Wednesday, March 25, 2026

ज्ञान -18

 ज्ञान -18

        सन्त ने प्रथम आदेश दिया - ‘राजगुरु को राजसिंहासन के बायीं और स्थित खम्भे से बांध दिया जाय ।’ सेवक ने तत्काल ही आज्ञा का पालन किया और राजगुरु को खंभे से बांध दिया । राजगुरु ऐसे आदेश से हतप्रभ रह गये परन्तु विवश थे, क्या करते, बंध गए । संत का दूसरा आदेश - ‘राजा को राजसिंहासन के दाईं ओर स्थित खंभे से बांध दें ।’ सेवक तनिक सकुचाए परंतु राजा ने आदेश पालन करने का संकेत किया । राजा को भी दूसरे खंभे से बांध दिया गया ।

          संत ने राजगुरु को कहा कि आप अब राजा को खोल दीजिए । राजगुरु ने कहा कि मैं स्वयं बंधा हूँ, किसी दूसरे को कैसे खोल सकता हूँ ? संत राजा की और उन्मुख हुए और बोले - ‘राजन् ! यही आपके प्रश्न का उत्तर है । एक बंधा हुआ व्यक्ति किसी दूसरे बंधे हुए को कभी भी मुक्त नहीं कर सकता ।’ राजगुरु प्रतिदिन राजा को ज्ञान देता था परंतु उसके स्वयं का जीवन उस ज्ञान के अनुसार नहीं था । ज्ञान का प्रवचन देने से महत्वपूर्ण है ज्ञान के अनुसार आचरण । 

         संत ने तत्काल ही बंधे हुए दोनों को खोलने का आदेश दिया और राजा को सिंहासन सौंप दिया । राजा के और साथ ही राजगुरु के, दोनों के ही संत की बात समझ में आ गई । बस, हमें भी जीवन में संत की इसी बात को समझना है । मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि सब कुछ जानते हुए भी वह जानबूझकर उलझा हुआ है । जाने हुए को जीवन में लागू करना है, उपयोग में लाना है, फिर जितना भी (कम या अधिक) जाना हुआ है, मुक्ति का साधन बन जाएगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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