Saturday, November 9, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१६

क्रमश:१६
                      गीता में भगवान श्री कृष्ण ने मुक्ति के तीन योग बताये हैं-यथा,ध्यान-योग,कर्म-योग और ज्ञान-योग |इन तीनों में सबसे उपयुक्त कर्म-योग को बताया है इसके कई कारण है |सबसे बड़ा कारण यह है की मनुष्य अपने जीवन में कभी भी किसी भी समय कर्म किये बिना रह ही नहीं सकता | जब कर्म ही करते रहना है तो फिर इससे अलग और आसान मुक्ति का साधन कोई दूसरा हो ही नहीं सकता |अब हम मुक्ति के तीसरे साधन की वैज्ञानिक आधार पर विवेचना करेंगे |यह तीसरा उपाय है -ज्ञान योग |
                     गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                             न    हि   ज्ञानेन   सदृशं    पवित्रमिह   विद्येते |
                            तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दन्ति ||गीता ४/३८||
           अर्थात्,इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है |उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग से शुद्ध अन्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है |
                        इस श्लोक में श्री कृष्ण ने तीन बाते कही है-१.ज्ञान सबसे पवित्र करने वाला है |२.ज्ञान कर्म-योग से ही पाया जा सकता है ,और ३.कर्म-योग से अन्तःकरण शुद्ध होने पर मनुष्य को ज्ञान पाने के लिए कहीं भी भटकना नहीं पड़ता है ,वह उस ज्ञान को अपनी आत्मा में ही पा लेता है |मनुष्य की ज्ञान पाने की जब छटपटाहट बढती है,तब वह उसे पाने के लिए इधर उधर भटकता है,कई प्रकार के कर्म करता है जैसे शास्त्र पढ़ना,तत्व-ज्ञानियों से सत्संग करना इत्यादि | इतने कर्म करने के बाद उसे यह आभास होता है कि इन सबसे  भी वह कुछ भी प्राप्त नहीं कर पा रहा है तब वह यह भटकन छोड़ कर शांत हो जाता है |यही अन्तःकरण के शुद्ध होने की अवस्था है और इसी अवस्था में वह ज्ञान जो वह बाहर खोज रहा था उसे अपनी आत्मा में यानि स्वयं के अंदर ही मिल जाता है |भगवान बुद्ध को भी इसी प्रकार बौधित्व प्राप्त हुआ था |
                            अब इसी ज्ञान को विज्ञानं के अनुसार देखते हैं |Neocortex केवल मानव मस्तिष्क में ही होता है |इसी में ज्ञान संचित(Store) रहता है और किये गए कर्मों की दीर्घ कालीन स्मृति(L.T.M.) भी |जब व्यक्ति ज्ञान प्राप्ति के लिए कर्म करता है वे दीर्घ कालीन स्मृति के रूप में Neocortex में संचित होते रहते है |जब व्यक्ति थक हारकर ज्ञान पाने से सम्बंधित कर्म बंद कर देता है तब उन सब कर्मों के बारे में वह अन्तःकरण से विचार करता है |उसे महसूस होता है कि सब कुछ आत्मा में ही स्थित है और आत्मा ही परमात्मा का एक अंश है |इस अवधि में वह तात्विक-ज्ञान (Elemental knowledge)को उपलब्ध हो जाता है ,जिसका वर्णन हम पहले ही कर चुके हैं |जब वह ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है तो पूर्व में किये गए कर्म जो दीर्घ कालीन स्मृति के रूप में Neocortex में अंकित हैं ,वे सभी धीरेधीरे कमजोर पड़कर समाप्त होने लगते हैं और एक दिन समस्त Neocortex कर्मों की स्मृति से मुक्त हो जाता है और मात्र ज्ञान ही वहाँ रह जाता है |इस स्थिति में अगर वह व्यक्ति कोई कर्म  करता है तो वे सभी अकर्म हो जाते हैं |यह ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है |मृत्यु के बाद आत्मा के साथ जाने के लिए कुछ भी शेष नहीं बचता,ऐसे में पुनर्जन्म का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है और और आत्मा का परमात्मा के साथ योग हो जाता है |इसी का नाम मुक्ति है |
                ज्ञान और कर्मों के बारे में भगवान श्री कृष्ण गीता में भी यही बात कहते हैं-
                            न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा |
                           इति मां  योSभिजानाति  कर्मभिर्न  स  बध्यते ||गीता ४/१४||
अर्थात्, कर्मों के फल में मेरी स्पृहा (आसक्ति) नहीं है;अतः मेरे को कर्म लिप्त नहीं करते - इसी प्रकार जो मनुष्य ज्ञान प्राप्त कर लेता है अर्थात् मुझे तत्व से जान लेता है ,वह भी कर्मों से नहीं बंधता(No attachment with acts) है यानि उसकी भी कर्मों में आसक्ति नहीं रहती है |
क्रमश:
                    || हरिः शरणम् ||

Friday, November 8, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१५

क्रमश:१५
                  गीता में कर्म तीन प्रकार के बतलाये गए हैं -कर्म,विकर्म और अकर्म|कर्म को आप सकाम कर्म भी कह सकते हैं ,जो की किसी निश्चित उद्देश्य को ध्यान में रख कर किये जाते हैं|                
                             जब सकाम कर्म किये जाते हैं और उनसे उद्देश्य (Target)पूरा नहीं हो पाता तब ये कर्म लघु अवधि स्मृति(S.T.M.) के रूप में  Hippocampus में जमा(Collect) हो जाते हैं और उद्देश्य की प्राप्ति के लिए Hypothalamus द्वारा पुनः कर्म करने के आदेश कर्मेन्द्रियों(Senses of act) को दिए जाते है |यह क्रम न टूटने वाले चक्र(Vicious cycle) में परिवर्तित हो जाता है और बार बार यही प्रक्रिया दोहराती(Repetition) जाती है |अंत में या तो उद्देश्य पूरा हो जाता है अथवा नहीं |नहीं की स्थिति में मृत्यु बाद पुनर्जन्म इन अधूरे उद्देश्य यानि कामनाओं को पूरा करने के लिए अवश्यम्भावी है|उद्देश्य पूर्ण हो जाने की स्थिति में व्यक्ति को कर्म के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है या फिर उद्देश्य और विशाल हो जाता है |ऐसे में व्यक्ति फिर से सकाम कर्म के चक्र से नहीं निकल पाता,ऐसे में पुनर्जन्म से मुक्ति कैसे संभव हो सकती है ?
                          विकर्म तो ऐसे कर्म है जो सकाम कर्म के बिलकुल ही उल्ट(Opposite) होते हैं |ऐसे कर्म जो दूसरे को हानि (Loss) पहुँचाने के उद्देश्य से किये जाते हों ,वे समस्त कर्म विकर्म कहलाते हैं |ये कर्म क्रोध,घृणा,अहंकार और भय के कारण किये जाते हैं |इन कर्मों में पीयूष ग्रंथि (Pitutary gland)के द्वारा Hormones का श्राव होता है जो Adrenal ग्रंथि (Supra renal gland)से Adrenaline hormone का श्राव (Secretion)कराती है जो ऐसे कर्म करवाते हैं जो क्रोधवश,घृणास्पद ,अहंकारयुक्त और भयवश किये जाते हैं |इन कर्मों के लिए पीयूष ग्रंथि(Pitutary gland) को  आदेश Hypothalamus से मिलते हैं और कर्म हो जाने पर सीधे Hippocampus द्वारा दीर्घ कालीन स्मृति(L.T.M.) में बदलकर Neocortex में संचित(Store) कर दिए जाते हैं |मृत्यु के समय ये सब चुम्बकीय तरंगों के (Magnetic waves)रूप में (चित्त )आत्मा के साथ शून्य (Space)में चले जाते हैं |विकर्म का फल बड़ा ही भयावह होता है |आत्मा उनका विश्लेषण(Analysis) कर नीच योनी के शरीर कर्मफल भोगने हेतु उपलब्ध करवाती है |
                            गीता में तीसरे प्रकार के जो कर्म बताये गए हैं ,वे कर्म ,सम्पादित होने के बाद कर्म(Act) से अकर्म(No act)) में बदल जाते हैं |जो कर्म,अकर्म(Act to in-act) में बदल जाते हैं वे है -निष्काम कर्म (Act without any target)अर्थात् ऐसे कर्म जो बिना किसी कामना के किये जाते हों जैसे समाज सेवा,असहाय की सहायता ,बीमार की सेवा सुश्रुसा आदि|दूसरे कर्म जो अकर्म बन जाते हैं वे हैं ऐसे कर्म जो ईश्वर को समर्पित होकर ईश्वर के लिए (Act for God)ही किये जाते हैं |ये कर्म होते तो सकाम कर्म है(Targeted act) अर्थात् किसी उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं परन्तु ईश्वर का कार्य(Act of God) मान कर किये जाते हैं |इसके उदहारण है -वृद्ध माता-पिता की सेवा करना,संतान का लालन-पालन करना,गौ-पालन और उसकी सेवा करना आदि|ये कर्म भी अकर्म में परिवर्तित हो जाते हैं |तीसरे प्रकार के कर्म जो कि बाद में अकर्म हो जाते हैं वे भी होते तो सकाम कर्म ही है ,किसी निश्चित कामना के लिए होते हैं और स्वयं के लिए होते हैं परन्तु कर्मफल ईश्वर को दे दिया जाता है अर्थात् कर्म-फल त्याग(Detachment from the result of act) दिया जाता है |इसके उदाहरण है व्यापार करना परन्तु उसका फल यानि लाभ या हानि (Profit or loss) ईश्वर को समर्पित करते हुए त्याग देना,चिकित्सक द्वारा स्वयं के लाभ के लिए चिकित्सा भले ही करना परन्तु उपचार का परिणाम(Result of treatment) त्याग कर ईश्वर को समर्पित कर देना(Doctor treats,God cures) ,किसी भी विद्यार्थी द्वारा परिक्षा की तैयारी सफल होने के उद्देश्य से करना परन्तु जो भी परिणाम आये उसे ईश्वर को समर्पित करते हुए त्याग देना आदि|उपरोक्त तीनो ही प्रकार के कर्म,बाद में अकर्म में परिवर्तित हो जाते है और उनका प्रभाव नए जन्म (Reincarnation)पर बिलकुल भी नहीं होगा |
                       कर्म-योग में मुक्ति का जो वैज्ञानिक आधार है उसमे कर्म के प्रति या कर्मफल के प्रति आसक्ति (Attachment with act or result of act ) का न होना ही है |जब कर्म किसी उद्देश्य को लेकर किये जाते हैं तब उसे सकाम कर्म कहा जाता है |परन्तु जब कर्म बिना किसी उद्देश्य के ,केवल ईश्वर के कर्म समझ कर किये जाते हैं तब वे निष्काम कर्म कहलाते हैं |ऐसे कर्म फिर अकर्म हो जाते हैं |अर्थात ऐसे कर्मों को करने के लिए Hippocampus द्वारा जो आदेश पीयूष ग्रंथि(Pitutary gland) के माध्यम से या मस्तिष्क के अन्य भागों के माध्यम से कर्मेन्द्रियों (Senses of act)को दिए जाते हैं उनसे कर्म तो कर लिए जाते हैं परन्तु उन कर्मों के उपरांत वापिस Hippocampus को कोई भी ऐसी संवेदी सूचनाएं(Sensory information in form of sensory signals) नहीं मिल पाती जिन्हें कि Hippocampus को स्मृति  में बदलना पड़े |ऐसे कर्मों का अंकन(Recording) जब Hippocampus द्वारा स्मृति(Memory) के रूप में नहीं किया जायेगा तो Neocortex को भी कोई सूचना नहीं मिल पायेगी और मृत्यु के समय आत्मा के साथ इनकी चुम्बकीय तरंगे(Magnetic waves) नहीं जाएँगी|फिर आत्मा को किसी नए शरीर की तलाश भी नहीं करेगी और चुम्बकीय तरंगों रुपी आत्मा पुनः अपने मूल श्रोत परम चुम्बकीय क्षेत्र(Para magnetic field) अर्थात परम ब्रह्म परमात्मा में जाकर उसके आत्मसात हो जायेगी|
                        गीता में  कर्म-योग में तीन प्रकार से मुक्ति के उपाय बताये गए हैं-निष्काम कर्म,ईश्वर के लिए कर्म और कर्मफल का त्याग |तीनों ही के अंतर्गत किये  गए कर्मों का वैज्ञानिक रूप से Hippocampus के द्वारा Neocortex में स्मृति के रूप में अंकन (Record as memory)संभव नहीं है |इस प्रकार ऐसे कर्म मुक्ति के द्वार(Entrance gate for freedom) हैं |
क्रमश:
                              || हरिः शरणम् ||
                          

Thursday, November 7, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१४


क्रमश:१४
                         मुक्ति(Freedom from Reincarnation) के लिए मन(Mind) पर नियंत्रण(Control) बहुत ही आवश्यक है |इच्छाएं और कामनाएं(Desires) कभी भी बुरी नहीं होती है ,बल्कि उनके पीछे भागना,किसी भी हालत में उन्हें पूरी करना और इच्छा पूरी होने के बाद भी और अधिक की इच्छा करना बुरा है | एक इच्छा को पूरी करने के लिए आसक्त होकर कर्म करना उस इच्छा की स्मृति को बनाये रखता है |जिसके फलस्वरूप अल्प अवधि स्मृति(S.T.M.) ,दीर्घ अवधि स्मृति(L.T.M.) में बदलकर भावी जीवन(Next life) को प्रभावित करती है |अतः पुनर्जीवन से मुक्ति के लिए आवश्यक है कि स्मृति(Memory) के आधार पर जो विचार(Thoughts) मन में उत्पन्न हो ,वे शुद्ध और सात्विक हों
                       विचार(Thoughts) एक ऐसी प्रक्रिया है जो बिना स्मृति के संभव नहीं है |आज हमारे मन में जो भी विचार पैदा हो रहे हैं ,उनका सम्बन्ध किसी न किसी पूर्व स्मृति से जरूर है | मानव मस्तिष्क (Brain) और सुषुम्ना नाडी(Spinal cord) से जो सन्देश (Signals)प्रसारित (Send)और प्राप्त (Receive)किये जाते हैं ,इस कार्य में  Neurons की भूमिका होती है |इन Neurons  के कारण ही स्मृति बनती है और स्मृति से विचार |Neurons कभी भी बढ़ते नहीं है जैसे कि शरीर की अन्य कोशिकाएं बढती हैं|एक बार अगर कोई एक Neuron समाप्त (Dead)हो जाता है तो फिर उस स्थान पर नया Neuron नहीं बनेगा | Neurons को नुकसान पहुँचने पर व्यक्ति की स्मृति और विचार में भी परिवर्तन आ जाता है |यही स्थिति Synapses की होती है |
                           इसी लिए भारतीय मनीषियों ने ध्यान(Meditation) पद्धति में विचारों पर अंकुश लगाने(Control on thoughts) की प्रकिया पर ही बल दिया है |निर्विचार(Thoughtlessness) हो जाना ही ध्यान की अवस्था है |विचार आखिर हैं क्या?-केवल पूर्व में प्राप्त अनुभव (Experiences)और ज्ञान(Knowledge) जो स्मृतियों के रूप में मस्तिष्क में इक्कठ्ठा (Stored in brain)हो जाता है |विचारों के मस्तिष्क से अलग होते ही स्मृतियाँ (Memories)भी स्थाई नहीं रह पायेगी }ऐसी स्थिति आने पर Hippocampus और Hypothalamus में सभी क्रियाएँ नियंत्रण में रहेगी और कर्म भी | ऐसी स्थिति में यही स्मृतियाँ ,इच्छाओं और कामनाओं को बढ़ने से रोक देती है और उनको पूरा करने के लिए किये जा रहे कर्मों को भी |जिसके कारण मानव जीवन में अभूतपूर्व सुधार आना शुरू हो जायेगा |यही एकमात्र पुनर्जन्म से मुक्ति(Freedom from Reincarnation) की वैज्ञानिक प्रक्रिया है |
                             पुनर्जन्म से मुक्ति के लिए जो भी वैज्ञानिक प्रक्रिया है वह केवल ध्यान योग ही है,जबकि भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवतगीता में ध्यान के अतिरिक्त मुख्यरूप से दो अन्य पद्धतियाँ भी बतलाई है |वे है -कर्म-योग तथा ज्ञान योग |ध्यान,कर्म और ज्ञान योग के बारे में आध्यात्मिकता की दृष्टि से हम पूर्व में विस्तृत रूप से विचार कर चुके हैं |ध्यान योग में साधारण सी दिखाई देने वाली प्रक्रिया है परन्तु उसको साधना बड़ा ही कठिन है |जिस दिन व्यक्ति विचारों की दुनियां से निकलकर निर्विचार की स्थिति प्राप्त कर लेगा उसी दिन वह इस जीवन में ही मुक्त हो जायेगा,पुनर्जन्म का तो प्रश्न ही नहीं है |
क्रमश:
              || हरिः शरणम् ||    

Wednesday, November 6, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१३

क्रमश:१३
                 सनातन धर्म-शास्त्र  गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
                                 इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः |
                                 मनसस्तु  परा  बुद्धिर्यो  बुद्धेः  परतस्तु सः ||गीता ३/४२||
                  अर्थात्,इन्द्रियों को स्थूल शरीर से श्रेष्ठ,बलवान और सूक्ष्म कहते हैं;इन इन्द्रियों से पर यानि श्रेष्ठ   और सूक्ष्म मन है,मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी पर या श्रेष्ठ और सूक्ष्म है वह आत्मा है |
               आइये अब इसी गीत्ता में कही गयी बात की तुलना करे आधुनिक विज्ञानं के कहने से-
                   शरीर(Physical body) से पर यानि सूक्ष्म और श्रेष्ठ इन्द्रियां (Sense organs)है,इन्द्रियों से सूक्ष्म व श्रेष्ठ इन्द्रियों का नियंत्रणकर्ता(Pitutary gland) है,इन्द्रियों के नियंत्रणकर्ता से सूक्ष्म Limbic system of brain(मन) है और Limbic system (मन) से सूक्ष्म Neocortex (बुद्धि) है |और Neocortex (बुद्धि) का नियंत्रणकर्ता उसकी विद्युत-चुम्बकीय उर्जा(Electro magnetic energy) है |
                     विज्ञानं इस उर्जा को अभी तक कोई शब्द नहीं दे पाया है |जबकि हजारों वर्ष पहले गीता में इस उर्जा को आत्मा का नाम दे दिया गया था |विज्ञानं अभी भी यह समझा नहीं पाया है कि मृत्यु होने पर यह उर्जा कहाँ चली जाती है ? और जन्म के समय यही उर्जा सक्रिय कैसे होती है ?
                     गीता और विज्ञानं द्वारा कही गयी बातों की तुलना के बाद स्पष्ट हो चूका है कि दोनों में मात्र शब्दों का ही अंतर है,प्रक्रिया में नहीं |जब दीर्घ कालीन स्मृतियाँ (L.T.M.)Cerebrum में एकत्रित हो जाती है ,तब धीरे धीरे व्यक्ति के संस्कार बन जाती है |ये संस्कार व्यक्ति का स्वाभाव बनाते है |उसी स्वभाव के अनुरूप व्यक्ति का आचरण होता है और उसी उनुरूप उसके कर्म |जब व्यक्ति के मन कोई इच्छा उत्पन्न होती है तो वह उन्हें पूरी करने के लिए कर्म करता  है |जब कर्म करते रहने के बाद भी उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वे इच्छाएं दीर्घ कालीन स्मृति (L.T.M.)के रूप में Cerebrum में संचित(Collect) होती है |मृत्यु के समय ये अधूरी कामनाएं और किये गए कर्मCerebrum के Neocortex से चुम्बकीय तरंगों(Magnetic waves) के रूप मेंHippocampus द्वारा पुनः सक्रिय (Retrieve)की जाती है |सक्रिय होकर ये तरंगों के रूप में ही Hypothalamus को स्थान्तरित की जाती है ,यहाँ से यह तरंगे चित्त के रूप में आत्मा (Soul) के साथ शरीर छोड़ देती हैं | मृत्यु होने के अतिरिक्त सामान्य दशा में उपरोक्त कामनाएं चुम्बकीय तरंगों(Magnetic waves) के स्थान पर विद्युत तरंगों(Electric waves) के रूप में सक्रिय होती है और Hypothalamus  द्वारा चित्त के रूप में आत्मा के साथ भेजने के स्थान पर शरीर के अन्य हिस्सों को प्रेषित(Transfer) की जाती है जिससे कार्य(Act) सम्पादित किया जा सके |शरीर की मृत्यु हो जाने के बाद आत्मा शून्य(Space) में इन चुम्बकीय तरंगों (चित्त) का आकलन(Analysis) कर अधूरी इच्छाओं को पूरी करने हेतु और किये गए कर्मों के फल प्रदान करने के लिए नए शरीर की तलाश कर इस चुम्बकीय उर्जा(Magnetic Energy) को नए शरीर में अपने साथ प्रवेश कराती है |इस क्रिया को पूर्ण होने में कुछ क्षणों से लेकर कई वर्षों तक का समय लग सकता है |यह तो पुनर्जन्म की वैज्ञानिक प्रक्रिया हुई |
                                     पुनर्जन्म से मुक्ति अर्थात् मोक्ष के लिए इन्हीं कामनाओं पर नियंत्रण रखना आवश्यक होगा |कामनाएं मन में पैदा होती है और मन को नियंत्रण में रखना आसान नहीं है|मुक्ति तभी संभव है जब कामनाएं पैदा ही न हो | कामनाएं कभी भी और किसी की भी कभी समाप्त नहीं हो पाती है क्योंकि जब एक कामना पूरी होती है तभी या तो वही कामना पुनः पैदा हो जाती है या फिर और अधिक की कामना पैदा हो जाती है |सनातन शास्त्रों में इसे" आत्मा का इन्द्रियों के विषयों का संग" करना कहते हैं|यही संग उसे नए शरीर में जाने को बाध्य करता है |
क्रमश:
               || हरिः शरणम् ||

Tuesday, November 5, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१२

क्रमश:१२
                      मस्तिष्क में कई न्यूरोंस(Neurons) होते हैं ,उसी प्रकार Nerves में भी Synapses होते हैं |जैसा  कि आप जानते ही है कि ये दो प्रकार के होते है-विद्युतीय(Electrical) और रासायनिक(Chemical) |किसी भी संवेदी संकेतों(Sensory signals) को ये Synapses विद्युत और रासायनिक संकेतों(Electro chemical signals) के माध्यम से स्थानांतरित (Transfer)करते हुए Hypothalamus और Hippocampus तक पहुंचाते हैं |यहाँ Hippocampus को बार बार मिलते इन संकेतों से एक स्मृति (Memory)बनती जाती है |जो प्रारंभ में लघु स्मृति (Short term memory)के रूप में अंकित होती जाती है |उदाहरणार्थ आप एक स्थान पर अपनी गाड़ी पार्क करते हैं ,यह संकेत आपके मस्तिष्क में स्थित Hippocampus को Synapses ,Neurons  और Nerves के माध्यम से मिल जाती है |यहाँ यह लघु स्मृति(S.T.M.) के रूप में अंकित हो जाती है |जब आप कार्य निबटा कर वापिस लौटते हैं तो तत्काल यह Hippocampus आपकी स्मृति (Memory)को सक्रिय(Active) कर देता है जिससे आप स्वतः ही उस दिशा की ओर चल देते हैं जिधर आपने गाड़ी पार्क की थी|यह लघु स्मृति(S.T.M.) हुई|अगर अगली बार जब आप उसी स्थान पर कई वर्षों बाद जायेंगे तो आप यह विस्मृत कर चुके होंगे कि पूर्व में जब आप यहाँ आये थे तब गाड़ी कहाँ पार्क की थी?
                     परन्तु अगर आपकी गाड़ी वहाँ से पहली बार में ही चुरा ली जाती है तो प्रत्येक दिन आपको वह स्थान याद आता रहेगा जहाँ आपने गाड़ी पार्क की थी | Hippocampus को जब यही सूचना(Information) Neurons के माध्यम से बार बार मिलती है,तो यही लघु काल स्मृति(S.T.M.),दीर्घ काल स्मृति(Long term memory)  में परिवर्तित हो जाती है |अब Hippocampus इस स्मृति को ज्यादा समय तक अपने पास नहीं रखेगा और इस दीर्घ काल स्मृति(L.T.M.) को Neocortex में स्थानांतरित कर संचित (Store)कर देगा |लंबे समय बाद आप गाड़ी चोरी की घटना को लगभग भूल जायेंगे |अचानक एक दिन जब आपको पुनः उसी जगह गाड़ी लेकर जाने का विचार भी करेंगे तो तत्काल आपकी यह दीर्घ कालीन स्मृति(L.T.M.) पुनः सक्रिय(Reactive) हो जायेगी|यह कार्य आपके मस्तिष्क(Brain) में स्थित इसी Hippocampus के कारण होता है |इस बार अगर आप उस स्थान पर जाते भी हैं तो गाड़ी उस स्थान पर भूल कर भी खड़ी नहीं करेंगे जहाँ से पूर्व में चोरी हुई थी|अगर उस स्थान पर खड़ी भी कर दी तो आप उस तरफ अपनी नज़र जरुर रखेंगे,जिससे उस घटना को दुबारा(Repeat) न होने दे|
                             यह सब संवेदी सुचनाये (Sensory information)मस्तिष्क(Brain) के Hippocampus में जाती है |इन संवेदी सूचनाओं की प्रतिक्रिया(Counter action) में कार्यिक सूचनाएं(Motor information) संकेतों (Signals)के रूप में Neocortex से चलकर Hypothalamus में आते है |Hypothalamus इनका आकलन (Analysis)कर संकेतों(Signals) को सम्बंधित अंगों(Related organs) तक Neurons, Nerves और Synapses के माध्यम से लक्ष्य (Target)तक पहुंचाता हैं और उसी अनुसार(Accordingly) कार्य सम्पादित(Completion of act) होता हैं |जब कार्य Hypothalamus के अनुसार पूर्ण नहीं (Incomplete)हो पाता है तो ये कार्मिक संकेत(Motor signals) बार बार सम्बंधित कार्य को पूर्ण करने हेतु भेजे जाते हैं |ये सब संकेत Hippocampus में पहले तो लघु कालिक स्मृति(S.T.M.) के रूप में अंकित होते हैं|पुनरावृति (Repetition)के कारण कर्म करने हेतु भेजे गए संकेत दीर्घ कालिक स्मृति(L.T.M.) में परिवर्तित होकर Neocortex को स्थानांतरित(Transfer) कर दिए जाते हैं |Neocortex में यह स्मृति सुरक्षित(Store) रहती है और आवश्यकता पड़ने पर Hippocampus इसको पुनः सक्रिय कर देता है |
                   इसको एक उदहारण से स्पष्ट करते हैं|अगर किसी व्यक्ति को यह विचार आता है की सौ मीटर की दौड में उसको रिकॉर्ड(Record in 100 meter race) तोडना है |तो वह इसके लिए लगातार कर्म (Act)करता रहता है |बार बार कर्म करते रहने से उसके यह कार्यिक संकेत (Motor signals)Hippocampus में पहले लघु कालिक स्मृति(S.T.M.) और फिर दीर्घ कालिक स्मृति (L.T.M.)के रूप में परिवर्तित(Change) होकर Neocortex में स्थानांतरित(Transfer) हो जाते हैं |यह स्मृति तब तक वहाँ रहती है जब तक कि वह व्यक्ति अपने मिशन में सफल नहीं हो जाता |अगर वह व्यक्ति अपने जीवन में सफल नहीं हो पाता तो इस स्मृति के संकेत मृत्यु के समय आत्मा के साथ अगली यात्रा पर निकल जाते हैं और नए शरीर प्राप्त करने का आधार बनते हैं |
क्रमश:
                         || हरिः शरणम् ||

Saturday, November 2, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-११

क्रमश:११
                      स्मृतियों और कर्मों के अंकन(Recording of memories and acts) को मस्तिष्क कैसे क्रियान्वित करता है,उसका आधारभूत ज्ञान(Basic knowledge) हम प्राप्त कर चुके है |इस वैज्ञानिक ज्ञान(Scientific knowledge) के आधार पर पुनर्जन्म और उससे मुक्ति को समझना आसान होगा |जितनी भी स्मृतियाँ है जब वे दीर्घ कालीन स्मृतियों में बदल जाती है तब वे व्यक्ति के संस्कार बन जाती है |ये संस्कार व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करते है |उन्ही के आधार पर पुरुष के गुण निर्धारित होते हैं-यथा,सद् गुण,रज गुण तथा तम गुण| व्यक्ति के कर्म और व्यवहार इन्ही गुणों के अनुसार होते हैं| इनको परिवर्तित करना एकदम आसान नहीं होता है |इसके लिए अत्यधिक परिश्रम की आवश्यकता होती है|यह परिवर्तन तभी आ सकता है जब सम्बंधित व्यक्ति को मानव जीवन के उद्देश्य का स्पष्ट ज्ञान हो|अन्यथा सारा परिश्रम एक झटके के साथ व्यर्थ हो सकता है|  इसको स्पष्ट करने के लिए  एक कहानी याद आती है |
                       एक राजा के दरबार में एक विदूषक(Foreigner) आया |उसने आते ही राजा का अभिवादन(Respect,salute) किया |राजा ने उससे पूछा कि आप किस स्थान से पधारें है ?विदूषक ने स्पष्ट कोई उत्तर नहीं दिया |बल्कि राजा के अन्य प्रश्नों का भी जवाब हर बार अलग अलग भाषा(Languages) में देता रहा |साथ ही कहता रहा कि आपके दरबार में इतने ज्ञानवान (Intelligent)और सुशिक्षित(Well educated) महानुभाव (Personalities)बैठे हैं,आप पहचानिये (Identify)कि मैं किस क्षेत्र(Region) से आया हूँ |राजा ने अपने दरबारियों की तरफ उत्तर जानने हेतु दृष्टि डाली|सभी ने न जानने के कारण अपना अपना सिर नीचे कर लिए |राजा समझ गया |उसने कुछ समय के लिए उसे शाही मेहमान(Guest of the state) बनने का निमंत्रण(Invitation) दिया |उसने सहर्ष स्वीकार(Happily accepted) कर लिया |
                      अब प्रत्येक दिन राजा के दरबार में वह उपस्थित रहता और बार बार अपनी भाषा बदलकर बात करता रहता|राजा की परेशानी बढती जा रही थी |उसने अपने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि जो भी इस विदूषक का मूल निवास स्थान बता देगा उसे शाही दरबार में उचित स्थान प्रदान किया जायेगा| एक युवक एक दिन राजा के पास पहुंचा और उनसे प्रार्थना की कि उसे विदूषक के साथ रहने कि अनुमति प्रदान करे|तभी वह उसके मूल निवास का पता कर सकेगा |राजा ने सहर्ष इसकी अनुमति दे दी |
                     अब वह युवक और विदूषक दोनों साथ साथ रहने लगे|कुछ ही दिनों में  उनकी साथ साथ रहने की यात्रा ,प्रगाढ़ मित्रता(Friendship) में बदल गयी|परन्तु विदूषक इतना होशियार था कि युवक को ऐसा कोई भी संकेत नहीं दिया जिससे वह उसके मूल राज्य का पता कर सके |थक-हार कर अंतिम उपाय जानने के लिए युवक अपने गुरु के पास गया |गुरु ने उसे कुछ समझाया|युवक के चहरे पर अब निराशा के स्थान पर मुस्कान थी |वह राज भवन लौटा |रातभर विदूषक के साथ रहा |सुबह शाही दरबार शुरू हुआ,लेकिन युवक किसी न किसी बहाने से विदूषक को वहाँ जाने से रोकता रहा |आखिर दोनों ने देरी से दरबार में प्रवेश किया|प्रवेश करते ही युवक ने विदूषक को पीछे से जोरदार धक्का दिया |धक्के के कारण विदूषक दरबार के मध्य में औंधे मुंह गिरा |गुस्से में उठकर वह युवक को असभ्य शब्द कहने लगा |युवक तुरंत ही राजा की ओर देख कर बोला-"क्षमा कीजिये महाराज,मैंने आपके अतिथि का अपमान किया है |परन्तु इस विदूषक के मूल निवास स्थान को जानने के लिए यह आवश्यक था|मेरे गुरु ने मुझे कहा था कि व्यक्ति कितना ही चालबाज़ हो,अपने संस्कारों से कभी भी मुक्त नहीं हो सकता |ज्यों ही मैंने इनको जमीन पर गिराया ,इन्हे क्रोध आ गया|क्रोध में इन्होने अपनी मूल भाषा में मुझे असभ्य शब्द कहे |इसी आधार पर मैंने इनके मूल निवास का पता कर लिया|" इतना कहकर युवक ने राजा को उस विदूषक के मूल राज्य का नाम बता दिया |जिसे विदूषक ने भी स्वीकार किया |
             इस कहानी के बताने का उद्देश्य यह है कि दीर्घ कालीन स्मृति(Long term memory) को चाहे कितना ही विस्मृत करने का प्रयास करें उसके नष्ट होने की सम्भावना(Possibility) नगण्य(Negligible) होती है |केवल मात्र तात्विक ज्ञान ही आपकी इस स्मृति को धीरे-धीरे क्षीण कर सकता है|अन्यथा यही स्मृतियाँ आपको पुनर्जन्म के लिए नए शरीर में ले जाएँगी|
क्रमश:
                 || हरिः शरणम् ||
                      

Friday, November 1, 2013

मुक्ति का वैज्ञानिक आधार |-१०

क्रमश:१०
            इतनी सारी कवायद के बाद समझ में आ रहा है की मन एक बहुत ही जटिल सिस्टम है|इसको आसानी से समझने के लिए हमें मस्तिष्क के लिम्बिक सिस्टम(Limbic system) को समझना होगा |यह लिम्बिक सिस्टम ही वास्तव में अपना मन है |इसको समझ लेने पर ही हम जान पाएंगे कि मानव शरीर मन पर कितना निर्भर है |बिना मन के मानव जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है |इसके अध्ययन से यह भी जाना जा सकेगा कि मन में स्मृतियां कैसे संचित(Collection of memories in the Mind) होकर आत्मा(Soul) को पुनर्जन्म के लिए बाध्य(Forced to reincarnate) करती है?

LIMBIC SYSTEM-

     1.Amygdala-यह एक बादाम की आकृति लिए हुए होता है|इसका सम्बन्ध व्यक्ति की भावनाओं को प्रदर्शित करना,स्मृति बनाये रखना और कुछ हार्मोन्स का स्राव(Secretion of hormones) करना होता है |
     2. Cingulate Gyrus-यह मस्तिष्क का भाग तह किया हुआ (Folded)होता है |यह भाग भावुकता (Emotions)और आक्रामकता(Aggression) के प्रवाह के लिए उत्तरदायी होता है |
     3.Fornix-यह एक धनुष की आकृति(Arch shaped) लिए हुए तंतुओं(Fibers) का बना होता है जो Hippocampusको Hypothalamus से जोड़ता है |
     4.Hippocampus-यह मस्तिष्क का बहुत ही छोटा सा भाग है जो स्मृति सूचिका(Memory indexer) का कार्य करता है |यह दीर्घ अवधि की स्मृति(Long term memory) को Cerebral hemisphere में संचित(For long term storage) करने के लिए भेजता है और आवश्यकता पड़ने पर उस स्मृति को पुनः जागृत (Retrieve)करता है |
     5.Hypothalamus-यह मस्तिष्क का महत्त्वपूर्ण भाग है|इसमे कई केन्द्रक (Nuclei)होते हैं जो शरीर द्वारा किये जाने वाले विभिन्न कार्यों(Various acts) के लिए उत्तरदायी (Responsible)होते है |मानव मन के निर्माण में इस भाग की ही सबसे बड़ी हिस्सेदारी होती है|एक प्रकार से इसी भाग को मन कहा जा सकता है |
     6.Olfactory cortex-यह सभी गंधों को पहचानने की क्षमता रखता है |Capacity to identify different types of smells.
     7.Thalamus-यह भाग संवेदी संकेतों(Sensory signals) को रिले (Relay)करने का कार्य करता है जो उसे सुषुम्ना नाडी(Spinal cord) या Cerebral cortex से प्राप्त होते हैं|यह एक से प्राप्त संकेतों को दूसरे तक और दूसरे से प्राप्त संकेतों को पहले तक पहुँचाने का कार्य करता है अर्थात इसकी भूमिका एक प्रसारण केन्द्र(Relay center) की होती है|
          इस प्रकार हम समझ सकते है की लिम्बिक सिस्टम(Limbic system) का कार्य भावनाओं (Emotions)और आक्रामकता(Aggression) के प्रवाह (Flow)को नियत्रण करना तथा गंध को पहचानना होता है | इसके साथ साथ वह स्मृति का संचय(Storage of memory) और हार्मोन्स (Hormones)के भी प्रवाह पर नियंत्रण रखता है| यह लिम्बिक सिस्टम संवेदना(Sensory) यानि ज्ञानेन्द्रियों के कार्य और कर्मिकता(Motor) यानि कर्मेन्द्रियों के कार्य अर्थात् कर्म के लिए भी उत्तरदायी(Responsible) होता है |एक प्रकार से कहा जा सकता है कि यह सिस्टम (Limbic system)शरीर के लगभग सभी कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है |
क्रमश:
                || हरिः शरणम् ||