Friday, February 7, 2014

अमृत-धारा |बिहारी-२

                                किसी भी बात को आसान और मधुर तरीके से कहने का अंदाज़ अगर सीखना हो तो कवि बिहारी से सीखा जा सकता है |इस समाज में भिन्न भिन्न  प्रकार के मनुष्य निवास करते हैं |सबसे बड़ी बात यह है कि सबके अपने अपने स्वभाव होते है |और सब अपने उसी स्वभाव के अनुरूप आचरण करते हैं |और इससे भी बड़ी बात यहाँ यह हहै कि हर कोई अपना स्वभाव तो बदलने की कोशिश करता नहीं है और संपर्क में आने वाले व्यक्ति का स्वभाव परिवर्तन करने का दुस्साहस अवश्य ही करता है |इस संसार में सब कुछ करना संभव हो सकता है,परन्तु किसी अन्य व्यक्ति का स्वभाव परिवर्तन करना किसी के लिए भी संभव नहीं है |
                                   इस भौतिक संसार में सभी प्रकार के मनुष्य निवास करते हैं|जिसमे कुछ अच्छे स्वभाव वाले होते है और कुछ अति निम्न स्तर के स्वभाव वाले |अच्छे स्वभाव वाले व्यक्ति के स्वभाव को परिवर्तित करने की किसी को भी आवश्यकता नहीं होती है परन्तु निम्न स्तर के स्वभाव वाले व्यक्ति के स्वभाव को बदलने की ईच्छा हर कोई में होती है |बिहारी कहते हैं कि आपका यह प्रयास बेकार ही जायेगा क्योंकि किसी का भी स्वभाव बदलना किसी के भी बस में नहीं होता है |बिहारी ने कहा है-
                                   कोटि जतन कोऊ करे,परे न प्रकृतिहि बीच |
                                    नल बल जल ऊंचौ चढे,तऊ नीच को नीच ||
                           पानी का स्वभाव ऐसा होता है कि वह ऊपर से नीचे की तरफ ही बहता है |विद्युत मोटर और नल की सहायता स उसे ऊपर छत पर बनी पानी की टंकी में चढ़ाया जा सकता है |परन्तु इतने से ही पानी का स्वभाव ऊपर चढने का नहीं हो जाता है |ज्योंही उसे नीचे की तरफ जाने का रास्ता मिलेगा वह ऊपर से नीचे की ओर बहने लगेगा | बिहारी पानी के इस स्वभाव से नीच मनुष्य के स्वभाव की तुलना करते हैं और कहते हैं कि चाहे आप करोड़ों (कोटि )तरह के उपाय करले,कोई भी उपाय प्रकृति प्रदत्त स्वभाव को बदल सकने जैसा कार्य नहीं करने वाला |आपके ये समस्त उपाय व्यर्थ ही साबित होंगे |क्योंकि प्रकृति प्रदत स्वभाव को कोई भी परिवर्तित नहीं कर सकता है |
                           इस दोहे से हमें यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि अगर आप को किसी व्यक्ति का स्वभाव पसंद नहीं है तो उस व्यक्ति का स्वभाव बदलने का प्रयास कदापि न करें |इससे आपकी उर्जा व्यर्थ में ही नष्ट होगी |बेहतर होगा की आप इस उर्जा का कहीं और उपयोग करें |
                                || हरिः शरणम् ||

Thursday, February 6, 2014

अमृत-धारा |बिहारी -१

                                     बिहारी,काव्य जगत का एक ऐसा नाम जिसे कभी भी विस्मृत नहीं किया जा सकेगा |जिस समय बिहारी का इस संसार में आगमन हुआ और अपना जीवन जिया , उस समय को  रीति-काल कहा जाता है |बिहारी का जन्म ग्वालियर ,बुंदेलखंड में हुआ था,बाद में  वे मथुरा ,अपनी ससुराल जाकर बस गए थे | बिहारी ने ७१३ दोहों से "सतसई " नामक एक ग्रन्थ की रचना की थी |जिसके बारे में किसी ने सच ही कहा है कि-
                           सतसईया के दोहरे,ज्यों नाविक के तीर |
                           देखन   में  छोटे   लगे , घाव करे गंभीर ||
               वे राज घराने जयपुर के राज कवि रहे हैं |उस वक्त जयपुर में सवाई जय सिंह का शासन था ,जो शाहजहाँ के अधीन थे |राजा जय सिंह अपनी शादी के बाद नई रानी के साथ अतिव्यस्त हो गए थे ,तब बिहारी ने उनको आगाह करने के लिए एक दोहा कहा था-
                                नहिं पराग नहिं  मधुर मधु,नहिं विकास यहि काल |
                                  अली कली में ही बिंध्यो ,आगे कौन हवाल ||
                   बिहारी , राजा जय सिंह को समझाते हुए कह रहे हैं कि रानी रत रहने का कोई कारण नहीं है|न तो इनमे पराग है,न ही यह कोई मीठा मधु यानि शहद है और रानी में मगन रहना न ही कोई विकास का काम  है |यह तो मात्र एक काल है |हे अली अर्थात हे भँवरे (राजा को संबोधन )तूं इस कली के साथ रहकर क्यों बिंधा जा रहा है अर्थात केवल रानी में ही क्यूँ इतना रत है ,इससे ज्यादा मैं क्या कहूँ?भंवरे और कली के उदाहरण से अधिक अच्छा क्या उदाहरण दूँ-"आगे कौन हवाल" अर्थात तुमसे अधिक इस राज्य का कौन रक्षक हो सकता है ?|भंवरा कली के मोह में आकर काँटों से बिंध जाता है क्योंकि फूल में पराग भी होता है और शहद भी |पराग और शहद पाने की कामना ,भंवरे को फूल की तरफ आकर्षित करती है|फूल के चारों और कांटे होते है जिनके कारण भंवरे का शरीर बिंध जाता है |बिहारी ने जय सिंह को यही समझाया कि रानी में न तो पराग है और न ही मीठा शहद |केवल रानी के पास रहकर तूं अपने आपको घायल क्यों कर रहा है?आप एक अच्छे योद्धा हो,रानी के पास रहते हुए घायल होने से अच्छा है कि युद्ध मैदान में वीरता के साथ लड़ते हुए घायल हों |उस समय शाहजहाँ ने बिना जय सिंह को साथ लिए बखल पर आक्रमण किया था परन्तु वहाँ पर वह और उसकी सेना फंस गयी |राजा जय सिंह को बुलाने के लिए उसने सन्देश भेजा था |उस समय राजा से डरते हुए किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि शाहजहाँ का यह सन्देश उन्हें पहुंचा दे क्योंकि राजा जय सिंह अपनी रानी में मस्त था |तब बिहारी ने ही उन्हें उपरोक्त दोहे के माध्यम से समझाया था |राजा जयसिंह सब बात तुरंत समझ गए और सेना लेकर बखल के लिए प्रस्थान कर गए |वहाँ वीरता से लड़कर शाहजहाँ और उसकी सेना को सुरक्षित निकल लाए |
                                    यही है बिहारी की खासियत |रीति-काल के कवि उस समय की व्यवस्था को देखकर अपनी काव्य रचना के माध्यम से संकेत देते थे |विवेकशील मनुष्य तुरंत ही उसका अर्थ समझ जाते थे और फिर उसी अनुरूप कार्य करते थे |इन रचनाओं में किसी भी प्रकार का कटाक्ष नहीं हुआ करता था,जिससे न तो कहने वाले और न ही समझने वाले को बुरा लगता था |एक आदर्श कविता और कवि की यही पहचान होती है |
                                  || हरिः शरणम् ||

Wednesday, February 5, 2014

अमृत-धारा |रहीम-५

                                                 रहीम एक समाजसुधारक भी रहे हैं |समय समय पर उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार किये|उनकी एक सोच थी कि जब तक व्यक्ति स्वयं  नहीं सुधरेगा तब तक समाज नहीं सुधर सकता |उन्होंने समझदार और मूर्खों के बारे में स्पष्टतः अंतर किया है और कहा है कि जब तक ज्ञान को आचरण में नहीं लाया जायेगा तब तक सारा ज्ञान ही व्यर्थ है |जिसको ज्ञान तो है परन्तु ज्ञान को अमल में नहीं लाता तो वह फिर ज्ञानी न होकर मूर्ख ही है |इस बारे में उनका एक दोहा है-
                                          रहिमन नीर पहान,बूडे पर सींझे नहीं |
                                           तैसे मूरख जान,बुझे पर सूझे नहीं ||
                     रहीम इस दोहे के माध्यम से कहना चाहते हैं कि जैसे नदी के जल में पत्थर डूब तो जाता है परन्तु भीतर से भीगता नहीं है-"रहिमन नीर पहान,बूडे पर सींझे नहीं"|आप पानी में पत्थर फेंकिये,वह उसमे डूब जायेगा |कई दिनों तक डूबे रहने के बाद निकालिए और उसे तोड़ डालें |आप पाएंगे कि भीतर से उसकी कठोरता कई दिनों तक पानी में डूबे रहने के बाद भी कायम है |रहीम कहते हैं कि यही स्थिति एक मूर्ख व्यक्ति की होती है,जो समझता तो सब है परन्तु उस समझ का उपयोग नहीं करता है |पानी रुपी ज्ञान में वह आकंठ डूबा है परन्तु उस ज्ञान पर वह चलता नहीं है |ऐसे व्यक्ति को मूर्ख के अतिरिक्त और क्या कह सकते हैं ?इसी मूर्खता के बारे में अन्य स्थान पर रहीम कहते हैं-
                                            पात पात को सींचबो,बरी-बरी को लोन |
                                            रहिमन ऐसी बुद्धि को ,कहो बरैगो कौन ||
                        रहीम कहते हैं कि मूर्खता कैसी कैसी होती है-देखिये जरा |पौधे को पानी देने के स्थान पर पत्तों को पानी दिया जा रहा है-"पात पात को सींचबो"|अगर पौधे को पानी देना है तो उसकी जड़ों में देना होता है,केवल पत्तों को भिगोने से कुछ नहीं होगा |इसी प्रकार दाल की जब बडियां बनाई जाती है तो नमक पूरी दाल में डाला जाता है ,न कि बडियां बनाने के बाद एक एक बड़ी पर नमक डाला जाये |मूर्ख लोग एक एक बड़ी पर नमक डालते हैं-"बरी-बरी को लोन"|आगे रहीम कहते हैं कि ऐसी बुद्धि की कोई सराहना कैसे कर सकता है ?रहीम इसके बाद बुद्धिमत्ता के बारे में कहते हैं कि-
                                           एकै साधे सब सधै,सब साधे सब जाय |
                                        रहिमन मूल ही सींचबो,फूलहि फलहि अघाय ||
                         पौधे की जड में पानी देने से सब कार्य संपन्न हो सकते हैं |पेड़ के पत्ते,फूल और फल सभी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकते हैं |अतः समझदार व्यक्ति एक ही मुख्य कार्य कर सभी कार्य संपन्न कर सकते हैं |प्रत्येक व्यक्ति की ऐसी ही सोच होनी चाहिए ,तभी उसकी बुद्धि की प्रशंसा की जा सकती है |
                         उपरोक्त सभी दोहों की अध्यात्मिक व्याख्या है |परमपिता परमात्मा ही सर्वज्ञ है और उन तक पहुंचना ही एक मात्र लक्ष्य होना चाहिए |उसी की आराधना ही सबसे बड़ी आराधना है |संसार का मूल वही है |समझदार व्यक्ति दिन-रात उसी में रत रहते हैं |
                                              || हरिः शरणम् ||

Tuesday, February 4, 2014

अमृत-धारा |कबीर-७

                                    कबीर परमात्मा की प्रार्थना के नाम पर किये जा रहे ढकोसलों के सख्त विरोधी थे |उन्होंने सभी धर्मों को मानने वालों को इन ढकोसलों के बारे में जागृत किया था | उन्होंने लोगों को चेताया कि अगर आप मन को प्रार्थना के दौरान परमात्मा की तरफ नहीं लगाते हो तो फिर आपकी ऐसी प्रार्थना की कोई कीमत नहीं है |परमात्मा आपके मुंह से उच्चारित शब्दों की तरफ आकर्षित नहीं होगा बल्कि आपका एकाग्र मन ही आपको परमात्मा के निकट ले जायेगा |
                         ऐसी ही मेरे बचपन की एक घटना मेरे को अभी याद आ रही है |मैं यदा कदा अपने ननिहाल जाया करता था |जहाँ मैं रहता हूँ उसी गांव में मेरा ननिहाल भी है |एक दिन शाम को मैं मेरे ननिहाल में ही था |शाम की आरती का समय हो चला था |मेरी बड़ी नानी भगवान की आरती नियमित तौर पर करती थी |आरती और पूजा के दौरान घर का मुख्य दरवाजा खुला रखा जाता है,ऐसी वहाँ परम्परा है |उस दिन नानी आरती कर रही थी कि अचानक एक कुत्ता मुख्य दरवाजे से घर के अंदर प्रवेश कर रसोईघर की तरफ जाने लगा |नानी "जय जगदीश हरे" गा रही थी |कुत्ते को देखते ही उनके बोल इस प्रकार बन गए-"जय जगदीश हरे...दूर रह....दूर रह..."|कुत्ते को वह कह रही थी कि दूर रह | मुझे उस समय बड़ी हंसी आई|मैंने नानी को कहा कि आप तो ईश्वर को दूर रहने की कह रही थी |नानी कुछ समझ नहीं पाई कि मैं क्या कह रहा हूँ?उस समय तो नानी को ईश्वर की बजाय रसोई में बने शाम के खाने को कुत्ते से बचाने की फ़िक्र ज्यादा थी |
                                   कबीर ऐसी ही बातों पर कटाक्ष करते हैं और कहते हैं-
                                                           माला फेरत जुग गया ,मिटा न मन का फेर |
                                                           कर का मनका छोड़कर, मन का मनका फेर ||
                  यह जो आप माला फेर रहे है,ईश्वर के नाम की जो गिनती कर रहे है उसकी कोई बात नहीं है |ईश्वर आपको कितनी बार याद करता है,उसकी क्या वह गिनती करता है,जो आप उसको जितनी बार याद कर रहे हो ,उसकी गिनती कर रहे हो |इसकी कोई बात नहीं,लेकिन जब आप ईश्वर का नाम मुँह से उच्चारित कर रहे हैं तब आपका मन कहाँ था,वह जानना ज्यादा महत्वपूर्ण है |आपका मन उस वक्त या तो किसी कल्पना में खोया हुआ रहता है,या सांसारिक गतिविधियों की कोई योजना बना रहा होता है |ऐसी माला फेरने का कोई औचित्य नहीं है |कबीर कहते हैं कि इस प्रकार माला फेरते फेरते युग बीत जायेंगे ,परमात्मा फिर भी उपलब्ध नहीं होनेवाले |क्योंकि आप परमात्मा को सच्चे ह्रदय से तो स्मरण नहीं कर रहे हैं |माला के मनके तो आपके हाथ में फिर रहे हैं और आपका मन परमात्मा की बजाय संसार में इधर उधर भागा भागा फिर रहा है |आवश्यकता है कि इस हाथ में फिर रहे माला के मनकों को तो फेरना बंद करें और इस मन को इधर उधर भटकने से रोकें |मन को संसार में लगाने  की बजाय उसे परमात्मा की तरफ लगा  दें|इस मन के मनकों को परमात्मा की तरफ फिरा देना ही असली माला के मनकों का फिराना है |कबीर ऐसी ही बात अपने अलग अंदाज़ में अन्य दोहे में भी कहते हैं-
                                                          माला तो कर में फिरे ,जीभ फिरे मुख मांही |
                                                          मनवा तो चहुँ दिसि फिरे,यह तो सुमिरन नाहीं ||
                        कभी ध्यान से देखें-जब माला हाथ में फिर  रही है तब मुख में स्वतः ही आपकी जीभ भी कुछ उच्चारित कर रही होती है |जीभ वही उच्चारित कर रही होती है जिसकी आप उसे आदत डाल देते हैं |प्रारंभ में आपको पता होता है कि आप किस मन्त्र को उच्चारित करने की आदत डाल रहे हैं |एक बार जब जीभ की वह आदत बन जाती है तब आपको भी ज्ञान नहीं रहता कि जीभ क्या उच्चारित कर रही है ?ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपका मन उस अवधि में संसार में चारों तरफ घूम रहा होता है ,सोच रहा होता है कि कल आपको किसने क्या कहा था,आज कौन कौन से काम करने है,किसको क्या कहना है ?आदि आदि |ऐसी अवस्था में आपका माला फेरना और जिव्हा से परमात्मा के लिए मन्त्रों को उच्चारित करना,सब व्यर्थ है |आप संसार में रहते हुए संसार के बारे में सोचते रहकर परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते |आप इस संसार में रहते हुए परमात्मा में मन लगाकर ही परमात्मा को पा सकते है |परमात्मा प्राप्ति के लिए संसार से भागने की कोई आवश्यकता नहीं है |साथ ही इसके लिए न तो माला की आवश्यकता है और न ही किन्ही मन्त्रों के उच्चारण की |
                                          || हरिः शरणम् ||  

Monday, February 3, 2014

अमृत-धारा |रहीम-४

                                                    रहीम और कबीर -भक्ति युग के ये दो नाम ही ऐसे है जिन्होंने परमात्मा की प्रार्थना के लिए किये जा रहे ढकोसलों को प्रमुखता से उठाया है |लोगों को इनके बारे में बताते हुए आगाह भी किया है |संसार में रहते हुए माया और मोह में रहते  हुए परमात्मा को प्राप्त करना -दोनों एक साथ होना मुश्किल है |या तो आपको मोह माया को त्यागना पड़ेगा या फिर परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयास छोडना होगा |रहीम ने इस सम्बन्ध में कहा है कि-
                           अब रहीम मुश्किल पड़ी,गाढे दोऊ काम |
                           साँचे से तो जग नहीं,झूठे से नहीं राम ||
                                                   परमात्मा ही सनातन है ,सत्य है |संसार असत है |परमात्मा सदैव और समान है |संसार परिवर्तनशील है |आप एक समय में सत् और असत दोनों को कैसे उपलब्ध हो सकते हैं ?अगर आप सत् चाहते हैं तो असत को त्यागना होगा और अगर आपका आकर्षण असत में है तो फिर सत् को भूलना होगा |रहीम यहाँ यही कह रहे हैं कि मनुष्य के सामने यह कितनी बड़ी परेशानी आ खड़ी हुई  है कि दोनों काम कैसे संभव हो ?वह सांसारिक मोह में रहते हुए परमात्मा को पाना चाहता है | अगर सत्य के साथ चले तो संसार उससे दूर हो चलेगा और अगर असत्य का साथ दे तो फिर परमात्मा से मिलन संभव नहीं है |यही मनुष्य के सामने सदैव दुविधा रही है |किसी एक रास्ते पर चलने की उधेडबुन में उसका पूरा जीवन ही समाप्त हो जाता है |वह ताउम्र तय ही नहीं कर पाता कि उसे दोनों में से एक किसे चुनना चाहिए |यहाँ रहीम  उसे कोई भी रास्ता नहीं दिखा रहे है,बल्कि उसकी दुविधा को उसे बता रहे है |
                                दुविधा को स्पष्ट करने के बाद रहीम कहते हैं-
                       तासों ही कछु पाइए,कीजे जाँकी आस |
                           रीते सरवर गये,कैसे बुझे प्यास ?
                    रहीम अब दुविधा में फंसे व्यक्ति को रास्ता दिखाने का प्रयास करते हैं |वे कहते हैं कि "तासों ही कछु पाइए,कीजे जांकी आस "जिसकी आप आशा कर रहे हो,मनुष्य की आशा है परमात्मा को पाना ,जिसकी तुम आशा कर रहे हो वही तुमको कुछ दे सकता है |यहाँ आपको जो कुछ भी मिल रहा है वह सब उस परम पिता परमात्मा का ही दिया हुआ है |रहीम यहाँ कहते हैं कि जिसको तुम चाहते हो वही तुम्हे दे सकता है |लेकिन तुम इस संसार में आकर,संसार से ही कुछ प्राप्त करने की आशा कर रहे हो |संसार तो एक रीता तालाब है ,उसमे पानी का अभाव है ,फिर भी आप उससे पानी चाहते है |ऐसे में वह सरोवर आपकी प्यास कैसे बुझा सकता है ?यहाँ प्यास आपकी कामनाएं है और संसार एक सरोवर है |संसार ने क्या किसी की कामनाये,इच्छाए कभी भी पूरी की है?नहीं,कभी भी किसी की कामनाएं पूरी हुई है और न ही कभी पूरी हो सकती है |मनुष्य यह सब भलीभांति जानता भी है ,फिर भी वह संसार से ही कुछ पाने की कामना करता है |लेकिन एक बार जब वह परमात्मा की आशा करता है तब समस्त कामनाएं समाप्त हो जाती है ,और उसे जो प्राप्त होता है वह केवल वही जान सकता है जिसने उसे प्राप्त किया है |रहीम इस बात को अपने काव्य के माध्यम से इस प्रकार कहते हैं -
                          रहिमन बात अगम्य की,कहनि सुननि की नाहीं |
                          जे जानति ते कहति नहीं,कहत ते जानति नाहीं ||
               "रहिमन बात अगम्य की"-अगम्य उसे कहते हैं जो गमन नहीं करता हो अर्थात चलायमान नहीं हो ,सनातन और प्रत्येक स्थान पर हो ,सर्वत्र हो ,परिवर्तनशील न हो |परमात्मा ही अगम्य है |रहीम कहते हैं कि परमात्मा की बात कोई कहने और सुनने की नहीं है ,क्योंकि जो परमात्मा को जान चूका है ,उसके पास तो उसे बताने के लिए शब्द नहीं है,वे परमात्मा को जानकर मौन हो जाते हैं |और जो परमात्मा को जानते ही नहीं है ,वे पूरे संसार को उसके बारे में बतलाते घूम रहे हैं |आज के सन्दर्भ में यह बात एकदम से सही प्रतीत हो रही है |कबीर ने परमात्मा को जान जाने और फिर उससे प्राप्त आनंद को सबको बता न पाने को "गूंगा केरी शर्करा "कहा है |गूंगा शक्कर खाकर भी उसकी मधुरता को बतला नहीं सकता |
                 रहीम संसार को असत कहते है और परमात्मा को सत् |दोनों एक साथ प्राप्त नहीं किये जा सकते |दोनों में से किसी एक को चुनना होगा |परमात्मा को ,सत् को चुनना ही सही चुनाव है |जब आपका चुनाव सत् के पक्ष में हो जाता है,तो फिर आप परमात्मा के अतिनिकट हो जाते हो |ऐसे में परमात्मा आप से दूर कैसे रह सकते है ?और एक बार जब आपको परमात्मा की आहट महसूस होती है तो फिर उसे व्यक्त करने के लिए आपके पास शब्द ही नहीं होते |यही आध्यात्मिकता की उच्चत्तम अवस्था है |
                                             || हरिः शरणम् ||

Sunday, February 2, 2014

अमृत-धारा |रसखान-२

                                             गीता में भगवान श्री कृष्ण ने परमात्मा की प्राप्ति के लिए जो मार्ग बताएं है उनमे एक मार्ग ज्ञान का है |ज्ञान ,परमात्मा को जानने का ही दूसरा नाम है |ज्ञान सबसे अच्छा रास्ता है क्योंकि इसमें परमात्मा को सम्पूर्ण रूप से जान लेने के कारण उससे सम्बंधित सभी भ्रांतियां दूर हो जाती है |परन्तु इस मार्ग की सबसे बड़ी कमी यह है कि ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति अहंकार ग्रस्त हो सकता है |कोई बिडला ही ऐसा होगा जो ज्ञान प्राप्त कर के भी अहंकार से मुक्त हो |
                                             ज्ञान प्राप्त होने के बाद भी अहंकार न आने पाये,यह केवल तभी संभव है जब आप प्रेमपूर्ण हो |प्रेम और अहंकार दोनों एक दूसरे के विपरीत है |जहाँ प्रेम है वहाँ अहंकार और घमंड का कोई स्थान नहीं है |हो सकता है कि बिना प्रेम पूर्णता के आप ज्ञान से सत्य को प्राप्त कर ले परन्तु जो आनंद प्रेम के साथ सत्य को पाने में है वह अकेले ज्ञान से सत्य पाने में नहीं है |इसलिए जितने भी संत महापुरुष हुए हैं वे सब ज्ञान के साथ साथ प्रेम से भी परिपूर्ण थे |इसी लिए उनके ह्रदय से काव्य प्रस्फुटित हुआ है |
                                              रसखान ने इसी ज्ञान और प्रेम के बारे में कहा है-
                                    भले वृथा करि पचि मरौ,ज्ञान गरूर बढ़ाय |
                                    बिना प्रेम फीको सबै,कोटिन कियो उपाय ||
                          आप चाहे कितना ही प्रयास करलें,आपके सब प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे अगर आप केवल अपना ज्ञान ही बढ़ा रहे है और आपके भीतर प्रेम नहीं है |बिना प्रेम के ज्ञान केवल आपका भार ही बढ़ाएगा |अहंकार आपके जीवन का सबसे बड़ा बोझ है |और जब आप बोझिल होते हैं तब आपके भीतर परमात्मा का प्रवेश कैसे संभव है ?बिना प्रेम के सारा संसार ही फीका है |आप करोड़ों उपाय करलें,आप बिना प्रेम के स्वयं में मधुरता नहीं ला सकते|रसखान आगे कहते हैं-
                                   कमलतंतु सो छीन अरु,कठिन खड़ग की धार |
                                    अति सूधो टेढो बहुरि,प्रेम पंथ अनिवार ||
                            ज्ञान-मार्ग के साथ प्रेम -मार्ग का संगम आपको परमात्मा की सुखद अनुभूति करता है |यह प्रेम का रास्ता कमल की डंडी के रेशे जितना सूक्ष्म है |कमल पुष्प की डंडी कई सूक्ष्म तंतुओं से बनी होती है |उसका प्रत्येक तंतु बहुत ही महीन होता है |रसखान कहते है कि प्रेम मार्ग इतना ही सूक्ष्म और संकडा व तंग है |प्रेम के रास्ते पर चलना ऐसे ही है जैसे तलवार की तेज धार पर चलना हो |संकडे और तेज धार वाले मार्ग पर चलना संसार में सबसे कठिन कार्य है |यह प्रेम का रास्ता सीधा भी है और टेढा भी |सीधा उनके लिए जो प्रेम में मिट जाते हैं और टेढा उनके लिए जो स्वयं को मिटा नहीं पाते |रसखान कहते हैं कि इस प्रेम के मार्ग पर सोच समझ कर चलना पड़ता है |और बिना प्रेम के सब कुछ फीका है |प्रेम ही आपके जीवन को मधुरता प्रदान कर सकता है |बिना प्रेम यह जीवन शुष्क मरुस्थल जैसा है और प्रेम के साथ अत्यंत ही मधुर |
                                           || हरिः शरणम् ||

Saturday, February 1, 2014

अमृत-धारा |रसखान -१

                                          रसखान,वाकई रस की खान ही है |मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद वे कृष्ण के परम भक्त थे |जितनी भी उन्होंने रचनाएँ की है,सब में कृष्ण के प्रति उनका प्रेम दृष्टिगोचर होता है |भक्ति-काल की इस विभूति ने रहीम और कबीर की तरह ही प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया है |परमात्मा की प्रार्थना में प्रेम अगर शामिल नहीं है तो वह प्रार्थना परमात्मा कैसे स्वीकार कर सकता है ?रसखान ने कृष्ण के जीवन के प्रेम-पक्ष को अपनी रचनाओं में प्राथमिकता दी है |प्रेम के बारे में रसखान कहते हैं कि-
                                            प्रेम प्रेम सब कोऊ कहत,प्रेम न जानत कोइ |
                                            जो जन जानत प्रेम जो , मरे जगत क्यूँ रोइ ||
                      रसखान भी यहाँ कबीर कि तरह ही प्रेम के बारे में कहते हैं कि सारा संसार प्रेम,प्रेम ,प्रेम ....कहता जरूर है ,परन्तु प्रेम क्या होता है यह बात कोई जानता तक नहीं है |सब लोगों ने प्रेम का नाम सुन जरूर रखा है परन्तु उनके जीवन में प्रेम परिलिक्षित कहीं भी नहीं होता है |आप प्यासे हो और केवल पानी ,पानी की रट लगाते रहोगे तो केवल क्या पानी का नाम लेते रहना ही आपकी प्यास  बुझा देगा ?अगर प्यास बुझानी है तो फिर पानी पीना ही होगा |इसी प्रकार  केवल प्रेम का नाम रटते रहने से प्रेम का अवतरण आपके जीवन में नहीं हो पायेगा |जिस दिन प्रेम का प्रादुर्भाव हो जायेगा उस दिन के बाद आपके जीवन से सारा रोना-धोना स्वतः ही मिट जायेगा |इसी को रसखान कहते हैं -"जो जन जानत प्रेम जो , मरे जगत क्यूँ रोइ "|अगर प्रेम को जानते हैं तो फिर यह संसार रो रो कर क्यों मर रहा है ?प्रेम में किसी भी प्रकार का दुःख-दर्द नहीं होता |प्रेम के साथ ही इन सब विकारों का अदृश्य होजाना भी स्वाभाविक है |प्रेम के बारे में रसखान समझते हैं कि -
                                        अति सूक्ष्म कोमल अतिहि ,अति पतरौ अति दूर |
                                         प्रेम कठिन सब ते सदा,नित इकरस भरपूर ||
                      प्रेम बहुत ही सूक्ष्म और कोमल है |सूक्ष्म इस दृष्टि से कि यह प्रेम केवल प्रेमपूर्ण ह्रदय वाले को ही नज़र आ सकता है,बिना ऐसे ह्रदय के प्रेम को देख पाना असंभव है |प्रेम जब महसूस हो जाता है तब लगता है कि यह बहुत ही पास है और जब इसका आभास किसी को नहीं हो पता तो उसके लिए प्रेम बहुत ही दूर की बात है |प्रेम ,इसी कारण से सदैव ही कठिन कहा गया है ,क्योंकि प्रेम करने के लिए व्यक्ति को खुद को मिटाना होता है |इस संसार में हर कोई दूसरे को ही मिटाने पर तुला  है,स्वयं मिटने को तैयार ही नहीं है |ऐसे में प्रेम कहाँ से प्रकट होगा ?इसी कारण से प्रेम को सबसे कठिन कहा गया है |प्रेम का पदार्पण जब हो जाता है तो वह अस्थाई कभी भी नहीं होता |वह असीम ,सनातन और आनंदित करने वाला होता है |प्रेम सदैव ही एक समान रस प्रदान करने वाला है और यह रस भी कम नहीं,भरपूर प्रदान करता है |
                                        || हरिः शरणम् ||