मुक्ति अथवा भक्ति -7
जिस प्रकार योगवासिष्ठ के उत्पत्ति-प्रकरण में अज्ञान की सात भूमिकाएं बताई गई है उसी प्रकार निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) में ज्ञान की भी सात भूमिकाएं बतलाई गई हैं । ये सात भूमिकाएं है - शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा । इनमें पहले की तीन भूमिकाएँ (शुभेच्छा, विचारणा और तनुमानसा) ज्ञान प्राप्ति से पहले की है जबकि अगली चार (सत्वापत्ति, असंसक्ति, पदार्थाभावना और तुर्यगा) जीवन्मुक्ति की अवस्थाएं हैं ।
योगवासिष्ठ में वसिष्ठ मुनि भगवान श्रीराम को उपदेश देते हुए कह रहे हैं -
शास्त्रसज्जनसम्पर्कै: प्रज्ञामादौ विवर्धयेत् ।
प्रथमा भूमिकैषोक्ता योगस्यैव च योगिन: ।।
विचारणाद्वितीया स्यातृतीयाऽसंगभावना ।
विलापनी चतुर्थी स्याद्वासनाविलयात्मिका ।।
शुद्धसंविन्मयानन्दरूपा भवति पञ्चमी ।
अर्धसुप्तप्रबुद्धाभो जीवनमुक्तोऽत्र तिष्ठति ।।
स्वसंवेदनरूपा च षष्ठी भवति भूमिका ।
आनन्दैकघनाकारा सुषुप्तसदृशस्थिति: ।।
तूर्यावस्थोपशान्ताथ मुक्तिरेवेह केवलम् ।
समता स्वच्छता सौम्या सप्तमी भूमिका भवेत् ।।
(योगवासिष्ठ - निर्वाण प्रकरण पूर्वार्ध - सर्ग 120/1-5 )
ज्ञान की ये सात भूमिकाएं (अवस्थाएं) आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग हैं, जो शुभेच्छा से प्रारंभ होकर तुर्यगा अर्थात् परम आनन्द की स्थिति तक जाती है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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