Friday, March 9, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 7


गीता-ज्ञान की सार्थकता – 7
                         एक बार एक चील को कहीं से एक मरा हुआ चूहा दिखलाई पड़ गया | वह भूख से बुरी तरह तड़प रही थी | उसने उस मरे हुए चूहे को अपने पंजों में जकड़ा और आकाश की अनंत ऊँचाइयों की तरफ उड़ चली | वह तलाश में थी एक ऐसे स्थान की, जहाँ शांति के साथ बैठ कर वह उस चूहे को उदरस्थ कर सके | परन्तु दुर्भाग्य, कुछ चीलों ने उसे चूहा ले जाते हुए देख लिया | अब तो सभी चीलें उसके पीछे पड़ गयी | एक-एक कर प्रत्येक चील उस अकेली चील को अपनी नुकीली चोंच और पंजों से आक्रमण कर घायल कर रही थी | जिस चील के पंजों में मरा हुआ चूहा था वह समझ ही नहीं पा रही थी कि आज अचानक ही अन्य सभी चीलें उसकी दुश्मन क्यों बन गयी है ? उस चील ने अपने जीवन में आज तक इस प्रकार के किसी संघर्ष का सामना नहीं किया था और आज उसके समक्ष ऐसी परिस्थिति बन गयी थी कि वह समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर उसके साथ  ऐसा हो क्यों रहा है ?
                   इसी संघर्ष में आखिर उस चील के पंजों से वह चूहा छूट गया | चूहे के छूटते ही अन्य चीलों ने भी उस चील पर आक्रमण करना छोड़ दिया | घायल चील संघर्ष करते-करते थक गयी थी | वैसे वह पहले से ही भूख से निढाल हो रही थी | थककर वह एक पेड़ की चोटी पर बैठ गयी और विचार करने लगी कि आखिर अन्य चीलों ने उस पर आक्रमण क्यों किया था ? वह तो केवल अपना आहार ही तो ले जा रही थी, उसने किसी का कुछ बुरा तो नहीं किया था | उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर उससे कहाँ और क्या भूल हुई जिसके कारण वह इस प्रकार हिंसा का शिकार बनी ? तभी उसकी दृष्टि उन चीलों पर गयी जो कुछ समय पहले तक उसके साथ संघर्ष कर रही थी | उसने देखा कि अब वे सभी चीलें उस मरे हुए चूहे को पाने के लिए एक दूसरे से संघर्ष कर रही थी | सभी चीलें सबसे पहले उस चूहे तक पहुँचने के लिए एक दूसरे का रास्ता रोक रही थी | उनके मध्य बड़ी ही रोचक प्रतिस्पर्धा चल रही थी | थोड़े से चिंतन से उस चील को स्वयं के विरुद्ध हुयी उस हिंसा का उत्तर मिल गया | वह समझ गयी कि उसके विरुद्ध अन्य चीलों के हिंसक होने का एक मात्र कारण वह मरा हुआ चूहा था | चूहे के छूटते ही उसके विरुद्ध होने वाली हिंसा भी छूट गयी थी | अब उसको एक दम स्पष्ट हो गया था कि उसके विरुद्ध हो रही हिंसा का कारण था, वह मरा हुआ चूहा और उससे मिट सकने वाली भूख | भूख नहीं होती तो हिंसा भी नहीं होती | कहने का अर्थ है कि भूख हिंसा को जन्म देती है | किसी से आहार छीन लेने के लिए हिंसा अथवा शिकार कर आहार पाने के लिए हिंसा | दोनों ही प्रकार की हिंसा के मूल में भूख ही है | इस दृष्टान्त से मूल बात यह निकल कर हमारे सामने आती है कि हिंसा का आधार भूख है और भय का आधार हिंसा है | अतः परोक्ष रूप से यह कहा जा सकता है कि भय की जननी भूख है |
             यह तो हुई अन्य प्राणियों की बात, परन्तु क्या मनुष्य के साथ भी ऐसा ही होता है ? क्या मनुष्य भी भूख शांत करने के लिए हिंसक हो सकता है ? भूख क्या सिर्फ और सिर्फ भोजन मिलने मात्र से ही मिट जाती है ? तीनों ही प्रश्नों का उत्तर हम सभी जानते हैं | प्रथम प्रश्न का उत्तर है, हाँ, मनुष्य भी अन्य प्राणियों से भिन्न नहीं है | दूसरे प्रश्न का उत्तर है, मनुष्य भी भूख को शांत करने के लिए हिंसक हो सकता है | तीसरे और अंतिम प्रश्न का उत्तर है कि सभी प्राणियों में पेट की भूख तो आहार मिलने से मिट जाती है परन्तु मनुष्य की भूख केवल आहार की नहीं होती बल्कि कई प्रकार की होती है, जो सब कुछ प्राप्त हो जाने के बाद भी मिट नहीं पाती | अतः  सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य ही सभी जीवों में एक मात्र जीव ऐसा है, जिसकी भूख भोजन पाकर भी शांत नहीं होती | यही कारण है कि मनुष्य जीवन भर भय से मुक्त नहीं हो पाता |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Thursday, March 8, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 6


गीता-ज्ञान की सार्थकता – 6
                          आहार प्राप्ति के लिए एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी को शिकार बनाना उनकी प्रकृति है | इसमें किसी प्रकार की हिंसा नहीं है | इसमें हिंसा हम मनुष्यों को इसलिए प्रतीत होती है क्योंकि हम मानते हैं कि स्वयं के आहार के लिए दूसरे जीव के जीने के अधिकार को छीन लेना एक प्रकार की हिंसा ही है | एक मेंढक छोटे-मोटे कीड़ों का शिकार करता है और वही मेंढक स्वयं एक सर्प का भोजन बन जाता है | इसी प्रकार एक सांप भी बाज, चील आदि पक्षियों का शिकार है | एक बड़ी मछली का भोजन समुद्र में तैर रही छोटी मछलियाँ ही होती है | इस प्रकार की कथित हिंसा में न तो कोई अपराधी है और न ही कोई पीड़ित | एक प्राकृतिक नियम के अनुसार सब एक दूसरे का आहार बनते हैं | ‘जीवो जीवस्य भोजनम्’ अर्थात जीव ही जीव का भोजन है | एक शेर जब मृग का शिकार आहार के लिए करता है, तब उसके भीतर किसी प्रकार की हिंसा का भाव नहीं होता | वह तो अपनी भूख मिटाने के लिए यह सब कर रहा होता है | क्षुधा की तृप्ति के लिए शेर के सामने चाहे मृग आये अथवा भैंस; उसको तो वह केवल आहार नज़र आता है |  एक बार शिकार कर लेने के बाद चाहे उसके सामने मृग आये अथवा अन्य कोई जानवर, उसके भीतर किसी प्रकार की इच्छा उत्पन्न नहीं होती कि वह उसका शिकार करे | ‘बुभुक्षितः किम् न करोति पापम्”, यह उक्ति यही स्पष्ट करती है कि भूखा प्राणी अपनी क्षुधा शांत करने के लिए किसी भी प्रकार का पाप (हिंसा) कर सकता है |
                    यह तो हुयी मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों की बात | परन्तु मनुष्य इन सब प्राणियों से अलग है | वह बुद्धिमान और विवेकी है | मनुष्य के अनुसार आहार प्राप्ति के लिए की जाने वाली भी हिंसा दो प्रकार की होती है | एक जीव को स्वयं की क्षुधा शांत करने के लिए आहार बनाना पहली  प्रकार की हिंसा है | दूसरे प्रकार की हिंसा है स्वयं की भूख मिटाने के लिए येन केन प्रकारेण किसी दूसरे के आहार को छीनने का प्रयास करना | पहली प्रकार की हिंसा में एक जीव दूसरे जीव को मारकर उससे अपनी भूख मिटाता है जबकि दूसरे प्रकार की हिंसा में वह प्राणी किसी दूसरे प्राणी से आहार छीनने का प्रयास करता है | इस प्रकार छीनने के प्रयास में एक प्राणी अपराधी (Accused)  बन जाता है और दूसरा प्राणी पीड़ित (Victim) हो जाता है, जबकि इसके विपरीत पहली प्रकार की हिंसा में न कोई अपराधी होता है और न ही कोई पीड़ित | इस प्रकार हम विवेकवान मनुष्य समझ सकते हैं कि किसी एक जीव का दूसरे जीव को आहार बनाना उसके लिए हिंसा नहीं है बल्कि हिंसा होती है किसी दूसरे के आहार को स्वयं की उदर पूर्ति के लिए छीनने का प्रयास करना | हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि एक के अधिकार को छीनने का प्रयास जो कोई भी करता है, उसको रोकने का प्रयास करना | महाभारत में भगवान श्री कृष्ण यही बात अर्जुन को कह रहे हैं | पांडवों का अधिकार कौरवों ने छीन लिया था जो कि अनुचित था | इसी कारण से भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों को पुनः अपना अधिकार प्राप्त कर लेने के लिए अंतिम विकल्प के रूप में युद्ध करने का सुझाव दिया था |
क्रमशः
प्रस्तुति – डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Wednesday, March 7, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 5


गीता-ज्ञान की सार्थकता – 5
                                      सभी सजीव प्राणियों में एक बात की समानता अवश्य होती है-भूख की | सभी जीवित प्राणियों को भूख लगती ही है, चाहे वह चर हो अथवा अचर | भूख पर विजय पाने के लिए आहार (Food) की आवश्यकता होती है | आहार पाने के लिए ही पेड़-पौधों में वृद्धि होती है | उसकी जड़ें (Roots) भूमि की गहराई को नापते हुए भोजन के लिए जल व आवश्यक तत्व जुटाती है | तना (Stem) बढ़कर आकाश की ऊँचाइयों को छूने लगता है, जिससे पत्तियों (Leaves) को अधिक से अधिक सूर्य का प्रकाश (Sunlight) उपलब्ध हो सके | सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में भोजन का निर्माण जल और अन्य आवश्यक तत्वों से किया जाता है, जिसे प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) कहा जाता है |               
             चर प्राणियों में पेड़-पौधों की तरह स्वयं के द्वारा भोजन बनाने की सुविधा परमात्मा ने प्रदान नहीं की है | अतः उन्हें भोजन प्राप्त करने के लिए अपने स्तर पर प्रयास करना पड़ता है | किसी भी प्रकार से अपनी क्षुधा शांत करने के लिए भोजन प्राप्त करने की इच्छा चर सजीव को हिंसक (Violent) बना देती है | हिंसा (Violence) चर प्राणी को भोजन तो प्रदान करा देती है परन्तु साथ ही साथ स्वयं के द्वारा की गयी उस हिंसा के कारण वह भयग्रस्त (Frightened) भी हो जाता है क्योंकि वह समझ जाता है कि जिस प्रकार उसने हिंसा के माध्यम से भोजन प्राप्त किया है, एक दिन वह भी इसी प्रकार अन्य किसी भूखे प्राणी का भोजन बन सकता है |
               भूख के कारण भय (Fear) पैदा होता है | भय पैदा होने का मुख्य कारण होता है मृत्यु, स्वयं का अस्तित्व मिट जाने का भय | यह भय दो कारणों से होता है-निराहार (Starvation) रहने से हो सकने वाली संभावित मृत्यु से तथा किसी निराहारी का आहार बन जाने की सम्भावना से | दोनों ही परिस्थितियों के कारण से प्राणियों में असुरक्षा (Insecurity) की भावना भी पैदा हो जाती है | यह भय (Fear) इसलिए भी पैदा होता है क्योंकि वह यह सोचता है कि जिस प्रकार उसने शिकारी (Predator) बनकर किसी अन्य प्राणी का शिकार किया है, उसी प्रकार वह स्वयं भी कभी न कभी किसी का शिकार (Prey) भी बन सकता है | इस प्रकार उसकी प्रजाति का उसके परिवार का एक न एक दिन विलुप्त होना संभव हो सकता है  | इसकी प्रतिक्रिया में वह स्वयं की प्रजाति और परिवार को संसार में बनाये रखने के लिए संतान उत्पत्ति में रत हो जाता है | जो प्राणी सबसे अधिक शिकार बनता है, प्रकृति (Nature)  के इस नियम के अनुसार उसमें संतान उत्पत्ति की दर (Rate) भी सर्वाधिक होती है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Tuesday, March 6, 2018

गीता ज्ञान की सार्थकता - 4


गीता-ज्ञान की सार्थकता – 4
             कर्म करने के पीछे भी केवल प्रकृति के गुणों की ही भूमिका रहती है | यही कारण है कि मनुष्य में चाहे तीनों में से किसी भी एक गुण की प्रधानता हो, वह कर्म करने को विवश अवश्य होता है | प्रकृति के उपरोक्त तीनों गुण प्रत्येक व्यक्त हुए सजीव अथवा निर्जीव, सभी में उपस्थित रहते हैं | फिर क्या कारण है कि इनमें से केवल मनुष्य ही कर्म करने को विवश है ? निर्जीव को तत्व (Element) कहते हैं क्योंकि उनका शरीर केवल तत्वों से ही आकार लेता है | ये तत्व स्वेच्छा से कहीं पर भी आ जा नहीं सकते इसीलिए इनको जड़ कहा जाता है | उनमें गति प्रदान करने के लिए बाह्य बल की आवश्यकता होती है | प्रत्येक तत्व में भी प्रकृति के तीनों गुण उपस्थित रहते हैं | किसी भी एक तत्व में उपस्थित प्रकृति के तीन गुण विद्युतीय (Electrical), भौतिक (Physical) और रासायनिक (Chemical) गुण कहलाते हैं | सजीव में यही गुण क्रमशः सात्विक, राजसिक तथा तामसिक गुण कहलाते हैं | सजीव का शरीर पदार्थ से (Matter) बना होता है, जिसकी इकाई (Unit) भी यह तत्व ही होता है | सजीव प्राणियों में फिर से दो विभाग किये जा सकते हैं – चर (Motile) और अचर (Nonmotile)| चर प्राणी वे होते हैं जो किसी भी माध्यम में  स्वेच्छा से चल-फिर सकते हैं और अचर प्राणी वे प्राणी होते हैं, जो किसी भी माध्यम में  स्वेच्छा से विचरण नहीं कर सकते | अचर प्राणियों के अंतर्गत सभी प्रकार के पेड़-पौधे आ जाते हैं तथा चर प्राणियों के अंतर्गत मनुष्य और अन्य सभी इधर उधर घूम-फिर सकने वाले प्राणी आते हैं |
                    पदार्थ (Matter) की इकाई (Unit) तत्व (Element) है | पदार्थ से ही प्राणी की कोशिका (Cell) का निर्माण होता है | कई कोशिकाएं मिलकर उत्तक (Tissue) बनाती है | उत्तकों से अवयवों (Organs) का निर्माण होता है और विभिन्न अवयव मिलकर भौतिक शरीर (Physical body) का निर्माण करते हैं | इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राणी के शरीर की इकाई कोशिका हुई और कोशिका की इकाई तत्व हुआ | इससे यह समझा जा सकता है कि बिना तत्व के प्राणी के शरीर की कल्पना नहीं की जा सकती | बिना किसी तत्व के योगदान के शरीर का बनना असंभव है | तत्व में उपस्थित प्रकृति के गुण ही इस भौतिक शरीर में क्रिया करने के लिए उत्तरदाई है | जिस प्रकार एक तत्व में उपस्थित प्रकृति के गुणों की आपस में क्रियाओं का एक निश्चित परिणाम होता है, ठीक उसी प्रकार प्राणी के भौतिक शरीर में होने वाली क्रियाओं का भी एक निश्चित परिणाम होता है | मनुष्य में ये क्रियाएं कर्म कहलाती हैं क्योंकि अपने शरीर में वह स्वयं इन क्रियाएं को करने के लिए स्वतन्त्र है | जो क्रियाएं स्वतः होती रहती है और हमारे नियंत्रण में नहीं (Involuntary acts) होती है, उसके परिणाम का हमें पूर्णतः ज्ञान नहीं हो सकता परन्तु जो क्रियाएं अर्थात कर्म हम स्वेच्छा (Voluntary  acts) से करते हैं, उनका परिणाम निश्चित होता है और जो हमारे ज्ञान में भी होता है | इससे स्पष्ट है कि जो क्रियाएं व्यक्ति अपनी इच्छानुसार संपन्न करता है, उन कर्मों के परिणाम भी उन क्रियाओं के अनुसार उसे अवश्य ही प्राप्त होते हैं | किसी भी कर्म के परिणाम कभी भी नष्ट नहीं हो सकते अर्थात प्रत्येक कर्म का कोई न कोई परिणाम अवश्य ही मिलता है |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Monday, March 5, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 3


गीता-ज्ञान की सार्थकता – 3    
          श्रीमद्भगवद्गीता को आधार बनाते हुए कुछ समय पूर्व मैंने पाँच श्रृंखलाएं आपके समक्ष प्रस्तुत की थी | प्रारम्भ में हमने ‘न करोति न लिप्यते’ व ‘गहना कर्मणो गति’ श्रृंखलाओं में चिंतन करते हुए ‘कर्म-योग’ पर चर्चा की थी | तत्पश्चात ‘ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिम्’ नाम की श्रृंखला के अंतर्गत ‘ज्ञान-योग’ पर चिंतन किया गया था | ‘भक्ति-योग’ पर चिंतन के लिए ‘मन्मना भव मद्भक्तो’ श्रृंखला थी | भक्ति  की पराकाष्ठा पर पहुँचने और शरणागति को समझने के लिए पांचवीं श्रृंखला ‘मामेकं शरणं व्रज’ के अंतर्गत भक्ति और शरणागति के अति सूक्ष्म अंतर को समझने का प्रयास किया गया था | कर्म, भक्ति और ज्ञान मार्ग एक दूसरे के पूरक मार्ग है | मनुष्य के जीवन में कभी भी ऐसा अवसर नहीं आ सकता जब वह केवल एक मार्ग पर चलते हुए आत्म-बोध को उपलब्ध हो सके | यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी भी मनुष्य में केवल एक ही प्राकृतिक गुण की उपस्थिति नहीं हो सकती | मनुष्य जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सत, रज और तम तीनों प्राकृतिक गुणों की उपस्थिति होनी आवश्यक है | हाँ, यह बात अलग है कि तीनों गुणों में से किसी एक प्राकृतिक गुण की प्रधानता प्रत्येक मनुष्य में होती है | किसी में सत्व गुण की प्रधानता होती है, किसी में रज की और किसी में तमोगुण की | आत्म-बोध के लिए सांसारिक व्यक्ति के लिए कर्म-योग उपयुक्त अवश्य होता है, परन्तु आत्म-बोध के लिए कर्म के साथ-साथ ज्ञान और भक्ति की उपस्थिति भी आवश्यक होती है | केवल एक अकेले कर्म-योग से भी आत्म-ज्ञान होना संभव नहीं हो सकता |
                 कर्म-योग व्यक्ति के कुछ न कुछ करते रहने से सम्बंधित है | हमारे द्वारा किये जाने वाले कर्म हमारा व्यवहार (Conduct) निर्धारित करते है | भक्ति-योग मनुष्य की भावनाओं (Emotions) से सम्बंधित है जबकि ज्ञान-योग मनुष्य के व्यक्तित्व से, स्वयं के अस्तित्ववान (Personal identity) होने से सम्बंधित है | आत्म-बोध, केवल कुछ करने से अथवा जानने से अथवा भावना व्यक्त करने से, इन तीनों में से किसी अकेले एक से संभव नहीं हो सकता | तीनों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है, तभी व्यक्ति योगी हो सकता है | हाँ, मनुष्य में उपस्थित प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता इन तीनों में से किसी एक मार्ग अथवा योग के चयन को सुनिश्चित अवश्य ही कर देता है | प्रकृति के गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता  के अनुरूप ही मनुष्य को इनमें से कोई एक मार्ग अधिक प्रभावित करता है अथवा वह इन तीनों ही मार्गों से विमुख भी बना रह सकता है | सब कुछ प्रकृति के गुणों की उपस्थिति और किसी एक गुण की प्रधानता पर निर्भर करता है | जो व्यक्ति इन तीनों योग में से किसी भी एक योग को मुख्य साधन नहीं बना सकता इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कर्म करने से भी विमुख हो जाता है | कर्म करना अलग है और कर्म-योगी होना अलग है | अतः व्यक्ति भले ही किसी एक योग को आत्मसात न करे परन्तु कर्म तो उसको फिर भी करने ही पड़ेंगे |
क्रमशः
प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Sunday, March 4, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 2


गीता ज्ञान की सार्थकता – 2
           इस ज्ञान के लुप्तप्राय हो जाने का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि ज्ञान सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो गया था, बल्कि इसका अर्थ है कि ज्ञान स्मृति में नहीं रह पाया था | स्मृति के लोप हो जाने का अर्थ ज्ञान का नष्ट हो जाना नहीं है बल्कि उस ज्ञान की स्मृति में न बने रहना है | गीता-ज्ञान शाश्वत ज्ञान है, सनातन ज्ञान है, यह कभी भी नष्ट नहीं हो सकता | तभी तो जब भगवान श्री कृष्ण गीता-ज्ञान का समापन कर रहे होते हैं, तभी अर्जुन कह उठते हैं –
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||गीता-18/73||
अर्जुन स्वीकार करते हैं कि हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |
                         प्रश्न यह उठता है कि क्या भगवान श्री कृष्ण से ज्ञान पाकर सचमुच में अर्जुन का मोह नष्ट हो गया था ? क्या उसने स्मृति प्राप्त कर ली थी ? स्मृति उस ज्ञान की जो उसके जीवन में मोह उत्पन्न हो जाने के कारण विस्मृत हो गया था |क्या वह पूर्णरूप से संशय रहित हो गया था ? हमारा जीवन भी अर्जुन की तरह का ही जीवन है | हमारे में और अर्जुन में तनिक मात्र भी भिन्नता नहीं है | अर्जुन को साक्षात् परमात्मा से ज्ञान प्राप्त हुआ था और हमें वही ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता से मिल रहा है और संशय रहित होने के लिए हमें योग्य गुरु भी उपलब्ध है | फिर क्या कारण है कि हम स्मृति प्राप्त कर लेने के बाद भी बार-बार मोह में पड़ जाते हैं और ज्ञान को विस्मृत कर संशयग्रस्त हो जाते हैं ? यह सब जानने के लिए हमें उस प्रसंग में उतरना होगा जो महाभारत में वर्णित है | महाभारत में वर्णित ये प्रसंग अर्जुन से सम्बंधित है जो गीता-ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत उसके जीवन में घटित हुए हैं | हमारे में और अर्जुन में नाम, समय और स्थान आदि का अंतर भले ही हो परन्तु उसकी और हमारी मानसिकता में तनिक भी अंतर नहीं है | इसी से हम समझ सकते हैं कि जो कुछ अर्जुन ने गीता-ज्ञान प्राप्त कर के अपने जीवन में जो किया वह हम भी कर सकते हैं | हम जब यह समझ लेंगे कि अर्जुन ने गीता-ज्ञान का कैसे उपयोग (Utilise) किया तभी हम श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान ग्रन्थ की सार्थकता (Significance) को समझ पाएंगे |
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

Saturday, March 3, 2018

गीता-ज्ञान की सार्थकता - 1


गीता-ज्ञान की सार्थकता - 1
                          श्रीमद्भगवद्गीता न जाने कितनी बार कही गयी है और सुनी गयी है परन्तु इस गीता-ज्ञान को कहने और सुनने से अधिक महत्वपूर्ण है कि हम यह जानें कि इसको कितने व्यक्तियों ने आत्मसात किया है | गीता-ज्ञान की प्रासंगिकता इसी से सिद्ध होगी, कहने और सुनने मात्र से नहीं | अगर इस ज्ञान को किसी भी व्यक्ति द्वारा आत्मसात नहीं किया जायेगा तो एक दिन यह गीता भी लुप्तप्राय हो जाएगी | गीता चाहे कुछ समय के लिए लुप्तप्राय हो जाये परन्तु अप्रासंगिक होना असंभव है | इस गीता को पुनर्जीवित करने के लिए फिर एक बार श्री कृष्ण को इस धरा पर अवतार लेना होगा और साथ ही अर्जुन को भी, जो यह ज्ञान सुन सके | गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं इस बात को स्वीकारते हुए अर्जुन को कह रहे हैं –
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेSब्रवीत् ||
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||गीता-4/1-2||
श्री कृष्ण कह रहे हैं-हे अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा | इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग इस धरा से लुप्तप्राय हो गया | 
                गीता-ज्ञान बड़ा ही विलक्षण ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने वाला योग्य पात्र होना आवश्यक है | जब किसी योग्य पात्र का अभाव हो जाता है तभी यह ज्ञान लुप्तप्राय हो सकता है अन्यथा नहीं | यही कारण है कि गीता की अनेकों विद्वानों ने अपने अनुसार व्याख्याएं की है, जिससे इस ज्ञान के प्रति समाज में रुचि बनी रहे और योग्य पात्रों का कभी अभाव न होने पाये | आज से नयी प्रारम्भ होने वाली इस श्रृंखला में मैं उन महत्वपूर्ण तथ्यों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करने जा रहा हूँ, जिससे हम यह समझ सकें कि कमी गीता-ज्ञान में नहीं है बल्कि हमारे में है, जो इस ज्ञान का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं | श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता इसके ज्ञान को आत्मसात करने में ही है केवल पढ़ने, सुनने और व्याख्या करते रहने में नहीं | अगर हम केवल इन तीन कार्यों में ही उलझे रहे तो एक दिन यह ज्ञान भी अपनी प्रासंगिकता खोकर लुप्तप्राय हो जायेगा |
क्रमशः
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||