Tuesday, January 13, 2015

कर्म-योग |-14

योग-कर्म के लिए आवश्यक तत्व-
              जीवन में प्रारम्भ के दो वर्ष ही अति महत्वपूर्ण होते हैं | इस अवधि में मानसिक विकास बड़ी ही तेजी के साथ होता है |इस मानसिक विकास के साथ साथ प्रकृति के शेष बचे तीन जड़ तत्व मन, बुद्धि और अहंकार का भी विकास होता है |उपरोक्त तीनों तत्व ही व्यक्ति को भोग-कर्म से योग-कर्म की तरफ अग्रसर करते हैं |जिन शिशुओं में इन तीन तत्वों का विकास अगर किसी कारणवश सुचारु रूप से नहीं हो पाता तो फिर ऐसी स्थिति में उसका भोग-कर्म से योग- कर्म की तरफ जाना असंभव है | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में उपरोक्त तीनों तत्वों का या तो सर्वथा अभाव होता है या फिर उनका विकास सुचारु रूप से नहीं हो पाता |इसी कारण से वे केवल भोग-योनियाँ ही मानी जाती है |उनमें योग-कर्म करने की क्षमता का विकास ही नहीं हो पाता |यही कारण है कि मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों द्वारा किये जा रहे कर्मों का उन्हें किसी भी प्रकार का फल नहीं मिलता ,वे कर्म संचित नहीं हो सकते |अतः इनको योग-कर्म नहीं कहा जा सकता |अन्य प्राणियों द्वारा किये जा रहे कर्म, मात्र पूर्व मानव जन्म में किये गए कर्मों के फल के भोग के लिए ही होते हैं|

                    ठीक इसी प्रकार जिन शिशुओं में मन, बुद्धि और अहंकार का विकास नहीं होता,वे शिशु मात्र भोग-कर्म के  लिए ही इस संसार में आते हैं |उनके द्वारा योग-कर्म करना असंभव ही रहता है | अब प्रश्न यह पैदा होता है कि जब मानव योनि भोग के साथ साथ योग या कर्म योनि है तो फिर कुछ शिशुओं में ऐसा कैसे हो सकता है ?इस शंका का समाधान यह है कि मानव योनि कुछ परिस्थितियों में मात्र भोग-योनि ही बन कर रह सकती है |जब पूर्व मानव जन्म में ऐसे कर्म हुए हो जो उसे मानव योनि तो उपलब्ध करवा सकते हैं परन्तु योग-कर्म करने से वंचित भी रख सकते हैं |यह प्रायः ऐसी परिस्थितियों में होता है जब व्यक्ति कर्म से विमुख होकर किसी भी प्रकार के कर्म करता ही नहीं है, यहाँ तक कि कोई अनुचित मानसिक कर्म तक भी नहीं करता |यह एक प्रकार का कर्मों से पलायन करना  हुआ और ऐसे में उसको नया जन्म किसी अन्य प्राणी के रूप में मिल ही नहीं सकता और वह पुनः मनुष्य के रूप में ही जन्म लेता  है। इसी लिए कर्म करने से पलायन करने को अनुचित माना गया है |
क्रमशः 
                    || हरिः शरणम् ||

Saturday, January 10, 2015

कर्म-योग |-13

         अब हम विचार करते हैं ,दूसरी परिस्थिति का, जब माता-पिता उसकी सुख प्राप्त करने की कामना को ठुकरा देते हैं | ऐसी परिस्थिति में सत गुणी बालक में राजसिक व तामसिक गुणों का प्रभाव बढ़ने लगता है या फिर वह सत गुणों के आधार पर अपनी कामना को ही भूल जाता है |राजसिक और तामसिक गुणों से युक्त बालक कामना पूर्ति न होने पर सत गुण से युक्त बालक की तरह व्यवहार करने लगता है अथवा फिर अपने रज या तम गुणों को प्रधानता देने लग जाता है | प्रथम अवस्था में बालक अपने व्यवहार में सुधार करते हुए शालीनता का व्यवहार सीख लेता है और दूसरी परिस्थिति में वह उद्दंडता की तरफ अग्रसर हो जाता है | यह बालक की वह अवस्था होती है, जब उसका व्यवहार उसका भविष्य निर्धारित करता है | इस प्रकार यह कहावत एक दम सत्य है कि “पूत के पाँव पालने में ही दिखाई दे जाते हैं |”

           यहाँ माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है | बाल्यावस्था में अगर हम  बच्चे की अनुचित कामना को पूरा न करें और उस कामना के बारे में बच्चे को सही और उचित तरीके से निर्देशित करें तो हो सकता है कि बालक सही राह पर आगे बढे |इसीलिए माता-पिता को ही प्रथम शिक्षक माना गया है और घर को विद्यालय | अपने पर्याप्त प्रयास के उपरांत भी अगर बालक सही राह नहीं पकड़ता है तो फिर इसे हम प्रारब्ध का खेल ही कहेंगे |ऐसी स्थिति में माता-पिता को अपने व्यवहार में शालीनता रखते हुए बच्चे की अनुचित कामना को ठुकरा देना चाहिए और बच्चे के भविष्य को उसके प्रारब्ध पर छोड़ देना चाहिए | 
क्रमशः 
                  || हरिः शरणम् ||   

Wednesday, January 7, 2015

कर्म-योग |-12

योग-कर्म से भोग-कर्म की यात्रा-
           मानव जीवन के प्रारम्भ में शिशु अवस्था में केवल भोग-कर्म ही सम्पादित होते हैं और इन कर्मों को करने या न करने पर शिशु का किसी भी प्रकार का नियंत्रण नहीं रहता है | ज्यों ज्यों शिशु का शारीरिक विकास होता है उससे कई गुना तेजी के साथ उसका मानसिक विकास होता है |बालक की 2 वर्ष की आयु आते आते मस्तिष्क का लगभग 90 प्रति शत विकास पूर्ण हो जाता है |शेष बचा 10 प्रति शत विकास समय के साथ साथ धीरे धीरे होता रहता है |इस अवधि में किये गए कर्मों से प्राप्त सफलता या विफलता को हम सांसारिक अनुभव का नाम दे देते हैं जबकि इस अनुभव की कीमत दो कौड़ी की नहीं होती है |दो वर्ष तक की आयु प्राप्त करने तक बालक भोग-कर्म में ही लगा रहता है उसके उपरांत वह योग-कर्म प्रारम्भ करने की तरफ अग्रसर होता है |उसका विकसित मस्तिष्क अब यह अनुभव करने लग जाता है कि कौन सा भोग-कर्म सुखप्रद है और कौन सा दुखदाई ? यह उसके मानव जीवन का प्रथम अनुभव और ज्ञान होता है जो उसे अपनी इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त होता है |उसके भीतर केवल सुखप्रद कर्म करने या केवल सुख प्राप्त करते रहने की कामना का अंकुर फूट पड़ता है |पूर्व जन्म के स्वभाव से मिले प्राकृतिक गुणों के वशीभूत होकर वह अब भोग-कर्म के साथ योग-कर्म भी करने लगता  है |

               केवल सुख प्राप्त करने के लिए बालक अपने जीवन पहली बार असत्य का सहारा लेता  है |इससे पहले प्रायः उसे इसका ज्ञान भी नहीं हो पाता है |यह सब उसकी मानसिक दशा और मन में उठ रही कामनाओं का ही परिणाम है |एक बार जब वह सुख चाहने लगता है तब उसकी यह कामना उसे किसी भी प्रकार का कर्म करने को विवश कर देती है |कर्म करना उसमें उपस्थित गुणों के वश में होता है |सात्विक गुणों से युक्त बालक सुख प्राप्त करने के लिए शालीनता पूर्वक अपने माता-पिता से प्रार्थना करता है जबकि राजसिक गुणों से युक्त बालक सुख प्राप्त करने के लिए रोना-धोना या नाराज हो जाना सरीखे कर्म करता है |इसी प्रकार तामसिक गुणों से युक्त बालक सुख प्राप्त करने के लिए असत्य बोलना अथवा लड़ाई झगडा करना प्रारम्भ कर देता है और कई कई बार तो मारपीट करने पर उतारू हो जाता है |माता-पिता ,अपने बालक की यह सुख प्राप्त करने की कामना पूर्ण करने को तत्पर हो जाते है |वे यह विचार करने का कष्ट तक नहीं करते कि बालक की यह कामना पूर्ण करना उचित है या अनुचित |अपने सुख की कामना की पूर्ति होते देख बालक में उपस्थित प्राकृतिक गुणों की प्रधानता इसी अनुरूप  बढती जाती है और वह उन्हीं गुणों के अनुरूप योग-कर्म करने को विवश हो जाता है |
क्रमशः 
                 || हरिः शरणम् ||

Sunday, January 4, 2015

कर्म-योग |-11

                        मनुष्य का जीवन भोग-कर्मों को करने के साथ ही प्रारम्भ होता है |भोग-कर्मों के करते करते मनुष्य कब योग-कर्म करने लग जाता है ,इसका उसे स्वयं ही पता नहीं चलता | कर्मों का यह प्रारम्भ उसे कर्म-क्षेत्र के चक्रव्यूह में ढकेल देता है |इस संसार में आकर उसकी गति उस भ्रमर की तरह हो जाती है जो पुष्प के रस का पान करने में यह भूल जाता है कि रात होने वाली है और इस पुष्प की पंखुडियां बंद हो जाएगी |मनुष्य कर्म करने में भी ऐसे ही उलझ जाता है कि उसके इस शरीर का संध्या काल आ जाता है और वह उसी भंवरे की तरह केवल इन्द्रियों द्वारा रसपान करने में ही उलझ कर रह जाता है, परमात्मा का उसे ध्यान ही नहीं रहता | अतः हम अपने मस्तिष्क में यह स्पष्ट कर लें कि जीवन में कर्मों का प्रारम्भ भोग-कर्मों के करने के साथ ही होता है | मनुष्य लाख प्रयास कर ले, अपने जीवन के प्रारम्भ में वह योग-कर्म कर ही नहीं सकता और भोग-कर्म करने में मनुष्य प्रकृति के गुणों के अधीन होता है | इन प्रकृति प्रदत्त गुणों का निर्धारण पूर्व के मनुष्य योनि में किये गए योग-कर्म के द्वारा होता हैं |

          भोग-कर्म से ही योग-कर्म प्रारम्भ होते हैं और योग-कर्म ही पुनर्जन्म में भोग-कर्म के रूप में करने पड़ते हैं |यह एक ऐसे चक्र का निर्माण करते हैं, जिसका टूट पाना लगभग असंभव होता है | इसीलिए कर्म को संसार की धुरी कहा गया है| सम्पूर्ण संसार इस कर्म को ही केंद्र में रखकर जीवित है | जिस दिन जो भी मनुष्य इस कर्म-चक्र को तोड़ डालता है, उसके लिए उसी दिन यह संसार समाप्त हो जाता  है |यही वास्तविक मुक्ति है, देह छोड़कर मुक्ति की कल्पना करना बिलकुल बे मानी है |अगर मुक्ति होगी तो इस मानव जन्म को जीते हुए ही होगी , कर्म करते हुए ही होगी, बस केवल कर्म ऐसे होने चाहिए जो व्यक्ति को इस कर्म-बंधन से मुक्त कर दे, इस भोग-कर्म और योग-कर्म के चक्रव्यूह को तोड़ डाले |

             मनुष्य न जाने क्यों, इतनी छोटी सी बात को भी आत्मसात नहीं कर पाता |वह भलीभांति जनता है कि इस संसार में सकाम-कर्म कभी भी कर्म-बंधन से मुक्ति नहीं दिला सकते ,फिर भी वह इन्हीं कर्मों को करते रहने को ही अपने जीवन का एक मात्र लक्ष्य बना लेता है |सकाम कर्म ही किसी व्यक्ति के कर्मयोगी बनने में बाधक है |  
क्रमशः 
                     || हरिः शरणम् ||                  

Thursday, January 1, 2015

कर्म-योग |-10

                   आज से नए साल २०१५ का आरम्भ है |सन् २०१४ में हमने इस संसार में कट्टरपंथियों का प्रभाव बढ़ते हुए देखा है |जिस प्रकार धर्म के नाम पर मानवता का क़त्ल गत वर्ष हुआ है वैसा शायद पूर्व में कभी नहीं हुआ होगा |ईश्वर से प्रार्थना है कि यह २०१५ का वर्ष ऐसी किसी घटनाओं के लिए भविष्य  में याद नहीं किया जाये जैसा २०१४ को किया जायेगा |आप सभी को नव-वर्ष की बहुत बहुत शुभ कामनाएं |
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कर्मों का प्रारम्भ-
                      जब शिशु का जन्म होता है तब वह किसी भी प्रकार के योग-कर्म करने की स्थिति में नहीं होता | वह केवल भोग-कर्म ही कर सकता है | मां की ममता का आनंद लेना, दुग्ध पान करना ,रोना, मुसकुराना ,हाथ-पाँव हिलाना आदि सभी क्रियाएं भोग-कर्म के अंतर्गत ही आती है |कई लोग यह कह सकते हैं कि प्रत्येक शिशु ही ऐसा करता है तो क्या सभी शिशुओं को एक ही प्रकार के भोग-कर्म करने होते हैं ? नहीं, ऐसा नहीं है |अगर आप सभी शिशुओं की क्रियाएं गंभीरता के साथ देखें तो आपको अंतर स्पष्ट हो जायेगा |कई शिशु 10 माह की उम्र में अपने आप चलना प्रारम्भ कर  देते हैं जबकि कुछ 2 वर्ष की उम्र में और कुछ तो जीवन भर ही चलना नहीं सीख पाते |इसी प्रकार किसी के जन्म-जात विकृति होती है और किसी के प्रसव की प्रक्रिया में बाधा आ जाने के कारण शारीरिक और मानसिक विकृतियाँ पैदा हो जाती है | ऐसा सब भोग-कर्मों के कारण ही संभव हो सकता है |

                      मैं एक शिशु रोग विशेषज्ञ हूँ और अपने इस जीवन में हजारों शिशुओं के जन्म का साक्षी रहा हूँ |सभी जन्म लेने वाले शिशुओं और उनकी माताओं के जीवन का पूरा ध्यान रखा जाता है |फिर भी कई शिशु जन्म लेने के बाद विभिन्न प्रकार की विकृतियों के शिकार हो जाते हैं या काल कलवित हो जाते हैं और इसी तरह से कई माताओं को भी विभिन्न प्रकार की शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती है तथा कुछ को अपनी जान तक गवानी पड़ती है |इतने सुरक्षित प्रसव के बाद भी ऐसी घटनाएँ होना क्या प्रदर्शित करता है ? मैं यह नहीं कहता कि इतनी सावधानियों के बाद भी ऐसी घटनाएँ होती है तो सब कुछ भाग्य भरोसे छोड़ देना चाहिए | इतनी सावधानियों के कारण शिशु मृत्यु-दर और मातृत्व मृत्यु-दर में कमी अवश्य ही आई है | परन्तु फिर भी प्रश्न यह उठता है कि इतना सब करने के बावजूद भी किसी किसी शिशु में शारीरिक और मानसिक विकृतियाँ पैदा हो जाना क्यों होता है ? प्रश्न बड़ा सीधा सादा है और उत्तर भी |यह सब पूर्व जन्मों के योग-कर्मों से उत्पन्न फल  ही हैं जो इस जन्म में भोग -कर्म के रूप में प्राप्त हुए है | इन्हीं भोग-कर्मों को करने के लिए आज यहाँ पर शिशु और मां, दोनों ही विवश हैं | 
क्रमशः 
                 || हरिः शरणम् || 

Tuesday, December 30, 2014

कर्म-योग |-9

                 अर्जुन एक क्षत्रिय है और इस कारण से वह रजोगुण प्रधानता लिए हुए था | एक क्षत्रिय का प्राकृतिक गुण होता है, युद्ध करना |अगर कुरुक्षेत्र से अर्जुन पलायन करता तो भी उसे युद्ध भूमि में युद्ध करने के लिए वापिस आना ही होता | इस युद्ध में भाग लेने के लिए उसमें स्थित प्रकृति के गुण उसे विवश कर देते | भगवान श्री कृष्ण ने गीता में उसे यही समझाया है कि तेरा कर्तव्य युद्ध भूमि से पलायन करना नहीं है बल्कि युद्ध भूमि में समत्व रखते हुए युद्ध करना है |इस कुरुक्षेत्र की भूमि पर जय-पराजय का विचार किये बिना, इसे अपना कर्तव्य समझ कर युद्ध करना ही समत्व  है | इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को कर्म करने की स्वतंत्रता परमात्मा ने अवश्य प्रदान की है परन्तु प्रकृति के गुणों के बंधन के साथ | यह आंशिक स्वतंत्रता और आंशिक परतंत्रता मनुष्य को कुछ सोचने को विवश अवश्य ही करती है | इस सोच और विचार करने की भूमिका में प्रकृति के शेष बचे तीनों तवों की भूमिका रहती है |यह सब मन, बुद्धि और अहंकार के वश में है कि वह मनुष्य को प्रकृति प्रदत्त गुणों की पराधीनता को कर्मों को करने की स्वतंत्रता में कैसे बदले ? इन गुणों के स्वरूप को परिवर्तित करते हुए मनुष्य आकाश की ऊँचाइयों को भी छू सकता है या फिर पाताल की गहराइयों तक पतन की पराकाष्ठा तक भी पहुँच सकता है | सब प्रकृति के गुणों के सदुपयोग या दुरुपयोग का खेल मात्र है |                         
                 मनुष्य अपने जीवन में बहुत कुछ करने की सोचता है, परन्तु क्या वह उसमें से थोडा बहुत भी अपने कारण, अपने अनुसार और स्वयं के द्वारा करने की क्षमता रखता है ? यही वह प्रश्न है, जिसका उत्तर किसी के भी पास नहीं है | करना तो व्यक्ति परमात्मा से भी अधिक चाहता है परन्तु जब जीवन का संध्या काल आता है तब उसके हाथ खाली के खाली ही रह जाते हैं |फिर इस जन्म की शतायु भी बौनी नज़र आने लगती है |इसलिए जीवन चाहे सौ वर्ष का हो चाहे चंद दिनों का, आपके कर्म ही आपके साथ चलते हैं और कर्मों का चयन करने की स्वतंत्रता आपके पास है |कर्मों के कारण ही आप निरंतर प्रगति करते हुए आकाश की ऊँचाई छू सकते हैं और पतन के गर्त में भी जा सकते हैं |अतः जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है, किये जाने वाले कर्मों का चयन |आप कर्म को करने से विमुख नहीं हो सकते क्योंकि कर्म करने को आप विवश हैं | ऐसे में आपके पास एक ही रास्ता बचता है, कर्म करने का, सही कर्म करने का, जो कर्म आपको पुनर्जन्म से मुक्त भले ही न कर सके परन्तु कर्म-योगी अवश्य ही बना दे |
 क्रमशः  
                        || हरिः शरणम् ||

Saturday, December 27, 2014

कर्म-योग |-8

         इतना समझाने पर भी अर्जुन के ना समझ पाने पर गीता के अंतिम अध्याय में आखिर थक हारकर भगवान श्री कृष्ण को कहना ही पड़ा-
         यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे |
         मिथ्येष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ||गीता 18/59||
अर्थात् जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है ;क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा |
         स्वभावजेन कौन्तेय निबध्दःस्वेन कर्मणा |
         कर्तुंनेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोsपि तत् ||गीता 18/60||
अर्थात् हे कुन्तीपुत्र ! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी तू अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा |

        यहाँ इस 60 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण एक दम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि अर्जुन ! जो तुमने पूर्व में कर्म किये हैं अर्थात पूर्वजन्म में तुमने जो कर्म किये हैं उनसे तुम्हारा यह स्वभाव बना और इस जन्म में यही स्वभाव संस्कार बना जिसके कारण तुम क्षत्रिय कुल में पैदा हुए हो |अतः तुम इस स्वाभाविक कर्म अर्थात क्षत्रिय कर्म के वश में हो, जिसके फलस्वरूप तुम्हें भोग-कर्म के रूप में वर्तमान जन्म में युद्ध करना ही पड़ेगा |
क्रमशः 
                     || हरिः शरणम् ||