Thursday, March 7, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-11

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-11
     रामकथा के एक प्रेमी में और हनुमान में, दोनों में कोई विशेष अंतर नहीं है। वह भी ऐसे विरह प्रसंग को सुनकर ही भाव विह्वल हो जाता है। हनुमान को तो सत्य का अनुभव हो गया।आज फिर एक बार उसने प्रभु को विस्मृत कर दिया था।'प्रभु पहिचान परेउ गहि चरना।सो सुख उमा जाहि नहीं बरना।।' भक्त भगवान के चरणों में गिर पड़ा । भक्त और भगवान में यही अंतर है। भगवान मनुष्य रूप में आकर भी स्वयं को नहीं भूलते हैं और भक्त बार बार स्वयं को भूल जाता है। हमारी दशा तो हनुमान से भी खराब है।हम भी लीला की कथा सुनकर राम को मनुष्य समझने लगते हैं ।राम और सीता, दोनों ही न तो कभी व्यथित हुए थे और न ही कभी हो सकते।वे तो व्यथित होने का नाटक कर रहे थे। लखन और हनुमान दोनों सीता के दुःख को अनुभव कर दुःखी हुए थे परंतु जाकर सीता को पूछो जरा। क्या वह किञ्चित मात्र भी दुःखी हुई थी?'केहि अपराध नाथ हौं त्यागी' सीता की छाया ही कह सकती है क्योंकि वास्तविक सीता तो उस समय अग्नि में समाहित थी। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर उस समय अशोक वाटिका में छाया सीता के स्थान पर वास्तविक सीता भी होती तो वह हनुमान को कभी ऐसा कहती ही नहीं।
         हम कथा को सुनकर सीता के साथ हुए व्यवहार से दुखी हो सकते हैं क्योंकि हम उनको हमारी ही तरह के मानव समझते हैं।जब संसार में दुःख सुख नाम की कोई चीज है ही नहीं, तो फिर हम सुखी दुःखी क्यों हों? हमारा मन ही हमें सुखी दुःखी करता है अर्थात सुख और दुःख केवल मन की अवस्था है, आत्मा की नहीं। जब हम आत्मिक स्तर पर कथा के घटनाक्रम को देखेंगे तो अनुभव करेंगे कि जो कुछ पूर्व नियोजित था, वही तो हो रहा था। जब नाटक में कलाकार दरिद्र होने की भूमिका निभाता है, तब वह केवल मंच पर ही दरिद्र बना रहता है, मंच से उतर जाने के बाद नहीं।दर्शक उसकी भूमिका की सराहना करते हैं क्योंकि वे उस कलाकार के वास्तविक स्वरूप से परिचित होते हैं।हमें भी परमात्मा के मानव रूप के अभिनय को मात्र अभिनय ही समझना चाहिए और सदैव उस अभिनय के पीछे का उद्देश्य जानना चाहिए। हमें रामकथा को सुनकर विभोर (delighted) होना सकते हैं।हाँ, कभी कभी विह्वल(over whelmed) भी हुआ जा सकता है परंतु विकल(discomfort) तो कभी भी नहीं होना चाहिए।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Wednesday, March 6, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-10

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-10
          लक्ष्मण तो राम के छोटे भाई होने के साथ साथ उनकी शैया (शेषनाग)भी थे। क्षीरसागर में ही तो हरि शेषनाग पर शयन करते हैं । लक्ष्मण तो थोड़े से समझाने से शीघ्र ही समझ गए परंतु हनुमान,वे तो मनुष्य न होकर एक वानर थे।इतनी जल्दी कैसे समझ सकते थे।दिन रात सीता के वन में वाल्मीकि आश्रम में दुःखी रहने की कल्पना कर कर रोते रहते।राम सोचते, "कैसा बावला भक्त है? भगवान पास है और भगवान की माया को खोकर रो रहा है। मायापति के पास होते हुए भी माया के ओझल हो जाने पर रो रहा है।मायापति तो सदा के लिए है, माया का तो आना जाना लगा ही रहता है। आते जाते रहने वाली माया के आगमन पर क्या तो खुश होना और उसके चले जाने पर क्या विलाप करना?" भगवान से भक्त का रोना अधिक देर तक नहीं देखा जा सकता। पहुंच गए भक्त के पास। हनुमान रोते हुए चरणों में गिर पड़े ।"भगवान, यह क्या कर दिया?एक धोबी के कहने मात्र से माता को वन में भेज दिया। मैं अपनी माता का वियोग सहन नहीं कर सकता।मेरे जीवन में ऐसा होना वज्रपात होने से किसी भी प्रकार से कम नहीं है।मैं अपनी माता को तपस्वी वेश में एक बार फिर से नहीं देख सकता।एक पति अपनी पत्नी के प्रति जिसका कि कोई दोष न हो,ऐसे निष्ठुर कैसे हो सकता है?"
      भगवान ने अपने प्रिय भक्त को उठाकर गले से लगाया और फिर उसका सिर अपनी गोद में रख सहलाने लगे। जब हनुमान कुछ शांत हुए तो बोले- "हनुमान! तुम्हें याद है न, मैंने तुम्हें एक बार पूछा था कि तुम कौन हो और मैं कौन हूँ?"
'हाँ याद आया, पूछा था। परंतु आज उस बात को याद दिलाने से क्या लाभ प्रभु?'
"तुम भूल गए थे, इसलिए आज पुनः याद दिलाना मैंने आवश्यक समझा है।तुमने कहा था न कि स्थूल दृष्टि से आप मनुष्य हैं मैं एक वानर हूँ, आप प्रभु हैं मैं आपका सेवक हूँ।सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो मैं आपका अंश हूँ और आप अंशी। अगर कारण दृष्टि से देखें तो जो आप हैं वही मैं हूँ, आपमें और मेरे में कोई अंतर नहीं है।"
हनुमान बोले, 'हाँ, याद आया, यही कहा था प्रभु।क्या उस समय मेरा यह कहना उचित नहीं था जो आज याद दिला रहे हो?'
"नहीं, तुमने उस समय तो सब कुछ उचित ही कहा था परंतु उस कहे को अपने जीवन में न अपनाकर तुम आज बहुत अनुचित कर रहे हो। जो मैं हूँ वही तुम हो तो फिर सीता के वन में जाने पर तुम व्यथित क्यों हो रहे हो? मैं तो जरा भी व्यथित नहीं हो रहा हूँ। बाहर से तुम्हें मैं व्यथित प्रतीत हो सकता हूँ परंतु भीतर से नहीं हूँ। तुम बाहर और भीतर दोनों ही ओर से व्यथित हो रहे हो। बात को समझो, वास्तव में न तो कोई वन में गया है और न ही किसी ने किसी को वन में भेजा है। यह तो केवल लीला संवरण करने के लिए मेरे ही द्वारा की जा रही एक लीला है।"
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Tuesday, March 5, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-9

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-9
           लखन और हनुमान भी भगवान राम की लीला देखकर कुछ समय के लिए भ्रमित हो जाते हैं।भक्त हैं दोनों भगवान के परंतु साथ ही साथ मनुष्य और वानर भी तो है।भला एक व्यक्ति अपनी भाभी को भाई के कहने पर वन में छोड़ आने के आदेश पर प्रश्न कैसे नहीं करेगा?एक भक्त अपनी माता को वन में जाते हुए देखकर अपने भगवान की ओर व्यथित होकर क्यों नहीं देखेगा?यही तो आज लक्ष्मण और हनुमान के साथ हुआ है। "नहीं, मैं नहीं कर सकता ऐसा?" लखन ने कहा।राम ने लखन को समझाया।" त्रेता में मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ, अतः मेरी आज्ञा का पालन करो। द्वापर में तुम बन जाना,मेरे बड़े भाई। तब मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूंगा । द्वापर दरवाजे पर खड़ा है, चलो जल्दी करो मेरे भाई। तुरंत सीता को वाल्मीकि आश्रम छोड़ आओ।" त्रेता-द्वापर, बड़ा-छोटा, क्या कह रहे हैं भाई, किस युग की और किस लोक की बात कर रहे हैं ?अचानक एक बिजली सी कौंधी और जैसे लखन की स्मृति लौट आई हो। इसी के साथ लक्ष्मण एक झटके से आ जाते हैं, आसमान से जमीन पर।"हे भगवान! मैं भी शेष का अवतार होते हुए भी मनुष्य की तरह व्यवहार क्यों करने लग गया था? एक ये महापुरुष हैं जो मनुष्य राम होकर भी अपने मूल स्वरूप को नहीं भूले हैं।मेरे इस भ्रम का निवारण भी इन्होंने मेरी धृष्टता क्षमा करते हुए द्वापर में मुझे अपना बड़ा भाई बनाकर किया है।क्षमा कर दें प्रभु! मैं ही भ्रम में था,आप नहीं।इस जन्म में तो क्या, मैं तो सदैव ही आपकी आज्ञा का पालन करूंगा, द्वापर में दाऊ होकर भी।" समझ गए लखन, राम जो भी कर रहे हैं सीता को वनवास देकर, सब कुछ लीला है इनकी, नाटक है इनका, सत्य से कोसों दूर।सीता को राम से आज तक कोई अलग कर पाया है भला। प्रकृति पुरुष से दूर हो ही नहीं सकती। दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर टिका हुआ है।पुरुष के बिना प्रकृति कुछ भी नहीं है और प्रकृति के अभाव में पुरुष भी व्यक्त नहीं हो सकता। वाह!क्या लीला है प्रभु आपकी?
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, March 4, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-8

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-8
    कहने का अर्थ है कि हमारे सभी कर्म भले ही उनको हम किसी भी कारण से कर रहे हों,अंततः उनका फल हमें ही भुगतना है,चाहे वह फल सुख दे अथवा दुःख।परमात्मा ऐसी व्यवस्था कर देते हैं कि जहाँ, जिससे, जिसको और जैसा फल भुगतना अथवा भुगताना होता है, येन केन प्रकारेण वह, वहाँ पहुंच ही जाता है।हमारे हाथ में फल भुगतना अथवा भुगताना है ही नहीं, वह तो प्रकृति और परमात्मा के हाथ है।हमारे हाथ में दुःखी अथवा सुखी होने के अलावा एक और बात है, वह है फल के रूप में मिलने वाले सुख-दुःख को सहन करते हुए उसके प्रभाव को देखना।इससे हम सुख में ज्यादा उछलने नहीं लगेंगे और दुख में अधिक व्यथित भी नहीं होंगे।राम और सीता ने केवल दुःख के प्रभाव को देखा, इसी कारण से वे अपने जीवन में सहज रह सके। कल राज तिलक होना है,तो भी ज्यादा खुश नहीं।राज के बदले प्रातः काल वनवास मिल गया तो दुःखी भी नहीं हुए।
        राम कथा में घटना आती है गर्भवती सीता के वनवास की। अपने शेष बचे मानव जीवन को एक परित्यक्ता का जीवन जीने के लिए विवश हुई सीता की कथा। राम रावण का वध कर लौटते हैं अयोध्या।राज्याभिषेक हो जाता है।एक धोबी के कथन पर सीता का परित्याग कर दिया जाता है। उसे केवल त्यागा ही नहीं गया बल्कि त्याग कर वनवास भी दे दिया गया, वन में वाल्मीकि आश्रम में भेज दिया गया।क्यों? क्या राम के लिए आज धोबी अधिक विश्वसनीय हो गया था,लखन और हनुमान की तुलना में? क्या राम नहीं जानते थे कि रावण ने माया की सीता का अपहरण किया था, वास्तविक सीता का नहीं?वे परम ब्रह्म हैं, सब कुछ जानते हुए भी कुछ भी न जानने की लीला कर रहे हैं।सीता को वन में जाना ही होगा क्योंकि परम ब्रह्म राम को अपनी लीला जो समेटनी है। यह राम कथा के उत्तरार्ध का अंतिम भाग है।राम हमारी तरह केवल मनुष्य मात्र ही होते तो राज्य का सुख भोगते, पत्नी को अपने से कभी भी अलग नहीं होने देते,अपने दोनों पुत्रों को गोद में खिलाते।परंतु नहीं,वे परम ब्रह्म राम है, उनके अवतरण का उद्देश्य पूरा हो गया है,उन्हें वैकुंठ लौटना ही होगा। मनुष्य रूप में है,अतः कर्मों की आड़ में कर्मफल भोगते हुए और आगे भोगने के लिए एक बार वैकुंठ लौट रहे हैं।सीता ने पृथ्वी से जन्म लिया है, उन्हें तो पृथ्वी में ही समाना होगा। अपने दोनों पुत्रों को राम को सौंप कर, सांसारिक कर्तव्य को पूरा करने की मिशाल बनकर पृथ्वी में समा जाती है, सीता।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Sunday, March 3, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-7

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-7
         सीता बाल्यावस्था में एक वाटिका में पेड़ के नीचे बैठी खेल रही थी।पेड़ पर बैठा था,एक तोते का जोड़ा।बैठे हुए दोनों पति पत्नी आपस में बात कर रहे हैं।मादा तोता गर्भ से है।नर तोता अपनी पत्नी को राम कथा सुना रहा है। 'भगवान का राम के रूप में अवतार हो गया है और उनका विवाह जनकनंदिनी सीता से शीघ्र ही होने वाला है।' एक तोते के मुख से अचानक अपना नाम सुनकर सीता चौंक गई।उसने सोचा-अवश्य ही यह तोता मेरे बारे में बहुत कुछ जानता है। उसने उस तोते के जोड़े को पकड़ लिया और महल में लाकर एक पिंजरे में रख दिया।वह तोते से बोली-"मैं ही सीता हूँ। आज से प्रतिदिन तुम मुझे राम की कथा सुनाओगे। मेरे जीवन में आगे भविष्य में क्या क्या होने वाला है? मैं सब कुछ जानना चाहती हूँ'।' तोते ने अपनी पत्नी के गर्भवती होने की दुहाई देते हुए दोनों को पिंजरे से मुक्त कर देने की प्रार्थना की।सीता ने मादा तोते को पिंजरे में ही कैद रखते हुए नर तोते को इस शर्त पर मुक्त कर दिया कि वह प्रतिदिन आकर राम कथा सुनाएगा। इस प्रकार तोता प्रतिदिन महल में आकर सीता को राम कथा सुनाने लगा। गर्भवती मादा तोता पति वियोग को अधिक दिनों तक सहन नहीं कर पाई औऱ उसने अपना शरीर छोड़ते हुए सीता को श्राप दिया कि तुम भी अपने जीवन में गर्भकाल की अवधि में पति के वियोग से दुःखी होगी।   
        अगले दिन सुबह जब नर तोता सीता के महल में पहुंचा तो मृत पत्नी को देखकर उसने भी अपना शरीर छोड़ दिया। अब कल से सीता को आगे की रामकथा कौन सुनाएगा? पति पत्नी के इस प्रकार देह त्याग देने की घटना से सीता बड़ी दु:खी हुई । उसे उस श्राप से डर लग रहा था जिसके परिणाम स्वरूप उसे गर्भावस्था में पति वियोग सहना पड़ेगा।परंतु अब चिंतित होने से भी कुछ नहीं हो सकता था।कर्म रूपी तीर कमान से छूट चुका था और भविष्य में उस तीर से घायल सीता ही होगी कोई दूसरा नहीं। मैना का दिया हुआ वह श्राप ही वह कारण है जिसके परिणाम स्वरूप सीता अपने समस्त मानव जीवन में कभी भी सुखी नहीं रह सकी।11वर्ष तक वन में अपने पति के साथ भटकते हुए वह कभी भी महलों का सुख नहीं भोग सकी।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, March 2, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-6

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-6
      बाली के जाने के बाद आई तारा, बाली की पत्नी।पति के शव पर विलाप करते हुए मानव राम को खूब खरी खोटी सुनाई, आखिर स्वर्ग की एक अप्सरा जो ठहरी । "हे पत्नी वियोग में व्याकुल होने वाले राम! क्यों मारा मेरे पति को? आप तो इस वियोग से स्वयं पीड़ित हो।सब कुछ जानते समझते हुए भी मेरे पति को दूर कर दिया न मुझसे।अपनी पत्नी को पाने के लिए तुम्हें सुग्रीव का सहारा क्या केवल बाली की जान की कीमत पर ही मिल सकता था? यह किया क्या तुमने ? सीता को के वियोग से मुक्ति पाने के लिए तारा को पति वियोग दे दिया।यह सब कर क्या तुम अपने शेष जीवन में सुखी रह सकते हो।सीता को तुम भी अधिक दिन अपने पास में नहीं रख सकोगे, यह मेरा श्राप है।" राम निश्चल होकर सुन रहे हैं,तारा का विलाप करना जारी है। थोड़ा शांत होने पर राम तारा को समझाते हैं-"छिति जल पावक गगन समीरा।" तारा तत्काल समझ जाती है, कौन हैं यह? 'हे भगवान!क्या बोल दिया मैंने?'
राम कहते हैं, 'आप नही बोली, मैंने आपसे बुलवाया है।आप व्यर्थ में ही परेशान न हो।' तारा का श्राप फिर एक बार राम को आश्वस्त कर देता है, अपनी माया को समेट लेने के प्रति।
     परंतु राम के इस कृत्य, तारा को दिए वैधव्य का फल सीता क्यों भुगते? यही प्रश्न इस रामकथा में सबसे महत्त्वपूर्ण है।परमात्मा का यह कर्म रहस्य बड़ा ही जटिल है।हम सब आपस में एक दूसरे से संबंधित है और अपने कर्मों के फल भुगतने और एक दूसरे को भुगताने के लिए एक साथ इकट्ठा हुए हैं।राम ने तो छुपकर बाली को मार डाला और बाली द्वापर में इस कर्म का फल उन्हें भुगता भी देगा। तारा पति विरह में राम को श्राप दे चुकी है कि सीता का वियोग भी उनको एक बार और सहन करना पड़ेगा। परंतु राम के कर्म के कारण सीता क्यों पति वियोग सहन करे? यहीं आकर कर्म का रहस्य समझ से परे हो जाता है।अतःअब जानने का प्रयास करेंगे सीता के उस कर्म के बारे में,जिसके कारण गर्भवती महारानी सीता वनवास भोगने को मजबूर कर दी गई।   
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Friday, March 1, 2019

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-5

रामकथा-कुछ अनछुए प्रसंग-5
          सब लीला हो रही है, धरती का भार उतारने और वापस लौट जाने के लिए।अब आ पहुंचे है,शबरी के पास।शबरी ने पता दिया सुग्रीव का।उधर सुग्रीव भी पत्नी विरह में, इधर राम भी, मिल गयी दोनों की जोड़ी। सुग्रीव वानर है और राम मनुष्य।साथ ही राम ब्रह्म भी है,अतः पहले काम सुग्रीव का।बाली वध हुआ, पेड़ की आड़ से तीर चलाकर। क्यों भई?राम ब्रह्म है, सामने आकर अथवा केवल अंगुली के इशारे से भी तो बाली को मार सकते थे। परन्तु नहीं, वे ब्रह्म होते हुए भी मनुष्य योनि में हैं।मनुष्य बने हैं तो उसी अनुसार ही तो कर्म करने होंगे, ब्रह्म है तो क्या हुआ?कर्म तो करने ही पड़ेंगे जैसा कि गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है। राम सोचते हैं,यहां भी लीला करो। मार दिया बाली को। बाली कहता है-'क्यों मारा छिपकर मुझे?मैंने तेरा क्या बिगाड़ा था?' राम ने कारण बताया सब कुछ समझाया। कहानी होती तो नहीं बतलाती कि राम ने बाली को क्यों मारा ? वह तो केवल यही कहती है,"बाली निर्दलनं" राम ने बाली को मारा। यही तो कथा की विशेषता है कि वह स्पष्ट करती है कि बाली क्यों मारा गया ? भगवान दयालु है, अपनी ओर से बाली को एक अवसर मरने से बचने का भी देते हैं।भगवान कहते हैं-'अचल करो तनु राखेउ प्राना।' बाली समझ जाता है कि जो मुझे मारने के उद्देश्य से तीर मारकर भी प्राण बचाने का कह सकता है, वह ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कोई हो ही नहीं सकता।अब क्यों जीऊं और किसके लिए जीऊं?जो मानव जीवन का उद्देश्य  है, परमात्मा को पाना, वे तो मेरे समक्ष खड़े हैं।भला, इससे अच्छा अवसर मुझे भविष्य में कहाँ मिलेगा? नहीं भगवन नहीं, मुझे अपनी शरण में ले लो। मुझे आपके दर्शन हो गए हैं, मैं आपको पहचान चुका हूं, अब इस तन को रखकर मुझे क्या करना है ?"जनम जनम मुनि जतन कराहीं।अन्त राम कहीं आवत नाहीं।।" आप तो मेरे सामने हैं, मुझे एक न एक दिन तो जाना ही है, फिर आज और अभी क्यों नहीं?आप अपने अवतरण का उद्देश्य पूरा कर फिर आ जाना। आज आपने मुझे मारने का जो कर्म किया है, उसका फल भी तो आपको आगे भुगतना है। त्रेता में आप मुझे मार रहे हो आगे द्वापर में मैं आपका वध करूंगा। यह आपका ही तो बनाया हुआ विधान है कि आज जिसको जो मारेगा उसको उसी के हाथों भविष्य में मरना पड़ेगा।"मां स भक्षयते यस्मान भक्षयिष्य तस्मान तमप्य्ह्म"।।महाभारत।। इस आधार पर द्वापर में भी तो आपके  साथ लीला करने का एक बार और अवसर मिलेगा। त्रेता में आपने मेरी लीला समाप्त की, द्वापर में मैं आपकी लीला समाप्त करूंगा, फिर हिसाब बराबर होगा। द्वापर में कृष्ण की मनुष्य लीला समाप्त करने का अवसर एक भील को मिला था,सोते हुए श्री कृष्ण पर तीर चलाकर। द्वापर का वह भील त्रेता का बाली ही था।
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।