Wednesday, June 17, 2026

आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -24

 आसक्ति से अनुरक्ति की ओर -24

          ‘मैं और मेरा’ का जन्म तभी होता है, जब हमारे मन में स्वयं और अपने परिवार के प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है । हम सभी जीवन में बार-बार कहते रहते हैं कि अपना, अपना होता है और पराया, पराया । जबकि वास्तविकता यह है कि इस संसार में कोई भी न तो कभी अपना हुआ है और न ही कभी पराया । हम सभी एक अनवरत चल रही यात्रा पर हैं और संयोगवश कभी-कभी किसी एक जीवन में आकर एक स्थान पर मिल जाते हैं । हम सब एक दूसरे से कुछ प्राप्त करने अथवा किसी को कुछ प्रदान करने के लिए पत्नी/पति, पुत्र, बंधु, मित्र अथवा आत्मीय-जन बनकर एक स्थान पर इस जन्म में मिले हैं । हम सब एक दूसरे का हिसाब-किताब चूकता कर अगले जन्म में पुनः एक दूसरे से दूर हो जायेंगे । इस बात को आत्मसात कर लेने से हमारा किसी भी व्यक्ति में आसक्ति भाव पैदा हो ही नहीं सकता । कबीर इस बात को अपने ही अंदाज में कहते हैं -

पत्ता टूटा डारि से ले गयी पवन उड़ाय ।

अबके बिछुड़े कब मिलें, दूर पड़ेंगे जाय ।।

      इसका भावार्थ यही है कि किसी संयोग से हमारा इस जीवन में साथ बना है, जो एक दिन इस शरीर की समाप्ति के साथ ही अस्थाई अथवा स्थाई रूप से समाप्त हो जाना है । सदैव के लिए साथ न तो किसी को मिला है और न ही भविष्य में कभी मिलने वाला है । इसलिए किसको तो आप अपना मान सकते हैं और किस को पराया ? सब कुछ मन का खेल है, जिसके कारण हम भीतर ही भीतर ‘अपने-पराये’ की आसक्ति को पाल बैठे हैं ।

क्रमशः

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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