आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -25
अपने परिवार अथवा पुत्र में आसक्ति रखना कोई बड़ी बात नहीं है । आज के युग में जब से हम छोटे परिवार को अधिक महत्त्व देने लगे हैं तब से अपने पुत्र और परिवार के प्रति आसक्ति का स्तर बढ़ने लगा है । इसका अर्थ यह नहीं है कि अधिक पुत्र होने से आसक्ति कम हो जाती है । आसक्ति चाहे कम हो अथवा अधिक, इसका प्रभाव हमारे जीवन पर पड़ना अवश्यम्भावी है । राजा दशरथ के चार पुत्र थे । वह जानते थे कि राम साक्षात् ब्रह्म का अवतार है फिर भी वे उन्हें अपना सांसारिक पुत्र मानते हुए उनमें आसक्त हो गए थे ।
एक सांसारिक मनुष्य राम के प्रति उनकी आसक्ति के स्थान पर अगर ब्रह्म के अवतार राम के प्रति उनका प्रेम होता, अनुरक्ति होती तो वे कभी के जीवन मुक्त हो गए होते । राम के प्रति उनकी आसक्ति जग जाहिर थी, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे राम के स्थान पर भरत को वन में भेजने के लिए सहमत हो जाते । वे भरत को भी वनवास नहीं दे सकते थे । अपने बड़े पुत्र राम के प्रति इसी आसक्त-भाव ने उनको मृत्यु के द्वार तक भी पहुंचा दिया । इसलिए सदैव याद रखें कि किसी भी वस्तु, जन, धन, कर्म व भोग आदि में आसक्ति ही दुःख का कारण बनती है । किसी के प्रति अधिक आसक्ति होना ही दुःख को घना और लम्बा कर देती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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