Monday, March 21, 2022

मुक्त कीन्हि असि नारि

 मुक्त कीन्हि असि नारि

         हमारा परम सौभाग्य है कि हमने उस धरा पर जन्म लिया है, जहाँ इस युग में कई महान महिला भक्त हुई हैं | मकराना की करमा बाई, जिसके खीचड़े का प्रथम भोग आज भी पुरी में ठाकुरजी को लगता है, उसी करमा का परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास इतना दृढ था कि भगवान् श्री कृष्ण को व्यक्त रूप में आकर उनका खीचड़ा खाना पड़ा | कहाँ तो करमा का बापू जीवन भर परमात्मा को भोग लगाने की क्रिया मात्र करता रहा और कहाँ करमा जिसने अपने बापू को खीचडा खाते हुए परमात्मा के दर्शन करा दिए | नमन है, ऐसी विभूति को |
         डेह (नागौर) के पास स्थित एक गाँव मांझुवास की अनपढ़ फूली बाई को भला हम कैसे भूल सकते हैं? फूली बाई नाम-भक्ति की एक आदर्श भक्त हुई है | कहा जाता है कि उनके द्वारा थापी गयी गोबर की थेपड़ी (उपले) में से भी राम-राम की धुन निकलती थी | एक छोटे से गाँव में अभावों के बीच पली-बढ़ी फूली के संतत्व का ही प्रभाव था कि उसने जोधपुर महाराजा और उनकी समस्त सेना को काबुल-युद्ध से लौटते हुए एक साथ बैठा कर भर-पेट भोजन करा दिया |
         मेड़ता की मीराबाई से तो आप सभी परिचित हैं ही, जो बाद में चितौड़ (मेवाड़) की महारानी भी बनी थी | भोजराज के साथ विवाह कर वह चित्तौड़ के महलों में पहुंच तो गई थी परंतु जो जन्म से ही गिरधर की हो गयी थी, उसको भला राजमहल का वैभव कब तक बाँध कर रख सकता था ? राजसी सुख-वैभव को प्रभावहीन करते हुए भगवान् श्री कृष्ण के प्रेम में वृन्दावन और द्वारका तक पहुँच गयी और अंततः भगवान् ने स्वयं उसे सशरीर अपने में लीन कर लिया |
          यह तो हुई कलियुग में भारत जैसे महान देश के एक प्रान्त, राजस्थान और उसके भी एक जिले नागौर की बात | त्रेता युग के समय दक्षिण भारत में भी एक महान नारी-भक्त हुई है, शबरी | शबरी - एक नाम, जो आज भी भक्ति का पर्याय बना हुआ है | कई वर्षों के बीत जाने पर कभी-कभी किसी ऐसे भक्त के दर्शन होते हैं, जिन्होंने भक्ति को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया है | एक महिला का भक्त होना विशेष बात है क्योंकि जिस परिवेश में एक बालिका का पालन-पोषण होता है, उसको देखते हुए इस बात की कल्पना तक नहीं की जा सकती कि उसके भीतर की भक्ति भावना उभर कर सबके सामने एक दिन प्रकट भी हो सकती है | इस बार हम चर्चा करेंगे, इसी राम-भक्त शबरी की |
        चलिए ! सबसे पहले चलते हैं, शबरी के पूर्वजन्म की कथा पर | कहा जाता है कि शबरी अपने पूर्वजन्म में एक राज्य की महारानी हुआ करती थी | महारानी के भी कोई पूर्वजन्म के संस्कार ही थे जो वह सदैव संतों की सेवा करने के लिए लालायित रहती थी | कई बार तो उसे स्वयं पर ग्लानि होती थी क्योंकि उसको अपने जीवन में एक महारानी होने के कारण सदैव राजा के मान-सम्मान के अनुरूप आचरण करना पड़ता था | लौकिक दृष्टि से भले ही महारानी का जीवन सुखी प्रतीत होता हो परन्तु इस महारानी को तो अपना जीवन भी बड़ा दुखमय लग रहा है | वह जानती है कि राजमहल सुख की खान नहीं है, केवल संतों की सेवा में रहते हुए सत्संग करना ही उसे सुखी कर सकता है | सत्संग और संतों की सेवा का सुख एक महारानी के रूप में रहते हुए मिलना कभी संभव नहीं हो सकता था | जब सत्संग की व्याकुलता एक सीमा से अधिक बढ़ गयी तो उन्होंने रनिवास को छोड़ने का निश्चय कर लिया | एक रात को महारानी ने राजमहल को त्याग दिया और प्रयाग जाने का रास्ता पकड़ लिया | प्रयागराज में वह सत-संग लेती और संतों की सेवा करती रहती |
          महारानी जैसे उच्च पद को गौरान्वित करने वाली किसी भी नारी के लिए अपना सांसारिक स्वरुप छिपाना बड़ा ही असंभव होता है क्योंकि एक पुरुष की दृष्टि भले ही अन्य किसी पुरुष पर न जाये, एक स्त्री पर अवश्य ही जाकर टिक जाती है | एक दिन ऐसा ही इस महारानी के साथ भी हुआ |
               माघ मास में संगम पर स्नान करने महारानी के राज्य के कुछ नागरिक भी आये थे | उन्होंने सन्तो की सेवा करते हुए अपनी महारानी को पहिचान लिया था | महारानी को लगा कि अब यह बात राजा तक अवश्य ही पहुंचेगी | मिलने वाली संभावित प्रताड़ना के भय से उसने संगम में डूबकर आत्महत्या कर ली | आत्महत्या, एक जघन्य अपराध और उस अपराध-कर्म की सजा.....जन्म हुआ एक भील के घर में, जहां के परिवेश में परमात्मा की बात तक होना लगभग असंभव सा लगता है | उसको जन्म नाम मिला, श्रमणा | भील समुदाय की जाति शबर में उसका जन्म हुआ था, इसलिए बाद में वह शबरी कहलाई |
             गीता में अर्जुन जब भगवान् श्री कृष्ण से पूछते हैं कि अगर योगभ्रष्ट व्यक्ति की पुनः सही मार्ग पकड़ने से पहले ही देह छूट जाये तो क्या होता है ? भगवान् कहते हैं कि अपने नए जन्म के साथ ही वह बाधित हुई प्रगति से आगे की यात्रा प्रारम्भ करते हुए योग-मार्ग पर बढ़ने लगता है | पूर्व में जितनी भी उसकी प्रगति की हुई होती है, वह नष्ट नहीं होती | इसी सिद्धांत के अनुसार भीलनी शबरी ने भले ही आत्महत्या जैसा जघन्य पाप किया हो, परमात्मा के मार्ग से उसका विचलन नहीं हुआ था | आत्महत्या के अपराध का परिणाम एक भील के घर जन्म लेकर उसने भोग लिया | अब आगे उसकी परमात्मा के मिलन के मार्ग में प्रगति होनी शेष है |
         पिता ने अपना कर्तव्य समझ कर युवावस्था की देहरी पर खड़ी शबरी के लिए वर ढूंढ लिया | उसके विवाह की तैयारी की जा रही है | बारात के लिए महाभोज का आयोजन किया गया है | भील परिवार में भोजन निरीह पशुओं के मांस का ही होता है | महाभोज के लिए बकरों और मेढ़ों की व्यवस्था की गयी है | अबोध बालिका शबरी पूछती है, ‘इन मासूम प्राणियों का क्या करेंगे ?’ पिता उत्तर देता है कि इन्हें काटा जायेगा और फिर इनके मांस को पकाकर अतिथियों को खिलाया जायेगा |
        ठीक उसी समय शबरी के पूर्वजन्म के संस्कार जाग उठते हैं | निरीह पशुओं की हिंसा की कल्पना कर वह सिहिर उठती है, उसका हृदय द्रवित हो जाता है | ओहो ! मेरे कारण इतने पशुओं की हिंसा हो रही है ? हे भगवान् ! मुझे राह दिखला | तत्काल ही घर छोड़कर घने जंगल में वह  भीलनी बालिका शबरी अदृश्य हो जाती है |
           जंगल में आगे बढ़ते-बढ़ते शबरी सोचती है कि वन में तो बहुत से ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं | चलो अच्छा हुआ, मैंने घर को छोड़ दिया जो अब मुझे संतों की सेवा करने का सौभाग्य मिलेगा | परन्तु तुरंत ही वह मायूस हो गयी | मैं एक नारी और वह भी एक नीच जाति की, भला मुझसे सेवा करवाएगा कौन ? कौन मुझे आश्रय देगा ? ऐसा करती हूँ कि जंगल में एक छोटी सी झोंपड़ी बना लेती हूँ और कन्द-मूल-फल खाकर अपनी क्षुधा शांत कर लिया करुँगी | हाँ, हाँ, यही ठीक है, मेरे लिए ऐसा करना ही उचित रहेगा |
           इस प्रकार सोचते-विचारते शबरी घने जंगल के मध्य में पहुँच गयी | उसने देखा कि वहां कई आश्रम बने हुए है, जिनमें अनेकों ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे हैं | वह छिपते-छिपाते उन आश्रमों से इतनी दूर चली गयी, जहां सुगमता से किसी ऋषि-मुनि की दृष्टि उस पर न पड़ सके | ऐसे स्थान पर उसने अपने रहने के लिए एक छोटी सी झोंपड़ी बना ली | एक अनपढ़ भीलनी, जो संतों की सेवा को ही परमात्मा के मिलन का मार्ग मान रही है, दिनभर वन में घूमती, ऋषियों की पूजा के लिए फूल तोड़ती और उनके भोजन के लिए कन्द-मूल-फल आदि की व्यवस्था करती |
        मध्य रात्रि को जब सभी गहरी नींद में सो रहे होते, उन ऋषियों के एक एक आश्रम में धीरे-धीरे प्रवेश करती और प्रातःकालीन पूजा के लिए फूल तथा दिन में आहार के लिए फल आदि चुपके से रख आती | लौटकर ब्रह्ममूहूर्त से पहले ही ऋषियों के स्नान के लिए पम्पा सरोवर की ओर जाने वाले मार्ग को बुहार देती | समस्त मार्ग अच्छी प्रकार से बुहारकर ऋषियों के सरोवर जाने से पहले ही वह लौटकर अपनी झोंपड़ी में आ जाती | दिनभर वह संतों के जीवन के बारे में ही सोचती रहती | वह सोचती कि इस जीवन में कब उसे सत्संग करने का अवसर मिलेगा ?
           भक्ति का अर्थ है – सेवा और प्रेम | मनुष्य के समक्ष दो मार्ग हैं –एक श्रेय का और दूसरा प्रेय का | अपने बनाए संसार का ही प्रिय लगना, केवल उसी से प्रेम करना, प्रेय मार्ग है और परमात्मा का प्रिय लगना, भगवान् से प्रेम करना श्रेय मार्ग है | हमें प्रेय मार्ग को छोड़कर श्रेय मार्ग को अपनाना है | भगवान् से प्रेम करने के लिए अपने बनाये संसार से प्रेम करना छोड़ना होगा | सच है, भक्ति करना सरल नहीं है क्योंकि हमें हमारा संसार मीठा लगता है, प्रिय लगता है | जिसको भक्ति करनी है, उसे इस संसार के समस्त सुखों का त्याग करना होता है | इसलिए भक्ति-मार्ग पर आकर सांसारिक सुख की कामना का त्याग कर दो | यह मत सोचो कि इस जीवन का क्या होगा ? भक्ति के लिए परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा का होना आवश्यक है | फिर भगवान् ही उसकी देखरेख करते हैं | गीता में भगवान् कहते ही हैं –‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ | शबरी ने अपने सभी सुखों का त्याग किया था | दिनभर जंगल में कंटीले झाड़-झंखाड़ में  उलझती, गिरती-पड़ती, निकलती और फल-फूल चुनती तथा रात को नींद का त्याग कर आश्रम-आश्रम जाती | यह भक्ति की पराकाष्ठा है |
           सेवा भी भक्ति है | जब आप स्वयं के शरीर के सुख के लिये कोई कार्य करते हो तो यह भोग है और जब यही कार्य दूसरे को सुख पहुँचाने के लिए करते हो तो वह भगवत्-सेवा है | दूसरे को सुख पहुँचाने के लिए त्याग करना पड़ता है | शबरी अपने लिए कुछ नहीं करती बल्कि ऋषियों के सुख के लिए सब कुछ करती है | आश्रम में ऐसी सुन्दर व्यवस्था होते देखकर सभी ऋषियों को आश्चर्य होता | सभी जानने को उत्सुक थे कि हमारे लिए इतना सब कुछ कौन कर रहा है ।
           वन में रहने वाले ऋषियों में एक ऋषि थे, मतंग | ऋषि मतंग अन्य सभी ऋषियों से जरा  भिन्न प्रकृति के थे | कहा जाता है कि वे एक बार के लिए एक हाथी को मारते और एक वर्ष तक उसका मांस खाते रहते | हाथी का एक पर्यायवाची शब्द मतंग भी है | हो सकता है इसी कारण से इन ऋषि का नाम मतंग पड़ा हो | मतंग ऋषि के मन में भी यह जानने की उत्सुकता हुयी कि आखिर उनकी इतनी सेवा कौन कर रहा है ?
          एक रात, उन्होंने सब कुछ जान लेने का निर्णय करते हुए नींद नहीं ली बल्कि सोने का अभिनय किया | अर्धरात्रि को ज्योंही शबरी ने उनके आश्रम में प्रवेश किया, वे उठ बैठे | उन्होंने शबरी को देखा | शबरी तो ऋषि को देखते ही भय से थर-थर काम्पने लगी | एक तो वह नीच जाति की, ऊपर से स्त्री और इधर ऋषि मतंग का एक ब्राह्मण होना | उसने सोचा कि अब उसकी खैर नहीं | प्रताड़ना के भय से वह सिहर उठी | मतंग ऋषि तो पहुंचे हुए संत थे | उनसे शबरी की मानसिकता छुपी न रह सकी | उन्होंने शबरी से प्रेमपूर्वक पूछा – ‘बेटी, तुम कौन हो ? कहाँ रहती हो ?’ उत्तर में शबरी ने अपनी समस्त गाथा मतंग ऋषि को रोते हुए कह सुनाई।    
        सेवा के लिए उसकी अटूट श्रद्धा देखकर ऋषि मतंग ने अपने आश्रम के एक कोने में उसे रहने की अनुमति दे दी और कह दिया कि आज से तुम मेरी बेटी हो | अब आगे से चोरी-छुपके कोई काम करने की आवश्यकता नहीं है | दिन के समय ही जंगल में जाकर फल-फूल ले आया करो | जब मैं शिष्यों के साथ सद्चर्चा करूँ तब तू लौटकर परमात्मा की कथा भी सुन लिया करो |
                 एक नीच जाति की स्त्री को आश्रय देकर मतंग अन्य सभी ऋषियों के कोपभाजन बन गए | उन्होंने मतंग ऋषि को अपने से अलग-थलग कर दिया | मतंग ऋषि पर इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा | वे तो जानते थे कि देह और जाति तो प्रारब्ध का परिणाम है | सभी देह भिन्न भिन्न आकार और रंग-रूप की हो सकती है परन्तु सब में एक परमात्मा ही निवास करते हैं | ऐसे में कौन छोटा और कौन बड़ा; कौन ऊँचा और कौन नीचा, कौन पुरुष और कौन स्त्री ? सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ परमात्मा की उपस्थति न हों | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं | ऐसे में कौन किससे घृणा करे और क्यों करे ? संसार में सभी से प्रेम करना ही परमात्मा की भक्ति है |
        प्रश्न उठता है कि मतंग के स्थान पर अन्य कोई ऋषि होता तो क्या शबरी के साथ वे भी प्रेम का व्यवहार करते ? नीच जाति की और वह भी महिला होना, अन्य ऋषियों के अनुसार ऐसे व्यक्ति से बात तक करना उचित नहीं है। फिर मतंग ऋषि ने शबरी के साथ विपरीत व्यवहार क्यों कर किया ? इसके लिए हमें मतंग के बाल्य काल को जानना होगा।
    मतंग को बचपन से अपने साथियों से उपहास का भाजन बनना पड़ता था।मतंग उसका कारण जानना चाहते थे।एक दिन जंगल में उदास बैठे थे, तब एक गर्दभी से उनका संवाद हुआ। उस गर्दभी ने बताया कि आपका पालन पोषण  ब्राह्मण दम्पति ने किया अवश्य है परंतु आप उस ब्राह्मणी के पति की संतान न होकर एक नाई के पुत्र हैं। ब्राह्मणी ने मेरे समक्ष ही नाई से संसर्ग किया था इसलिए मैं यह बात जानती हूँ। आपको अपने से निम्न स्तर का मानकर ही अन्य ब्राह्मण पुत्र आपकी उपेक्षा करते हैं।
     सब कुछ जानकर मतंग ने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए तप किया।तप से वे ब्राह्मण बने और फिर ऋषि। ऋषि मतंग अपने बाल्यकाल की बात भूले नहीं थे, इसीलिये उन्होंने शबरी के साथ प्रेम का व्यवहार किया। मतंग जानते थे कि किस कुल में और कहाँ जन्म लेना है, यह व्यक्ति के हाथ में नहीं है। उन्होंने शबरी की सेवा भाव और प्रेम को देखा, जाति को नहीं।
        मतंग ऋषि प्रतिदिन अपने शिष्यों से राम-कथा कहते | उनके साथ शबरी भी बड़े मनोयोग से वह कथा सुनती | राम-कथा के प्रति शबरी की रुचि देखकर मतंग ऋषि ने दया कर उसको राम नाम की दीक्षा दी | उन्होंने कहा कि दिन-रात राम नाम का जाप करती रहो, यह नाम अतिदिव्य है | अपने गुरु के आदेश को शिरोधार्य करते हुए शबरी निरंतर राम नाम का जप करने लगी |
           एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में शबरी ऋषियों के स्नान के लिए पम्पा सरोवर की ओर जाने वाले मार्ग को बुहार रही थी | घुप्प अँधेरा था | उसी समय एक ऋषि गोदावरी स्नान को जा रहे थे कि उनका पैर शबरी की बुहारी से, उसकी झाड़ू से स्पर्श कर गया | ऋषि क्रोधित हो गए | उन्होंने शबरी को विविध प्रकार से प्रताड़ित किया | जब वे ऋषि पम्पा सरोवर पहुंचे तो देखते हैं कि सरोवर का जल रक्ताभ हो गया है और उसमे कीड़े कुलबुला रहे हैं | सभी ने ऋषि मतंग को इसका दोष दिया कि उन्होंने एक भीलनी को अपने आश्रम में आश्रय दे रखा है, उस कारण से ईश्वर कुपित हो गए हैं और उन्होंने इस सरोवर का जल दूषित कर दिया है |
         मतंग ऋषि ने कहा कि मैंने अपने धर्म के अनुरूप ही आचरण किया है | सनातन धर्म की मर्यादा के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया है | किसी निराश्रित को आश्रय प्रदान करना हमारा प्रथम धर्म है | शबरी संतों की सेवा में रत थी, अतः इसने भी कोई भूल नहीं की है | अँधेरे के कारण अगर किसी ऋषि का पैर शबरी की झाड़ू से तनिक छू गया तो इसमें भला शबरी का कोई दोष कैसे हो सकता है ?     
           जब तक व्यक्ति के जीवन में सम-भाव और समदर्शिता नहीं आती तब तक अध्यात्म के मार्ग में प्रगति नहीं हो सकती | मनुष्य की कमी है कि वह किसी भी सुनी-सुनाई बात के अनुसार उस पर विश्वास कर लेता है जबकि वास्तव में उस बात के पीछे तथ्य कुछ और ही होता है | कथ्य और तथ्य दोनों में अंतर होता है | कथ्य का निर्माण सतत असत्य से निर्मित धारणा से होता है, जैसे कि ऋषियों ने यह मान लिया था कि एक नीच जाति की स्त्री को मतंग ऋषि ने अपने आश्रम में रखा है, इसलिए सरोवर का जल विकारग्रस्त हुआ है | तथ्य यह है कि शबरी तो ऋषियों की सेवा में रत है, उसका लक्ष्य किसी की राह में बाधा पहुँचाना कभी रहा ही नहीं | कथ्य और तथ्य दोनों से ही परे सत्य यह है कि भगवान् से अपने भक्त की प्रताड़ना सहन नहीं हुई, इसलिए सरोवर का जल दूषित हो गया था |
           मतंग ऋषि का सत्संग शबरी को बहुत वर्षों तक मिला | प्रारब्ध के अनुसार मतंग ऋषि की देह का भी अंतिम समय आ गया | वे ब्रह्मलोक जाने को तैयार थे | मतंग ऋषि के शिष्यों के माध्यम से जब यह बात शबरी तक पहुंची तो वह अपने गुरु से मिलने दौड़ी चली आयी |
              जब शबरी ने मृत्यु शैया पर सोये अपने गुरु को देखा तो वह बहुत भावुक हो गयी और बोली –‘आपके जाने के बाद मेरा क्या होगा ?’ मतंग ऋषि बोले-‘राम नाम का जप करती रहना | मैंने भी बहुत जप किया है | मैं तो इस जन्म में प्रभु श्री राम के दर्शन नहीं कर सका परन्तु तुम सौभाग्य शाली हो | तुम्हें श्री राम के दर्शन अवश्य होंगे | अभी वे चित्रकूट में हैं | एक दिन वे स्वयं चलकर तुम्हारे पास आयेंगे |’
           एक भक्त को भगवान् का दर्शन होगा, इससे अधिक उसे और क्या आश्वासन चाहिए ? आश्वासन भी साधारण सांसारिक व्यक्ति से न मिलकर एक पहुंचे हुए गुरु से मिला है | शबरी सोच रही है, ‘अनन्त कोटि ब्रह्मांड के नायक साक्षात् परमात्मा, श्री राम के रूप में उसकी कुटिया में आयेंगे | मैं तो अनपढ़ हूँ, बेसहारा हूँ, निर्धन हूँ, क्या ऐसे में परमात्मा मेरे घर आ सकते हैं ?’ एक भक्त के लिए इससे अधिक ख़ुशी की बात क्या होगी कि साक्षात् परमात्मा उसके पास स्वयं चलकर आ रहे हैं | सच है, परमात्मा न धन के भूखे हैं न ज्ञान के, परमात्मा तो बस प्रेम के भूखे हैं | भीतर अगर प्रेम हो, परमात्मा के प्रति अनुराग हो तो परमात्मा अपने आपको रोक नहीं सकते | अपने भक्त प्रहलाद के प्रेम ने उन्हें पत्थर से प्रकट होने को विवश कर दिया था | भगवान् को तो अपने भक्त को कृतार्थ करना होता है | जो केवट को कृतार्थ कर सकता है, वह भला भीलनी को कैसे भूल सकता है ?
            मतंग ऋषि तो बहुत कुछ समझाकर भीलनी शबरी को अकेला छोड़कर देवलोक चले गए | शबरी अब प्रतीक्षा कर रही है, जब भगवान् श्री राम उसको दर्शन देंगे | भक्त को भगवान् दर्शन देंगे, इतना आश्वासन ही उसे उत्साहित बनाये रखता है, भले ही इसके लिए कितने ही युग बीत जाये | शबरी जानती है कि परमात्मा के दर्शन बिना अब यह देह छूटने से रही | गुरु का कथन ही सत्य कथन है | शबरी तो परमात्मा की प्रतीक्षा में मतंग वन में बैठी है और दिन रात राम-राम रटती रहती है |
      शबरी कभी-कभी यह सोचकर अत्यंत व्याकुल हो उठती है कि मेरे गुरु का वचन तो एक दिन अवश्य ही सत्य होगा, यह तो मैं जानती हूँ परन्तु मेरा पता श्री राम को कौन बताएगा ? कौन उनको जाकर कहेगा कि तुम्हारी अनन्य भक्त - एक भीलनी, इस घने जंगल में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है ? फिर यह सोचकर धैर्य धारण कर लेती है कि जो घट-घट की बात जानता है, भला उससे मेरा पता भी कभी छिपा रह सकता है ! ऐसा सोचकर फिर से वह दुगुने उत्साह से अपनी कुटिया को आने वाले चारों ओर के सभी रास्ते बुहारने लगती और मन ही मन कहती रहती की मेरे राम जरूर आयेंगे, एक दिन मेरे राम मुझसे मिलने जरूर आयेंगे |
       शबरी इधर मतंग-वन में श्री राम के आने की बाट जोह रही है और उधर भगवान् चित्रकूट में वाल्मीकिजी से विदा लेकर पंचवटी आ गए हैं | पंचवटी में भगवान् की इच्छानुसार छाया रूप जानकीजी की का हरण होता है और दोनों भाई जंगल-जंगल उनको ढूँढने की लीला कर रहे हैं | लीला क्या है, एकदम सत्य सा प्रतीत होता है, मानो एक पति अपनी पत्नी के विरह में मानसिक संतुलन खो चूका है और उसकी खोज में दर दर भटक रहा है | साथ चल रहे छोटे भाई लक्षमण उनको बहुत प्रकार से समझाते हैं परन्तु राम की विरह-वेदना इतनी प्रगाढ़ है कि छूटती नहीं है | रंगमंच का कलाकार इतना ही अधिक मंजा हुआ होना चाहिए कि देखने वाले को उसके अभिनय में सत्यता नज़र आये | आज जब संसार के रंगमंच को रचने वाला स्वयं अभिनय कर रहा है तो फिर उसके सत्य प्रतीत होने में किसी प्रकार की कमी रह जाने का प्रश्न ही नहीं उठता |
            तभी रास्ते में घायल पड़े जटायु से मिलन होता है | प्रभु पूछते हैं-‘जटायु, तुम्हारे साथ यह सब कैसे हुआ ?’ जटायु कहता है – ‘नाथ दसानन यह गति कीन्ही |
तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही ||’
     वह समस्त घटनाक्रम बतला देता है कि दसानन रावण जनकसुता का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है | भगवान् सब कुछ जानते हैं, सब उनका ही तो करा-धरा है परन्तु सामने भक्त है, उसका सहयोग लेना तो बनता ही है | यही भगवान् की विशेषता है, जानते सब कुछ है फिर भी भक्त की बात को सुनते हैं, समझते हैं और उससे अनुग्रहित भी होते हैं | इसी को परमात्मा की भक्त पर अनुकम्पा होना कहते हैं |
           घायल अवस्था में मरणासन्न पड़े जटायु के जीवन की अभिलाषा भी आज पूरी होती है | उसने अपने जीवन में भगवान् के दर्शन की कामना की थी जो आज जाकर पूरी हुई है | भगवान् श्री राम कहते हैं कि मैं तुम्हें पुनः स्वस्थ और सुन्दर बना दूंगा | पर जटायु कहता है-
     जा कर नाम मरत मुख आवा |
     अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा |
      सो मम लोचन गोचर आगें |
      राखौं देह नाथ केहि खाँगे ||
       मरते समय आपका नाम जिसके मुख में भी आ जाये तो अधम से अधम को भी मुक्ति मिल जाती है, ऐसा श्रुति कहती है | फिर मैं तो बहुत ही सौभाग्यशाली हूँ जो साक्षात् आप मेरी आँखों के सामने खड़े हैं | अब मैं कौन सी कामना मन में रखते हुए इस देह को रखूं ? आप ही बताइए |
        नहीं, नहीं, अब वह इस शरीर को छोड़ देगा क्योंकि जीवन का उद्देश्य, परमात्मा से मिलन का था, वह आज पूरा हो गया है | फिर इस पञ्च-तत्व से निर्मित भौतिक शरीर की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है ? जिस शरीर से परमात्मा का कार्य संपन्न हो जाये, फिर उस शरीर का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है | इसलिए जब तक आपके पास यह स्वस्थ शरीर है, तब तक उससे सभी कर्मों को परमात्मा का कार्य मानते हुए करते रहो, फिर परमात्मा स्वयं आपके द्वार पर चलकर आयेंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | जटायु-प्रसंग हमें यही सन्देश दे रहा है |
            परमात्मा का कार्य करते हुए, परमात्मा की गोद मिले और स्वयं परमात्मा की कृपा-दृष्टि उस पर हो, भला उससे अच्छा किसी के जीवन में क्या हो सकता है ? जटायु ने अपने जीवन की अंतिम साँस ली और भगवान् श्री राम भाव- विह्वल हो उठे | उन्होंने अपने परम भक्त जटायु को परम-गति (सारुप्य-मुक्ति) प्रदान की | स्वयं अपने हाथों से उसके शरीर की अंतिम क्रिया की | धन्य है जटायु का जीवन जिसने इतनी नीच योनि में भी जन्म लेकर परमात्मा को कभी विस्मृत नहीं किया | इधर एक मनुष्य है, जिसको परमात्मा ने सब कुछ दिया है फिर भी उसने परमात्मा को विस्मृत कर रखा है | विषय-भोग में रत मनुष्य से तो वह मांसभक्षी जटायु अच्छा, जिसने परमगति प्राप्त की | शिवजी कथा सुनाते हुए पार्वती को कहते हैं-
     सुनहु उमा ते लोग अभागी |
     हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ||
           जटायु के अंतिम संस्कार से निवृत होकर भगवान् वन में सीता की खोज कर रहे हैं | मतंग-वन से कुछ पहले ही उन्होने देखा कि वे और अनुज लक्ष्मण, दो विशाल भुजाओं के मध्य धीरे-धीरे फंसते जा रहे हैं | दोनों भुजाएं धीरे-धीरे आपस में एक दूसरे के नजदीक आ रही है और राम-लक्ष्मण उन भुजाओं की पकड़ में आ गए हैं | लक्ष्मण भुजाओं के पाश में जकडे बड़े व्याकुल हो रहे हैं | उन्हें लग रहा है कि शीघ्र ही यह राक्षस उसे अपना भोजन बना लेगा | इस राक्षस का नाम है, कबंध ।
            कबन्ध ने राम-लखन को अपने बाहुपाश में बान्ध रखा है | लक्ष्मण को व्याकुल देखकर श्री राम ने आँखों से संकेत किया और तत्क्षण ही दोनों ने अपनी अपनी तलवारें निकाल ली | एक ही झटके से कबन्ध की दोनों भुजाएं काट डाली गयी | कबन्ध घायल हो जमीन पर गिर पड़ा | उसने भगवान् को प्रणाम किया और अपने पूर्व जन्म-का वृतांत कह सुनाया |
         पूर्व जन्म में कबन्ध एक गन्धर्व था | उसका शरीर अतिसुन्दर था, जिस पर उसे बहुत अभिमान था | एक दिन वह गन्धर्व, कई कन्याओं के साथ गंगा तट पर रमण कर रहा था | गंगा तट पर ही मुनि अष्टावक्र बैठे थे | मुनि का शरीर श्यामवर्ण का था और आठ स्थानों से वक्र भी | मुनि को देखकर उस गन्धर्व ने उनका उपहास किया | सत्य है, चर्म चक्षु केवल चर्म ही देख सकते हैं, हृदय नहीं | चर्म चक्षु से देखने वाला भोग के लिए चहुँ ओर केवल चर्म ही खोजता है | वह यह नहीं जानता कि जिसको वह सुन्दर मान रहा है, वह सुन्दर नहीं है बल्कि सुन्दरता तो कुछ और ही है | शरीर की सुन्दरता को तो एक न एक दिन खो जाना है, फिर भी मनुष्य अपने शरीर सौष्ठव का अहंकार करता फिरता रहता है |स्वामीजी कहा करते थे -
   'है' सो सुन्दर है सदा, 'नहीं' सो सुन्दर नाहीं |
   'नहीं' को प्रकट देखिये, 'है' सो दीखे नाहीं ||
       जो सुन्दर दिखलाई पड़ता है, उस सुन्दरता का एक दिन नष्ट हो जाना निश्चित है | एक परमात्मा ही सुन्दर हैं जिनमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता | जो अजर, अमर और अव्यय है, केवल उसी को सुन्दर कहा जा सकता है | परिवर्तनशील संसार और उस संसार में रमण करने वाला यह शरीर सुन्दर दिखलाई पड़ने के बाद भी सुन्दर नहीं है क्योंकि देखने वाली इन्द्रिय भी तो आखिर इस शरीर का ही एक अंग है | आँखें केवल बाहर देखती है, अतः वह संसार की सुन्दरता पर मुग्ध हो सकती है परन्तु जिसकी दृष्टि दिव्य हो जाती है, वह जीवन में पहली बार अपने भीतर देखता है | तब भीतर बैठे परमात्मा की सुन्दरता उसे मोहित कर लेती है, फिर वह बाहर संसार को देखना बंद कर देता है | 
          गन्धर्व ने जब मुनि अष्टावक्र का उपहास किया तब वे क्षुब्ध हो गए | अष्टावक्र मुनि ने उस गन्धर्व को शाप दिया कि जा, तू राक्षस हो जा | मुनि के शाप से गन्धर्व को बड़ा दुःख हुआ | वह तत्काल ही राक्षस रूप में आ गया | उसने अष्टावक्र जी के चरण पकड़ लिए और शाप से मुक्त होने का उपाय पूछा | तब अष्टावक्र मुनि ने कहा कि जब भगवान् श्री राम अपनी भार्या को जंगल-जंगल ढूंढते फिरेंगे तब वे एक दिन तेरे पास भी आयेंगे | उन्हीं के हाथों तुम्हारा उद्धार होगा |
          प्रत्येक अहंकारी व्यक्ति का एक न एक दिन पतन होना निश्चित है और ऐसा ही उस गन्धर्व के साथ हुआ | उसके द्वारा किये गए एक उपहास ने उसके जीवन को बदल दिया | जिस शरीर और सदा संग रहने वाली जिन सुन्दरियों पर उसे गर्व था, वह सब कुछ एक झटके के साथ लुट चूका था | अब एक भयानक राक्षस के रूप में परमात्मा की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त उसके सामने अन्य कोई रास्ता नहीं था |
                   कबन्ध के मरने से पहले श्री राम ने उसे सीता-हरण का पूरा वृतांत कह सुनाया और साथ ही सीता को पुनः प्राप्त करने के सम्बन्ध में उससे सहायता मांगी | कबंध ने कहा कि मेरा यह राक्षस शरीर जल जाने के बाद ही मुझे सब कुछ जानने की शक्ति मिल सकती है | शक्ति प्राप्त होने के बाद ही मैं आपको बता सकूंगा कि जनकसुता को प्राप्त करने के लिए आपको क्या करना चाहिए ? तब श्री राम ने उसके शरीर को एक गढ्ढे में डालकर उसका अंतिम संस्कार करने का प्रबंध किया | आज कबन्ध रूप धरे उसी अहंकारी गन्धर्व का कल्याण परमात्मा के हाथों होने जा रहा है |
         चिता के जल उठते ही कबन्ध वहां दिव्य रूप में प्रकट हो गया और उसने बतलाया कि सीता को प्राप्त करने के लिए वैसे तो छः युक्तियाँ है परन्तु आपको ‘समाश्रय’ युक्ति का उपयोग करना चाहिए | आपको ऐसे व्यक्ति को अपना मित्र बनाना होगा जो आपकी तरह ही अपनी पत्नी के वियोग में दुखी हो | व्यक्ति को जब अपने समान ही कोई दूसरा दुखी व्यक्ति मिल जाता है, तब उनकी समस्या का निदान भी शीघ्र ही हो जाता है | दिव्य-रूप धारी कबन्ध कह रहा है कि पास में ही ऐसा एक पुरुष रहता है-सुग्रीव | उसकी पत्नी को उसके भाई (बाली) ने बलात उससे छीन लिया है | वह अभी ऋष्यमूक पर्वत पर अपने सहायकों के साथ रहता है | आप उसके साथ मित्रता कीजिये, वही इस समय आपका एक मात्र और महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध हो सकता है |
             गन्धर्व आगे भगवान् को कह रहा है कि सुग्रीव सूर्य का औरस पुत्र है | वे वानरों के साथ मिलकर आपकी पत्नी का पता अवश्य ही लगा लेंगे | जहां तक सूर्य तपते हैं, वहां तक संसार में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जो सुग्रीव के लिए अज्ञात हो | दिव्य वेशधारी कबन्ध (गन्धर्व) कहता है कि यहाँ से पश्चिम दिशा की ओर सुखद मार्ग है | आप उस रास्ते से आगे बढिए | आगे मतंग-वन आएगा जहां कभी ऋषि मतंग अपने शिष्यों के साथ रहा करते थे | उस वन में मतंग ऋषि के प्रभाव से हाथी कभी भी आक्रमण नहीं करते हैं | उससे आगे पम्पा सरोवर मिलेगा | उसी सरोवर के पूर्व में ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ सुग्रीव अपने चार साथियों के साथ निवास करते है | इतना कहकर कबन्ध ने अपने धाम जाने की आज्ञा मांगी और तत्काल ही वहां से प्रस्थान कर गया |
            कौन कहता है कि परमात्मा को भक्त का पता नहीं होता ? परमात्मा की सब ओर दृष्टि रहती है | भक्त भले ही सोचता रहे परन्तु भगवान् को सब पता होता है कि कौन भक्त कहाँ है और क्या कर रहा है ? कबन्ध तो एक माध्यम था, रास्ता बतलाने का | जिसने संसार बनाया है, संसार में भ्रमण करने के लिए रास्ते भी तो उसी ने बनाये है | कबन्ध नहीं होता तो भगवान् लीला कैसे करते ? भक्त भी तो भगवान की उसी लीला के पात्र होते हैं | आज भगवान् अपने भक्तों के लिए लीला करते हुए उन्हें आनंदित कर रहे हैं |     
      कबन्ध के अपने धाम प्रस्थान करने के बाद श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ पश्चिम दिशा की ओर जाने का मार्ग पकड़ लेते हैं | इधर शबरी दिन-रात राम नाम का जप करते करते अपनी कुटिया की ओर आने वाले चारों मार्गों को बुहार रही है | निष्पाप शबरी को पता नहीं है कि उसके राम किस मार्ग से आ रहे हैं ? श्री राम भले ही किसी भी मार्ग से आ जाएँ, उनको सारे मार्ग कंटक रहित मिलेंगे | दिन में प्रभु के लिए फल-फूल तोड़ती और ब्रह्म मूहूर्त में सारे मार्ग साफ करती | प्रभु की प्रतीक्षा में जब रात होने लगती तो सभी फल मतंग ऋषि के शिष्यों में बाँट देती और दूसरे दिन सुबह से फिर यही क्रम प्रारम्भ हो जाता |
                 भगवान् राम धीर-धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे | पम्पा सरोवर के पास तक आ गए | उन्हें देखकर बहुत से ऋषि-मुनि दौड़कर आये | सभी उनसे अपने आश्रम में चलने का आग्रह करने लगे | लेकिन प्रभु तो प्रेम के भूखे हैं | ‘रामहि केवल प्रेम पिआरा’, भला प्रेम का बंधन किसी को क्यों नहीं खींचेगा ? उन ऋषियों ने तो उनकी परम भक्त शबरी का अपमान किया था | ऐसे अहंकारी ऋषियों का आग्रह भला वे कैसे स्वीकार कर सकते थे ? उन्हें तो शबरी से ही मिलना था | प्रभु जाति, रंग और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाले को तनिक भी पसंद नहीं करते |   
         भगवान् तो प्रेम के भूखे होते हैं | द्वापर में दुर्योधन अपने घर में ले जाकर स्वादिष्ट पकवान खिलाना चाहता था परन्तु भगवान् को तो अहंकारी व्यक्ति जरा भी पसंद नहीं है, ऐसे में वे दुर्योधन के घर क्यों कर जाते ? उन्हें तो बस प्रेम से ही वश में किया जा सकता है | उसी प्रेम के कारण वे पहुँच गए थे, विदुर के घर | उस समय अकेली विदुरानी थी वहां | उन्होंने प्रेम के अतिरेक में केले के छिलके तक भगवान् को खिला दिए थे और भगवान् ने प्रेम से खा भी लिए | हस्तिनापुर राजभवन से उसी समय लौटे विदुर, संकेत से विदुरानी को समझाने का प्रयास भी करते हैं परन्तु विदुरानी तो एकटक प्रभु को निहार रही है | उसका ध्यान कहीं दूसरी ओर तनिक सा भी नहीं है |
           ऋषियों के आग्रह की उपेक्षा करते हुए प्रभु धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए | अचानक उन्हें शबरी का आश्रम दिखलाई पड़ा | शबरी उसी मार्ग को राम-राम रटते हुए बुहार रही थी | अचानक उसकी दृष्टि प्रभु के चरण कमलों पर पड़ी | समझ गयी कि आज वह पावन दिन आ ही गया है | श्री राम पर दृष्टि पड़ते ही ख़ुशी से पागल हो गयी शबरी | पहले तो बोल रही थी, मेरे राम आयेंगे, मेरे राम आयेंगे और अब उनको देखते ही बोल पड़ी-‘प्रभु आप आ गए !’ प्रश्न भी उसका और उत्तर भी उसका |
         गोस्वामीजी शबरी प्रसंग को अपने शब्दों की धार देते हुए रोचक बनाते हैं और कहते हैं -
      सरसिज लोचन बाहु बिसाला |
      जटा मुकुत सिर उर बनमाला |
      स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई |
      सबरी परी चरन लपटाई ||
      प्रेम मगन मुख बचन न आवा |
     पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ||
       सादर जल लै चरन पखारे |
       पुनि सुन्दर आसन बैठारे ||
           प्रभु श्रीराम का स्वरुप देखकर शबरी भाव विह्वल हो गयी | दोनों भाइयों के चरणों में गिर पड़ी | भाव-वश उसके मुख से बोल नहीं निकल पा रहे थे केवल बार-बार उनके चरणों में नमन करती रही | तुरंत ही कुटिया के भीतर जाकर जल लाई और प्रेम से प्रभु के चरणों को धोया | फिर उन्हें अपनी कुटिया के भीतर ले गयी और कुश के बने सुन्दर आसन पर दोनों भाइयों को बिठाया |
     दोनों भाइयों को सुन्दर आसन पर बिठाकर शबरी उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी | उसने झुककर दोनों भाइयों को प्रणाम किया | शबरी से कुछ भी बोला नहीं जा रहा है | फिर उसने विधिवत उनका सत्कार किया | कह रही है कि प्रभु आपकी स्तुति कैसे करूँ ? एक तो मैं नीच जाति की, ऊपर से एक नारी और फिर मुझे किसी बात का ज्ञान भी तो नहीं है |
        केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी |
        अधम जाति मैं जड़मति भारी ||
        अधम ते अधम अधम अति नारी |
        तिन्हं महँ मैं मतिमंद अघारी || 
            भगवान् ने शबरी पर कृपा दृष्टि डाली | आज शबरी के गुरु मतंग का कहा सत्य सिद्ध हो रहा है | शबरी जानती है कि उसकी तपस्या आज फलीभूत हुई है | शबरी ने  जो भी फूल उसने अपने हाथों से चुने थे, उन पुष्पों से भगवान् की विधिवत पूजा की और फिर फलों को चख चख कर बड़े प्रेम से दोनों भाइयों को खिलाया | भगवान् भी डबडबाई आँखों से भक्त को देखते हुए बड़े प्रेम से फल खा रहे हैं | आज भगवान् अपने भक्त के जूठे फल खा रहे है | उनको भान ही नहीं रहा कि वे जंगल में बनी एक कुटिया में शबरी के फल खा रहे हैं अथवा अपनी माता कौशल्या के हाथों से भोजन कर रहे हैं | सब भेद मिट गया है आज | वाह प्रभु, कैसी लीला है आपकी ? जब लिखने वाला आपकी लीला का वर्णन कर मुग्ध हो रहा है तो उस भक्त भीलनी की दशा का वर्णन शब्दों के माध्यम से किया ही कैसे जा सकता है ?  
            प्रेम एक न एक दिन फलीभूत अवश्य ही होता है | प्रेम के बारे में जब चर्चाएँ होती है तब प्रायः लोग प्रेम का प्रतिशत बताने लगते हैं | प्रेम न तो कुछ-कुछ होता है और न ही लगभग | नहीं, प्रेम कभी आधा-अधूरा नहीं होता, होता है तो पूरा का पूरा होता है | फिर भी अगर कुछ अधूरा है भी, तो वह कुछ और हो सकता है, प्रेम नहीं हो सकता | प्रेम तो शत प्रतिशत होता है अन्यथा होता ही नहीं है |
            प्रेम के कारण भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने थे | प्रेम के कारण गोपियाँ कृष्ण के विरह में पागल हो जाती थी | इसी प्रेम और विरह पर श्रीमद्भागवत् महापुराण में वेद व्यासजी ने पूरा एक अध्याय (10/30) लिख डाला है | गोपियों के प्रेम के वशीभूत होकर बाल कृष्ण नाचने लगते हैं | तभी तो रसखान जैसे कवि कह उठते हैं – ‘ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं |’ मिट्टी की एक छोटी सी हंडिया में दूध भी नहीं, मक्खन भी नहीं, केवल छाछ | क्या एक हंडिया भर छाछ मिलने की आशा से परमात्मा नाच सकता है ? नहीं, यहाँ महत्त्व छाछ का नहीं है | महत्त्व है गोपियों के प्रेम का | प्रेम जब पूर्णता ले लेता है तब भगवान् को भी भक्त के सामने नाचना पड़ता है | नाचने का अर्थ नृत्य करने से नहीं है, बल्कि भक्त की इच्छानुसार भगवान् का चलना और करना है |
           शबरी प्रेमाभक्ति की मूर्ति है | भगवान् के नाम से प्रेम किया, उसने ऋषि-मुनियों की सेवा करते हुए तपस्या की, उसका परिणाम परमात्मा के दर्शन से अधिक और क्या हो सकता है ? एक परमात्मा को पा लेने से अधिक इस भौतिक संसार में अन्य कुछ है भी नहीं | शबरी आज धन्य हो गयी |
          शबरी से भगवान् श्री राम कह रहे हैं - ‘पुरुष और स्त्री का भेद, जाति, नाम, और आश्रम-ये कोई मेरे भजन के कारण नहीं है | मेरे दर्शन का कारण तो एक मात्र मेरी भक्ति ही है | जो मेरी भक्ति से विमुख है; वे यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्म से मुझे नहीं देख सकते | इसलिए हे भामिनी ! मैं संक्षेप में अपनी भक्ति के साधनों का वर्णन करता हूँ |’ इस प्रकार परमात्मा श्री राम अब शबरी के सामने नवधा-भक्ति का वर्णन करते हैं |
        वे कहते हैं –‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा |’ अर्थात भक्ति का प्रथम साधन है संतों का संग | “सतां संगतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम्” (अ.रा.3/10/22) | संग का बहुत महत्त्व है, जैसी संगति होगी वैसा ही परिणाम मिलता है | संतों का संग करने से सत तक पहुंचा जा सकता है | ‘सठ सुधरहि सत्संगति पाई | पारस परस कुधातु सहाई ||’ दुष्ट व्यक्ति भी अच्छे संग में रहे तो उसमें भी सुधार दृष्टिगोचर होने लगता है | पारस पत्थर के संपर्क में आने से लोहा भी सोना बन जाता है |  
            भक्ति का दूसरा दूसरा साधन है-‘द्वितीयं मत्कथालापः’ यानि मेरे जन्म-कर्मों की कथा का कीर्तन करना अर्थात ‘दूसरि रति मम कथा प्रसंगा’ | भगवान् की कथा लगातार सुनने से परमात्मा के प्रति प्रेम जाग्रत हो जाता है | भगवत-कथा व्यक्ति का ध्यान संसार से हटाकर परमत्मा की ओर कर देती है | कथा सुनने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे मन को शांति मिलती है | कथा श्रवण का आनंद लेने के लिए मन को कथा में लगाना आवश्यक है | जो मनोयोग से कथा नहीं सुनता उसको उस कथा का कोई भी लाभ नहीं मिलता |
       भक्ति का तीसरा साधन है – ‘तृतीयं मद्गुणेरणम्’ अर्थात मेरे गुणों की चर्चा करना | परमात्मा के गुणों की चर्चा करने से तात्पर्य है-परमात्मा की स्तुति करना | गुणों की प्रशंसा करने से परमात्मा के गुण व्यक्ति में भी धीरे-धीरे आने लगते हैं | भागवत में एक अध्याय ‘गोपिका-गीत’ (10/31) है | शरद पूर्णिमा की रात रास-लीला की अवधि में अचानक श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो जाते हैं | तब गोपियाँ उनके विरह में भगवान् के गुणों का गान करती है | अंतत परमात्मा उन सबके मध्य प्रकट होकर उन्हें सांत्वना देते है और उनके साथ महारास (भागवत-10/32-33) की रचना करते हैं।
            भक्ति का चतुर्थ साधन है – ‘व्याख्यातृत्वं चतुर्थं साधनं भवेत्’ अर्थात मेरे वाक्यों की व्याख्या करना | ‘आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्यामायया सदा’ अर्थात अपने गुरुदेव की निष्कपट होकर भगवद्बुद्धि से सेवा करना भक्ति का पांचवां साधन है | ‘पुण्यशीलत्वं यम- नियमादि च | निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनम्’ अर्थात पवित्र स्वभाव, यम-नियमादि का पालन और मेरी पूजा में सदा प्रेम होना, भक्ति का छठा साधन है | ‘मम मन्त्रोपासकत्वं सांगं सप्तमुच्यते’-सातवाँ भक्ति का साधन है-मेरे मन्त्रों की सांगोपांग उपासना करना | भक्ति के अंतिम दो साधन बताते हुए श्री राम शबरी को कहते हैं-
       ‘मद्भक्तेषवधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः |
       बह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ||
       अष्टमं नवमं तत्वविचारो मम भामिनी |
       एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ||अ.रा.-3/10/26-27||
      मेरे भक्तों की मेरे से अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियों में मेरी भावना करना, बाह्य पदार्थों में वैराग्य करना और शम-दमादि संपन्न होना-यह मेरी भक्ति का आठवां साधन है | नवां साधन है- तत्व विचार करना | हे भामिनी ! इस प्रकार यह नौ प्रकार की भक्ति है |
          इस प्रकार भक्ति के नौ साधन बताकर भगवान् कहते हैं कि इनमें से एक भी भक्ति किसी में भी हो उसको मेरे स्वरुप का अनुभव हो जाता है | श्री रामचरितमानस में गोस्वामीजी भी लगभग इन्हीं नौ साधनों का वर्णन करते हैं | प्रथम भक्ति- संतों का संग | दूसरी भक्ति – मेरी कथा श्रवण में रुचि | तीसरी भक्ति –गुरु के चरणों की सेवा | चौथी भक्ति – मेरे गुणों का गान | पांचवीं भक्ति – मन्त्रों का जाप और परमात्मा में विश्वास | छठी भक्ति – क्षमा, दम, शील आदि का पालन | सातवीं भक्ति – प्रभु के समान ही समस्त जग को देखना | संतों को मुझसे अधिक मानना | आठवीं भक्ति – संतोष धारण करना | दूसरे में दोष न देखना | नवीं भक्ति – सभी प्रकार के कपट से दूर रहना और मेरे में पूर्ण विश्वास रखना |
           भक्ति के साधनों में से किसी भी एक साधन का जीवन में उपयोग करेंगे तो स्वतः ही शेष सभी साधन आपको मिल जायेंगे | जो व्यक्ति भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता है उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं रह जाता है | आवश्यकता है, संसार से विमुख होकर परमात्मा के सम्मुख होने की | 
          इसके बाद भगवान् श्री राम शबरी से सीता के बारे में पूछते हैं | शबरी कहती है – ‘नाथ ! आप तो सर्वज्ञ हैं | मैं आपको क्या बता सकती हूँ ? भगवान् का अपने भक्त के प्रति प्रेम देखिये, सब कुछ पहले से जानते हुए भी फिर एक भक्त से ही सहायता चाह रहे हैं | वहां चित्रकूट में वाल्मीकिजी से अपने रहने का स्थान पूछ रहे थे और यहाँ शबरी से सीता का पता पूछ रहे हैं |
       शबरी भी भगवान् का मान रखती है | वह बतलाती है कि सीताजी को रावण हर कर ले गया है | यहाँ पास में ही पम्पा सरोवर है | वहां ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते है | आप उनके साथ मित्रता कीजिये | वे आपका सभी प्रकार से सहयोग करेंगे |” इसके बाद शबरी ने प्राण त्यागने की इच्छा प्रकट की | राम ने पूछा – ‘तुम्हारी कोई इच्छा है तो बताओ | शबरी बोली – ‘नाथ ! इस पम्पा सरोवर का जल विकारयुक्त हो गया है | वह पुनः अपनी पवित्रता को प्राप्त कर ले, ऐसा कोई उपाय करो |’ श्री राम बोले – ‘एक ऋषि ने आपको लात मारी थी, उसी कारण से इस जल में विकार आ गया है | तुम इसमें स्नान करोगी तभी यह सरोवर पुनः शुद्ध हो पायेगा |’ 
          भगवान् की लीला तो देखो, अपनी महिमा बताने के स्थान पर अपने भक्त की महिमा बढा रहे हैं | सीता कहाँ है, वहां तक कैसे पहुंचा जा सकता है ? प्रभु सब जानते हैं फिर भी शबरी को पूछ रहे हैं | गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ अर्थात अर्जुन ! तू तो केवल निमित्त मात्र बन जा | कुरुक्षेत्र में महाभारत के ये सब योद्धा तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके है अर्थात इनका मरना तो निश्चित है, तू तो इनको मारने का श्रेय ले ले | पम्पा सरोवर का जल तो पवित्र भगवान् के कारण ही हुआ था परन्तु उन्हें तो इसका श्रेय अपने भक्त को देना है |
         सुग्रीव से मित्रता करने की बात कहकर शबरी ने पम्पा सरोवर में स्नान किया | सरोवर की गरिमा पुनः लौट आई | फिर शबरी ने परमात्मा के दर्शन करते करते योगाग्नि के माध्यम से अपने शरीर से मुक्त हो गई | इस प्रकार शबरी का उद्धार हुआ |
          किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले |
          प्रसन्ने धमजन्मापि शबरी मुक्तिमाप सा ||अ.रा.-3/10/42||
अर्थात भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीराम के प्रसन्न होने पर क्या दुर्लभ है ? अर्थात कुछ भी दुर्लभ नहीं है | देखो, उनकी कृपा से नीच कुल में जन्मी निष्पाप शबरी ने भी मोक्ष प्राप्त कर लिया ।
            शबरी, निम्न वर्ग में पैदा हुई एक साधारण सी महिला जिसने राम शब्द का ‘र’ अक्षर भी ठीक से न पढ़ा होगा, मन में सेवा और प्रेम की भावना से ओतप्रोत लड़की जंगल में अकेली निकल गयी | सेवा और प्रेम ही उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य था | परमात्मा को पाने की कल्पना भी उसने अपने जीवन में कभी नहीं की थी | जहां सेवा और प्रेम हो वहां प्रभु स्वयं रहते हैं |
        मतंग ऋषि का सानिध्य मिलने से और उनके द्वारा मिले राम नाम के गुरु-मन्त्र ने उसे परमात्मा के निकट ला दिया | भगवान् से बड़ा भगवान् का नाम होता है | इसी नाम को सहारा बनाकर शबरी ने संसार सागर को पार कर लिया | राम-नाम की महिमा को उसने प्रत्यक्ष कर दिखाया | गोस्वामीजी शबरी के बारे में मानस में लिखते हैं -
           जाति हीन अघ जन्म महि,
           मुक्त कीन्हि असि नारि |
           महामंद मन सुख चहसि,
           ऐसे प्रभुहि बिसारि ||मानस-3/36||
       जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी,ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन ! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है ?
          शबरी के जीवन से प्रेरणा लें और प्रभु को सेवा और प्रेम के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करें | परमात्मा को कभी भी भूले नहीं | दिन रात प्रभु का स्मरण करते रहें और कहते रहें, ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !! मैं आपको भूलूँ नहीं |’
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

  

Wednesday, February 16, 2022

प्रगट भई तपपुंज सही-शंका समाधान

 प्रगत भई तपपुंज सही – शंका समाधान  

       अहल्या  के इस विवेचन पर पाठकों ने जितनी प्रतिक्रियाएं दी हैं, उतनी आज तक किसी विवेचन पर नहीं मिली | यह पाठकों के जागरूक होने का संकेत है | बहुत से प्रश्न मिले हैं, उनमें उठी शंकाओं का समाधान करने का प्रयास कर रहा हूँ |

     अहल्या ने छद्म वेशधारी इन्द्र को पहचानने के पश्चात् भले ही जानबूझकर अथवा अनजाने में उसके प्रणय निवेदन को स्वीकार किया हो, कुछ अपराध तो अहल्या का बनता ही है | वह जानती थी कि ऋषि गौत्तम कभी भी असमय (ब्रह्म मुहूर्त में) प्रणय निवेदन नहीं कर सकते फिर भी उसने ऋषि गौत्तम का वेश धरे इन्द्र का आग्रह स्वीकार कर लिया | इसी कारण से उसे अपने पति का कोपभाजन होना पड़ा | इसके परिणाम स्वरूप वह परित्यक्ता हो गयी और एक युग तक उसे  जीवन में जड़वत होकर रहना पड़ा | जड़वत होकर भी उसने अपने अपराध से मुक्त होने के लिए साधना की जो उसे परमात्मा तक ले गयी |

       शास्त्रों में अहल्या को कन्या इसलिए कहा गया कि उसने कामवासना के अधीन होकर कोई कर्म नहीं किया | इन्द्र स्वर्ग के राजा थे | घर आये अतिथि का यथोचित्त स्वागत करना इस देश की संस्कृति में है | परन्तु ऋषि का वेश धरे इंद्र का ऐसा सत्कार करना उसे शापित होने की सीमा तक ले जायेगा, शायद इसका भान अहल्या को नहीं रहा होगा |

       चन्द्र देव पर गौत्तम ऋषि के कमंडल की चोट से लगा दाग प्रतीकात्मक है | जो भी व्यक्ति किसी दुष्कर्म में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सहयोगी होता है, उसके चरित्र पर दाग लगना निश्चित है | यही चन्द्रमा के साथ हुआ है | पूर्णिमा के चाँद का सौन्दर्य इस दाग के कारण कुछ फीका अवश्य ही पड़ जाता है और ऊपर से कभी कभी उस पर लगने वाला ग्रहण भी उसके तेज को कम कर देता है |

         अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि किसी की दृष्टि में अगर अहल्या पापी भी है तो वह परमात्मा की साधना और भजन के कारण मुक्त होने की अधिकारी है | गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है –

   अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |

  साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ||9/30||

यदि कोई दुराचारी से दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधू ही मानने योग्य है क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है |

   पौराणिक कथाओं पर प्रश्न उठते ही रहते हैं। उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने से महत्वपूर्ण है, इन कथाओं के भाव को ग्रहण करना, जिनके लिए इनकी रचना की गई है।इसलिए इन कथाओं में छिपे संदेश को पकड़ें अन्य अतिशयोक्तियों पर अधिक ध्यान न दें।

कल से नयी श्रृंखला - भक्त शबरी पर

प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||


Tuesday, February 15, 2022

प्रगट भई तपपुंज सही

 प्रगट भई तपपुंज सही 

          गत दिनों जब हम बैठे चर्चा कर रहे थे तब एक सज्जन ने कहा कि सनातन धर्म ग्रंथों में नारी के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया है | नारी भले ही कितनी ही पवित्र हो, उसको अपवित्र करने वाले अथवा दुर्वचन कहने वाले पुरुष प्रथमतः तो साफ छूट जाते हैं अथवा फिर उस पुरुष के साथ नारी को भी प्रताड़ित होना पड़ता है | सीता का उदाहरण देते हुए वे कहने लगे कि रावण के यहाँ एक वर्ष तक अकेले रहने पर भी उसके सतीत्व पर किसी प्रकार की आंच नहीं आयी थी, फिर भी लंका युद्ध के बाद उन्हें अग्नि परिक्षा तक देनी पड़ी | अवध के एक धोबी के द्वारा स्वयं के घर में अपनी पत्नी को सीता को उद्घृत कर कुछ दुर्वचन कहे गए थे | उसके कारण जनकसुता को गर्भावस्था में अकेले ही वनगमन के लिए विवश होना पड़ा था जबकि उस धोबी को अपने द्वारा कहे गए दुर्वचनों के लिए कोई सजा नहीं मिली |

          वे बड़े रोष में दिखलाई पड़ रहे थे | उनको समझाते हुए मैंने कहा कि धर्म ग्रंथों में नारी के सम्मान की बात ही कही गयी है | नारी का अपमान करने का मंतव्य किसी भी धर्मग्रन्थ में नहीं है | हाँ, कुछेक मामलों में आपका कहना एक सीमा तक सत्य हो सकता है लेकिन यह पूर्णतः सत्य नहीं है | जब तक हम किसी वृतांत का समग्रता के साथ अध्ययन नहीं कर लेते और यह नहीं जान लेते कि उस बात के पीछे क्या उद्देश्य था, तब तक सनातन धर्म-ग्रंथों के बारे में ऐसी राय बना लेना उचित नहीं है | 

          मैंने सीताहरण से पहले जनकसुता के द्वारा अग्निप्रवेश करने की बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस सीता का अपहरण रावण ने किया था वह वास्तविक सीता न होकर उसकी छाया मात्र थी | लंका युद्ध के बाद श्री राम ने सबके समक्ष छाया सीता को अग्नि में प्रवेश कराकर वास्तविक सीता को पुनः प्रकट किया गया था | रही बात अयोध्या के धोबी की, तो भगवान् श्रीराम अपनी प्रजा का पालन करने वाले राजा थे और एक राजा का कर्तव्य होता है कि वह प्रजा के हित का ध्यान रखे और साथ ही उसे संतुष्ट भी रखे | धोबी के द्वारा अपनी पत्नी को सीता को इंगित करते हुए कहे गए वचन भगवान् ने सुन लिए थे | धोबी नहीं जानता था कि वास्तविक सीता रावण के यहाँ कभी गयी ही नहीं थी | फिर भी राम ने प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सीता का त्याग करना उचित समझा, क्योंकि एक राजा का यही धर्म होता है कि वह प्रजा को निःस्वार्थ भाव से उचित आचरण करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करे |

           परन्तु वे सज्जन तो आज कुछ अलग ही सोचकर आये थे | आगे फिर अहिल्या का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसके सतीत्व भंग के लिए केवल इंद्र दोषी थे, अहिल्या का इसमें कोई दोष नहीं था, फिर भी इंद्र की करतूत का दंड उसके साथ-साथ अहिल्या को भी भोगना पड़ा | ऋषि गौत्तम के श्राप के कारण बेचारी अबला को सूने आश्रम में जडवत होकर कई वर्षों तक रहना पड़ा | मैंने उनको यथासंभव स्पष्ट करते हुए संतुष्ट करने का प्रयास किया परन्तु वे तो जैसे न समझने की शपथ ही लेकर आए थे | खैर, उनके साथ हुए वार्तालाप ने मुझे अहिल्या के बारे में कुछ लिखने को प्रेरित अवश्य कर दिया |   

           रामायण में मुझे केवट-चरित्र के बाद जिसने प्रभावित किया है, वह है शबरी-चरित्र | शबरी के बाद अगर कोई महत्वपूर्ण नारी-चरित्र रामायण में है तो वह अहिल्या-चरित्र है | वैसे अहिल्या का सही नाम अहल्या है जिसका अर्थ है अजोत भूमि अर्थात वह भूमि जो जोती न जा सके या जिसको जोतना कठिन हो | देखा जाये तो रामायण में शबरी, अहिल्या के अतिरिक्त तारा (बाली की पत्नी) और मंदोदरी (रावण की पत्नी), इन दो नारियों के चरित्र भी बड़े प्रभावशाली है | परन्तु आज बात करते हैं, अहिल्या की |

      ब्रह्मपुराण में लिखा है –

       अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा |

       पंचकन्या: स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ||ब्रह्मपुराण-3/7/219 ||

     अहिल्या, तारा, मंदोदरी के अतिरिक्त कुंती और द्रौपदी को भी प्रातः स्मरणीय बताया गया है | इनके स्मरण मात्र से ही सभी महापाप नष्ट हो जाते हैं | इन्हें कन्यायें इसलिए बतलाया गया है कि इन्होने कामवासना के अधीन होकर अपने जीवन में कभी भी कोई कार्य नहीं किया था | सभी पतिपरायाणा थी और परमात्मा से उनका अतुलनीय प्रेम था | मंदोदरी भले ही रावण की पत्नी रही हो परन्तु वे जानती थी कि जिस राम से द्वेषभाव उसके पति रख रहे हैं, वे स्वयं परमब्रह्म हैं |  

           तारा अपने पति बाली के वध से क्षुब्ध होकर कुछ समय के लिए विचलित अवश्य हुई थी | इस उद्वेग में उसने श्रीराम को दो श्राप दे डाले थे | पहला श्राप था कि आपने मुझे अपने पति से अलग कर दिया है, अतः इस जीवन में आपकी पत्नी भी भविष्य में आपके साथ न रह सकेगी | इसी श्राप के कारण धोबी के द्वारा कहे गए वचनों के आधार पर श्रीराम को अपनी पत्नी सीता का त्याग करना पड़ा था | दूसरा श्राप तारा ने दिया कि जिस प्रकार छिपकर आपने मेरे पति को बाण से मारा है उसी प्रकार अगले जन्म में आपकी मृत्यु भी किसी के द्वारा छिपकर चलाये गए बाण से होगी | द्वापर के अंत में भगवान् श्रीकृष्ण की मृत्यु भी बाली के द्वारा बहेलिये के रूप में पुनः जन्म लेकर, छिपकर चलाये गए बाण से हुयी थी |  

           श्राप देने के बाद भगवान् श्रीराम के द्वारा प्रदत्त ज्ञान ने तारा की आँखें खोल दी थी | तारा और मंदोदरी रामायण के ही दो पात्र हैं | द्रौपदी और कुंती महाभारत के दो पात्र हैं, उनकी बात फिर कभी | आज अहिल्या के बारे में चिंतन करते हैं | 

       अहिल्या ब्रह्माजी की मानस पुत्री थी | बहुत ही सुन्दर कन्या थी, अहिल्या | जब वह युवा हुयी तब ब्रह्माजी ने उनके लिए उचित वर ढूँढने के लिए एक योग्यता आवश्यक कर दी | वह आवश्यक योग्यता थी कि जो कोई सबसे पहले त्रिलोकी की परिक्रमा पूरी कर लौटेगा उसके साथ ही अहिल्या का विवाह संपन्न कर दिया जायेगा |  

          स्वर्ग का राजा इन्द्र अहिल्या की सुन्दरता पर पहले ही मुग्ध था | उसकी आसक्ति अहिल्या के प्रति इतनी अधिक थी कि वह किसी भी प्रकार उनको प्राप्त करना चाहता था | स्वर्ग लोक भोग का स्थान है | वहां सुख ही सुख है, दुःख लेशमात्र भी नहीं है | इतना सब होते हुए भी मुक्ति/मोक्ष नहीं है | भोग पूरे हो जाने के बाद सभी को फिर से इसी संसार में लौटना पड़ता है |

             स्वर्ग में किसी भी प्रकार के भोग की कोई कमी नहीं है | फिर भी इन्द्र काम-भोग से संतुष्ट नहीं है | सत्य है, आज तक भोगों से कोई संतुष्ट नहीं हुआ है | भोग भोगते भोगते अंततः एक दिन यह शरीर ही भोग बन जाता है परन्तु हम हैं कि जीवन भर विभिन्न भोगों के पीछे भागते रहते हैं | भोगों की अग्नि भोग भोगने से और अधिक प्रज्वलित हो जाती है और नए-नए भोगों की मांग करने लगती है | देवताओं के राजा इन्द्र भी हमसे भिन्न नहीं है |   

          अहिल्या के प्रति आसक्त इन्द्र ने सबसे पहले पृथ्वी त्रिलोकी का चक्कर लगाने के लिए बड़ी तेज दौड़ लगाई | साथ में कई अन्य देवता भी दौड़ रहे थे परन्तु दौड़ पूरी करने में एक मात्र इन्द्र ही सफल हुए | ब्रह्माजी, अहिल्या का विवाह इन्द्र के साथ निश्चित करने ही वाले थे कि नारायण-नारायण करते नारद मुनि वहां पहुँच गए |

              नारदजी भी ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं | उन्होंने आते ही कहा कि ‘पिताजी, तीनों लोकों की परिक्रमा तो सबसे पहले महर्षि गौत्तम ने सम्पूर्ण की है इसलिए आप द्वारा रखी गयी आवश्यक योग्यता उन्होंने इन्द्र से पहले ही अर्जित कर ली है | अतः अहिल्या का विवाह गौत्तमजी के साथ ही होना चाहिए |’ ब्रह्माजी ने पूछा कि ‘ऋषि गौत्तम तो यहाँ आये ही नहीं फिर वे कब त्रिलोकी की परिक्रमा को गए थे ?’ नारदजी ने उत्तर दिया कि ‘उनके आश्रम में एक गाय ने बछड़े को जन्म दिया था और गौत्तम ऋषि उस समय प्रतिदिन की तरह उस गाय की परिक्रमा कर रहे थे | प्रसव करती गाय की परिक्रमा करना तीनों लोकों की परिक्रमा करने के समकक्ष है | प्रसव करती गाय की परिक्रमा ऋषि गौत्तम ने इन्द्र के द्वारा त्रिलोकी की परिक्रमा पूरी करने से पहले ही पूरी कर ली है | अतः अहिल्या का विवाह ऋषि गौत्तम के साथ ही होना चाहिए |’  

          नारदजी की बात ब्रह्माजी को उचित और न्यायसंगत जान पड़ी । उन्होंने ऋषि गौत्तम के साथ अहिल्या का विवाह करने का  निश्चय कर लिया | उचित अवसर पर अहिल्या का विवाह अत्रि के पुत्र ऋषि गौत्तम के साथ कर दिया गया | विवाह उपरांत ऋषि अपनी पत्नी को लेकर आश्रम में चले आये | अहिल्या विवाह के उपरांत अपने पति की सेवा बड़े मनोयोग से करने लगी |

           अहिल्या का विवाह ऋषि गौत्तम के साथ हो जाने का सुनकर इन्द्र को बहुत बुरा लगा | उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अहिल्या को किसी भी प्रकार प्राप्त करके ही रहेगा | कामांध व्यक्ति कभी भी किसी बात का भला-बुरा नहीं सोचता | इसी कारण से उस व्यक्ति का एक न एक दिन पतन होना निश्चित है परन्तु यह बात किसी भी कामी के आज तक समझ में नहीं आई है | गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि काम में बाधा पड़ने से क्रोध पैदा होता है | क्रोध से सम्मोह (मूढभाव) पैदा होता है, सम्मोह से स्मृतिभ्रम और स्मृतिभ्रम से बुद्धि का नाश हो जाता है | बुद्धि का नाश होने से मनुष्य पतन को प्राप्त होता है |(2/62-63)।ऐसा ही अब इंद्र के साथ होने जा रहा है। 

          बात उस समय की है जब आज के दरभंगा (बिहार) जिले में गंगा नदी से कुछ ही दूरी पर ऋषि गौत्तम का आश्रम था | ऋषि अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहां एक कुटिया में निवास करते थे | एक दिन इन्द्रदेव ने चन्द्रमा को अपने साथ लिया और पृथ्वी के भ्रमण पर निकल पड़े | ऋषि गौत्तम का आश्रम देखकर उसके भीतर उपस्थित अहिल्या का स्मरण कर उनके मन में काम-वासना जाग उठी | अहिल्या की सुन्दरता पर इन्द्रदेव पहले से ही मुग्ध थे | आज उनको अवसर मिल ही गया | वे अपनी काम-वासना पूरी करने के लिए अहिल्या के पास जाने की युक्ति लगाने लगे | आश्रम के पास आकर उन्होंने देखा कि आश्रम में अहिल्या के साथ तो गौत्तम ऋषि भी शयन कर रहे हैं | तब गौत्तम ऋषि को कुटिया से बाहर भेजने के लिए इन्द्र ने चन्द्रमा के साथ मिलकर एक चाल चली |

          इन्द्र अपनी माया से चन्द्रमा को मुर्गा बनाकर उनसे ऋषि गौत्तम को भोर होने की सूचना देने के लिए बांग दिलाई | ऋषि गौत्तम समझे कि ब्रह्म-मुहूर्त हो गया है | वे प्रतिदिन ब्रह्म-मुहूर्त में गंगा-स्नान करने जाया करते थे | भोर होने वाली है, यह जानकर वे उठे, पृथ्वी को प्रणाम किया और गंगा-स्नान के लिए चल दिए | काम-वासना पूर्ति हेतु उचित अवसर जानकर इन्द्रदेव ने गौत्तम ऋषि का वेश धारण किया और आश्रम में प्रवेश कर गए | चंद्रदेव बाहर खड़े होकर पहरा देने लगे ।  

           इधर कुटिया में ऋषि गौत्तम के रूप में इन्द्र ने अहिल्या को अपनी काम-वासना शांत करने के लिए तैयार कर लिया और उधर ऋषि गौतम गंगा के तट पर पहुँच गए | स्नान करने के लिए ज्योंही वे गंगा की धारा में प्रवेश करने लगे कि मां गंगा प्रकट हो गयी | उन्होंने ऋषि को बताया कि अभी ब्रह्म-मुहूर्त में बहुत समय शेष है | इस समय अर्धरात्रि में स्नान करना वर्जित है | गंगा मां ने बताया कि अहिल्या का सतीत्व भंग करने के लिए इद्रदेव ने यह मायावी चाल चली है | इतना सुनते ही ऋषि के तन-बदन में आग लग गयी | वे क्रोधित होते हुए अपनी कुटिया पर लौटे |

          कुटिया के बाहर चंद्रदेव पहरेदारी कर रहे थे | चंद्रदेव पर दृष्टि पड़ते ही ऋषि ने उसको अपना कमंडल फैंक मारा और शाप दिया कि तुम्हारे ऊपर राहू की सदैव कुदृष्टि रहेगी और अवसर मिलते ही कुछ समय के लिए तुम्हें ग्रस लेगा | पूर्णिमा के दिन होने वाला चंद्रग्रहण उस शाप का ही परिणाम है | कहा जाता है कि चन्द्रमा पर जो दाग दिखलाई पड़ता है, वह दाग ऋषि गौत्तम के द्वारा फैंक कर मारे गए कमंडल की चोट का निशान है | हालाँकि आज विज्ञान ने चंद्रग्रहण का और चन्द्रमा में होने वाले दाग का रहस्य जान लिया है परन्तु एक कथा अगर अपने अन्दर कोई महत्वपूर्ण सन्देश छिपाए हुए है तो कोई भी अतिशयोक्ति स्वीकार्य है |

         इधर इन्द्रदेव को कुटिया के भीतर जब ऋषि गौत्तम की आवाज़ सुनाई दी तो वे बाहर निकलने को दौड़ पड़े | बाहर निकलते समय इन्द्रदेव अपने वास्तविक स्वरुप में आ गये | गौतम ऋषि के वेश में स्वयं इन्द्र थे, यह जानकर अहिल्या अपने पति ऋषि गौत्तम के संभावित क्रोध की कल्पना कर सिहर उठी | दुम दबाकर भागते इन्द्र को गौत्तम ऋषि ने नपुंसक होने का श्राप दे डाला | साथ ही कहा कि आज से न तो कोई इन्द्र को सम्मान की दृष्टि से देखेगा और न ही इसकी कोई पूजा करेगा |

       गौत्तम ऋषि ने जब कुटिया के भीतर प्रवेश किया तो देखा कि सामने खड़ी अहिल्या भय के मारे थर-थर कांप रही है | वह हाथ जोड़े अपने पति से क्षमा याचना का भाव लिए खड़ी है और बार-बार अपने निर्दोष होने का स्पष्टीकरण दे रही है | परन्तु क्रोधित ऋषि ने उसकी प्रत्येक बात को अनसुना कर दिया | क्रोध में व्यक्ति को मूढ़ता घेर लेती है | मूढ़ता से स्मृति भ्रम हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाता है | बुद्धि का नाश होने पर उस व्यक्ति का पतन होना निश्चित है | क्रोधित गौत्तम ऋषि ने अपनी पत्नी को कहा कि “मेरे साथ रहते हुए तुम्हें इतने वर्ष हो गए हैं | क्या तुम मेरे स्पर्श को अभी तक भी नहीं पहचान सकी ? हाँ, मेरे स्पर्श को नहीं पहिचानती तभी तो तू छद्म वेशधारी इन्द्र के स्पर्श को भी न पहिचान सकी | कहीं न कहीं तुम्हारे मन में भी कुछ खोट अवश्य था | इस जगत में केवल जड़ को ही स्पर्शादि इन्द्रियों का ज्ञान नहीं होता इसलिए जा, जडवत हो जा और एक शिला की तरह इस कुटिया के कोने में पड़ी रह |” 

          इस प्रकार ऋषि गौत्तम ने अपने तीनों अपराधियों को श्राप दे डाले | इन्द्र और चन्द्र तो वहां से भाग लिए परन्तु अहिल्या बेचारी भाग कर जाती भी तो कहाँ तक जाती ? अहिल्या ने अपने पति से स्वयं के निष्पाप होने का बार-बार कहा परन्तु एक ब्राह्मण और वह भी तपस्वी ऋषि, उसका दिया हुआ शाप वापिस तो हो नहीं सकता था | 

       क्रोध के कारण ऋषि का तप नष्ट हो चुका था। फिर से तप करने के लिए हिमालय की ओर निकलने से पहले ऋषि ने अपनी पत्नी को इस शाप से मुक्त होने का एक उपाय अवश्य बता दिया | कहा कि त्रेता में जब श्री हरिः दशरथ पुत्र राम के रूप में अवतार लेंगे और विश्वामित्रजी के साथ राक्षसों का वध करते हुए इधर से निकलेंगे तब उनके चरणों की रज से तुम अपने वास्तविक स्वरुप में लौट आओगी | तब तक तुम यहीं पर जड़ बनी तपस्या करती रहो |” इतना कहकर ऋषि गौत्तम आश्रम को छोड़ हिमालय में तप करने निकल पड़े |    

         अहिल्या अपने पति से हुए अलगाव से व्यथित होकर जड़ बन कर रह गयी | ऋषि गौत्तम के श्राप के कारण वह शिला बनकर तपस्या में लीन हो गयी |

            अहिल्या के जडवत होते ही आश्रम प्राणीविहीन हो गया | पशु पक्षी धीरे धीरे आश्रम को छोड़कर चले गए | सूना आश्रम देखकर भय के मारे कोई पथिक भी वहां नहीं रूकता था | एक कामांध पुरुष के कारण सब के साथ-साथ इस आश्रम को भी सजा मिल गयी थी |

      गौत्तम ऋषि के आश्रम को इसी अवस्था में छोड़ तनिक इन्द्र की अवस्था की ओर भी दृष्टिपात कर लेते हैं | ऋषि गौत्तम से नपुंसक होने का शाप मिलते ही इन्द्र के दोनों वृषण (Testes) वहीँ गिर जाते हैं | वाल्मीकिजी रामायण में लिखते हैं –

        गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना |

        पेततुर्वृषणो भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात् ||बालकाण्ड - 48/28||

    अर्थात रोष से भरे हुए महात्मा गौत्तम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अंडकोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े | इस श्लोक में इन्द्र को सहस्राक्ष अर्थात हजार आँखों वाला बताया गया है |उसे सहस्राक्ष क्यों कहा जाता है, इसको अध्यात्म रामायण में स्पष्ट किया गया है।

      ऋषि गौतम के द्वारा इंद्र को दिए गए शाप का उल्लेख पद्मपुराण और अध्यात्म रामायण में भी मिलता है –

       योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहस्रभगवान्भव |

       शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य स्वाश्रमं द्रुतम् ||अ.रा.-बालकाण्ड-5/26||

     इस श्लोक का अर्थ है कि गौत्तम ऋषि शाप देते हैं कि इन्द्र, तू योनिलम्पट है, इसलिए तेरे शरीरमे एक हजार भग (vulva) हो जायं | ऐसा कहकर ऋषि ने अपने आश्रम में प्रवेश किया |

         दोनों ही ग्रंथों में श्राप का मंतव्य इन्द्र के नपुंसक हो जाने से ही है | आधुनिक विज्ञान के अनुसार किसी पुरुष में उपरोक्त दोनों में से कोई एक प्रकार का भी परिवर्तन हो जाता है तो वह नपुंसक हो जाता है |

       ऋषि के श्राप से तत्काल ही इन्द्र के शरीर पर एक हजार स्त्री-जननांग निकल आये | जिसके कारण उत्पन्न हुई अपनी कुरूपता देखकर उन्होंने ऋषि से इन अंगों को नेत्रों के रूप में बदलने की याचना की | ऋषि द्वारा आग्रह स्वीकार करते ही ये सभी अंग नेत्रों के रूप में बदल गए | इसी कारण से इन्द्र का एक नाम सहस्राक्ष भी है |

        इन्द्र के चाहे दोनों वृषण गिर गए हों अथवा उनके शरीर पर एक हजार भग (vulva) निकल आयी हों, दोनों ही स्थितियों में एक पुरुष नपुंसक हो जाता है | वृषणहीन हो जाने की स्थिति में शरीर में पुरुष-हार्मोन बनना बंद हो जाते है, जिससे पुरुष नपुंसकता को प्राप्त हो जाता है | दूसरी स्थिति में एक ही शरीर में दोनों प्रकार के जननांग हो जाने पर पुरुष और स्त्री दोनों हार्मोंस का आपसी संतुलन बिगड़ जाता है और पुरुष नपुंसक हो जाता है |

      शापित इन्द्र ने अपने लोक में प्रवेश कर देवताओं से कहा कि मैंने आप सबके हित में ऋषि गौत्तम के प्रति अपराध किया है | आप मुझे इस नपुसंकता के शाप से मुक्ति दिलाएं | तब अग्निदेव के सानिध्य में पितृ देवों से प्रार्थना की गयी | पितृ देवताओं ने मेढे के वृषण काटकर इन्द्र के शरीर में यथास्थान लगा दिए और इस प्रकार वे नपुसंकता के शाप से मुक्त हुए | मेढ़े के वृषण लग जाने के कारण इन्द्र का एक नाम मेषवृषण भी है |

        कहा जाता है कि ऋषि गौत्तम ने इतना अधिक तप किया था कि इन्द्रदेव को अपने  सिंहासन पर संकट नज़र आने लगा था | अहिल्या पर वह पहले से ही आसक्त था और इधर ऋषि के तप ने उसकी अपने सिंहासन की सुरक्षा के प्रति चिंता बढा दी थी | अंततः उसने एक तीर से दो शिकार करने की युक्ति निकाली | अहिल्या को भ्रमित कर उसने अपनी काम-वासना शांत की और ऋषि गौतम को क्रोध दिलाकर उनके तप को नष्ट कर दिया | 

       जरा सोचिये, इससे इन्द्र को क्या लाभ हुआ ? सिवाय पतन के अतिरिक्त उसको कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ | सबसे अधिक हानि तो अहिल्या को उठानी पड़ी जो निर्दोष होते हुए भी आश्रम के एक कोने में जडवत होकर इन्द्र के द्वारा किये गए पाप का प्रायश्चित करती रही | वाल्मीकि-रामायण में इंद्र द्वारा कारित इस पाप में अहिल्या को भी सहभागी बताया गया है।

       एक नारी जिसे अबला भी कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कितनी विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुई यह घटना इसका प्रमाण है, फिर चाहे सामने वह पुरुष इंद्र हो या ऋषि गौत्तम अथवा कोई अन्य।पाप इंद्र ने किया और उस पाप में कथित रूप से सहभागी होने का परिणाम इंद्र के साथ अहिल्या को भी भुगतना पड़ रहा है।

            सूने आश्रम में भला कोई जीव भी कब तक निवास कर सकता है ? गौत्तम ऋषि का आश्रम प्राणी-विहीन हो चूका था | न तो वहां पक्षियों का कलरव था और न ही रंभाती गायों की पुकार | वहां था तो केवल एक सन्नाटा और उस सन्नाटे में अबला का जड़ होकर पत्थर हुआ  शरीर, जिसके मुख से कोई बोल तक भी नहीं निकल पाते थे | शिला बन जाने का अर्थ पत्थर बन जाना नहीं है बल्कि चलते फिरते शरीर का जड़वत हो जाना है। 

       पति परित्याग के कारण जड़ हो गई अहिल्या मन ही मन भगवान् का नाम लेकर तप कर रही थी और प्रतीक्षा कर रही थी कि कब राम आयेंगे और कब वह पुनः चेतन अवस्था को प्राप्त होगी |

             भगवान् अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी | एक सूई की नोंक जितना भी स्थान इस ब्रह्मांड में नहीं है जहाँ श्री हरि का वास न हो | प्रभु बड़े दयालु हैं | वे अपने भक्तों पर कृपा करते हैं, इसीलिए उन्हें करुणानिधान कहा जाता है | अपने प्रत्येक भक्त पर उनकी दृष्टि प्रतिक्षण बनी रहती है | ऐसे में भला, वे अहिल्या को कैसे भूल सकते हैं ? विश्वामित्र मुनि के साथ जनकपुरी में सीता स्वयंवर देखने जा रहे है | वे जानते हैं कि वहां जनकपुरी में क्या होना है ? सीता उनका ही वरण करेगी, जानते हैं | फिर भी कोई जल्दी नहीं है | सीता तो जन्म जन्मान्तर की भार्या है, उससे मिलना कठिन नहीं है परन्तु उन्हें पहले अपने भक्त की कामना पूरी करनी है |  

               ऐसा सोचकर वे चल पड़े जनकपुरी के रास्ते से थोडा हटकर,अलग रास्ते से | भक्त की भगवान् से कभी कोई दूरी नहीं होती | आश्रम को सूना और एक कोने में जड़वत बैठी नारी सी प्रतिमा को देखकर श्री राम ने मुनि से उसका कारण पूछ बैठे | मुनि विश्वामित्र जानते हैं कि राम सर्वज्ञ है फिर भी मेरा मान रखने के लिए पूछ रहे हैं | चलो, मैं ही बता देता हूँ | विश्वामित्र कहते हैं –“राम ! यह अहिल्या है | अपने पति ऋषि गौत्तम के शाप से यह जड़ हो गयी है | शिला बनी तप में लीन है | परित्यक्त होकर पत्थर बन गयी है, इस कारण से आपसे आग्रह भी नहीं कर सकती कि आप उसे अपने चरणों से छूकर, उसे अपनी चरण रज देकर उसका उद्धार करें | आपके चरणों के छूने से ही आपके चरणों की रज उसे मिलेगी और यह पुनः अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त होगी |’ विश्वामित्र मुनि कहते हैं कि राम, आगे बढ़ो और अपने चरणों की रज का स्पर्श देकर इस नारी का सम्मान लौटा दो |

         राम कह रहे हैं – “ नहीं गुरूजी, मैं भला पुरुष होकर एक नारी को अपने चरणों से स्पर्श कैसे कर सकता हूँ ? नारी तो सदैव वन्दनीय होती है | मैं तो उनको केवल प्रणाम ही कर सकता हूँ |” अनुकरणीय है उनका ऐसा कहना। ऐसा है भगवान् श्री राम का एक नारी के प्रति सम्मान | आज इसी सम्मान के अभाव में नारी दुराचार की शिकार होती जा रही है | जब तक हम अपने बच्चों को संस्कार नहीं देंगे तब तक नारी-सम्मान वापिस अपनी गरिमामय स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकेगा | कलियुग का प्रभाव है यह | 

        द्वापर में एक नारी के अपमान ने महाभारत रच दिया था फिर इस कलियुग में नारी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह क्या नहीं करेगा? हाँ, कोई भी युग तभी परिवर्तित हो सकता है जब हम स्वयं अपने आप को परिवर्तित करेंगे |

           श्री राम एक-टक दृष्टि से शिला बनी नारी को निहारते हुए भाव-विह्वल हो उठे | कहा जाता है कि उसी समय वायु का प्रवाह तीव्र गति से हुआ और श्री राम के चरणों को स्पर्श करती हुई रज उड़कर शिला बनी अहिल्या को छू गयी | तत्काल ही वह शिला एक सुन्दर नारी में परिवर्तित हो गयी ।  

           माता अहिल्या को अपने वास्तविक स्वरुप में देखते ही राम-लखन ने आगे बढ़कर उस देवी के चरण छू लिए | राम कहते हैं –‘देवी अहिल्या, सारा दोष इन्द्र का था | वह अपनी करनी भुगत रहा है | आज इन्द्र का वह पहले वाला सम्मान नहीं रहा है और न ही अब कोई उसकी पूजा करता है | चन्द्रमा उसका सहयोगी था, जब तक यह ब्रह्मांड है तब उसको अपने किये की सजा मिलती रहेगी | तुम्हारा कोई दोष नहीं था | तुम्हें बिना कोई अपराध किये सजा मिली थी | ऋषि गौत्तम भी आपसे हुए अलगाव से दुखी हैं | अब आप भी उनके पास चली जाओ | वे आपको सहर्ष स्वीकार कर लेंगे |”

         भगवान् श्री राम की बातें सुनकर अहिल्या गद् गद् हो गयी | वह उनकी स्तुति करने लगी | स्तुति को गोस्वामीजी ने मानस में एक छंद के रूप में बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में पिरोया है |  ’परसत पद पवन सोक नसावान प्रगट भई तपपुंज सही |’ अर्थात जो शोक का नाश करने वाले हैं ऐसे आपके चरणों की रज का स्पर्श पाते ही शिला से तपपुंज के रूप में एक नारी प्रकट हो गयी | अहिल्या कह रही है कि ‘प्रभु ! मैं तो आपके दर्शन कर कृतार्थ हो गयी | भला हुआ, जो ऋषि ने मुझे शाप दिया | मेरे पति ने मेरा कितना ध्यान रखा था कि क्रोध में कहे गए वचनों में भी उन्होंने मेरा हित देखा, तभी तो मुझे आपके दर्शन हुए हैं | मुझे कोई भी दुःख-शोक नहीं है कि मेरे पति ने मेरे निष्पाप होने की बात का विश्वास क्यों नहीं किया ? मेरा तो उनके द्वारा दिए गए शाप से भी भला ही हुआ है, जो आपके दर्शन का सौभाग्य मिल सका।   

        अहिल्या को भगवान् ने प्रेमाभक्ति का वरदान दिया और उनको अपने पति ऋषि गौत्तम के पास भेज दिया | भगवान् राम इसके बाद आगे की यात्रा पर निकल पड़े जहाँ सीता उनका इंतजार कर रही है | जनकपुर में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम भेंट होती है, सतानन्द से | सतानन्द, जनकपुरी के राजपुरोहित | श्री राम को देखते ही पूछ बैठते हैं –“प्रभु, क्या आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है ? क्या उन्होंने पुनः अपना वास्तविक स्वरुप प्राप्त कर लिया है ? क्या वह अब मेरे पिता ऋषि गौत्तम के पास चली गयी हैं ?”

         भगवान् श्री राम इन प्रश्नों के उत्तर में केवल मुस्कुरा देते हैं | सतानन्द आगे कह रहे हैं-“भगवन, मैं जानता हूँ आपने सब कार्य सिद्ध कर दिए हैं, तभी आप मुस्कुरा रहे हैं | भगवान् भक्त को कृतार्थ कर ही मुस्कुराते हैं | भक्त के दुःख को भगवान् अपना दुःख मानते हैं | दुखी होकर प्रभु मुस्कुरा नहीं सकते | आज आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है, तभी तो आप इतने अधिक मुस्कुरा रहे हो | मैं आपका बहुत बड़ा उपकार मानता हूँ |” भगवान् श्री राम ने आगे बढकर राजपुरोहित सतानन्द के चरण स्पर्श कर लिए |

            भला, एक भक्त की भगवान् सुध नहीं लेंगे तो कौन लेगा ? इस संसार में भगवान् के अतिरिक्त भक्त का होता ही कौन है ? इस प्रकार आज भगवान् ने एक भक्त को जड़त्व से मुक्त किया है । तभी गोस्वामीजी कहते हैं – “प्रगट भई तपपुंज सही |”

प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||  


           


Friday, January 28, 2022

मा शुचः

 मा शुचः 

            संसार में प्राणियों की कुल 84 लाख प्रजातियाँ है | मनुष्य नाम का एक प्राणी उन 84 लाख प्राणियों की गिनती से अलग है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणी जीवन में केवल विषय-भोग को भोगने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और भोगते-भोगते ही शरीर को त्याग देते हैं | उन्हें अपने जीवन के उद्देश्य के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं होता | उनके भीतर किसी भी बात पर मनन, चिंतन, विचार, शोक आदि करने की क्षमता ही नहीं होती, इसीलिए वे बेचारों की श्रेणी में आते हैं | बेचारा, वह प्राणी होता है, जिसके भीतर कभी कोई विचार उठता ही नहीं है इसलिए उनके लिए किसी कार्य के परिणाम के बारे में मनन करने के लिए कोई सोच ही पैदा नहीं होती | उनकी बेचारगी इसी से जाहिर होती है कि उनके सामने निरुद्देश्य जीवन जीते रहने के अतिरिक्त अन्य कोई चारा नहीं होता |

        क्या मनुष्य नाम का जीव भी बेचारा हो सकता है ? भगवान् ने उसे बेचारा बनाया नहीं है बल्कि वह स्वयं के कारण बेचारा बना हुआ रह सकता है | जिसमें किसी कार्य के प्रति विचार पैदा कर उस पर मनन करने की क्षमता ही नहीं होती, भला ऐसा मनुष्य एक पशु से भिन्न कैसे हो सकता है ? ऐसे मनुष्य को आप बेचारा नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे ?

            स्पष्ट है कि मानव अन्य सभी प्राणियों से भिन्नता रखते हुए एक मननशील प्राणी है क्योंकि उसके भीतर मनन करने के लिए विचार उठते रहते हैं | मनुष्य के जीवन को विचित्र जीवन कहा जा सकता क्योंकि जहाँ संसार के विभिन्न प्राणियों को अपने जीवन में कुछ भी चिंता करनी नहीं पड़ती वहीँ इसके विपरीत मनुष्य को संसार भर की चिंताएं सताती रहती है | इस प्रकार विभिन्न चिंताएं ही उसके शोक का कारण बनती है |

        जीवन भर मनुष्य शोक ग्रस्त बना रहता है और लाखों चिंताओं से घिरा दुखी होता रहता है | चिंताओं के कारण उसके मन में हर समय बड़ी उथलपुथल मची रहती है | दिन-रात चिंताग्रस्त रहकर विभिन्न विषयों के बारे में वह सोच विचार करता रहता है | क्या आपने अब तक किसी गधे अथवा घोड़े को किसी बात के बारे में सोचते, विचारते, चिंता, शोक आदि करते देखा है ? नहीं न | अब मुझे इस संसार में एक भी ऐसा मनुष्य बता दीजिये जो चिंताग्रस्त नहीं हो, जो किसी प्रकार की सोच, शोक से परे हो | नहीं है न ! ऐसा एक भी मनुष्य आपको जीवन में कभी मिलेगा भी नहीं |

       मनुष्य का मस्तिष्क परमात्मा ने बनाया ही इसी प्रकार है कि वह किसी भी बात पर गंभीरता से विचार कर सके | विचार की उसे आवश्यकता ही इसलिए है क्योंकि वह अपने जीवन में सब कुछ सही प्रकार से करना चाहता है | वह सही होगा अथवा गलत, यह उसके उस कार्य से पूर्व किए जाने वाले विचारों पर निर्भर करता है | उसी सोच-विचार के आधार पर वह अपने जीवन में सुखी-दुखी होता रहता है | उसके द्वारा किये जाने वाले सोच-विचार के कारण ही वह विषादग्रस्त हो जाता है जोकि उसके शोक का कारण बनता है | मनुष्य की मुक्ति प्रत्येक विषाद और शोक से परे निकल जाने में ही है और इसके लिए प्रत्येक प्रकार की सोच और विचार पर अंकुश लगाने की आवश्यकता है |

           विचारों पर अंकुश लगाने का अर्थ यह कदापि नहीं है कि किसी भी कार्य से पूर्व उसके परिणाम पर विचार ही नहीं किया जाए | विचार करने की क्षमता मनुष्य को नैसर्गिक रूप से मिली है, इसलिए इस क्षमता का उपयोग करना उसका अधिकार है | परन्तु समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह किसी एक बात पर अत्यधिक विचार करते हुए शोकग्रस्त हो जाता है | हमें सर्वप्रथम यह जानना होगा कि कौन सी बातें विचार करने योग्य है और कौन सी नहीं |

           स्पष्ट है कि मनुष्य की सोच ही शोक का कारण बनती है | अपनी सोच पर नियंत्रण रख कर ही मनुष्य शोकमुक्त हो सकता है | आइये ! सर्वप्रथम यह जानते हैं कि किस किस विषय पर सोच-विचार करना एक सीमा तक उचित है | श्रीरामचरितमानस में इसी बात को वसिष्ठ मुनि ने भरतजी को  स्पष्ट किया है | वे कहते हैं कि -  

          सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना | तजि निज धरमु बिषय लयलीना ||

              सोच तो उस ब्राहमण का करना चाहिए जो वेद नहीं जानता और अपना धर्म छोड़कर विषय-भोग में रत रहता है | विप्र ज्ञान का वाहक होता है | अगर एक ब्राह्मण ज्ञान प्राप्त ही नहीं करेगा तो फिर ज्ञान को बांटेगा कैसे ? सभी वर्णों में ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि वह समाज को अपने ज्ञान के माध्यम से निर्देशित करता रहता है | अगर एक ब्राह्मण अपना धर्म छोड़कर केवल विषय-भोग प्राप्त करने में ही लगा रहेगा तो फिर समाज का पतन होना निश्चित है | धर्म-ध्वजा के वाहक ब्राह्मण को अपने जीवन में मर्यादित आचरण करना होता है जिससे अन्य व्यक्ति उसको देखकर, उसका अनुसरण कर सके | इसलिए धर्म-मार्ग पर न चलने वाले ब्राह्मण के बारे में सोच-विचार करना उचित है |

        ब्राह्मण के बारे में कहने के बाद वसिष्ठ मुनि एक राजा के बारे में भरतजी को बता रहे हैं कि -

            सोचिअ नृपति जो नीति न जाना |

            जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ||

                उस राजा का सोच करना चाहिए जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है | एक क्षत्रिय का धर्म होता है, नीति अनुसार अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए उसका उचित प्रकार से पालन-पोषण करना | जो राजा इस नीति के अनुसार नहीं चलता वह शोक करने योग्य ही है | आज संसार में प्रायः देशों में लोकतंत्र होने के कारण बहुमत के आधार पर राजा चुना जाता है | अगर चयनित राजा नीति अनुसार नहीं चलता, अपनी प्रजा को समान दृष्टि से नहीं देखता, अपनी प्रजा के हित की नहीं सोचता तो उसका भविष्य में पतन होना निश्चित है |

           क्षत्रिय का कार्य प्रजा की रक्षा और भलाई करना है | आजकल जनतंत्र में राजा वंशानुगत नहीं होता बल्कि प्रजा के द्वारा चुना जाता है, उस कारण से कुछ विकार भी आ गए हैं | प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति का राज्य करने का काल केवल कुछ वर्ष ही होता है, ऐसे में वे प्रजा के स्थान पर स्वयं का ध्यान अधिक रखने लगे हैं | प्रजा चाहे संकट झेल रही हो आज के प्रधानमंत्री अथवा राष्ट्रपति राजा शिवि जैसा उदाहरण प्रस्तुत करने में विफल रहे है।

               एक बार राजा शिवि जब यज्ञ कर रहे थे तब उनकी गोद में एक कबूतर आकर छुप गया | उसके पीछे उसका शिकार करने के लिए एक बाज पड़ा था | बाज ने राजा शिवि से अपने भोजन कबूतर को लौटने का कहा | तब राजा ने शरण में आये कबूतर की रक्षा करते हुए उसे सौंपने से मना कर दिया था |

        इधर कबूतर के जीवन का प्रश्न और उधर बाज की क्षुधापूर्ति का सवाल | ऐसे में एक राजा का कर्तव्य क्या हो सकता है ? राजा शिवि ने सोच-विचार कर उचित निर्णय लिया |

        शिवि ने बाज के समक्ष उस कबूतर के वजन जितना अपना मांस देने का प्रस्ताव रखा | तत्काल ही तराजू की व्यवस्था की गयी | एक पलड़े में कबूतर को बिठाया गया और दूसरे पलड़े में राजा शिवि अपने शरीर से काट-काट कर मांस रखते गए | परन्तु राजा के मांस से भी पलड़े बराबर नहीं हुए तो अंततः स्वयं शिवि उस पलड़े में बैठ गए | यह होता है, एक राजा का अपनी प्रजा के प्रति कर्तव्य |

       इंद्र ने राजा शिवि की परीक्षा लेने के लिए यह सब किया था | इस परीक्षा में राजा शिवि खरे उतरे | सही में राज-धर्म ऐसा ही होता है, जिसका पालन करना एक आदर्श राजा के लिए महत्वपूर्ण है |   

        एक वैश्य का धर्म क्या होता है ? जो वैश्य अपने धर्म का अनुसरण नहीं करता, वह वैश्य सोच करने योग्य होता है | वसिष्ठजी कहते हैं कि -

         सोचिअ बयसु कृपन धनवानू | 

      जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ||

      वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि उस वैश्य का सोच करना चाहिए जो धनवान होकर भी कंजूस है, जो आये अतिथि का सत्कार नहीं करता और जो शिव की भक्ति करने में कुशल नहीं है |   

      संसार में वैश्य वर्ण ही ऐसा वर्ण है जो धनोपार्जन में रत रहता है | वह बात और है कि आजकल सभी वर्ण के लोग धनोपार्जन में लगे हुए हैं। संचित धन की तीन गतियाँ बतलाई गयी है – दान, भोग और नाश | कंजूस वैश्य के धन की तीसरी गति होती है क्योंकि वह अपनी कृपण प्रवृति के कारण न तो धन का दान ही करता है और न ही उसका भोग कर पाता है | कंजूस धनवान को घर आया अतिथि भी एक बोझ लगता है | वह उसका यथायोग्य सत्कार इसी भय से नहीं करता कि कहीं धन में कमी न आ जाये | न ही वह परमात्मा की भक्ति में लग पाता है क्योंकि उसकी दृष्टि केवल धन के अर्जन और उसके संग्रह पर ही रहती है |

           धन आप चाहे जितना संग्रहित कर लें, वह आपके पास सदैव के लिए नहीं रह सकता | इसीलिए रहीमजी कहते हैं-

          पानी बाढे नाव में, घर में बाढे दाम |

          दोऊ हाथ उलीचिये, यही सयानो काम ||

       जिस प्रकार नाव में यात्रा की अवधि में पानी भरने लगे तो दोनों हाथों से भरकर पानी को नाव से बाहर उलीच देना चाहिए अन्यथा नाव का डूबना निश्चित है | इसी प्रकार अगर धन की वर्षा हो रही हो तो दोनों हाथों से उसका दान करते रहना चाहिए अन्यथा उसका एक दिन नाश होना निश्चित है |  दान धन की सर्वोत्तम गति है और भोग मध्यम गति है | धन को अगर दान में न दिया जाये और भोगा भी न जाये तो फिर एक न एक दिन उस धन का नाश होना निश्चित है |

    सोचनीय शूद्र कौन है ? वसिष्ठजी कहते हैं -

           सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी | 

          मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ||

      उस शूद्र का सोच करना चाहिए जो ब्राह्मणों का अपमान करता है, बहुत बोलता है और जिसे ज्ञान का अभिमान है |

         शूद्र वर्ण का कर्तव्य सेवा करना है | सेवा करने वाले व्यक्ति को अपने ज्ञान का घमंड कभी भी नहीं होना चाहिए | अभिमान सेवा करने में सबसे बड़ी बाधा है | इस संसार में ज्ञान सभी को है | वह बात और है कि यह ज्ञान किसी किसी में ही परिलक्षित होता है | ज्ञान का दिखावा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ज्ञान तो व्यक्ति के आचरण से स्वतः ही दिखलाई पड़ जाता है |

        शूद्र वही विचार करने योग्य है जो किसी ज्ञानी व्यक्ति का अपमान करता है | किसी के सामने अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना ही ज्ञान का अभिमान है | ज्ञान के माध्यम से दूसरे को नीचा दिखाना, उसका अपमान करना है | बहुत अधिक बोलने का अर्थ यह नहीं है कि वह व्यक्ति ज्ञानी है | ज्ञान कभी गुप्त रह ही नहीं सकता | वह तो आपके आचरण से सबके सामने स्वतः ही प्रकट हो जाता है | इसलिए कोई शूद्र अगर ज्ञानी हो और साथ ही साथ सेवाभावी भी हो तो ऐसा शूद्र प्रशंसनीय है |

       कौन सी नारी शोक करने योग्य है, इसको स्पष्ट करते हुए वसिष्ठजी कहते हैं-

         सोचिअ पुनि पति बंचक नारी | 

         कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ||

             उस स्त्री का सोच करना चाहिए जो पति को छलने वाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है |

          एक पतिव्रता स्त्री पति की विश्वासपात्र, प्रिय, शांत स्वभाव वाली और पति की आज्ञानुसार आचरण करने वाली होती है | जिस स्त्री में इन चारों में से एक भी गुण का अभाव होता है तो फिर ऐसी स्त्री शोक करने योग्य ही है | ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि आज नारी स्वतंत्रता के नाम पर स्त्री अपने पति की अवहेलना करने लग गयी है | गृहस्थी को सम्हालने के स्थान पर तथा आत्मनिर्भर होने के नाम पर वह नौकरी कर रही है | एक गृहस्थ के रूप में नारी केवल अपने पति के अधीन होते हुए भी स्वाधीन जीवन जीती है परन्तु कामकाजी स्त्री अपने कार्यस्थल पर बहुत से जनों के अधीन कार्य करते हुए अपनी वास्तविक स्वतंत्रता को खो रही है | इसको नारी स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता | कहा जाता है कि एक सुशील स्त्री के कारण दो घर सुधर जाते हैं परन्तु आधुनिक युग में तो नारी स्वतंत्रता के नाम पर प्रायः सभी घर उजड़ रहे हैं | ऐसी स्त्री वास्तव में सोच करने योग्य ही है |

       स्वामीजी की सोच उस समय की सोच है, जब स्त्रियों के घर से निकलने तक का विरोध किया जाता था। कहने का अर्थ है कि आज अगर सुसंस्कारित नारी बाहर नौकरी भी करती है तो उसके लिए ऐसा कहना उचित नहीं है।समस्या संस्कार के पालन न करने से होती है अन्यथा नारी तो अपने पति की प्रत्येक क्षेत्र में सहयोगिनी मानी गई है।

     नारी अगर धनोपार्जन हेतु नौकरी करते हुए भी स्वेच्छाचारी नहीं है अर्थात संस्कारों के विपरीत कोई कार्य नहीं करती है, तो वैसी नारी सोचनीय की श्रेणी में नहीं आती। पति परायण रहना और गृहस्थी को सम्हालना नारी के संस्कार है। स्वाभाविक लज्जा उसके आभूषण है। संस्कारों के अभाव से ही कलियुग में नारी की सोचनीय दशा होती जा रही है। अतः नारी का संस्कारित होना आवश्यक है ।

   ब्रह्मचारी की ओर संकेत करते हुए वसिष्ठ मुनि कह रहे हैं-

          सोचिअ बटु निज ब्रत परिहरई | 

          जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ||

          उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिए जो अपने ब्रह्मचर्य-व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञानुसार नहीं चलता |

         ब्रह्मचर्य जीवन की वह अवस्था है जब एक ब्रह्मचारी संयमित जीवन जीते हुए अपने गुरु के अधीन रहकर शिक्षा ग्रहण करता है | ब्रह्मचर्य का अर्थ है ब्रह्म जैसा आचरण। जीवन की इस प्रथम अवस्था में बचपन से ही ब्रह्म जैसा आचरण करना सिखाया जाता है।जो ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य व्रत को तोड़ देता है अर्थात असंयमित जीवन जीने लगता है वह जीवन में कभी भी ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकता | उसको ज्ञान प्राप्त होता है, अपने गुरु के माध्यम से | इसलिए गुरु का सम्मान करना उसका प्रथम कर्तव्य बनता है | 

        काकभुशुण्डिजी गुरु के आगमन पर भी अपने आसन पर बैठे रहे थे, उनके सम्मान में उठ खड़े नहीं हुए थे, इस बात का शंकर भगवान् को बुरा लगा था | काकभुशुण्डि का यह आचरण शंकर भगवान् से देखा नहीं गया और उन्होंने तत्काल ही उसे श्राप दे दिया था |  

        ऐसा ब्रह्मचारी जो गुरु का सम्मान नहीं करता और उनके आदेशों की भी अवहेलना करने लग जाता है वह अंततः पतन को ही प्राप्त होता है | वास्तव में ऐसे ब्रह्मचारी की दशा सोचनीय है |

    नारी और ब्रह्मचारी के बाद एक गृहस्थ पुरुष के बारे में भी वसिष्ठ जी का मत जान लीजिए -

             सोचिअ गृही जो मोह बस 

            करइ करम पथ त्याग |

            सोचिअ जती प्रपंच रत 

            बिगत बिबेक बिराग ||मानस-2/172||

           उस गृहस्थ का सोच करना चाहिए जो मोहवश अपने कर्म का त्याग कर देता है |  जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है, उसके कुछ कर्तव्य होते है, जिन्हें उसे निभाना पड़ता है | जीवन में गृहस्थी अपनाई है तो ऐसे में संसार का विस्तार होना भी स्वाभाविक है | अपनी पत्नी की सुरक्षा, अपने बच्चों का पालन-पोषण और उनकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करना आदि एक गृहस्थ के कर्तव्य-कर्म हैं | कर्तव्य-कर्म को बोझ समझना मोह है | जो अपने कर्तव्य-कर्म से विमुख हो जाता है ऐसा गृहस्थ विचार करने योग्य है |

          कर्म-मार्ग का त्याग करना किसी भी गृहस्थ के लिए उचित नहीं है | हाँ, कर्तव्य-कर्म पूर्ण हो जाने के बाद वह अपने जीवन में संन्यास का मार्ग अपना सकता है | जो व्यक्ति अपने गृहस्थ जीवन के कर्तव्य-कर्म से पलायन कर जाता है,वह भले ही कहीं पर भी चला जाये, अशांत ही रहेगा | ऐसा गृहस्थ सोचनीय है |

             आगे वसिष्ठ मुनि कहते हैं कि उस संन्यासी का सोच करना चाहिए जो संसार के प्रपंच में अभी भी फंसा हुआ है और ज्ञान तथा वैराग्य से हीन है | संन्यास का अर्थ है, संसार से मुक्त हो जाना और परमात्मा से जुड़ जाना | ऐसे में एक संन्यासी के लिए अपने जीवन में किसी भी प्रकार का कोई कर्तव्य नहीं रह जाता है | जिसने एक बार संन्यास मार्ग पर चलने का निर्णय कर लिया, फिर भी संसार के प्रपंच में लगा हुआ है, ऐसे संन्यासी का कल्याण नहीं हो सकता | संन्यासी के लिए महत्वपूर्ण दो बातें ही है - एक तो ज्ञान प्राप्त करना और दूसरा वैराग्यपूर्ण जीवन जीना | इसलिए एक संन्यासी को संसार में किसी भी प्रकार का राग नहीं रखना चाहिए |

          एक संन्यासी का जीवन सांसारिक जीवन से बिलकुल भिन्न होता है | उसको अपने पूर्व सांसारिक जीवन में किसी भी प्रकार की रुचि नहीं रखनी चाहिए | प्रायः देखा जाता है कि घर-बार छोड़कर व्यक्ति संन्यास तो ले लेता है परन्तु अपने पूर्व जीवन का चिंतन करते हुए अपने परिवार पर भी एक दृष्टि बनाये रखता है | ऐसा सन्यासी सोच करने योग्य है क्योंकि फिर उसकी दशा ‘माया मिली न राम’ वाली हो जाती है |

    गृहस्थ के बाद वानप्रस्थ अवस्था को प्राप्त हुए व्यक्ति के बारे में वसिष्ठ मुनि कह रहे हैं-

           बैखानस सोई सोचै जोगू | 

           तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ||

              वही वानप्रस्थी सोच करने योग्य है, जिसको तपस्या छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं | गृहस्थ जीवन के कर्तव्य से निवृत हो जाने पर वानप्रस्थ की अवस्था आती है | यह अवस्था तप करने की अवस्था है | जिसमें सभी प्रकार के विषय-भोग छोड़ देने होते हैं | परन्तु आज के युग में ऐसा प्रतीत होता है जैसे व्यक्ति के जीवन में वानप्रस्थ अवस्था कभी आती ही नहीं है | गृहस्थ जीवन के भोगों में ही व्यक्ति लगा रहता है और जीवन का संध्याकाल आ जाता है | फिर वह तपस्या ही क्या, कुछ भी करने योग्य नहीं रहता |

          सोचिअ पिसुन अकारण क्रोधी |

          जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ||

             सोच उसका करना चाहिए जो चुगलखोर है, अकारण क्रोध करता है तथा माता-पिता,गुरु एवं भाई बंधुओं से विरोध रखता है | चुगलखोर वह व्यक्ति होता है जो एक दूसरे के विरुद्ध बात करते हुए आपस में लड़ा तक देता है | इधर की बात उधर और उधर की बात इधर करने का उसका स्वभाव होता है | चुगलखोरी संसार में सर्वाधिक निंदनीय कार्य है |

        आज छोटी-छोटी बात पर व्यक्ति क्रोधित हो जाता है | क्रोध सामने वाले को तो किसी प्रकार की कोई हानि नहीं पहुंचा सकता पर क्रोधी को अवश्य इससे शारीरिक और मानसिक संताप उठाना पड़ता है | वसिष्ठ मुनि ने ऐसे ही क्रोधी व्यक्ति को शोक करने योग्य बताया है | इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने माता-पिता, गुरु और भाई-बंधू को प्रेम नहीं करता, उनका विरोध और अपमान करता है, वे भी सोच के योग्य हैं |

           सब बिधि सोचिअ पर अपकारी |

           निज तनु पोषक निरदय भरी ||

         सब प्रकार से उनका सोच करना चाहिए जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है | दूसरे को हानि पहुँचाना जिस व्यक्ति का उद्देश्य बन जाता है, वह व्यक्ति अपने जीवन में कभी भी प्रगति नहीं कर सकता | जो केवल अपने शरीर के ही पोषण में लगा रहता है वह बड़ा ही निर्दयी है | ऐसे व्यक्ति का कल्याण कैसे होगा? यह बात विचारणीय है |  

             सोचनीय सबहीं बिधि सोई | 

             जो न छाडि छलु हरि जन होई ||

              वह व्यक्ति तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता |

           वसिष्ठजी अंतिम और महत्वपूर्ण बात भरतजी को कहते हैं कि ऐसे मनुष्य का जीवन विचारणीय है जो सर्वोत्कृष्ट मनुष्य जीवन पाकर भी हरि की आराधना नहीं करता है बल्कि जीवन भर संसार में छल-कपट करने में ही लगा रहता है | मनुष्य जीवन का एक मात्र उद्देश्य है-आत्म-बोध अर्थात परमात्मा को प्राप्त करना | हरि को जानना है तो हरि की भक्ति करना आवश्यक है |

          संसार से मुक्त होकर हरि के साथ भक्त होना ही हरि को जानना है और यही आत्म-ज्ञान है | इसके लिए सभी प्रकार के छल-कपट से दूरी बनानी होगी | दो नावों में एक साथ सवारी कभी भी नहीं हो सकती | संसार छल-कपट से भरा हुआ है, इसीलिए वह लुभावना प्रतीत होता है | संसार के आकर्षण को छोड़कर परमात्मा की ओर उन्मुख होने में ही मनुष्य का कल्याण निहित है |

         जब दशरथ का पुत्र-वियोग में मरण हो गया तब भरतजी के मन में भी एक सोच ने जन्म लिया था | उस अत्यधिक सोच-विचार के कारण भरत भी बड़े दुखी और शोकग्रस्त हो गए थे | तब मुनि वसिष्ठ ने उनका शोक दूर करने की लिए क्या कहा था ? गोस्वामीजी लिखते हैं-

   सुनहु भारत भावी प्रबल,

   बिलखि कहेउ मुनिनाथ |

   हानि लाभु जीवनु मरनु, 

   जसु अपजसु बिधि हाथ ||मानस-2/171||

    वसिष्ठजी दुखी मन से कहते हैं कि हे भरत ! सुनो, भावी बड़ी प्रबल है | हानि-लाभ, जीवन-मरण और यश-अपयश, ये सब विधाता के हाथ है | 

          वसिष्ठजी मानस में भरतजी को कहते हैं कि सोचो और विचार करो कि दशरथ के मरने का दोष किसको दिया जाये ? क्या दशरथ के मरण का दोष कैकई को दिया जाय, जिसके वर मांगने से अयोध्या का परिदृश्य एक ही रात में बदल गया था अथवा इसका दोष राजा के पुत्र-मोह को दिया जाय जो राम के वन चले जाने से उत्पन्न हुए आघात को तनिक भी सहन नहीं कर सके | आखिर इसका दोष किसे दिया जाय ?

           वसिष्ठ मुनि भरत को पूछ रहे हैं कि क्या केवल कैकेई के दो वर ही दशरथ के मरण के कारण बने हैं ? नहीं, जिस माता कैकेयी को तुम अपने पिता के मरने का कारण मान रहे हो, वह अनुचित है | संसार में जितनी भी घटनाएँ घटित होती हैं, उनमें से प्रत्येक घटना परमात्मा के द्वारा पूर्व नियोजित होती है और उनका होना निश्चित है | प्रत्येक घटना के घटित होने के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है और वह घटना सबके हित में ही घटित होती है | घटना घटित होने के बाद हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे विधि ने हमारे साथ अन्याय किया है | इस संसार में कोई किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता, सब प्रकृति के नियमानुसार ही घटित होता है |

       वसिष्ठजी आगे कहते हैं कि इस बात के लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता और फिर दशरथ तो सोच करने योग्य है ही नहीं | उन जैसा राजा न तो अब तक कोई हुआ है, न है और न ही अब होने को है | अवधपति दशरथ ने अपने जीवन में प्रजा की भलाई के लिए ही कार्य किये हैं । अतः हे भरत ! सुनो, तुम्हें उनके मरने पर तनिक भी शोक नहीं करना चाहिए |

           त्रेता से अब चलते है द्वापर में। भरत की तरह ही द्वापर में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन भी एक काल्पनिक संसार में खोकर शोकग्रस्त हो गया था | किसी छोटी सी बात पर अत्यधिक विचार करने से भी मनुष्य अपने भीतर एक काल्पनिक संसार को रच लेता है | फिर उसे वही दिखलाई पड़ता है, जैसा वह देखना चाहता है | अर्जुन द्वारा युद्ध के बारे में किये गए अत्यधिक सोच-विचार ने ही उसे अवसाद की दशा में ला खड़ा कर दिया जो कि उसके विषाद का कारण बना |

         प्रश्न उठता है कि क्या किसी व्यक्ति, किसी कार्य, किसी विषय अथवा किसी घटनाक्रम पर किसी भी प्रकार के विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है ? नहीं, ऐसा सोचना भी अनुचित है | बिना सोच-विचार के निर्विचार की अवस्था तक पहुंचा ही नहीं जा सकता | इसलिए सोच-विचार करने की आवश्यकता प्रत्येक परिस्थिति में रहती ही है | बस, हमें इस बात का ज्ञान हो जाना चाहिए कि किस विषय पर कितनी सीमा तक विचार करने की आवश्यकता है | अनावश्यक रूप से और एक सीमा से अधिक सोचना ही मनुष्य को अर्जुन और भरत की तरह विषादग्रस्त कर देता है |

        संसार में प्रतिपल लाखों घटनाक्रम घटित होते हैं, क्या हम सभी पर विचार करते हैं ? नहीं, हम स्वयं से सम्बंधित व्यक्तियों, विषयों और कार्यों पर ही अधिक विचार करते हैं | कई बार हम ऐसे ऐसे विषयों पर विचार करने लगते हैं, जिनका हमसे दूर दूर का सम्बन्ध ही नहीं होता | ऐसे प्रत्येक विचार से दूरी बनाना आवश्यक हैं | इनमें राजनैतिक विषय प्रमुख है, जिस पर एक आध्यात्मिक चिन्तक के लिए सोचना भी निरथर्क है |

   विचार क्या है ? मुख्य रूप से विचार किसी उद्देश्य और उस उद्देश्य की पूर्णता के लिए किए जाने वाले कर्म के मध्य की एक प्रतिक्रिया मात्र है। यह प्रतिक्रिया परिणाम निकलने के पहले अथवा उसके बाद में हो सकती है।कहने का अर्थ है कि कार्य प्रारंभ करने से पहले उसके संभावित परिणाम  की कल्पना करने अथवा किसी कार्य अथवा घटना के हो जाने के बाद, मस्तिष्क में जो आवेग उत्पन्न होता है, वह आवेग ही विचार का जनक है। 

            चिंता, शोक, दुःख आदि के पीछे मन में उठने वाले विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है | इन विचारों पर मंथन बुद्धि करती है।इस प्रकार कहा जा सकता है कि मन और बुद्धि की भूमिका विचार करने में है। ये दोनों ही जड़ प्रकृति के हैं। जड़ से चेतन तक नहीं पहुंचा जा सकता,अतः विचारों से आगे निकल जाना आवश्यक है, तभी इस मनुष्य जीवन का कुछ अर्थ है।

       विचारों के आधार पर मनुष्य को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है | पहली श्रेणी उन मनुष्यों की है जिनके मन में किसी कार्य के परिणाम पर गहराई से सोचने का विचार ही जन्म नहीं लेता | यह बुद्धिहीन लोगों की श्रेणी है, उनकी बुद्धि कुंद है। इन लोगों के भीतर विचार जन्म ही नहीं लेते।ऐसे मनुष्य को मनुष्य न कहकर पशु-पक्षी ही कहा जा सकता है | यह मनुष्य की विचारहीनता की अवस्था है |

          कुंद बुद्धि का अर्थ है जब बुद्धि में एक बात जच जाए फिर उसी पर टिके रहना, उस पर किसी प्रकार का विचार न करना । यह प्रथम श्रेणी ऐसे ही विचारहीन मनुष्यों की श्रेणी है, जिसमें किसी बात पर किसी कार्य के परिणाम पर विचार ही नहीं किया जाता | 

       दूसरी श्रेणी में वे मनुष्य आते हैं जिनके भीतर कार्य के परिणाम पर विचार जन्म लेते हैं, इसलिए वह अपने भीतर कार्य के परिणाम को लेकर बहुत अधिक चिंतन और मनन करने लगता है | ऐसे लोगों की बुद्धि तेज होती है।अत्यधिक चिंतन मनन करने से वह "क्या करूं, क्या न करुं", इस द्वंद्व का शिकार बन जाता है, जैसा कि कुरुक्षेत्र में अर्जुन के साथ हुआ था | यह मनुष्य की वैचारिक या विचारशील (Thoughtfulness) अवस्था है |

          तीसरी श्रेणी में वे मनुष्य आते हैं, जिनके भीतर विचार तो जन्म लेते हैं, उन विचारों के अनुसार भीतर चिंतन-मनन भी होता है फिर भी वे चिंता और शोकग्रस्त नहीं होते क्योंकि विचार करते करते एक अवस्था ऐसी आती है जब उन्हें विचार करना भी व्यर्थ लगने लगता है।कहने का अर्थ है कि इस स्थिति में बुद्धिमान व्यक्ति बुद्धि का अतिक्रमण कर जाता है। अंततः वे विचार करने की अवस्था से स्वयं को अलग कर लेते हैं | यह मनुष्य की निर्विचार (Thoughtlessness) की अवस्था है | इस अवस्था में मनुष्य वैचारिक अवस्था तक पहुँचता तो है, परन्तु वहाँ पहुंचकर उसे आभास हो जाता है कि किसी विषय पर इतना अधिक विचार करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है ।

       बुद्धि का अतिक्रमण किये बिना जीवन की वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। यह पूर्ण होश की अवस्था है जहां बुद्धि होते हुए भी बुद्धि का अनर्गल उपयोग नहीं है।श्री कृष्ण इस सीढ़ी पर हैं और वे अर्जुन को भी खींचकर अपनी अवस्था में लाना चाहते हैं।

         प्रथम श्रेणी (विचारहीन) और तीसरी श्रेणी (निर्विचार) एक सी प्रतीत अवश्य होती है परंतु दोनों में गुणात्मक अंतर बहुत है।प्रथम श्रेणी का मनुष्य तीसरी श्रेणी में नहीं जा सकता क्योंकि विचारहीन अवस्था से निर्विचार की अवस्था में जाना संभव ही नहीं है क्योंकि वह किसी भी बात अथवा विषय पर तनिक भी विचार करने की क्षमता खो चूका है | या तो ऐसे लोगों में बुद्धि नहीं है या वह कुंद हो चुकी है। जब उनमें बुद्धि का अभाव है तो फिर उसके अतिक्रमण करने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

        परन्तु दूसरी श्रेणी (विचारशील) का मनुष्य तीसरी श्रेणी (निर्विचार) में अवश्य ही ले जाया जा सकता है | वैचारिक अवस्था से बुद्धि से परे जाकर  निर्विचार की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है | महाभारत का दुर्योधन प्रथम श्रेणी का मनुष्य है तभी तो वह युद्ध के लिए आमादा है | ऐसा व्यक्ति बुद्धि का जरा सा भी उपयोग नहीं कर पाता। दुर्योधन युद्ध की विभीषिका के बारे में जरा भी विचार नहीं कर रहा है | वह युद्ध जैसे कार्य के बारे में विचारहीन है | प्रत्येक युद्ध चुनौती है परंतु उस चुनौती का परिणाम क्या होगा, इस पर विचार करना भी आवश्यक है।

         अर्जुन दूसरी श्रेणी का मनुष्य है, जो युद्ध भूमि में अपने सम्मुख खड़े युद्ध को देखकर, जिसको टालना अब लगभग असंभव है फिर भी उसकी विभीषिका के बारे में विचार तो कर रहा है | वह एक वैचारिक मनुष्य है |उसकी बुद्धि सोचने समझने लायक है। जब ऐसा मनुष्य एक सीमा से अधिक चिंतन मनन करता है तब वह अवसाद और विषादग्रस्त हो सकता है | जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ था | अर्जुन को अगर सही दिशा मिले तो वह बुद्धि के पार जा सकता है। यह तो अच्छा हुआ कि उसे श्री कृष्ण जैसा गुरु मिला जिसने उसको वैचारिक स्थिति से निर्विचार की अवस्था में लाकर खड़ा कर दिया अन्यथा अर्जुन तो युद्ध से लगभग पलायन कर ही गया था |

      एक छोर पर दुर्योधन खड़ा है, दूसरे छोर पर श्री कृष्ण और दोनों के मध्य खड़े हैं, अर्जुन। अर्जुन दोनों में से किसी एक छोर पर अवश्य ही जाएगा। श्री कृष्ण जैसे गुरु मिलें है तो निर्विचार के छोर पर जाना निश्चित है।

     अर्जुन दो किनारों के मध्य में खड़ा है। विचारशील व्यक्ति बहुत संकल्प-विकल्प करता है। हथियार चलाने में संकल्प-विकल्प की कोई भूमिका नहीं होती। युद्ध के लिए या तो दुर्योधन की तरह विचारहीन होना होगा अथवा श्री कृष्ण की तरह निर्विचार की अवस्था वाला। वैचारिक मनुष्य तो केवल विचार ही कर सकता है, युद्ध नहीं।अर्जुन भी बहुत विचार कर रहा है और युद्ध से पलायन को ही सर्वश्रेष्ठ मान रहा है। देखते हैं, आगे भगवान श्री कृष्ण क्या करते हैं?

            भगवान् श्री कृष्ण ने युद्ध की विभीषिका के प्रति अर्जुन के विचार को पूर्ण रूप से धैर्य रखते हुए सुना और समझा | यही कारण है कि गीता के प्रथम अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण एक भी शब्द नहीं बोलते हैं | सब कुछ जानकर अर्जुन की दशा को समझकर ज्ञान की धारा को प्रवाहित करते हुए गीता के दूसरे अध्याय के प्रारम्भ में ही भगवान् श्री कृष्ण उसे कह देते हैं-

       अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |

        गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ||गीता-2/11||

       अर्थात अर्जुन ! तूने शोक न करनेयोग्य बात का शोक किया है और विद्वता भरी बातें कर रहे हो | जिनके प्राण चले गए हैं और जिनके प्राण नहीं गए है, उनके लिए पण्डित जन शोक नहीं करते |

       अर्जुन ने अपने सम्मुख खड़े युद्ध को देखा | उसने दोनों सेनाओं के मध्य खड़े होकर देखा कि मरने वाले और मारने वाले, दोनों एक ही परिवार के सदस्य हैं | फिर ऐसे युद्ध से क्या लाभ ? इस युद्ध के परिणाम में अगर जीत मिलेगी तो भी दुःख होगा और अगर पराजय मिलेगी फिर तो दुःख मिलना अवश्यम्भावी ही है |

   क्या दोनों ओर की सेनाओं में केवल अर्जुन के ही सम्बन्धी थे, दुर्योधन के नहीं थे ? सम्बन्धी तो दोनों के ही एक दूसरे के विरुद्ध खड़े थे परंतु दुर्योधन तो विचारहीन अवस्था में है।वह भला युद्ध के परिणाम पर विचार क्यों करे?उसकी तो बुद्धि एक ही बात कह रही थी कि एक सूई की नोक जितनी जमीन भी पांडवों को नहीं देनी है।कुंद हुई बुद्धि की दशा परिवर्तित नही की जा सकती। बुद्धि की दशा परिवर्तित होते ही तो विचारों को दिशा मिल जाती है।

        विचार से अधिक महत्वपूर्ण विचार की दिशा है | तामसिक प्रवृति का व्यक्ति विचारहीन होता है अर्थात उसके मन में किसी प्रकार का कोई विचार जन्म ही नहीं लेता | अगर कभी कोई विचार जन्म ले भी लेता है तो वह अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर उस पर मनन तक नहीं करता | सात्विक प्रवृति के व्यक्ति के मन में बहुत से विचार जन्म तो लेते हैं परन्तु उन विचारों पर मनन करते करते उसको विचार करना तथ्यहीन प्रतीत होता है और एक दिन वह निर्विचार की अवस्था को उपलब्ध हो जाता है | समस्या तो राजसिक प्रवृति वाले के व्यक्ति के साथ सबसे अधिक है, जिसके विचारों का कोई अंत ही नहीं है |

        विचार राजसिक प्रवृति के व्यक्ति को सर्वाधिक हानि पहुंचाते हैं | वह किसी भी घटना के बारे में बहुत अधिक सोचने लगता है, जैसा कि भरत के साथ हुआ था अथवा फिर वह किसी कार्य के संभावित परिणाम पर बहुत सोचता है, जैसा कि अर्जुन ने किया था | दोनों ही परिस्थितियों में वह मानसिक अवसाद और विषाद का आसान शिकार बन जाता है, जो उसके जीवन को प्रभावित करता है ।

          इस प्रकार स्पष्ट है कि बहुत अधिक सोच-विचार करने से शोक और विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है | साथ ही यह भी स्पष्ट है कि निर्विचार की स्थिति को प्राप्त कर लेने से शोक और चिंता दूर हो सकती है | महर्षि पतंजलि ने अपने अष्टांग-योग में योग का एक अंग "ध्यान" भी बताया है | ध्यान-योग से निर्विचार की अवस्था उपलब्ध हो सकती है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है | परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह एक सुगम साधन नहीं है |

        अब प्रश्न उठता है कि क्या ज्ञान से शोक दूर किया जा सकता है ? ज्ञान और ध्यान-योग के सम्बन्ध में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –

   शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया |

   आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ||गीता-6/25||

    अर्थात धैर्ययुक्त बुद्धि के द्वारा संसार से धीरे-धीरे उपराम हो जाएँ और मन-बुद्धि को परमात्मा में सम्यक प्रकार से स्थित करके फिर किसी भी प्रकार का चिंतन न करें | इस प्रकार प्रयास करने से निर्विचार की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है |

          गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म, ज्ञान और भक्ति-योग के माध्यम से अर्जुन को शोक और विषाद की अवस्था से बाहर निकाला और कह दिया कि ‘मा शुचः’ अर्थात तू किसी प्रकार का शोक या चिंता न कर | सम्पूर्ण गीता में दो ही स्थान पर ‘मा शुचः’ आया है | 

       गीता एक राजसिक प्रवृति वाले व्यक्ति अर्जुन को कही गयी है | इसका तात्पर्य है कि राजसिक व्यक्ति के लिए शोक और चिंता से मुक्त होने के लिए, निर्विचार होने के लिए ध्यान-योग से महत्वपूर्ण दो अवस्थाएं और भी हैं, जिनके लिए ‘मा शुचः’, इन दो शब्दों को उपयोग में लिया गया है | 

            प्रथम अवस्था, दैवी सम्पदा की अवस्था है जिसको स्पष्ट करते हुए गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं –

    दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता |

    मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोSसि पाण्डव ||16/5||

               अर्थात दैवी सम्पति मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पति बंधन के लिए मानी गयी है | हे पाण्डव ! तुम दैवी सम्पति को प्राप्त हुए हो, इसलिए तुम शोक मत करो |     

           अपने में दैवी सम्पति की वृद्धि करते रहने से व्यक्ति धीरे-धीरे सभी प्रकार के विचारों से दूर होता चला जाता है | दैवी सम्पति कौन कौन सी है? इसको गीताजी के 16 वें अध्याय के प्रथम चार श्लोकों में स्पष्ट किया गया है |

          दैवी सम्पति से युक्त मनुष्य जीवन में अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में सम रहता है | इसलिए उसके विचलित होकर शोकग्रस्त और चिन्तायुक्त होने का प्रश्न ही पैदा नहीं होता | इसलिए निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने के लिए दैवी सम्पति से सदैव युक्त रहना आवश्यक है |

         निर्विचार होने की दूसरी व्यवस्था, परमात्मा के शरणागत हो जाने की है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं –

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

   अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||18/66||

    अर्थात सभी धर्मों (कर्तव्य कर्मों) के आश्रय का त्याग कर केवल एक मेरी शरण में आजा, मैं तुम्हें सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत कर |

            राजसिक प्रवृति का व्यक्ति किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणाम पर गहराई से विचार करता है | उस विचार के अनुसार ही वह परिणाम स्वरुप मिलने वाले पाप और पुण्य की गणना करता है |देखा जाए तो पाप और पुण्य का अस्तित्व केवल मानसिक विचार के कारण ही है। वास्तव में कर्म-योग के अनुसार कर्म करने से सभी कर्म पाप और पुण्य से परे हो जाते हैं। 

       एक परमात्मा की शरण में चले जाने से व्यक्ति निश्चिन्त हो जाता है, निशोक हो जाता है, निर्भय हो जाता है और निशंक हो जाता है | इन चारों अवस्थाओं को प्राप्त कर लेने वाले व्यक्ति के मन में फिर किसी भी प्रकार के विषय पर विचार और मनन करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है । इस प्रकार भविष्य में फिर कोई विचार तक मन में जन्म ही नहीं लेगा |ऐसे में पाप और पुण्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता। यही व्यक्ति की निर्विचार की अवस्था है |

        सभी प्रकार के शोक और चिंता से मुक्त होने के लिए एक परमात्मा की शरण में चले जाना ही सुगम और सर्वश्रेष्ठ मार्ग है | अन्य सभी मार्गों में विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है परन्तु भगवान् की शरण लेने में किसी भी प्रकार के प्रयास की कोई आवश्यकता नहीं होती | जब आप अपने जीवन की बागडोर परमात्मा को सौंप देते हैं, तब आपके समस्त कार्य बिना किसी विचार करने के ही संपन्न हो जाते है |  

            परमात्मा के शरण होने का अर्थ है, परमात्मा की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देना | ऐसा कर लेंगे तो फिर किसी भी परिस्थिति में आप विचलित नहीं हो सकते | फिर किसी कार्य के परिणाम पर, किसी घटना, किसी विषय आदि पर किसी प्रकार का विचार करने की कोई  आवश्यकता ही नहीं होगी | हाँ, यह बात अवश्य है कि परमात्मा पर श्रद्धा और विश्वास किये बिना शरणागत हो जाना असंभव है | अतः एक परमात्मा पर ही पूर्ण विश्वास रखना महत्वपूर्ण है | जितने भी महान संत और भक्त हुए हैं, उनके जीवन का सपूर्ण भार परमात्मा ने अपने ऊपर लिया है |  

     गीता में भी भगवान् कहते हैं –

       अनन्यश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते |

      तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || (9/22)

अर्थात जो अनन्य भक्त मेरा चिंतन करते हुए मेरी भलीभांति उपासना करते हैं, मुझमें निरंतर लगे हुए उन भक्तों का योगक्षेम अर्थात अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा मैं करता हूँ |

   इसलिए अगर विचार और चिंतन करना है तो केवल परमात्मा का करें | तभी ‘मा शुचः’ सही मायने में सिद्ध होगा ।

 सार-संक्षेप

          ‘मा शुचः’ अर्थात शोक न करो, से तात्पर्य है कि किसी भी विषय पर अधिक चिंतन न करो | ऐसा चिंतन व्यर्थ का चिंतन है | व्यर्थ का चिंतन ही चिंता और शोक का कारण बनता है | त्रेता में दशरथ के मरने पर भरतजी शोकग्रस्त होकर उनके मरने के कारणों पर विचार कर रहे हैं | यह घटना के घटित हो जाने के पश्चात् की वैचारिक अवस्था है | इधर द्वापर में अर्जुन भविष्य में घटित होने जा रही संभावित घटना पर विचार करते हुए शोकमग्न हो रहा है | यह भविष्य में होने वाले संभावित घटनाक्रम पर किये जाने वाली वैचारिक अवस्था है | दोनों ही अर्थात भूत और भविष्य की अवस्थाओं पर विचार करना किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता | व्यक्ति को सदैव  वर्तमान में रहते हुए तात्कालिक विषय पर ही किसी प्रकार का विचार करना चाहिए जैसा कि वसिष्ठजी ने भरत को मानस में बतलाया है |

         विचारहीन होने से अच्छा है, विचारवान होना | विचारहीन मनुष्य और पशु में कोई अंतर नहीं है | हम प्रायः विचारहीन अवस्था को ही निर्विचार होना मान लेते हैं जोकि अनुचित है | विचारहीन व्यक्ति विचारशून्य नहीं हो सकता | विचारशून्य विचार उत्पन्न होने के बाद ही हुआ जा सकता है जैसा कि अर्जुन के साथ हुआ था | वैचारिक व्यक्ति को विचारशून्य की अवस्था में ले जाया जा सकता है विचारहीन व्यक्ति को नहीं |

       निर्विचार की अवस्था के लिए ध्यान-योग है परन्तु इसमें विशेष प्रयास करना पड़ता है | परमात्मा की शरण होना, निर्विचार की अवस्था को प्राप्त करने का सर्वोत्तम मार्ग है, जिस पर चलकर ही अर्जुन ने कुरुक्षेत्र का महाभारत अपने नाम कर लिया था | इसलिए जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है, एक परमात्मा की शरण लेकर निर्विचार हो जाना |

प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||