Friday, March 7, 2014

जीवन का अर्थ |

                           जीवन परमात्मा का प्रसाद होता है। इसे यों भी कह सकते हैं कि जीवन पूर्ण परमात्मा की आंशिक अभिव्यक्ति है। इसलिए हम मानते हैं कि हमारे अंतर्मन में परमात्मा निवास करता है। परमात्मा प्राणरूप में हमारे सूक्ष्म और स्थूल शरीर का संचालन करता है। इसलिए जीवात्मा को परमात्मा भी कहते हैं। हमारी आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, यह अतिसूक्ष्म है, शक्तिरूप है। लेकिन जब कभी बाहर का प्रभाव अंतर्मन पर पड़ने लगता है, तो आत्मा की दिव्यता कम होने लगती है। इसीलिए हमारे साधक साधना करते हैं ताकि बाहर की विकृति अंतर्मन को दूषित न कर सके।
                        सच कहा जाए, तो हमारा जीवन एक महोत्सव है। यह आनंदस्वरूप है, केवल ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमारे आनंद के सागर में विकारों की लहरें न उठें। इसलिए पतंजलि संयम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि ( अष्टांग योग ) के अभ्यास की बात कहते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर जीवन को रसपूर्ण बनाना है, तो साधना की अग्नि में उसे तपाना पड़ेगा, तभी जीवन को दिव्य बनाया जा सकता है। सामान्यत: लोग अपने ही विकारों से जीवन की दिव्यता को धूमिल बना लेते हैं क्योंकि सारे विकार स्व अर्जित होते हैं। अगर थोड़ी सी सतर्कता बरती जाए, तो हमारा जीवन आनंदपूर्ण बन सकता है।
                     अनेक लोग अकारण निराशावादी बन जाते हैं, कई लोग तनावग्रस्त और चिंतित रहने लगते हैं। अगर इनके कारणों पर विचार किया जाए तो इनके तनाव और चिंता का कोई प्रबल कारण नहीं दिखता। अकारण चिंतित होकर कई लोग अपने जीवन के आनंद से वंचित रह जाते हैं। इसलिए प्रसन्न रहने का अभ्यास किया जाना चाहिए। संसार में न केवल दुख है और न सुख ही सुख है। हमारा दृष्टिकोण जैसा होता है, संसार उसी तरह दिखने लगता है। आशावादी व्यक्ति को चारों ओर प्रकृति की मुस्कान दिखती है और निराशावादी व्यक्ति को इस संसार में केवल कांटे ही दिखते हैं। हमें जीने का नजरिया बदलना होगा, हमें जीवन जीने की विधि सीखनी होगी, तभी हम जीवन का सार्थक उपयोग कर सकते हैं। जीवन का एक-एक पल कीमती है, आनंदपूर्ण है। जीवन जीने की यह कला सीख लेना ही आपके जीवन का सही अर्थ है |
                     || हरिः शरणम् ||

Thursday, March 6, 2014

जीवन-चक्र |

                       गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि शरीर का निर्माण पांच तत्वों-पृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि और तीन गुणों- सतो (सत), रजो (रज) व तमो (तम) से हुआ है। इसके बाद ब्रह्म का अंश जीव के रूप में शरीर में प्रवेश करके उसे जीवात्मा बनाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रकृति के गुण जीव निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
                       प्रकृति के गुणों के विद्यमान होने के अनुपात के अनुसार जीव की वृत्ति का निर्धारण होता है। जन्म-जनमांतर यह वृत्ति मन के रूप में जीव के साथ चलती रहती है। अष्टांग योग में साधक यम, नियम, आसन इत्यादि द्वारा मन के निग्रह का ध्येय लेकर चलता है।
                       मन का पूर्ण निग्रह होते ही जीव परम ब्रह्म में विलीन होकर जीवन-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है, परंतु आज के समाज में मन के निग्रह की कल्पना कठिन नजर आती है। इसका प्रमुख कारण है, अनियंत्रित भोग-विलास और यम के प्रमुख स्तंभ अस्तेय व अपरिग्रह का पालन न होना। अस्तेय का अर्थ है- चोरी न करना और अपरिग्रह का मतलब है जरूरत से ज्यादा संग्रह न करना। आज ज्यादातर मनुष्य किसी न किसी प्रकार की चोरी में लिप्त हैं। अपरिग्रह के बारे में तो कोई सोच ही नहीं रहा है। जीवनयापन से ज्यादा धन यदि मनुष्य समाज की भलाई में लगा दे तो समाज का आर्थिक असंतुलन समाप्त हो सकता है और धन की चोरी रोकी जा सकती है।
                      अत्यधिक धन संग्रह की इच्छा रजोगुण में वृद्धि का मूल कारण है। जब ज्यादा धन संग्रह हो जाता है, तब विलासिता, मोह व भय उत्पन्न होने लगते हैं और इनके द्वारा तमोगुण की प्रधानता होने लगती है। तमो गुण से ग्रस्त व्यक्ति निम्न योनियों जैसे-पशु, पक्षी आदि के रूप में जन्म लेता है क्योंकि अस्तेय व अपरिग्रह को जीवन में न अपनाकर वह निम्न योनियों को प्राप्त कर रहा है। जीव का अगला जन्म उसके अंदर विद्यमान गुणों पर निर्भर करता है। निम्न योनियां जैसे पशु-पक्षी आदि केवल अपना पेट भरने व अपनी सुरक्षा के बारे में ही सोचती हैं। इसलिए जो मनुष्य केवल इसी प्रकार सोचता है, वह भी पशु समान ही है। उसे पशु की योनि प्राप्त होती है।
                       सतो गुण में वृद्धि होने के कारण प्रेम,आनंद और परमार्थ की भावना उत्पन्न होते हैं | जिस कारण मनुष्य को आत्मिक शांति प्राप्त होती है | यही गुण मनुष्य को इंसान बनाता है | हमें सोचना होगा कि हमारा जीवन कैसा होना चाहिये ? सतो गुण युक्त या रजो व तमो गुण युक्त |   
                                                   || हरिः शरणम् ||
                               

Wednesday, March 5, 2014

व्यक्ति की महानता |

                       किसी भी व्यक्ति की महानता का आकलन करने के लिए प्रत्येक समाज या विचारधारा के अलग-अलग पैमाने होते हैं। इन्हीं के आधार पर हम लोगों को महान कहते हैं।भारतीय संस्कृति में यह पैमाने सदियों पहले से ही निश्चित किये हुए हैं जिनकी सार्थकता आज भी है |
                      वेदों में महानता के पांच लक्षण बताए गए हैं। प्रथम लक्षण है व्यक्ति का कर्मयोगी होते हुए परमेश्वर, समाज और राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित करना। दूसरा लक्षण है कि वह मान-अपमान, लाभ-हानि आदि की परवाह न करते हुए और सदा आनंदित रहते हुए अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ता रहता है। वह दूसरों को भी आनंद प्रदान करता है। व्यक्ति की महानता का तीसरा लक्षण यह है कि वह मननशील, सहनशील और मर्यादा पालक होता है। उसका धर्म मनुष्यता या परोपकार पर आधारित होता है। गीता के अनुसार निष्काम कर्म करने वाला यानी अपने लाभ के लिए कर्म न करने वाला व्यक्ति महानता के लक्षण पूरे करता है।चौथा लक्षण यह है कि उसमें छोटापन नहीं होता है। उसका हृदय विशाल होता है और वह प्रत्येक जीव को समान आदर और प्रेम की दृष्टि से देखता है। महानता का पांचवां लक्षण यह है कि ऐसा व्यक्ति स्वयं प्रकाशित होता है और अपने इस प्रकाश से अन्य लोगों को भी प्रकाशित करता है यानी वह ज्ञान और ऊर्जा से परिपूर्ण होता है और अन्य लोगों को भी प्रेरित करता है जिससे वे भी अपना अज्ञान मिटाकर कर्मशील होकर ज्ञानमार्ग पर बढ़ सकते हैं।
                      सदैव दूसरों की सहायता करने वाला, पुरुषार्थयुक्त, उत्तम बल से युक्त, बुद्धिमान और विशेष ज्ञान वाला और बिना किसी स्वार्थ के सेवा में तत्पर रहना आदि गुणों से सुशोभित होना भी महानता के लक्षण हैं। महान व्यक्तियों के कर्मो और स्वभाव को समझकर यदि हम आत्मसात कर सकें तो अपने जीवन में कुछ सुधार ला सकते हैं। आज तक इस धरती पर जितने भी कर्मशील लोग पैदा हुए हैं, सभी ने अपने-अपने तरीके से कुछ रचनात्मक योगदान दिया है। इस सृष्टि को इन विचारकों, मनीषियों और वैज्ञानिकों आदि ने समस्याओं का समाधान करते हुए समृद्ध बनाया है।
                      अंग्रेजी भाषा में एक कहावत है जिसका आशय है कि कुछ लोग जन्म से महान होते हैं, कुछ महान बन जाते हैं और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। हमारी संस्कृति के अनुसार महानता किसी पर थोपी नहीं जा सकती है। सतत साधना करते हुए नर और नारायण की सेवा करके हम महान बन सकते हैं |
                         || हरिः शरणम् || 

Tuesday, March 4, 2014

जीवन-लक्ष्य |

                   मनुष्य जीवन के दो लक्ष्य हैं। पहला, कुसंस्कारों से छुटकारा पाना और परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाना। परिष्कृत जीवन के साथ जुड़ी हुई आनंद भरी उपलब्धियां स्वर्ग कहलाती हैं और दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने को ही मुक्ति कहते हैं।जीवन का दूसरा लक्ष्य है भगवान द्वारा ही निर्मित इस भौतिक संसार को, इस विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने में योगदान देना।
                   इन दोनों प्रयोजनों को पूरा करने में जो जितना योगदान देता है वह उतना ही बड़ा भक्त होता है। इस मार्ग पर चलने वाले संत, ऋषि, देवात्मा आदि नामों से पुकारे जाते हैं।उन्हें असीम आत्मसंतोष प्राप्त होता है। वे लोक-सम्मान के पात्र होते हैं। ऐसे लोगों को दूसरों से सहयोग मिलने से अपने उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति में असाधारण सफलता भी मिलती है। उनके कृत्य ऐतिहासिक होते हैं और उनके प्रभाव से तमाम लोगों को ऊंचा उठने के और आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।
                 अतः बुद्धिमता इस बात में है कि आत्म-तत्व और शरीर दोनों की आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाए। श्रम और बुद्धि का उपयोग दोनों क्षेत्रों के लिए इस प्रकार किया जाए कि शरीर स्वस्थ रहे और आत्मा अपने महान लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो जाए, किंतु यह करना आसान नहीं है। जो बुद्धि आए दिन अनेक समस्याओं को सुलझाने में, संपदाओं और उपलब्धियों के उपार्जन में पग-पग पर चमत्कार दिखाती है वह केवल मौलिक नीति निर्धारण, सुख-सुविधाओं के संचय-संवर्धन में ही लग जाती है। बुद्धि का यह एकपक्षीय असंतुलन ही जीवात्मा का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। उसी से छुटकारा पाने के लिए ब्रह्मज्ञान, आत्मज्ञान और तत्वज्ञान के विशालकाय कलेवर की संरचना की गई है।
               बुद्धि को आत्मा के स्वरूप और उसके लक्ष्य को समझने का अवसर देना ही उपासना का मूलभूत उद्देश्य है। भौतिक जगत में शरीर के लिए अनेक आवश्यक सुविधा-साधन उपलब्ध हैं। ठीक उसी प्रकार एक चेतन जगत भी है। उसमें भरी हुई संपदा आत्मिक आवश्यकताओं को पूरा करती है। ब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है, पर उसकी अभीष्ट अनुभूति करने के लिए भी पुरुषार्थ करना पड़ता है।इसको ही भक्ति या उपासना कहा जाता है | उपासना-प्रक्रिया को ईश्वर और जीव के बीच विशिष्ट आदान-प्रदान का द्वार खोलना कह सकते हैं। उपासना-प्रक्रिया का उद्देश्य अंतस चेतना को परिष्कृत करना है। दोनों लक्ष्यों को साधना ही मानव जीवन का उद्देश्य होना जाहिए, तभी इसकी सार्थकता है |
                  || हरिः शरणम् || 

Monday, March 3, 2014

जागरण |

                                   भय और भ्रम के निवारण के लिए मनुष्य का जागना अत्यावश्यक है |जब तक हम अपने सपनों में ही खोये रहेंगे तब तक भय और भ्रम दोनों से ही मुक्त नहीं हो सकते | सपने से बाहर निकलने के लिए जागना जरूरी है |मनुष्य की सबसे बड़ी कमी है कि वह भौतिक रूप से जागते हुए भी सपने देखना नहीं छोड़ पाता |इसलिए उसके इस प्रकार जगे रहने को जागरण नहीं कहा जा सकता |जब तक मनुष्य जागते हुए भी सपने देखना बंद नहीं कर देगा तब तक वह भ्रम-जाल से निकल नहीं पायेगा |जैसा कि हमने उस राजा के बारे में कहानी पढ़ी है , जिसने सपने में भरापूरा परिवार देखा था ,ऐसी ही कभी किसी के साथ कोई घटना घटित हो जाती है तब अचानक वह एक झटके के साथ जागरण को प्राप्त होता है |ज्ञान किताबों में सब लिखा है,शास्त्रों में सब जगह वर्णित है,संत सब जगह प्रवचन में कहते हैं फिर भी इन सब के कारण कितने लोग जागे है,यह आप और मैं भली-भांति जानते हैं |
                                 राजा परीक्षित,जिसको ऋषि-पुत्र ने सात दिन में सर्पराज तक्षक द्वारा काटे जाने और तत्पश्चात मृत्यु को प्राप्त हो जाने का श्राप दिया था, उनसे सम्बंधित एक प्रसंग है | राजा परीक्षित ने अपनी संभावित  मृत्यु स्वीकार करते हुए शुकदेव जी से भागवत सुनना प्रारंभ किया |आप जानते हैं क्यों? मात्र मृत्यु के भय से मुक्त होने के लिए | जब तक व्यक्ति भय से मुक्त नहीं होगा तब तक वह इस भ्रम ,इस संसार से भी मुक्त नहीं हो सकता |भागवत सुनने के लिए उसके पास मात्र एक सप्ताह ही था |संसार का सारा ज्ञान भागवत में है |वक्ता भी इस संसार में शुकदेवजी के बराबर न तो उस समय कोई था और न ही कोई भविष्य में हो सकता है |परीक्षित गंगा जैसी पवित्र नदी के किनारे सुरम्य वातावरण में बैठ कर,सब राजकार्यों से मुक्त होकर बड़ी तल्लीनता  से भागवत सुन रहे थे |उन्हें भागवत सुनते छः दिन हो गए थे |भागवत से उनके सभी मोह और आकांक्षाएं समाप्त हो गई परन्तु अपने शरीर का मोह वह छोड़ न सके |शुकदेवजी सब समझ गए |उन्होंने सातवें दिन परीक्षित को एक कथा सुनाई,जिससे उनका अपने शरीर से भी मोह समाप्त हो गया |
                                शुकदेवजी ने कथा प्रारम्भ की |बोले-"हे राजन!एक राजा शाम के समय जंगल में आखेट के लिए निकला |वह शिकार के पीछे पीछे जंगल में काफी दूर तक निकल गया |शिकार खेल कर जब वह लौटने को उद्यत हुआ तो रात हो चुकी थी |जंगल में उसे हिंसक जानवरों की आवाजे सुनकर भय सताने लगा |उसे भ्रम होने लगा कि आस पास ही कोई सिंह व्याघ्र जैसा हिसंक जानवर है मिल सकता है |जो उसे मार सकता है | अब उसे रात गुजारने के लिए किसी सुरक्षित स्थान की तलाश थी |तभी उसे दूर कहीं एक जलते दीपक से आती रोशनी दिखाई दी |उसने उस तरफ किसी मनुष्य का निवास स्थान होना समझा | यह सोचकर वह उधर चल पड़ा |पास पहुंचकर उसने देखा कि वह एक बहेलिये की झोंपड़ी थी |राजा घोड़े से उतरा और बहेलिये को अपना परिचय दिया |साथ ही रात को वहाँ ठहरने देने की प्रार्थना की |बहेलिया बोला-"राजन ! आप जरा भीतर आइये |देखिये,डर के कारण मैं भी रात को बाहर नहीं निकलता हूँ |इस कोने में मैंने अपना मल-मूत्र  त्यागने का स्थान बना रखा है, जिस कारण से यहाँ आपको बदबू महसूस होगी |इधर छत से मरे जानवरों की खालें लटक रही है |ऐसे में आप को यहाँ बहुत असुविधा होगी |" राजा बोला-"एक रात की ही तो बात है |सुबह नींद से जागते ही मैं वापिस चला जाऊंगा |"बहेलिया बोला-"नहीं राजन!जो एक बार यहाँ रुक जाता है ,फिर उसे यहाँ आनंद आने लगता है |उसे  यहाँ की बदबू भी खुशबू लगने लगती है |फिर वह यहाँ से किसी भी सूरत में जाना ही नहीं चाहता |"राजा बोला-"नहीं,मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सुबह जागते ही मैं यहाँ से निकल जाऊंगा |" अंत में थकहारकर बहेलिये ने उन्हें रूकने का कह दिया |राजा रात भर के लिए वहाँ रुक गया |सुबह हुई |बहेलिये ने राजा को लौट जाने को कहा |राजा ने वापिस जाने से इंकार कर दिया |" इतना कहकर शुकदेवजी रुक गए | उन्होंने अकस्मात ही कहानी सुनानी बंद कर दी |
         राजा परीक्षित चौंक उठे,बोले-"महात्मन!आगे भी सुनाइए |आपने कहानी सुनानी बंद क्यों कर दी ? वह राजा ऐसे कैसे कर सकता है ? बहेलिये को दिए आश्वासन से वह मुकर कैसे सकता है ?मुझे आगे भी बताइए वह राजा कौन था ? मैं उसके वहाँ रुके रहने का कारण जानना चाहता हूँ |"
               शुकदेवजी बोले-"राजन!वह राजा आप ही हैं |"परीक्षित ने पूछा -"कैसे?"शुकदेवजी बोले-"और क्या राजन!आसन्न मृत्यु देखते हुए भी तुम्हारा इस मल-मूत्र देने वाले शरीर के प्रति अभी भी मोह है |तभी तो वह राजा तुम्ही हो | इस संसार में व्यक्त होने वाली समस्त आत्माएं अपने परमात्मा को यही आश्वासन देकर आती है कि वे जल्दी ही वापिस लौट आएगी | परन्तु इस संसार में आकर भी ,यह जानकर भी कि यह केवल  दुखालय है ,फिर भी यहाँ संसार और शरीर के मोह में इतना फंस जाती है कि परमात्मा के पास वापिस जाना ही नहीं चाहती |बार बार पुनर्जन्म लेकर इस शरीर में आना चाहती है | आपको भी तो इस शरीर से ही तो मोह है | इस कारण से आप ही तो वह राजा हुए |" यह सुनकर परीक्षित की आँखे अनायास ही खुल गई |और उनका शरीर से भी मोह नष्ट हो गया |
                          सम्पूर्ण भागवत सुनकर भी जिसका शरीर से मोह और मृत्यु से भय नहीं गया हो ,उसका शरीर से मोह औरमृत्यु से भय एक कहानी सुनने मात्र से ही नष्ट हो गया |ऐसे जाग जाना ही वास्तविक जागरण है | अब कोई कैसे जागरण को उपलब्ध होता है वह सब परिस्थितयों और समय पर निर्भर करता है |सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर भी आप मोह से मुक्त नहीं होते , और कभी एक छोटी सी घटना ही आपको इस  जीवन-मोह से मुक्त कर देती है |
                                 || हरिः शरणम् ||

Sunday, March 2, 2014

नींद से जागना |

                    जागरूक होकर हम कोई भी उपलब्धि प्राप्त कर सकते हैं। फिर हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता..
                अध्यात्म विमुख होने का नहीं, बल्कि सम्मुख होने का संदेश देता है। वह चेतना को जगाने की बात करता है। अपनी चेतना को जाग्रत रख पाने के लिए ही हमें यह मानव जीवन मिला है। हम उपलब्धियां भी तभी प्राप्त करेंगे, जब जागते रहेंगे। जागे बिना, हम न तो खुद को जान पाते हैं, न ईश्वर को। कठोपनिषद में कहा गया है - "उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निवोधत।" अर्थात, उठो, जागो और श्रेष्ठता को प्राप्त करो। इस श्लोक को स्वामी विवेकानंद अपने व्याख्यानों में उद्धृत करते रहते थे।
                  इसलिए जागना जरूरी है। लेकिन हम नींद में खोए हुए हैं। यह नींद मोह की है, लोभ की है, माया की है..। हमारी चेतना तभी जागती है, जब हम हम काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह इत्यादि को छोड़ देते हैं। तब हमें अपनी ही आत्मा का परम प्रकाश दिखाई देता है। हमें अपने भीतर ही परमात्मा के दर्शन हो जाते हैं। तब हमारे पास आत्मविश्वास घनीभूत होकर आ जाता है और हम समाज के लिए महत्वपूर्ण कार्य कर जाते हैं। यह जागरण तभी होता है, जब हमारे भीतर राग-द्वेष, आसक्ति आदि मिट जाए और हम आत्मोन्मुख से परोन्मुखी हो जाएं , केवल स्वयं के बारे में ही नहीं सोचे, सबके बारे में ,सबके हित का सोचें |
                  जो जागता है, उसे ही जागरूक कहते हैं। ईश्वर का प्रकाश खोजने से पहले अपने भीतर का प्रकाश खोजना होगा। वहीं हमें ईश्वर भी मिल जाता है। अध्यात्म और योग शास्त्र हमें जागरूक रहना सिखाते हैं, फिर हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं रह जाता। अतः हमारी जिंदगी में जागरण आवश्यक है |
                   || हरिः शरणम् ||

Saturday, March 1, 2014

भ्रम का निवारण |

                                       एक राज परिवार अपनी रियासत में बड़े आनंद से सत्ता संचालन कर रहा था |उस राजपरिवार में तीन सदस्य थे |राजा,रानी और राजकुमार |सुखपूर्वक उनके दिन बीत रहे थे |अचानक एक दिन राजकुमार बीमार हो गया |राजा ने राजवैद्य से उसका आवश्यक उपचार शुरू करवाया |लेकिन उपचार के बाद भी राजकुमार स्वस्थ होने के स्थान पर और ज्यादा बीमार रहने लगा |दिन प्रतिदिन उसकी बीमारी बढती गई | अब राजा को उसकी मृत्यु का भय सताने लगा |उसने आसपास के राज्यों से सभी अच्छे चिकित्सकों को बुलाया और उनसे सही और सटीक मशविरा देने को कहा |सभी चिकित्सकों ने राजकुमार की भली-भांति जाँच की और एक अंतिम निर्णय पर पहुँच गए |मुख्य चिकित्सक ने राजा को बड़े ही विनम्र शब्दों में समझाया कि महाराज ,राजकुमार को एक असाध्य बीमारी ने जकड लिया है |इस बीमारी का आज तक ईलाज नहीं खोजा जा सका है ,यह बीमारी लाइलाज है |ज्यादा से ज्यादा राजकुमार की जिंदगी सात दिन की बची है |
                                       राजा और रानी चिकित्सक के मुंह से यह बात सुनकर हतप्रभ रह गए |राजा ने अपने आप को संभाला और रानी को यह सब विधि का विधान है यह सब समझाने लगा |परन्तु भीतर ही भीतर राजा,राजकुमार की संभावित मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहा था |सात दिन तो पंख लगाकर उड़ गए और अंत में राजकुमार की मृत्यु का दिन आ पहुंचा |रात हुई |राजा और रानी ,दोनों राजकुमार के पास बैठे उसकी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे |राजा दिन भर का थका हुआ था |कुछ समय के लिए उसकी आँख लग गई |सोते ही गहरी नींद में राजा को स्वप्न दिखाई देने लगा |उसने स्वप्न देखा कि-
                              "वह एक बहुत ही विशाल देश का राजा है |उसके दरबार में छोटी मोटी कई रियासतों के राजा हाजरी देते हैं|उसकी रानी बहुत ही सुन्दर और विशाल ह्रदय वाली है |उनके सात अति सुन्दर राजकुमार है |राजा उन सबके साथ अपना जीवन बिता रहा है |बड़े आनंद में है वह |"
                                     तभी रानी के विलाप से उसकी नींद टूट जाती है और सभी राजकुमार,रानी और देश सब एक झटके के साथ गायब हो जाते है |सपना टूट जाता है,राजा जाग जाता है और वह देखता है कि रानी मृत राजकुमार की देह से लिपटकर रो रही है |राजा रोती हुई रानी को देख रहा है |कभी वह राजकुमार के शव को देखता है,कभी विलाप करती रानी को और फिर सोचता है ,अभी अभी टूटे स्वप्न में जो कुछ देखा उसके बारे में | वह समझ नहीं पा रहा था कि सातों राजकुमार और वह रानी कहाँ गए ? फिर सोचता है कि वह तो मात्र एक सपना था | जब विलाप करते करते रानी थक कर रोना बंद कर देती है तब उसे राजा का ख्याल आता है |वह देखती है कि राजा के चहरे पर दुःख के कोई भाव नहीं है |वह राजा को पूछती है -"क्या आपको राजकुमार की मृत्यु का कोई दुःख नहीं हुआ जो आप रो भी नहीं रहे है |"यह सुनकर राजा ने बड़े ही सधे हुए अंदाज़ में उत्तर दिया-"प्रिये!मैं यह सोच रहा हूँ कि इस राजकुमार की मृत्यु का शोक करूँ या उन सात राजकुमारों का जिनको मैंने अपने पुत्रों के रूप में सपने में देखा ?अब न तो वे सातों राजकुमार मेरे सामने है और न ही यह राजकुमार |मैं इस दुविधा में हूँ कि विलाप दोनों में से किसके लिए करूँ ?अगर वो सपना था तो क्या फिर यह भी एक सपना नहीं है ?"
                                       यह कहानी हमें यहीं छोडनी होगी क्योंकि हम सब जानते हैं कि रानी ने राजा को फिर क्या क्या कहा होगा | उनके समाज और देश ने राजा की आलोचना करते हुए क्या कहा होगा ? इस बात का परिणाम उन दोनों पर ही छोड़ देना उचित होगा क्योंकि ऐसी कथाएं मात्र मार्गदर्शन के लिए होती है,न कि परिणाम जानने के लिए |हमें भी इस कथा का विश्लेषण करना चाहिए कि राजा की इस दुविधा का कारण जान सके,समझ सके | यह सोचे कि राजा जिस दुविधा में है, क्या ऐसी  दुविधा हमारे सामने भी नहीं है ? राजा तो इस कहानी का एक पात्र मात्र है,वह दुविधा से निकले या फंसा रहे उसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा |उसको तो वही कहना और करना है जैसा उस कथा का रचनाकार चाहेगा |और अच्छा रचनाकार वही होता है जो अपने मूल पात्र को दुविधा से निकालते हुए अपने पाठकों को एक सन्देश दे |
                             हम भी तो इस संसार रंगमंच के पात्र हैं| हम भी यहाँ सपने देखते है ,दुविधाग्रस्त होते हैं |हम सब का रचनाकार परमात्मा है, वह भी यही चाहता है कि हम इस दुविधा से उबरें |जैसे उपरोक्त कहानी के कथाकार ने सपने को तोड़ते हुए राजा को जगाया वैसे ही हमारा रचनाकार भी हमें नींद से जगाने का प्रयास करता है |परन्तु वास्तविकता के पात्र और कथा के पात्र में एक बहुत बड़ा अंतर होता है |कथा का पात्र यहाँ जागते हुए सपने नहीं देख रहा है |परन्तु इस संसार के सब पात्र जागते हुए भी सपने में खोये रहते है |ऐसे में वह दुविधा से बाहर कैसे निकले ? सोते हुए सपने देखने वाले को जगाना आसान है,जागते हुए सपने देखने वाले को जगाना बहुत ही मुश्किल है |सपना,मात्र भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है |संसार भी तो एक स्वप्न मात्र है ,इसीलिए यहाँ सब इसको ही सत्य मानते हुए भ्रमित हैं | अतः जिस प्रकार  सपने से बाहर आने के लिए जागना आवश्यक है वैसे ही इस भ्रम के निवारण के लिए भी एक तरह का जागरण जरूरी है |
                                        || हरिः शरणम् ||