Wednesday, February 4, 2026

नाभावो विद्यते सत: -3

 नाभावो विद्यते सतः -3

     माया का सबसे बड़ा अस्त्र यह ‘काम’ ही है, जिसके कारण मनुष्य कंचन और कामिनी के आकर्षण से कभी मुक्त नहीं हो पाता । यह आकर्षण जीव के भीतर पल रहे ‘काम’ के कारण है । स्मरण रहे - माया में केवल आकर्षण है, वह किसी ओर आकर्षित नहीं होती; आकर्षित तो जीव ही होता है । माया के प्रति आकर्षित होकर जीव माया (काम) से मिलने वाले शारीरिक सुख का भोग करने लगता है । वास्तव में यह सुख प्रकृति के गुणों की क्रियाओं का परिणाम होता है ।

            प्रकृति में हो रही क्रियाएँ मनुष्य को इंद्रियों के माध्यम से सुख-दुःख प्रदान करती है । यथार्थ में इस संसार में सुख-दुःख जैसी चीज कहीं है ही नहीं । प्रकृति में हो रही क्रियाएँ जीव के समक्ष केवल परिस्थितियों का निर्माण करती है, जैसे वातावरण में तापक्रम का बढ़ना अथवा कम होना । स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से व्यक्ति को वातावरण में हो रहे परिवर्तन से गर्मी अथवा शीत का अनुभव होता है । हम इस परिस्थिति को सहन करने की क्षमता पैदा कर लेते है तो फिर हम वातावरण में हो रहे परिवर्तन से सुखी-दुःखी नहीं होंगे । इसका अर्थ है कि सुख-दुःख का अनुभव करना हमारी मानसिक दशा पर निर्भर है अर्थात् यथार्थ में सुख-दुःख कहीं नहीं है बल्कि प्रकृति में होने वाली क्रियाओं से केवल परिस्थितियाँ परिवर्तित होती हैं ।

          कहने का अर्थ है कि मन के कारण ही जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है । सुखी दुःखी होने का कारण हमारा मन है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, February 3, 2026

नाभावो विद्यते सत: -2

 नाभावो विद्यते सतः - 2

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुण से हुई है ।

         काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ।

         महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ।। गीता - 3/37।।

अर्थात् रजोगुण से उत्पन्न यह ‘काम’ अर्थात् कामना ही पाप का कारण है । यह ‘काम’ ही क्रोध में परिणत होता है । यह बहुत अधिक खाने वाला और महापापी है । इस विषय में तू इसको ही वैरी जान ।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘काम’ की उत्पत्ति माया (प्रकृति) के ही एक गुण, रजोगुण से हुई है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य माया से मुक्त होकर परमात्म-अवस्था को प्राप्त होना है । माया से मुक्त होने के लिए ‘काम’ पर नियंत्रण कर उसको जीतना आवश्यक है । यह ‘काम’ इतना प्रभावशाली है कि कोई भी व्यक्ति जीते-जी नहीं कह सकता कि उसने ‘काम’ को जीत लिया है । काम को जीतने का अर्थ है, जीवन में काम से निष्प्रभावी बने रहना ।

      रजोगुण से उत्पन्न ‘काम’ आपको संसार के साथ बाँधता है । इसी बंधन के कारण जीव संसार के आवागमन में पड़ा रहता है और मुक्त नहीं हो पाता । इसीलिए ‘काम’ को माया का अस्त्र कहा गया है, जिसका उपयोग करते हुए माया सृष्टि-चक्र को रूकने नहीं देती ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Monday, February 2, 2026

नाभावो विद्यते सत: -1

 नाभावो विद्यते सतः -1

ऋग्वेद (10.129.1) — नासदीय सूक्त में कहा गया है -

“नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम् नासीद्रजो नो व्योमा परो यत् ।

किमावरीव: कुह कस्य शर्मन्नम्भ: किमासीद् गहनं गभीरम् ।।” 

अर्थात् प्रलय की दशा में न असत् था और न सत् ही था । उस समय न लोक थे और न अंतरिक्ष था, न कोई आवरण था और न ढकने योग्य कोई पदार्थ था । कहीं भी न कोई प्राणी था और न कोई सुख पहुंचाने वाला भोग ही था । उस समय गहन गंभीर जल भी नहीं था । 

         सृष्टि के अभ्युदय और प्राणियों की रचना के साथ ही सत् और असत् का भेद स्पष्ट होने लगा । संसार और शरीर असत् के अन्तर्गत हैं क्योंकि उनमें स्थायित्व नहीं है जबकि सत् अपरिवर्तनशील है । संसार के भोग पदार्थ प्राणी के जीवन को सुगमता पूर्वक संचालित करने के लिए आवश्यक हैं । उन पदार्थों के उपयोग से जो शारीरिक सुख जीव को मिला उसमें वह आसक्त होने लगा । उन पदार्थों, वस्तुओं आदि पर अपना अधिकार समझने लगा और उनका संग्रह करने लगा । इस प्रकार शारीरिक सुख की इच्छा पैदा होने से जीव संसार के साथ बंधता गया । शरीर के सुख को प्राप्त करने की की इच्छा ही ‘काम’ कहलाती है ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Sunday, February 1, 2026

काम का त्याग

 काम का त्याग 

         विगत लेख पर एक सुधि पाठक का प्रश्न आया है कि काम (सुख प्राप्त करने की इच्छा) क्यों पैदा होता है और इसका त्याग कैसे हो सकता है ?

       ‘काम’ शब्द की व्याख्या करना बड़ा ही कठिन है क्योंकि इसके विविध रूप है । पाठक के प्रश्न तक सीमित रहते हुए इसे सरल भाषा में समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।

       जो प्रश्न आया है, वह ‘काम’ के उस रूप से संबंधित है जो हमें संसार में उलझा रहा है । उस ‘काम’ से मुक्त होने के लिए मनुष्य को सांसारिक पदार्थों को पाने की इच्छा का त्याग करना आवश्यक है । पिछले लेख “त्याग से शान्ति” में इसी बात को स्पष्ट किया गया था । 

         एक सिक्के की तरह ‘काम’ के भी दो पहलू हैं । ‘काम’ संसार से सुख मिलने की सम्भावना तलाशता है, जिसके कारण मनुष्य ममता और आसक्ति के जाल में उलझकर संसार के बियाबान में ताउम्र भटकता रहता है, फिर भी उसे सुख नहीं मिलता । यही ‘काम’ अगर प्रेम और आनंद की दिशा पकड़ लेता है तो मनुष्य को परमात्मा तक ले जा सकता है । यह निर्णय तो स्वयं मनुष्य को ही करना है कि वह संसार से सुख चाहता है अथवा परमात्मा का प्रेम । फिर ‘काम’ स्वतः ही अपनी दिशा उसी प्रकार निर्धारित कर लेगा । ‘काम’ वर्जनीय नहीं है, मनुष्य की मानसिकता ही उसे विकृत बना देती है । अतः ‘काम’ को राम की दिशा में लगा देना ही उचित है ।

             जीवन में किसी शारीरिक सुख के लिए अनुभव किए जाने वाले ‘अभाव’ की पूर्ति के लिए जिस काम की उत्पत्ति होती है, हमें उसी काम का त्याग करना है । चलिए ! काम के जनक उसी ‘अभाव’ को समझने का प्रयास करते हैं, ’नाभावो विद्यते सतः’ लेख के माध्यम से ।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल