Friday, November 23, 2018

सकाम भक्ति/निष्काम भक्ति

सकाम भक्ति/ निष्काम भक्ति 
मलूकदास और नामदेव, दोनों ही प्रसंग से स्पष्ट होता है कि मनुष्य के जीवन में भक्ति के होने का बड़ा महत्व है। भक्ति में भी निष्काम भक्ति सर्वश्रेष्ठ है। मलूकदास को परमात्मा में विश्वास नहीं था।वे नास्तिक थे । नास्तिक से आस्तिक होने में देर कितनी लगी ? एक दिन मात्र ही तो लगा इसमें। सत्संग से उपजी श्रद्धा के कारण मलूकदास के मन में परमात्मा के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए परीक्षा लेने का आग्रह हुआ। उस परीक्षा के अनुभव ने परमात्मा के अस्तित्व को स्वीकार करने के साथ साथ उनके प्रति विश्वास पैदा किया और श्रद्धा को मजबूत किया। मलूकदास तत्काल ही निष्काम भक्ति की ओर चल पड़े। लेकिन एक सांसारिक व्यक्ति के लिए प्रारम्भ से ही निष्काम भक्ति के लिए प्रेरित होना संभव नहीं हो सकता। परीसा भागवत भी तो प्रारम्भ से ही सकाम भक्ति में ही लीन था।
सकाम भक्ति को व्यर्थ न समझें।निष्काम भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ भक्ति है परंतु उस भक्ति को स्वीकार करना एक सांसारिक व्यक्ति के लिए लगभग असंभव है।"भूखे भजन न होय गोपाला।ये ले अपनी कंठी माला।।" कहने का अर्थ यह है कि सकाम भक्ति में हमारी कामनाओं से हम परमात्मा को अवगत कराते हैं।परमात्मा दयावान है, वे भूखा किसी को भी नहीं सोने देते । आपकी आवश्यकता वे पूरी करेंगे ही, इस भावना के साथ ही सकाम भक्ति निष्काम भक्ति बनने की ओर अग्रसर होती है। परंतु यह मनुष्य नाम का प्राणी है न, यह पेट भरकर, अपनी आवश्यकताएँ पूरी हो जाने पर भी संतुष्ट नहीं होता।उसकीआवश्यकता जब विलासिता में परिवर्तित हो जाती है, तब उसकी भक्ति भी केवल कामना पूर्ति के साधन बनकर रह जाती है।सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति की ओर तो केवल वही व्यक्ति अग्रसर हो सकता है जो अपनी आवश्यकताओं के पूरा हो जाने पर संतुष्ट हो जाता है। संतुष्टि के अभाव में सकाम भक्ति पर अटक जाने का खतरा है । यह बात सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए सकाम भक्ति से निष्काम भक्ति की ओर वही जा सकता है, जो जीवन में संतुष्टि धारण कर ले ।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Thursday, November 22, 2018

प्रेरक प्रसंग के संदेश -5

प्रेरक प्रसंग के संदेश -5
नामदेव पारस पत्थर कभी के छोड़ चुके थे।नदी में से निकले सभी पत्थर उनकी दृष्टि में एक समान थे, न कोई पारस न कोई पत्थर,सब के सब पत्थर, जिनका मनुष्य के जीवन के लिए कोई अर्थ नहीं है। "ओ पारीसा, ढूंढ ले अपना पारस पत्थर।हे मेरे पाण्डुरंग ! कहाँ फंसा दिया रे मुझको।" और इधर पारीसा, जिस पत्थर को उठाकर देखे वही पारस, लोहे से छुआते ही सोना। नदी किनारे स्वर्ण का पहाड़ खड़ा हो गया।उधर नामदेव का ध्यान केवल परमात्मा पर। पारीसा दौड़ा और नामदेव के चरणों में गिर पड़ा।
भूल गया परीसा भागवत भी, पारस को।अरे! जिसके भक्त के स्पर्श मात्र से ही साधारण पत्थर भी पारस बन गए हो, उस भक्त के तो पाण्डुरंग ही महान हुए। फिर ऐसे पारस का महत्व ही क्या,जो संसार के बंधन में डाल दे।भक्ति से मिले तो फिर पाण्डुरंग को ही मांगो। वही असली पारस। सच है, जिसने सब कुछ छोड़ा, उसी ने पूरा पाया। आधा छोड़ने वाले का सब कुछ ही छूट जाता है।
      सकाम भक्त आधा छोड़ता है, उसे सिवाय पारस के कुछ भी नहीं मिलता।पारस की भी क्या कीमत,कुछ नहीं।जीवन में परमात्मा नहीं तो सब कुछ होकर भी कुछ भी नहीं है। केवल सांसारिक अभाव की पूर्ति करते रहना, आत्मा को खोखला कर देता है। रिक्त आत्मा का क्या तो होना और क्या न होना। जीवन आत्मसंतुष्टि का दूसरा नाम है और यह भी सत्य है कि आत्मसंतुष्टि जीवन में हज़ारों पारस मिल जाये तो भी नहीं आ सकती। भक्ति ही करनी है तो फिर निष्काम भक्ति ही की जाए। मिला हुआ स्वर्ण मिट्टी समान, दोनों में कोई अंतर नहीं। नामदेव शताब्दियों में कोई एक पैदा होता है, अन्यथा पारीसा भागवत जैसे तो इस संसार में करोड़ों व्यक्ति अपना जीवन व्यर्थ ही गँवा रहे हैं।न जाने हमारे जैसे करोड़ों पारीसाओं को नामदेव कब मिलेंगे जो हमारी आंखें खोल दे।
प्रस्तुति -डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Wednesday, November 21, 2018

प्रेरक प्रसंग के संदेश -4

प्रेरक प्रसंग के संदेश -4
   नामदेव तो भक्त थे। कई दिनों बाद सत्संग कर लौटे तो अपने घर की दशा देखकर विस्मित रह गए। खाली पड़े खाद्यान्न भंडार ठसाठस भरे हुए थे। टूटी फूटी झोंपड़ी भी सुधार दी गई थी। ऐसा कैसे हुआ राजाई?राजाई की बातों को सुनकर बड़ा दुःख हुआ, नामदेव को। हे पाण्डुरंग, यह क्या हुआ ? क्यों राजाई, मुझको समझ नहीं सकी?
      परमात्मा जैसे अमूल्य हीरे के रहते यह पारस पत्थर भी तुच्छ है।भला,पत्थर के बदले हीरा कैसे फैंका जा सकता है? अभाव हैं तो परमात्मा से निकटता है, अभाव दूर हुए कि परमात्मा से विस्मरण हुआ। परीसा भागवत बनना सरल है, नामदेव बनना बड़ा मुश्किल।नामदेव जानते थे कि असली पारस तो परमात्मा है,  स्वर्ण बनाने वाला पारस पत्थर तो छद्म है, नकली है। पारस पत्थर तो संसार मे उलझाने का काम करता है।इस पत्थर को तो जितनी शीघ्रता से त्याग दिया जाए,वही उत्तम है। पाण्डुरंग याद आये, नामदेव को।हम होते तो पाण्डुरंग को भूला देते,केवल पारस पत्थर को याद रखते।नामदेव ने पारस को उठाया और नदी में फेंक दिया और पुनः लग गए, पाण्डुरंग को भजने।
      नामदेव पारस छोड़ सकता है परंतु परीसा भागवत भला कैसे छोड़ दे उसको। नामदेव अनन्य भक्त हैं भगवान के, उनको कैसे कुछ अनुचित कह दे।स्वयं परीसा अपने ही बाल नोचने लगा। हम भी तो ऐसा ही करते हैं, जब मिली हुई भोग की वस्तु हमसे कोई छीन कर ऐसी जगह फैंक देता है,जहां से उसे वापिस पाना असंभव लगने लगे।जब बात कुछ अधिक ही बढ़ गई तो पाण्डुरंग की कृपा नामदेव पर हुई। नदी में गोता लगाकर मुट्ठी में भरकर सैंकड़ो पारस पत्थर ला फैंके, परीसा भागवत के सामने। कितना खूबसूरत दृश्य रहा होगा उस समय, जब चारों और पारस पत्थर बिखरे पड़े हों और नामदेव की दृष्टि केवल परमात्मा पर ही टिकी हो और वे निर्विकार भाव से पाण्डुरंग को भज रहे हो।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम् ।।

Tuesday, November 20, 2018

प्रेरक प्रसंग के संदेश 3

प्रेरक प्रसंग के संदेश - 3
"असली पारस" प्रसंग में जो संदेश छिपा है वह एकदम स्पष्ट है है। भक्ति क्या है और कौन सी भक्ति श्रेष्ठ है, इस प्रसंग से स्पष्ट हो जाता है।परमात्मा की भक्ति दो प्रकार की होती है-सकाम भक्ति और निष्काम भक्ति।सकाम भक्ति के द्वारा व्यक्ति परमात्मा से सांसारिक वस्तुएं मांगता है जबकि निष्काम भक्ति में भक्त की कोई मांग नहीं होती।
 पारस पत्थर से छूने वाला लोहा भी सोना बन जाता है। सोने से दैनिक आवश्यकताएं तो पूरी ही सकती है परंतु परमात्मा से दूरी बनी रहती है। भक्ति परीसा ने भी की थी और नामदेव ने भी।परीसा की दैवी उपासना से प्रसन्न हुई देवी से आखिर पसीजा ने मांगा तो क्या मांगा ? परीसा भागवत के स्थान पर उसकी पत्नी कमला होती अथवा आप और हम होते तो भी क्या मांगते ? वही जो परीसा भागवत ने मांगा-पारस पत्थर। परमात्मा चाहिए भी किसको ? हमें विश्वास ही नहीं है, उसके होने पर भी। हम तो केवल उसकी भक्ति करने का नाटक भर कर रहे हैं। उस नाटक से प्रसन्न होकर कभी ईश्वर ने हमें भी वर मांगने का कह दे, तो हम भी क्या मांगेंगे-उस परमपिता को नहीं बल्कि उस पत्थर को जिसके छूने भर से लोहा सोना बन जाता है।हम नामदेव बनना ही नहीं चाहते। प्रशंसा करेंगे, नामदेव की भक्ति की और स्वयं भक्ति के बदले मांगेंगे पारस।यही वास्तविकता है, हमारी भक्ति की और हमारे जीवन की भी।
अभावों में नामदेव भी जी रहे थे और परीसा भागवत भी। शारीरिक भूख नामदेव और परीसा, दोनों की एक समान थी परंतु आत्मज्ञान की भूख केवल नामदेव को थी। जो व्यक्ति शारीरिक भूख के समक्ष समर्पण कर देता है वह परमात्मा के प्रति समर्पित हो ही नहीं सकता । शारीरिक भूख के सामने समर्पण करने वाले पर परमात्मा दया करते हैं, यह बात निश्चित है परंतु उसकी  दया के परिणाम स्वरूप मिलेगी सांसारिक वस्तुएं, जो आपकी शारीरिक भूख कुछ समय के लिए शांत कर सकती है परंतु फिर लोभ को बढ़ा देती है। परीसा भागवत की पत्नी कमला के साथ भी तो यही हुआ था। पारस पत्थर मिलने पर उसने टनों स्वर्ण बना लिया था, फिर भी भूख ऐसी थी कि शांत होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही थी। जैसा कि नारी का स्वभाव होता है कि वह तकलीफ में किसी को देख नहीं सकती।उसका हृदय कोमल होता है। ऐसे ही कमला भी अपनी सहेली राजाई की गरीबी नहीं देख सकी। उसने द्रवित होकर पारस पत्थर से स्वर्ण बनाने के लिए कुछ समय के लिए राजाई को दे दिया, जिससे वह अपने अभाव दूर कर सके।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Monday, November 19, 2018

प्रेरक प्रसंग के संदेश -2

प्रेरक प्रसंग के सन्देश-2
'अजगर करे न चाकरी' प्रसंग से दो महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलते हैं-प्रथम, सत्संग से ही जीवन परिवर्तित होता है और दूसरा बिना ईश्वरीय कृपा के सत्संग नहीं मिलता ।मनुष्य एवं अन्य जीवों में मूलभूत यही अंतर है कि अन्य जीव सत्संग से लाभ नहीं उठा सकते। आप ने देखा होगा कि सत्संग के समय उस क्षेत्र में कई प्राणी आकर बैठ जाते हैं परंतु वे उसका लाभ नहीं ले सकते।सत्संग विवेक को जाग्रत करता है और मनुष्य के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्राणी में यह क्षमता नहीं है।हमारे धर्म शास्त्रों में लिखा है कि अल्प समय के लिए मिला सत्संग भी जीवन की धारा को मोड़ने के लिए पर्याप्त होता है।
         एक चोर चोरी करने के लिए दिन के समय ही एक घर में घुस गया।घर किसी प्रभावशाली व्यक्ति का था। घर के किसी व्यक्ति ने  चोर को चोरी करते हुए देख लिया। चोर के जितना माल हाथ लगा उसे लेकर वहां से भाग छूटा। रसूखदार ने तुरंत पुलिस को फोन किया। मामला vip का था,तो पुलिस को सक्रिय होना ही था।अब चोर माल सहित आगे आगे और पुलिस उसके पीछे पीछे। चोर को छिपने का स्थान तक नहीं मिल रहा था। तभी उसे एक घर में सत्संग होता दिखाई दिया। उसे छिपने के लिए वह स्थान उपयुक्त लगा।वह सत्संग हो रहे स्थान पर प्रवेश कर छिपने के लिए श्रोताओं के मध्य जाकर बैठ गया।चोरी के माल की गठरी को पास में ही रखकर प्रवचन को सुनने का नाटक लगा। संत कह रहे थे -"इस संसार में जिस व्यक्ति को एक क्षण के लिए भी सत्संग मिल जाता है,उसके समस्त पाप कट जाते हैं,उसका कल्याण हो जाता है। समय निकालकर सत्संग करना अन्य सांसारिक कार्यों से ज्यादा जरूरी है।"
उसी समय पुलिस का उस पांडाल में प्रवेश होता है। पुलिस उड़ती नज़रें पांडाल में बैठे श्रोताओं पर डालती है और यह सोचकर वहां से निकल जाती है कि भला,चोर यहां पर क्यों कर आएगा ? इस प्रकार चोर पकड़े जाने से बच जाता है। चोर को बड़ा आश्चर्य होता है । उसे संत की कही वाणी पर विश्वास हो जाता है और मन ही मन में भविष्य में चोरी न करने का संकल्प कर लेता है। सत्संग समाप्ति के बाद वह चोरी का माल वहीँ छोड़कर चल देता है। रास्ते में वह सोचता है कि "संत सही कह रहे थे । सत्संग तो अल्प समय के लिए भी मिले तो जीवन परिवर्तित हो जाता है। आज मैंने कुछ देर ही सत्संग किया और पकड़े जाने से बच गया, अगर  नित्य सत्संग करूँ तो निश्चित ही मेरा कल्याण हो सकता है।"
       चोर को सत्संग मिला,ईश्वर कृपा से।अगर वह उस राह पर ही नहीं आता जहां सत्संग हो रहा था,तो वह या तो कहीं अन्य स्थान पर छिप जाता अथवा पकड़ा जाता।दोनों ही परिस्थितियों में उसकी चोरी करने की आदत नहीं छूटती। परमात्मा की कृपा होने से ही उसको वही राह भागने को मिली,जिस राह पर सत्संग हो रहा था। सत्संग में एक ही बात ने उसको प्रभावित किया कि अल्प समय के लिए मिला सत्संग भी कल्याणकारी होता  है। इस बात का उस पर प्रभाव तभी पड़ा,जब वह पकड़े जाने से बच गया। बच जाने से ही उसका जीवन परिवर्तित हुआ, जो पकड़े जाने पर संभव नहीं था। यह है, सत्संग का प्रभाव। अतः मनुष्य को सत्संग कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए और कुसंग से सदैव बचना चाहिए।मलूकदास का तो एक सत्संग से ही कल्याण हो गया और इसी प्रकार चोर का भी।परंतु यह कल्याण हुआ,सत्संग में सुनी हुई बातों को आत्मसात करने से। सत्संग में प्रवचन सुनने मात्र से कल्याण नहीं होता बल्कि उस ज्ञान को जीवन मे अपनाने से होता है ।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Sunday, November 18, 2018

प्रेरक प्रसंग के सन्देश - 1

प्रेरक प्रसंग के संदेश - 1
पिछले दो दिनों में हमने दो प्रेरक प्रसंग पढ़े।पढ़ने और सुनने में दोनों ही प्रसंग हृदय स्पर्शी हैं। पहले प्रसंग में मलूक दास अपने जीवन के प्रारम्भ में परमात्मा में बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते थे अर्थात नास्तिक थे परंतु सत्संग के प्रभाव से उनका जीवन ही परिवर्तित हो गया। उनके जीवन मे यह परिवर्तन यूँही नहीं आ गया। घोर नास्तिक की सबसे बड़ी विशेषता होती है कि वह बिना सबूत के, बिना आजमाए किसी बात को आसानी से स्वीकार नहीं करता ।ऐसा व्यक्ति भगवान ही क्या, किसी पर भी विश्वास नहीं करता। संतों के सानिध्य से, राम-कथा का लगातार श्रवण करते रहने से उनके मन में परमात्मा के प्रति, उसे जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई।मलूकदास ने इससे पूर्व जीवन मे कभी शायद ही सोचा होगा कि संसार का पालनहार भी मनुष्य के अतिरिक्त कोई अन्य भी हो सकता है।उन्होंने इसी बात को संतों के द्वारा कही गई बात की सत्यता परखने का आधार बनाया। इस परीक्षा से वह बड़ी सरलता से समझ सकता था कि ईश्वर का अस्तित्व है अथवा नहीं।
जीवन में सभी परिस्थितियां अचानक ही नहीं बनती।उनके बनने के पीछे भी परमात्मा की ही कृपा होती है। मलूकदास ने परीक्षा लेने से पहले सोचा भी नहीं होगा कि 24 घंटे के अंदर ही घनघोर जंगल में परिस्थिति इतनी तेज गति से परिवर्तित हो जाएगी।शेर, अपने स्वभावानुसार शिकार की तलाश में जंगल में सदैव घूमता ही रहता है।दहाड़ लगाना भी उसकी एक आदत है। परंतु राज कर्मचारियों का आना,फिर शेर की दहाड़ सुनकर पहले घोड़ों के और फिर सभी का भोजन वहीं छोड़कर भाग जाना क्या अपने आप हो सकता है ? सब कुछ पूर्वलिखित एक पटकथा सी लगती है। प्रसंग अपनी पराकाष्ठा को तब छूता है, जब डाकू स्वयं भोजन करने से पहले पेड़ पर बैठे मलूकदास को अपने हाथों से भोजन कराते हैं। अंततः मलूकदास के साथ साथ डाकुओं का भी हृदय परिवर्तन हो जाता है।
रामचरितमानस में महर्षि वाल्मिकी जी भगवान श्री राम को कहते हैं कि हे राम!आपको वही जान सकता है, जिसको आप जनाना चाहते हैं। इस प्रसंग से यह बात शतप्रतिशत सत्य सिद्ध होती है। सत्संग भी उसी को मिलता है जिस पर परमात्मा की कृपा होती है।मलूकदास के गांव में भी इस राम-कथा से पहले भी कई संत आये होंगे। परंतु जब मलूकदास जी पर परमात्मा की कृपा दृष्टि पड़ी तभी सत्संग में केवल एक प्रसंग सुनकर और परख कर ही वे नास्तिक से आस्तिक हो गए और स्वयं के जीवन को परिवर्तित करने के साथ साथ डाकुओं का जीवन भी परिवर्तित कर दिया। ऐसी होती है, परमात्मा की कृपा और सत्संग का प्रभाव।
गोस्वामीजी मानस में इसी सम्बन्ध में कहते हैं-
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाहि।।2/3/127।।
बिनु सतसंग बिबेक न होई।राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।1/3/7।।
होइ विवेकु मोह भ्रम भागा।तब रघुनाथ चरन अनुरागा।।2/93/5।।
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।

Saturday, November 17, 2018

असली पारस

असली पारस
संत नामदेव की पत्नी का नाम राजाई था और परीसा भागवत की पत्नी का नाम था कमला। कमला और राजाई शादी के पहले सहेलियाँ थीं। 
दोनों की शादी हुई तो पड़ोस-पड़ोस में ही आ गयीं। राजाई नामदेव जी जैसे महापुरुष की पत्नी थी और कमला परीसा भागवत जैसे देवी के उपासक की पत्नी थी। 
कमला के पति ने देवी की उपासना करके देवी से पारस माँग लिया और वे बड़े धन-धान्य से सम्पन्न होकर रहने लगे।
नामदेव जी दर्जी का काम करते थे। वे भजन-कीर्तन करने जाते और दस-पन्द्रह दिन के बाद लौटते। अपना दर्जी का काम करके आटे-दाल के पैसे इकट्ठे करते और फिर चले जाते।वे अत्यन्त दरिद्रता में जीते थे लेकिन अंदर से बड़े सन्तुष्ट और खुश रहते थे।
एक दिन नामदेव जी कहीं कीर्तन-भजन के लिए गये तो कमला ने राजाई से कहा कि ‘तुम्हारी गरीबी देखकर मुझे तरस आता है। मेरा पति बाहर गया, तुम यह पारस ले लो, थोड़ा सोना बना लो और अपने घर को धन धान्य से सम्पन्न कर लो।‘
राजाई ने पारस लिया और थोड़ा सा सोना बना लिया। संतुष्ट व्यक्ति की माँग भी आवश्यकता की पूर्ति भर होती है। ऐसा नहीं कि दस टन सोना बना ले, एक दो पाव बनाया बस।
नामदेव जी ने आकर देखा तो घर में बहुत सारा सामान, धन-धान्य…. भरा-भरा घर दिखा। शक्कर, गुड़, घी आदि जो भी घर की आवश्यकता थी वह सारा सामान आ गया था।
नामदेव जी ने कहाः “इतना सारा वैभव कहाँ से आया ? “ 
राजाई ने सारी बात बता दी कि “परीसा भागवत ने देवी की उपासना की और देवी ने पारस दिया। वे लोग खूब सोना बनाते हैं और इसीलिए दान भी करते हैं, मजे से रहते हैं। हम दोनों बचपन की सहेलियाँ हैं। मेरा दुःख देखकर उसको दया आ गयी।“
नामदेव जी ने कहाः “मुझे तुझ पर दया आती है कि सारे पारसों के पारस ईश्वर है, उसको छोड़कर तू एक पत्थर लेकर पगली हो रही है। चल मेरे साथ, उठा ये सामान !”
नामदेव जी बाहर गरीबों में सब सामान बाँटकर आ गये। घर जैसे पहले था वैसे ही खाली कर दिया।
नामदेव जी ने पूछाः “वह पत्थर कहाँ है ? लाओ !” राजाई पारस ले आयी। नामदेव जी ने उसे ले जाकर नदी में फेंक दिया और कहने लगे ‘मेरे विट्ठल, पांडुरंग ! हमें अपनी माया से बचा। इस धन दौलत, सुख सुविधा से बचा, नहीं तो हम तेरा, अंतरात्मा का सुख भूल जायेंगे।‘ – ऐसा कहते कहते वे ध्यान मग्न हो गये।
स्त्रियों के पेट में ऐसी बड़ी बात ज्यादा देर नहीं ठहरती। राजाई ने अपनी सहेली से कहा कि ऐसा-ऐसा हो गया। अब सहेली कमला तो रोने लगी। 
इतने में परीसा भागवत आया, पूछाः “कमला ! क्या हुआ, क्या हुआ ? “
वह बोलीः “तुम मुझे मार डालोगे ऐसी बात है।“ आखिर परीसा भागवत ने सारा रहस्य समझा तो वह क्रोध से लाल-पीला हो गया और बोलाः “कहाँ है नामदेव, कहाँ है ? कहाँ गया मेरा पारस, कहाँ गया ? “ और इधर नामदेव तो नदी के किनारे ध्यानमग्न थे।
परीसा भागवत वहाँ पहुँचाः “ओ ! ओ भगत जी ! मेरा पारस दीजिये।“
नामदेवः “पारस तो मैंने डाल दिया उधर, नदी में। परम पारस तो है अपना आत्मा। यह पारस पत्थर क्या करता है ? मोह, माया, भूत-पिशाच की योनि में भटकाता है। पारस-पारस क्या करते हो भाई ! बैठो और पांडुरंग का दर्शन करो।“
“मुझे कोई दर्शन-वर्शन नहीं करना।“
“हरि - हरि बोलो और आत्म-विश्रांति पाओ !!
“नहीं चाहिए आत्मविश्रान्ति, आप ही पाओ। मेरे जीवन में दरिद्रता है, ऐसा है वैसा है.. मुझे मेरा पारस दीजिये।“
“पारस तो नदी में डाल दिया।“
“नदी में डाल दिया ! नहीं, मुझे मेरा वह पारस दीजिये।“
“अब क्या करना है.. सच्चा पारस तो तुम्हारी आत्मा ही है। अरे, सत्य आत्मा है..“
“मैं आपको हाथ जोड़ता हूँ मेरे बाप ! मुझे मेरा पारस दो.. पारस दो..।“
“पारस मेरे पास नही है, वह तो मैंने नदी में डाल दिया।“
“कितने वर्ष साधना की, मंत्र-अनुष्ठान किये, सिद्धि आयी, अंत में सिद्धिस्वरूपा देवी ने मुझे वह पारस दिया है। देवी का दिया हुआ वह मेरा पारस..“
नामदेव जी तो संत थे, उनको तो वह मार नहीं सकता था। अपने-आपको ही कूटने लगा।
नामदेव जी बोलेः “अरे क्या पत्थर के टुकड़े के लिए आत्मा का अपमान करता है !”
‘जय पांडुरंगा !’ कहकर नामदेव जी ने नदीं में डुबकी लगायी और कई पत्थर ला के रख दिये उसके सामने।
“आपका पारस आप ही देख लो।“ 
देखा तो सभी पारस ! “इतने पारस कैसे !”
“अरे, कैसे-कैसे क्या करते हो, जैसे भी आये हों ! आप ले लो अपना पारस !” 
“ये कैसे पारस, इतने सारे !”
नामदेव जी बोलेः “अरे, आप अपना पारस पहचान लो।“ 
अब सब पारस एक जैसे, जैसे रूपये-रूपये के सिक्के सब एक जैसे। आपने मुझे एक सिक्का दिया, मैंने फेंक दिया और मैं वैसे सौ सिक्के ला के रख दूँ और बोलूँ कि आप अपना सिक्का खोज लो तो क्या आप खोज पाओगे ??
उसने एक पारस उठाकर लोहे से छुआया तो वह सोना बन गया। लोहे की जिस वस्तु को लगाये वह सोना !
“ओ मेरी पांडुरंग माऊली (माँ) ! क्या आपकी लीला है ! हम समझ रहे थे कि नामदेव दरिद्र हैं। बाप रे ! हम ही दरिद्र हैं। नामदेव तो कितने वैभवशाली हैं। नहीं चाहिए पारस, नहीं चाहिए, फेंक दो। ओ पांडुरंग !”
परीसा भागवत ने सारे-के-सारे पारस नदी में फेंक दिये और परमात्म- पारस में ध्यान मग्न हो गये।
प्रस्तुति-डॉ. प्रकाश काछवाल
।।हरि:शरणम्।।