Friday, April 17, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -17

 मुक्ति अथवा भक्ति -17 

          ज्ञान और भक्ति की इस चर्चा में कर्म विषय पर बात नहीं की जाए तो अपूर्णता रहेगी । गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म-मार्ग में कुछ भी अंतर नहीं माना है । दोनों को ही लौकिक बताया है, जबकि भक्ति को अलौकिक । कर्म में ज्ञान और ज्ञान में कर्म, दोनों एक दूसरे के सहयोगी है और दोनों ही परमात्मा की ओर ले जाने वाले हैं । 

            कर्म-योग में सेवा के लिए कर्म करते हुए राग अर्थात् आसक्ति को समाप्त करना होता है । ज्ञान में प्रकृति से सम्बन्ध विच्छेद करते हुए वैराग्य को उपलब्ध होना है । राग अर्थात् संसार और उसके पदार्थों से आसक्ति समाप्त होना ही वैराग्य है जिससे मनुष्य संसार से मुक्त हो जाता है । जब तक जीव को ज्ञान नहीं होता तब तक कर्म-रहस्य को वह समझ नहीं पाएगा । एक बार कर्मों का स्वरूप समझ में आ गया तो कर्म-योग के माध्यम से संसार की सेवा होगी और ज्ञान-योग से वैराग्य का जन्म होगा । ज्ञान से कर्म कैसे प्रभावित होते हैं, इसको स्पष्ट करने के लिए आगामी लेख में विवेचना करेंगे ।

          मुख्य बात जो इस लेख में हुई विवेचना से निकल कर सामने आई है, वह यह है कि ज्ञान श्रेष्ठ है परन्तु यदि ज्ञान से भक्ति को उपलब्ध हो जाएं तो वह मार्ग सर्वश्रेष्ठ है । मुक्ति और भक्ति, दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो मैं भक्ति को चुनूँगा परन्तु ज्ञान के रास्ते से होकर, जिससे मुक्ति के साथ-साथ परमात्मा से प्रेम भी हो जाए और साथ ही उनके प्रेम का कृपापात्र भी बन सकूं ।

कल सार-संक्षेप 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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