Monday, December 8, 2014

कर्म और कर्मयोग ।

                 गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म करते रहने की सलाह दी।यह ज्ञान "कर्मयोग" नाम से जाना जाता है।गीता के इसी "कर्मयोग" को ही सबसे ज्यादा पसंद करते हैं परंतु वास्तव में इसे बहुत कम लोगों ने समझा है।गीता के इसी कर्मयोग को बहुत से दार्शनिक और ज्ञानी महापुरुषों ने अपनी समझ के अनुसार इसकी व्याख्या की है।उनकी व्याख्या को मैंने भी पढा है और पूरी तरह किसी से भी संतुष्ट नहीं हूँ।उन सभी व्याख्याओं को पढने और गीता के अध्ययन के बाद "कर्मयोग" के बारे  में जो मेरी समझ में आया है वह पूर्व में की गई व्याख्याओं से कुछ भिन्न अवश्य है परंतु आलोच्य बिल्कुल भी नहीं है।आलोच्य कोई भी व्याख्या हो ही नहीं सकती है क्योंकि वे सब संबधित व्यक्तियों द्वारा अपनी अपनी सोच और समझ से की गई है।जैसा भी व्यक्ति समझता है, वह वैसा ही व्यक्त करता है और अपनी सोच और समझ के अनुसार सभी का अपना एक सत्य होता है।अतः उसकी इस सत्यता पर अंकुश लगाने का अर्थ है, परमात्मा की सत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगाना। मेरी तरह ही सभी को यह स्वतंत्रता है कि वह अपने विचार रखे।अतः कर्मयोग की कोई भी व्याख्या कभी भी आलोच्य नहीं है। इसी भावना के साथ मैं भी" कर्मयोग "पर अपने विचार रखने का प्रयास कर रहा हूं।
              कर्म को जैसा गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है, वह हमने उसके ठीक विपरीत उसे समझा है। गीता का ज्ञान हम सहस्राब्दियो से पढते और सुनते आ रहे हैं, फिर भी हम इस छोटे से शब्द" कर्म " को सही तरीके से समझ नहीं पाए हैं ।प्रायः हम प्रत्येक प्रकार के होते हुए कर्म को ही कर्मयोग तथा कर्ता को कर्मयोगी घोषित कर देते हैं जो कि पूरी तरह से असत्य है।ऐसे में यह जानने की जरूरत है कि आखिर कर्म की सत्यता क्या है? जिस दिन आप कर्म के बारे में पूर्ण रूप से जान और समझ लेंगे,  आप भी कर्मयोग के मार्ग पर चलकर कर्मयोगी बन सकते हैं।
                कर्मयोग आम व्यक्ति को समझ में आ जाए, उसी भाषा और अंदाज में अपने विचार व्यक्त करने का प्रयास कर रहा हूं। कितना सफल हो पाउँगा , ऐसा किसी भी प्रकार का विचार मेरे मन में कहीं भी नहीं है । इस तरह का कोई भी विचार का न होना ही कर्मयोग का एकमात्र और महत्वपूर्ण सिध्दांत है।इस दौरान अगर कोई भी प्रश्न, कर्म, कर्मयोग अथवा कर्मयोगी के सम्बन्ध में तो उनका स्वागत है। मेरे से जहां तक संभव होगा आपकी शंकाओं के समाधान का प्रयास करूंगा।
             पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य और सामाजिक प्रतिबद्धताओं के कारण नियमित रूप से लेखन कार्य नहीं कर पा रहा हूँ। भविष्य में इसे नियमित करने का प्रयास करूंगा। आशा है आप सभी से सहयोग मिलेगा।सप्ताह में कम से कम दो बार का क्रम तो बना रहेगा, ऐसी आशा है।
                      ।। हरि : शरणम्।। 

Friday, December 5, 2014

सुख-सुविधा |

                  समाज में सभी सुखी रहना चाहते हैं, लेकिन यह हो कैसे? इसका एक सूत्र है-प्रेम। वस्तुत: प्रेम वह तत्व है जो प्रेम करने वाले को सुखी तो बनाता ही है, जिससे प्रेम किया जाता है वह भी सुखी होता है।
                 याद रखें, सुख और सुविधा दो भिन्न चीजें हैं। जो शरीर को आराम पहुंचाता है वह सुख नहीं, सुविधा है, लेकिन सुख का संबंध आत्मा से होता है। आप अच्छे घर में रहते हैं, अच्छी कार में बैठते हैं, एयरकंडीशन ऑफिस में काम करते हैं उससे आपके शरीर को सुविधा प्राप्त होती है, परंतु आप सत्य बोलते हैं, सबको प्रेम करते हैं, ईमानदारी और नैतिकता का व्यवहार अपनाते हैं, सच्चाई और संवेदना दर्शाते हैं, अहिंसा के मार्ग पर चलते हैं तो उससे आपको जो सुख मिलता है वह आत्मिक सुख कहलाता है। यही सुख व्यक्ति और समाज को सुखी बनाता है। जिंदगी के सफर में नैतिक व मानवीय उद्देश्यों के प्रति मन में अटूट विश्वास होना जरूरी है। कहा जाता है आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास सभी गुणों को एक जगह बांध देता है यानी विश्वास की रोशनी में मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व और आदर्श उजागर होता है। दुनिया में कोई भी व्यक्ति महंगे वस्त्र, आलीशान मकान, विदेशी कार, धन-वैभव के आधार पर बड़ा या छोटा नहीं होता। उसकी महानता उसके चरित्र से बंधी है और चरित्र उसी का होता है जिसका खुद पर विश्वास है।
              मनुष्य के भीतर देवत्व है, तो पशुत्व भी है। 'सर्वे भवंतु सुखिन:' का पुरातन भारतीय मंत्र संभवत: दानवों को नहीं सुहाया और उन्होंने अपने दानवत्व को दिखाया। पूर्वजों के लगाए पेड़ आंगन में सुखद छांव और फल-फूल दे रहे थे, लेकिन जब शैतान जागा और दानवता हावी हुई तो भाई-भाई के बीच दीवार खड़ी हो गई। बड़े भाई के घर में वृक्ष रह गए और छोटे भाई के घर में छांव पडऩे लगी। अधिकारों में छिपा वैमनस्य जागा और बड़े भाई ने सभी वृक्षों को कटवा डाला। पड़ोसियों ने देखा तो दुख भी हुआ। उन्होंने पूछा इतने छांवदार और फलवान वृक्ष को आखिर कटवा क्यों दिया? उसने उत्तर दिया, क्या करूं पेड़ों की छाया का लाभ दूसरों को मिल रहा था और जमीन मेरी रुकी हुई थी। वर्तमान में हमने जितना पाया है, उससे कहीं अधिक खोया है। भौतिक मूल्य इंसान की सुविधा के लिए हैं, इंसान उनके लिए नहीं है।
                                      || हरिः शरणम् || 

Tuesday, December 2, 2014

गीता-जयंती|

                                 आज मोक्षदा एकादशी है । आज ही के दिन कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में महाभारत युद्ध से पूर्व भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म-योग का ज्ञान दिया था। यह ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता में संकलित है । यह ज्ञान द्वापरयुग के अंत में और कलियुग के प्रारम्भ से कुछ समय पूर्व ही दिया गया था । आज  हम कलियुग में जी रहे हैं । आज के इस युग में हमारे में बहुतायत अर्जुन जैसे लोगों की है,जो किंकर्तव्यविमूढ़ है । क्या किया जाये और क्या न किया जाये,उनके सामने स्पष्ट नहीं है । ऐसे में यह गीता नामक शास्त्र ,हम सबका एक अच्छा मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है । बस, आवश्यकता है कि हम इस शास्त्र के महत्व को समझे और इसको आत्मसात करें । इस ग्रन्थ को  पढ़ने के उपरांत ही अनुभव होता है कि कितनी गहनता है इसमें ?
                                      इसके अध्ययन के प्रारम्भिक दौर में हो सकता है कि विषय कुछ नीरस सा महसूस हो,परन्तु इसका सतत अध्ययन करने से पता चलेगा कि कितना सरल है इसका अध्ययन ? हाँ,यह अवश्य है कि जब तक हमारे सामने अर्जुन जैसी परिस्थितियां पैदा नहीं होगी,तब तक हमारा गीता के प्रति आकर्षण बनना कठिन है । एक बार गीता के ज्ञान सागर में उतरें,आप इसके अन्दर डूबते चले जायेंगे । यही इस ग्रन्थ की विशेषता है ।
                          हम ऋणी हैं अर्जुन के ,जिसके कारण हमें इतना पवित्र ज्ञान प्राप्त हो सका । इस पावन दिवस पर आप सभी को गीता-जयंती की  शुभकामनायें ।
                                       ॥ हरिः शरणम् ॥     

Sunday, November 30, 2014

समझ |

मैने बहुत से इन्सान देखे हैं,
जिनके बदन पर लिबास नहीं होता।
और बहुत से लिबास देखे हैं,
जिनके अंदर इन्सान नहीं होता ।
कोई हालात नहीं समझता,
कोई जज़्बात नहीं समझता,
ये तो बस अपनी अपनी समझ है,
कोई कोरा कागज़ भी पढ़ लेता है,
तो कोई पूरी किताब नहीं समझता...!!!
                         ||हरिः शरणम् ||

Thursday, November 27, 2014

What is love?

What is love?
Love is when my mom kisses me and says mera bachha lakhon me ek hai...
Love is when you come back from work and dad says 'arey beta! aaj bahut der ho gai
Love is when ur bhabhi says ' hey hero ladki dekhi hai tere liye, koi aur pasand ho tou bata dena'
Love is when ur brother says ' bhai tu tension na le, main hu na tere saath
Love is when you are Mood less and your sister says ' chal bhai kahi ghoom kay aatein hai
Love is when ur best friend hugs you and says' abe tere bagair mazaa nahi aata yar....
These all are best moments of love.....don't miss them in life.
Love is not only having a bf or gf.
Love you all who have been a special part of my life...........
Its love,
when a little girl puts her energy to give dad a head massage.
Its love,
when a wife makes tea for husband and take a sip before him.
Its love,
when a mother gives her son the best piece of cake.
Its love,
when your friend holds your hand tightly on a slippery
road.
Its love,
when your brother messages you and asks did you reach home on time..
Love is not just a guy holding a girl and going around the city.
Love when you send a small message to your friends to make them smile
Love is actually a name of "care".. !!!!..
Love is the name of God....
Love every one  and live with God.
                         || HARI SHARNAM ||

Wednesday, November 26, 2014

प्रदर्शन |

                                अभी दो दिन पूर्व मैं उदयपुर था-राजस्थान के  शिशु रोग विशेषज्ञों के सम्मलेन में भाग लेने के लिए । किसी भी आयोजन से पूर्व सदैव ही उस आयोजन के उद्घाटन की एक रस्म निभाई जाती है । इस आयोजन में भी ऐसा ही कुछ किया गया । मंचस्थ सभी व्यक्ति अपने प्राकृतिक व्यवहार से विपरीत व्यवहार करते महसूस हो रहे थे । जो व्यक्ति सदैव जिस रूप में हमें नज़र आते हैं,यदि किसी एक दिन वे ऊसके विपरीत नज़र आये तो स्वाभाविक है कि उस तरफ आपका ध्यान अवश्य ही जायेगा । मंच पर आयोजक और मुख्य अतिथि उपस्थित थे और वे सभी उस दिन ऐसा व्यवहार कर रहे थे ,जैसा कि वे आम दिनों में नहीं करते हैं ।
                                स्वर्गाश्रम,ऋषिकेश में एक संस्था है -वानप्रस्थ-आश्रम । वहां कई स्थानों पर सुविचार लिखे हुए है । एक सुविचार है-"व्यक्ति जो कुछ भी है उसको छुपाने में अपनी आधी ऊर्जा व्यय कर देता है और शेष बची ऊर्जा जो नहीं है,उसे दिखाने में ।"इस  प्रकार हम देखते हैं की इस छुपाने और दिखने में ही वह अपने जीवन की सारी ऊर्जा खपा डालता है । ऐसे में उसके पास अपने जीवन में कुछ नया करने के लिए ऊर्जा बचती ही नहीं है । यही बात ध्यान देने योग्य है ।
                              हमें अपने जीवन में सदैव ही अपने स्वभाव के अनुरूप ही व्यवहार करते रहना चाहिए,जिससे ऊर्जा का अनावश्यक क्षरण न हो । ऐसे में हमारे पास ऊर्जा का अतुल भंडार होगा जिससे हम अपने इस छोटे से जीवनकाल में कई सृजनात्मक कार्य  कर सकते हैं । जीवन में अगर किसी लक्ष्य को प्राप्त करना है तो सदैव ही अपने प्राकृतिक स्वभाव में ही जीयें । याद रखें,शेर की खाल ओढ़ लेने मात्र से ही कोई भेड़िया कभी भी शेर बन कर शिकार नहीं कर सकता । भेड़िया तभी शिकार कर सकता है जब वह भेड़िये के स्वभावानुसार ही शिकार करे । आप जो  कुछ भी हैं ,उस परमात्मा ने आपके स्वभावानुसार ही आपको वैसा बनाया है । उसमे कुछ भी परिवर्तन करने का प्रयास न करें । फिर देखें,आप कैसे अपनी इस  उर्जा से नई उपलब्धियां हासिल करते हैं । दिखावा आपको बड़ा होने का भ्रम ही पैदा कर सकता है,बड़ा बनाता नहीं है और न ही बड़ा बनने देता है ।
                             ॥ हरिः शरणम् ॥ 

Saturday, November 22, 2014

जीवन - मृत्यु ।

                                          आज सुबह सुबह ही एक मित्र का फोन आया ।एक लम्बा अंतराल हो गया था उससे बात हुए ।मेरे हैलो कहते ही वह बिना किसी औपचारिकता पूरी किए मुझ पर बरस पङा ।वह बोला-"पंडित, जिन्दा है कि मर गया? "मुझे मेरे सभी मित्र मेडिकल कॉलेज में इसी नाम से सम्बोधित करते थे ।खैर , उस मित्र को अपने पुत्र की शादी का निमंत्रण देना था, जो उसने दे दिया ।परंतु उसने मुझे कुछ और ही दिशा मे सोचने को विवश कर दिया ।आज जीवन के उतरार्ध में ऐसा सोचना कितना कष्ट प्रद होता है, ऐसा अनुभव  मुझे आज जाकर  हुआ ।
                                         इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ पाना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल है कि आज मैं जिन्दा हूँ कि मर गया हूँ? जिन्दा अपने आप को इस तरह नहीं कह सकता हूँ क्योंकि मेरी विवशताओं ने मुझसे मेरे शरीर से जीवित होने के सभी लक्षण छीन लिए हैं और मरा हुआ इसलिये नहीं कह सकता हूँ क्योंकि इस शरीर में दिल अभी भी धङक रहा है तथा सासें भी चल रही है।जीवन में इसी तरह समय बंद मुट्ठी से बालू रेत की तरह फिसल जाता है ।अंत में जब मुठ्ठी खोलने पर रिक्तता नजर आती है तो फिर निराश और निरूत्तर होना ही पङता है।
                                     जिन्दगी में भौतिकता का संग्रह कोई उपलब्धि नहीं है, जिसे हम अपनी उपलब्धि बताते हुए उस पर गर्व कर सके। आज इस संसार मे यही तो हो रहा है।यहां हर कोई भौतिक सुख की कामना करते हुए भौतिकता के पीछे दौड रहा है जिसे वह अपनी उपलब्धि बताते हुए गर्व महसूस करता है।परंतु जीवन के संध्या काल में जाकर उसे अहसास होगा कि वह कितना गलत था।जीवन का उतरार्ध वह अवस्था है कि जब व्यक्ति के पास कुछ करने के लिए न तो समय ही रहता है और न ही शारीरिक उर्जा।
इसका क्या समाधान हो सकता है?
                                                       ।।हरि: शरणम् ।।