Friday, October 5, 2018

पुरुषार्थ - 10


पुरुषार्थ-10
शुभ-पुरुषार्थ कैसे किये जाये ? —
              प्रत्येक मनुष्य के लिए अपने जीवन में कर्म करने आवश्यक है | अगर वह अपने वर्तमान जीवन में कर्म नहीं भी करना चाहता तो उसे पूर्वजन्म में किये गए कर्मों के फलस्वरुप प्राप्त हुए प्रारब्ध,भाग्य या दैव के कारण मिलने वाले फलों को भोगने के लिए कर्म करने आवश्यक हो जाते हैं, जिस प्रकार कि संसार के अन्य प्राणी कर्म करते हैं | केवल मनुष्य ही क्यों, संसार के समस्त जीव प्रारब्ध स्वरुप मिलने वाले कर्मफलों को प्राप्त करने के लिए वर्तमान जीवन में कर्म करने को विवश (Compel) होते हैं | एक मात्र पुरुषार्थ से सिद्ध होने वाला जो अवश्यम्भावी (Sure) फल है, उसी को हम लोग दैव या प्रारब्ध कहते हैं | अतः जब दैव के वशीभूत (According to destiny) होकर कुछ कर्म इच्छा न होते हुए भी करने आवश्यक हो जाते हैं तो फिर क्यों न इस जन्म में अपनी इच्छा से केवल ऐसे कर्म ही किये जाये जो अभीष्ट (Desirable) की प्राप्ति में सहायक हों | जीव के मन में जैसी इच्छा या वासना होती है, वह शीघ्र ही वैसे कर्म करना प्रारम्भ कर देता है | मन में कामना (Wish) कोई और हो और वह कर्म किसी अन्य (Other) प्रकार का करे, यह संभव (Possible) ही नहीं है | अशुभ कर्म से पाप फल मिलेंगे और शुभ कर्म से पुण्य फल | अतः सर्वप्रथम अशुभ वासना को त्यागकर शुभ वासना से युक्त होना आवश्यक है |  शुभ कर्म या शुभ पुरुषार्थ से अभीष्ट की प्राप्ति होती है |
                   मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है, जिसको परमात्मा ने स्वतन्त्र सत्ता दी है | इस स्वतन्त्र सत्ता का यह अर्थ नहीं है कि वह अपना जीवन अमर्यादित ढंग से जीने लगे | आपको स्वतंत्रता मिली है, परमात्मा तक पहुँचने के लिए कर्म करने के लिए, आत्म-बोध (Realization) को उपलब्ध होने के लिए | पुरुषार्थ का वास्तविक अर्थ भी यही है कि हम परमात्मा को प्राप्त हों, हमें आत्मज्ञान हो जाये | आपको अपने जीवन का सदुपयोग करना चाहिए, दुरूपयोग नहीं | चाकू से सब्जी काटी जा सकती है और गला भी | आपको क्या करना चाहिए, यह सब आपके विवेक (conscience) पर निर्भर करता है | इसीलिए परमात्मा ने आपको कर्म करने की स्वतंत्रता के साथ साथ विवेक भी दिया है | आप विवेक का उपयोग करने के स्थान पर इसका दुरूपयोग करने लगेंगे तो परमात्मा आपसे आपकी स्वतन्त्र सत्ता छीन लेंगे और परतंत्र कर निम्न योनियों (Lower species) में डाल देंगे जिनमें आपको कई जन्मों तक भटकना पड़ेगा | प्रातः स्मरणीय ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी महाराज इनको कूकर-शूकर (dogs and pigs) योनियों में भटकना कहा करते थे |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

Thursday, October 4, 2018

पुरुषार्थ - 9


पुरुषार्थ – 9
               जैसा कि पहले बताया जा चूका है कि पूर्व जन्म (Past life) के पौरुष से अर्थ और काम पुरुषार्थ की उपलब्धि होती है और वर्तमान जीवन के पौरुष से धर्म और मोक्ष पुरुषार्थ की | इसका अर्थ यह हुआ कि धर्माचरण एवं मुक्ति के विषय मे इस वर्तमान जन्म (Present life) का पुरुषार्थ बलवान (Powerful) है और अर्थ एवं काम के विषय में पूर्व जन्म (past life) में फल प्राप्ति के लिए किया गया पुरुषार्थ | पूर्व मानव जीवन में किये गया पुरुषार्थ इस जन्म में प्रारब्ध या भाग्य अथवा दैव (Destiny) कहलाता है और काम तथा अर्थ के सम्बन्ध में वह पौरुष प्रबल है | शास्त्र सम्मत जो भी कर्म करते हुए अपनी मर्यादा (Nobility) का पालन करता हैं, उस मनुष्य को अपनी समस्त अभीष्ट (Desirable) वस्तुएं उसी प्रकार प्राप्त होती है, जैसे सागर में गोता लगाने वाले को रत्न (Jewel)| मनुष्य की अपने जीवन में दो ही तो अभिलाषाएं (Ambitions) होती है – सुख की प्राप्ति (Getting pleasure) और दुःख की निवृति (Free from sorrow) | इन दो के लिए जो वह पौरुष करता है, वह अगर शास्त्र अनुकूल हो तो फिर परम पुरुषार्थ की प्राप्ति स्वतः ही हो जाती है | आत्म कल्याण (well being) के लिए अगर इस परम पुरुषार्थ का आश्रय लिया जाये तो वह अवश्य ही दैव या भाग्य को जीत लेता है | अतः यह स्पष्ट हो जाता है कि अभीष्ट की उपलब्धि न होने पर बैठ कर केवल दैव या भाग्य को कोसते रहना अनुचित है | इसके स्थान पर मर्यादा का पालन करते हुए, धैर्यशील बनकर शास्त्र सम्मत कर्म करने चाहिए जिससे पूर्व जन्म के पौरुष (भाग्य) को जीता जा सके |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

Wednesday, October 3, 2018

पुरुषार्थ - 8


पुरुषार्थ – 8
                इतना सब आत्मसात कर लेने के पश्चात् प्रश्न यह पैदा होता है कि यह सब अर्थात किसी भी  पुरुषार्थ को प्राप्त करना संभव कैसे हो पाता है ? इसमे एक बात ध्यान देने कि है कि कोई भी मानव बिना पुरुषार्थ के कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता | कुछ भी प्राप्त करने के लिए कर्म करने आवश्यक हैं | जो व्यक्ति यह कहते हैं कि “किसी भी कर्म को करने से अच्छे अथवा बुरे या मिश्रित फल मिलते है, अतः कर्म करने से कर्म न करना अधिक उपयुक्त है” वे एकदम सफ़ेद झूठ बोल रहे हैं | मैं इन लोगों को केवल कर्मों को करने से भागने का मार्ग ढूँढने वाला पलायनवादी (Escapist) कहूँगा | इस संसार में प्रत्येक जीव के लिए कर्म करने आवश्यक हैं और यहाँ तक कि परमात्मा ने भी इस संसार में जब जब अवतार (Incarnation) लिया है, सभी रूपों में उन्होंने कर्म किये ही है | भला, बिना कर्म किये कोई पुरुषार्थ यानि फल कैसे प्राप्त कर सकते हैं ? मोक्ष भी बिना कर्म किये नहीं मिल सकता | अतः बिना पुरुषार्थ के फिर मानव जीवन का उद्देश्य ही भला क्या रह जायेगा ? सर्वप्रथम हमें यह निश्चित कर लेना है कि पुरुषार्थ करना ही है | कैसे करना है, यह सब आपके विवेक पर निर्भर करता है |
 पुरुषार्थ के प्रयत्न (पौरुष या कर्म के प्रकार ) –(Efforts for purusharth)-
              पुरुषार्थ प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले प्रयत्न को कर्म अथवा पौरुष कहते हैं | ये कर्म दो प्रकार के होते हैं – शास्त्र अनुमोदित या शास्त्र-सम्मत (According to norms) और शास्त्र विरुद्ध (Against the norms) | शास्त्र-सम्मत कर्म; पुण्यकर्म कहलाते है और शास्त्र-निषिद्ध कर्म, पापकर्म | इनमें जो शास्त्र-निषिद्ध पुरुषार्थ है वह अनर्थ का कारण है और शास्त्र-सम्मत पुरुषार्थ परमार्थ वस्तु की प्राप्ति का कारण है | जो पूर्व जन्म में अशुभ-पौरुष या कर्म किये गए हैं, उनका फल वर्तमान जीवन में प्राप्त होता है | इस अशुभ-पौरुष के प्रभाव को वर्तमान जीवन में शुभ-पौरुष से कम किया जा सकता है, इसमे कोई संशय नहीं है | अशुभ-पौरुष के प्रभाव को सम्पूर्ण रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता | अतः जीवन में सदैव ही शुभ-कर्म करने चाहिए जिससे हमें प्रत्येक जीवन में केवल अच्छे फल ही उपलब्ध हों और किसी प्रकार का कष्ट उठाना नहीं पड़े | जब इस जन्म के शुभ कर्मों से पूर्व मानव जन्म के अशुभ कर्मों के प्रभाव को कम किया जा सकता है तो इसका सीधा सा अर्थ यही हुआ कि वर्तमान जीवन के कर्म अधिक महत्वपूर्ण है, बजाय भूतकाल (Past) के जीवन के कर्मों के | इसीलिए यह कहा जाता है कि मनुष्य को वर्तमान (present) में ही जीना चाहिए क्योंकि भूतकाल के कर्मों के बारे में सोचने से कोई लाभ नहीं होने वाला | अकर्मण्य व्यक्ति (Lethargic) भाग्य, दैव अथवा प्रारब्ध (Destiny) के भरोसे बैठा रहता है अथवा कार्य सिद्ध नहीं होने पर उन्ही को कोसता रहता है | जबकि कर्मशील व्यक्ति (Laborious) अपने जीवन में कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखता |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

Tuesday, October 2, 2018

पुरुषार्थ - 7


पुरुषार्थ – 7  
                आत्मा, परमात्मा और संसार आदि सब विस्तृत विवेचन के विषय हैं | अतः इतना सा अल्प विवेचन ही हमें पुरुषार्थ को समझने के लिए पर्याप्त है | जब उपरोक्त 24 तत्व (पाँच भौतिक तत्व,दस इन्द्रियां, पाँच इन्द्रियों के विषय, मन,बुद्धि,अहंकार और चैतन्यता प्रदान करने वाली आत्मा) सम्मिलित हो जाते हैं तब यह भौतिक शरीर कर्म सम्पादित करने के योग्य हो जाता है | सूक्ष्म शरीर (Subtle body) और कारण शरीर (Causal body) के स्थूल शरीर (Gross body) के साथ संयोग हो जाने से से ही मनुष्य के भौतिक शरीर ((Physical body) का सही रूप में सञ्चालन हो पायेगा | पुरुषार्थ के लिए मनुष्य को कर्म करने आवश्यक है | कर्म किये बिना पुरुषार्थ की प्राप्ति असंभव है | पुरुषार्थ में उपलब्धियां चार प्रकार की होती हैं, वे हैं – धर्म (Righteousness), अर्थ (Prosperity), काम (Pleasure) और मोक्ष (Enlightenment or Liberation) है | इन चारों पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ करने की ही आवश्यकता होती है | धर्म और मोक्ष के लिए वर्तमान जीवन में पुरुषार्थ करना आवश्यक है जबकि अर्थ और काम की उपलब्धि मनुष्य को भाग्य अर्थात प्रारब्ध (Destiny) से होती है | प्रारब्ध या भाग्य पूर्व मनुष्य जन्म में किया गया पुरुषार्थ ही तो है | जो पुरुषार्थ शरीर के जीते जी प्राप्त नहीं हो सके, वे ही नए जन्म में प्रारब्ध, दैव या भाग्य बनकर आते हैं | अतः यह स्पष्ट है कि इस जगत में जो कुछ भी आप प्राप्त करना चाहते हैं, वे सब आपका पुरुषार्थ ही है, पुरुषार्थ के अतिरिक्त कुछ नहीं | प्रारब्ध, भाग्य या दैव कुछ भी नहीं है बल्कि पूर्व जन्म के पुरुषार्थ का केवल नाम परिवर्तन मात्र है |
       पूर्व जन्म के पुरुषार्थ, जो वर्तमान जीवन में प्राप्त होते हैं, वे हैं – अर्थ और काम तथा इसी जन्म में किये गए पुरुषार्थ इसी जीवन में प्राप्त किये जा सकते हैं, वे हैं – धर्म और मोक्ष | इस बात में किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए | जो मनुष्य यह सोचता है कि इस जन्म में कर्म करके पुरुषार्थ के रूप में काम और अर्थ को प्राप्त कर सकते हैं, तो वे बहुत बड़े भ्रम (illusion) में है | अगर ऐसा संभव होना होता तो फिर मनुष्य और अन्य प्राणियों में कोई अंतर ही नहीं रह जाता है | अन्य प्राणी भी तो पूर्व मानव जन्म के पुरुषार्थ को अपने  जीवन में प्राप्त करता है – काम और अर्थ के रूप में | परन्तु वह अपने इस जीवन में दो पुरुषार्थ - धर्म और मोक्ष को किसी भी प्रकार प्राप्त नहीं कर सकता | इन दोनों पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम तो उन्हें मानव रूप में जन्म लेना होगा अर्थात मनुष्य शरीर प्राप्त करना ही होगा  | इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया है कि दो पुरुषार्थ –अर्थ और काम तो पूर्व जन्म के फलीभूत पुरुषार्थ हैं और शेष दो पुरुषार्थ – धर्म और मोक्ष वर्तमान जीवन में किये जा रहे प्रयास से ही उपलब्ध हो सकते हैं | साथ ही साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पुनर्जन्म (Rebirth) का एक मात्र कारण अर्थ और काम को प्राप्त करने की इच्छा ही है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

Monday, October 1, 2018

पुरुषार्थ-6

पुरुषार्थ – 6
            इस जड़ शरीर (Static/physical body) में चेतनता आती है-चेतन (Conscious) के प्रवेश करने से | इस चेतन को ही आत्मा (Spirit) कहा जाता है | आत्मा “कारण शरीर” (Causal body) भी कहलाती है | अकेली आत्मा (Spirit) कभी भी किसी भौतिक शरीर में प्रवेश नहीं कर सकती | किसी भी स्थूल शरीर में प्रवेश करने के लिए उसे सूक्ष्म शरीर (Subtle body) अर्थात जीव की आवश्यकता होती है | यह 8 तत्वों वाला सूक्ष्म शरीर अर्थात जीव जब आत्मा से संयोग कर लेता है तब संयुक्त रूप से उसे ‘जीवात्मा’ (Soul) कहा जाता है | जब आत्मा सहित ‘पुर्यष्टक’ अर्थात 9 तत्वों से युक्त जीवात्मा (Soul) किसी स्थूल शरीर (Gross body) में प्रवेश पाता है तभी उस जड़ शरीर में सक्रियता (Activity) आ पाती है | तभी यह भौतिक शरीर चेतन अवस्था (Consciousness) को प्राप्त होता है | यही चेतन शरीर अब कार्यरूप लेकर कर्म करना प्रारम्भ करता है | इन्ही कर्मों (Acts) को जब मनुष्य करता है तब इन्हें उस मनुष्य का पुरुषार्थ कहा जाता है | यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि आत्मा की उपस्थिति शरीर को सक्रिय अवश्य करती है परन्तु वह पुर्यष्टक के साथ उपस्थित रहते हुए भी सदैव ‘न करोति न लिप्यते’ वाली स्थिति में बनी रहती है |
                कई महापुरुष आत्मा (Spirit) का अलग अस्तित्व स्वीकार नहीं करते और उनका यह कथन  बहुत सीमा तक सही भी है | कारण कि जब आत्मा (Spirit) और परमात्मा (God/supreme power) एक ही है तो फिर आत्मा का अलग से अस्तित्व (Existance) स्वीकार नहीं किया जा सकता | कारण और कार्य अलग नहीं हो सकते | परन्तु ज्ञानीजन साथ ही यह भी कहते हैं कि साधारणजन को समझाने के लिए कुछ समय के लिए ऐसा मान लेना आवश्यक हो जाता है कि आत्मा, परमात्मा का एक अंश (Piece) है और उसका मूल स्रोत (Original source) परमात्मा ही है | जब आत्मा संकल्प (Determine) करती है तभी चित (Psyche/supermind) का जन्म हो जाता है | चित्त ही चैतन्य (Consciousness) का प्रतीक है | यही चित्त मनुष्य के मन (Mind) का जनक है और इसी मन के विस्तार (Extension of mind)  से फिर इन्द्रियों के विषयों (Subjects of sense and act organs) का जन्म होता है | अतः यह माना जा सकता है कि आत्मा का प्रतिबिम्ब (Image) ही ‘पुर्यष्टक’ है, जिसमें मन के साथ चित्त को भी सम्मिलित कर लिया गया है |
            जब मन को नियंत्रित (control) कर लिया जाता है, तब चित भी निर्मल (Refind) हो जाता है | उसी समय आत्मा का यह प्रतिबिम्ब भी स्वतः ही मिट जाता है और आत्मा स्वतन्त्र हो जाती है | आत्मा का स्वतन्त्र हो जाना ही उसका परमात्मा में विलीन हो जाना है | कार्य का कारण में विलय होना अवश्यम्भावी है | इस बात को स्पष्ट करने के लिए समुद्र और उसमें उठ-मिट रही लहरों का उदाहरण देना चाहूँगा | इसमें लहर समुद्र से अलग थोड़े ही है | लहरें उठती हैं और मिट जाती हैं | समुद्र में ही बनती है और फिर समुद्र में ही विलीन हो जाती है | आत्मा और परमात्मा का इसी प्रकार लहर और समुद्र का सा सम्बन्ध है | जिस प्रकार एक लहर समुद्र से अलग नहीं है, उसी प्रकार आत्मा परमात्मा से अलग नहीं है | जिस प्रकार समुद्र से उठते ही लहर अलग प्रतीत होती है उसी प्रकार आत्मा एक भौतिक शरीर को प्राप्त कर उसके साथ सम्बन्ध बना लेती है तब जीवात्मा हो जाती है और अपने आपको परमात्मा से अलग मानने लगती है | वास्तविकता में लहर और समुद्र एक ही हैं और आत्मा और परमात्मा भी एक ही हैं |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम्||

पुरुषार्थ-5

पुरुषार्थ – 5
                  आइये जानें कि हमारे सनातन शास्त्र इस जड़ शरीर को सक्रिय करने के बारे में क्या कहते है ? हमारे इस भौतिक जड़ शरीर (Gross body) को सक्रियता प्रदान करता है, हमारा ही सूक्ष्म शरीर (Subtle body) | सूक्ष्म शरीर के अंतर्गत आते हैं- ज्ञानेन्द्रियों के पांच विषय – शब्द (Sounds), स्पर्श (Sensations like touch,temperature etc.), रूप (Vision), रस (Taste) और गंध (Smell)| इनके साथ मन (Mind), बुद्धि (Intelligence) और अहंकार (Ego) ये तीन तत्व और सम्मिलित हैं, इस सूक्ष्म शरीर में | इस प्रकार कुल आठ तत्वों से इस सूक्ष्म शरीर का निर्माण होता है | इन आठ तत्वों के समूह को “पुर्यष्टक” कहा जाता है और इस शरीर को “आतिवाहिक शरीर“ (Subtle body)| यही शरीर (8 तत्वों से युक्त) जब भौतिक शरीर को त्याग कर बाहर निकल जाता हैं तब हम उस भौतिक शरीर को ‘मृत’ (Dead) कह देते हैं | यह “आतिवाहिक” शरीर ही पुनर्जन्म (Rebirth) और आवागमन का कारण है, अन्य कोई कारण नहीं है | यह सूक्ष्म शरीर स्थूल प्रकृति का नहीं है क्योंकि इसका कोई भी तत्व हमें अपनी आँखों से दिखाई नहीं देता है परन्तु सूक्ष्म होते हुए भी इसको भी स्थूल शरीर की भांति असत ही माना गया है, क्योंकि ये सभी तत्व भी परिवर्तनशील (Changeable) अर्थात अस्थाई (Unstable) हैं | इस प्रकार 15 तत्व स्थूल शरीर के और 8 तत्व सूक्ष्म शरीर के, कुल मिलाकर 23 तत्व इस असत शरीर का निर्माण करते हैं | स्थूल और सूक्ष्म शरीर के मिलने के उपरांत भी यह शरीर असत ही है क्योंकि इसके निर्माण में प्रयुक्त सभी तत्व परिवर्तनशील है | इनमे स्थायित्व का अभाव है अतः ये नित्य नहीं है | नित्य नहीं है, इसलिए सत भी नहीं है | जब इन 23 तत्वों के साथ चेतन के रूप में आकर 24वां तत्व सम्मिलित होता है, तभी यह भौतिक शरीर कर्म करने हेतु तैयार हो सकता है, उससे पहले नहीं | 15 तत्वों के स्थूल शरीर और 8 तत्वों के सूक्ष्म शरीर (आतिवाहिक) के मिलने से बना यह शरीर हिलडुल सकता है, उसमें प्राणों का प्रादुर्भाव अवश्य हो जाता है अर्थात इस शरीर में जीवन है, ऐसा कहा जा सकता है, परन्तु चेतनता (Consciousness) का अभी भी सर्वथा अभाव होता है | इससे यह सिद्ध होता है कि स्थूल शरीर जड़ ही है और सूक्ष्म शरीर जीव है | अकेले सूक्ष्म शरीर से भी इस जड़ शरीर में जीवन तो आ सकता है परन्तु सक्रियता नहीं आ सकती | उपरोक्त 23 तत्वों को मिलाने के उपरांत भी यह भौतिक शरीर जड़ का जड़ ही बना रहता है, हालाँकि इन 23 तत्वों से बने इस शरीर को ‘जीवित’ होना कहा जा सकता है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
||हरिः शरणम् ||

पुरुषार्थ-4

पुरुषार्थ – 4     
 पुरुषार्थ के योग्य मानव शरीर-
          इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया है कि संसार में आने के बाद व्यक्ति जो भी कार्य अपने अभीष्ट (Desirable) को प्राप्त करने के लिए सम्पादित करता है उसे हम उसका पुरुषार्थ कहते हैं | कार्य अथवा कर्म मनुष्य कर्मेन्द्रियों के द्वारा करता है | कर्मेन्द्रियाँ (Organs for act) पांच होती है – वाक् (Vocal cords and tongue), हस्त (Hands), पाद (Legs), उपस्थ (प्रजननांग) (Organs of reproduction) और पायु (Organs of excretion)| कर्मेन्द्रियों की तरह ही पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (Organs for sense) होती है - श्रवनेंद्रिय या श्रोतेंद्रिय अर्थात कान(Organ for hearing, ear), त्वगेंद्रिय अर्थात त्वचा(organ to feel sensations, skin), तेजेंद्रिय या दर्शनेंद्रिय अथवा नयन(Organ of sight, eyes), रसेंद्रिय या स्वादेंद्रिय अथवा जिव्हा(Organ for taste, tongue)तथा घ्रानेंद्रिय अर्थात नाक (Organ for smell, nose)| इन समस्त इन्द्रियों का इस भौतिक शरीर के निर्माण में उपयोगी पांच भौतिक तत्वों – आकाश (Ether), वायु (Air), अग्नि (Fire), जल (Water) और पृथ्वी (Earth) से ही हुआ है | इस प्रकार कुल 15 तत्वों से मिलकर यह स्थूल शरीर बनता है | इन तत्वों को स्थूल इस लिए कहा जाता है क्योंकि इन सभी तत्वों हम अपनी आँखों से देख सकते हैं | इन सभी तत्वों को असत भी कहा जाता है क्योंकि ये सभी परिवर्तनशील है | जो परिवर्तनशील है, जिनमे स्थायित्व भाव नहीं है, भला वह सत कैसे हो सकता है | अतः ये सभी तत्व स्थूल और जड़ प्रकृति वाले कहे गए हैं और असत हैं | ये सभी तत्व मिलकर एक भौतिक शरीर (Physical body) का निर्माण करते हैं |
                   कोई भी भौतिक शरीर तब तक कार्यरूप ग्रहण नहीं कर सकता जब तक कि उसको संचालित करने की शक्ति प्राप्त न हो | अतः यह सिद्ध होता है कि स्थूल शरीर (Gross body) किसी भी प्रकार का कार्य जिसे मनुष्य अपना पुरुषार्थ कहता है, तब तक सम्पादित नहीं कर पायेगा जब तक कि उसे उस कार्य को करने के लिए दिशा निर्देश (Directions) नहीं मिले | जब तक मात्र उपरोक्त वर्णित केवल 15 तत्व एक साथ होते हैं, तब तक वे जड़ (Static) ही बने रहेंगे | उस जड़ शरीर में अगर क्रियाशीलता (Activity) लानी है तो फिर उसे सक्रिय करना होगा | इस जड़ शरीर में सक्रियता आती है, उसके चैतन्य भाव (Consciousness) को प्राप्त करने से | चैतन्य भाव कहाँ से आएगा ? प्रश्न यही उठता है | यह देह है, कोई रोबोट तो है नहीं कि उसे विद्युत् प्रदान करके संचालित किया जा सके | इस जड़ शरीर को आज तक कोई भी वैज्ञानिक अपने स्तर पर प्रयास करते हुए सक्रिय नहीं कर पाया है | जिस दिन विज्ञान ऐसा करने में सफल हो जायेगा उस दिन मानव जीवन अपने चरम (Peak) पर होगा | फिर उसके विकास की यह पराकाष्ठा (Height) होगी  | विज्ञान इस शरीर के सक्रिय होने के बारे में अभी भी मौन है परन्तु हमारे सनातन शास्त्र नहीं | जिस स्थिति में हमारा विज्ञान आज तक पहुंचा है वह हमारे ही शास्त्रों के कारण संभव हुआ है | आज तक जो भी नई नई खोज वैज्ञानिकों ने की है, सब की सब हमारे शास्त्रों में पहले से वर्णित है | आधुनिक विज्ञान के अंधभक्त प्रायः ऐसे प्रश्न करते रहते हैं, जिनका उत्तर समझदार व्यक्तियों द्वारा हजारों वर्षों पहले ही दे दिया गया होता है | वे सभी उत्तर हमारे शास्त्रों में समाहित हैं | आवश्यकता है, समय निकाल कर कुछ उन शास्त्रों का भी अध्ययन कर लिया जाए | हमारे शास्त्रों में तो यह जड़ शरीर सक्रिय कैसे होता है, इसकी जानकारी भी उपलब्ध है, परन्तु विज्ञान अभी इस सम्बन्ध में मौन है |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||