मौन -17
स्वामीजी ने मौन को परमात्मा तक पहुंचने का साधन बताया है । वे कहते हैं कि प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी देर चुप होकर बैठने का अभ्यास करें । चाहे कुछ समय के लिए ही सही पर दिन में तीन चार बार बैठेंगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ता जाएगा । चुप होकर बैठने का अर्थ है कि कुछ भी चिन्तन न करें, न तो परमात्मा का और न ही संसार का । कितना ही चिन्तन न करने का आग्रह रखें, चिंतन तो फिर भी होगा । ऐसे चिंतन से तटस्थ बने रहना है, न तो उसके साथ होना है और न ही उसके होने का विरोध करना है । अपनी ओर से चिंतन के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध न बनाएं; न तो अच्छा और न ही बुरा ।
साधक को अपनी बुद्धि में यह पक्का निश्चय कर लेना चाहिए कि संपूर्ण संसार, समय, क्रिया, वस्तु, व्यक्ति आदि में एक परमात्म-तत्व ही सत्तारूप से परिपूर्ण है । जब भी चुप होकर बैठें, संसार का चिंतन छोड़ परमात्मा का ऐसे चिंतन करें कि एक परमात्मा के सिवाय दूसरा कुछ भी नहीं है । अन्ततः इस चिंतन को भी छोड़ देना है । इस प्रकार आप बाहर के साथ-साथ भीतर से भी चुप/मौन हो जाएंगे । चिंतन छूट जाने से अक्रियता का अनुभव होगा, जोकि परमात्म-तत्व की विशेषता है । अक्रियता से ही सक्रियता जन्म लेती है । समस्त शक्तियां अक्रियता की उपज है । स्वामीजी कहते हैं कि इस प्रकार व्यक्ति को चुप रहने से जो शक्ति प्राप्त होती है, उससे वह संसार से ऊंचा उठ सकता है ।
सोते समय जब कुछ भी चिंतन नहीं होता तो अच्छी नीन्द आती है और थके-मांदे व्यक्ति में नई ऊर्जा का संचार होता है । इसी प्रकार चुप होने से साधक को नई ऊर्जा मिलती है, जिससे वह परमात्मा के अधिक निकट होता जाता है । वास्तव में देखा जाए तो बाहर-भीतर से चुप हो जाना ही सहजावस्था है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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