Thursday, April 2, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -2

 मुक्ति अथवा भक्ति -2

           विवेचन से स्पष्ट है कि ज्ञान का जब प्रेम में जाकर समापन होता है तभी व्यक्ति भावपूर्ण अवस्था को प्राप्त होता है । संसार में अनेकों जीव है, सभी सांसारिक पदार्थों की आसक्ति में आकण्ठ डूबे हुए है । अन्य जीवों की बात को तो छोड़ दें, मनुष्य जैसा विवेकवान जीव भी इन आसक्तियों से कहां मुक्त हो पाया है ? पदार्थों की आसक्तियों में डूबा मनुष्य बंधा हुआ है, संसार के साथ । इन सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए उसे अपने ज्ञान को सतह पर लाना होगा जो अभी अज्ञान की असंख्य पर्तों के नीचे दबा पड़ा है । जीवन में ज्ञान कैसे उतरेगा, जानने के लिए हमें एक दृष्टि अपने अज्ञान पर डालनी होगी । 

         अज्ञान से ज्ञान प्राप्ति की यात्रा में आगे बढ़ने से पहले हमें अज्ञान को जानना चाहिए । अज्ञान का अर्थ ज्ञान की अनुपस्थिति मात्र नहीं है बल्कि जन्म-जन्मांतरों से चली आ रही मूढ़ता ही इस अज्ञान का कारण है । अज्ञान की दृढ़ता हो जाने से ज्ञान उसके नीचे दब जाता है । इसका कारण है- ‘देही को विस्मृत कर देह को ही सब कुछ समझ लेना ।’ यह जड़ देह एक पदार्थ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । वास्तव में देह की सत्ता है ही नहीं । देह तो जड़ है, इसे सुख-दुःख का अनुभव नहीं होता, परन्तु साथ ही यह भी सत्य है कि सुख -दुःख का अनुभव तो फिर होता है । प्रश्न है कि सुख-दुःख का अनुभव शरीर नहीं करता तो फिर कौन करता है ? देहाभिमानी जीवात्मा ही अविवेक के कारण सुखी-दुःखी होता है । 

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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