Saturday, April 18, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -18-समापन कड़ी

 मुक्ति अथवा भक्ति -18

सार-संक्षेप 

        गीता को मुख्य रूप से कर्म-योग का ग्रन्थ कहा गया है क्योंकि इसमें ज्ञान एक गृहस्थ (अर्जुन) को दिया गया है । गृहस्थ जीवन में अपना कर्तव्य निभाने और जीविकोपार्जन के लिए कर्म करने आवश्यक हैं । इन कर्मों को करते हुए भी परमात्मा से योग को उपलब्ध हुआ जा सकता है । कर्मों को करने में जब तक राग रहेगा तब तक योग की ओर जाना संभव नहीं है । वैराग्य ज्ञान से पैदा होता है । ज्ञानपूर्वक कर्म ही रागरहित हो सकते हैं, बिना ज्ञान के तो फलासक्ति सकाम कर्मों की ओर ही ले जाएगी ।

        मनुष्य बिना किसी बन्धन के स्वतंत्र ही पैदा होता है परन्तु विभिन्न भोगों की आसक्तियों में फँसकर संसार के साथ बंध जाता है । कर्म और ज्ञान की रागरहित राह हमें इस संसार से मुक्त करती है । इसलिए कर्म और ज्ञान, दोनों ही रास्तों को लौकिक कहा गया है । लौकिक मार्गों में पराश्रय और परिश्रम की आवश्यकता रहती है । इन दोनों से भी मुक्त होना आवश्यक है । इसके लिए भक्ति की राह सर्वोत्तम है । भक्ति में केवल एक भगवान का ही आश्रय है और साथ ही विश्राम भी ।

           सीधे परमात्मा की शरण ले लेना आज के युग में लगभग असंभव सा है क्योंकि मनुष्य परिश्रम करते हुए कर्म और ज्ञान के स्तर पर जाकर ही सब कुछ पाना चाहता है । वह परमात्मा के प्रति समर्पण को भी एक क्रिया मानने लगा है । परमात्मा की शरण में जाने को एक क्रिया मान लेने से कभी भी शरणागत नहीं हुआ जा सकता । अतः इस युग में ज्ञान और कर्म के माध्यम से वैराग्य को उपलब्ध हो भक्ति की राह पकड़ शरणागत हो जाना ही सर्वोत्तम मार्ग है । 

         ज्ञान मुक्ति तो प्रदान करता है परन्तु परमात्मा से/के प्रेम के लिये भक्ति आवश्यक है । इसलिए साधना में लगे मनुष्य के लिए आवश्यक है कि गुरु के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करते हुए भक्ति की राह पर चले । गीता में भगवान ने भी कहा है - ‘ज्ञानी-भक्त मुझे अत्यन्त प्रिय है । वह तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप है ।’ इस विवेचन का सार है कि यदि मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा का प्रेम भी चाहिए तो ज्ञानी-भक्त होने का प्रयास कीजिए अन्यथा ज्ञान से मुक्ति तो स्वतः सिद्ध है ।

          इसी के साथ ‘मुक्ति अथवा भक्ति’ लेख के समापन की आज्ञा चाहूँगा । अन्त तक साथ बने रहने के लिए आपका आभार ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

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