Tuesday, February 17, 2026

नाभावो विद्यते सत: -16

 नाभावो विद्यते सत: -16

      स्वामीजी कहते हैं - “उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओं की इच्छा को ही ‘काम‘ कहते हैं । कामना अभाव में पैदा होती है । अभाव सदैव असत् में रहता है, सत् में अभाव है ही नहीं । परंतु जब सत् असत् के साथ गठजोड़ कर लेता है, तब असत् में उपस्थित अभाव को वह अपने में मान लेता है ।”

       जीवन में अभाव का कब अनुभव होता है ? जब आपको लगता है—“मेरे पास जो है, वह पर्याप्त नहीं है।” यह भावना किसी चीज़ के अधूरे होने से आती है । जो अधूरा है, वही असत् है । जो चीज़ बदलती रहती है, टिकती नहीं है, आज है, कल नहीं रहेगी, वही असत् है। असत् कभी पूरा नहीं लगता, इसलिए उसी में अभाव पैदा होता है।

         जो पूरा है, वही सत् है । जो हमेशा है, बदलता नहीं, अपने आप में पर्याप्त है, वही सत् है । जो पहले से पूरा है, उसे किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हो सकती ।

         इसलिए स्पष्ट है कि अभाव अधूरेपन (असत्) की अनुभूति है, जबकि पूर्णता सत् की । पूर्णता में अभाव असंभव है । अन्त में कहा जा सकता है कि जिसे कुछ चाहिए, वह असत् में स्थित है । जिसे कुछ नहीं चाहिए, वह सत् में स्थित है । सत् में स्थित होने के लिए सत् - असत् के तादात्म्य को तोड़ना होगा । फिर असत् के अभाव का अनुभव नहीं होगा ।

कल सार-संक्षेप 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

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