलब्ध हो सके | सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में भोजन का निर्माण जल और अन्य आवश्यक तत्वों से किया जाता है, जिसे प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) कहा जाता है |               

             चर प्राणियों में पेड़-पौधों की तरह स्वयं के द्वारा भोजन बनाने की सुविधा परमात्मा ने प्रदान नहीं की है | अतः उन्हें भोजन प्राप्त करने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करना पड़ता है | किसी भी प्रकार से अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भोजन प्राप्त करने की इच्छा चर सजीव को हिंसक (Violent) बना देती है | हिंसा (Violence) चर प्राणी को भोजन तो प्रदान करा देती है परन्तु साथ ही साथ स्वयं के द्वारा की गयी उस हिंसा के कारण वह भयग्रस्त (Frightened) भी हो जाता है क्योंकि वह समझ जाता है कि जिस प्रकार उसने हिंसा के माध्यम से भोजन प्राप्त किया है, एक दिन वह भी इसी प्रकार अन्य किसी भूखे प्राणी का भोजन बन सकता है | 

               भूख के कारण भय (Fear) पैदा होता है | भय पैदा होने का मुख्य कारण होता है मृत्यु, स्वयं के अस्तित्व के मिट जाने का भय | यह भय दो कारणों से होता है-निराहार (Starvation) रहने से हो सकने वाली संभावित मृत्यु से तथा किसी निराहारी का आहार बन जाने की सम्भावना से | दोनों ही परिस्थितियों के कारण से प्राणियों में असुरक्षा (Insecurity) की भावना भी पैदा हो जाती है | यह भय (Fear) इसलिए भी पैदा होता है क्योंकि वह यह सोचता है कि जिस प्रकार उसने शिकारी (Predator) बनकर किसी अन्य प्राणी का शिकार किया है, उसी प्रकार वह स्वयं भी कभी न कभी किसी का शिकार (Prey) भी बन सकता है | इस प्रकार उसकी प्रजाति का,उसके परिवार का एक न एक दिन विलुप्त होना संभव हो सकता है | इसकी प्रतिक्रिया में वह स्वयं की प्रजाति और परिवार को संसार में बनाये रखने के लिए संतान उत्पत्ति में रत हो जाता है | जो प्राणी सबसे अधिक शिकार बनता है, प्रकृति (Nature)  के इस नियम के अनुसार उसमें संतान उत्पत्ति की दर (Rate) भी सर्वाधिक होती है |

                    आहार प्राप्ति के लिए एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी को शिकार बनाना उनकी प्रकृति है | इसमें किसी प्रकार की हिंसा नहीं है | इसमें हिंसा हम मनुष्यों को इसलिए प्रतीत होती है क्योंकि हम मानते हैं कि स्वयं के आहार के लिए दूसरे जीव के जीने के अधिकार को छीन लेना एक प्रकार की हिंसा ही है |

               आहार के लिए एक प्राणी दूसरे प्राणी पर निर्भर रहता है | एक मेंढक छोटे-मोटे कीड़ों का शिकार करता है और वही मेंढक स्वयं एक सर्प का भोजन बन जाता है | इसी प्रकार एक सांप भी बाज, चील आदि पक्षियों का शिकार है | एक बड़ी मछली का भोजन समुद्र में तैर रही छोटी मछलियाँ ही होती है | इस प्रकार की कथित हिंसा में न तो कोई अपराधी है और न ही कोई पीड़ित | एक प्राकृतिक नियम के अनुसार सब एक दूसरे का आहार बनते हैं | ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ अथवा अर्थात जीव ही जीव का भोजन है | भागवतजी में कहा गया है-‘जीवो जीवस्य जीवनम्” अर्थात जीव ही जीव का जीवन है | बिना आहार के जीवन जिया नहीं जा सकता | इस प्रकार एक जीव ही दूसरे जीव का आहार बनकर जीव का जीवन जीना संभव बनाता है |

             एक शेर जब मृग का शिकार आहार के लिए करता है, तब उसके भीतर किसी प्रकार की हिंसा का भाव नहीं होता | वह तो अपनी भूख मिटाने के लिए यह सब कर रहा होता है | क्षुधा की तृप्ति के लिए शेर के सामने चाहे मृग आये अथवा भैंस; उसको तो वह केवल आहार नज़र आता है |  एक बार शिकार कर लेने के पश्चात चाहे उसके सामने मृग आये अथवा कोई अन्य जानवर, उसके भीतर इस प्रकार की इच्छा उत्पन्न नहीं होती कि वह उसका शिकार करे | ‘बुभुक्षितः किम् न करोति पापम्”, यह उक्ति यही स्पष्ट करती है कि भूखा प्राणी अपनी क्षुधा शांत करने के लिए किसी भी प्रकार का पाप (हिंसा) कर सकता है |

                    अभी तक आहार के सम्बन्ध में हमने चर्चा की वह तो हुई मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों की बात | मनुष्य इन सब प्राणियों से अलग है | वह बुद्धिमान और विवेकी है |एक मनुष्य के अनुसार आहार प्राप्ति के लिए की जाने वाली हिंसा भी दो प्रकार की होती है | एक जीव को स्वयं की क्षुधा शांत करने के लिए आहार बनाना पहली प्रकार की हिंसा है | दूसरे प्रकार की हिंसा है स्वयं की भूख मिटाने के लिए येन केन प्रकारेण किसी दूसरे से आहार को छीनने का प्रयास करना | पहली प्रकार की हिंसा में एक जीव दूसरे जीव को मारकर उससे अपनी भूख मिटाता है जबकि दूसरे प्रकार की हिंसा में वह प्राणी किसी दूसरे प्राणी से उसका आहार छीनने का प्रयास करता है | इस प्रकार छीनने के प्रयास में एक प्राणी अपराधी (Accused)  बन जाता है और दूसरा प्राणी पीड़ित (Victim) हो जाता है, जबकि इसके विपरीत पहली प्रकार की हिंसा में न कोई अपराधी होता है और न ही कोई पीड़ित |

            इस प्रकार हम विवेकवान मनुष्य समझ सकते हैं कि किसी एक जीव का दूसरे जीव को आहार बनाना उसके लिए हिंसा नहीं है बल्कि हिंसा होती है किसी दूसरे के आहार को स्वयं की उदर पूर्ति के लिए छीनने का प्रयास करना | हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि एक के अधिकार को छीनने का प्रयास जो कोई भी करता है, उसको रोकने का प्रयास करना | महाभारत में भगवान श्री कृष्ण यही तो बात अर्जुन को कह रहे हैं | पांडवों का अधिकार कौरवों ने छीन लिया था जो कि अनुचित था | इसी कारण से भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लेने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में युद्ध करने का सुझाव दिया था |

                   दूसरे का आहार छीन लेने का एक सटीक उदाहरण प्रस्तुत है | एक बार एक चील को एक मरा हुआ चूहा दिखलाई पड़ गया | वह भूख से बुरी तरह तड़प रही थी | उसने उस मरे हुए चूहे को अपने पंजों में जकड़ा और आकाश की अनंत ऊँचाइयों की तरफ उड़ चली | वह तलाश में थी एक ऐसे स्थान की, जहाँ शांति के साथ बैठ कर वह उस चूहे को उदरस्थ कर सके | परन्तु दुर्भाग्य, कुछ चीलों ने उसे चूहा ले जाते हुए देख लिया | अब तो सभी चीलें उसके पीछे पड़ गयी | एक-एक कर प्रत्येक चील उस अकेली चील को अपनी नुकीली चोंच और पंजों से आक्रमण कर घायल कर रही थी | जिस चील के पंजों में मरा हुआ चूहा था वह समझ ही नहीं पा रही थी कि आज अचानक ही अन्य सभी चीलें उसकी दुश्मन क्यों बन गयी है ? उस चील ने अपने जीवन में आज तक इस प्रकार के किसी संघर्ष का सामना नहीं किया था और आज अनायास ही उसके समक्ष ऐसी परिस्थिति बन गयी थी | वह समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर उसके साथ ऐसा हो क्यों रहा है ?

                   इसी संघर्ष में आखिर उस चील के पंजों से वह चूहा छूट गया | चूहे के छूटते ही अन्य चीलों ने भी उस चील पर आक्रमण करना छोड़ दिया | घायल चील संघर्ष करते-करते थक गयी थी | वैसे वह पहले से ही भूख से निढाल हो रही थी | थककर वह एक पेड़ की चोटी पर बैठ गयी और विचार करने लगी कि आखिर अन्य चीलों ने उस पर आक्रमण क्यों किया था ? वह तो केवल अपना आहार ही तो ले जा रही थी, उसने किसी का कुछ बुरा तो नहीं किया था | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उससे कहाँ और क्या भूल हुई जिसके कारण वह इस प्रकार हिंसा का शिकार बनी ?

          थकी-हारी उस चील की दृष्टि अन्य चीलों पर गयी जो कुछ समय पहले तक उसके साथ संघर्ष कर रही थी | उसने देखा कि अब वे सभी चीलें उस मरे हुए चूहे को पाने के लिए एक दूसरे से संघर्ष कर रही थी | सभी चीलें सबसे पहले उस चूहे तक पहुँचने के लिए एक दूसरे का रास्ता रोक रही थी | उनके मध्य बड़ी ही रोचक प्रतिस्पर्धा चल रही थी | थोड़े से चिंतन से ही उस चील को स्वयं के विरुद्ध हुयी उस हिंसा का उत्तर मिल गया | वह समझ गयी कि उसके विरुद्ध अन्य चीलों के हिंसक होने का एक मात्र कारण वह मरा हुआ चूहा था | चूहे के छूटते ही उसके विरुद्ध होने वाली हिंसा भी छूट गयी थी | अब उसको एक दम स्पष्ट हो गया था कि उसके विरुद्ध हो रही हिंसा का कारण था, वह मरा हुआ चूहा और उससे मिट सकने वाली भूख |

         भूख नहीं होती तो हिंसा भी नहीं होती | कहने का अर्थ है कि भूख हिंसा को जन्म देती है | किसी से आहार छीन लेने के लिए हिंसा अथवा शिकार कर आहार पाने के लिए हिंसा | दोनों ही प्रकार की हिंसा के मूल में भूख ही है | इस दृष्टान्त से मूल बात यह निकल कर हमारे सामने आती है कि हिंसा का आधार भूख है | भूख का आधार है बिना आहार के जीवन के नष्ट हो जाने का भय क्योंकि बिना आहार के जीवन जीना असंभव है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि भय का आधार हिंसा है | अतः परोक्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि भय की जननी भूख है | 

             अभी तक हमने अन्य प्राणियों की बात की है, परन्तु क्या मनुष्य के साथ भी ऐसा ही होता है ? क्या मनुष्य भी भूख शांत करने के लिए हिंसक हो सकता है ? भूख क्या सिर्फ और सिर्फ भोजन मिलने मात्र से ही मिट जाती है ? तीनों ही प्रश्नों का उत्तर हम सभी जानते हैं | प्रथम प्रश्न का उत्तर है, हाँ, मनुष्य भी अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है | दूसरे प्रश्न का उत्तर है, मनुष्य भी भूख को शांत करने के लिए हिंसक हो सकता है | तीसरे और अंतिम प्रश्न का उत्तर है कि सभी प्राणियों में पेट की भूख तो आहार मिलने से मिट जाती है परन्तु मनुष्य की भूख केवल आहार की नहीं होती बल्कि अन्य कई प्रकार की होती है, जो सब कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी मिट नहीं पाती | अतः सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य ही सभी जीवों में एक मात्र जीव ऐसा है, जिसकी भूख भोजन पाकर भी शांत नहीं होती | यही कारण है कि मनुष्य जीवन भर भय से मुक्त नहीं हो पाता |

                 मनुष्य के अतिरिक्त कोई अन्य प्राणी इस भय से मुक्त होने का विचार नहीं कर सकता | वह सदैव भयग्रस्त ही बना रहता है | मनुष्य ऐसे किसी भी प्रकार के भय से मुक्त होने की मन में इच्छाएं (Desires) पैदा करता है | वह भय से मुक्त होने के लिए मन में विभिन्न प्रकार की इच्छाएँ लिए भोग सामग्री को एकत्रित (संग्रह) करने में लग जाता है | उसके द्वारा इस प्रकार भोग-सामग्री को संग्रह करने का कारण बनता है, अब तक उसको जो कुछ भी मिला है, उसको अपर्याप्त मानना अर्थात सदैव एक प्रकार के अभाव में जीना | यह कृत्रिम अभाव फिर से किसी नए भय को उत्पन्न कर देता है |

             इस प्रकार भूख, भय, संग्रह और अभाव का कभी न टूट सकने वाला चक्र (Vicious cycle) बन जाता है, जो व्यक्ति को जीवन में कभी भयमुक्त नहीं होने देता | इस अभाव से उत्पन्न हुए भय के कारण मनुष्य अपने वर्चस्व (Dominancy) को बनाये और व्यक्तित्व (Personality) को बचाये रखने के लिए विभिन्न प्रकार के भोगों में लिप्त होकर संतान उत्पत्ति (Reproduction) में लग जाता है | वह समझता है कि संतान उत्पन्न करने से वह अल्प रूप से ही सही, इस संसार में सदैव के लिए विद्यमान अवश्य ही रह सकेगा | परन्तु क्या केवल यही मार्ग है- भयमुक्त होने का ? ऐसा तो भयमुक्त होने के लिए मनुष्य ही क्या, संसार के सभी प्राणी करते हैं | फिर चर प्राणियों के अंतर्गत आने वाले बुद्धिमान प्राणी मनुष्य और अन्य प्राणियों में अन्तर ही कहां रह जायेगा ? भयमुक्त होने के लिए संतानोत्पति, भोग सामग्री का संग्रह और स्वार्थ पूर्ति के लिए की जाने वाली हिंसा के अतिरिक्त जो मार्ग है, उसी मार्ग को गीता में अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण स्पष्ट करते हैं |

             गीता की सार्थकता तभी है, जब हम भय मुक्त हो जाएँ और इस बात को स्पष्ट रूप से समझ लें कि हिंसा कब और किस परिस्थिति में आवश्यक हो जाती है ? कहने का अर्थ है कि केवल अपनी भूख मिटाने के लिए की गयी हिंसा भूख और भय दोनों को बढ़ाती ही है, उनसे हमें मुक्त नहीं कर सकती | 

                 सभी चर प्राणी आहार(Feed), निद्रा(Sleep), भय (Fear) और मैथुन (Sex) में लीन है और मनुष्य भी इनसे अलग नहीं है | परन्तु मनुष्य के पास इनसे अलग एक क्षमता औऱ  है, विचार करने की क्षमता। वह इस क्षमता का उपयोग कर भयमुक्त हो सकता है। गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि बिना भयमुक्त हुए और अहंकार को त्यागे बिना मनुष्य के जीवन में शांति नहीं आ सकती | अगर भय और अहंकार का त्याग मनुष्य नहीं कर सकता तो वह जीवन में कभी भी मुक्त नहीं हो सकता | हालाँकि इन दो का त्याग करने के लिए मुक्ति की कामना पैदा करना आवश्यक है परन्तु अंततः मुक्ति के लिए भी मुक्ति की कामना सहित सभी कामनाओं का त्याग करना आवश्यक है |

          भय और अहंकार से मुक्त होने के लिए भगवान ने गीता में तीन मार्ग बताएं हैं,  जिन्हें क्रमशः कर्म, ज्ञान और भक्ति-योग कहा जाता है | बिना कर्म किये व्यक्ति क्या तो किसी को देगा और क्या किसी से प्राप्त कर सकेगा ? अतः कर्म करने भी आवश्यक है | बिना ज्ञान के मनुष्य अपने होने का उद्देश्य ही नहीं जान पायेगा | अतः व्यक्ति के लिए ज्ञान प्राप्त करना भी आवश्यक है | बिना भक्ति की भावना के मनुष्य मात्र एक मशीन बन कर रह सकता है, वह केवल एक प्रकार का यांत्रिक जीवन ही जी सकता है, जिस जीवन की कोई उपयोगिता नहीं है | अतः मनुष्य का भावना प्रधान होना भी आवश्यक है | भावना से सम्बंधित भक्ति-योग नाम से भगवान ने इसका वर्णन गीता में किया है |

                      मनुष्य के लिए आहार का अर्थ व्यापक है, इसे केवल पेट की क्षुधा शांत करने से ही न लें | मनुष्य को अपना पेट भरने के अतिरिक्त भी अन्य कई प्रकार के आहार चाहिए क्योंकि उसने अपनी क्षुधा को विस्तार दे दिया है | प्रत्येक इन्द्रिय-भोग की अपनी भूख होती है | जब मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों को ज्ञान की प्राप्ति के स्थान पर केवल विषय-भोग की प्राप्ति की ओर लगा देता है, तब उसकी भूख का विस्तार पेट के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी हो जाता है |

         इस प्रकार जब मनुष्य में तृष्णा बढ़ती है तब प्रत्येक इन्द्रिय के माध्यम से मिलने वाले आहार की आवश्यकता भी बढ़ जाती है | जीवन में किसी न किसी की आवश्यकता बने रहने का नाम ही अभाव है | आज के इस भौतिक युग में समस्या यह है कि हम विलासिता और आवश्यकता में अंतर नहीं कर पा रहे हैं और विलासिता को ही आवश्यकता समझ बैठे हैं | साथ ही यह भी सत्य है कि आज की विलासिता भविष्य में एक दिन आवश्यकता बन ही जाती है | विलासिता ही अभाव को जन्म देती है जो सभी प्रकार का आहार पाकर भी तृप्त नहीं हो सकती | इस प्रकार असंतुष्टि का भाव जीवन में दुःख उत्पन्न करता है | इसीलिए गीता हमें अपनी आवश्यकताएं सीमित रखने को कहती है, जिससे मन में किसी प्रकार की निरर्थक कामनाओं का जन्म ही न हो |

            श्रीमद्भगवद्गीता में आहार और शयन के बारे में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को स्पष्ट करते हुए कहते है कि –

         युक्ताहारविहारस्य  युक्तचेष्टस्य कर्मसु |

         युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ||गीता-6/17||

        भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं कि दुखों का नाश करने वाला योग तो उचित आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने-जागने वाले का ही सिद्ध होता है |

                  दुःख का कारण है- भय | भय मनुष्य को सदैव दुःखी बनाये रखता है | मनुष्य को अगर कभी सुख की प्राप्ति हो भी जाती है तो वह थोड़े समय बाद उस सुख को अपर्याप्त मानते हुए दुःखी हो जाता है | अभाव सभी प्रकार के भय का जनक है और भय दुःख का प्रमुख कारण है | अगर हम आहार केवल अपने प्राण की रक्षा के लिए करते हैं तब तो वह निश्चित ही उपलब्ध होगा |

          हमें इस संसार में जन्म देने से पहले ही परमात्मा ने हमारे प्राणों की रक्षा करने के लिए हमारे लिए उचित आहार की व्यवस्था कर रखी है | जब कोई स्त्री गर्भधारण करती है, तब गर्भ की प्रारम्भिक अवस्था में ही उसके स्तनों का विकास दूध-स्राव के लिए होना प्रारम्भ हो जाता है जिससे नौ माह बाद पैदा होने वाले शिशु को तत्काल ही उचित आहार मिल सके |

           इस संसार में केवल मनुष्य नाम का ही एक प्राणी है, जो आहार के अतिरिक्त पैदा की हुयी क्षुधा को शांत करने के लिए दिन-रात एक किये हुए हैं, भविष्य के न देखे जा सकने वाले हजारों वर्षों की व्यवस्था करने में लगे हुए हैं | हमें आहार चाहिए केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए और प्राण चाहिए इस शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए | स्वस्थ शरीर चाहिए तत्व-ज्ञान की प्राप्ति के लिए, आत्म-बोध के लिए | अतः हमारे जीवन का उद्देश्य केवल मात्र एक आत्म-बोध का ही होना चाहिए, केवल आहार प्राप्त करते रहने का नहीं |

      इसी बात को योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्री राम को उपदेश देते हुए स्पष्ट कर रहे हैं –

             अन्न्नाहार्थं कर्म कुर्यादनिन्द्यं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणार्थम् |

       प्राणा संधार्यास्तत्वजिज्ञासनार्थं तत्त्वं जिज्ञास्यं यें भूयो न दुःखम् ||नि.प्र.उ.21/10||

              अर्थात मनुष्य को चाहिए कि इस संसार में आहार की प्राप्ति के लिए शास्त्रानुकूल अनिंद्य कर्म करे | आहार भी उतना ही करे, जितने से प्राणों की रक्षा हो सके | प्राण रक्षा भी तत्त्व-ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही करे | तत्त्व-ज्ञान की इच्छा सब के लिए अत्यंत आवश्यक है, जिससे फिर से जन्म-मरण आदि दुखों की प्राप्ति न हो | 

              आत्म-ज्ञान प्राप्त करके ही अभय हुआ जा सकता है | भय से मुक्ति ही व्यक्ति को शांति उपलब्ध करवा सकती है | कहने का अर्थ है कि मनुष्य को ज्ञान अभय करता है जबकि अज्ञान भय और दुःख प्रदान करता है | परन्तु ज्ञान प्राप्ति की मुमुक्षा है कहाँ ? आधुनिकता के नक्कारखाने में ज्ञान के शब्द तूती की आवाज़ बनकर दबते जा रहे हैं | इसलिए आधुनिकता को प्रभावहीन करते हुए ज्ञान प्राप्त करने की भूख जगानी होगी | ज्ञान प्राप्ति की भी एक प्रकार की भूख होती है परन्तु यह भूख भोजन से नहीं मिटती बल्कि भजन से मिटती है | ज्ञान की भूख-प्यास को मिटाने के लिए मनुष्य में लगन का होना आवश्यक है |

           ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी महाराज कहा करते थे कि परमात्मा-प्राप्ति के लिए व्यक्ति में लगन का होना सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक है | वे कहा करते थे कि अगर आपमें लगन (Devotion) है, परमात्मा-प्राप्ति की उत्कृष्ट इच्छा है तो फिर परमात्मा आपको प्राप्त होकर ही रहेंगे | ये संत भी कभी-कभी बड़ी विलक्षण (Remarkable) बातें कह जाते हैं | कभी-कभी कोई ऐसी बात कह जाते हैं कि हमारे जैसे साधारण व्यक्ति सोच में पड़ जाते हैं कि उनके कहने का मंतव्य क्या है ? अपने प्रातःकालीन उद्बोधन में हरिः शरणम् आश्रम बेलडा, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा सदैव ही संत-वाणी के अंतर्गत स्वामी जी के प्रवचनों का विवेचन करते हुए उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं | उस समय तो हमें वह बात स्पष्ट हो जाती है परन्तु कुछ समय बाद स्मृति से बाहर हो जाती है । 

                एक ओर तो स्वामी रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि लगन हो तो परमात्मा भी मिल सकते हैं और दूसरी और वे ही संत कहते हैं कि परमात्मा खोए कहाँ है, जो मिल जायेंगे ? वे तो पहले से ही मिले हुए है | जब सुनते हैं तो लगता है कि दोनों बातों में बहुत विरोधाभास हैं | नहीं, विरोधाभास बिलकुल भी नहीं है | ‘परमात्मा मिल सकते हैं’, यह कहना हमारी उस अवस्था को प्रदर्शित करता है जब हमें ज्ञान नहीं हुआ है और हम आत्म-ज्ञान के लिए प्रयास कर रहे हैं | ‘परमात्मा खोए कब हैं, वे तो पहले से ही मिले हुए हैं’, इस कथन का अर्थ है कि परमात्मा हमारे भीतर ही हैं | आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो जाने के बाद ही हमें आभास होता है कि जिसके मिलने के लिए हम प्रयास कर रहे थे वे तो पहले से ही मिले हुए हैं |

         पहली अवस्था उस कृष्ण-मृग की अवस्था है, जो स्वयं की नाभि में ही स्थित कस्तूरी को बाहर जंगल में घास को सूंघ-सूंघ कर ढूंढ रहा है और उसे वह नहीं मिल रही है | दूसरी अवस्था में बाहर की खोज बंद कर दी जाती है और विश्राम की अवस्था को प्राप्त कर लिया जाता है | विश्राम की अवस्था का नाम ही आत्म-ज्ञान है, जहाँ पहुंचकर व्यक्ति को अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल जाते है, उसके मन में कोई प्रश्न शेष नहीं रहता | उसे भली-भांति अनुभव हो जाता है कि जिसको वह बाहर ढूंढ रहा था वह तो उसके भीतर पहले से ही मौजूद है, केवल स्वयं के भीतर ही नहीं सब जगह उपस्थित है, सार्वभौमिक है, सर्वदेशीय है | उसमें और परमात्मा में कोई भिन्नता है ही नहीं , फिर कौन तो ढूंढें और किसको ढूंढें ?

              आत्म-ज्ञान की स्थिति में व्यक्ति स्वयं के होने की स्मृति को पुनः प्राप्त कर लेता है | मोह वश वह अपनी स्मृति खो बैठा है, इतने दिनों तक स्वयं को एक शरीर मान बैठा था परंतु मोह के नष्ट होते ही स्मृति प्राप्त कर वह अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाता है | केवल प्रश्न यही है कि वह इस बात को अपनी स्मृति में कब तक और कैसे बनाये रखे ?

           शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए आहार की आवश्यकता होती है | आहार को प्राप्त करने लिए कर्म करने आवश्यक है (कर्म-योग), तत्व-ज्ञान की प्राप्ति के लिए ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है (ज्ञान-योग) और अहिंसक बनने के लिए हमारा भावना-प्रधान (भक्ति-योग) होना आवश्यक है | तीनों योग मिलकर ही हमें आत्म-बोध को उपलब्ध करा सकते हैं | अकेला एक योग मनुष्य को आत्ममुग्ध बना सकता है | यही कारण है कि केवल ज्ञान व्यक्ति के अहंकार का कारण बनता है और अकेला कर्म व्यक्ति को कर्तापन की ओर ले जाता है | परन्तु भक्ति के साथ ऐसा नहीं है | भक्ति में न तो अहंकार रहता है और न ही कर्तृत्वाभिमान पैदा होता है | भक्ति में अहंकाररहित ज्ञान भी होता हैं और बिना कर्ताभाव के कर्म भी होते रहते हैं |

        श्रीमद्भगवद्गीता में इन तीनों विषयों पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में सारगर्भित ज्ञान दिया है | हम सब अज्ञान के कारण अपने जीवन में सदैव किसी न किसी बात का अभाव मानकर अभय नहीं हो पा रहे हैं | दुःख का कारण भय है और भय का मूल कारण अज्ञान है | जीवन में गीता की सार्थकता तभी सिद्ध होगी जब हम भावना-प्रधान रहते हुए कर्म करें और ज्ञान को भी उपलब्ध हों |        

    इतने लम्बे विवेचन से स्पष्ट है कि गीता-ज्ञान के आधार पर चलें और भगवान् श्री कृष्ण की बातों को जीवन में विस्मृत न होने दें तो जीवन में सभी विकारों से मुक्त होकर निर्भय हुआ जा सकता है | हमारा भयरहित हो जाना ही इस बात की पुष्टि करता है कि हम विकार मुक्त हो गए हैं | अब इस विषय का समापन करते हुए कुछ कड़ियों में इसका उपसंहार करते हैं |

             एक गृहस्थ को अपने जीवन कैसे जीना चाहिए, यह बात हमें गीता से अधिक अच्छे तरीके से कोई अन्य समझा नहीं सकता | हम अपने मन की शुद्धि के लिए न जाने कितने प्रपंच करते रहते हैं | निरुद्देश्य भटकते रहते हैं और जीवन का संध्या-काल आ जाता है और मन की अशांति मिट नहीं पाती | गीता मन को शांत करने का सुगम मार्ग बतलाती है | मनुष्य जीवन में इस भौतिक शरीर से कर्म होंगे ही | सकाम कर्म विकारों के जनक हैं जो विषय-भोगों अर्थात सांसारिक सुख प्राप्त करने की इच्छा से किये जाते हैं | हम अपने जीवन में यह तो इच्छा रखते हैं कि परमात्मा हमें सभी दोषों और विकारों से मुक्त रखे परन्तु कर्म ऐसे करते हैं और इस प्रकार के करते हैं कि विकारों का त्याग न होकर दिन प्रतिदिन उनमें वृद्धि ही होती जाती है | ऐसी स्थिति में हमें अपने कर्मों के स्वरूप के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा | कर्मों के स्वरूप में परिवर्तन करके ही हम समस्त विकारों से दूर हो सकते हैं | यही कर्म-योग है और इस कर्म-योग को साधने का सर्वोत्तम मार्ग है, भक्ति और ज्ञान | ज्ञान इस बात का सदैव बना रहे कि कर्म हम नहीं करते है बल्कि प्रकृति के गुणों के द्वारा ही होते हैं | जिस दिन हमें इस बात का ज्ञान हो जायेगा तो हम स्वयं को किसी भी कर्म का कर्ता नहीं मानेंगे | कर्ता-भाव रखना ही समस्त विकारों की जड़ है |

                  अब प्रश्न यह है कि हम विकार से मुक्त एक बार तो हो जाते हैं परन्तु वही विकार हमारे भीतर क्यों पुनः प्रवेश पा जाता है ? मोह ही ऐसा विकार है, जो मन के बाहर भीतर होता रहता है | इसका कारण है कि हमें अभी तक कर्म का विज्ञान पूर्ण रूप से समझ में नहीं आया है | जब तक कर्म-विज्ञान पूर्ण रूप से समझ में नहीं आएगा तब तक विकार बार-बार आते जाते रहेंगे | ज्ञान जब आत्मसात नहीं हो सके तो अपने आप को परमात्मा को समर्पित कर दें | संसार से प्रेम करने के स्थान पर परमात्मा से प्रेम करें | इससे आपका कर्ता-भाव भी समाप्त हो जायेगा और आपको ज्ञान भी प्राप्त हो जायेगा | इसीलिए भक्ति-योग को ज्ञान-योग से श्रेष्ठ बताया गया है | भक्ति योग से आपके भीतर के कामादि सभी विकार चले जायेंगे और आप परम शांति को उपलब्ध हो जायेंगे |

                      गीता-ज्ञान की सार्थकता को मैंने अल्प रूप से समझाने का प्रयास किया है | मैं जानता हूँ कि गीता की सार्थकता को शब्दों के एक निश्चित क्षेत्र में बाँध पाना असंभव है फिर भी एक प्रयास किया है |

            गीता-ज्ञान को अर्जुन पूर्ण रूप से सार्थक नहीं कर सका, यह सत्य है | हम भी तो अर्जुन की तरह ही हैं | हम गीता के प्रति श्रद्धा भाव तो रखते हैं परन्तु उस ज्ञान के अनुसार चलते नहीं है | हमें गीता से ज्ञान मिलता है, कुछ ज्ञान आत्मसात भी करते हैं और साथ ही कुछ संशय ग्रस्त भी रहते हैं | ऐसे में भला गीता-ज्ञान की क्या कमी है ? हम परमात्मा की सेवा, पूजा अर्चना सब कुछ मन लगाकर करते हैं परन्तु उसी परमात्मा के बनाये और बताये हुए सिद्धांतों का अनुगमन करने के प्रति सदैव संशयग्रस्त बने रहते हैं | हमें लगता है कि गीता-ज्ञान अलग बात है, उस ज्ञान के अनुसार इस संसार में रहकर जीवन चलाना मुश्किल है | हमारी सोच ही कुछ इस प्रकार की हो गयी है कि हम मानने लगे हैं कि संसार में रहना केवल संसार के अनुसार चलने से ही संभव है | मैं बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ इस बात से | 

            गीता-ज्ञान एक व्यावहारिक ज्ञान है और इसे व्यवहार में लाए जाने से ही आनंद की अनुभूति होगी | हमने इस ज्ञान को अब तक केवल एक किताबी ज्ञान बना रखा है, इस ज्ञान को जीवन में उतारने का प्रयास तक नहीं किया है | अतः सभी प्रकार के संशय छोडिये और इस ज्ञान को एक-एक कर जीवन में उतारना प्रारंभ कीजिये | विज्ञान की पुस्तकों में लिखा है कि प्रत्येक क्रिया के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया अवश्य और उसी अनुपात में होती है | इसी बात को सनातन शास्त्र शताब्दियों से कहते आ रहे हैं कि प्रत्येक कर्म का उसी अनुपात में फल अवश्य प्राप्त होता है | हमारी प्रत्येक क्रिया ही कर्म है | हम शताब्दियों तक इस बात को पढ़ते आये हैं परन्तु व्यवहार में नहीं ला सके | जिस एक व्यक्ति ने इस ज्ञान को भौतिक रूप से व्यवहार में लिया, तो उसने इस ज्ञान का उपयोग करते हुए रॉकेट बना डाला जिसके कारण आज अंतरिक्ष की यात्रा संभव हुई है | इसी ज्ञान का आध्यात्मिक स्तर पर उपयोग किया जाये तो व्यक्ति का कल्याण हो जाये |

              ज्ञान और नाम, दोनों को केवल रटते रहने से कुछ नहीं होने वाला | रटते रहने से ही ज्ञान अगर सार्थक होता तो राम-राम रटते रहने वाला तोता कभी का जीवन-मुक्त हो गया होता | हमें गीता के प्रति श्रद्धा रखने के साथ-साथ उसमें समाहित ज्ञान को जीवन में उतारकर उपयोगी बनाना होगा तभी यह ज्ञान सार्थक सिद्ध होगा | कृषि-भूमि चाहे कितनी ही उपजाऊ हो, उस पर हल चलाने से ही उपज मिल सकती है अन्यथा केवल बैठे –बैठे उस भूमि को निहारते रहिये, उपज मिलने से रही | हम गीता को उपजाऊ भूमि मानते अवश्य हैं परन्तु उसमें समाहित ज्ञान को हल चलाकर उसका दोहन करना नहीं जानते |

          समस्त ज्ञान भी अर्जुन को मुक्त नहीं कर सका, फिर हमें कैसे मुक्त करेगा ? भगवान श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्म और ज्ञान योग कहने के बाद भक्ति और शरणागति पर जाने से पहले एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही है | गीता 7/14 में भगवान ने कहा है कि मेरी यह माया बड़ी दुस्तर है अर्थात मेरी माया को समझना और इससे पार हो जाना बड़ा कठिन है | इस माया के कारण ही हम गीता-ज्ञान को ग्रहण करके भी उसको बार-बार भूल जाते हैं | यह सब उस माया का ही प्रभाव है | अगर हम इस त्रिगुणी माया को भली भांति समझ लें तो तीनों गुणों का उल्लंघन कर गुणातीत हो सकते हैं | अर्जुन भी इस ज्ञान को पाकर सत्व गुण की अवस्था तक पहुँच गया था परन्तु गुणातीत नहीं हो सका क्योंकि वह परमात्मा के साथ रहते हुए भी उसकी इस माया से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाया था | वह कुछ समय के लिए माया-जाल से निकलता और कुछ समय बाद पुनः उसी माया में उलझ जाता | उसके साथ ऐसा क्यों हुआ ? कारण- मोह और अहंकार | मोह, परिवार का, अहंकार अपने आपको कर्ता मानने का | यह दो विकार ही हमें अर्जुन की तरह बार-बार गीता-ज्ञान से दूर ले जाते हैं और पुनः सांसारिक मोह-माया में उलझा देते हैं |

         मोह आदि विकार चला जाता है परन्तु पुनः लौट आता है, ऐसे में क्या करना चाहिए जिससे कि विकार वापिस नहीं आये ? अगर बाहर किया हुआ विकार वापिस लौट आता है इसका एक ही अर्थ है कि विकार का त्याग मन से नहीं किया गया था बल्कि यह एक सम सामयिक किया गया त्याग था, जिसे साधारण भाषा में मसानिया वैराग (किसी मृतक की अंत्येष्टि में जाने से उत्पन्न हुआ वैराग्य ) कहा जाता है | जीवन में विषम परिस्थितियां बन जाने पर हम एक बार उस विकार को त्याग तो देते है परन्तु बार-बार विषय-चिंतन से वह विकार पुनः लौट आता है | विकारों के इस आवागमन को रोकने का एक मात्र उपाय है, समस्त विषयों के प्रति अनासक्त हो जाना | विषय-भोग उपलब्ध हुए तो अच्छा, नहीं मिल पाए तो भी ठीक | न विषयों के प्रति आसक्ति और न ही इनसे विरक्ति | ऐसे में अनासक्त रहकर जीना ही एक मात्र उपाय है, विकारों को नियंत्रित करने के लिए |

                      विकारों के शरीर में प्रवेश करने से रोकने के भी वही तीन मार्ग-कर्म, ज्ञान और भक्ति | कर्म हमारे भीतर कर्तापन पैदा कर सकता है यानि मोह (अज्ञान) और अहंकार स्वयं के कर्ता होने का | ज्ञान अहंकार ला सकता है, स्वयं के ज्ञानी हो जाने का | शेष रहा एक- भक्ति-मार्ग | इस मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के सामने विकार ग्रस्त होने के कम अवसर हैं, हालाँकि इसमें भी व्यक्ति कभी–कभी संशय ग्रस्त हो सकता है | इसीलिए गीता के अंतिम और समापन चरण में संशयग्रस्त अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण सब कुछ छोड़-छाड़ कर शरणागत होने का कह देते हैं –‘सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’| अतः सरलतम उपाय हुआ, शरणागति | हरिः शरणम् आश्रम, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा शरणागति पर एक भजन सुनाया करते हैं – ‘नाथ थार शरण आयो जी, जच जिस तरह खेल खिलाओ, थे मन चाह्यो जी, नाथ मैं शरण आयो जी .......|'  शरणागत हो जाने से कोई भी विकार भीतर रह ही नहीं सकता और न ही उसके पुनः लौट आने का खतरा रहता है | शरणागति अर्थात न तो कुछ करने का राग, न कुछ जान लेने का अहंकार और न ही परमात्मा के बारे में किसी प्रकार का संशय | कर्म आपको रजस में भटका सकते हैं, ज्ञान राजसिक गुणों से सात्विक गुणों की ओर ले जाता है, भक्ति सत्व गुणों से भरकर आपको सात्विक गुणों के उच्चत्तम स्तर पर पहुंचा सकती है परन्तु शरणागति आपको सभी गुणों से परे ले जाकर गुणातीत कर सकती है | इस प्रकार शरणागति सर्वश्रेष्ठ हुई, तभी तो मीरा भी बोल उठी थी -‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई ...|’

                     कहने का अर्थ है कि हमें परमात्मा के प्रति पूर्ण श्रद्धा-भाव रखना होगा और समर्पण के साथ अनन्य भक्त बनना पड़ेगा | किसी भी प्रकार का संशय मन में न रखते हुए शरणागत हो जाएँ | कर्म करना छोड़ना नहीं है बल्कि उनमें सुधार करते हुए नैष्कर्म्यता को अपनाना होगा | किसी भी कर्म का कर्ता नहीं बनना है | ज्ञान-योग यही बात तो कहता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों के कारण होते हैं | गुणों में सुधार करते हुए उनके अनुसार कर्म करते रहना ही कर्म-योग है | सद्गुणों से किये जाने वाले कर्म ही निष्काम-कर्म हैं | माया का अर्थ है भ्रम | भ्रम इस बात का कि मैं कर्म करता हूँ जबकि सत्य बात यह है कि हम कर्म करते नहीं हैं बल्कि हमारे माध्यम से कर्म होते हैं | पुत्र हमारा नहीं है, बल्कि हमारे माध्यम से इस संसार में उसका आगमन हुआ है | इस बात को हम स्वीकार करें तो पुत्र में मोह पैदा नहीं होगा, परिवार में मोह पैदा नहीं होगा | भगवान ने अर्जुन को स्पष्ट रूप से कह दिया था कि इस युद्ध में खड़े सभी योद्धाओं का मरना मेरे द्वारा पहले ही निश्चित किया जा चूका है, तू तो इनको मारने का केवल निमित्त मात्र  बन जा | हुआ भी वही, जो श्री कृष्ण ने कहा था परन्तु अर्जुन ने स्वयं को निमित्त मात्र माना ही कहाँ था ? वह तो महाभारत युद्ध के उपरांत श्री कृष्ण द्वारा दिया गया समस्त ज्ञान भूलकर उन योद्धाओं को मारने के लिए स्वयं को कर्ता मान बैठा था | यही अर्जुन का अहंकार था और हम भी अपने जीवन में ऐसे एक नहीं अनेकों अहंकार पाले हुए बैठे हैं |

               हम भोजन करते हैं और भोजन पचाने की क्रिया हमारे उदर में स्वतः होती है | क्या हम कह सकते हैं कि किये गए इस भोजन को मैं पचा रहा हूँ ? नहीं कह सकते क्योंकि भोजन स्वतः ही प्रकृति प्रदत्त गुणों के कारण पचता है | हम केवल इतना कह सकते हैं कि मेरी पाचन शक्ति अच्छी/ख़राब है | इसी प्रकार जब हमारा विवाह हो जाता है, पत्नी आ जाती है और फिर पुत्र पैदा हो जाता है तब उनमें मोह हो जाता है और कहने लग जाते हैं-यह मेरी पत्नी/पुत्र है । क्यों कहते हैं ? व्यवहारिक दृष्टि से तो कह सकते हैं परंतु मोहवश नहीं कहना चाहिए | हम किसी भी कर्म को करने के लिए केवल एक माध्यम मात्र हैं, कर्ता नहीं हैं |

         गोस्वामीजी मानस में कहते हैं –

मैं अरु मोर तोर तैं माया | 

जेहिं बस कीन्हें जीव निकाया ||

गो गोचर जहँ लगि मन जाई |

 सो सब माया जानेहु भाई ||

                           (अरण्यकाण्ड -15/2-3)

भगवान राम अपने अनुज लक्ष्मण को कह रहे हैं कि मैं और मेरा, तूं और तेरा – यही माया है; जिसने सभी जीवों को अपने वश में कर रखा है | इन्द्रियों के विषय और जहाँ तक मन जाता है, हे भाई ! उस सबको माया जानना |

                  इस माया को जान लेने और फिर उसी अनुसार अपने जीवन को बना लेने से ही हम गीता-ज्ञान को सार्थक कर पाएंगे अन्यथा आवागमन के चक्र से मुक्त नहीं हो पाएंगे | माया के कारण ही हमारी कभी श्रद्धा बढ़ती है और कभी दुष्टता; कभी हम ज्ञान को मानने लगते हैं, फिर उसी ज्ञान पर संशय भी करने लगते है | हमारी स्थिति ऐसी हो जाती है जैसी एक धोबी के कुत्ते की होती है | आया के साथ आया, गए के साथ गया | ऐसे में यह आवागमन कैसे मिटे ? माया भगवान ने बनाई ही हमें उलझाने के लिए है | अगर हम सभी माया का उल्लंघन कर जाये तो फिर यह संसार कैसे अनवरत रूप से चलेगा ? इस माया में हम स्वयं ही जानबूझकर उलझते हैं | एक मृग को जब दोपहर में प्यास लगती हैं तब वह मृग-तृष्णा को देखकर दूर कहीं पानी होना समझकर उस और दौड़ पड़ता है परन्तु वहां पहुँचने पर उसे पानी मिलता नहीं है | जल के होने का भ्रम तो कहीं और आगे बढ़ चूका होता है | इस प्रकार का भ्रम ही तो व्यक्ति को इधर से उधर, उधर से इधर दौड़ता रहता है | यह माया ही मृग-तृष्णा है | हमें सब कुछ अपनी इच्छानुसार प्राप्त कर लेने का भ्रम होता है और इस प्रकार हम किसी न किसी को और कुछ न कुछ पाने के लिए जीवन भर दौड़ते रहते हैं | 

            एक जीवन, फिर दूसरा जीवन, ऐसे ही न जाने कितने जीवन, अनंत जीवन | फिर भी प्यास कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जाती है | इस अनंत यात्रा में हम उलझते जाते हैं परन्तु हमें प्राप्त कुछ भी नहीं होता | जिस दिन हम इस माया को पूर्णरूप से समझ जायेंगे फिर इसमें नहीं उलझेंगे | हमारी दौड़ भी थम जाएगी |

                माया को समझकर सभी विकारों से हम स्वयं को मुक्त रख सकते हैं | विकार-मुक्त जीवन ही आनंददायक होता है | शेष सभी सुख-दुःख केवल भ्रम जाल हैं, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | हमें गीता-ज्ञान के अनुसार स्वयं को ही बदलना होगा तभी इस ज्ञान की सार्थकता होगी |

                 प्रश्न यह उठता है कि भगवान ने यह माया फिर बनाई ही किस लिए ? अगर माया नहीं होती तो यह संसार अस्तित्व ही नहीं लेता | अगर माया को समझकर सभी व्यक्ति इससे पार चले जाते तो फिर अब तक यह संसार कभी का समाप्त हो चूका होता | माया उस परम पिता ने बनाई ही इसलिए है कि वह देखना चाहता है कि कौन इस माया को समझकर इसमें उलझने से बच जाता है ? माया में उलझने से बचने का अर्थ है, मायातीत हो जाना जो कि साक्षात् परमात्मा हैं | पूरे एक वर्ष तक हम एक कक्षा में अध्ययन रत रहते हैं | वर्ष के अंत में एक परीक्षा होती है, जिसमें प्रश्न पत्र के माध्यम से कई प्रश्न पूछे जाते हैं | जो इन सब प्रश्नों का सही-सही उत्तर दे देता है, वह विद्यार्थी सर्वोत्तम सिद्ध होता है | वह परीक्षक के द्वारा पूछे जाने वाले घुमावदार प्रश्नों के जाल में नहीं उलझता बल्कि उन प्रश्नों को समझकर उनका उत्तर देकर उनसे बाहर निकल जाता है | यह माया भी ऐसे ही घुमावदार उलझाने वाले प्रश्नों की तरह एक प्रश्न-पत्र है | हमें इसको समझकर इस भौतिक जगत में अपनी भूमिका निभाते हुए इस माया रुपी संसार के पार चले जाना है |

                आपको सदैव अपने भीतर जन्म ले रहे विकारों पर पैनी दृष्टि रखनी होगी | क्रोध आता है, तो क्रोध को ध्यान से देखें | पता लगाओ कि क्रोध किस कामना के पूरा न होने से आया है | उस कामना का विश्लेषण करो कि क्या आपकी यह कामना शुभ थी अथवा अशुभ | अशुभ कामना है तो भविष्य में ऐसी कामना  करें ही नहीं और शुभ कामना है तो यह समझें कि जिस व्यक्ति पर क्रोध आया है, वह आपकी शुभ कामना को सही रूप से समझ नहीं पाया है | इस क्रोध से आपका ही नुकसान हो रहा है, सामने वाले का नहीं | इस प्रकार के क्रोध को करने से क्या लाभ ? धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपका क्रोध कम हो रहा है, उसकी आवृति और तीव्रता दोनों ही कम होती जा रही है | कामनाओं पर भी नियंत्रण स्थापित होता जा रहा है | इस प्रक्रिया के सतत चलते रहने से धीरे-धीरे दूसरे दोष और विकारों से भी आप मुक्त होते चले जायेंगे | प्रारम्भ में कुछ असुविधा हो सकती है, परन्तु धैर्य के साथ ऐसा करते रहेंगे तो विकारों से दूर रहने में सफलता मिलने लगेगी | इस प्रकार आप अपनी स्वयं की प्रगति का आकलन कर सकते हैं |

               हम भी गीता से ज्ञान प्राप्त कर कह सकते हैं-‘करिष्ये वचनं तव’ परन्तु मात्र इस प्रकार कहने का कोई अर्थ नहीं है जब तक गीता के अनुसार किया नहीं जाये | अर्जुन ने भी ये शब्द तभी कहे थे जब कर्म, ज्ञान और भक्ति पर लम्बा चौड़ा व्याख्यान देने के बाद भी अर्जुन के प्रश्न समाप्त नहीं हो रहे थे | अंततः भगवान् को कहना पड़ा – ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’ अर्थात तू इतना सब छोड़ केवल मेरी शरण में आ जा | कर्म और ज्ञान को समझना और उनकी अनुपालना करना बड़ा ही मुश्किल कार्य प्रतीत होता है | भक्ति में हम लोग क्रिया से आगे नहीं बढ़ पाते हैं, ऐसे में एक परमात्मा की शरण में जाना ही सरल और सर्वोत्तम मार्ग रह जाता है | परन्तु वह शरण उसी प्रकार की होनी चाहिए जैसी मीरा ने ली थी, तुलसी ने ली थी, सूर ने ली थी | शरणागति से ही मुक्ति की राह निकलती है और जीवन मुक्त हुआ जा सकता है।

       अंत में मैं बड़ी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूँ कि मैंने स्वयं के स्तर पर कोई राह नहीं सुझाई है बल्कि विभिन्न धर्म ग्रंथ विशेष रूप से गीता को पढ़कर यह राह जो कुछ मेरे समझ में आई है वह आपके साथ साझा की है | मैं स्वयं अभी भी इस राह पर चलने का प्रयास कर रहा हूँ और मैंने पाया है कि गीता-ज्ञान के आधार पर अगर जीवन जिया जाये तो इन विकारों से धीरे-धीरे मुक्त हुआ जा सकता है और जीवन में आनंद की अनुभूति की जा सकती है | मैं यह तो नहीं कहता कि मैंने उस तत्व को प्राप्त कर लिया है जिसको प्राप्त करने की कामना प्रत्येक कोई इस मार्ग पर चलने वाला करता है परन्तु इतना सत्य अवश्य है कि जीवन में 180 डिग्री (अक्षांश) का परिवर्तन अवश्य ही इस मार्ग पर चलने से आया है |

            हमारे शरीर की परिधि पर स्थित इन्द्रियां बाहर की तरफ विषय प्राप्त करने को दौड़ती रहती है | विषयों के साथ हमारे भीतर विकार प्रवेश करेंगे ही |अध्यात्म की यात्रा में इन इन्द्रियों की दौड़ को पूर्ण रूप से बदलना होता है | इन्द्रियों को विषयों की भूख से मोड़कर आत्म-बोध की भूख की ओर लगाना होगा | परिधि पर स्थित इन्द्रियों की बाह्य दृष्टि को आंतरिक दृष्टि देनी होगी | यह कार्य गीता-के ज्ञान से संभव हो सकता है | ‘करिष्ये वचनं तव’ की पूर्ण रूप से पालना करते हुए ज्ञान को कभी विस्मृत नहीं होने देना है, तभी आत्मा तक पहुंचकर परमात्मा को पा सकेंगे |

            अध्यात्म की राह परमात्मा की राह है और इसका अनुगमन जीवन पर्यंत करने से ही आनंद की अवस्था को उपलब्ध हुआ जा सकता है | इसका अनुपालन करने की मन में दृढ इच्छा होनी चाहिए, फिर जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है | केवल उस एक का आश्रय ही महत्वपूर्ण है फिर किसी अन्य का आश्रय लेने की आवश्यकता ही नहीं है।"करिष्ये वचनं तव" तभी सिद्ध होगा,जब हम करना,जानना छोड़ एक परमात्मा को मानते हुए पूर्ण रूप से श्रद्धा रखते हुए उसके प्रति समर्पित हों ।स्वीकर करें -"अब तो केवल उस एक की ही शरण ....... अन्य कुछ भी नहीं |"

     इसी के साथ यह महत्वपूर्ण श्रृंखला समाप्त करने की आज्ञा चाहूँगा | 

|| हरिः शरणम् ||

प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल 


Tuesday, May 3, 2022

करिष्ये वचनं तव -31से60

 करिष्ये वचनं तव-31से60

                अर्जुन को मोह और मद, ये दो विकार ही ले डूबे | भगवान श्री कृष्ण जैसे गुरु भी उसे इन दो प्रमुख विकारों से मुक्ति नहीं दिला सके | इधर हम है, जो इन दो ही नहीं बल्कि समस्त विकारों के साथ जीवन की गाड़ी को खेचे चले जा रहे हैं | ऐसे में हमारा भविष्य कैसा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है | अर्जुन के दो विकार उसे बैकुण्ठ ही नहीं, सीधे स्वर्ग तक को भी उपलब्ध नहीं करा सके, स्वर्ग से पहले उन्हें कुछ दिनों के लिए नरक में जाना ही पड़ा था | अर्जुन के लिए बैकुण्ठ तो दिवास्वप्न ही बना रहा | हम इस देह को त्यागने के बाद कहाँ होंगे, इस बात की तो बस केवल कल्पना ही की जा सकती है |

            महाभारत युद्ध से एक बात तो स्पष्ट हो गई कि मनुष्य को चाहे परमात्मा से ही ज्ञान क्यों न मिल जाये, उसके लिए उस ज्ञान को जीवन भर स्मृति में बनाये रखना आवश्यक है | अगर क्षण भर के लिए भी ज्ञान को विस्मृत किया तो मनुष्य किसी भी विकार से ग्रस्त हो सकता है | इन विकारों में से किसी भी एक विकार के प्रवेश करते ही शेष सभी विकार मनुष्य में एक-एक कर आ ही जायेंगे | इसीलिए आध्यात्मिक जीवन को सावधानीपूर्वक जीना पड़ता है | ‘महाभारत’ में जब कुरुक्षेत्र-युद्ध के बाद श्री कृष्ण द्वारिका जा रहे होते हैं तब अर्जुन उनसे गीता-ज्ञान को एक बार फिर से दोहराने को कहते हैं |

          उसी ज्ञान को दोहराने के लिए कहने का अर्थ है कि अर्जुन कुरुक्षेत्र में दिए गए ज्ञान को विस्मृत कर चूका है | ज्ञान विस्मृत विपरीत परिस्थितियों में तो हो जाता है परन्तु अर्जुन के तो महाभारत के उपरांत सभी परिस्थितियां अनुकूल थी | ऐसे में ज्ञान के विस्मृत हो जाने का कारण क्या रहा होगा ?

      भगवान् श्रीकृष्ण द्वारका लौटने के लिए राजमहल से निकलने की तैयारी कर रहे हैं तभी अर्जुन भगवान् को वही ज्ञान पुनः कहने का कह रहे हैं -

यत्तु तद्भवता प्रोक्तं तदा केशव सौहृदात् |

तत्सर्वं पुरुषव्याघ्र नष्टं में नष्टचेतसः ||अनुगीता–1/6||

अर्जुन कह रहे हैं कि हे पुरुषव्याघ्र ! जो उस समय आपके द्वारा बताया गया था वह सब मुझ नष्टचित्त का नष्ट हो गया है |

              तब भगवान् कहते हैं कि हे पार्थ ! मेरे द्वारा तुम्हें रहस्यात्मक बात सुनायी गयी थी,सनातन तत्व के बारे में भी बताया था, धर्म का स्वरुप और सभी शाश्वत लोकों के बारे में भी बताया था | हे पाण्डव ! तुमने उस समय सम्पूर्ण रूप से बुद्धिहीन होकर नहीं सुना, वह मेरे लिए अत्यंत अप्रिय है | अब आज उस ज्ञान को दुबारा याद करना मेरे लिए भी संभव नहीं है | कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर दिया वह ज्ञान सम्पूर्ण ब्रह्म को जानने के लिए पर्याप्त था | उसे पूरी तरह दोहरा पाना अब मेरे लिए संभव नहीं है क्योंकि अब परिस्थितियां बदल गई है |

नूनम श्रद्धानोSसि दुर्मेधा ह्यासि पाण्डव |

न च शक्यं पुनर्वक्तुमशेषेण धनंजय || अ.गी.-1/11||

            निश्चय ही तुम श्रद्धाहीन हो और मूढ़ भी | हे धनञ्जय ! मैं तुम्हें अब पूरी तरह से दुबारा न बता पाउँगा |

        इससे स्पष्ट है कि अर्जुन युद्ध की परिस्थिति में तो अपने मित्र को गुरु मान रहा था परन्तु उस समय उसमें गुरु के प्रति श्रद्धाभाव स्थाई रूप से नहीं बन पाया था | जिस मनुष्य की गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण नहीं होता, उसका ज्ञान विस्मृत हो सकता है |

            उसी ज्ञान को दोहराने का अर्जुन द्वारा आग्रह होने पर भगवान श्री कृष्ण व्यथित हो जाते हैं, फिर भी वे एक बार अर्जुन को वही ज्ञान दुबारा देते हैं | इस ज्ञान के संकलन को ‘अनु-गीता’ कहा जाता है | अनु-गीता में भक्ति-योग को नहीं कहा गया है | ज्ञान और कर्म-योग को पुनः कहा गया है | इसका पहला कारण है कि अर्जुन अब युद्ध की मानसिकता से पूर्णतया बाहर निकल आया है और संसार में रम गया है | ऐसे में उसको अधिक आवश्यकता कर्म-योग और ज्ञान-योग की है | दूसरा कारण है कि कर्म और ज्ञान के अंतर्गत भक्ति-योग भी आ जाता है | अतः भगवान ने उसे अब भक्ति-योग के स्थान पर कर्म और ज्ञान पर निर्देश देना अधिक उचित समझा, जिससे कि वह पुनः सांसारिक विकारों में न फंस पाए |

        मनुष्य कितना ही सात्विक प्रवृति वाला हो, कब उसके भीतर तामसिक अथवा राजसिक गुण प्रभावशाली हो सकता है, कहा नहीं जा सकता | इसलिए मनुष्य को समस्त जीवन में सावधान रहना पड़ता है क्योंकि इस संसार में फिसलकर पतित होने के बहुत से आकर्षण है | जब तक अपने लक्ष्य तक पहुँच नहीं जाएँ तब तक सावधान बने रहने की आवश्यकता है | लक्ष्य तक सकुशल पहुँचना तभी माना जायेगा जब हमारे सभी प्रारब्ध समाप्त हो जायेंगे | प्रारब्ध समाप्त होते ही यह शरीर भी गिर जायेगा और नए शरीर की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी | कहने का तात्पर्य है कि जब तक यह भौतिक शरीर है तब तक हमें सावधानी रखनी होगी अन्यथा पतन होते देर नहीं लगेगी | जब तक शरीर है तब तक बाहर खड़े विकार उसके भीतर प्रवेश पाने की प्रतीक्षा में खड़े रहते हैं |

          विकार ही बंधन है, विकार ही वह जाल है जिसके कारण हम संसार में उलझे रहते हैं | विकार ही हमें कर्म-बंधन में डाल देता है | विकार ही सब समस्याओं की मूल में है | विकार से मुक्त कैसे हुआ जा सकता है ? जब तक हम उन विकारों को भली भांति समझ नहीं लेंगे तब तक उनसे मुक्त होने का विचार तक नहीं कर सकते | गीता-ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब हम इस ज्ञान को सदैव स्मृति में बनाए रखें तथा उसी ज्ञान के अनुसार चलें और अपने जीवन को विकार-मुक्त बनायें |

                  अर्जुन के जीवन को समझ लेने के पश्चात यह स्पष्ट हो जाता है कि हम चाहे कितनी ही पूजा-पाठ जैसी विभिन्न क्रियाएं कर लें और चाहे भगवान श्री कृष्ण स्वयं भौतिक रूप से आकर हमारे साथ जीवन भर रह लें, मुक्त होने के लिए तो उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को अपने हृदय में सदैव के लिए बनाये रखना होगा | समस्या ज्ञान को सुनने और जानने की नहीं है, ज्ञान तो सार्वकालिक और प्रत्येक स्थान पर उपलब्ध है | समस्या है उस ज्ञान को स्मृति में बनाये रखने की | ज्ञान विस्मृत हुआ नहीं कि मन में विकार प्रवेश पा जाते हैं | अर्जुन ज्ञान को विस्मृत करता गया और विकार उसमें एक एक कर प्रवेश करते गए | भगवान उस ज्ञान का फिर से स्मरण कराते, अर्जुन पुनः सक्रिय होकर अस्थाई रूप से समता धारण कर लेता परन्तु कुछ समय उपरांत वही ढाक के तीन पात | ये मानसिक विकार ही मुक्ति में बाधक है, परमात्मा-प्राप्ति में बाधक है, आत्म-ज्ञान में बाधक है | तो आइये, अब सबसे पहले हम उन मानसिक विकारों की तरफ चलकर उनकी खबर लेते हैं |

                परमात्मा ने हमें विकार रहित ही बनाया है परन्तु संसार में आकर हम कर्म-जाल में इस प्रकार उलझ गए हैं कि विकार ग्रस्त हो गए हैं | हमारे शास्त्रों में मुख्यरूप से छः विकार माने गए हैं | इन्हें षट्-विकार के नाम से कहा गया है | ये छः विकार हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य | वैसे शास्त्रों में कई स्थानों पर सात विकार भी बताये हैं | उपरोक्त छः विकारों में अंतिम विकार मात्सर्य के स्थान पर राग और द्वेष विकार मिलाने पर मुख्य विकारों की संख्या सात हो जाती है | वृहद् रूप से (Broadly) देखा जाये तो विकार अनगिनत है परन्तु इनके अतिरिक्त किसी न किसी विकार का आधार इन मुख्य विकारों में से कोई एक विकार अवश्य होता है | 

          विकार, विकार ही होते हैं और आत्म-ज्ञान के लिए समस्त विकारों का त्याग करना आवश्यक है | मन का शुद्धिकरण समस्त प्रकार के विकारों के त्याग करने से ही संभव हो सकता है | इसे भीतर की शुद्धि अर्थात आत्म-शुद्धि भी कहा जाता है | शुद्ध मन से ही मनुष्य जीवन-मुक्त हो सकता है अन्यथा उसको आवागमन से कभी मुक्ति नहीं मिल सकती | शुद्ध मन और आत्मा में कोई अंतर नहीं है | शुद्ध मन ही आत्मा कहलाता है। प्रकाश में सात रंग होते हैं परन्तु वह हमें सफ़ेद यानि रंगहीन ही दृष्टिगत होता है | हमारा चैतन्य भी प्रकाश स्वरूप होता है | हमारा शरीर जिसमें हमारी जीवात्मा रहती है, वह भी उसी चैतन्य से प्रकाशित होती है | इसी प्रकार शुद्ध मन भी प्रकाश स्वरूप होता है ।

                 किसी वस्तु पर जब प्रकाश पड़ता है, तब वह किसी एक विशेष रंग की दिखलाई पड़ती है | इसका क्या कारण है ? संसार की सभी वस्तुओं पर प्रकाश समान रूप से पड़ता है ? प्रत्येक वस्तु प्रकाश के सात रंगों में से कुछ रंग को अवशोषित (Absorb) कर लेती है और शेष बचे रंग को परावर्तित (Reflect) कर देती है | जिस रंग को वह परावर्तित करती है, हमें उस वस्तु का वही रंग दिखलाई पड़ता है | परावर्तित अर्थात त्यागा गया रंग ही उस वस्तु का रंग होता है, अवशोषित किया हुआ नहीं | इसी प्रकार इस संसार में आने के उपरांत हमारे मन के भीतर भी विकार रुपी रंग प्रवेश कर जाते हैं | जिस प्रकार सभी सातों रंगों को परावर्तित कर दिया जाता है तो वह वस्तु हमें प्रकाश के रंग की अर्थात (सफ़ेद) रंगहीन दिखलाई पड़ती है | इसी प्रकार अगर हम सभी विकारों को त्याग देते हैं, तो हमारा जीवन भी प्रकाशित हो सकता है | केवल एक या दो विकार त्याग भी दिए जाएँ तो भी हमारा कोई न कोई रंग त्याग के रूप में तो दिखाई दे सकता है परन्तु इसका अर्थ है कि वास्तव में हम विकार-मुक्त नहीं हुए हैं | मन के भीतर प्रवेश कर गए समस्त विकारों का त्याग किये बिना हमारा प्रकाशित होना असंभव है | अतः आत्म-ज्ञान के लिए समस्त विकारों का त्याग करना आवश्यक है |

                  विकार (Disorder) क्या है और मनुष्य में आखिर प्रवेश कैसे करते हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर मिल जाने पर ही हम विकार-मुक्त होने की सम्भावना तलाश सकते हैं अन्यथा नहीं | गीता-ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब हम समस्त विकारों से मुक्त हो जाएँ | जब कोई वस्तु अपने मूल स्वरूप को खो देती है, तब कहा जा सकता है कि उस वस्तु में विकार आ गया है | इस भौतिक शरीर में विकार आने से हम रोग-ग्रस्त हो जाते हैं और विकार के जाते ही रोग-मुक्त ।

               दूध में विकार आ जाने पर वह फट जाता है | दूध में पैदा हुए इस विकार को दूध का खट्टा हो जाना कहते हैं, अर्थात खटास (Acid) ही वह विकार है, जो दूध का स्वरूप परिवर्तित कर देता है | लेकिन अगर दूध में खमीर मिला दिया जाये तब भी उसका स्वरूप परिवर्तित हो जाता है और वह दही बन जाता है | दूध का स्वरूप खमीर से भी परिवर्तित होता है परन्तु खमीर (Yeast) विकार नहीं है | इस दूध के उदाहरण से विकार को समझने में हमें सहायता मिलती है | खमीर विकार नहीं है क्योंकि इससे हमें दूध में छुपे मक्खन को पाने में सहायता मिलती है जबकि खटास दूध में आया विकार है क्योंकि उससे दूध अनुपयोगी हो जाता है | इस प्रकार विकार की परिभाषा स्पष्ट हो जाती है |

          विकार मनुष्य के भीतर मन में प्रवेश करने वाला वह दोष है, जो उसे पतन की ओर ले जाता है | विकार के स्थान पर मनुष्य में जब भक्ति प्रवेश करती है, तब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करने के लिए आत्म-ज्ञान की और अग्रसर होता है | विकार के प्रवेश करने से व्यक्ति के स्वरूप में परिवर्तन होता है जबकि भक्ति के प्रवेश करने से व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त हो जाता है | व्यक्ति में विकार संसार के प्रति आसक्ति रखने से प्रवेश पाते हैं जबकि भक्ति का प्रवेश संसार के प्रति अनासक्त होने से होता है | अनासक्ति परमात्मा की और ले जाएगी और आसक्ति पतन की ओर।

                पूर्व में सभी विकार बतला दिए गए हैं, फिर भी एक बार पुनः स्मरण करा दूं कि मुख्य विकार छः हैं | ये षट्-विकार हैं - काम (Desires), क्रोध (Anger), लोभ/तृष्णा (Greed / Lust), मोह (Fascination), मद (Arrogance)  मात्सर्य (Envy, Jealousy) | इन मुख्य विकारों के बारे में आप सभी जानते ही हैं | मनुष्य के भीतर ये विकार प्रवेश कैसे करते हैं, यही विचारणीय है | जब तक हम इन विकारों की प्रकृति को नहीं समझेंगे तब तक इन विकारों से स्वयं को दूर नहीं रख पाएंगे अथवा भीतर से बाहर नहीं निकाल पाएंगे | एक विकार दूसरे विकार से सम्बंधित (Inter related) होता है और एक दूसरे का पोषक (Nourisher) भी | सम्बंधित तो इस मायने में है कि जब एक विकार हमारे भीतर प्रवेश करता है, तब दूसरा विकार धीरे-धीरे उसके पीछे-पीछे हमारे मन में प्रवेश पा लेता है | एक विकार किसी दूसरे विकार का पोषक इस मायने में है कि एक विकार दूसरे विकार को शक्ति प्रदान करता है, जिससे वे विकार व्यक्ति पर प्रभावी हो जाते हैं और अपनी पकड़ को मजबूत बना लेते हैं |

            एक बार जब इन विकारों का प्रभुत्व व्यक्ति पर स्थापित हो जाता है, तो फिर उन विकारों का त्याग करना लगभग असंभव हो जाता है | उदाहरण स्वरूप जब एक (काम) कामना पूरी होती है तो व्यक्ति में लोभ उत्पन्न होता है | लोभ फिर एक नए काम (कामना) को जन्म देता है और फिर उसकी पूर्ति हो जाने पर लोभ और अधिक बढ़ कर तृष्णा बन जाता है | इस प्रकार धीरे-धीरे दोनों विकार मन पर अपनी पकड़ को मजबूत कर लेते हैं |

                   जब (काम) कामना पूरी नहीं होती तो क्रोध और दुःख उत्पन्न होता है | क्रोध उस कामना को पूरा करने के लिए फिर अधिक जोश से प्रयास करने की इच्छा पैदा करता है और अगर इस बार भी काम पूर्ण नहीं हुआ तो क्रोध और अधिक बढ जाता है | काम पूर्ण हो जाने की दशा में व्यक्ति सुख के मद/अहंकार/दर्प में चूर हो जाता है और अपने आपको सभी कामनाओं को पूर्ण करने की क्षमता वाला और एक मात्र कर्ता समझ बैठता है | इस प्रकार स्वयं के द्वारा किये गए कर्म से काम के पूर्ण होने पर दूसरा विकार मोह पैदा हो गया है | यह मोह फिर एक नई कामना (काम) को जन्म देगा | इसके साथ ही कर्म करने का राग भी हमारे भीतर प्रवेश पा जाता है |

         मोह वह विकार है, जो सुख प्रदान करने वाले व्यक्ति (ममता) व वस्तुओं आदि से होता है | कहने का अर्थ है कि हमें अपने द्वारा स्वयं के लिए बनाये संसार से मोह हो जाता है | मोह को अज्ञान भी कहा जाता है | हम जानते हैं कि यह संसार और इसकी सभी वस्तुएं व व्यक्ति अस्थाई और परिवर्तनशील है तथा उनसे हमारा सम्बन्ध केवल तात्कालिक है, सार्वकालिक नहीं है, असत है; फिर भी हम उन्हीं को स्थाई, सदैव के लिए व सत्य समझ बैठते हैं और उन्हीं से सुख पाना चाहते हैं | इस प्रकार संसार के जाल में उलझाकर रख देने वाले ये काम और मोह नामक दो विकार प्रमुख हुए | काम और मोह दोनों ही विकार मनुष्य को एक प्रकार का सुख प्रदान करते हैं परन्तु वास्तव में यह सुख न होकर सुखी होने का भ्रम मात्र ही होता है ।

                जब कोई नया काम पूर्ण नहीं हो पाता अथवा वह मनोवांछित फल प्रदान नहीं करता तो व्यक्ति के इस मद अर्थात अभिमान को ठेस पहुँचती है, जो उसे दुःख पहुँचाती है | कामना को पूरा न कर पाने से हमारा क्रोध और अधिक बलवान होता जाता है | इसी प्रकार जब हमें सतत प्रयास के बाद भी कामना को पूरा करने में विफलता हाथ लगती है, तो हमारे भीतर उस कार्य को पूर्ण करने के लिए कर्म के प्रति राग भी पैदा हो जाता है | जिस अन्य व्यक्ति के पास अगर कोई वस्तु है और हमारे पास नहीं है अथवा उस व्यक्ति के अल्प प्रयास से भी वह कामना पूर्ण हो गयी हो जो हमारी पूरी नहीं हुई है तथा अगर कोई व्यक्ति हमारी कामना को पूर्ण करने में बाधक बना हो तो हमारे भीतर उस व्यक्ति के प्रति मात्सर्य (ईर्ष्या) और द्वेष पैदा हो जाता है | इस प्रकार काम पूरा होने अथवा न होने से उत्पन्न होने वाले ये दोनों विकार सामूहिक रूप से राग-द्वेष कहलाते हैं | जब कामना पूर्ण नहीं हो, तब अगर विवेक बुद्धि का उपयोग किया जाये तो व्यक्ति परमात्मा की ओर अग्रसर हो सकता है | सुख की अपेक्षा दुःख हमें शीघ्र ही आध्यात्मिक बना सकता है | इसीलिए कहा जाता है कि जीवन में जब दुःख आये तो समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की ओर चलने का समय आ गया है |

            इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि प्रत्येक विकार एक दूसरे का जनक (Procreator) भी है और पोषक (Nourisher) भी | एक विकार के आने से व्यक्ति में एक-एक कर सभी विकार उत्पन्न हो जाते हैं | इतने विवेचन से स्पष्ट है कि इन छह विकारों में भी दो मुख्य विकार है, जो सभी विकारों के जनक भी है और पोषक भी | वे दो विकार हैं - काम और मोह | इन दोनों में से एक विकार अधिक महत्वपूर्ण है और वह विकार है, काम | इसलिए काम को थोडा विस्तार से जानना आवश्यक है |

                काम अर्थात कामना | मनुष्य में कामना मन में उठती है और मन के होने व उसे अपने अनुसार चलाने की क्षमता के कारण से ही यह प्राणी मनुष्य कहलाता है | कामनायें  दो प्रकार की होती हैं - शुभ कामना और अशुभ कामना | स्मरण रखें कि दोनों ही कामनाएं विकार हैं | हाँ, शुभ कामनाएं हमें उत्थान और मुक्ति की ओर ले जाती है और अशुभ कामनाएं पतन व आवागमन के चक्र की ओर | शुभ कामना को जानने से पहले अशुभ कामनाओं के बारे में जान लेते हैं | अशुभ कामनाएं इस संसार से सुख प्राप्त करने की अपेक्षा से मन में जन्म लेती है | अशुभ कामनाएं सांसारिक कामनाएं होती है और इन्हें दो प्रकार से पूरा किया जा सकता है | अशुभ कामना को पूरा करने के लिए प्रथम रास्ता है स्वयं के द्वारा कर्म (सकाम अथवा विकर्म) करके पूरा करना | अशुभ कामनाओं को पूरा करने के लिए दूसरा मार्ग है किसी अन्य व्यक्ति से उस कामना को पूरी करने की आशा अथवा अपेक्षा रखना | दोनों ही रास्तों से जब अशुभ कामना अर्थात सांसारिक कामना पूरी नहीं होती तो फिर क्रोध पैदा होता है | इन सांसारिक कामनाओं का पूरा होना बहुत कुछ आपके भाग्य अर्थात प्रारब्ध पर ही निर्भर करता है |

                 शुभ कामना व्यक्ति के उत्थान के लिए होती है, इसे आध्यात्मिक कामना भी कहा जा सकता है अर्थात ये कामनाएं परमात्मा अथवा आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए होती है | अगर पूर्ण रूप से समर्पित होकर मानसिक प्रयास किये जाएँ तो यह शुभ कामना परमात्मा की प्राप्ति करवा देती है | शुभ कामना को पूरा करने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना पड़ता है | स्वयं के अतिरिक्त अन्य किसी व्यक्ति जैसे गुरु अथवा शास्त्र अध्ययन के माध्यम से शुभ-कामना पूरी नही की जा सकती, वे तो केवल आपके लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं |

            "मैं संसार के समस्त सुख पा लूँ", इसका अर्थ है, मन में अशुभ कामनाओं का आगमन हो रहा है। आत्मज्ञान की दिशा की ओर चलने का मन कर रहा है,इसकाअर्थ है कि मन में शुभ कामनाओं का पदार्पण हो रहा है।संतजन शुभ कामना को पूरा करने के लिए चार प्रकार की कृपा का होना आवश्यक बताते हैं | पहली है, स्व-कृपा अर्थात परमात्मा को पाने के लिए स्वयं के द्वारा प्रयास करना आवश्यक है, स्वयं की लगन आवश्यक है | हम अगर स्वयं अपना उत्थान नहीं चाहते तो कोई दूसरा चाहकर भी हमारा भला नहीं कर सकता | ज्ञान तो सभी प्राप्त करना चाहते हैं परन्तु ज्ञान के लिए सर्वप्रथम स्वयं को तैयार करना पड़ता है | स्वयं को आत्म-ज्ञान के लिए तैयार करने को ही परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज स्व-कृपा होना कहते हैं | वे परमात्म प्राप्ति के लिए हमारी लगन को सर्वाधिक महत्व देते हैं।

                 दूसरी है, गुरु-कृपा | स्व-कृपा से जब व्यक्ति शुभ कामना को पूरा करने का प्रयास करता है तो उस पर गुरु-कृपा होना आवश्यक है | गुरु की कृपा व्यक्ति को आत्म-ज्ञान के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती है | जब हम आत्म-ज्ञान के लिए प्रयास करते हैं तो गुरु की खोज अधिक समय तक नहीं करनी पड़ती, गुरु मिल ही जाते हैं | जिसकी स्वयं पर कृपा नहीं होती, उसको गुरु लाख ढूँढने से भी नहीं मिल पाते |

           तीसरी कृपा है, शास्त्र-कृपा | गुरु आपको शास्त्रों के माध्यम से मार्गदर्शन देता है | शास्त्रों को पढ़कर और गुरु के द्वारा उसका सही विवेचन सुनकर ही आप आत्म-ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं  | शास्त्र और गुरु हमारे भीतर से सभी विकार बाहर कर इस प्रकार प्रकाशित कर देते हैं जैसे किसी बर्तन को बाहर-भीतर से साफ कर चमका दिया जाता है | शास्त्र अध्ययन और गुरु का मार्गदर्शन आपको ऐसी राह दिखा देते हैं, जहाँ से परमात्मा मिलने बहुत ही सहज हो जाते हैं । 

          चौथी और अंतिम कृपा है, भगवत-कृपा | परमात्मा की कृपा के बिना कोई भी कामना फल प्रदान नहीं कर सकती, चाहे वह किसी भी प्रकार की कामना हो | जिस दिन हमें आत्म-ज्ञान हो जायेगा हम स्वयं के भीतर बैठे परमात्मा को पा लेंगे | उस दिन कृष्ण-मृग की तरह वन-वन, पत्ते-पत्ते में कस्तूरी को ढूँढना नहीं पड़ेगा |

                काम (कामना) को विकार कहा गया है, इसका अर्थ हुआ कि शुभ कामना भी एक विकार है | यह सत्य है कि काम एक विकार है परन्तु एक विकार होते हुए भी शुभ-कामना व्यक्ति के लिए उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है | प्रारम्भिक स्तर पर आध्यात्मिकता के लिए यह कामना भी आवश्यक है, जिससे हम संसार से विमुख हो सकें अर्थात संसार में रहते हुए भी उससे लिप्त न हों, आसक्त न हों | अगर आत्म-बोध को पूर्णतः उपलब्ध होना है, तो अंततः इस शुभ कामना का भी त्याग करना होगा | मन के भीतर किसी भी प्रकार की कोई कामना है तो इसका अर्थ है कि अभी हम मुक्त नहीं हुए हैं।भक्त प्रह्लाद से जब नरसिंह भगवान ने कहा कि वत्स ! कोई वरदान मांगो तो भक्त प्रह्लाद ने कहा कि मैं कोई वर नहीं चाहता | प्रह्लाद ने आगे कहा कि अगर फिर भी आपको वरदान के रूप में मुझे कुछ देना ही है तो आप मेरे पर इतनी कृपा कीजिये कि इस जीवन में मेरे मन में कभी कोई कामना ही न उठे | इससे भक्त प्रह्लाद ने स्पष्ट कर दिया है कि काम रुपी विकार के रहते परमात्मा से पूर्ण मिलन अर्थात मोक्ष असंभव है | इसका अर्थ हुआ कि परमात्मा के द्वार पर पहुँचते पहुँचते आपकी समस्त कामनाएं गिर जानी चाहिए अर्थात आपकी सभी कामनाएं समाप्त हो जानी आवश्यक है।

                   इस प्रकार इस विवेचन से हमने काम को संक्षेप में जाना है | वैसे अकेले इस विकार काम पर ही बहुत कुछ लिखा जा सकता है परन्तु इस विषय को समझने के लिए इतना जान लेना ही पर्याप्त है | काम के कारण जो दूसरा प्रमुख विकार हमारे मन में प्रवेश करता है | आइये ! उसके बारे में भी संक्षेप में जान लेते हैं |

             दूसरा प्रमुख विकार है मोह | मोह का अर्थ हैं ममता | जहाँ काम है वहां मोह अवश्य ही होगा | जिस किसी भी वस्तु या व्यक्ति से हम कोई कामना रखते हैं या कोई अपेक्षा करते हैं तो हमारा उस वस्तु अथवा व्यक्ति के प्रति मोह हो जाता है। हम उसको मेरा व मेरे लिए कहना प्रारम्भ कर देते हैं।यही मोह और ममता है।बिना किसी कामना अथवा अपेक्षा के मोह पैदा हो ही नहीं सकता।जब उस वस्तु अथवा व्यक्ति के माध्यम से हमारी कामना पूरी होने की संभावना नहीं रहती,तत्काल ही उसके प्रति हमारा मोह समाप्त हो जाता है। कहने का अर्थ है कि काम ही मोह का जनक है।

        किसी एक विषय, स्थान, व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति लगाव का होना ही मोह है | हम जिस व्यक्ति, वस्तु अथवा विषय-भोग से सुख का अनुभव करते हैं, उसके प्रति हमारा विशेष लगाव हो जाता है | हम जानते हैं कि भौतिक संसार की सभी वस्तुएं व जीव अस्थाई और परिवर्तनशील है, माया है और इनके प्रति आकर्षण रखना अंत में दुःख ही देने वाला है, फिर भी हम अपने मोह (अज्ञान) के कारण उनसे बंधन को छोड़ नहीं पाते | मोह काम के कारण पैदा होता है | परमात्मा की माया हमें काम के माध्यम से एक प्रकार के आकर्षण में बाँध लेती है | यह माया का आकर्षण ही मोह (अज्ञान ) है | इस आकर्षण से छूटने का एक मात्र उपाय है, भक्ति | भक्ति अर्थात परमात्मा के प्रति प्रेम अर्थात आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो जाना |

                 सभी विकारों का अग्रणी (नायक) काम है | अतः हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि हम हमारी कामनाओं पर अंकुश रखें और धीरे-धीरे उस अवस्था को उपलब्ध हो जाएँ जहाँ पर मन में किसी काम का जन्म ही न हो पाए | इसके लिए हमें हमारे सुख-भोग के साधनों के प्रति आसक्ति को कम करना होगा | विषय-भोग हमारी कामनाओं को हवा देते हैं, जिससे हमें कर्म करना पड़ता है | प्रत्येक कर्म जब सुख प्रदान करता है तब पुनः उस सुख के प्रति आसक्ति बढ़ती है और आसक्ति फिर एक नए काम को जन्म देती है ।

              अब प्रश्न यह पैदा होता है कि मुख्य विकार अर्थात काम का जनक कौन है और यह कहाँ पैदा होता है ? काम का जनक है, विषय-भोग (सांसारिक सुख) तथा विषय-भोग मिलते हैं, कर्म करने से | अतः कर्म ही परोक्ष रूप से मुख्य कारण बनते हैं-काम को जन्म देने में और काम के जन्म लेने का स्थान होता है, मन |  मन में विषय-भोग के प्रति आसक्ति के कारण काम जन्म लेता है अर्थात भोगों के कारण मन में काम उत्पन्न होता है | बिना किसी कर्म के किये भोग उपलब्ध हो नहीं सकते | इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि बिना कोई कर्म किये मन में काम पैदा हो ही नहीं सकता परन्तु क्या जीवन में कर्म का त्याग करना संभव है ? नहीं, कर्म करना हम छोड़ ही नहीं सकते, जीवन में हमें कर्म करने ही पड़ते हैं क्योंकि इस जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए कर्म करने आवश्यक हैं | गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते भी हैं कि मनुष्य अपने जीवन में एक क्षण के लिए भी कर्म किये बिना रह भी नहीं सकता |

               मनुष्य कर्म करना क्यों और कैसे प्रारम्भ करता है ? इसको जानने के लिए हमें मन को जानना होगा क्योंकि मन के बिना कोई भी मनुष्य कर्म करने को विवश नहीं हो सकता | मन के दो भाग होते हैं | एक भाग शरीर के साथ संलग्न होता है और दूसरा भाग आत्मा के साथ | शरीर के साथ लगा मन का भाग तभी सक्रिय होता है जब व्यक्ति कर्म करना प्रारम्भ करता है अन्यथा नए जन्मे शिशु में मन सदैव निर्मल (Pure) ही होता है, विकार ग्रस्त नहीं | 

             विकार तो कर्म करने के साथ ही भोग मिलने पर मन के भीतर उत्पन्न होते हैं, जिसे विकार का व्यक्ति में प्रवेश होना कहते हैं | मनुष्य अपने जीवन में कर्म करना प्रारम्भ करता है, अपने पूर्व जन्म के पुरुषार्थ अर्थात प्रारब्ध के कारण | अगर प्रारब्ध में कुछ भी लिखा ही नहीं गया हो तो फिर देह धारण करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।प्रारब्धवश देह मिली है तो फिर बिना कर्म किये रहना जीवन में संभव ही नहीं है | कुछ न कुछ कर्म (क्रियाएँ) स्वतः ही इस शरीर में होते रहते हैं | प्रत्येक कर्म का एक निश्चित फल अवश्य ही होता है | वह फल हमें या तो सुख पहुंचाता है या दुःख | दोनों ही प्रकार के कर्म-फल को भोग कहा जाता है | इन विषय-भोग (सांसारिक सुख) के प्रति व्यक्ति आसक्त हो जाता है | यह विषयासक्ति हमारे जीवन में विकारों को आमंत्रित करती है |

             मन के भीतर जब काम बढ़ता है, तब नए जीवन के लिए प्रारब्ध बनना प्रारम्भ हो जाता है | परन्तु ऐसा किसी भी व्यक्ति के मनुष्य जीवन में संभव ही नहीं है कि उसका प्रारब्ध बना ही नहीं हो | प्रारब्ध के कारण ही तो मनुष्य जीवन मिलना संभव होता है | प्रारब्ध के कारण ही हम आवागमन से मुक्त नहीं हो पाते हैं | इतने विवेचन से कर्मों के बारे में एक अति महत्वपूर्ण बात निकलकर हमारे समक्ष आती है कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन में प्रारब्ध के कारण कर्म तो अवश्य करे परन्तु नया प्रारब्ध बनाने के लिए कर्म नहीं करे |

             कर्म के कारण ही विकार एक-एक कर मनुष्य के भीतर प्रवेश करते हैं क्योंकि कर्म भोग उपलब्ध कराते हैं और भोग हमें सुख प्रदान करता है | वास्तव में देखा जाये तो वह सुख न मिलना होकर केवल उसके मिलने का भ्रम होता है | जब मनुष्य अपने जीवन के प्रारम्भ में कर्म करना प्रारम्भ करता है, तब उन कर्मों के प्रारम्भ करने में प्रारब्ध की भूमिका होती है | कोई भी कर्म भले ही वह प्रारब्ध के कारण फल प्राप्त करने के लिए ही होता हो परन्तु उस फल का मिलना वर्तमान जीवन में बिना पुरुषार्थ किये संभव ही नहीं है | इसीलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में कोई भी व्यक्ति कर्म किये बिना क्षण मात्र भी नहीं रह सकता अर्थात प्रत्येक क्षण कोई न कोई कर्म हम करते ही रहते हैं | इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की अपने जीवन में कर्म करने की एक आदत बन जाती है | इसलिए मनुष्य के द्वारा अपने जीवन में कोई भी कर्म न करना लगभग असंभव सी बात है |

         जब प्रारब्ध के अनुसार कर्म-फल प्राप्त करने के लिए कर्म किये जाते हैं तब व्यक्ति को यह आभास होता है कि वह जो कर्म अपने वर्तमान जीवन में कर रहा है उसके कारण ही वह अपनी इच्छानुसार फल (भोग) प्राप्त कर रहा है | यह पूर्णतः सत्य नहीं है | इसी को संत जन कर्म के प्रति मोह होना कहते हैं, यह मोह होना ही अज्ञान है | इस मोह के कारण ही हमें लगता है कि हमारे प्रयास से, हमारे कर्म करने से उपयुक्त फल प्राप्त हो रहे हैं | एक ही प्रकार के फल को पुनः प्राप्त करने के लिए काम का जन्म होता है तथा उसी फल को बारम्बार और अधिक से अधिक मात्रा में प्राप्त करने की चाह को लोभ कहा जाता है | यह लोभ उस भोग की तृष्णा (प्यास) को जन्म देता है | यह तृष्णा हमें उस कर्म के प्रति आसक्त बना देती है | जब हम कर्म करते हुए अपनी रुचि के अनुसार फल प्राप्त करते जाते हैं तो हमारे भीतर मद/अहंकार नाम के विकार का जन्म हो जाता है | इस प्रकार प्रारब्ध से कर्म के रास्ते चलते हुए हम चार विकारों अर्थात मोह, काम, लोभ और मद को अपने भीतर पैदा कर चुके होते हैं |

                ये चारों विकार (काम,लोभ,मोह तथा मद)कर्म का फल इच्छानुसार प्राप्त होते जाने से पैदा हुए हैं | परन्तु जब कर्म करने के बाद भी इच्छानुसार फल प्राप्त नहीं होता तब पांचवां विकार क्रोध पैदा होता है | क्रोध से सम्मोह (मूढ भाव) और फिर मूढ़भाव से स्मृति भ्रम हो जाता है जो बुद्धि का नाश कर देता है | बुद्धि का नाश होने का अर्थ है, मोह(अज्ञान) का और अधिक बढ़ जाना | क्रोध से पैदा हुए स्मृति-भ्रम के कारण मात्सर्य पैदा होता है | मात्सर्य का अर्थ है, ईर्ष्या | ईर्ष्या उस व्यक्ति से जिसके पास वह सब कुछ उपलब्ध है जो आप चाहते हैं परंतु आपके पास वह नहीं है |

            इस प्रकार एक कर्म के प्रति आसक्ति का भाव हमें काम से मात्सर्य तक समस्त छः विकारों से ग्रस्त कर देता है | कर्मासक्ति ही कर्म बंधन पैदा करती है | हम केवल उस कर्म के प्रति ही अधिक आसक्ति भाव रखते हैं, जिस कर्म को करने से हमें इच्छित फल प्राप्त होता है | यह आसक्ति ही हमें उस कर्म के साथ बाँध देती है | इस प्रकार इतने विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि अप्रत्यक्ष रूप से हमारे कर्म ही विकार का कारण बनते हैं | गीता को कर्मयोग का ग्रन्थ कहा ही इसलिए जाता है क्योंकि यही एक मात्र ग्रन्थ है, जो हमें कर्म-बंधन से मुक्त होने की राह दिखलाता है | गीता की सार्थकता तभी है जब हम कर्म के रहस्य को समझकर इस कर्म-बंधन को तोड़कर समस्त विकारों से मुक्त हो जाएँ | समस्त विकारों से मुक्त हो जाना ही जीवन- मुक्त हो जाना है |

                 नए मानव जीवन में प्रारब्ध से सीधे ही कर्म करने प्रारम्भ नहीं होते बल्कि सर्वप्रथम मनुष्य के पूर्व मानव जीवन में अपूर्ण रही कामनाएं सक्रिय होती हैं | ये अपूर्ण कामनाएं सूक्ष्म शरीर में स्थित चित्त में संग्रहित की हुई रहती है जो शिशु के जन्म के साथ ही सूक्ष्म शरीर के भौतिक शरीर में प्रवेश करते ही उसके मन में स्थानांतरित हो जाती है | इसलिए कहा जा सकता है कि नए जन्म में पूर्व जन्म की कामनाएं अथवा काम ही कर्म प्रारम्भ होने का मुख्य कारण बनती है | उन अपूर्ण रही कामनाओं को पूरा करने के लिए  हमारा मन शरीर की कर्मेन्द्रियों से कर्म संपन्न करवाता है और पूर्वजन्म का इच्छित फल हमें बिना अधिक प्रयास किये सुगमता के साथ इस जन्म में प्राप्त हो जाता है | कहने का अर्थ है कि प्रारब्ध (भाग्य) के कारण कुछ इच्छित फल कम प्रयास से अथवा अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं |

         ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी श्री रामसुख दास जी महाराज इसके लिए एक सत्य घटना बताया करते थे | यह घटना आंध्र-प्रदेश की है | चोरों ने किसी व्यापारी के घर से एक तिजोरी चोरी कर ली परन्तु वे उस तिजोरी को खोल नहीं पाए थे | चोरी की सूचना मिलने पर पुलिस भी सक्रिय हो गयी थी | वह चोरों का पीछा करने लगी | चोरों से तिजोरी खुल नहीं पा रही थी | पुलिस से बचने के लिए उन चोरों ने वह तिजोरी राह में पड़ने वाली एक नदी में फेंक दी | इस प्रकार वे चोर पुलिस से बच निकलने में सफल हो गए | नदी के बहाव की दिशा में स्थित एक गाँव से एक व्यक्ति उस नदी में नियमित स्नान करने आया करता था | उस दिन उसने उस तिजोरी को बहते देखकर उसे बाहर निकाला | घर ले जाकर उसने तिजोरी खोली तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी | उस तिजोरी में अथाह धन राशि और महंगे आभूषण आदि भरे पड़े थे | इस प्रकार उस व्यक्ति को पूर्व जन्म के पुरुषार्थ (भाग्य) के अनुसार केवल दैनिक शौच-कर्म करते हुए भी विपुल धन-सम्पति प्राप्त हो गयी |

                   हमारे जीवन में भी भाग्य इसी प्रकार के खेल कई बार खेलता है | जब हमारे भाग्य में कुछ बहुत अच्छा होना लिखा होता है, तब कम प्रयास से अल्प मात्रा में कर्म करते हुए हमारी पूर्व जन्म की कामना पूर्ण हो जाती है | कामनाओं को पूरा करने के लिए थोड़ा-बहुत पुरुषार्थ तो करना ही पड़ेगा चाहे उन कामनाओं को पूरा होना हमारे भाग्य में लिखा ही क्यों न हो | कर्म करने से हमें चार पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है जिन्हें चार पदार्थ भी कहा जाता है | ये चार पुरुषार्थ हैं-काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष | कहने का आशय यह है कि बिना कर्म किये न तो कामनाएं पूरी हो सकती हैं, न ही अर्थ प्राप्त हो सकता है, न ही धर्म की प्राप्ति होती है और न ही मुक्त हुआ जा सकता है | काम और अर्थ की प्राप्ति हमारे पूर्व जन्म के पुरुषार्थ यानि प्रारब्ध (भाग्य) हैं और धर्म और मोक्ष इस जन्म के पुरुषार्थ हैं | अर्थ और काम हमें पूर्व जन्म के पुरुषार्थ के कारण इस जन्म में अल्प कर्म करके ही सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं | धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ को वर्तमान मानव जीवन में कर्म करते हुए इसी जीवन में ही प्राप्त किया जा सकता है | धर्म और मोक्ष की प्राप्ति में प्रारब्ध का योगदान कम ही रहता है |

          जीवन में सर्वप्रथम कर्म प्रारम्भ करने का आधार तो हमने खोज लिया-प्रारब्ध | प्रारब्ध पूर्व मानव जन्म में किया गया पुरुषार्थ अर्थात पूर्व मनुष्य योनि में किये गए कर्म | इससे स्पष्ट है कि समस्त योनियों में जो चक्राकार हम घूम रहे हैं उसका आधार मूलतः कर्म ही है | अर्जुन की तरह एक गृहस्थ के लिए इस आवागमन के चक्र से बाहर निकलने का सर्वोत्तम रास्ता, जिसे गीता में प्रमुखता के साथ स्पष्ट किया गया है, वह है - कर्म-योग का | कर्म-योग को समझने के लिए हमें कर्मों की मूल को जानना होगा | कर्म का मूल क्या है ? इसको जाने बिना हम कर्मों के स्वरूप को परिवर्तित नहीं कर सकते |

                कर्म का आधार कामना और कामना का आधार कर्म | इतना जान लेना अपर्याप्त है | केवल इतना जान लेने मात्र से तो आवागमन से मुक्ति नहीं मिलेगी | कामना जिस कारण से मन में जन्म लेती है, वही कारण होगा कर्म प्रारम्भ करने का | कामना जन्म लेती है, विषय-भोग के कारण अर्थात मन के विषयासक्त हो जाने के कारण | विषय-भोग वह शारीरिक सुख है, जो हम इस भौतिक संसार में खोजते हैं और जिसे हमारा मन बार-बार भोगने की कामना करता है | प्रारम्भ में सभी विषय-भोग अमृत तुल्य प्रतीत होते हैं परन्तु अंत में ये विष तुल्य हो जाते हैं अर्थात प्रत्येक विषय-भोग प्रारम्भ में शारीरिक सुख प्रदान करता हुआ प्रतीत अवश्य होता है परन्तु अंत में यही विषय-भोग शरीर को दुःख देता है | विषय-भोग को बार-बार प्राप्त करने की कामना मन के कारण और मन में ही उत्पन्न होती है और केवल एक मात्र बुद्धि ही मनुष्य में ऐसा साधन है, जिससे कामनाओं और मन दोनों को नियंत्रित किया जा सकता है |

               विषय पाँच ज्ञानेन्द्रियों से सम्बंधित है | प्रत्येक  ज्ञानेन्द्रिय अपने-अपने विषय को ग्रहण कर मन को उपलब्ध करवाती है | उस विषय को प्राप्त करने के लिए कर्म हमारी पाँचों कर्मेन्द्रियाँ करती है | इस प्रकार विषय-भोग मन के माध्यम से हमें उपलब्ध होता है | मन के प्रिय विषय-भोग को पुनः और बारम्बार प्राप्त करने के लिए मन में अनेकों प्रकार की कामनाओं का जन्म होता है | फिर कामनाओं के पूरा होते जाने से मन में लोभ आ जाता है | लोभ पुनः एक नई  कामना को जन्म देता है | इस प्रकार यह विषय-भोग से प्रारम्भ हुआ चक्र मन से कामना के माध्यम से कर्म कर वापिस विषय-भोग पर लौट आता है | इस प्रकार से यह विषय-भोग से कर्म और पुनः विषय-भोग तक चलते रहने वाला अटूट चक्र मनुष्य के जीवन में सदैव चलता रहता है |

             जब विषय-भोग वृद्धावस्था अथवा अन्य किन्हीं कारणों से उपलब्ध नहीं हो पाते अथवा अपर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं, तो विषय-भोग की कामनाएं सूक्ष्म शरीर के चित्त में संग्रहित हो जाती है | देह की समाप्ति के बाद यही कामनाएं हमारे सूक्ष्म शरीर के माध्यम से नए जीवन में मिलने वाले स्थूल शरीर में स्थानांतरित हो जाती है | फिर नई योनि के नए जीवन में पुनः उन कामनाओं से विषय-भोग प्राप्त करने के लिए कर्म प्रारम्भ हो जाते हैं | कभी न मिट पाने वाले आवागमन के पीछे केवल यही एकमात्र रहस्य है |

         विषय-भोग, विकार (कामादि), कर्म, कर्म-फल और पुनः विषय-भोग भोगना, यह अटूट चक्र कैसे टूट सकता है ? इस चक्र को तोड़ने के लिए हमें इसकी कमजोर कड़ी पर तीव्र प्रहार करना पड़ेगा | इस चक्र की सबसे कमजोर कड़ी है-विकार | हम स्वयं के मन से विकार को बाहर निकाल सकते हैं और फिर पुनः प्रवेश करने से भी रोक सकते हैं | मुख्य विकार है-काम और मोह | सर्वप्रथम जानते हैं कि हमें इन दोनों विकारों को बाहर निकाल फेंकने के लिए क्या करना होगा ? इसके लिए विकार की मूल उत्पत्ति कैसे होती है, इसको जानना होगा | कर्म करने के कारण फल के रूप में हमें विषय-भोग प्राप्त होते हैं और ये भोग हमारे भीतर विभिन्न विकारों (दोषों) को जन्म देते हैं | अतः किसी भी विकार को उत्पन्न होने से रोकने के लिए हमें कर्म का सहारा लेना पड़ेगा | कर्म का सहारा लेने के दो कारण है | प्रथम कारण, मनुष्य ही एक मात्र ऐसी योनि है, जिसमें मनुष्य कर्म करने को स्वतन्त्र है यानि वह स्वयं की इच्छानुसार कर्म कर सकता है | स्वयं की इच्छा को नियंत्रित कर हम कर्म का स्वरूप परिवर्तित कर सकते हैं अर्थात सकाम कर्म के स्थान पर निष्काम कर्म कर सकते हैं | दूसरा कारण, मनुष्य अपने जीवन में कभी भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता | इसलिए कर्म करने को हम विवश है | ऐसा जीवन में कभी भी नहीं हो सकता कि हम किसी प्रकार का कर्म ही न करें | अतः कर्म तो करने ही पड़ेंगे, तो फिर ऐसे कर्म क्यों न करें, जिससे हमारा जीवन विकार-मुक्त जीवन बन सके।

                 हमने इस अटूट चक्र में से केवल विकार और कर्म को ही क्यों चुना, अन्य में विषय-भोग को भी तो चुन सकते थे ? इसका कारण है कि जिस संसार में हम रहते हैं, उसमें विभिन्न विषय प्रचुर मात्रा में भोग के लिए उपलब्ध हैं | अतः हम विषयों से किसी भी प्रकार से दूर नहीं भाग सकते | जीवन में समय-समय पर इन विषयों से आमना-सामना होता रहेगा ही | कामना को इसलिए नहीं चुना क्योंकि अपने जीवन में कोई भी व्यक्ति कामना को उठने से रोक नहीं सकता | हाँ, कामनाओं पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है | इस जीवन की वास्तविकता यही है कि 'मन में बिना किसी कामना के रहे' इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती | सबसे महत्वपूर्ण बात, बिना कामना के हम आत्म-ज्ञान को भी उपलब्ध नहीं हो सकते | अतः कामनाएं जीवन से बाहर नहीं हो सकती और न ही विषय बाहर हो सकते हैं |

                 इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पूर्व मानव जीवन में की गयी विषय-भोग की कामना इस जीवन में कर्म करते हुए भोग अवश्य ही उपलब्ध कराएगी | उन भोगों को भोगे बिना आप कहीं पर भी भाग कर नहीं जा सकते | इसी सांसारिक सुख को प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने हमें ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और मन दिया है | मनुष्य भोगों से शारीरिक सुख प्राप्त करते हुए केवल एक कार्य अवश्य ही कर सकता है | वह इन भोगों के प्रति आसक्त न हो |

               भोगों में आसक्ति तभी पैदा नहीं होगी जब हम प्रारब्ध स्वरूप प्राप्त हो रहे भोगों को त्याग पूर्वक भोगें | त्याग पूर्वक भोगने का आशय है कि प्रारब्ध स्वरूप मिले सुख को परमात्मा का प्रसाद मानते हुए ग्रहण करें परन्तु उन भोगों को पकडे नहीं, उनमें डूबे नहीं | भोगों से सुख लेना किसी भी प्रकार अनुचित नहीं है परन्तु जब प्रारब्ध स्वरूप मिलने वाले सुख समाप्त हो जाएँ, तब दुःखी न हो | दुःखी होना फिर से नई कामना को जन्म देगा और फिर पुनः वैसे ही सुख को प्राप्त करने के लिए हम कर्म के माध्यम से प्रयास करने लगेंगे | आपको ऐसा आभास होगा कि आपके प्रयास एक न एक दिन अवश्य रंग लायेंगे और आप वैसे ही सुख पुनः प्राप्त कर लेंगे जैसे सुख पूर्व में प्राप्त हुए थे | बस, यहाँ पर आकर स्थिति आपके जीवन को एक तीव्र मोड़ दे देती है | आप इच्छानुसार कर्म अवश्य कर सकते हैं परंतु इच्छानुसार उनका फल प्राप्त नहीं कर सकते | यही इस मनुष्य जीवन की वास्तविकता है |

                 अभी भी आप जीवन की वास्तविकता से अपरिचित हैं | काम और अर्थ केवल उतना ही इस जीवन में प्राप्त होगा जितना उनको पाने के लिए आपने पूर्वजन्म में प्रयास किया था, उससे रत्ती भर भी अधिक अथवा कम नहीं | मनुष्य जीवन की वास्तविकता यह है कि आपको इस जीवन में अपने प्रारब्ध (भाग्य) में लिखे से अधिक केवल धर्म और मोक्ष ही उपलब्ध हो सकता है, काम और अर्थ नहीं | परन्तु हम मोहग्रस्त मनुष्य धर्म और मोक्ष की तरफ झांकते तक नहीं है और जीवन भर केवल काम और अर्थ को प्राप्त करने के लिए दौड़ते रहते हैं |  

                   विषय-भोग मनुष्य को शारीरिक सुख प्रदान करते हैं | सुख की अधिक से अधिक कामना रखना ही सबसे बड़ा विकार है | इन विकारों को मन के भीतर प्रवेश करने व पलते रहने से बचने का क्या उपाय है ? आज के इस आधुनिक युग में जहाँ प्रत्येक वस्तु, व्यक्ति, साधन और व्यवस्था प्रतिपल बदल रहे हैं, वहां इन सुखों के पीछे दौड़ते रहना कोई बुद्धिमानी नहीं है | हरिः शरणम् आश्रम, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा इस सम्बन्ध में एक दृष्टान्त सुनाते हैं | एक बार गाँव के ठाकुर ने अपने पास जमीन पाने की कामना लिए आये एक व्यक्ति को कह दिया कि आज सूर्यास्त से पहले तुम जितनी जमीन को अपने कदमों से नाप लोगे, उतनी जमीन तुम्हें दे दूंगा | इतना सुनते ही वह व्यक्ति जमीन नापने को दौड़ पड़ा | जरा सा भी विलम्ब करना उसको उचित नहीं लगा | वह बिना विश्राम किये लगातार दौड़ता रहा | दोपहर हुई परन्तु वह नहीं रुका | थक कर चूर-चूर हो रहा था परन्तु उसकी दौड़ समाप्त नहीं हुई | सूरज उसके सिर पर तेज चमकता हुआ अपनी गर्मी से उसे और अधिक थका रहा था परन्तु वह व्यक्ति भला कहाँ रुकने वाला था ? वह क्षण भर के लिए भी विश्राम किये बिना लगातार दौड़ता जा रहा था | उसे अभी भी अपने द्वारा नापी  गयी जमीन बहुत ही कम प्रतीत हो रही थी | थोड़ी देर बाद धरती पर शाम भी उतरने लगी | लगातार दौड़ते-दौड़ते वह व्यक्ति अब तक बुरी तरह से थक चूका था | उसने ऊपर आसमान पर दृष्टि डाली | देखा, सूर्यास्त होने में अभी भी कुछ समय शेष था | उसने अपनी बची-खुची शक्ति बटोरी और पूरे जोश से दौड़ लगा दी | आखिर शरीर की शक्ति की भी एक सीमा होती है | तभी उसकी शारीरिक शक्ति ने उसका साथ छोड़ दिया | वह गश खाकर जमीन पर गिर पड़ा | अपने घोड़े पर सवार हुआ ठाकुर उसके पीछे-पीछे चला आ रहा था |

              ठाकुर ने जब उसको जमीन पर थककर गिरते हुए देखा, तो तुरंत अपने घोड़े से उतरकर उस व्यक्ति तक पहुंचा | उसने देखा कि जमीन पर गिरे व्यक्ति के प्राण पखेरू उड़ चुके हैं | दिन भर उस साधारण से व्यक्ति ने दौड़ते हुए कई मील जमीन नाप डाली थी परन्तु देखा जाए तो वास्तव में उसे केवल छः फीट जमीन ही चाहिए थी, जिस पर वह अभी मृत अवस्था में पड़ा था | उसकी असंतुष्टि ने उसके प्राण ले लिए थे | उसकी इस असंतोषी प्रवृति ने कि "अब तक जो कुछ मिला है, वह अपर्याप्त है", उसे मार डाला था | यह है, लोभ प्रवृति | संतोष लोभ को उत्पन्न होने ही नहीं देता और इस प्रकार परोक्ष रूप से नई कामना पर भी अंकुश लग जाता है।काम, भोग को प्राथमिकता देता है और लोभ, संग्रह को बढावा देता है |इस प्रकार मनुष्य जीवनभर केवल भोग और संग्रह में ही लगा रहता है।अतः जो मिल जाता है उसमें संतुष्ट हो जाना ही हमें काम और लोभ से मुक्त कर देता है।

                  लोभ काम को पैदा करता है और काम लोभ को | अतः हमें सर्वप्रथम लोभ से दूर रहने के लिए संतोष धारण करना होगा | परमात्मा ने प्रारब्ध स्वरूप हमें जितना दिया है वह बहुत है, पर्याप्त है; यही संतोष है | संतोष धारण करने के लिए किसी प्रकार का विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता | संतोष की अवस्था को उपलब्ध होने के लिए न ज्ञान चाहिए, न भक्ति | जीवन में संतोष के पदार्पण के साथ ही भक्ति स्वतः ही प्रवेश पा लेती है | 

     ब्रह्मलीन स्वामी रामसुख दासजी महाराज कहा करते थे-

दौड़ सके तो दौड़ ले जब लगि तेरी दौड़ |

दौड़ थक्या धोखा मिट्या, वस्तु ठौड़ की ठौड़ ||

            हमारे जीवन की यही वास्तविकता है, इससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते | एक न एक दिन इसको स्वीकार करना ही होगा, तो फिर अभी क्यों नहीं स्वीकार कर लेते कि 'संतोषी सदा सुखी' |

                प्रारब्ध से मिलने वाले भोग और सुख को प्राप्त करने के लिए कर्म करने आवश्यक हैं | विषय-भोग को परमात्मा का प्रसाद मानकर त्याग पूर्वक भोगें और न तो उन भोगों के प्रति आसक्त हों जो हमें भाग्य से उपलब्ध हुए हैं और न ही उन कर्मों के प्रति आसक्त हों जो प्रारब्ध के कारण हमारे शरीर को करने पड़ रहे हैं | प्रारब्ध से मिलने वाले भोगों को भोग लेने के लिए किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त भी अन्य कर्म करने को मनुष्य विवश है | ऐसा प्रत्येक कर्म नए जीवन के लिए प्रारब्ध बनाता है | ऐसे कर्मों को करने में हमारी भूमिका किस प्रकार की होनी चाहिए, यह सबसे अधिक महत्वपूर्ण है |  इसके लिए दो विकल्प हैं | प्रथम विकल्प है, ज्ञान का और दूसरा विकल्प है, भक्ति का | इसीलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्म-योग को आधार बनाते हुए ज्ञान-योग और भक्ति योग कहा है | गीता में भगवान श्री कृष्ण द्वारा आधारभूत सांख्य-योग के पश्चात् सर्वप्रथम कर्म-योग, उसके बाद ज्ञान योग और अंत में भक्ति और शरणागति को स्पष्ट किया गया है | श्री कृष्ण का उद्देश्य एक गृहस्थ को इस संसार में रहते हुए और कर्म करते हुए संन्यस्थ करने का था, जिससे वह कर्म करते हुए भी परमात्म-तत्व को पा सके | संन्यासी होने का अर्थ संसार से भागकर जंगल में चले जाना नहीं है बल्कि कर्मों के प्रति आसक्त न होने से है अर्थात एक गृहस्थ का इस संसार में रह कर कर्म करते हुए संन्यासी बन जाना है |

            ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुख दासजी महाराज ने इन तीनों योगों को बहुत ही अल्प शब्दों में स्पष्ट करते हुए कहा है कि आप जो भी कर्म कर रहे हो उन्हें संसार की सेवा में अर्पित कर दो (कर्म-योग), उन कर्मों को प्रकृति में अर्पण कर दो (ज्ञान-योग) अथवा सभी किये जाने वाले कर्मों को परमात्मा के द्वारा होना मानो (भक्ति-योग) अर्थात सभी कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर दो | इनसे कम शब्दों में कर्म-बंधन से मुक्त होने को स्पष्ट नहीं किया जा सकता | स्वामीजी की इस बात का सार यह है कि “कर्म हम अपने लिए नहीं कर रहे है, इस बात का सदैव ध्यान रखें | कर्म या तो संसार की सेवा के लिए हो रहे हैं या प्रकृति के अनुसार हो रहे हैं अथवा फिर परमात्मा के लिए किये जा रहे हैं |” जब कर्म हम स्वयं के लिए नहीं कर रहे हैं, इसका अर्थ यह हुआ कि हम कर्म के प्रति आसक्त भी नहीं है | जब कर्मासक्ति नहीं होगी तो कर्म-बंधन भी नहीं होगा | कर्म बंधन नहीं है तो कामादि विकार उत्पन्न होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होगा | जब हमारे जीवन में कोई कर्म-बंधन ही नहीं है, इसका अर्थ है कि हम जीवन-मुक्त हैं |

                गीता-ज्ञान की सार्थकता जीवन-मुक्त होने में है | इस संसार में रहते हुए हम कर्म भी करेंगे और कर्मासक्त भी नहीं होंगे | इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण भक्ति है | भागवत में कहा गया है कि भक्ति के दो पुत्र हैं, ज्ञान और वैराग्य | जब व्यक्ति संसार के स्थान पर परमात्मा से प्रेम करने लगता है, उसका नाम ही भक्ति है | जब व्यक्ति में भक्ति का पदार्पण होता है, ज्ञान और वैराग्य दोनों भक्ति के पीछे-पीछे स्वतः ही आ जायेंगे | ज्ञान का अर्थ है, बुद्धि का उपयोग करते हुए मन पर नियंत्रण करना | यह ज्ञान-योग हुआ | वैराग्य का अर्थ है, कर्म करने में राग का न होना अर्थात कर्मों के प्रति आसक्ति का न होना | यह कर्म-योग हुआ | एक गृहस्थ के जीवन में गीता की सार्थकता अधिक है क्योंकि इसमें समाहित ज्ञान हमें संसार में रहकर कर्म करते हुए भी परमात्मा तक ले जाने की क्षमता रखता है |

    अभी तक हमने एक कोण से इस विषय का विवेचन किया | अब जरा दूसरे कोण से भी इस विषय को देख लेते हैं | मन में उठती कामना का कारण है, जीवन में मिलने वाले विषय-भोग के प्रति हमारी आसक्ति और यह आसक्ति हमें विवश करती है, कर्म करने के लिए | कर्म का आरंभ भले ही प्रारब्धवश होता हो परन्तु देखा जाये तो कर्म प्रारम्भ करने का मुख्य कारण प्रकृति है |      

             कर्म करने के पीछे भी केवल प्रकृति के गुणों की ही मुख्य भूमिका रहती है | यही कारण है कि मनुष्य में चाहे तीनों में से किसी भी एक गुण की प्रधानता हो, वह कर्म करने को विवश अवश्य होता है | प्रकृति के उपरोक्त तीनों गुण प्रत्येक व्यक्त हुए सजीव अथवा निर्जीव, सभी में उपस्थित रहते हैं | फिर क्या कारण है कि इनमें से केवल मनुष्य ही कर्म करने को विवश है ? आधुनिक विज्ञान के अनुसार शरीर की इकाई को तत्व (Element) कहा जाता है क्योंकि सबका शरीर (सजीव हो चाहे निर्जीव) केवल तत्वों से ही आकार ग्रहण करता है | ये तत्व स्वेच्छा से कहीं पर भी आ जा नहीं सकते इसीलिए इनको जड़ कहा जाता है | उनमें गति प्रदान करने के लिए बाह्य बल की आवश्यकता होती है |

             प्रत्येक तत्व में भी प्रकृति के तीनों गुण उपस्थित रहते हैं | किसी भी एक तत्व में उपस्थित प्रकृति के तीन गुण विद्युतीय (Electrical), भौतिक (Physical) और रासायनिक (Chemical) गुण कहलाते हैं | सजीव में यही गुण क्रमशः सात्विक, राजसिक तथा तामसिक गुण कहलाते हैं | सजीव का शरीर भी पदार्थ से (Matter) बना होता है, जिसकी इकाई (Unit) भी यह तत्व ही है | सजीव प्राणियों में फिर से दो विभाग किये जा सकते हैं – चर (Motile) और अचर (Non-motile)| चर प्राणी वे होते हैं जो किसी भी माध्यम में अपनी इच्छा से विचरण कर सकते हैं और अचर प्राणी वे प्राणी होते हैं, जो किसी भी माध्यम में स्वेच्छा से विचरण नहीं कर सकते | अचर प्राणियों के अंतर्गत सभी प्रकार के पेड़-पौधे आ जाते हैं तथा चर प्राणियों के अंतर्गत मनुष्य और अन्य सभी इधर उधर घूम-फिर सकने वाले प्राणी आते हैं |

                    पदार्थ (Matter) की इकाई (Unit) तत्व (Element) है | पदार्थ से ही प्राणी की कोशिका (Cell) का निर्माण होता है | कई कोशिकाएं मिलकर उत्तक (Tissue) बनाती है | उत्तकों से अवयवों (Organs) का निर्माण होता है और विभिन्न अवयव मिलकर भौतिक शरीर (Physical body) का निर्माण करते हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राणी के शरीर की इकाई कोशिका हुई और कोशिका की इकाई तत्व हुआ | इससे यह समझा जा सकता है कि बिना तत्व के प्राणी के शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती | बिना किसी तत्व के योगदान के शरीर का बनना असंभव है |

          तत्व में उपस्थित प्रकृति के गुण ही इस भौतिक शरीर में क्रिया करने के लिए उत्तरदाई है | जिस प्रकार एक तत्व में उपस्थित प्रकृति के गुणों की आपस में क्रियाओं का एक निश्चित परिणाम होता है, ठीक उसी प्रकार प्राणी के भौतिक शरीर में होने वाली क्रियाओं का भी एक निश्चित परिणाम होता है | मनुष्य के शरीर में होने वाली ये क्रियाएं कर्म कहलाती हैं क्योंकि अपने शरीर में वह स्वयं इन क्रियाओं को करने के लिए स्वतन्त्र है | जो क्रियाएं स्वतः होती रहती है और हमारे नियंत्रण में नहीं (Involuntary acts) होती है, उसके परिणाम का हमें पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता परन्तु जो क्रियाएं अर्थात कर्म हम स्वेच्छा (Voluntary acts) से करते हैं, उनका परिणाम निश्चित होता है और जो हमारे ज्ञान में भी होता है | इससे स्पष्ट है कि जो क्रियाएं व्यक्ति अपनी इच्छानुसार संपन्न करता है, उन कर्मों के परिणाम भी उन क्रियाओं के अनुसार उसे अवश्य ही प्राप्त होते हैं | किसी भी कर्म के परिणाम कभी भी नष्ट नहीं हो सकते अर्थात प्रत्येक कर्म का कोई न कोई परिणाम अवश्य ही मिलता है |

क्रमशः

प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल

।।हरि:शरणम्।।

Saturday, April 23, 2022

-अपनों से अपनी बात -

 ‘करिष्ये वचनं तव’ -अपनों से अपनी बात  -

          कल तक इस श्रृंखला की 31 कड़ियाँ प्रसारित हो चुकी है | इस अवस्था पर आकर मैं समझता हूँ कि इस विषय को लेकर उत्पन्न हो सकने वाली संभावित भ्रांतियों का तत्काल निवारण किया जाना आवश्यक है | अर्जुन के सखा, परम हितैषी और गुरु श्री कृष्ण ही थे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | फिर भी अर्जुन उस अवस्था को प्राप्त नहीं हो सका जिसका वह इतना ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद अधिकारी था | इसका अर्थ यह नहीं है कि अर्जुन मुक्त नहीं हो सका और हम तो उसके आस-पास कहीं ठहरते ही नहीं है तो हमारा कल्याण कैसे होगा, हम मुक्त कैसे होंगे ?

           श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान का अथाह भंडार है जोकि महाभारत ग्रन्थ के अंतर्गत आता है | महाभारत इस देश का इतिहास है | जो व्यक्ति अपने देश के इतिहास से शिक्षा ग्रहण नहीं करता वह कल्याण का अधिकारी कैसे हो सकता है ? शास्त्र हमें उन त्रुटियों की ओर भी संकेत करते हैं जो उनमें वर्णित पात्रों द्वारा की गयी है | उनमें से एक पात्र अर्जुन भी है, जिसने भगवान् को कह तो दिया ‘करिष्ये वचनं तव’ परन्तु वह उस ज्ञान पर पूर्ण रूप से चल नहीं सका था | जब तक हम अर्जुन की उन त्रुटियों की विवेचना नहीं करेंगे तब तक हम भी अपने जीवन में उन त्रुटियों को दोहराते चले जायेंगे और केवल ज्ञान की गलियों में भटकते रहेंगे, उद्देश्य को प्राप्त नहीं कर सकेंगे |

       प्रश्न उठता है कि क्या इतने अधिक विवेचन से साधकों के मध्य कहीं अनुचित सन्देश तो नहीं जा रहा है, वे भ्रमित तो नहीं हो रहे हैं ? सब कुछ साधकों के विवेक पर निर्भर करता है कि वह इस विवेचना को किस प्रकार लेते हैं ।श्रृंखला का उद्देश्य एक दम स्पष्ट है।श्रृंखला के प्रस्तुतीकरण का उद्देश्य केवल साधकों को उन विकारों के प्रति सावधान करना है, जिन विकारों के बार-बार प्रवेश करते रहने से अर्जुन जैसा महायोद्धा भी अपने उद्देश्य से भटक गया था | हमारे सामने भी वैसी ही परिस्थितियां आ सकती है, जिनके कारण अर्जुन विचलित हो गया था | विकार के भीतर प्रवेश करते ही ज्ञान विस्मृत हो जाता है, जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ था |अगर हम अपने जीवन में विकारों को आने ही नहीं देंगे, तभी गीता के ज्ञान से हमारा कल्याण होगा अन्यथा नहीं |

          शास्त्र-मोह और सांसारिक-मोह, इन दो विषयों को आचार्य श्री गोविन्द राम जी शर्मा इन दिनों अपने प्रातःकालीन प्रवचन में पूर्ण रूप से स्पष्ट कर रहे हैं | इस श्रृंखला का उद्देश्य भी यही है कि हम शास्त्रीय मोह में न पड़कर केवल शास्त्र से शिक्षा ग्रहण करें और अपने जीवन में प्रभु के प्रति अतिशय प्रेम प्रकट करें, जिससे जीवन आनंदमय बन सके | जब परमात्मा का प्रेम पराकाष्ठा पर होगा तब समस्त शास्त्र और संसार स्वतः ही पीछे छूट जायेंगे और इस बात का हमें पता भी नहीं चलेगा कि शास्त्र और संसार कहाँ रह गए | शास्त्र परमात्मा की राह पर चलने में हमारे सहयोगी हैं ।शास्त्र तभी तक उपयोगी हैं, जब तक उद्देश्य तक पहुँचने की राह के सभी कठिन मोड़ दृष्टि से ओझल नहीं हो जाते | परमात्मा का पथ सीधा और सरल है, बस आवश्यकता है, इस राह को गुरु और शास्त्रों के माध्यम से एक बार स्पष्ट रूप से जान लें |

       कल से ‘करिष्ये वचनं तव’ श्रृंखला पर फिर से आगे बढ़ते हुए 'महाभारत' में प्रवेश करेंगे, जिसमें भगवान् श्री कृष्ण से अर्जुन एक बार फिर गीता-ज्ञान देने की प्रार्थना कर रहे हैं |

 ||हरिः शरणम् ||                                                            डॉ.प्रकाश काछवाल


  


            


        

Friday, April 1, 2022

करिष्ये वचनं तव 1से30

 करिष्ये वचनं तव 

         परमात्मा की लीला देखिए!मनुष्य को बनाया, जीवन में आनंद लेने के लिए। आनंद की अनुभूति के लिए इंद्रियां बनाई,शरीर की परिधि पर और स्वयं जाकर बैठ गया शरीर के केंद्र पर।विषयों को रखा इस शरीर के बाहर।वह भी इसलिए कि मनुष्य के शरीर की परिधि पर स्थित इंद्रियां बाहर घूम रहे विषयों का आनन्द तो ले परंतु दृष्टि सदैव केंद्र पर रखे।मानव शरीर से आनंद प्राप्त करने का एक मात्र यही उपयोग होना चाहिए।

     मानव देह पाकर परमात्मा की इच्छा का सम्मान नहीं हुआ।इंद्रियां केंद्र से बंधी रहने के स्थान पर विषयों से जाकर बंध गई। यहीं से मनुष्य के जीवन में पतन प्रारम्भ होता है। इंद्रियां केंद्र की ओर उन्मुख रहे,इसके लिए दीर्घ काल तक और सतत संत समागम तथा शास्त्र अध्ययन आवश्यक है। संत तो मिले अथवा न मिले शास्त्र तो सदा से ही उपलब्ध है । शास्त्रों में भी श्रीमद्भगवद्गीता सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें गुरु भी है और ज्ञान भी है।"कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुं" यूँही नहीं कहा गया है।

      गुरु और गीता का ज्ञान तभी उपयोगी है,जब उसे आचरण में लाया जाए। हम कह तो देते हैं कि संतों और शास्त्रों के बतलाये मार्ग पर चलेंगे परंतु कब हमारी इंद्रियां केंद्र से विमुख होकर संसार के विषयों में फंसकर उलझ जाती है, पता ही नहीं चलता। गुरु और गीता हमारी बाह्य दृष्टि (विषयासक्ति) को दिव्य दृष्टि में परिवर्तित कर पुनः केंद्र (परमात्मा) की ओर उन्मुख कर देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम सतत सत्संग और स्वाध्याय करते रहें जिससे "सावधानी हटी,दुर्घटना घटी" हमारे साथ चरितार्थ न हो । गुरु और गीता के आकर्षण से हम भी अर्जुन की तरह कह सकेंगे -"करिष्ये वचनं तव"। साथ ही ध्यान रखें कि हमें गीता में कहे गए गुरु-वचनों का सदैव पालन करना है, पुनः संसार जाल में नहीं उलझना है।  

       श्रीमद्भगवद्गीता हमारा महत्वपूर्ण शास्त्र है | इसे गीतोपनिषद भी कहा गया है क्योंकि इसमें शिष्य ने गुरु के सामने बैठकर श्रद्धापूर्वक अपनी शंकाओं का समाधान किया है | उपनिषद् तीन शब्दों से मिलकर बना है- ‘उप’ अर्थात समीप, ‘निः’ अर्थात श्रद्धा और ‘सद्’ अर्थात बैठना | इस प्रकार उपनिषद् का अर्थ हुआ, शिष्य का गुरु के समीप श्रद्धापूर्वक बैठना जिससे शिष्य की अविद्या का नाश हो और उसे ब्रह्म की प्राप्ति हो | गुरु शिष्य का एकांत में बैठकर वार्तालाप करना ही उपनिषद् है | गीता में अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद है, इसलिए इसे उपनिषद की श्रेणी में रखा जाता है |

           अभी कुरुक्षेत्र की भूमि पर महाभारत का युद्ध प्रारम्भ ही नहीं हुआ था कि अपने पक्ष और  विपक्ष में खड़े मरने मारने को उतारू अपने ही सगे सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे | आज जीवन में पहली बार उसने युद्ध के परिणाम के बारे में सोचा था | यह बात नहीं है कि महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा था | इससे पूर्व भी उसने कई युद्ध लड़े थे परन्तु आज महाभारत प्रारम्भ होने से पूर्व वह अपने रचे संसार के मोह जाल में पड़ कर कर्तव्यच्युत होने जा रहा है क्योंकि वह जानता है कि इस युद्ध में क्षति केवल उसी के परिवार को होनी है | ऐसा होने पर उसका युद्ध करना अर्थहीन हो जाएगा| इस प्रकार की सोच रखना कि संभावित क्षति का कारण मैं ही बनूँगा, ही व्यक्ति को कर्तव्य मार्ग से डिगा देती है |

          हमारे और अर्जुन के जीवन में जरा भी भिन्नता नहीं है | हमारी स्वार्थपूर्ण आसक्तियां हमें कुछ व्यक्तियों के साथ बांधकर एक संसार का निर्माण कर देती है | स्वनिर्मित इस संसार को जब किसी प्रकार की तनिक सी भी क्षति पहुँचने की सम्भावना बनती है, तब हम भी अर्जुन की तरह विचलित हो जाते हैं | उस समय हमें भी किसी श्रीकृष्ण के रूप में योग्य गुरु की आवश्यकता पड़ती है, जिससे हम मोहजाल से मुक्ति पा सके और ज्ञान पाकर अर्जुन की तरह अपने गुरु को कह सकें –

  नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |

  स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||गीता-18/73||

      गीताज्ञान प्राप्त कर अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से कहा था-“हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

            ज्ञान व्यक्ति के मोह को नष्ट करता है और उसे सभी प्रकार के द्वंद्वों से मुक्त करता है | इसलिए जीवन में ज्ञान का पदार्पण होना आवश्यक है | ज्ञान क्या है ? ज्ञान है, स्वयं को पहिचानना, स्वयं के स्वरुप को जानना | स्वरुप तक पहुँच जाना ही स्मृति को प्राप्त कर लेना है | जब हमें अपने वास्तविक स्वरुप की स्मृति हो जाती है, तब जीवन में संशय का कोई स्थान ही नहीं रहता अर्थात सभी संशय मिट जाते है | संशयरहित होने से ही गुरु की आज्ञा का पालन हो सकता है अन्यथा नहीं |

           इस भौतिक संसार में न तो गुरुओं की कमी है और न ही शिष्यों की | दूरदर्शन को खोलते ही दसों गुरु ज्ञान बांटते दिखलाई पड़ जाते हैं और हजारों शिष्य उन गुरुओं को सुनते हुए | फिर भी क्या कारण है कि संसार से विसंगतियां समाप्त होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है | किसमें कमी है,गुरु में है अथवा शिष्य में है ? ज्ञान बाँटना जितना सरल है, उतना ही मुश्किल है उसको जीवन में उतारना | जब तक गुरु ज्ञान के अनुसार जीवन नहीं जियेगा तब तक शिष्य के भीतर गुरु के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं हो सकता | जब तक गुरु के प्रति श्रद्धा भाव नहीं होगा तब तक जीवन में उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान शून्य प्रगतिकारक ही सिद्ध होगा |

          श्रद्धा और विश्वास, ये दो शब्द आध्यात्मिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | श्रद्धा का अर्थ है, किसी के प्रति सम्मान और समर्पण का भाव | विश्वास का अर्थ है, जिसमें श्रद्धा है उनके कथन पर विश्वास करना | केवल उनके कथन पर ही विश्वास नहीं रखना है बल्कि इस बात का भी विश्वास होना चाहिए कि इनके वचनों से ही मेरा कल्याण होगा | विश्वास में तर्क-वितर्क का कोई स्थान नहीं होता | जहाँ तर्क-वितर्क होता है वहां विश्वास को ठेस पहुँचती है | इस प्रकार श्रद्धा और विश्वास दोनों एक दूसरे के पूरक हुए | जिसमें श्रद्धा भाव रखेंगे उसके प्रति हमारे भीतर विश्वास भी होगा और जिसमें विश्वास है उसके प्रति श्रद्धा भाव भी होगा |

                    हमारी आध्यात्मिक यात्रा में किसी प्रकार की प्रगति क्यों नहीं हो रही है ? यह प्रश्न जब ब्रह्मलीन स्वामी श्री राम सुख दासजी महाराज से पूछा जाता तो वे एक दोहा सुनाया करते थे-

कुछ श्रद्धा कुछ दुष्टता, कुछ संशय कुछ ज्ञान |

घर का रहा न घाट का ज्यों धोबी का श्वान ||

      यह दोहा स्पष्ट करता है कि गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास पूर्णरूपेण होना चाहिए अन्यथा व्यक्ति जीवन में न तो इधर (संसार) का रहेगा और न ही उधर (परमात्मा की ओर) जा पायेगा |

           एकलव्य का अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से श्रद्धा भाव था और मजबूत विश्वास भी कि उनकी शिक्षा से मैं अवश्य ही धनुर्विद्या में पारंगत हो जाऊंगा | भले ही गुरु द्रोण ने प्रारम्भ में उसे अपना शिष्य स्वीकार नहीं किया परन्तु एकलव्य की उनके प्रति दृढ़ निष्ठा और श्रद्धा ने द्रोणाचार्य की मूर्ति में ही गुरु की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी | श्रद्धा और विश्वास के कारण ही गुरु की मूर्ति के समक्ष अभ्यास करते हुए एकलव्य विश्व का श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया | अंततः एक दिन परिस्थिति के वशीभूत होकर द्रोणाचार्य को उसे अपना शिष्य स्वीकार करना पड़ा | गुरु-दक्षिणा में एकलव्य से उन्होंने उसके दायें हाथ का अंगूठा मांग लिया | यह सरासर अन्याय था, एक धनुर्धर के साथ | फिर भी एकलव्य ने अपने साथ होने जा रहे इस अन्याय पर तनिक भी विचार नहीं किया और अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में डाल दिया | एकलव्य का अपने गुरु के प्रति ऐसा श्रद्धा भाव इतिहास के पन्नों में स्वर्णक्षरों से अंकित हो गया |

            गीता में अर्जुन ने कह तो दिया ‘शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ कि मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण लेता हूँ, इसलिए आप मुझे शिक्षा दीजिये | दूसरे अध्याय में कहे गए अपने इन वचनों से क्या अर्जुन ने अपने गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा दिखलाई थी ? अर्जुन के भीतर श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा कब उत्पन्न हुई ? अवश्य ही श्री कृष्ण के प्रति अर्जुन का श्रद्धाभाव था, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता परन्तु इस श्रद्धा के उत्पन्न होने का जो कारण था, वह जानना भी महत्वपूर्ण है | माना कि अर्जुन अपने समय का महान योद्धा था परन्तु वह अपने मोह के कारण भीतर ही भीतर मानसिक रूप से कमजोर हो गया था और युद्ध-भूमि से पलायन करने की सोच रहा था | अपनी इस दुर्बल अवस्था में उसे एक सहारे की आवश्यकता थी | ऐसे समय में व्यक्ति के लिए अपने अभिन्न परम मित्र का ही सहारा लेना उचित होता है और उसने ऐसा किया भी | श्रीकृष्ण उसके परम सखा थे और सखा को ही उसने अपना गुरु माना |

        गुरु मान लेने के उपरांत भी भगवान् श्री कृष्ण के प्रति उसकी श्रद्धा बीच-बीच में डांवाडोल होती रही, तभी तो उसने बहती ज्ञान धारा के मध्य एक-एक कर कई प्रतिप्रश्न कर डाले | प्रतिप्रश्न करना किसी प्रकार अनुचित नहीं है क्योंकि ज्ञान को भीतर तक ले जाने के लिए उनका उठना स्वाभाविक है | प्रतिप्रश्न से ही शिष्य की मुमुक्षा का पता चलता है | परन्तु श्रद्धा और मुमुक्षा में अंतर है | श्रद्धा गुरु के प्रति समर्पण है और मुमुक्षा गुरु के समक्ष ज्ञान के प्रति जिज्ञाषा व्यक्त करना |

         दसवें अध्याय में भगवान् ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया और अर्जुन को अंत में कह भी दिया कि और अधिक जानने से तुम्हारा कोई प्रयोजन नहीं होना चाहिए | तुम तो केवल इतना जान लो कि ‘एकांशेन स्थितो जगत्त्’ - मेरे एक अंश में यह संसार व्याप्त है और मैं उसमें स्थित हूँ | तब जाकर अर्जुन के मन में भगवान् के प्रति श्रद्धा दृढ हुई और उसका संशय नष्ट होना प्रारम्भ हुआ | श्रद्धा होते हुए भी उसने भगवान् के वास्तविक स्वरुप को देखना चाहा | जब अर्जुन को भगवान् का विश्वरूप दर्शन हुआ तब जाकर उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और पूर्ण समर्पण भाव पैदा हुआ |

           हमारा जीवन भी अर्जुन से तनिक भी भिन्न नहीं है | हमारी श्रद्धा भी घडी के पेंडुलम (दोलक) की तरह इधर उधर डोलती रहती है | सुख मिला तब भगवान् को भूल गए और दुःख आया तो “भगवान् तू ही एक सहारा है” कहने लगे परन्तु क्या कभी भगवान् के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हुए हैं ? नहीं हुए और न ही कभी हो सकेंगे क्योंकि संसार का सुख हमें बार बार अपनी ओर आकर्षित करता है और हम भगवान् को भूल जाते हैं | मनुष्य जीवन का उद्देश्य है-आत्मज्ञान को उपलब्ध होना अर्थात परमात्मा को प्राप्त कर लेना | परन्तु हमारा उद्देश्य हमारी कामनाओं के बोझ तले दबकर सिसकियाँ लेने लगता है | कहने का अर्थ है कि हमारी कामनाएं हमें संसार से मुक्त नहीं होने देती |

          जीवन का उद्देश्य है कामनारहित होना, कामनाओं में उलझकर सुखी-दुखी होना नहीं है | कामना किसी की पूरी नहीं हो सकती परन्तु अपने उद्देश्य तक प्रत्येक कोई पहुंच सकता है | कामनाओं में डूबे रहेंगे तो जन्म-जन्मान्तर तक भटकते रहेंगे और उद्देश्य के पीछे लग जायेंगे तो भटकने से मुक्त हो जायेंगे | गीता का ज्ञान मात्र इतना ही है | आवश्यकता है, गीता के ज्ञान को मानकर गुरु के वचनों का पालन करें | भगवान् श्री कृष्ण ने अपने वचनों के माध्यम से अर्जुन को कौन सा ज्ञान दिया था और अर्जुन ने उन वचनों के अनुसार कैसा आचरण किया ? यह जानने के लिए हमें गीता के मर्म को जानना होगा |

         श्रीमद्भगवद्गीता न जाने कितनी बार कही गयी है और सुनी गयी है परन्तु इस गीता-ज्ञान को कहने और सुनने से अधिक महत्वपूर्ण है कि हम यह जानें कि इसको कितने व्यक्तियों ने आत्मसात किया है | गीता-ज्ञान की प्रासंगिकता इसी से सिद्ध होगी, कहने और सुनने मात्र से नहीं | अगर इस ज्ञान को किसी भी व्यक्ति द्वारा आत्मसात नहीं किया जायेगा तो धीरे-धीरे एक दिन यह गीता भी लुप्तप्राय हो जाएगी | गीता चाहे कुछ समय के लिए लुप्तप्राय हो जाये परन्तु इसका अप्रासंगिक होना असंभव है | इसी गीता ज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिए फिर एक बार श्री कृष्ण को इस धरा पर अवतार लेना होगा और साथ ही अर्जुन को भी, जो यह ज्ञान सुन सके | 

        गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं इस ज्ञान के लुप्त होने की बात को स्वीकारते हुए अर्जुन को कह रहे हैं –

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेSब्रवीत् ||

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||गीता-4/1-2||

             श्री कृष्ण कह रहे हैं-हे अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा | इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग इस धरा से लुप्तप्राय हो गया | 

                  चलिए, श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ पन्नों को पलटते हुए आधुनिक युग के साथ इसका सामंजस्य बिठाने का प्रयास करते हैं | भौतिकतावादी युग ने मनुष्य के जीवन को बड़े संकट में डाल रखा है | आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य को भौतिक संसाधनों के प्रति आसक्त किया है | विज्ञान का उद्देश्य भले ही प्रकृति के रहस्यों को एक एक कर के खोलना रहा हो परन्तु इन रहस्यों से जरा सा पर्दा उठते ही मनुष्य उन संसाधनों का दास बनता जा रहा है | सुख प्राप्ति के लिए संसाधनों के प्रति उसकी दासता जितनी अधिक बढेगी उतना ही वह परमात्मा से अर्थात स्वयं से दूर होता चला जायेगा | जब मनुष्य एक दिन स्वयं से ही दूर चला जायेगा तो फिर ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ ही क्या ? संसाधनों का उपयोग करना अनुचित नहीं है बल्कि उन संसाधनों का दास बन जाना अनुचित है |

                गीता-ज्ञान बड़ा ही विलक्षण ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए योग्य पात्र का होना आवश्यक है | जब किसी योग्य पात्र का अभाव हो जाता है तभी यह ज्ञान लुप्तप्राय हो सकता है अन्यथा नहीं | यही कारण है कि गीता की अनेकों विद्वानों ने अपने अपने अनुसार व्याख्याएं की है, जिससे इस ज्ञान के प्रति समाज में रुचि बनी रहे और योग्य पात्रों का कभी अभाव न होने पाये | इस लेख में मैं उन महत्वपूर्ण तथ्यों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करने जा रहा हूँ, जिससे हम यह समझ सकें कि कमी गीता-ज्ञान में नहीं है बल्कि हमारे में है, जो इस ज्ञान का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं |  

      श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता इसके ज्ञान को आत्मसात करने में ही है, केवल पढ़ने, सुनने और व्याख्या करते रहने में नहीं | अगर हम केवल इन तीन कार्यों में ही उलझे रहे तो एक दिन यह ज्ञान भी लुप्तप्राय हो जायेगा |

           इस ज्ञान के लुप्तप्राय हो जाने का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि ज्ञान सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो गया था, बल्कि इसका अर्थ है कि ज्ञान स्मृति में नहीं रह पाया था | स्मृति के लोप हो जाने का अर्थ ज्ञान का नष्ट हो जाना नहीं है बल्कि उस ज्ञान का स्मृति में न बने रहना है | गीता-ज्ञान शाश्वत ज्ञान है, सनातन ज्ञान है, यह कभी भी नष्ट नहीं हो सकता |

        जब भगवान श्री कृष्ण गीता-ज्ञान का समापन कर चुके होते हैं और अर्जुन से पूछते हैं कि क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया ? तभी अर्जुन कह उठते हैं –

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||गीता-18/73||

   अर्जुन स्वीकार करते हैं कि हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

              प्रश्न यह उठता है कि क्या भगवान श्री कृष्ण से ज्ञान पाकर सचमुच में अर्जुन का मोह नष्ट हो गया था ? क्या उसने स्मृति प्राप्त कर ली थी ? स्मृति उस ज्ञान की जो उसके जीवन में मोह उत्पन्न हो जाने के कारण विस्मृत कर दिया गया था | क्या वह पूर्णरूप से संशय रहित हो गया था ? हमारा जीवन भी अर्जुन की तरह का ही जीवन है | हमारे में और अर्जुन में तनिक मात्र भी भिन्नता नहीं है | अर्जुन को साक्षात् परमात्मा से ज्ञान प्राप्त हुआ था और हमें वही ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से मिल रहा है और संशय रहित होने के लिए हमें भी श्रीकृष्ण जैसे योग्य गुरु भी उपलब्ध है | फिर क्या कारण है कि हम स्मृति प्राप्त कर लेने के बाद भी बार-बार मोह में पड़ जाते हैं और ज्ञान को विस्मृत कर संशयग्रस्त हो जाते हैं ? यह सब जानने के लिए हमें उस प्रसंग में उतरना होगा जो महाभारत में वर्णित है |

            महाभारत में वर्णित कई प्रसंग अर्जुन से सम्बंधित है जो गीता-ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत उसके जीवन में घटित हुए हैं | हमारे में और अर्जुन में नाम, समय और स्थान आदि का अंतर भले ही हो परन्तु उसकी और हमारी मानसिकता में तनिक भी अंतर नहीं है | इसी से हम समझ सकते हैं कि जो कुछ अर्जुन ने गीता-ज्ञान प्राप्त कर के अपने जीवन में किया वह हम भी कर सकते हैं | अर्जुन ने गीता-ज्ञान का अपने जीवन में किस प्रकार उपयोग (Utilise) किया, जब हम यह समझ लेंगे तभी हम श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान ग्रन्थ की सार्थकता (Significance) को समझ पाएंगे |

           स्मृति को प्राप्त कर लेने से अर्थ है, आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाना | भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में आत्म-बोध को उपलब्ध होने के तीन मार्ग बतलाये हैं | ये तीन मार्ग हैं-ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग | कर्म, भक्ति और ज्ञान मार्ग एक दूसरे के पूरक मार्ग है | ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी महाराज कहते हैं कि इनमें से प्रत्येक साधन आत्मबोध के लिए अपने आप में स्वतंत्र साधन है।इसका अर्थ यह नहीं है कि एक साधन में रत मनुष्य दूसरे साधन को उपयोग में बिल्कुल नहीं लेता। किसी साधक के लिए एक साधन प्रधान अवश्य होता है फिर भी शेष दोनों साधनों का उपयोग भी उसके द्वारा किया जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी भी मनुष्य में केवल एक ही प्राकृतिक गुण की उपस्थिति नहीं हो सकती | मनुष्य जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सत, रज और तम तीनों प्राकृतिक गुणों की उपस्थिति होनी आवश्यक है | हाँ, यह बात अलग है कि तीनों गुणों में से किसी एक प्राकृतिक गुण की प्रधानता प्रत्येक मनुष्य में होती है | किसी में सत्व गुण की प्रधानता होती है, किसी में रज की और किसी में तमोगुण की | आत्म-बोध के लिए सांसारिक व्यक्ति के लिए कर्म-योग उपयुक्त अवश्य होता है, परन्तु आत्म-बोध के लिए कर्म के साथ-साथ ज्ञान और भक्ति की उपस्थिति भी आवश्यक होती है | केवल एक अकेले कर्म-योग से भी आत्म-ज्ञान होना संभव नहीं हो सकता | उसके साथ ज्ञान और भक्ति का होना भी आवश्यक है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कर्म योग तभी सिद्ध होता है जब सभी कर्म, ज्ञान और भक्ति के आधार पर किये जायें।

                 कर्म-योग व्यक्ति के कुछ न कुछ करते रहने से सम्बंधित है | हमारे द्वारा किये जाने वाले कर्म हमारा व्यवहार (Conduct) निर्धारित करते है | भक्ति-योग मनुष्य की भावनाओं (Emotions) से सम्बंधित है जबकि ज्ञान-योग मनुष्य के व्यक्तित्व से, स्वयं के अस्तित्ववान (Personal identity) होने से सम्बंधित है | आत्म-बोध को उपलब्ध होना, केवल कुछ करने से, जानने से अथवा भावना व्यक्त करने से, इन तीनों में से किसी अकेले एक से संभव नहीं हो सकता | तीनों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है, तभी व्यक्ति योगी हो सकता है | हाँ, मनुष्य में उपस्थित प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता होना, इन तीनों में से किसी एक मार्ग अथवा योग के चयन को सुनिश्चित अवश्य ही कर देता है |

          प्रकृति के गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता के अनुरूप ही मनुष्य को इनमें से किसी एक मार्ग पर चलना अधिक सुगम प्रतीत होता है अथवा फिर वह इन तीनों ही मार्गों से विमुख भी बना रह सकता है | सब कुछ प्रकृति के गुणों की उपस्थिति और किसी एक गुण की प्रधानता पर निर्भर करता है | जो व्यक्ति इन तीनों योग में से किसी भी एक योग को मुख्य साधन नहीं बना सके तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कर्म करने से भी विमुख हो जाएगा | कर्म करना अलग बात है और कर्म-योगी होना अलग बात है | अतः व्यक्ति भले ही किसी एक भी योग को आत्मसात न करे परन्तु जीवन में कर्म तो उसको फिर भी करने ही पड़ेंगे |

             कर्म का सम्बन्ध हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियों (भौतिक शरीर) से है, ज्ञान का सम्बन्ध मस्तिष्क (बुद्धि) से है, जबकि भावना अर्थात भक्ति का सम्बन्ध हृदय (मन) से है | हमारी समस्त कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय रहते हुए व्यवस्थित रूप से तभी कर्म कर सकती है, जब हमारे मस्तिष्क और हृदय के साथ उनका स्वस्थ रूप से तालमेल बना रहे | इनमें से किसी एक में भी आया व्यवधान हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने से वंचित कर सकता है |

            कर्म-योग का सम्बन्ध हमारे शरीर से है, ज्ञान-योग का सम्बन्ध बुद्धि से है और भक्ति-योग का सम्बन्ध हमारे मन से है | शरीर से ‘करना’ होता है, बुद्धि से ‘जानना’ होता है और मन से ‘मानना’ होता है | अतः शरीर, मन और बुद्धि इन तीनों में सामंजस्य (Harmony) होना आवश्यक है | हमारे जीवन में दुःख इसीलिए ही है क्योंकि इन तीनों अर्थात शरीर, मन और बुद्धि में सामंजस्य का अभाव है |यह अभाव ही किसी भी एक योग को साधने में बाधक बन जाता है |

       हम स्वयं में उपस्थित गुणों की प्रधानता (Dominancy) के अनुरूप किसी एक योग को प्रमुखता देते हुए अपने साध्य (Target) तक सुगमता से पहुँच सकते हैं | गीता में भगवान ने आपको तीनों मार्ग बता दिए हैं, आपको अपने में उपस्थित गुणों के आधार पर किसी एक मार्ग को प्रधानता (Priority) देते हुए चयन करना होगा | भगवान ने आप पर ही यह कार्य छोड़ा है | उन्होंने गीता ज्ञान का समापन करते हुए अर्जुन को भी ऐसा ही कहा है ।

  गीता-ज्ञान का समापन करते हुए भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं -

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु || गीता-18/63||

          अर्थात इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया है | अब तुम इस रहस्य युक्त ज्ञान पर पूर्णतया भली भांति विचार कर, जैसे चाहता है, वैसे ही कर |

            परमात्मा की यही विशेषता है कि वे सब कुछ बताकर भी निर्णय (Decision) सामने वाले श्रोता पर ही छोड़ देते हैं | इसका कारण है कि मनुष्य चाहे कितना ही ज्ञान प्राप्त कर ले, वह उस ज्ञान को किस प्रकार लेता है, यह सब उसके विवेक पर निर्भर करता है, ज्ञान देने वाले की क्षमता पर नहीं | इस संसार में अथाह ज्ञान भरा पड़ा है, ज्ञान देने वाले गुरु भी बहुत हैं, ज्ञान देने वाले शास्त्र भी बहुत हैं फिर भी व्यक्ति मुक्ति की राह पर चल नहीं पा रहा है | कारण है, ज्ञान को जीवन में धारण न करना | जरा विचार कीजिये, गीता- ज्ञान को आत्मसात कर उस पर चलने वाले कितने लोग हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आप और मैं, हम सब भली-भांति जानते हैं |

          भगवान श्री कृष्ण ने अपने सखा, अपने शिष्य अर्जुन को गोपनीय (Confidential) से भी अति गोपनीय ज्ञान कह दिया है | यह गोपनीय ज्ञान रहस्यों से परिपूर्ण है और रहस्य युक्त ज्ञान केवल वही व्यक्ति आत्मसात कर सकता है, जो ज्ञान को आत्मसात करने से पूर्व किसी भी प्रकार के कथित ज्ञान से पूर्णतया रिक्त हो | अर्जुन तो पहले से ही कथित ज्ञान से भरा पड़ा था, तभी तो वह युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण से एक ज्ञानी की तरह बातें कर रहा था | युद्ध से होने वाली हानि और उससे लगने वाले पाप को समझा रहा था | भगवान श्री कृष्ण चाहते हैं कि ज्ञान को भली भांति विचारकर उसके अनुसार चलने अथवा उस पर न चलने का निर्णय स्वयं अर्जुन करे | भगवान ने तो अर्जुन के समक्ष ज्ञान देकर ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है कि उसे निर्णय करने में जरा सी भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए |  

       पहले से ही बुद्धि में भरे ज्ञान (जो कि वास्तव में ज्ञान न होकर अज्ञान है) को मिटाए बिना वास्तविक ज्ञान को आत्मसात नहीं किया जा सकता | पूर्व में भरा ज्ञान, जोकि केवल सांसारिक ज्ञान है, के सामने वास्तविक ज्ञान बौना बन कर रह जाता है जिससे व्यक्ति के  सामने द्वंद्व पैदा हो जाता है | वह समझ नहीं पाता कि कौन सा ज्ञान वास्तविक ज्ञान है | समय आने पर पूर्व में प्राप्त सांसारिक ज्ञान ही आध्यात्मिक ज्ञान पर भारी पड़ जाता है जिसके कारण व्यक्ति के सामने आने वाली विपरीत परिस्थितियां उसे मोहग्रस्त कर देती है |

           एक बार एक संत भिक्षा के लिए एक घर में जाते हैं |  भिक्षा देने वाली महिला संत से कहती है कि मुझे ज्ञान दीजिये | संत कहते हैं कि अभी तक तुमने क्या क्या ज्ञान प्राप्त कर लिया है ? तब वह महिला अपनी पढी और सुनी ज्ञान की बातें संत को बतला देती है | बार बार संत से ज्ञान की बातें कहने का आग्रह करने पर संत कहते हैं कि आज नहीं, कल जब मैं भिक्षा के लिए आऊंगा तब तुम्हें ज्ञान दूंगा | दूसरे दिन भिक्षा के लिए जब संत उसी द्वार पर जाते हैं तब महिला भिक्षा देने के लिए बाहर आती है | संत भिक्षा के लिए पात्र को आगे कर देते हैं और कहते हैं कि इसमें भिक्षा डाल दो | महिला पात्र को देखती है कि उसमें तो गोबर भरा है | महिला कहती है कि महात्माजी, इसमें तो गोबर भरा है | संत कहते हैं भिक्षा इसी पात्र में डाल दो | महिला कहती है कि इससे तो भोजन दूषित हो जायेगा |

            तब संत महिला को समझाते हैं कि इसी प्रकार पहले से ही तुम्हारे भीतर जो ज्ञान भरा पड़ा है उस पर मेरे द्वारा दिया गया ज्ञान भी दूषित होकर अर्थहीन हो जायेगा | इसलिए पहले उस ज्ञान को बाहर निकाल फेंको, तभी मेरे दिए ज्ञान का कुछ प्रभाव होगा अन्यथा मेरे द्वारा दिया ज्ञान भी अर्थहीन होकर रह जायेगा | हम भी उस महिला की तरह ही हैं जो पहले से ही ज्ञान से भरे हैं | इसीलिए हमारे ऊपर भी गीता का ज्ञान भी किसी प्रकार का प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है |  

                 आइये ! पुनः चलते है कुरुक्षेत्र में होने जा रहे युद्ध की ओर जहां अभी युद्ध प्रारम्भ नहीं हुआ है | दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने डटी हुई है और युद्ध के लिए तत्पर है | दोनों सेनाओं के मध्य अर्जुन का रथ लिए भगवान् श्री कृष्ण खड़े हैं | अपने भीतर भरे ज्ञान (अज्ञान) के कारण अर्जुन विषाद कर रहे हैं | विषाद मनुष्य को अवसाद में ले जाता है और अवसाद मनुष्य को कुछ भी करने लायक नहीं छोड़ता है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को अवसाद में जाने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं | अथक प्रयास के बाद जब भगवान् को प्रतीत होता है कि अब अर्जुन सभी संशयों से मुक्त हो चूका है तब वे अर्जुन को अपने विवेक से निर्णय करने का कह देते हैं | इस प्रकार समस्त गीता-ज्ञान को पाकर अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को अब कह रहे हैं-

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत |

स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्य वचनं तव || गीता-18/73||

अर्थात हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

                  यह श्लोक गीता के श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद का अंतिम श्लोक है, जो अर्जुन द्वारा उच्चारित किया गया है | इस श्लोक के अनुसार भगवान श्री कृष्ण को अर्जुन आश्वस्त करता है कि उसका समस्त प्रकार का मोह समाप्त हो चूका है और उसने अपनी स्मृति प्राप्त कर ली है | वह द्वंद्व से बाहर निकल कर निर्द्वंद्व हो चूका है अतः वह भगवान की आज्ञा का पालन करेगा |

          भगवान् की आज्ञा क्या है ? भगवान् की आज्ञा है-‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज’ | क्या अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से शरणागत हो गए थे ? क्या अर्जुन ने मीरां की तरह कह दिया था –‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ ? इस श्लोक को पूर्ण रूप से समझने के लिए इस श्लोक इसके भीतर उतरते हैं |  

              गीता के इस श्लोक (18/73) में चार बातें अर्जुन द्वारा कही गयी है | प्रथम, मेरा मोह (अज्ञान) नष्ट हो गया है; दूसरी बात, मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है; तीसरी, मैं संशय रहित हो गया हूँ और चौथी तथा अंतिम बात कि मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा | इन चारों में अतिमहत्वपूर्ण बात है, मोह (अज्ञान) का नष्ट हो जाना | अतः प्रथम बात को थोड़ा विस्तार से जानना आवश्यक है तभी हम निश्चित कर सकते हैं कि गीता-ज्ञान का अर्जुन पर कितना प्रभाव पड़ा है ?

         अर्जुन पर पड़े प्रभाव के अनुसार ही हमारे ऊपर इस गीता-ज्ञान का क्या प्रभाव पड़ सकता है, यह निश्चित होगा | मोह नष्ट होना, ज्ञान का प्रथम प्रभाव होता है | शेष सभी तीनों प्रभाव मोह के अधीन है | मोह के नष्ट होते ही व्यक्ति को स्मृति भी प्राप्त हो जाती है, फिर वह निर्द्वंद्व (संशय रहित) होकर सब कुछ परमात्मा के नियमानुसार करेगा अर्थात उनकी आज्ञा का पालन करेगा | हम सब सांसारिक मोह में इतने जकड़े हुए हैं कि हमें मोह से मुक्त होना लगभग असंभव प्रतीत होता है | मोह हमें एक प्रकार की सुखद अनुभूति देता है, जो हमें साक्षात् इस जीवन में अनुभव होती दिखाई देती है |

              ज्ञानी चाहे कितना ही ज्ञान देता रहे कि यह संसार मिथ्या है, मृग-मरीचिका है परन्तु हमें जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, हम उसी को सत्य मानते हुए जड़ बने रहते हैं | परिवार जनों का मोह, शरीर का मोह, व्यवसाय का मोह, धन-सम्पति का मोह आदि असंख्य मोह के बंधनों से छूट पाना इतना आसान नहीं है | इस मोह की पकड़ इतनी अधिक मजबूत है कि गीता का ज्ञान भी हमें इस मोह से तत्काल मुक्त नहीं कर सकता | यह मोह आखिर है क्या ?

              मोह अज्ञान है | जो परिवर्तनशील है, उसको शाश्वत मान लेना ही मोह है | जो अपना नहीं है, उसको अपना मान लेना ही मोह है | फिर इस अपनत्व को गहराई से आत्मसात कर लेना और उसे ही अपना संसार बना लेना अपनी आंतरिक दृष्टि को भी खो देना है | आखिर ‘मोह में व्यक्ति अंधा हो जाता है’, यह कथन चरितार्थ हो ही जाता है | मोह के कारण व्यक्ति अपना भला-बुरा नहीं समझ सकता और उसी के वशीभूत होकर वह अपनी स्मृति खो बैठता है | वह यह नहीं जानता कि वह क्या है, कौन है और उसके इस जीवन का उद्देश्य क्या है ? 

               ज्योंही व्यक्ति मोह के बंधन से छूटता है, उसको अपने होने का, अपने जीवन के उद्देश्य का भान हो जाता है | इसी को स्मृति को प्राप्त हो जाना कहते हैं | इसीलिए अर्जुन यहाँ पर कह रहा है कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है | आप अपने शरीर को ही स्वयं का होना मान रहे हैं; स्वयं को भूल जाना, अपने आपको विस्मृत कर देना, मोह के कारण ही संभव होता है और ज्योंही आपका मोह समाप्त हो जाता है, आप को अपनी सही स्थिति का अनुभव हो जाता है | यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे दर्पण पर धूल जम जाती है तब आप उसमें अपना वास्तविक स्वरूप नहीं देख सकते | ज्योंही दर्पण से धूल की वह परत हटा दी जाती है आपका वास्तविक स्वरूप आपके समक्ष प्रकट हो जाता है | इस प्रकार जब आपको अपनी स्मृति पुनः प्राप्त हो जाती है, तब आपका प्रत्येक संशय भी समाप्त हो जाता है | इस प्रकार संशय की समाप्ति हो जाना आपके मन को स्थिरता प्रदान कर देता है जिससे आपकी सोचने समझने की क्षमता तीव्र हो जाती है | मोह के नष्ट हो जाने से लेकर निर्द्वंद्व होने की स्थिति में पहुँचने तक, प्रभु कृपा और गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होती है |

               परमात्मा की कृपा के बिना न तो मोह नष्ट हो सकता है और न ही संशय दूर हो सकता है | प्रभु कृपा से आपको गुरु के रूप में एक सच्चा मार्गदर्शक मिल जाता है, जो आपको मोह के जाल से बाहर निकाल कर प्रत्येक संशय से रहित कर देता है | संशय रहित जीवन ही वास्तविकता में जीवन होता है अन्यथा द्वंद्व में तो सारा संसार जी ही रहा है | जब तक आप अपने जीवन के होने, अपने स्वयं के होने को नहीं समझते तब तक संशय ग्रस्त ही बने रहते हैं | संशय दूर होते ही आपकी मानसिक दशा भी स्थिर हो जाती है और धीरे-धीरे आप आत्म-बोध होने की ओर बढ़ने लगते हैं |

         इतना ज्ञान हो जाने पर मनुष्य समझ जाता है कि वह कुछ भी नहीं करता है बल्कि सब कुछ परमात्मा की इच्छानुसार ही होता है | उसके हाथ में कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि वह स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ वह एक परमात्मा (सर्व लोकैक नाथम्) ही है | यही कारण है कि अर्जुन यहाँ पर कह रहे हैं कि अब वह सब कुछ वैसे ही करेगा जैसा उसे भगवान श्री कृष्ण कहेंगे अर्थात ‘करना और होना परमात्मा की मर्जी के अनुसार’, इस बात को स्वीकार कर लेगा | इस स्थिति को उपलब्ध हो जाने के बाद ही मनुष्य परमात्मा होने की राह पर आगे बढ़ता है | 

              परमात्मा होने की राह पर आगे बढ़ने का अर्थ परमात्मा हो जाना नहीं है | आध्यात्मिकता की राह बड़ी फिसलन भरी राह है | यहां पर कदम-कदम पर फिसल जाने का खतरा बना रहता है | जब तक सोपान के अंतिम भाग तक पहुँच कर छत पर पांव नहीं जमाये जाते तब तक गिरने का भय बना ही रहता है | 

          एक सांसारिक व्यक्ति को जिन संकटों का सामना अपने जीवन में करना पड़ता है, उससे कहीं अधिक संकट आध्यात्मिकता की राह पर चलने से व्यक्ति के समक्ष उपस्थित होते हैं | ये संकट ही मनुष्य की कड़ी परीक्षा लेते है | जो इन संकटों से निकल गया, वही परमात्मा को उपलब्ध हो सकता है | आध्यात्मिकता के रास्ते की वे बाधाएं क्या हैं, जो व्यक्ति को अपने लक्ष्य से भटका देती हैं ? अर्जुन को गीता-ज्ञान साक्षात् परमात्मा श्री कृष्ण से मिला था, परन्तु फिर भी वह परमात्मा को नहीं पा सका | परमात्मा तो सभी के साथ सदैव है।साथ में होने का अर्थ यह नहीं है कि आप स्वयं परमात्मा हो गए है।स्वयं का परमात्मा हो जाना ही आत्मबोध को उपलब्ध होना है। 

         जब अर्जुन जैसा व्यक्ति जो सतत कई वर्षों तक स्वयं परमात्मा के सानिध्य में रहा था, फिर भी परमात्मा से उसकी दूरी बनी रही, तो फिर आप की और हमारी तो उसके सामने बिसात ही क्या है ? भगवान श्री कृष्ण भौतिक रूप से अर्जुन के साथ अवश्य बने रहे परन्तु आत्मिक स्तर पर क्या अर्जुन उनके साथ एकत्व स्थापित कर सका ?

                हम अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के दुःख और सुख भोगते हैं | सुख में हम इतने अधिक उत्साहित हो जाते हैं कि हमें परमात्मा की स्मृति तक नहीं रहती | जब दुःख सामने आता है, तो एक पल में ही व्यथित होकर भगवान को पुकारने लगते हैं | हमारी भौतिक दृष्टि में परमात्मा सुख में भी हमारे आस-पास नहीं थे और दुःख में भी कहीं दिखलाई नहीं पड़ते | जबकि वास्तविकता यह है कि परमात्मा हमें छोड़कर जा ही नहीं सकते, जिस समय परमात्मा इस भौतिक शरीर को छोड़ देंगे, हमारा इस एक योनि का जीवन भी समाप्त हो जायेगा अर्थात यह शरीर भी नष्ट हो जायेगा | इस संसार में हमें दुःख मिलता ही इसी कारण से है कि हम कर्म भी केवल इस शरीर के लिए ही करते हैं | जबकि महत्वपूर्ण हमारा शरीर नहीं बल्कि हमारी आत्मा है, जो कि हम स्वयं है | हम शरीर नहीं हैं | आत्म-बोध हो जाने पर शरीर में रहते हुए भी हम केवल ‘शरीर’ नहीं रहते बल्कि जिस के कारण यह शरीर मिला है, वही हम हो जाते हैं  | आत्म-ज्ञान को प्राप्त होकर ही हम मुक्त हो सकते हैं अन्यथा नहीं ।

              अर्जुन ने कह तो दिया कि ‘करिष्ये वचनं तव’ परन्तु क्या उसने भगवान् श्री कृष्ण द्वार कहे गए वचनों के आधार पर उस ज्ञान को प्राप्त कर लिया जिसको पाकर मनुष्य संसार से मुक्त होकर आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाता है |नहीं, ज्ञान को सुनकर भी उसका मन युद्ध भूमि पर ही  डांवाडोल हो गया था |

        आइये ! अब हम यह जानने का प्रयास करें कि वे कौन से कारण थे, जिनके कारण अर्जुन जैसा शिष्य भी आत्म-ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सका | अर्जुन के जीवन में जो कारण रहे, वही कारण हमारे जीवन में आज भी उपस्थित हैं जो हमारी मुक्ति में बाधक बनते है | श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ज्ञान को श्री कृष्ण से प्राप्त कर लेने के उपरांत अर्जुन के जीवन में उस महायुद्ध में और उस युद्ध के उपरांत क्या कुछ घटित हुआ, इसको जानने के लिए महाभारत की और चलते हैं |

                गीता महाभारत के भीष्म-पर्व के अंतर्गत आती है | गीता-ज्ञान से आगे की बातें महाभारत में वर्णित है | गीता-ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत अर्जुन ने कह दिया है कि वह अब वही करेगा, जैसा उसे भगवान श्री कृष्ण आदेश देंगे | उसके अनुसार उसका मोह नष्ट हो चूका था और मानसिक रूप से संशय रहित होकर वह स्थिर हो गया था | कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में रण-भेरी बज चुकी है और युद्ध प्रारम्भ हो गया है | श्री कृष्ण के ज्ञान के प्रभाव से अर्जुन मन लगाकर युद्ध भी कर रहा है | समता का आचरण करते हुए वह समभाव से अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग कर रहा है | युद्ध अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ रहा है और आखिर एक दिन वह घडी आ जाती है, जब अर्जुन पुनः मोहग्रस्त हो जाता है | उधर सामने विरोधी पक्ष में पितामह भीष्म और इधर अर्जुन | अर्जुन के मानसिक दृष्टि पटल पर पितामह के साथ बाल्यकाल से लेकर आज तक के दृश्य एक-एक कर आ जा रहे हैं | वह अभी भी महाप्रतापी भीष्म को एक योद्धा न मानकर अपना पितामह ही मान रहा है |

                  पितामह को सामने देखकर वह श्री कृष्ण द्वारा दिया गया वह ज्ञान भूल चूका है कि ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च‘ अर्थात जन्म लेने वाले की मृत्यु और मरने वाले का जन्म होना निश्चित है | एक व्यक्ति को, एक योद्धा को केवल अपना पितामह मान लेना भी मोह है | इस प्रकार उत्पन्न हुए मोह के कारण भला अपने पितामह को वह कैसे मार सकता है ? अर्जुन इस मोह के वशीभूत होकर यह भी भूल गया था कि श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘देही नित्यमवध्योSयं देहे सर्वस्य भारत’ अर्थात देह में स्थित यह देही सदैव ही अवध्य है यानि इसे मारा नहीं जा सकता, केवल देह मरती है | मोहग्रस्त होकर वह अपने क्षत्रिय धर्म को भी भूल गया था जहाँ उसका एकमात्र धर्म युद्ध करना होता है | जैसे तैसे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझा बुझा कर इस मोह रुपी अज्ञान से बाहर निकालते हैं और इस प्रकार युद्ध फिर से अपनी लय प्राप्त कर लेता है और भीष्म को अर्जुन के द्वारा शर-शैया उपलब्ध होती है |

                 इसी प्रकार युद्ध के मध्य में ही अर्जुन जान चूका है कि कर्ण उसका बड़ा भाई है | एक बार फिर युद्ध में मोहग्रस्त होने की स्थिति अर्जुन के सामने उपस्थित हो जाती है | इस बार भीष्म के स्थान पर कर्ण अर्जुन के सामने होता है | मोह उसे एक बार फिर अपनी पकड़ में जकड़ लेता है | युद्धभूमि में निहत्था कर्ण अपने रथ के पहिये को दलदल से बाहर निकालने का प्रयास कर रहा है | निहत्थे पर प्रहार करना युद्ध के नियम के विरुद्ध होता है | अर्जुन इस नियम के वशीभूत हो जाता है और मोहग्रस्त होकर उसे केवल देख भर रहा है | श्री कृष्ण उसे फिर मोह से बाहर निकलते हुए स्मृति दिलाते हैं कि इस युद्ध में नियम अनेकों बार टूटे हैं | अभिमन्यु को भी तो नियम तोड़ कर मारा गया था | यह जानकर ही अर्जुन मोह से बाहर निकल पाता है और कर्ण का वध कर देता है |

           एक बार ज्ञान हो जाने के बाद भी बार-बार मोहग्रस्त हो जाना ‘मनुष्य की नियति है’ ऐसा कहा जा सकता है | मोह संसार का आकर्षण है इसलिए यह अंधकार है, अज्ञान है | अन्धकार को केवल आलोक से ही दूर किया जा सकता है | अज्ञान को केवल ज्ञान से ही मिटाया जा सकता है | वह ज्ञान, जो केवल पढ़ा अथवा सुना ही नहीं जाये बल्कि उस ज्ञान को गुना भी जाये, उस ज्ञान के अनुसार जिया जाये | जब व्यक्ति ज्ञान में जीने लगता है, वह पुनः मोह के जंगल में भटकता नहीं है | अर्जुन ने केवल ज्ञान को सुना ही था, ज्ञान के अनुरुप चला नहीं था, उस ज्ञान को जिया नहीं था, उस ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं किया था |

                  आपके जीवन में भी आपको अपने लक्ष्य से भटकाने के लिए ऐसे ही सब विकार अवरोध बनकर आयेंगे | अगर आप ने ज्ञान को आत्मसात किया होगा तो फिर संसार की कोई भी शक्ति आपको मोह ग्रस्त नहीं कर सकती | परन्तु यह सब इतना सरल नहीं है | साधारण मनुष्य के लिए तो एक दम नहीं है | ब्रह्मा पुत्र नारद जैसे देवर्षि भी स्त्री के मोह के जाल में फंसने से नहीं बच पाए थे |

         देवर्षि नारद ने काम को जीत लिया था | इसका उनको अभिमान हो गया था | वे सभी देवताओं को अपनी उपलब्धि बताते हुए आत्मप्रशंसा कर रहे थे | भगवान शंकर ने उन्हें कहा भी कि मुझे तुम जो यह सब काम-विजय की गाथा सुना रहे हो न, उसे भगवान विष्णु को मत बताना | देवर्षि तो काम-विजय के मद में चूर थे | भला वे शिव की बात को सुनने वाले कहाँ थे ? पहुँच गए बैकुण्ठ, श्री हरि के दरबार में और करने लगे उनके समक्ष आत्मप्रशंसा | श्री हरि ने भी स्वीकार किया कि आप जैसा कोई नहीं है, जो काम को जीत सका हो | परन्तु नारद कहाँ रुकने वाले थे | वे तो लगातार अपनी प्रशंसा किये जा रहे थे |

                 परमात्मा की एक बहुत बड़ी विशेषता है | वे संसार में सब कुछ सहन कर सकते हैं परन्तु अपने भक्त का पतन उनको सहन नहीं होता | नारद ठहरे भगवान के परम भक्त | सदैव तीनों लोकों में ‘नारायण-नारायण’ का जप करते हुए घूमते रहते हैं | श्री हरि ने देखा कि अहंकार के कारण मेरे भक्त नारद का पतन हो रहा है, उसको इस प्रकार पतित होने से रोकना होगा | नारद जब बैकुण्ठ में श्री हरि के सामने आत्मप्रशंसा करते-करते थक गए तो उन्होंने परमात्मा को प्रणाम कर पृथ्वी लोक के भ्रमण पर जाने के लिए उनसे आज्ञा मांगी |

      श्री हरि की स्वीकृति पाकर वे ‘नारायण-नारायण’ जपते हुए पृथ्वी-लोक के लिए चल पड़े | तुरंत ही वे पृथ्वी लोक में पहुँच गए | वहां पहुंचते ही वे देखते हैं कि एक  नगर में वहां के राजा शीलनिधि की अति सुन्दर कन्या राजकुमारी विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा है | उस नगर में पहुंचकर वे राज निवास गए | शीलनिधि ने नारदजी का स्वागत करते हुए अपनी कन्या का हाथ देखकर भविष्य बतलाने का आग्रह किया | हस्त-रेखा पढ़कर देवर्षि समझ गए थे कि इस कन्या का वर तो श्री हरि के समान ही कोई होगा |

     किसी भी मनुष्य को भले ही भविष्य जानने का कितना ही ज्ञान हो परन्तु काम के वशीभूत होकर वह मोहग्रस्त हो ही जाता है | नारद जानते थे कि विश्वमोहिनी का वर श्री हरि जैसा ही होगा परन्तु वह स्वयं हरि जैसा है नहीं | फिर भी काम ने उनको भ्रमित कर दिया | वे जानते थे कि श्री हरि जैसा होना केवल श्री हरि की कृपा से ही संभव हो सकता है अन्यथा नहीं |

          मन में जब कोई कामना जन्म लेती है तो मनुष्य उसे तत्काल ही पूरा करने में लग जाता है और जीवन की वास्तविकता से मुंह मोड़ लेता है | नारदजी ने भी यही किया, सत्य से मुंह मोड़ लिया | उन्होंने विश्वमोहिनी के भविष्य का सब कुछ ज्ञान अपने मन में छुपाकर रख लिया क्योंकि वे तो राजकुमारी को देखते ही मोहग्रस्त हो गए थे | उनके मन में उत्कंठा हुई कि क्यों न स्वयंवर में राजकुमारी उन्हें ही वर के रूप में चुने और जयमाला पहनाये ? परन्तु ऐसा होना इतना आसान नहीं था | सब कुछ राजकुमारी विश्वमोहिनी के द्वारा किये जाने वाले चयन पर निर्भर था | देवर्षि नारद के सामने एक ही रास्ता था | वे श्री हरि से प्रार्थना करने लगे कि प्रभु, आप मुझे आपके जैसा सुन्दर रूप दीजिये | आप वह सब कुछ कीजिये जिससे राजकुमारी विश्वमोहिनी मुझे ही वर के रूप में स्वीकार करे | श्री हरि ने देवर्षि को कहा कि ‘मैं वह सब कुछ करूँगा जिसमें तुम्हारा हित निहित होगा | तुम्हारे हित के विरुद्ध मैं कुछ भी नहीं करूँगा |’

                       श्री हरि से आशीर्वाद प्राप्त कर देवर्षि पहुँच गए, शील निधि के दरबार में जहाँ विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा था | राजकुमारी जयमाला लेकर मंडप में आती है, नारद उछल-उछल कर उसके सामने अपने चेहरे को ले जाते हैं परन्तु राज कुमारी उनकी ओर दृष्टि तक नहीं डालती है | राजकुमारी उनकी तरफ दुबारा आती ही नहीं है और भीड़ में अदृश्य हो जाती है | अन्ततः स्वयंवर समाप्त हो जाता है और सभी अपने-अपने स्थान पर वापिस जाने के लिए उठ खड़े होते हैं | नारदजी भी अपना सा मुंह लेकर दुखी मन से इधर-उधर देखने लगते हैं | सभी एक-एक कर वापिस जाने लगते हैं ।

                  स्त्री-वियोग में दुखी होकर देवर्षि भी उठ खड़े होते हैं | पास में बैठे थे शिव के दो गण, वे दोनों नारद के बन्दर जैसे चेहरे को देखकर उनकी हंसी उड़ाते हैं | नारद उन्हें शाप देते हैं कि तुम दोनों जो मेरी इस देह को देखकर राक्षसों की तरह मुझ पर हंस रहे हो न, त्रेता युग में तुम दोनों निशाचर बनोगे | व्यथित नारद राजप्रासाद से बाहर निकलते हैं और पास में स्थित सरोवर में जाकर अपने मलिन मुख को धोते हैं | वे अपना चेहरा जल-दर्पण में देखकर हतप्रभ रह जाते हैं | यह कैसा रूप दे दिया श्री हरि आपने ? भयंकर विशाल बन्दर की देह | नहीं, ऐसा हो नहीं सकता | रोष में जलते नारद सोच रहे हैं कि आखिर श्री हरि ने जानबूझकर मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?

               नारद इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि श्री हरि आ पहुंचे देवर्षि के सम्मुख | साथ में एक ओर चल रही है जन्म जन्मान्तर की भार्या रमा और दूसरी ओर राजकुमारी  विश्वमोहिनी | श्री हरि और राजकुमारी विश्वमोहिनी, दोनों के गले में पड़ी वरमाला देखकर नारद सब कुछ समझ गए | स्त्री-मोह ने उनसे आंतरिक दृष्टि छीन ली थी, मोह ने उन्हें अँधा बना दिया था | वे व्यथित तो पहले से ही थे, श्री हरि के साथ राजकुमारी को देखकर उनकी व्यथा कई गुना अधिक बढ़ गयी | उन्होंने श्री हरि को शाप दिया कि जिस प्रकार एक स्त्री के वियोग में मैं आज दुखी हो रहा हूँ, उसी प्रकार आप भी एक दिन स्त्री के वियोग में दुखी होंगे | साथ ही साथ जिस प्रकार आपने मुझे जैसे यह वानर देह दी है, वैसे ही वानर एक दिन आपके लिए सहायक सिद्ध होंगे | श्री हरि ने मुस्कान के साथ उनका शाप शिरोधार्य किया और अपनी माया समेट ली | अब वहां पर न तो कोई नगर था और न ही राजकुमारी विश्वमोहिनी | यह सब कुछ केवल भ्रमित करने वाली माया थी जिसके मोह में काम को जीत लेने वाले देवर्षि नारद भी काम के वश होकर फंस गए थे |

                 मोह परमात्मा की माया के कारण ही पैदा होता है और माया में ही पैदा होता है | मोह के कारण ही काम, क्रोध, लोभ, मद, ईर्ष्या आदि सब विकार मनुष्य के मन में जन्म ले लेते हैं | ये सभी नरक के द्वार हैं और मनुष्य को चाहिए कि वह इनसे बचकर रहे | मोह में फंसकर ही व्यक्ति सुख-दुःख का अनुभव करता है, वह सदैव अपने आपको असुरक्षित पाता है | अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से ज्ञान पाकर भी बार-बार मोह में फंसता जा रहा था और एक मात्र यही कारण था कि वह मोक्ष को उपलब्ध नहीं हो सका |

           अर्जुन इंद्र-पुत्र था और इंद्र स्वर्ग का राजा है, फिर भी अर्जुन सीधे स्वर्ग में भी नहीं पहुँच सका | जब स्वर्ग जाने के लिए पांचो भाई व द्रोपदी हिमालय में स्वर्गारोहण कर रहे थे तभी एक पहाड़ पर चढते समय फिसल कर गिर जाने से अर्जुन की मृत्यु हो गयी थी | देह छोड़ते समय भी उनके मन में स्वर्ग तक न पहुँच पाने का दुःख था | स्वर्ग जाने का मोह भी अंत समय में उसके दुःख का कारण रहा | इस प्रकार जीवन के अंत तक मोह नष्ट न होने के कारण वे कभी भी द्वंद्व से मुक्त नहीं हो सके थे | इस कारण से अर्जुन को प्रारम्भ में कुछ समय के लिए नरक में भी जाना पड़ा | नरक की अवधि भोगकर वहां से फिर वह अपने जैविक पिता इंद्र की नगरी स्वर्ग पहुंचे | जहाँ पर रहकर उन्होंने अपने मानव जीवन में किये गए सत्कर्मों का फल भोगा और पुनः पृथ्वी-लोक में मनुष्य के रूप में जन्म लिया |

           इस प्रकार हमने जाना कि साक्षात् परमात्मा श्री कृष्ण का सानिध्य और उनसे प्राप्त किया ज्ञान भी अर्जुन को बैकुण्ठ में स्थान नहीं दिला सका | इसका कारण गीता-ज्ञान में कोई कमी होना नहीं है, बल्कि मनुष्य की कमजोरी है क्योंकि उसकी मानसिकता ही ऐसी हो गयी है कि वह बार-बार मोह में पड़ता रहता हैं | ज्ञान पाकर भी हम त्याज्य विकारों का त्याग नहीं कर पाते हैं अथवा एक बार त्यागने के बाद पुनः उनको ही अपना लेते हैं | यह हमें सोचने को विवश करता है कि ऐसा क्या किया जा सकता है, जिससे हम सदैव के लिए मोह और माया से मुक्त हो सकें ?

                अर्जुन के मुक्त न होने का एक मात्र कारण केवल मोह का नष्ट न हो पाना ही नहीं था | कुरुक्षेत्र का युद्ध महाभारत समाप्त हो चूका था | अर्जुन को अपने आपको महायोद्धा मान लेने का अभिमान भी हो गया था | अभी कुछ दिन ही तो बीते थे उसे गीता-ज्ञान प्राप्त किये | फिर भी वह समझ नहीं पा रहा था कि युद्ध करने वाला, युद्ध में मरने वाला और युद्ध में मारने वाला, ये तीनों भला केवल 'एक' व्यक्ति ही कैसे हो सकता है ?

           भगवान् श्रीकृष्ण का ‘एक’ कहने से तात्पर्य कुछ ओर ही था जिसे अर्जुन समझ न सका था | भगवान् कहना चाहते हैं कि उस एक परम के अतिरिक्त इस जगत में कोई अन्य जब है ही नहीं ऐसे में कौन तो मारे, किसको मारे और कौन मरवाए ? मरने वाला, मारने वाला और मरवाने वाला, ये तीनों एक ही चैतन्य के अंश हैं |

     श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होने से पहले यहाँ तक स्पष्ट कर दिया था कि ‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ अर्थात ‘ये युद्ध भूमि में खड़े सभी योद्धा मारे जा चुके हैं, तू तो केवल इनको मारने का निमित मात्र बन जा |’ युद्ध की समाप्ति पर अर्जुन इस ज्ञान को विस्मृत कर चूका है | वह इस युद्ध में हुई विजय को केवल स्वयं की विजय होना मान रहा है | इस प्रकार अर्जुन में महाभारत युद्ध की विजय से उत्पन्न हुए अभिमान में और नारद में काम-विजय उपरांत जगे अभिमान में मूलभूत से कोई अंतर नहीं है | ऐसा अभिमान भी व्यक्ति को पतन की राह पर डाल देता है | नारद को तो श्री हरि ने अभिमान के गर्त से बाहर निकाल लिया था | देखें ! अर्जुन के साथ श्री कृष्ण क्या करते हैं ?

                    अर्जुन और श्री कृष्ण युद्ध भूमि में विचरण कर रहे हैं | भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख अर्जुन अपने आपको सर्वकालीन महायोद्धा बताते हुए आत्मप्रशंसा में लीन है | उसके अभिमान को चूर-चूर करने के लिए श्री कृष्ण अवसर का इंतजार कर रहे हैं | तभी उनके सामने कुरुक्षेत्र की वह पहाड़ी आ जाती है, जहाँ भीम पुत्र बर्बरीक का मस्तक युद्ध देखने के लिए रखा गया था | गुरु-शिष्य दोनों टहलते हुए बर्बरीक के शीश के पास पहुंचते हैं | अर्जुन अभी भी आत्मप्रशंसा में लीन है | अंततः भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ‘हे अर्जुन ! महाबली बर्बरीक ने सम्पूर्ण महाभारत युद्ध को अपनी आँखों से देखा है | क्यों न इनसे ही पूछ लिया जाये कि इस महायुद्ध का महायोद्धा कौन है ?’ अर्जुन ने बर्बरीक की और देख कर उनसे इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहा | महाबली बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया-‘मुझे तो इस युद्ध में कोई भी व्यक्ति योद्धा के रूप में लड़ते हुए दिखाई ही नहीं दिया | केवल एक मात्र सुदर्शन चक्र ही इस छोर से उस छोर तक घूमते हुए संहार कर रहा था |’ बर्बरीक का यह उत्तर सुनकर अर्जुन का गर्व चूर-चूर हो गया |

                  इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि मोह और मद (अभिमान) सभी विकारों के मूल है | अगर इतना ज्ञान सुनकर और पढ़कर भी हमारा अहंकार और मोह नष्ट नहीं होता तो कमी हमारे में है, ज्ञान में और ज्ञान देने वाले में नहीं | हमें यह जानना आवश्यक है कि ज्ञान केवल सुनने और पढ़ने की पुस्तकीय बातें होने तक ही सीमित नहीं है बल्कि उस ज्ञान को जीवन में अपनाने से ही उसकी महता है | इसीलिए कहा जाता है कि ‘ज्ञानं भारः क्रियाः बिना’ अर्थात ज्ञान को काम में लिए बिना वह ज्ञान मात्र बोझ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | हम ज्ञान के बोझ तले दबे जा रहे हैं | यह बोझ ही मनुष्य में ज्ञान का अहंकार पैदा करता है | इस ज्ञान के बोझ को कम करने का एक ही उपाय है, उस ज्ञान का सही समय पर सदुपयोग कर लिया जाये | अगर ज्ञान का समय पर सदुपयोग नहीं किया जाता तो फिर ऐसा ज्ञान बोझ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता है |

             हम पढ़ते हैं, सुनते हैं, गुरु के पास जाते हैं और सब कुछ सीखते और जानते भी हैं परन्तु उस जाने हुए ज्ञान के अनुसार चलते नहीं है | यह प्रत्येक मनुष्य की कमी है | आज जो कुछ भी सामने दिखाई दे रहा है, उसी को सत्य मान बैठे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी हमें दिखलाई पड़ रहा है, वह प्रतिपल निरंतर परिवर्तित हो रहा है | निरंतर परिवर्तित होने वाला सत्य हो ही नहीं सकता फिर भी हम उसी को सत्य मान रहे हैं | वास्तविक ज्ञान वही है जो इस बात का ज्ञान करा दे कि सत्य ही शाश्वत होता है और इस भौतिक दृष्टि से वह दिखाई नहीं दे सकता | मोह वह अज्ञान है जो हमें हमारे जीवन में वास्तविक ज्ञान से वंचित कर देता है |

क्रमशः

प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||