नाभावो विद्यते सतः -15
स्वामीजी के सामने प्रश्न आया कि आत्मा तो चेतन है, फिर यह शरीर में क्यों फँसता है ? उनका उत्तर था - “सुख के लिए फँसता है ।” सुख की इच्छा ही काम है । प्रश्न उठता है कि काम से मुक्त होने के लिए क्या करना चाहिए ? काम की उत्पत्ति जहां से प्रारंभ होती है, उसी स्थान पर ध्यान केंद्रित करें तो काम को स्वयं पर प्रभावी होने देने से बचा जा सकता है ।
परमात्मा अकेले थे, ‘एकाकी न रमते’ । अचानक उनमें आनन्द को अनुभव करने की इच्छा पैदा हुई । ऐसी इच्छा को स्फुरणा कहा जाता है । स्फुरणा वह विचार है, जो अचानक भीतर बिजली की तरह कौंधता है । स्फुरणा केवल चेतन में ही होती है । भगवान इसी स्फुरणा के कारण एक से दो हुए । एक से दो होकर परमात्मा स्वयं तो उस दूसरे में लिप्त नहीं हुए परंतु हम दूसरे में लिप्त हो गए । इस प्रकार स्फुरणा हमारे लिए ‘काम’ बन गई और हम संसार में उलझ गए । स्फुरणा निरन्तर रहने वाली चेतना है, जबकि काम इस स्फुरण से उत्पन्न सापेक्ष क्रिया है । जब स्फुरण अहंकार (अहम् वृत्ति) से जा जुड़ता है तो वह भीतर स्वयं के ‘कर्ता’ होने का भाव पैदा करता है । यहीं से काम, कर्म और भोग पैदा होते हैं ।
अभाव का अनुभव ‘पर’ में ही होता है, ‘स्व’ में नहीं । यदि मन इस स्फुरण के स्रोत अर्थात् ‘स्व’ पर स्थिर हो जाए, तो आत्म-साक्षात्कार हो जाता है अर्थात् अभाव का अभाव हो जाता है । फिर स्फुरणा ही मुक्ति का मार्ग बन जाती है । स्फुरण वह प्रकाश है, जो परमात्मा के अनुभव को सम्भव बनाता है जबकि काम उस प्रकाश से प्रेरित होकर किया जाने वाला कार्य है ।
क्रमशः
प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल
।। हरिः शरणम् ।।
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