Friday, April 1, 2022

करिष्ये वचनं तव 1से30

 करिष्ये वचनं तव 

         परमात्मा की लीला देखिए!मनुष्य को बनाया, जीवन में आनंद लेने के लिए। आनंद की अनुभूति के लिए इंद्रियां बनाई,शरीर की परिधि पर और स्वयं जाकर बैठ गया शरीर के केंद्र पर।विषयों को रखा इस शरीर के बाहर।वह भी इसलिए कि मनुष्य के शरीर की परिधि पर स्थित इंद्रियां बाहर घूम रहे विषयों का आनन्द तो ले परंतु दृष्टि सदैव केंद्र पर रखे।मानव शरीर से आनंद प्राप्त करने का एक मात्र यही उपयोग होना चाहिए।

     मानव देह पाकर परमात्मा की इच्छा का सम्मान नहीं हुआ।इंद्रियां केंद्र से बंधी रहने के स्थान पर विषयों से जाकर बंध गई। यहीं से मनुष्य के जीवन में पतन प्रारम्भ होता है। इंद्रियां केंद्र की ओर उन्मुख रहे,इसके लिए दीर्घ काल तक और सतत संत समागम तथा शास्त्र अध्ययन आवश्यक है। संत तो मिले अथवा न मिले शास्त्र तो सदा से ही उपलब्ध है । शास्त्रों में भी श्रीमद्भगवद्गीता सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें गुरु भी है और ज्ञान भी है।"कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुं" यूँही नहीं कहा गया है।

      गुरु और गीता का ज्ञान तभी उपयोगी है,जब उसे आचरण में लाया जाए। हम कह तो देते हैं कि संतों और शास्त्रों के बतलाये मार्ग पर चलेंगे परंतु कब हमारी इंद्रियां केंद्र से विमुख होकर संसार के विषयों में फंसकर उलझ जाती है, पता ही नहीं चलता। गुरु और गीता हमारी बाह्य दृष्टि (विषयासक्ति) को दिव्य दृष्टि में परिवर्तित कर पुनः केंद्र (परमात्मा) की ओर उन्मुख कर देती है। इसलिए आवश्यक है कि हम सतत सत्संग और स्वाध्याय करते रहें जिससे "सावधानी हटी,दुर्घटना घटी" हमारे साथ चरितार्थ न हो । गुरु और गीता के आकर्षण से हम भी अर्जुन की तरह कह सकेंगे -"करिष्ये वचनं तव"। साथ ही ध्यान रखें कि हमें गीता में कहे गए गुरु-वचनों का सदैव पालन करना है, पुनः संसार जाल में नहीं उलझना है।  

       श्रीमद्भगवद्गीता हमारा महत्वपूर्ण शास्त्र है | इसे गीतोपनिषद भी कहा गया है क्योंकि इसमें शिष्य ने गुरु के सामने बैठकर श्रद्धापूर्वक अपनी शंकाओं का समाधान किया है | उपनिषद् तीन शब्दों से मिलकर बना है- ‘उप’ अर्थात समीप, ‘निः’ अर्थात श्रद्धा और ‘सद्’ अर्थात बैठना | इस प्रकार उपनिषद् का अर्थ हुआ, शिष्य का गुरु के समीप श्रद्धापूर्वक बैठना जिससे शिष्य की अविद्या का नाश हो और उसे ब्रह्म की प्राप्ति हो | गुरु शिष्य का एकांत में बैठकर वार्तालाप करना ही उपनिषद् है | गीता में अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद है, इसलिए इसे उपनिषद की श्रेणी में रखा जाता है |

           अभी कुरुक्षेत्र की भूमि पर महाभारत का युद्ध प्रारम्भ ही नहीं हुआ था कि अपने पक्ष और  विपक्ष में खड़े मरने मारने को उतारू अपने ही सगे सम्बन्धियों को देखकर अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे | आज जीवन में पहली बार उसने युद्ध के परिणाम के बारे में सोचा था | यह बात नहीं है कि महाभारत के युद्ध से पहले अर्जुन ने कोई युद्ध नहीं लड़ा था | इससे पूर्व भी उसने कई युद्ध लड़े थे परन्तु आज महाभारत प्रारम्भ होने से पूर्व वह अपने रचे संसार के मोह जाल में पड़ कर कर्तव्यच्युत होने जा रहा है क्योंकि वह जानता है कि इस युद्ध में क्षति केवल उसी के परिवार को होनी है | ऐसा होने पर उसका युद्ध करना अर्थहीन हो जाएगा| इस प्रकार की सोच रखना कि संभावित क्षति का कारण मैं ही बनूँगा, ही व्यक्ति को कर्तव्य मार्ग से डिगा देती है |

          हमारे और अर्जुन के जीवन में जरा भी भिन्नता नहीं है | हमारी स्वार्थपूर्ण आसक्तियां हमें कुछ व्यक्तियों के साथ बांधकर एक संसार का निर्माण कर देती है | स्वनिर्मित इस संसार को जब किसी प्रकार की तनिक सी भी क्षति पहुँचने की सम्भावना बनती है, तब हम भी अर्जुन की तरह विचलित हो जाते हैं | उस समय हमें भी किसी श्रीकृष्ण के रूप में योग्य गुरु की आवश्यकता पड़ती है, जिससे हम मोहजाल से मुक्ति पा सके और ज्ञान पाकर अर्जुन की तरह अपने गुरु को कह सकें –

  नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |

  स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||गीता-18/73||

      गीताज्ञान प्राप्त कर अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से कहा था-“हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

            ज्ञान व्यक्ति के मोह को नष्ट करता है और उसे सभी प्रकार के द्वंद्वों से मुक्त करता है | इसलिए जीवन में ज्ञान का पदार्पण होना आवश्यक है | ज्ञान क्या है ? ज्ञान है, स्वयं को पहिचानना, स्वयं के स्वरुप को जानना | स्वरुप तक पहुँच जाना ही स्मृति को प्राप्त कर लेना है | जब हमें अपने वास्तविक स्वरुप की स्मृति हो जाती है, तब जीवन में संशय का कोई स्थान ही नहीं रहता अर्थात सभी संशय मिट जाते है | संशयरहित होने से ही गुरु की आज्ञा का पालन हो सकता है अन्यथा नहीं |

           इस भौतिक संसार में न तो गुरुओं की कमी है और न ही शिष्यों की | दूरदर्शन को खोलते ही दसों गुरु ज्ञान बांटते दिखलाई पड़ जाते हैं और हजारों शिष्य उन गुरुओं को सुनते हुए | फिर भी क्या कारण है कि संसार से विसंगतियां समाप्त होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है | किसमें कमी है,गुरु में है अथवा शिष्य में है ? ज्ञान बाँटना जितना सरल है, उतना ही मुश्किल है उसको जीवन में उतारना | जब तक गुरु ज्ञान के अनुसार जीवन नहीं जियेगा तब तक शिष्य के भीतर गुरु के प्रति श्रद्धाभाव उत्पन्न नहीं हो सकता | जब तक गुरु के प्रति श्रद्धा भाव नहीं होगा तब तक जीवन में उनके द्वारा प्रदत्त ज्ञान शून्य प्रगतिकारक ही सिद्ध होगा |

          श्रद्धा और विश्वास, ये दो शब्द आध्यात्मिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | श्रद्धा का अर्थ है, किसी के प्रति सम्मान और समर्पण का भाव | विश्वास का अर्थ है, जिसमें श्रद्धा है उनके कथन पर विश्वास करना | केवल उनके कथन पर ही विश्वास नहीं रखना है बल्कि इस बात का भी विश्वास होना चाहिए कि इनके वचनों से ही मेरा कल्याण होगा | विश्वास में तर्क-वितर्क का कोई स्थान नहीं होता | जहाँ तर्क-वितर्क होता है वहां विश्वास को ठेस पहुँचती है | इस प्रकार श्रद्धा और विश्वास दोनों एक दूसरे के पूरक हुए | जिसमें श्रद्धा भाव रखेंगे उसके प्रति हमारे भीतर विश्वास भी होगा और जिसमें विश्वास है उसके प्रति श्रद्धा भाव भी होगा |

                    हमारी आध्यात्मिक यात्रा में किसी प्रकार की प्रगति क्यों नहीं हो रही है ? यह प्रश्न जब ब्रह्मलीन स्वामी श्री राम सुख दासजी महाराज से पूछा जाता तो वे एक दोहा सुनाया करते थे-

कुछ श्रद्धा कुछ दुष्टता, कुछ संशय कुछ ज्ञान |

घर का रहा न घाट का ज्यों धोबी का श्वान ||

      यह दोहा स्पष्ट करता है कि गुरु के प्रति श्रद्धा और विश्वास पूर्णरूपेण होना चाहिए अन्यथा व्यक्ति जीवन में न तो इधर (संसार) का रहेगा और न ही उधर (परमात्मा की ओर) जा पायेगा |

           एकलव्य का अपने गुरु के प्रति पूर्ण रूप से श्रद्धा भाव था और मजबूत विश्वास भी कि उनकी शिक्षा से मैं अवश्य ही धनुर्विद्या में पारंगत हो जाऊंगा | भले ही गुरु द्रोण ने प्रारम्भ में उसे अपना शिष्य स्वीकार नहीं किया परन्तु एकलव्य की उनके प्रति दृढ़ निष्ठा और श्रद्धा ने द्रोणाचार्य की मूर्ति में ही गुरु की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी | श्रद्धा और विश्वास के कारण ही गुरु की मूर्ति के समक्ष अभ्यास करते हुए एकलव्य विश्व का श्रेष्ठ धनुर्धर बन गया | अंततः एक दिन परिस्थिति के वशीभूत होकर द्रोणाचार्य को उसे अपना शिष्य स्वीकार करना पड़ा | गुरु-दक्षिणा में एकलव्य से उन्होंने उसके दायें हाथ का अंगूठा मांग लिया | यह सरासर अन्याय था, एक धनुर्धर के साथ | फिर भी एकलव्य ने अपने साथ होने जा रहे इस अन्याय पर तनिक भी विचार नहीं किया और अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में डाल दिया | एकलव्य का अपने गुरु के प्रति ऐसा श्रद्धा भाव इतिहास के पन्नों में स्वर्णक्षरों से अंकित हो गया |

            गीता में अर्जुन ने कह तो दिया ‘शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ कि मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण लेता हूँ, इसलिए आप मुझे शिक्षा दीजिये | दूसरे अध्याय में कहे गए अपने इन वचनों से क्या अर्जुन ने अपने गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा दिखलाई थी ? अर्जुन के भीतर श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा कब उत्पन्न हुई ? अवश्य ही श्री कृष्ण के प्रति अर्जुन का श्रद्धाभाव था, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता परन्तु इस श्रद्धा के उत्पन्न होने का जो कारण था, वह जानना भी महत्वपूर्ण है | माना कि अर्जुन अपने समय का महान योद्धा था परन्तु वह अपने मोह के कारण भीतर ही भीतर मानसिक रूप से कमजोर हो गया था और युद्ध-भूमि से पलायन करने की सोच रहा था | अपनी इस दुर्बल अवस्था में उसे एक सहारे की आवश्यकता थी | ऐसे समय में व्यक्ति के लिए अपने अभिन्न परम मित्र का ही सहारा लेना उचित होता है और उसने ऐसा किया भी | श्रीकृष्ण उसके परम सखा थे और सखा को ही उसने अपना गुरु माना |

        गुरु मान लेने के उपरांत भी भगवान् श्री कृष्ण के प्रति उसकी श्रद्धा बीच-बीच में डांवाडोल होती रही, तभी तो उसने बहती ज्ञान धारा के मध्य एक-एक कर कई प्रतिप्रश्न कर डाले | प्रतिप्रश्न करना किसी प्रकार अनुचित नहीं है क्योंकि ज्ञान को भीतर तक ले जाने के लिए उनका उठना स्वाभाविक है | प्रतिप्रश्न से ही शिष्य की मुमुक्षा का पता चलता है | परन्तु श्रद्धा और मुमुक्षा में अंतर है | श्रद्धा गुरु के प्रति समर्पण है और मुमुक्षा गुरु के समक्ष ज्ञान के प्रति जिज्ञाषा व्यक्त करना |

         दसवें अध्याय में भगवान् ने अपनी विभूतियों का वर्णन किया और अर्जुन को अंत में कह भी दिया कि और अधिक जानने से तुम्हारा कोई प्रयोजन नहीं होना चाहिए | तुम तो केवल इतना जान लो कि ‘एकांशेन स्थितो जगत्त्’ - मेरे एक अंश में यह संसार व्याप्त है और मैं उसमें स्थित हूँ | तब जाकर अर्जुन के मन में भगवान् के प्रति श्रद्धा दृढ हुई और उसका संशय नष्ट होना प्रारम्भ हुआ | श्रद्धा होते हुए भी उसने भगवान् के वास्तविक स्वरुप को देखना चाहा | जब अर्जुन को भगवान् का विश्वरूप दर्शन हुआ तब जाकर उसके मन में श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति और पूर्ण समर्पण भाव पैदा हुआ |

           हमारा जीवन भी अर्जुन से तनिक भी भिन्न नहीं है | हमारी श्रद्धा भी घडी के पेंडुलम (दोलक) की तरह इधर उधर डोलती रहती है | सुख मिला तब भगवान् को भूल गए और दुःख आया तो “भगवान् तू ही एक सहारा है” कहने लगे परन्तु क्या कभी भगवान् के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हुए हैं ? नहीं हुए और न ही कभी हो सकेंगे क्योंकि संसार का सुख हमें बार बार अपनी ओर आकर्षित करता है और हम भगवान् को भूल जाते हैं | मनुष्य जीवन का उद्देश्य है-आत्मज्ञान को उपलब्ध होना अर्थात परमात्मा को प्राप्त कर लेना | परन्तु हमारा उद्देश्य हमारी कामनाओं के बोझ तले दबकर सिसकियाँ लेने लगता है | कहने का अर्थ है कि हमारी कामनाएं हमें संसार से मुक्त नहीं होने देती |

          जीवन का उद्देश्य है कामनारहित होना, कामनाओं में उलझकर सुखी-दुखी होना नहीं है | कामना किसी की पूरी नहीं हो सकती परन्तु अपने उद्देश्य तक प्रत्येक कोई पहुंच सकता है | कामनाओं में डूबे रहेंगे तो जन्म-जन्मान्तर तक भटकते रहेंगे और उद्देश्य के पीछे लग जायेंगे तो भटकने से मुक्त हो जायेंगे | गीता का ज्ञान मात्र इतना ही है | आवश्यकता है, गीता के ज्ञान को मानकर गुरु के वचनों का पालन करें | भगवान् श्री कृष्ण ने अपने वचनों के माध्यम से अर्जुन को कौन सा ज्ञान दिया था और अर्जुन ने उन वचनों के अनुसार कैसा आचरण किया ? यह जानने के लिए हमें गीता के मर्म को जानना होगा |

         श्रीमद्भगवद्गीता न जाने कितनी बार कही गयी है और सुनी गयी है परन्तु इस गीता-ज्ञान को कहने और सुनने से अधिक महत्वपूर्ण है कि हम यह जानें कि इसको कितने व्यक्तियों ने आत्मसात किया है | गीता-ज्ञान की प्रासंगिकता इसी से सिद्ध होगी, कहने और सुनने मात्र से नहीं | अगर इस ज्ञान को किसी भी व्यक्ति द्वारा आत्मसात नहीं किया जायेगा तो धीरे-धीरे एक दिन यह गीता भी लुप्तप्राय हो जाएगी | गीता चाहे कुछ समय के लिए लुप्तप्राय हो जाये परन्तु इसका अप्रासंगिक होना असंभव है | इसी गीता ज्ञान को पुनर्जीवित करने के लिए फिर एक बार श्री कृष्ण को इस धरा पर अवतार लेना होगा और साथ ही अर्जुन को भी, जो यह ज्ञान सुन सके | 

        गीता में भगवान श्री कृष्ण स्वयं इस ज्ञान के लुप्त होने की बात को स्वीकारते हुए अर्जुन को कह रहे हैं –

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् |

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेSब्रवीत् ||

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः |

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ||गीता-4/1-2||

             श्री कृष्ण कह रहे हैं-हे अर्जुन! मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र इक्ष्वाकु से कहा | इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग इस धरा से लुप्तप्राय हो गया | 

                  चलिए, श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ पन्नों को पलटते हुए आधुनिक युग के साथ इसका सामंजस्य बिठाने का प्रयास करते हैं | भौतिकतावादी युग ने मनुष्य के जीवन को बड़े संकट में डाल रखा है | आधुनिक विज्ञान ने मनुष्य को भौतिक संसाधनों के प्रति आसक्त किया है | विज्ञान का उद्देश्य भले ही प्रकृति के रहस्यों को एक एक कर के खोलना रहा हो परन्तु इन रहस्यों से जरा सा पर्दा उठते ही मनुष्य उन संसाधनों का दास बनता जा रहा है | सुख प्राप्ति के लिए संसाधनों के प्रति उसकी दासता जितनी अधिक बढेगी उतना ही वह परमात्मा से अर्थात स्वयं से दूर होता चला जायेगा | जब मनुष्य एक दिन स्वयं से ही दूर चला जायेगा तो फिर ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ ही क्या ? संसाधनों का उपयोग करना अनुचित नहीं है बल्कि उन संसाधनों का दास बन जाना अनुचित है |

                गीता-ज्ञान बड़ा ही विलक्षण ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए योग्य पात्र का होना आवश्यक है | जब किसी योग्य पात्र का अभाव हो जाता है तभी यह ज्ञान लुप्तप्राय हो सकता है अन्यथा नहीं | यही कारण है कि गीता की अनेकों विद्वानों ने अपने अपने अनुसार व्याख्याएं की है, जिससे इस ज्ञान के प्रति समाज में रुचि बनी रहे और योग्य पात्रों का कभी अभाव न होने पाये | इस लेख में मैं उन महत्वपूर्ण तथ्यों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करने जा रहा हूँ, जिससे हम यह समझ सकें कि कमी गीता-ज्ञान में नहीं है बल्कि हमारे में है, जो इस ज्ञान का समुचित उपयोग नहीं कर पा रहे हैं |  

      श्रीमद्भगवद्गीता की प्रासंगिकता इसके ज्ञान को आत्मसात करने में ही है, केवल पढ़ने, सुनने और व्याख्या करते रहने में नहीं | अगर हम केवल इन तीन कार्यों में ही उलझे रहे तो एक दिन यह ज्ञान भी लुप्तप्राय हो जायेगा |

           इस ज्ञान के लुप्तप्राय हो जाने का अर्थ यह बिलकुल भी नहीं है कि ज्ञान सम्पूर्ण रूप से समाप्त हो गया था, बल्कि इसका अर्थ है कि ज्ञान स्मृति में नहीं रह पाया था | स्मृति के लोप हो जाने का अर्थ ज्ञान का नष्ट हो जाना नहीं है बल्कि उस ज्ञान का स्मृति में न बने रहना है | गीता-ज्ञान शाश्वत ज्ञान है, सनातन ज्ञान है, यह कभी भी नष्ट नहीं हो सकता |

        जब भगवान श्री कृष्ण गीता-ज्ञान का समापन कर चुके होते हैं और अर्जुन से पूछते हैं कि क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया ? तभी अर्जुन कह उठते हैं –

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ||गीता-18/73||

   अर्जुन स्वीकार करते हैं कि हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

              प्रश्न यह उठता है कि क्या भगवान श्री कृष्ण से ज्ञान पाकर सचमुच में अर्जुन का मोह नष्ट हो गया था ? क्या उसने स्मृति प्राप्त कर ली थी ? स्मृति उस ज्ञान की जो उसके जीवन में मोह उत्पन्न हो जाने के कारण विस्मृत कर दिया गया था | क्या वह पूर्णरूप से संशय रहित हो गया था ? हमारा जीवन भी अर्जुन की तरह का ही जीवन है | हमारे में और अर्जुन में तनिक मात्र भी भिन्नता नहीं है | अर्जुन को साक्षात् परमात्मा से ज्ञान प्राप्त हुआ था और हमें वही ज्ञान श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से मिल रहा है और संशय रहित होने के लिए हमें भी श्रीकृष्ण जैसे योग्य गुरु भी उपलब्ध है | फिर क्या कारण है कि हम स्मृति प्राप्त कर लेने के बाद भी बार-बार मोह में पड़ जाते हैं और ज्ञान को विस्मृत कर संशयग्रस्त हो जाते हैं ? यह सब जानने के लिए हमें उस प्रसंग में उतरना होगा जो महाभारत में वर्णित है |

            महाभारत में वर्णित कई प्रसंग अर्जुन से सम्बंधित है जो गीता-ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत उसके जीवन में घटित हुए हैं | हमारे में और अर्जुन में नाम, समय और स्थान आदि का अंतर भले ही हो परन्तु उसकी और हमारी मानसिकता में तनिक भी अंतर नहीं है | इसी से हम समझ सकते हैं कि जो कुछ अर्जुन ने गीता-ज्ञान प्राप्त कर के अपने जीवन में किया वह हम भी कर सकते हैं | अर्जुन ने गीता-ज्ञान का अपने जीवन में किस प्रकार उपयोग (Utilise) किया, जब हम यह समझ लेंगे तभी हम श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महान ग्रन्थ की सार्थकता (Significance) को समझ पाएंगे |

           स्मृति को प्राप्त कर लेने से अर्थ है, आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाना | भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में आत्म-बोध को उपलब्ध होने के तीन मार्ग बतलाये हैं | ये तीन मार्ग हैं-ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग | कर्म, भक्ति और ज्ञान मार्ग एक दूसरे के पूरक मार्ग है | ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदास जी महाराज कहते हैं कि इनमें से प्रत्येक साधन आत्मबोध के लिए अपने आप में स्वतंत्र साधन है।इसका अर्थ यह नहीं है कि एक साधन में रत मनुष्य दूसरे साधन को उपयोग में बिल्कुल नहीं लेता। किसी साधक के लिए एक साधन प्रधान अवश्य होता है फिर भी शेष दोनों साधनों का उपयोग भी उसके द्वारा किया जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी भी मनुष्य में केवल एक ही प्राकृतिक गुण की उपस्थिति नहीं हो सकती | मनुष्य जीवन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सत, रज और तम तीनों प्राकृतिक गुणों की उपस्थिति होनी आवश्यक है | हाँ, यह बात अलग है कि तीनों गुणों में से किसी एक प्राकृतिक गुण की प्रधानता प्रत्येक मनुष्य में होती है | किसी में सत्व गुण की प्रधानता होती है, किसी में रज की और किसी में तमोगुण की | आत्म-बोध के लिए सांसारिक व्यक्ति के लिए कर्म-योग उपयुक्त अवश्य होता है, परन्तु आत्म-बोध के लिए कर्म के साथ-साथ ज्ञान और भक्ति की उपस्थिति भी आवश्यक होती है | केवल एक अकेले कर्म-योग से भी आत्म-ज्ञान होना संभव नहीं हो सकता | उसके साथ ज्ञान और भक्ति का होना भी आवश्यक है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि कर्म योग तभी सिद्ध होता है जब सभी कर्म, ज्ञान और भक्ति के आधार पर किये जायें।

                 कर्म-योग व्यक्ति के कुछ न कुछ करते रहने से सम्बंधित है | हमारे द्वारा किये जाने वाले कर्म हमारा व्यवहार (Conduct) निर्धारित करते है | भक्ति-योग मनुष्य की भावनाओं (Emotions) से सम्बंधित है जबकि ज्ञान-योग मनुष्य के व्यक्तित्व से, स्वयं के अस्तित्ववान (Personal identity) होने से सम्बंधित है | आत्म-बोध को उपलब्ध होना, केवल कुछ करने से, जानने से अथवा भावना व्यक्त करने से, इन तीनों में से किसी अकेले एक से संभव नहीं हो सकता | तीनों का एक साथ उपस्थित होना आवश्यक है, तभी व्यक्ति योगी हो सकता है | हाँ, मनुष्य में उपस्थित प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता होना, इन तीनों में से किसी एक मार्ग अथवा योग के चयन को सुनिश्चित अवश्य ही कर देता है |

          प्रकृति के गुणों में से किसी एक गुण की प्रधानता के अनुरूप ही मनुष्य को इनमें से किसी एक मार्ग पर चलना अधिक सुगम प्रतीत होता है अथवा फिर वह इन तीनों ही मार्गों से विमुख भी बना रह सकता है | सब कुछ प्रकृति के गुणों की उपस्थिति और किसी एक गुण की प्रधानता पर निर्भर करता है | जो व्यक्ति इन तीनों योग में से किसी भी एक योग को मुख्य साधन नहीं बना सके तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कर्म करने से भी विमुख हो जाएगा | कर्म करना अलग बात है और कर्म-योगी होना अलग बात है | अतः व्यक्ति भले ही किसी एक भी योग को आत्मसात न करे परन्तु जीवन में कर्म तो उसको फिर भी करने ही पड़ेंगे |

             कर्म का सम्बन्ध हाथ-पाँव आदि कर्मेन्द्रियों (भौतिक शरीर) से है, ज्ञान का सम्बन्ध मस्तिष्क (बुद्धि) से है, जबकि भावना अर्थात भक्ति का सम्बन्ध हृदय (मन) से है | हमारी समस्त कर्मेन्द्रियाँ सक्रिय रहते हुए व्यवस्थित रूप से तभी कर्म कर सकती है, जब हमारे मस्तिष्क और हृदय के साथ उनका स्वस्थ रूप से तालमेल बना रहे | इनमें से किसी एक में भी आया व्यवधान हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचने से वंचित कर सकता है |

            कर्म-योग का सम्बन्ध हमारे शरीर से है, ज्ञान-योग का सम्बन्ध बुद्धि से है और भक्ति-योग का सम्बन्ध हमारे मन से है | शरीर से ‘करना’ होता है, बुद्धि से ‘जानना’ होता है और मन से ‘मानना’ होता है | अतः शरीर, मन और बुद्धि इन तीनों में सामंजस्य (Harmony) होना आवश्यक है | हमारे जीवन में दुःख इसीलिए ही है क्योंकि इन तीनों अर्थात शरीर, मन और बुद्धि में सामंजस्य का अभाव है |यह अभाव ही किसी भी एक योग को साधने में बाधक बन जाता है |

       हम स्वयं में उपस्थित गुणों की प्रधानता (Dominancy) के अनुरूप किसी एक योग को प्रमुखता देते हुए अपने साध्य (Target) तक सुगमता से पहुँच सकते हैं | गीता में भगवान ने आपको तीनों मार्ग बता दिए हैं, आपको अपने में उपस्थित गुणों के आधार पर किसी एक मार्ग को प्रधानता (Priority) देते हुए चयन करना होगा | भगवान ने आप पर ही यह कार्य छोड़ा है | उन्होंने गीता ज्ञान का समापन करते हुए अर्जुन को भी ऐसा ही कहा है ।

  गीता-ज्ञान का समापन करते हुए भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं -

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु || गीता-18/63||

          अर्थात इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया है | अब तुम इस रहस्य युक्त ज्ञान पर पूर्णतया भली भांति विचार कर, जैसे चाहता है, वैसे ही कर |

            परमात्मा की यही विशेषता है कि वे सब कुछ बताकर भी निर्णय (Decision) सामने वाले श्रोता पर ही छोड़ देते हैं | इसका कारण है कि मनुष्य चाहे कितना ही ज्ञान प्राप्त कर ले, वह उस ज्ञान को किस प्रकार लेता है, यह सब उसके विवेक पर निर्भर करता है, ज्ञान देने वाले की क्षमता पर नहीं | इस संसार में अथाह ज्ञान भरा पड़ा है, ज्ञान देने वाले गुरु भी बहुत हैं, ज्ञान देने वाले शास्त्र भी बहुत हैं फिर भी व्यक्ति मुक्ति की राह पर चल नहीं पा रहा है | कारण है, ज्ञान को जीवन में धारण न करना | जरा विचार कीजिये, गीता- ज्ञान को आत्मसात कर उस पर चलने वाले कितने लोग हैं ? इस प्रश्न का उत्तर आप और मैं, हम सब भली-भांति जानते हैं |

          भगवान श्री कृष्ण ने अपने सखा, अपने शिष्य अर्जुन को गोपनीय (Confidential) से भी अति गोपनीय ज्ञान कह दिया है | यह गोपनीय ज्ञान रहस्यों से परिपूर्ण है और रहस्य युक्त ज्ञान केवल वही व्यक्ति आत्मसात कर सकता है, जो ज्ञान को आत्मसात करने से पूर्व किसी भी प्रकार के कथित ज्ञान से पूर्णतया रिक्त हो | अर्जुन तो पहले से ही कथित ज्ञान से भरा पड़ा था, तभी तो वह युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व भगवान श्री कृष्ण से एक ज्ञानी की तरह बातें कर रहा था | युद्ध से होने वाली हानि और उससे लगने वाले पाप को समझा रहा था | भगवान श्री कृष्ण चाहते हैं कि ज्ञान को भली भांति विचारकर उसके अनुसार चलने अथवा उस पर न चलने का निर्णय स्वयं अर्जुन करे | भगवान ने तो अर्जुन के समक्ष ज्ञान देकर ऐसी परिस्थिति का निर्माण कर दिया है कि उसे निर्णय करने में जरा सी भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए |  

       पहले से ही बुद्धि में भरे ज्ञान (जो कि वास्तव में ज्ञान न होकर अज्ञान है) को मिटाए बिना वास्तविक ज्ञान को आत्मसात नहीं किया जा सकता | पूर्व में भरा ज्ञान, जोकि केवल सांसारिक ज्ञान है, के सामने वास्तविक ज्ञान बौना बन कर रह जाता है जिससे व्यक्ति के  सामने द्वंद्व पैदा हो जाता है | वह समझ नहीं पाता कि कौन सा ज्ञान वास्तविक ज्ञान है | समय आने पर पूर्व में प्राप्त सांसारिक ज्ञान ही आध्यात्मिक ज्ञान पर भारी पड़ जाता है जिसके कारण व्यक्ति के सामने आने वाली विपरीत परिस्थितियां उसे मोहग्रस्त कर देती है |

           एक बार एक संत भिक्षा के लिए एक घर में जाते हैं |  भिक्षा देने वाली महिला संत से कहती है कि मुझे ज्ञान दीजिये | संत कहते हैं कि अभी तक तुमने क्या क्या ज्ञान प्राप्त कर लिया है ? तब वह महिला अपनी पढी और सुनी ज्ञान की बातें संत को बतला देती है | बार बार संत से ज्ञान की बातें कहने का आग्रह करने पर संत कहते हैं कि आज नहीं, कल जब मैं भिक्षा के लिए आऊंगा तब तुम्हें ज्ञान दूंगा | दूसरे दिन भिक्षा के लिए जब संत उसी द्वार पर जाते हैं तब महिला भिक्षा देने के लिए बाहर आती है | संत भिक्षा के लिए पात्र को आगे कर देते हैं और कहते हैं कि इसमें भिक्षा डाल दो | महिला पात्र को देखती है कि उसमें तो गोबर भरा है | महिला कहती है कि महात्माजी, इसमें तो गोबर भरा है | संत कहते हैं भिक्षा इसी पात्र में डाल दो | महिला कहती है कि इससे तो भोजन दूषित हो जायेगा |

            तब संत महिला को समझाते हैं कि इसी प्रकार पहले से ही तुम्हारे भीतर जो ज्ञान भरा पड़ा है उस पर मेरे द्वारा दिया गया ज्ञान भी दूषित होकर अर्थहीन हो जायेगा | इसलिए पहले उस ज्ञान को बाहर निकाल फेंको, तभी मेरे दिए ज्ञान का कुछ प्रभाव होगा अन्यथा मेरे द्वारा दिया ज्ञान भी अर्थहीन होकर रह जायेगा | हम भी उस महिला की तरह ही हैं जो पहले से ही ज्ञान से भरे हैं | इसीलिए हमारे ऊपर भी गीता का ज्ञान भी किसी प्रकार का प्रभाव नहीं छोड़ पा रहा है |  

                 आइये ! पुनः चलते है कुरुक्षेत्र में होने जा रहे युद्ध की ओर जहां अभी युद्ध प्रारम्भ नहीं हुआ है | दोनों पक्षों की सेनाएं आमने-सामने डटी हुई है और युद्ध के लिए तत्पर है | दोनों सेनाओं के मध्य अर्जुन का रथ लिए भगवान् श्री कृष्ण खड़े हैं | अपने भीतर भरे ज्ञान (अज्ञान) के कारण अर्जुन विषाद कर रहे हैं | विषाद मनुष्य को अवसाद में ले जाता है और अवसाद मनुष्य को कुछ भी करने लायक नहीं छोड़ता है | भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को अवसाद में जाने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं | अथक प्रयास के बाद जब भगवान् को प्रतीत होता है कि अब अर्जुन सभी संशयों से मुक्त हो चूका है तब वे अर्जुन को अपने विवेक से निर्णय करने का कह देते हैं | इस प्रकार समस्त गीता-ज्ञान को पाकर अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को अब कह रहे हैं-

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत |

स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्य वचनं तव || गीता-18/73||

अर्थात हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा |

                  यह श्लोक गीता के श्री कृष्ण-अर्जुन संवाद का अंतिम श्लोक है, जो अर्जुन द्वारा उच्चारित किया गया है | इस श्लोक के अनुसार भगवान श्री कृष्ण को अर्जुन आश्वस्त करता है कि उसका समस्त प्रकार का मोह समाप्त हो चूका है और उसने अपनी स्मृति प्राप्त कर ली है | वह द्वंद्व से बाहर निकल कर निर्द्वंद्व हो चूका है अतः वह भगवान की आज्ञा का पालन करेगा |

          भगवान् की आज्ञा क्या है ? भगवान् की आज्ञा है-‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज’ | क्या अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण रूप से शरणागत हो गए थे ? क्या अर्जुन ने मीरां की तरह कह दिया था –‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ ? इस श्लोक को पूर्ण रूप से समझने के लिए इस श्लोक इसके भीतर उतरते हैं |  

              गीता के इस श्लोक (18/73) में चार बातें अर्जुन द्वारा कही गयी है | प्रथम, मेरा मोह (अज्ञान) नष्ट हो गया है; दूसरी बात, मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है; तीसरी, मैं संशय रहित हो गया हूँ और चौथी तथा अंतिम बात कि मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा | इन चारों में अतिमहत्वपूर्ण बात है, मोह (अज्ञान) का नष्ट हो जाना | अतः प्रथम बात को थोड़ा विस्तार से जानना आवश्यक है तभी हम निश्चित कर सकते हैं कि गीता-ज्ञान का अर्जुन पर कितना प्रभाव पड़ा है ?

         अर्जुन पर पड़े प्रभाव के अनुसार ही हमारे ऊपर इस गीता-ज्ञान का क्या प्रभाव पड़ सकता है, यह निश्चित होगा | मोह नष्ट होना, ज्ञान का प्रथम प्रभाव होता है | शेष सभी तीनों प्रभाव मोह के अधीन है | मोह के नष्ट होते ही व्यक्ति को स्मृति भी प्राप्त हो जाती है, फिर वह निर्द्वंद्व (संशय रहित) होकर सब कुछ परमात्मा के नियमानुसार करेगा अर्थात उनकी आज्ञा का पालन करेगा | हम सब सांसारिक मोह में इतने जकड़े हुए हैं कि हमें मोह से मुक्त होना लगभग असंभव प्रतीत होता है | मोह हमें एक प्रकार की सुखद अनुभूति देता है, जो हमें साक्षात् इस जीवन में अनुभव होती दिखाई देती है |

              ज्ञानी चाहे कितना ही ज्ञान देता रहे कि यह संसार मिथ्या है, मृग-मरीचिका है परन्तु हमें जो कुछ भी दिखाई दे रहा है, हम उसी को सत्य मानते हुए जड़ बने रहते हैं | परिवार जनों का मोह, शरीर का मोह, व्यवसाय का मोह, धन-सम्पति का मोह आदि असंख्य मोह के बंधनों से छूट पाना इतना आसान नहीं है | इस मोह की पकड़ इतनी अधिक मजबूत है कि गीता का ज्ञान भी हमें इस मोह से तत्काल मुक्त नहीं कर सकता | यह मोह आखिर है क्या ?

              मोह अज्ञान है | जो परिवर्तनशील है, उसको शाश्वत मान लेना ही मोह है | जो अपना नहीं है, उसको अपना मान लेना ही मोह है | फिर इस अपनत्व को गहराई से आत्मसात कर लेना और उसे ही अपना संसार बना लेना अपनी आंतरिक दृष्टि को भी खो देना है | आखिर ‘मोह में व्यक्ति अंधा हो जाता है’, यह कथन चरितार्थ हो ही जाता है | मोह के कारण व्यक्ति अपना भला-बुरा नहीं समझ सकता और उसी के वशीभूत होकर वह अपनी स्मृति खो बैठता है | वह यह नहीं जानता कि वह क्या है, कौन है और उसके इस जीवन का उद्देश्य क्या है ? 

               ज्योंही व्यक्ति मोह के बंधन से छूटता है, उसको अपने होने का, अपने जीवन के उद्देश्य का भान हो जाता है | इसी को स्मृति को प्राप्त हो जाना कहते हैं | इसीलिए अर्जुन यहाँ पर कह रहा है कि मेरा मोह नष्ट हो गया है और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है | आप अपने शरीर को ही स्वयं का होना मान रहे हैं; स्वयं को भूल जाना, अपने आपको विस्मृत कर देना, मोह के कारण ही संभव होता है और ज्योंही आपका मोह समाप्त हो जाता है, आप को अपनी सही स्थिति का अनुभव हो जाता है | यह ठीक उसी प्रकार है, जैसे दर्पण पर धूल जम जाती है तब आप उसमें अपना वास्तविक स्वरूप नहीं देख सकते | ज्योंही दर्पण से धूल की वह परत हटा दी जाती है आपका वास्तविक स्वरूप आपके समक्ष प्रकट हो जाता है | इस प्रकार जब आपको अपनी स्मृति पुनः प्राप्त हो जाती है, तब आपका प्रत्येक संशय भी समाप्त हो जाता है | इस प्रकार संशय की समाप्ति हो जाना आपके मन को स्थिरता प्रदान कर देता है जिससे आपकी सोचने समझने की क्षमता तीव्र हो जाती है | मोह के नष्ट हो जाने से लेकर निर्द्वंद्व होने की स्थिति में पहुँचने तक, प्रभु कृपा और गुरु की भूमिका महत्वपूर्ण होती है |

               परमात्मा की कृपा के बिना न तो मोह नष्ट हो सकता है और न ही संशय दूर हो सकता है | प्रभु कृपा से आपको गुरु के रूप में एक सच्चा मार्गदर्शक मिल जाता है, जो आपको मोह के जाल से बाहर निकाल कर प्रत्येक संशय से रहित कर देता है | संशय रहित जीवन ही वास्तविकता में जीवन होता है अन्यथा द्वंद्व में तो सारा संसार जी ही रहा है | जब तक आप अपने जीवन के होने, अपने स्वयं के होने को नहीं समझते तब तक संशय ग्रस्त ही बने रहते हैं | संशय दूर होते ही आपकी मानसिक दशा भी स्थिर हो जाती है और धीरे-धीरे आप आत्म-बोध होने की ओर बढ़ने लगते हैं |

         इतना ज्ञान हो जाने पर मनुष्य समझ जाता है कि वह कुछ भी नहीं करता है बल्कि सब कुछ परमात्मा की इच्छानुसार ही होता है | उसके हाथ में कुछ भी नहीं है, यहाँ तक कि वह स्वयं भी व्यक्तिगत रूप से कुछ भी नहीं है बल्कि सब कुछ वह एक परमात्मा (सर्व लोकैक नाथम्) ही है | यही कारण है कि अर्जुन यहाँ पर कह रहे हैं कि अब वह सब कुछ वैसे ही करेगा जैसा उसे भगवान श्री कृष्ण कहेंगे अर्थात ‘करना और होना परमात्मा की मर्जी के अनुसार’, इस बात को स्वीकार कर लेगा | इस स्थिति को उपलब्ध हो जाने के बाद ही मनुष्य परमात्मा होने की राह पर आगे बढ़ता है | 

              परमात्मा होने की राह पर आगे बढ़ने का अर्थ परमात्मा हो जाना नहीं है | आध्यात्मिकता की राह बड़ी फिसलन भरी राह है | यहां पर कदम-कदम पर फिसल जाने का खतरा बना रहता है | जब तक सोपान के अंतिम भाग तक पहुँच कर छत पर पांव नहीं जमाये जाते तब तक गिरने का भय बना ही रहता है | 

          एक सांसारिक व्यक्ति को जिन संकटों का सामना अपने जीवन में करना पड़ता है, उससे कहीं अधिक संकट आध्यात्मिकता की राह पर चलने से व्यक्ति के समक्ष उपस्थित होते हैं | ये संकट ही मनुष्य की कड़ी परीक्षा लेते है | जो इन संकटों से निकल गया, वही परमात्मा को उपलब्ध हो सकता है | आध्यात्मिकता के रास्ते की वे बाधाएं क्या हैं, जो व्यक्ति को अपने लक्ष्य से भटका देती हैं ? अर्जुन को गीता-ज्ञान साक्षात् परमात्मा श्री कृष्ण से मिला था, परन्तु फिर भी वह परमात्मा को नहीं पा सका | परमात्मा तो सभी के साथ सदैव है।साथ में होने का अर्थ यह नहीं है कि आप स्वयं परमात्मा हो गए है।स्वयं का परमात्मा हो जाना ही आत्मबोध को उपलब्ध होना है। 

         जब अर्जुन जैसा व्यक्ति जो सतत कई वर्षों तक स्वयं परमात्मा के सानिध्य में रहा था, फिर भी परमात्मा से उसकी दूरी बनी रही, तो फिर आप की और हमारी तो उसके सामने बिसात ही क्या है ? भगवान श्री कृष्ण भौतिक रूप से अर्जुन के साथ अवश्य बने रहे परन्तु आत्मिक स्तर पर क्या अर्जुन उनके साथ एकत्व स्थापित कर सका ?

                हम अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के दुःख और सुख भोगते हैं | सुख में हम इतने अधिक उत्साहित हो जाते हैं कि हमें परमात्मा की स्मृति तक नहीं रहती | जब दुःख सामने आता है, तो एक पल में ही व्यथित होकर भगवान को पुकारने लगते हैं | हमारी भौतिक दृष्टि में परमात्मा सुख में भी हमारे आस-पास नहीं थे और दुःख में भी कहीं दिखलाई नहीं पड़ते | जबकि वास्तविकता यह है कि परमात्मा हमें छोड़कर जा ही नहीं सकते, जिस समय परमात्मा इस भौतिक शरीर को छोड़ देंगे, हमारा इस एक योनि का जीवन भी समाप्त हो जायेगा अर्थात यह शरीर भी नष्ट हो जायेगा | इस संसार में हमें दुःख मिलता ही इसी कारण से है कि हम कर्म भी केवल इस शरीर के लिए ही करते हैं | जबकि महत्वपूर्ण हमारा शरीर नहीं बल्कि हमारी आत्मा है, जो कि हम स्वयं है | हम शरीर नहीं हैं | आत्म-बोध हो जाने पर शरीर में रहते हुए भी हम केवल ‘शरीर’ नहीं रहते बल्कि जिस के कारण यह शरीर मिला है, वही हम हो जाते हैं  | आत्म-ज्ञान को प्राप्त होकर ही हम मुक्त हो सकते हैं अन्यथा नहीं ।

              अर्जुन ने कह तो दिया कि ‘करिष्ये वचनं तव’ परन्तु क्या उसने भगवान् श्री कृष्ण द्वार कहे गए वचनों के आधार पर उस ज्ञान को प्राप्त कर लिया जिसको पाकर मनुष्य संसार से मुक्त होकर आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाता है |नहीं, ज्ञान को सुनकर भी उसका मन युद्ध भूमि पर ही  डांवाडोल हो गया था |

        आइये ! अब हम यह जानने का प्रयास करें कि वे कौन से कारण थे, जिनके कारण अर्जुन जैसा शिष्य भी आत्म-ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सका | अर्जुन के जीवन में जो कारण रहे, वही कारण हमारे जीवन में आज भी उपस्थित हैं जो हमारी मुक्ति में बाधक बनते है | श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित ज्ञान को श्री कृष्ण से प्राप्त कर लेने के उपरांत अर्जुन के जीवन में उस महायुद्ध में और उस युद्ध के उपरांत क्या कुछ घटित हुआ, इसको जानने के लिए महाभारत की और चलते हैं |

                गीता महाभारत के भीष्म-पर्व के अंतर्गत आती है | गीता-ज्ञान से आगे की बातें महाभारत में वर्णित है | गीता-ज्ञान प्राप्त कर लेने के उपरांत अर्जुन ने कह दिया है कि वह अब वही करेगा, जैसा उसे भगवान श्री कृष्ण आदेश देंगे | उसके अनुसार उसका मोह नष्ट हो चूका था और मानसिक रूप से संशय रहित होकर वह स्थिर हो गया था | कुरुक्षेत्र की रण-भूमि में रण-भेरी बज चुकी है और युद्ध प्रारम्भ हो गया है | श्री कृष्ण के ज्ञान के प्रभाव से अर्जुन मन लगाकर युद्ध भी कर रहा है | समता का आचरण करते हुए वह समभाव से अस्त्र-शस्त्रों का उपयोग कर रहा है | युद्ध अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ रहा है और आखिर एक दिन वह घडी आ जाती है, जब अर्जुन पुनः मोहग्रस्त हो जाता है | उधर सामने विरोधी पक्ष में पितामह भीष्म और इधर अर्जुन | अर्जुन के मानसिक दृष्टि पटल पर पितामह के साथ बाल्यकाल से लेकर आज तक के दृश्य एक-एक कर आ जा रहे हैं | वह अभी भी महाप्रतापी भीष्म को एक योद्धा न मानकर अपना पितामह ही मान रहा है |

                  पितामह को सामने देखकर वह श्री कृष्ण द्वारा दिया गया वह ज्ञान भूल चूका है कि ‘जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च‘ अर्थात जन्म लेने वाले की मृत्यु और मरने वाले का जन्म होना निश्चित है | एक व्यक्ति को, एक योद्धा को केवल अपना पितामह मान लेना भी मोह है | इस प्रकार उत्पन्न हुए मोह के कारण भला अपने पितामह को वह कैसे मार सकता है ? अर्जुन इस मोह के वशीभूत होकर यह भी भूल गया था कि श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘देही नित्यमवध्योSयं देहे सर्वस्य भारत’ अर्थात देह में स्थित यह देही सदैव ही अवध्य है यानि इसे मारा नहीं जा सकता, केवल देह मरती है | मोहग्रस्त होकर वह अपने क्षत्रिय धर्म को भी भूल गया था जहाँ उसका एकमात्र धर्म युद्ध करना होता है | जैसे तैसे भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को समझा बुझा कर इस मोह रुपी अज्ञान से बाहर निकालते हैं और इस प्रकार युद्ध फिर से अपनी लय प्राप्त कर लेता है और भीष्म को अर्जुन के द्वारा शर-शैया उपलब्ध होती है |

                 इसी प्रकार युद्ध के मध्य में ही अर्जुन जान चूका है कि कर्ण उसका बड़ा भाई है | एक बार फिर युद्ध में मोहग्रस्त होने की स्थिति अर्जुन के सामने उपस्थित हो जाती है | इस बार भीष्म के स्थान पर कर्ण अर्जुन के सामने होता है | मोह उसे एक बार फिर अपनी पकड़ में जकड़ लेता है | युद्धभूमि में निहत्था कर्ण अपने रथ के पहिये को दलदल से बाहर निकालने का प्रयास कर रहा है | निहत्थे पर प्रहार करना युद्ध के नियम के विरुद्ध होता है | अर्जुन इस नियम के वशीभूत हो जाता है और मोहग्रस्त होकर उसे केवल देख भर रहा है | श्री कृष्ण उसे फिर मोह से बाहर निकलते हुए स्मृति दिलाते हैं कि इस युद्ध में नियम अनेकों बार टूटे हैं | अभिमन्यु को भी तो नियम तोड़ कर मारा गया था | यह जानकर ही अर्जुन मोह से बाहर निकल पाता है और कर्ण का वध कर देता है |

           एक बार ज्ञान हो जाने के बाद भी बार-बार मोहग्रस्त हो जाना ‘मनुष्य की नियति है’ ऐसा कहा जा सकता है | मोह संसार का आकर्षण है इसलिए यह अंधकार है, अज्ञान है | अन्धकार को केवल आलोक से ही दूर किया जा सकता है | अज्ञान को केवल ज्ञान से ही मिटाया जा सकता है | वह ज्ञान, जो केवल पढ़ा अथवा सुना ही नहीं जाये बल्कि उस ज्ञान को गुना भी जाये, उस ज्ञान के अनुसार जिया जाये | जब व्यक्ति ज्ञान में जीने लगता है, वह पुनः मोह के जंगल में भटकता नहीं है | अर्जुन ने केवल ज्ञान को सुना ही था, ज्ञान के अनुरुप चला नहीं था, उस ज्ञान को जिया नहीं था, उस ज्ञान को पूर्ण रूप से आत्मसात नहीं किया था |

                  आपके जीवन में भी आपको अपने लक्ष्य से भटकाने के लिए ऐसे ही सब विकार अवरोध बनकर आयेंगे | अगर आप ने ज्ञान को आत्मसात किया होगा तो फिर संसार की कोई भी शक्ति आपको मोह ग्रस्त नहीं कर सकती | परन्तु यह सब इतना सरल नहीं है | साधारण मनुष्य के लिए तो एक दम नहीं है | ब्रह्मा पुत्र नारद जैसे देवर्षि भी स्त्री के मोह के जाल में फंसने से नहीं बच पाए थे |

         देवर्षि नारद ने काम को जीत लिया था | इसका उनको अभिमान हो गया था | वे सभी देवताओं को अपनी उपलब्धि बताते हुए आत्मप्रशंसा कर रहे थे | भगवान शंकर ने उन्हें कहा भी कि मुझे तुम जो यह सब काम-विजय की गाथा सुना रहे हो न, उसे भगवान विष्णु को मत बताना | देवर्षि तो काम-विजय के मद में चूर थे | भला वे शिव की बात को सुनने वाले कहाँ थे ? पहुँच गए बैकुण्ठ, श्री हरि के दरबार में और करने लगे उनके समक्ष आत्मप्रशंसा | श्री हरि ने भी स्वीकार किया कि आप जैसा कोई नहीं है, जो काम को जीत सका हो | परन्तु नारद कहाँ रुकने वाले थे | वे तो लगातार अपनी प्रशंसा किये जा रहे थे |

                 परमात्मा की एक बहुत बड़ी विशेषता है | वे संसार में सब कुछ सहन कर सकते हैं परन्तु अपने भक्त का पतन उनको सहन नहीं होता | नारद ठहरे भगवान के परम भक्त | सदैव तीनों लोकों में ‘नारायण-नारायण’ का जप करते हुए घूमते रहते हैं | श्री हरि ने देखा कि अहंकार के कारण मेरे भक्त नारद का पतन हो रहा है, उसको इस प्रकार पतित होने से रोकना होगा | नारद जब बैकुण्ठ में श्री हरि के सामने आत्मप्रशंसा करते-करते थक गए तो उन्होंने परमात्मा को प्रणाम कर पृथ्वी लोक के भ्रमण पर जाने के लिए उनसे आज्ञा मांगी |

      श्री हरि की स्वीकृति पाकर वे ‘नारायण-नारायण’ जपते हुए पृथ्वी-लोक के लिए चल पड़े | तुरंत ही वे पृथ्वी लोक में पहुँच गए | वहां पहुंचते ही वे देखते हैं कि एक  नगर में वहां के राजा शीलनिधि की अति सुन्दर कन्या राजकुमारी विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा है | उस नगर में पहुंचकर वे राज निवास गए | शीलनिधि ने नारदजी का स्वागत करते हुए अपनी कन्या का हाथ देखकर भविष्य बतलाने का आग्रह किया | हस्त-रेखा पढ़कर देवर्षि समझ गए थे कि इस कन्या का वर तो श्री हरि के समान ही कोई होगा |

     किसी भी मनुष्य को भले ही भविष्य जानने का कितना ही ज्ञान हो परन्तु काम के वशीभूत होकर वह मोहग्रस्त हो ही जाता है | नारद जानते थे कि विश्वमोहिनी का वर श्री हरि जैसा ही होगा परन्तु वह स्वयं हरि जैसा है नहीं | फिर भी काम ने उनको भ्रमित कर दिया | वे जानते थे कि श्री हरि जैसा होना केवल श्री हरि की कृपा से ही संभव हो सकता है अन्यथा नहीं |

          मन में जब कोई कामना जन्म लेती है तो मनुष्य उसे तत्काल ही पूरा करने में लग जाता है और जीवन की वास्तविकता से मुंह मोड़ लेता है | नारदजी ने भी यही किया, सत्य से मुंह मोड़ लिया | उन्होंने विश्वमोहिनी के भविष्य का सब कुछ ज्ञान अपने मन में छुपाकर रख लिया क्योंकि वे तो राजकुमारी को देखते ही मोहग्रस्त हो गए थे | उनके मन में उत्कंठा हुई कि क्यों न स्वयंवर में राजकुमारी उन्हें ही वर के रूप में चुने और जयमाला पहनाये ? परन्तु ऐसा होना इतना आसान नहीं था | सब कुछ राजकुमारी विश्वमोहिनी के द्वारा किये जाने वाले चयन पर निर्भर था | देवर्षि नारद के सामने एक ही रास्ता था | वे श्री हरि से प्रार्थना करने लगे कि प्रभु, आप मुझे आपके जैसा सुन्दर रूप दीजिये | आप वह सब कुछ कीजिये जिससे राजकुमारी विश्वमोहिनी मुझे ही वर के रूप में स्वीकार करे | श्री हरि ने देवर्षि को कहा कि ‘मैं वह सब कुछ करूँगा जिसमें तुम्हारा हित निहित होगा | तुम्हारे हित के विरुद्ध मैं कुछ भी नहीं करूँगा |’

                       श्री हरि से आशीर्वाद प्राप्त कर देवर्षि पहुँच गए, शील निधि के दरबार में जहाँ विश्वमोहिनी का स्वयंवर हो रहा था | राजकुमारी जयमाला लेकर मंडप में आती है, नारद उछल-उछल कर उसके सामने अपने चेहरे को ले जाते हैं परन्तु राज कुमारी उनकी ओर दृष्टि तक नहीं डालती है | राजकुमारी उनकी तरफ दुबारा आती ही नहीं है और भीड़ में अदृश्य हो जाती है | अन्ततः स्वयंवर समाप्त हो जाता है और सभी अपने-अपने स्थान पर वापिस जाने के लिए उठ खड़े होते हैं | नारदजी भी अपना सा मुंह लेकर दुखी मन से इधर-उधर देखने लगते हैं | सभी एक-एक कर वापिस जाने लगते हैं ।

                  स्त्री-वियोग में दुखी होकर देवर्षि भी उठ खड़े होते हैं | पास में बैठे थे शिव के दो गण, वे दोनों नारद के बन्दर जैसे चेहरे को देखकर उनकी हंसी उड़ाते हैं | नारद उन्हें शाप देते हैं कि तुम दोनों जो मेरी इस देह को देखकर राक्षसों की तरह मुझ पर हंस रहे हो न, त्रेता युग में तुम दोनों निशाचर बनोगे | व्यथित नारद राजप्रासाद से बाहर निकलते हैं और पास में स्थित सरोवर में जाकर अपने मलिन मुख को धोते हैं | वे अपना चेहरा जल-दर्पण में देखकर हतप्रभ रह जाते हैं | यह कैसा रूप दे दिया श्री हरि आपने ? भयंकर विशाल बन्दर की देह | नहीं, ऐसा हो नहीं सकता | रोष में जलते नारद सोच रहे हैं कि आखिर श्री हरि ने जानबूझकर मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?

               नारद इस प्रकार विचार कर ही रहे थे कि श्री हरि आ पहुंचे देवर्षि के सम्मुख | साथ में एक ओर चल रही है जन्म जन्मान्तर की भार्या रमा और दूसरी ओर राजकुमारी  विश्वमोहिनी | श्री हरि और राजकुमारी विश्वमोहिनी, दोनों के गले में पड़ी वरमाला देखकर नारद सब कुछ समझ गए | स्त्री-मोह ने उनसे आंतरिक दृष्टि छीन ली थी, मोह ने उन्हें अँधा बना दिया था | वे व्यथित तो पहले से ही थे, श्री हरि के साथ राजकुमारी को देखकर उनकी व्यथा कई गुना अधिक बढ़ गयी | उन्होंने श्री हरि को शाप दिया कि जिस प्रकार एक स्त्री के वियोग में मैं आज दुखी हो रहा हूँ, उसी प्रकार आप भी एक दिन स्त्री के वियोग में दुखी होंगे | साथ ही साथ जिस प्रकार आपने मुझे जैसे यह वानर देह दी है, वैसे ही वानर एक दिन आपके लिए सहायक सिद्ध होंगे | श्री हरि ने मुस्कान के साथ उनका शाप शिरोधार्य किया और अपनी माया समेट ली | अब वहां पर न तो कोई नगर था और न ही राजकुमारी विश्वमोहिनी | यह सब कुछ केवल भ्रमित करने वाली माया थी जिसके मोह में काम को जीत लेने वाले देवर्षि नारद भी काम के वश होकर फंस गए थे |

                 मोह परमात्मा की माया के कारण ही पैदा होता है और माया में ही पैदा होता है | मोह के कारण ही काम, क्रोध, लोभ, मद, ईर्ष्या आदि सब विकार मनुष्य के मन में जन्म ले लेते हैं | ये सभी नरक के द्वार हैं और मनुष्य को चाहिए कि वह इनसे बचकर रहे | मोह में फंसकर ही व्यक्ति सुख-दुःख का अनुभव करता है, वह सदैव अपने आपको असुरक्षित पाता है | अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से ज्ञान पाकर भी बार-बार मोह में फंसता जा रहा था और एक मात्र यही कारण था कि वह मोक्ष को उपलब्ध नहीं हो सका |

           अर्जुन इंद्र-पुत्र था और इंद्र स्वर्ग का राजा है, फिर भी अर्जुन सीधे स्वर्ग में भी नहीं पहुँच सका | जब स्वर्ग जाने के लिए पांचो भाई व द्रोपदी हिमालय में स्वर्गारोहण कर रहे थे तभी एक पहाड़ पर चढते समय फिसल कर गिर जाने से अर्जुन की मृत्यु हो गयी थी | देह छोड़ते समय भी उनके मन में स्वर्ग तक न पहुँच पाने का दुःख था | स्वर्ग जाने का मोह भी अंत समय में उसके दुःख का कारण रहा | इस प्रकार जीवन के अंत तक मोह नष्ट न होने के कारण वे कभी भी द्वंद्व से मुक्त नहीं हो सके थे | इस कारण से अर्जुन को प्रारम्भ में कुछ समय के लिए नरक में भी जाना पड़ा | नरक की अवधि भोगकर वहां से फिर वह अपने जैविक पिता इंद्र की नगरी स्वर्ग पहुंचे | जहाँ पर रहकर उन्होंने अपने मानव जीवन में किये गए सत्कर्मों का फल भोगा और पुनः पृथ्वी-लोक में मनुष्य के रूप में जन्म लिया |

           इस प्रकार हमने जाना कि साक्षात् परमात्मा श्री कृष्ण का सानिध्य और उनसे प्राप्त किया ज्ञान भी अर्जुन को बैकुण्ठ में स्थान नहीं दिला सका | इसका कारण गीता-ज्ञान में कोई कमी होना नहीं है, बल्कि मनुष्य की कमजोरी है क्योंकि उसकी मानसिकता ही ऐसी हो गयी है कि वह बार-बार मोह में पड़ता रहता हैं | ज्ञान पाकर भी हम त्याज्य विकारों का त्याग नहीं कर पाते हैं अथवा एक बार त्यागने के बाद पुनः उनको ही अपना लेते हैं | यह हमें सोचने को विवश करता है कि ऐसा क्या किया जा सकता है, जिससे हम सदैव के लिए मोह और माया से मुक्त हो सकें ?

                अर्जुन के मुक्त न होने का एक मात्र कारण केवल मोह का नष्ट न हो पाना ही नहीं था | कुरुक्षेत्र का युद्ध महाभारत समाप्त हो चूका था | अर्जुन को अपने आपको महायोद्धा मान लेने का अभिमान भी हो गया था | अभी कुछ दिन ही तो बीते थे उसे गीता-ज्ञान प्राप्त किये | फिर भी वह समझ नहीं पा रहा था कि युद्ध करने वाला, युद्ध में मरने वाला और युद्ध में मारने वाला, ये तीनों भला केवल 'एक' व्यक्ति ही कैसे हो सकता है ?

           भगवान् श्रीकृष्ण का ‘एक’ कहने से तात्पर्य कुछ ओर ही था जिसे अर्जुन समझ न सका था | भगवान् कहना चाहते हैं कि उस एक परम के अतिरिक्त इस जगत में कोई अन्य जब है ही नहीं ऐसे में कौन तो मारे, किसको मारे और कौन मरवाए ? मरने वाला, मारने वाला और मरवाने वाला, ये तीनों एक ही चैतन्य के अंश हैं |

     श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध प्रारम्भ होने से पहले यहाँ तक स्पष्ट कर दिया था कि ‘मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ अर्थात ‘ये युद्ध भूमि में खड़े सभी योद्धा मारे जा चुके हैं, तू तो केवल इनको मारने का निमित मात्र बन जा |’ युद्ध की समाप्ति पर अर्जुन इस ज्ञान को विस्मृत कर चूका है | वह इस युद्ध में हुई विजय को केवल स्वयं की विजय होना मान रहा है | इस प्रकार अर्जुन में महाभारत युद्ध की विजय से उत्पन्न हुए अभिमान में और नारद में काम-विजय उपरांत जगे अभिमान में मूलभूत से कोई अंतर नहीं है | ऐसा अभिमान भी व्यक्ति को पतन की राह पर डाल देता है | नारद को तो श्री हरि ने अभिमान के गर्त से बाहर निकाल लिया था | देखें ! अर्जुन के साथ श्री कृष्ण क्या करते हैं ?

                    अर्जुन और श्री कृष्ण युद्ध भूमि में विचरण कर रहे हैं | भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख अर्जुन अपने आपको सर्वकालीन महायोद्धा बताते हुए आत्मप्रशंसा में लीन है | उसके अभिमान को चूर-चूर करने के लिए श्री कृष्ण अवसर का इंतजार कर रहे हैं | तभी उनके सामने कुरुक्षेत्र की वह पहाड़ी आ जाती है, जहाँ भीम पुत्र बर्बरीक का मस्तक युद्ध देखने के लिए रखा गया था | गुरु-शिष्य दोनों टहलते हुए बर्बरीक के शीश के पास पहुंचते हैं | अर्जुन अभी भी आत्मप्रशंसा में लीन है | अंततः भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ‘हे अर्जुन ! महाबली बर्बरीक ने सम्पूर्ण महाभारत युद्ध को अपनी आँखों से देखा है | क्यों न इनसे ही पूछ लिया जाये कि इस महायुद्ध का महायोद्धा कौन है ?’ अर्जुन ने बर्बरीक की और देख कर उनसे इस प्रश्न का उत्तर जानना चाहा | महाबली बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया-‘मुझे तो इस युद्ध में कोई भी व्यक्ति योद्धा के रूप में लड़ते हुए दिखाई ही नहीं दिया | केवल एक मात्र सुदर्शन चक्र ही इस छोर से उस छोर तक घूमते हुए संहार कर रहा था |’ बर्बरीक का यह उत्तर सुनकर अर्जुन का गर्व चूर-चूर हो गया |

                  इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि मोह और मद (अभिमान) सभी विकारों के मूल है | अगर इतना ज्ञान सुनकर और पढ़कर भी हमारा अहंकार और मोह नष्ट नहीं होता तो कमी हमारे में है, ज्ञान में और ज्ञान देने वाले में नहीं | हमें यह जानना आवश्यक है कि ज्ञान केवल सुनने और पढ़ने की पुस्तकीय बातें होने तक ही सीमित नहीं है बल्कि उस ज्ञान को जीवन में अपनाने से ही उसकी महता है | इसीलिए कहा जाता है कि ‘ज्ञानं भारः क्रियाः बिना’ अर्थात ज्ञान को काम में लिए बिना वह ज्ञान मात्र बोझ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | हम ज्ञान के बोझ तले दबे जा रहे हैं | यह बोझ ही मनुष्य में ज्ञान का अहंकार पैदा करता है | इस ज्ञान के बोझ को कम करने का एक ही उपाय है, उस ज्ञान का सही समय पर सदुपयोग कर लिया जाये | अगर ज्ञान का समय पर सदुपयोग नहीं किया जाता तो फिर ऐसा ज्ञान बोझ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता है |

             हम पढ़ते हैं, सुनते हैं, गुरु के पास जाते हैं और सब कुछ सीखते और जानते भी हैं परन्तु उस जाने हुए ज्ञान के अनुसार चलते नहीं है | यह प्रत्येक मनुष्य की कमी है | आज जो कुछ भी सामने दिखाई दे रहा है, उसी को सत्य मान बैठे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि जो कुछ भी हमें दिखलाई पड़ रहा है, वह प्रतिपल निरंतर परिवर्तित हो रहा है | निरंतर परिवर्तित होने वाला सत्य हो ही नहीं सकता फिर भी हम उसी को सत्य मान रहे हैं | वास्तविक ज्ञान वही है जो इस बात का ज्ञान करा दे कि सत्य ही शाश्वत होता है और इस भौतिक दृष्टि से वह दिखाई नहीं दे सकता | मोह वह अज्ञान है जो हमें हमारे जीवन में वास्तविक ज्ञान से वंचित कर देता है |

क्रमशः

प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||



Monday, March 21, 2022

मुक्त कीन्हि असि नारि

 मुक्त कीन्हि असि नारि

         हमारा परम सौभाग्य है कि हमने उस धरा पर जन्म लिया है, जहाँ इस युग में कई महान महिला भक्त हुई हैं | मकराना की करमा बाई, जिसके खीचड़े का प्रथम भोग आज भी पुरी में ठाकुरजी को लगता है, उसी करमा का परमात्मा में श्रद्धा और विश्वास इतना दृढ था कि भगवान् श्री कृष्ण को व्यक्त रूप में आकर उनका खीचड़ा खाना पड़ा | कहाँ तो करमा का बापू जीवन भर परमात्मा को भोग लगाने की क्रिया मात्र करता रहा और कहाँ करमा जिसने अपने बापू को खीचडा खाते हुए परमात्मा के दर्शन करा दिए | नमन है, ऐसी विभूति को |
         डेह (नागौर) के पास स्थित एक गाँव मांझुवास की अनपढ़ फूली बाई को भला हम कैसे भूल सकते हैं? फूली बाई नाम-भक्ति की एक आदर्श भक्त हुई है | कहा जाता है कि उनके द्वारा थापी गयी गोबर की थेपड़ी (उपले) में से भी राम-राम की धुन निकलती थी | एक छोटे से गाँव में अभावों के बीच पली-बढ़ी फूली के संतत्व का ही प्रभाव था कि उसने जोधपुर महाराजा और उनकी समस्त सेना को काबुल-युद्ध से लौटते हुए एक साथ बैठा कर भर-पेट भोजन करा दिया |
         मेड़ता की मीराबाई से तो आप सभी परिचित हैं ही, जो बाद में चितौड़ (मेवाड़) की महारानी भी बनी थी | भोजराज के साथ विवाह कर वह चित्तौड़ के महलों में पहुंच तो गई थी परंतु जो जन्म से ही गिरधर की हो गयी थी, उसको भला राजमहल का वैभव कब तक बाँध कर रख सकता था ? राजसी सुख-वैभव को प्रभावहीन करते हुए भगवान् श्री कृष्ण के प्रेम में वृन्दावन और द्वारका तक पहुँच गयी और अंततः भगवान् ने स्वयं उसे सशरीर अपने में लीन कर लिया |
          यह तो हुई कलियुग में भारत जैसे महान देश के एक प्रान्त, राजस्थान और उसके भी एक जिले नागौर की बात | त्रेता युग के समय दक्षिण भारत में भी एक महान नारी-भक्त हुई है, शबरी | शबरी - एक नाम, जो आज भी भक्ति का पर्याय बना हुआ है | कई वर्षों के बीत जाने पर कभी-कभी किसी ऐसे भक्त के दर्शन होते हैं, जिन्होंने भक्ति को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कर दिया है | एक महिला का भक्त होना विशेष बात है क्योंकि जिस परिवेश में एक बालिका का पालन-पोषण होता है, उसको देखते हुए इस बात की कल्पना तक नहीं की जा सकती कि उसके भीतर की भक्ति भावना उभर कर सबके सामने एक दिन प्रकट भी हो सकती है | इस बार हम चर्चा करेंगे, इसी राम-भक्त शबरी की |
        चलिए ! सबसे पहले चलते हैं, शबरी के पूर्वजन्म की कथा पर | कहा जाता है कि शबरी अपने पूर्वजन्म में एक राज्य की महारानी हुआ करती थी | महारानी के भी कोई पूर्वजन्म के संस्कार ही थे जो वह सदैव संतों की सेवा करने के लिए लालायित रहती थी | कई बार तो उसे स्वयं पर ग्लानि होती थी क्योंकि उसको अपने जीवन में एक महारानी होने के कारण सदैव राजा के मान-सम्मान के अनुरूप आचरण करना पड़ता था | लौकिक दृष्टि से भले ही महारानी का जीवन सुखी प्रतीत होता हो परन्तु इस महारानी को तो अपना जीवन भी बड़ा दुखमय लग रहा है | वह जानती है कि राजमहल सुख की खान नहीं है, केवल संतों की सेवा में रहते हुए सत्संग करना ही उसे सुखी कर सकता है | सत्संग और संतों की सेवा का सुख एक महारानी के रूप में रहते हुए मिलना कभी संभव नहीं हो सकता था | जब सत्संग की व्याकुलता एक सीमा से अधिक बढ़ गयी तो उन्होंने रनिवास को छोड़ने का निश्चय कर लिया | एक रात को महारानी ने राजमहल को त्याग दिया और प्रयाग जाने का रास्ता पकड़ लिया | प्रयागराज में वह सत-संग लेती और संतों की सेवा करती रहती |
          महारानी जैसे उच्च पद को गौरान्वित करने वाली किसी भी नारी के लिए अपना सांसारिक स्वरुप छिपाना बड़ा ही असंभव होता है क्योंकि एक पुरुष की दृष्टि भले ही अन्य किसी पुरुष पर न जाये, एक स्त्री पर अवश्य ही जाकर टिक जाती है | एक दिन ऐसा ही इस महारानी के साथ भी हुआ |
               माघ मास में संगम पर स्नान करने महारानी के राज्य के कुछ नागरिक भी आये थे | उन्होंने सन्तो की सेवा करते हुए अपनी महारानी को पहिचान लिया था | महारानी को लगा कि अब यह बात राजा तक अवश्य ही पहुंचेगी | मिलने वाली संभावित प्रताड़ना के भय से उसने संगम में डूबकर आत्महत्या कर ली | आत्महत्या, एक जघन्य अपराध और उस अपराध-कर्म की सजा.....जन्म हुआ एक भील के घर में, जहां के परिवेश में परमात्मा की बात तक होना लगभग असंभव सा लगता है | उसको जन्म नाम मिला, श्रमणा | भील समुदाय की जाति शबर में उसका जन्म हुआ था, इसलिए बाद में वह शबरी कहलाई |
             गीता में अर्जुन जब भगवान् श्री कृष्ण से पूछते हैं कि अगर योगभ्रष्ट व्यक्ति की पुनः सही मार्ग पकड़ने से पहले ही देह छूट जाये तो क्या होता है ? भगवान् कहते हैं कि अपने नए जन्म के साथ ही वह बाधित हुई प्रगति से आगे की यात्रा प्रारम्भ करते हुए योग-मार्ग पर बढ़ने लगता है | पूर्व में जितनी भी उसकी प्रगति की हुई होती है, वह नष्ट नहीं होती | इसी सिद्धांत के अनुसार भीलनी शबरी ने भले ही आत्महत्या जैसा जघन्य पाप किया हो, परमात्मा के मार्ग से उसका विचलन नहीं हुआ था | आत्महत्या के अपराध का परिणाम एक भील के घर जन्म लेकर उसने भोग लिया | अब आगे उसकी परमात्मा के मिलन के मार्ग में प्रगति होनी शेष है |
         पिता ने अपना कर्तव्य समझ कर युवावस्था की देहरी पर खड़ी शबरी के लिए वर ढूंढ लिया | उसके विवाह की तैयारी की जा रही है | बारात के लिए महाभोज का आयोजन किया गया है | भील परिवार में भोजन निरीह पशुओं के मांस का ही होता है | महाभोज के लिए बकरों और मेढ़ों की व्यवस्था की गयी है | अबोध बालिका शबरी पूछती है, ‘इन मासूम प्राणियों का क्या करेंगे ?’ पिता उत्तर देता है कि इन्हें काटा जायेगा और फिर इनके मांस को पकाकर अतिथियों को खिलाया जायेगा |
        ठीक उसी समय शबरी के पूर्वजन्म के संस्कार जाग उठते हैं | निरीह पशुओं की हिंसा की कल्पना कर वह सिहिर उठती है, उसका हृदय द्रवित हो जाता है | ओहो ! मेरे कारण इतने पशुओं की हिंसा हो रही है ? हे भगवान् ! मुझे राह दिखला | तत्काल ही घर छोड़कर घने जंगल में वह  भीलनी बालिका शबरी अदृश्य हो जाती है |
           जंगल में आगे बढ़ते-बढ़ते शबरी सोचती है कि वन में तो बहुत से ऋषि-मुनि तपस्या करते हैं | चलो अच्छा हुआ, मैंने घर को छोड़ दिया जो अब मुझे संतों की सेवा करने का सौभाग्य मिलेगा | परन्तु तुरंत ही वह मायूस हो गयी | मैं एक नारी और वह भी एक नीच जाति की, भला मुझसे सेवा करवाएगा कौन ? कौन मुझे आश्रय देगा ? ऐसा करती हूँ कि जंगल में एक छोटी सी झोंपड़ी बना लेती हूँ और कन्द-मूल-फल खाकर अपनी क्षुधा शांत कर लिया करुँगी | हाँ, हाँ, यही ठीक है, मेरे लिए ऐसा करना ही उचित रहेगा |
           इस प्रकार सोचते-विचारते शबरी घने जंगल के मध्य में पहुँच गयी | उसने देखा कि वहां कई आश्रम बने हुए है, जिनमें अनेकों ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे हैं | वह छिपते-छिपाते उन आश्रमों से इतनी दूर चली गयी, जहां सुगमता से किसी ऋषि-मुनि की दृष्टि उस पर न पड़ सके | ऐसे स्थान पर उसने अपने रहने के लिए एक छोटी सी झोंपड़ी बना ली | एक अनपढ़ भीलनी, जो संतों की सेवा को ही परमात्मा के मिलन का मार्ग मान रही है, दिनभर वन में घूमती, ऋषियों की पूजा के लिए फूल तोड़ती और उनके भोजन के लिए कन्द-मूल-फल आदि की व्यवस्था करती |
        मध्य रात्रि को जब सभी गहरी नींद में सो रहे होते, उन ऋषियों के एक एक आश्रम में धीरे-धीरे प्रवेश करती और प्रातःकालीन पूजा के लिए फूल तथा दिन में आहार के लिए फल आदि चुपके से रख आती | लौटकर ब्रह्ममूहूर्त से पहले ही ऋषियों के स्नान के लिए पम्पा सरोवर की ओर जाने वाले मार्ग को बुहार देती | समस्त मार्ग अच्छी प्रकार से बुहारकर ऋषियों के सरोवर जाने से पहले ही वह लौटकर अपनी झोंपड़ी में आ जाती | दिनभर वह संतों के जीवन के बारे में ही सोचती रहती | वह सोचती कि इस जीवन में कब उसे सत्संग करने का अवसर मिलेगा ?
           भक्ति का अर्थ है – सेवा और प्रेम | मनुष्य के समक्ष दो मार्ग हैं –एक श्रेय का और दूसरा प्रेय का | अपने बनाए संसार का ही प्रिय लगना, केवल उसी से प्रेम करना, प्रेय मार्ग है और परमात्मा का प्रिय लगना, भगवान् से प्रेम करना श्रेय मार्ग है | हमें प्रेय मार्ग को छोड़कर श्रेय मार्ग को अपनाना है | भगवान् से प्रेम करने के लिए अपने बनाये संसार से प्रेम करना छोड़ना होगा | सच है, भक्ति करना सरल नहीं है क्योंकि हमें हमारा संसार मीठा लगता है, प्रिय लगता है | जिसको भक्ति करनी है, उसे इस संसार के समस्त सुखों का त्याग करना होता है | इसलिए भक्ति-मार्ग पर आकर सांसारिक सुख की कामना का त्याग कर दो | यह मत सोचो कि इस जीवन का क्या होगा ? भक्ति के लिए परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा का होना आवश्यक है | फिर भगवान् ही उसकी देखरेख करते हैं | गीता में भगवान् कहते ही हैं –‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’ | शबरी ने अपने सभी सुखों का त्याग किया था | दिनभर जंगल में कंटीले झाड़-झंखाड़ में  उलझती, गिरती-पड़ती, निकलती और फल-फूल चुनती तथा रात को नींद का त्याग कर आश्रम-आश्रम जाती | यह भक्ति की पराकाष्ठा है |
           सेवा भी भक्ति है | जब आप स्वयं के शरीर के सुख के लिये कोई कार्य करते हो तो यह भोग है और जब यही कार्य दूसरे को सुख पहुँचाने के लिए करते हो तो वह भगवत्-सेवा है | दूसरे को सुख पहुँचाने के लिए त्याग करना पड़ता है | शबरी अपने लिए कुछ नहीं करती बल्कि ऋषियों के सुख के लिए सब कुछ करती है | आश्रम में ऐसी सुन्दर व्यवस्था होते देखकर सभी ऋषियों को आश्चर्य होता | सभी जानने को उत्सुक थे कि हमारे लिए इतना सब कुछ कौन कर रहा है ।
           वन में रहने वाले ऋषियों में एक ऋषि थे, मतंग | ऋषि मतंग अन्य सभी ऋषियों से जरा  भिन्न प्रकृति के थे | कहा जाता है कि वे एक बार के लिए एक हाथी को मारते और एक वर्ष तक उसका मांस खाते रहते | हाथी का एक पर्यायवाची शब्द मतंग भी है | हो सकता है इसी कारण से इन ऋषि का नाम मतंग पड़ा हो | मतंग ऋषि के मन में भी यह जानने की उत्सुकता हुयी कि आखिर उनकी इतनी सेवा कौन कर रहा है ?
          एक रात, उन्होंने सब कुछ जान लेने का निर्णय करते हुए नींद नहीं ली बल्कि सोने का अभिनय किया | अर्धरात्रि को ज्योंही शबरी ने उनके आश्रम में प्रवेश किया, वे उठ बैठे | उन्होंने शबरी को देखा | शबरी तो ऋषि को देखते ही भय से थर-थर काम्पने लगी | एक तो वह नीच जाति की, ऊपर से स्त्री और इधर ऋषि मतंग का एक ब्राह्मण होना | उसने सोचा कि अब उसकी खैर नहीं | प्रताड़ना के भय से वह सिहर उठी | मतंग ऋषि तो पहुंचे हुए संत थे | उनसे शबरी की मानसिकता छुपी न रह सकी | उन्होंने शबरी से प्रेमपूर्वक पूछा – ‘बेटी, तुम कौन हो ? कहाँ रहती हो ?’ उत्तर में शबरी ने अपनी समस्त गाथा मतंग ऋषि को रोते हुए कह सुनाई।    
        सेवा के लिए उसकी अटूट श्रद्धा देखकर ऋषि मतंग ने अपने आश्रम के एक कोने में उसे रहने की अनुमति दे दी और कह दिया कि आज से तुम मेरी बेटी हो | अब आगे से चोरी-छुपके कोई काम करने की आवश्यकता नहीं है | दिन के समय ही जंगल में जाकर फल-फूल ले आया करो | जब मैं शिष्यों के साथ सद्चर्चा करूँ तब तू लौटकर परमात्मा की कथा भी सुन लिया करो |
                 एक नीच जाति की स्त्री को आश्रय देकर मतंग अन्य सभी ऋषियों के कोपभाजन बन गए | उन्होंने मतंग ऋषि को अपने से अलग-थलग कर दिया | मतंग ऋषि पर इस बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा | वे तो जानते थे कि देह और जाति तो प्रारब्ध का परिणाम है | सभी देह भिन्न भिन्न आकार और रंग-रूप की हो सकती है परन्तु सब में एक परमात्मा ही निवास करते हैं | ऐसे में कौन छोटा और कौन बड़ा; कौन ऊँचा और कौन नीचा, कौन पुरुष और कौन स्त्री ? सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ परमात्मा की उपस्थति न हों | सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में एक परमात्मा के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं | ऐसे में कौन किससे घृणा करे और क्यों करे ? संसार में सभी से प्रेम करना ही परमात्मा की भक्ति है |
        प्रश्न उठता है कि मतंग के स्थान पर अन्य कोई ऋषि होता तो क्या शबरी के साथ वे भी प्रेम का व्यवहार करते ? नीच जाति की और वह भी महिला होना, अन्य ऋषियों के अनुसार ऐसे व्यक्ति से बात तक करना उचित नहीं है। फिर मतंग ऋषि ने शबरी के साथ विपरीत व्यवहार क्यों कर किया ? इसके लिए हमें मतंग के बाल्य काल को जानना होगा।
    मतंग को बचपन से अपने साथियों से उपहास का भाजन बनना पड़ता था।मतंग उसका कारण जानना चाहते थे।एक दिन जंगल में उदास बैठे थे, तब एक गर्दभी से उनका संवाद हुआ। उस गर्दभी ने बताया कि आपका पालन पोषण  ब्राह्मण दम्पति ने किया अवश्य है परंतु आप उस ब्राह्मणी के पति की संतान न होकर एक नाई के पुत्र हैं। ब्राह्मणी ने मेरे समक्ष ही नाई से संसर्ग किया था इसलिए मैं यह बात जानती हूँ। आपको अपने से निम्न स्तर का मानकर ही अन्य ब्राह्मण पुत्र आपकी उपेक्षा करते हैं।
     सब कुछ जानकर मतंग ने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए तप किया।तप से वे ब्राह्मण बने और फिर ऋषि। ऋषि मतंग अपने बाल्यकाल की बात भूले नहीं थे, इसीलिये उन्होंने शबरी के साथ प्रेम का व्यवहार किया। मतंग जानते थे कि किस कुल में और कहाँ जन्म लेना है, यह व्यक्ति के हाथ में नहीं है। उन्होंने शबरी की सेवा भाव और प्रेम को देखा, जाति को नहीं।
        मतंग ऋषि प्रतिदिन अपने शिष्यों से राम-कथा कहते | उनके साथ शबरी भी बड़े मनोयोग से वह कथा सुनती | राम-कथा के प्रति शबरी की रुचि देखकर मतंग ऋषि ने दया कर उसको राम नाम की दीक्षा दी | उन्होंने कहा कि दिन-रात राम नाम का जाप करती रहो, यह नाम अतिदिव्य है | अपने गुरु के आदेश को शिरोधार्य करते हुए शबरी निरंतर राम नाम का जप करने लगी |
           एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में शबरी ऋषियों के स्नान के लिए पम्पा सरोवर की ओर जाने वाले मार्ग को बुहार रही थी | घुप्प अँधेरा था | उसी समय एक ऋषि गोदावरी स्नान को जा रहे थे कि उनका पैर शबरी की बुहारी से, उसकी झाड़ू से स्पर्श कर गया | ऋषि क्रोधित हो गए | उन्होंने शबरी को विविध प्रकार से प्रताड़ित किया | जब वे ऋषि पम्पा सरोवर पहुंचे तो देखते हैं कि सरोवर का जल रक्ताभ हो गया है और उसमे कीड़े कुलबुला रहे हैं | सभी ने ऋषि मतंग को इसका दोष दिया कि उन्होंने एक भीलनी को अपने आश्रम में आश्रय दे रखा है, उस कारण से ईश्वर कुपित हो गए हैं और उन्होंने इस सरोवर का जल दूषित कर दिया है |
         मतंग ऋषि ने कहा कि मैंने अपने धर्म के अनुरूप ही आचरण किया है | सनातन धर्म की मर्यादा के विरुद्ध कुछ भी नहीं किया है | किसी निराश्रित को आश्रय प्रदान करना हमारा प्रथम धर्म है | शबरी संतों की सेवा में रत थी, अतः इसने भी कोई भूल नहीं की है | अँधेरे के कारण अगर किसी ऋषि का पैर शबरी की झाड़ू से तनिक छू गया तो इसमें भला शबरी का कोई दोष कैसे हो सकता है ?     
           जब तक व्यक्ति के जीवन में सम-भाव और समदर्शिता नहीं आती तब तक अध्यात्म के मार्ग में प्रगति नहीं हो सकती | मनुष्य की कमी है कि वह किसी भी सुनी-सुनाई बात के अनुसार उस पर विश्वास कर लेता है जबकि वास्तव में उस बात के पीछे तथ्य कुछ और ही होता है | कथ्य और तथ्य दोनों में अंतर होता है | कथ्य का निर्माण सतत असत्य से निर्मित धारणा से होता है, जैसे कि ऋषियों ने यह मान लिया था कि एक नीच जाति की स्त्री को मतंग ऋषि ने अपने आश्रम में रखा है, इसलिए सरोवर का जल विकारग्रस्त हुआ है | तथ्य यह है कि शबरी तो ऋषियों की सेवा में रत है, उसका लक्ष्य किसी की राह में बाधा पहुँचाना कभी रहा ही नहीं | कथ्य और तथ्य दोनों से ही परे सत्य यह है कि भगवान् से अपने भक्त की प्रताड़ना सहन नहीं हुई, इसलिए सरोवर का जल दूषित हो गया था |
           मतंग ऋषि का सत्संग शबरी को बहुत वर्षों तक मिला | प्रारब्ध के अनुसार मतंग ऋषि की देह का भी अंतिम समय आ गया | वे ब्रह्मलोक जाने को तैयार थे | मतंग ऋषि के शिष्यों के माध्यम से जब यह बात शबरी तक पहुंची तो वह अपने गुरु से मिलने दौड़ी चली आयी |
              जब शबरी ने मृत्यु शैया पर सोये अपने गुरु को देखा तो वह बहुत भावुक हो गयी और बोली –‘आपके जाने के बाद मेरा क्या होगा ?’ मतंग ऋषि बोले-‘राम नाम का जप करती रहना | मैंने भी बहुत जप किया है | मैं तो इस जन्म में प्रभु श्री राम के दर्शन नहीं कर सका परन्तु तुम सौभाग्य शाली हो | तुम्हें श्री राम के दर्शन अवश्य होंगे | अभी वे चित्रकूट में हैं | एक दिन वे स्वयं चलकर तुम्हारे पास आयेंगे |’
           एक भक्त को भगवान् का दर्शन होगा, इससे अधिक उसे और क्या आश्वासन चाहिए ? आश्वासन भी साधारण सांसारिक व्यक्ति से न मिलकर एक पहुंचे हुए गुरु से मिला है | शबरी सोच रही है, ‘अनन्त कोटि ब्रह्मांड के नायक साक्षात् परमात्मा, श्री राम के रूप में उसकी कुटिया में आयेंगे | मैं तो अनपढ़ हूँ, बेसहारा हूँ, निर्धन हूँ, क्या ऐसे में परमात्मा मेरे घर आ सकते हैं ?’ एक भक्त के लिए इससे अधिक ख़ुशी की बात क्या होगी कि साक्षात् परमात्मा उसके पास स्वयं चलकर आ रहे हैं | सच है, परमात्मा न धन के भूखे हैं न ज्ञान के, परमात्मा तो बस प्रेम के भूखे हैं | भीतर अगर प्रेम हो, परमात्मा के प्रति अनुराग हो तो परमात्मा अपने आपको रोक नहीं सकते | अपने भक्त प्रहलाद के प्रेम ने उन्हें पत्थर से प्रकट होने को विवश कर दिया था | भगवान् को तो अपने भक्त को कृतार्थ करना होता है | जो केवट को कृतार्थ कर सकता है, वह भला भीलनी को कैसे भूल सकता है ?
            मतंग ऋषि तो बहुत कुछ समझाकर भीलनी शबरी को अकेला छोड़कर देवलोक चले गए | शबरी अब प्रतीक्षा कर रही है, जब भगवान् श्री राम उसको दर्शन देंगे | भक्त को भगवान् दर्शन देंगे, इतना आश्वासन ही उसे उत्साहित बनाये रखता है, भले ही इसके लिए कितने ही युग बीत जाये | शबरी जानती है कि परमात्मा के दर्शन बिना अब यह देह छूटने से रही | गुरु का कथन ही सत्य कथन है | शबरी तो परमात्मा की प्रतीक्षा में मतंग वन में बैठी है और दिन रात राम-राम रटती रहती है |
      शबरी कभी-कभी यह सोचकर अत्यंत व्याकुल हो उठती है कि मेरे गुरु का वचन तो एक दिन अवश्य ही सत्य होगा, यह तो मैं जानती हूँ परन्तु मेरा पता श्री राम को कौन बताएगा ? कौन उनको जाकर कहेगा कि तुम्हारी अनन्य भक्त - एक भीलनी, इस घने जंगल में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है ? फिर यह सोचकर धैर्य धारण कर लेती है कि जो घट-घट की बात जानता है, भला उससे मेरा पता भी कभी छिपा रह सकता है ! ऐसा सोचकर फिर से वह दुगुने उत्साह से अपनी कुटिया को आने वाले चारों ओर के सभी रास्ते बुहारने लगती और मन ही मन कहती रहती की मेरे राम जरूर आयेंगे, एक दिन मेरे राम मुझसे मिलने जरूर आयेंगे |
       शबरी इधर मतंग-वन में श्री राम के आने की बाट जोह रही है और उधर भगवान् चित्रकूट में वाल्मीकिजी से विदा लेकर पंचवटी आ गए हैं | पंचवटी में भगवान् की इच्छानुसार छाया रूप जानकीजी की का हरण होता है और दोनों भाई जंगल-जंगल उनको ढूँढने की लीला कर रहे हैं | लीला क्या है, एकदम सत्य सा प्रतीत होता है, मानो एक पति अपनी पत्नी के विरह में मानसिक संतुलन खो चूका है और उसकी खोज में दर दर भटक रहा है | साथ चल रहे छोटे भाई लक्षमण उनको बहुत प्रकार से समझाते हैं परन्तु राम की विरह-वेदना इतनी प्रगाढ़ है कि छूटती नहीं है | रंगमंच का कलाकार इतना ही अधिक मंजा हुआ होना चाहिए कि देखने वाले को उसके अभिनय में सत्यता नज़र आये | आज जब संसार के रंगमंच को रचने वाला स्वयं अभिनय कर रहा है तो फिर उसके सत्य प्रतीत होने में किसी प्रकार की कमी रह जाने का प्रश्न ही नहीं उठता |
            तभी रास्ते में घायल पड़े जटायु से मिलन होता है | प्रभु पूछते हैं-‘जटायु, तुम्हारे साथ यह सब कैसे हुआ ?’ जटायु कहता है – ‘नाथ दसानन यह गति कीन्ही |
तेहिं खल जनकसुता हरि लीन्ही ||’
     वह समस्त घटनाक्रम बतला देता है कि दसानन रावण जनकसुता का अपहरण करके दक्षिण दिशा की ओर ले गया है | भगवान् सब कुछ जानते हैं, सब उनका ही तो करा-धरा है परन्तु सामने भक्त है, उसका सहयोग लेना तो बनता ही है | यही भगवान् की विशेषता है, जानते सब कुछ है फिर भी भक्त की बात को सुनते हैं, समझते हैं और उससे अनुग्रहित भी होते हैं | इसी को परमात्मा की भक्त पर अनुकम्पा होना कहते हैं |
           घायल अवस्था में मरणासन्न पड़े जटायु के जीवन की अभिलाषा भी आज पूरी होती है | उसने अपने जीवन में भगवान् के दर्शन की कामना की थी जो आज जाकर पूरी हुई है | भगवान् श्री राम कहते हैं कि मैं तुम्हें पुनः स्वस्थ और सुन्दर बना दूंगा | पर जटायु कहता है-
     जा कर नाम मरत मुख आवा |
     अधमउ मुकुत होइ श्रुति गावा |
      सो मम लोचन गोचर आगें |
      राखौं देह नाथ केहि खाँगे ||
       मरते समय आपका नाम जिसके मुख में भी आ जाये तो अधम से अधम को भी मुक्ति मिल जाती है, ऐसा श्रुति कहती है | फिर मैं तो बहुत ही सौभाग्यशाली हूँ जो साक्षात् आप मेरी आँखों के सामने खड़े हैं | अब मैं कौन सी कामना मन में रखते हुए इस देह को रखूं ? आप ही बताइए |
        नहीं, नहीं, अब वह इस शरीर को छोड़ देगा क्योंकि जीवन का उद्देश्य, परमात्मा से मिलन का था, वह आज पूरा हो गया है | फिर इस पञ्च-तत्व से निर्मित भौतिक शरीर की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है ? जिस शरीर से परमात्मा का कार्य संपन्न हो जाये, फिर उस शरीर का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है | इसलिए जब तक आपके पास यह स्वस्थ शरीर है, तब तक उससे सभी कर्मों को परमात्मा का कार्य मानते हुए करते रहो, फिर परमात्मा स्वयं आपके द्वार पर चलकर आयेंगे, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | जटायु-प्रसंग हमें यही सन्देश दे रहा है |
            परमात्मा का कार्य करते हुए, परमात्मा की गोद मिले और स्वयं परमात्मा की कृपा-दृष्टि उस पर हो, भला उससे अच्छा किसी के जीवन में क्या हो सकता है ? जटायु ने अपने जीवन की अंतिम साँस ली और भगवान् श्री राम भाव- विह्वल हो उठे | उन्होंने अपने परम भक्त जटायु को परम-गति (सारुप्य-मुक्ति) प्रदान की | स्वयं अपने हाथों से उसके शरीर की अंतिम क्रिया की | धन्य है जटायु का जीवन जिसने इतनी नीच योनि में भी जन्म लेकर परमात्मा को कभी विस्मृत नहीं किया | इधर एक मनुष्य है, जिसको परमात्मा ने सब कुछ दिया है फिर भी उसने परमात्मा को विस्मृत कर रखा है | विषय-भोग में रत मनुष्य से तो वह मांसभक्षी जटायु अच्छा, जिसने परमगति प्राप्त की | शिवजी कथा सुनाते हुए पार्वती को कहते हैं-
     सुनहु उमा ते लोग अभागी |
     हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी ||
           जटायु के अंतिम संस्कार से निवृत होकर भगवान् वन में सीता की खोज कर रहे हैं | मतंग-वन से कुछ पहले ही उन्होने देखा कि वे और अनुज लक्ष्मण, दो विशाल भुजाओं के मध्य धीरे-धीरे फंसते जा रहे हैं | दोनों भुजाएं धीरे-धीरे आपस में एक दूसरे के नजदीक आ रही है और राम-लक्ष्मण उन भुजाओं की पकड़ में आ गए हैं | लक्ष्मण भुजाओं के पाश में जकडे बड़े व्याकुल हो रहे हैं | उन्हें लग रहा है कि शीघ्र ही यह राक्षस उसे अपना भोजन बना लेगा | इस राक्षस का नाम है, कबंध ।
            कबन्ध ने राम-लखन को अपने बाहुपाश में बान्ध रखा है | लक्ष्मण को व्याकुल देखकर श्री राम ने आँखों से संकेत किया और तत्क्षण ही दोनों ने अपनी अपनी तलवारें निकाल ली | एक ही झटके से कबन्ध की दोनों भुजाएं काट डाली गयी | कबन्ध घायल हो जमीन पर गिर पड़ा | उसने भगवान् को प्रणाम किया और अपने पूर्व जन्म-का वृतांत कह सुनाया |
         पूर्व जन्म में कबन्ध एक गन्धर्व था | उसका शरीर अतिसुन्दर था, जिस पर उसे बहुत अभिमान था | एक दिन वह गन्धर्व, कई कन्याओं के साथ गंगा तट पर रमण कर रहा था | गंगा तट पर ही मुनि अष्टावक्र बैठे थे | मुनि का शरीर श्यामवर्ण का था और आठ स्थानों से वक्र भी | मुनि को देखकर उस गन्धर्व ने उनका उपहास किया | सत्य है, चर्म चक्षु केवल चर्म ही देख सकते हैं, हृदय नहीं | चर्म चक्षु से देखने वाला भोग के लिए चहुँ ओर केवल चर्म ही खोजता है | वह यह नहीं जानता कि जिसको वह सुन्दर मान रहा है, वह सुन्दर नहीं है बल्कि सुन्दरता तो कुछ और ही है | शरीर की सुन्दरता को तो एक न एक दिन खो जाना है, फिर भी मनुष्य अपने शरीर सौष्ठव का अहंकार करता फिरता रहता है |स्वामीजी कहा करते थे -
   'है' सो सुन्दर है सदा, 'नहीं' सो सुन्दर नाहीं |
   'नहीं' को प्रकट देखिये, 'है' सो दीखे नाहीं ||
       जो सुन्दर दिखलाई पड़ता है, उस सुन्दरता का एक दिन नष्ट हो जाना निश्चित है | एक परमात्मा ही सुन्दर हैं जिनमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता | जो अजर, अमर और अव्यय है, केवल उसी को सुन्दर कहा जा सकता है | परिवर्तनशील संसार और उस संसार में रमण करने वाला यह शरीर सुन्दर दिखलाई पड़ने के बाद भी सुन्दर नहीं है क्योंकि देखने वाली इन्द्रिय भी तो आखिर इस शरीर का ही एक अंग है | आँखें केवल बाहर देखती है, अतः वह संसार की सुन्दरता पर मुग्ध हो सकती है परन्तु जिसकी दृष्टि दिव्य हो जाती है, वह जीवन में पहली बार अपने भीतर देखता है | तब भीतर बैठे परमात्मा की सुन्दरता उसे मोहित कर लेती है, फिर वह बाहर संसार को देखना बंद कर देता है | 
          गन्धर्व ने जब मुनि अष्टावक्र का उपहास किया तब वे क्षुब्ध हो गए | अष्टावक्र मुनि ने उस गन्धर्व को शाप दिया कि जा, तू राक्षस हो जा | मुनि के शाप से गन्धर्व को बड़ा दुःख हुआ | वह तत्काल ही राक्षस रूप में आ गया | उसने अष्टावक्र जी के चरण पकड़ लिए और शाप से मुक्त होने का उपाय पूछा | तब अष्टावक्र मुनि ने कहा कि जब भगवान् श्री राम अपनी भार्या को जंगल-जंगल ढूंढते फिरेंगे तब वे एक दिन तेरे पास भी आयेंगे | उन्हीं के हाथों तुम्हारा उद्धार होगा |
          प्रत्येक अहंकारी व्यक्ति का एक न एक दिन पतन होना निश्चित है और ऐसा ही उस गन्धर्व के साथ हुआ | उसके द्वारा किये गए एक उपहास ने उसके जीवन को बदल दिया | जिस शरीर और सदा संग रहने वाली जिन सुन्दरियों पर उसे गर्व था, वह सब कुछ एक झटके के साथ लुट चूका था | अब एक भयानक राक्षस के रूप में परमात्मा की प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त उसके सामने अन्य कोई रास्ता नहीं था |
                   कबन्ध के मरने से पहले श्री राम ने उसे सीता-हरण का पूरा वृतांत कह सुनाया और साथ ही सीता को पुनः प्राप्त करने के सम्बन्ध में उससे सहायता मांगी | कबंध ने कहा कि मेरा यह राक्षस शरीर जल जाने के बाद ही मुझे सब कुछ जानने की शक्ति मिल सकती है | शक्ति प्राप्त होने के बाद ही मैं आपको बता सकूंगा कि जनकसुता को प्राप्त करने के लिए आपको क्या करना चाहिए ? तब श्री राम ने उसके शरीर को एक गढ्ढे में डालकर उसका अंतिम संस्कार करने का प्रबंध किया | आज कबन्ध रूप धरे उसी अहंकारी गन्धर्व का कल्याण परमात्मा के हाथों होने जा रहा है |
         चिता के जल उठते ही कबन्ध वहां दिव्य रूप में प्रकट हो गया और उसने बतलाया कि सीता को प्राप्त करने के लिए वैसे तो छः युक्तियाँ है परन्तु आपको ‘समाश्रय’ युक्ति का उपयोग करना चाहिए | आपको ऐसे व्यक्ति को अपना मित्र बनाना होगा जो आपकी तरह ही अपनी पत्नी के वियोग में दुखी हो | व्यक्ति को जब अपने समान ही कोई दूसरा दुखी व्यक्ति मिल जाता है, तब उनकी समस्या का निदान भी शीघ्र ही हो जाता है | दिव्य-रूप धारी कबन्ध कह रहा है कि पास में ही ऐसा एक पुरुष रहता है-सुग्रीव | उसकी पत्नी को उसके भाई (बाली) ने बलात उससे छीन लिया है | वह अभी ऋष्यमूक पर्वत पर अपने सहायकों के साथ रहता है | आप उसके साथ मित्रता कीजिये, वही इस समय आपका एक मात्र और महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध हो सकता है |
             गन्धर्व आगे भगवान् को कह रहा है कि सुग्रीव सूर्य का औरस पुत्र है | वे वानरों के साथ मिलकर आपकी पत्नी का पता अवश्य ही लगा लेंगे | जहां तक सूर्य तपते हैं, वहां तक संसार में कोई भी स्थान ऐसा नहीं है, जो सुग्रीव के लिए अज्ञात हो | दिव्य वेशधारी कबन्ध (गन्धर्व) कहता है कि यहाँ से पश्चिम दिशा की ओर सुखद मार्ग है | आप उस रास्ते से आगे बढिए | आगे मतंग-वन आएगा जहां कभी ऋषि मतंग अपने शिष्यों के साथ रहा करते थे | उस वन में मतंग ऋषि के प्रभाव से हाथी कभी भी आक्रमण नहीं करते हैं | उससे आगे पम्पा सरोवर मिलेगा | उसी सरोवर के पूर्व में ऋष्यमूक पर्वत है, जहाँ सुग्रीव अपने चार साथियों के साथ निवास करते है | इतना कहकर कबन्ध ने अपने धाम जाने की आज्ञा मांगी और तत्काल ही वहां से प्रस्थान कर गया |
            कौन कहता है कि परमात्मा को भक्त का पता नहीं होता ? परमात्मा की सब ओर दृष्टि रहती है | भक्त भले ही सोचता रहे परन्तु भगवान् को सब पता होता है कि कौन भक्त कहाँ है और क्या कर रहा है ? कबन्ध तो एक माध्यम था, रास्ता बतलाने का | जिसने संसार बनाया है, संसार में भ्रमण करने के लिए रास्ते भी तो उसी ने बनाये है | कबन्ध नहीं होता तो भगवान् लीला कैसे करते ? भक्त भी तो भगवान की उसी लीला के पात्र होते हैं | आज भगवान् अपने भक्तों के लिए लीला करते हुए उन्हें आनंदित कर रहे हैं |     
      कबन्ध के अपने धाम प्रस्थान करने के बाद श्री राम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ पश्चिम दिशा की ओर जाने का मार्ग पकड़ लेते हैं | इधर शबरी दिन-रात राम नाम का जप करते करते अपनी कुटिया की ओर आने वाले चारों मार्गों को बुहार रही है | निष्पाप शबरी को पता नहीं है कि उसके राम किस मार्ग से आ रहे हैं ? श्री राम भले ही किसी भी मार्ग से आ जाएँ, उनको सारे मार्ग कंटक रहित मिलेंगे | दिन में प्रभु के लिए फल-फूल तोड़ती और ब्रह्म मूहूर्त में सारे मार्ग साफ करती | प्रभु की प्रतीक्षा में जब रात होने लगती तो सभी फल मतंग ऋषि के शिष्यों में बाँट देती और दूसरे दिन सुबह से फिर यही क्रम प्रारम्भ हो जाता |
                 भगवान् राम धीर-धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे | पम्पा सरोवर के पास तक आ गए | उन्हें देखकर बहुत से ऋषि-मुनि दौड़कर आये | सभी उनसे अपने आश्रम में चलने का आग्रह करने लगे | लेकिन प्रभु तो प्रेम के भूखे हैं | ‘रामहि केवल प्रेम पिआरा’, भला प्रेम का बंधन किसी को क्यों नहीं खींचेगा ? उन ऋषियों ने तो उनकी परम भक्त शबरी का अपमान किया था | ऐसे अहंकारी ऋषियों का आग्रह भला वे कैसे स्वीकार कर सकते थे ? उन्हें तो शबरी से ही मिलना था | प्रभु जाति, रंग और लिंग के आधार पर भेदभाव करने वाले को तनिक भी पसंद नहीं करते |   
         भगवान् तो प्रेम के भूखे होते हैं | द्वापर में दुर्योधन अपने घर में ले जाकर स्वादिष्ट पकवान खिलाना चाहता था परन्तु भगवान् को तो अहंकारी व्यक्ति जरा भी पसंद नहीं है, ऐसे में वे दुर्योधन के घर क्यों कर जाते ? उन्हें तो बस प्रेम से ही वश में किया जा सकता है | उसी प्रेम के कारण वे पहुँच गए थे, विदुर के घर | उस समय अकेली विदुरानी थी वहां | उन्होंने प्रेम के अतिरेक में केले के छिलके तक भगवान् को खिला दिए थे और भगवान् ने प्रेम से खा भी लिए | हस्तिनापुर राजभवन से उसी समय लौटे विदुर, संकेत से विदुरानी को समझाने का प्रयास भी करते हैं परन्तु विदुरानी तो एकटक प्रभु को निहार रही है | उसका ध्यान कहीं दूसरी ओर तनिक सा भी नहीं है |
           ऋषियों के आग्रह की उपेक्षा करते हुए प्रभु धीरे-धीरे आगे बढ़ते गए | अचानक उन्हें शबरी का आश्रम दिखलाई पड़ा | शबरी उसी मार्ग को राम-राम रटते हुए बुहार रही थी | अचानक उसकी दृष्टि प्रभु के चरण कमलों पर पड़ी | समझ गयी कि आज वह पावन दिन आ ही गया है | श्री राम पर दृष्टि पड़ते ही ख़ुशी से पागल हो गयी शबरी | पहले तो बोल रही थी, मेरे राम आयेंगे, मेरे राम आयेंगे और अब उनको देखते ही बोल पड़ी-‘प्रभु आप आ गए !’ प्रश्न भी उसका और उत्तर भी उसका |
         गोस्वामीजी शबरी प्रसंग को अपने शब्दों की धार देते हुए रोचक बनाते हैं और कहते हैं -
      सरसिज लोचन बाहु बिसाला |
      जटा मुकुत सिर उर बनमाला |
      स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई |
      सबरी परी चरन लपटाई ||
      प्रेम मगन मुख बचन न आवा |
     पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ||
       सादर जल लै चरन पखारे |
       पुनि सुन्दर आसन बैठारे ||
           प्रभु श्रीराम का स्वरुप देखकर शबरी भाव विह्वल हो गयी | दोनों भाइयों के चरणों में गिर पड़ी | भाव-वश उसके मुख से बोल नहीं निकल पा रहे थे केवल बार-बार उनके चरणों में नमन करती रही | तुरंत ही कुटिया के भीतर जाकर जल लाई और प्रेम से प्रभु के चरणों को धोया | फिर उन्हें अपनी कुटिया के भीतर ले गयी और कुश के बने सुन्दर आसन पर दोनों भाइयों को बिठाया |
     दोनों भाइयों को सुन्दर आसन पर बिठाकर शबरी उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़ी हो गयी | उसने झुककर दोनों भाइयों को प्रणाम किया | शबरी से कुछ भी बोला नहीं जा रहा है | फिर उसने विधिवत उनका सत्कार किया | कह रही है कि प्रभु आपकी स्तुति कैसे करूँ ? एक तो मैं नीच जाति की, ऊपर से एक नारी और फिर मुझे किसी बात का ज्ञान भी तो नहीं है |
        केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी |
        अधम जाति मैं जड़मति भारी ||
        अधम ते अधम अधम अति नारी |
        तिन्हं महँ मैं मतिमंद अघारी || 
            भगवान् ने शबरी पर कृपा दृष्टि डाली | आज शबरी के गुरु मतंग का कहा सत्य सिद्ध हो रहा है | शबरी जानती है कि उसकी तपस्या आज फलीभूत हुई है | शबरी ने  जो भी फूल उसने अपने हाथों से चुने थे, उन पुष्पों से भगवान् की विधिवत पूजा की और फिर फलों को चख चख कर बड़े प्रेम से दोनों भाइयों को खिलाया | भगवान् भी डबडबाई आँखों से भक्त को देखते हुए बड़े प्रेम से फल खा रहे हैं | आज भगवान् अपने भक्त के जूठे फल खा रहे है | उनको भान ही नहीं रहा कि वे जंगल में बनी एक कुटिया में शबरी के फल खा रहे हैं अथवा अपनी माता कौशल्या के हाथों से भोजन कर रहे हैं | सब भेद मिट गया है आज | वाह प्रभु, कैसी लीला है आपकी ? जब लिखने वाला आपकी लीला का वर्णन कर मुग्ध हो रहा है तो उस भक्त भीलनी की दशा का वर्णन शब्दों के माध्यम से किया ही कैसे जा सकता है ?  
            प्रेम एक न एक दिन फलीभूत अवश्य ही होता है | प्रेम के बारे में जब चर्चाएँ होती है तब प्रायः लोग प्रेम का प्रतिशत बताने लगते हैं | प्रेम न तो कुछ-कुछ होता है और न ही लगभग | नहीं, प्रेम कभी आधा-अधूरा नहीं होता, होता है तो पूरा का पूरा होता है | फिर भी अगर कुछ अधूरा है भी, तो वह कुछ और हो सकता है, प्रेम नहीं हो सकता | प्रेम तो शत प्रतिशत होता है अन्यथा होता ही नहीं है |
            प्रेम के कारण भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने थे | प्रेम के कारण गोपियाँ कृष्ण के विरह में पागल हो जाती थी | इसी प्रेम और विरह पर श्रीमद्भागवत् महापुराण में वेद व्यासजी ने पूरा एक अध्याय (10/30) लिख डाला है | गोपियों के प्रेम के वशीभूत होकर बाल कृष्ण नाचने लगते हैं | तभी तो रसखान जैसे कवि कह उठते हैं – ‘ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं |’ मिट्टी की एक छोटी सी हंडिया में दूध भी नहीं, मक्खन भी नहीं, केवल छाछ | क्या एक हंडिया भर छाछ मिलने की आशा से परमात्मा नाच सकता है ? नहीं, यहाँ महत्त्व छाछ का नहीं है | महत्त्व है गोपियों के प्रेम का | प्रेम जब पूर्णता ले लेता है तब भगवान् को भी भक्त के सामने नाचना पड़ता है | नाचने का अर्थ नृत्य करने से नहीं है, बल्कि भक्त की इच्छानुसार भगवान् का चलना और करना है |
           शबरी प्रेमाभक्ति की मूर्ति है | भगवान् के नाम से प्रेम किया, उसने ऋषि-मुनियों की सेवा करते हुए तपस्या की, उसका परिणाम परमात्मा के दर्शन से अधिक और क्या हो सकता है ? एक परमात्मा को पा लेने से अधिक इस भौतिक संसार में अन्य कुछ है भी नहीं | शबरी आज धन्य हो गयी |
          शबरी से भगवान् श्री राम कह रहे हैं - ‘पुरुष और स्त्री का भेद, जाति, नाम, और आश्रम-ये कोई मेरे भजन के कारण नहीं है | मेरे दर्शन का कारण तो एक मात्र मेरी भक्ति ही है | जो मेरी भक्ति से विमुख है; वे यज्ञ, दान, तप अथवा वेदाध्ययन आदि किसी भी कर्म से मुझे नहीं देख सकते | इसलिए हे भामिनी ! मैं संक्षेप में अपनी भक्ति के साधनों का वर्णन करता हूँ |’ इस प्रकार परमात्मा श्री राम अब शबरी के सामने नवधा-भक्ति का वर्णन करते हैं |
        वे कहते हैं –‘प्रथम भगति संतन्ह कर संगा |’ अर्थात भक्ति का प्रथम साधन है संतों का संग | “सतां संगतिरेवात्र साधनं प्रथमं स्मृतम्” (अ.रा.3/10/22) | संग का बहुत महत्त्व है, जैसी संगति होगी वैसा ही परिणाम मिलता है | संतों का संग करने से सत तक पहुंचा जा सकता है | ‘सठ सुधरहि सत्संगति पाई | पारस परस कुधातु सहाई ||’ दुष्ट व्यक्ति भी अच्छे संग में रहे तो उसमें भी सुधार दृष्टिगोचर होने लगता है | पारस पत्थर के संपर्क में आने से लोहा भी सोना बन जाता है |  
            भक्ति का दूसरा दूसरा साधन है-‘द्वितीयं मत्कथालापः’ यानि मेरे जन्म-कर्मों की कथा का कीर्तन करना अर्थात ‘दूसरि रति मम कथा प्रसंगा’ | भगवान् की कथा लगातार सुनने से परमात्मा के प्रति प्रेम जाग्रत हो जाता है | भगवत-कथा व्यक्ति का ध्यान संसार से हटाकर परमत्मा की ओर कर देती है | कथा सुनने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे मन को शांति मिलती है | कथा श्रवण का आनंद लेने के लिए मन को कथा में लगाना आवश्यक है | जो मनोयोग से कथा नहीं सुनता उसको उस कथा का कोई भी लाभ नहीं मिलता |
       भक्ति का तीसरा साधन है – ‘तृतीयं मद्गुणेरणम्’ अर्थात मेरे गुणों की चर्चा करना | परमात्मा के गुणों की चर्चा करने से तात्पर्य है-परमात्मा की स्तुति करना | गुणों की प्रशंसा करने से परमात्मा के गुण व्यक्ति में भी धीरे-धीरे आने लगते हैं | भागवत में एक अध्याय ‘गोपिका-गीत’ (10/31) है | शरद पूर्णिमा की रात रास-लीला की अवधि में अचानक श्री कृष्ण अंतर्ध्यान हो जाते हैं | तब गोपियाँ उनके विरह में भगवान् के गुणों का गान करती है | अंतत परमात्मा उन सबके मध्य प्रकट होकर उन्हें सांत्वना देते है और उनके साथ महारास (भागवत-10/32-33) की रचना करते हैं।
            भक्ति का चतुर्थ साधन है – ‘व्याख्यातृत्वं चतुर्थं साधनं भवेत्’ अर्थात मेरे वाक्यों की व्याख्या करना | ‘आचार्योपासनं भद्रे मद्बुद्ध्यामायया सदा’ अर्थात अपने गुरुदेव की निष्कपट होकर भगवद्बुद्धि से सेवा करना भक्ति का पांचवां साधन है | ‘पुण्यशीलत्वं यम- नियमादि च | निष्ठा मत्पूजने नित्यं षष्ठं साधनम्’ अर्थात पवित्र स्वभाव, यम-नियमादि का पालन और मेरी पूजा में सदा प्रेम होना, भक्ति का छठा साधन है | ‘मम मन्त्रोपासकत्वं सांगं सप्तमुच्यते’-सातवाँ भक्ति का साधन है-मेरे मन्त्रों की सांगोपांग उपासना करना | भक्ति के अंतिम दो साधन बताते हुए श्री राम शबरी को कहते हैं-
       ‘मद्भक्तेषवधिका पूजा सर्वभूतेषु मन्मतिः |
       बह्यार्थेषु विरागित्वं शमादिसहितं तथा ||
       अष्टमं नवमं तत्वविचारो मम भामिनी |
       एवं नवविधा भक्तिः साधनं यस्य कस्य वा ||अ.रा.-3/10/26-27||
      मेरे भक्तों की मेरे से अधिक पूजा करना, समस्त प्राणियों में मेरी भावना करना, बाह्य पदार्थों में वैराग्य करना और शम-दमादि संपन्न होना-यह मेरी भक्ति का आठवां साधन है | नवां साधन है- तत्व विचार करना | हे भामिनी ! इस प्रकार यह नौ प्रकार की भक्ति है |
          इस प्रकार भक्ति के नौ साधन बताकर भगवान् कहते हैं कि इनमें से एक भी भक्ति किसी में भी हो उसको मेरे स्वरुप का अनुभव हो जाता है | श्री रामचरितमानस में गोस्वामीजी भी लगभग इन्हीं नौ साधनों का वर्णन करते हैं | प्रथम भक्ति- संतों का संग | दूसरी भक्ति – मेरी कथा श्रवण में रुचि | तीसरी भक्ति –गुरु के चरणों की सेवा | चौथी भक्ति – मेरे गुणों का गान | पांचवीं भक्ति – मन्त्रों का जाप और परमात्मा में विश्वास | छठी भक्ति – क्षमा, दम, शील आदि का पालन | सातवीं भक्ति – प्रभु के समान ही समस्त जग को देखना | संतों को मुझसे अधिक मानना | आठवीं भक्ति – संतोष धारण करना | दूसरे में दोष न देखना | नवीं भक्ति – सभी प्रकार के कपट से दूर रहना और मेरे में पूर्ण विश्वास रखना |
           भक्ति के साधनों में से किसी भी एक साधन का जीवन में उपयोग करेंगे तो स्वतः ही शेष सभी साधन आपको मिल जायेंगे | जो व्यक्ति भक्ति मार्ग पर अग्रसर होता है उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं रह जाता है | आवश्यकता है, संसार से विमुख होकर परमात्मा के सम्मुख होने की | 
          इसके बाद भगवान् श्री राम शबरी से सीता के बारे में पूछते हैं | शबरी कहती है – ‘नाथ ! आप तो सर्वज्ञ हैं | मैं आपको क्या बता सकती हूँ ? भगवान् का अपने भक्त के प्रति प्रेम देखिये, सब कुछ पहले से जानते हुए भी फिर एक भक्त से ही सहायता चाह रहे हैं | वहां चित्रकूट में वाल्मीकिजी से अपने रहने का स्थान पूछ रहे थे और यहाँ शबरी से सीता का पता पूछ रहे हैं |
       शबरी भी भगवान् का मान रखती है | वह बतलाती है कि सीताजी को रावण हर कर ले गया है | यहाँ पास में ही पम्पा सरोवर है | वहां ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव रहते है | आप उनके साथ मित्रता कीजिये | वे आपका सभी प्रकार से सहयोग करेंगे |” इसके बाद शबरी ने प्राण त्यागने की इच्छा प्रकट की | राम ने पूछा – ‘तुम्हारी कोई इच्छा है तो बताओ | शबरी बोली – ‘नाथ ! इस पम्पा सरोवर का जल विकारयुक्त हो गया है | वह पुनः अपनी पवित्रता को प्राप्त कर ले, ऐसा कोई उपाय करो |’ श्री राम बोले – ‘एक ऋषि ने आपको लात मारी थी, उसी कारण से इस जल में विकार आ गया है | तुम इसमें स्नान करोगी तभी यह सरोवर पुनः शुद्ध हो पायेगा |’ 
          भगवान् की लीला तो देखो, अपनी महिमा बताने के स्थान पर अपने भक्त की महिमा बढा रहे हैं | सीता कहाँ है, वहां तक कैसे पहुंचा जा सकता है ? प्रभु सब जानते हैं फिर भी शबरी को पूछ रहे हैं | गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – ‘निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्’ अर्थात अर्जुन ! तू तो केवल निमित्त मात्र बन जा | कुरुक्षेत्र में महाभारत के ये सब योद्धा तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके है अर्थात इनका मरना तो निश्चित है, तू तो इनको मारने का श्रेय ले ले | पम्पा सरोवर का जल तो पवित्र भगवान् के कारण ही हुआ था परन्तु उन्हें तो इसका श्रेय अपने भक्त को देना है |
         सुग्रीव से मित्रता करने की बात कहकर शबरी ने पम्पा सरोवर में स्नान किया | सरोवर की गरिमा पुनः लौट आई | फिर शबरी ने परमात्मा के दर्शन करते करते योगाग्नि के माध्यम से अपने शरीर से मुक्त हो गई | इस प्रकार शबरी का उद्धार हुआ |
          किं दुर्लभं जगन्नाथे श्रीरामे भक्तवत्सले |
          प्रसन्ने धमजन्मापि शबरी मुक्तिमाप सा ||अ.रा.-3/10/42||
अर्थात भक्तवत्सल जगन्नाथ श्रीराम के प्रसन्न होने पर क्या दुर्लभ है ? अर्थात कुछ भी दुर्लभ नहीं है | देखो, उनकी कृपा से नीच कुल में जन्मी निष्पाप शबरी ने भी मोक्ष प्राप्त कर लिया ।
            शबरी, निम्न वर्ग में पैदा हुई एक साधारण सी महिला जिसने राम शब्द का ‘र’ अक्षर भी ठीक से न पढ़ा होगा, मन में सेवा और प्रेम की भावना से ओतप्रोत लड़की जंगल में अकेली निकल गयी | सेवा और प्रेम ही उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य था | परमात्मा को पाने की कल्पना भी उसने अपने जीवन में कभी नहीं की थी | जहां सेवा और प्रेम हो वहां प्रभु स्वयं रहते हैं |
        मतंग ऋषि का सानिध्य मिलने से और उनके द्वारा मिले राम नाम के गुरु-मन्त्र ने उसे परमात्मा के निकट ला दिया | भगवान् से बड़ा भगवान् का नाम होता है | इसी नाम को सहारा बनाकर शबरी ने संसार सागर को पार कर लिया | राम-नाम की महिमा को उसने प्रत्यक्ष कर दिखाया | गोस्वामीजी शबरी के बारे में मानस में लिखते हैं -
           जाति हीन अघ जन्म महि,
           मुक्त कीन्हि असि नारि |
           महामंद मन सुख चहसि,
           ऐसे प्रभुहि बिसारि ||मानस-3/36||
       जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी,ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन ! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है ?
          शबरी के जीवन से प्रेरणा लें और प्रभु को सेवा और प्रेम के माध्यम से प्राप्त करने का प्रयास करें | परमात्मा को कभी भी भूले नहीं | दिन रात प्रभु का स्मरण करते रहें और कहते रहें, ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !! मैं आपको भूलूँ नहीं |’
प्रस्तुति-डॉ.प्रकाश काछवाल
|| हरिः शरणम् ||

  

Wednesday, February 16, 2022

प्रगट भई तपपुंज सही-शंका समाधान

 प्रगत भई तपपुंज सही – शंका समाधान  

       अहल्या  के इस विवेचन पर पाठकों ने जितनी प्रतिक्रियाएं दी हैं, उतनी आज तक किसी विवेचन पर नहीं मिली | यह पाठकों के जागरूक होने का संकेत है | बहुत से प्रश्न मिले हैं, उनमें उठी शंकाओं का समाधान करने का प्रयास कर रहा हूँ |

     अहल्या ने छद्म वेशधारी इन्द्र को पहचानने के पश्चात् भले ही जानबूझकर अथवा अनजाने में उसके प्रणय निवेदन को स्वीकार किया हो, कुछ अपराध तो अहल्या का बनता ही है | वह जानती थी कि ऋषि गौत्तम कभी भी असमय (ब्रह्म मुहूर्त में) प्रणय निवेदन नहीं कर सकते फिर भी उसने ऋषि गौत्तम का वेश धरे इन्द्र का आग्रह स्वीकार कर लिया | इसी कारण से उसे अपने पति का कोपभाजन होना पड़ा | इसके परिणाम स्वरूप वह परित्यक्ता हो गयी और एक युग तक उसे  जीवन में जड़वत होकर रहना पड़ा | जड़वत होकर भी उसने अपने अपराध से मुक्त होने के लिए साधना की जो उसे परमात्मा तक ले गयी |

       शास्त्रों में अहल्या को कन्या इसलिए कहा गया कि उसने कामवासना के अधीन होकर कोई कर्म नहीं किया | इन्द्र स्वर्ग के राजा थे | घर आये अतिथि का यथोचित्त स्वागत करना इस देश की संस्कृति में है | परन्तु ऋषि का वेश धरे इंद्र का ऐसा सत्कार करना उसे शापित होने की सीमा तक ले जायेगा, शायद इसका भान अहल्या को नहीं रहा होगा |

       चन्द्र देव पर गौत्तम ऋषि के कमंडल की चोट से लगा दाग प्रतीकात्मक है | जो भी व्यक्ति किसी दुष्कर्म में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से सहयोगी होता है, उसके चरित्र पर दाग लगना निश्चित है | यही चन्द्रमा के साथ हुआ है | पूर्णिमा के चाँद का सौन्दर्य इस दाग के कारण कुछ फीका अवश्य ही पड़ जाता है और ऊपर से कभी कभी उस पर लगने वाला ग्रहण भी उसके तेज को कम कर देता है |

         अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि किसी की दृष्टि में अगर अहल्या पापी भी है तो वह परमात्मा की साधना और भजन के कारण मुक्त होने की अधिकारी है | गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है –

   अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |

  साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ||9/30||

यदि कोई दुराचारी से दुराचारी भी अनन्यभाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधू ही मानने योग्य है क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है |

   पौराणिक कथाओं पर प्रश्न उठते ही रहते हैं। उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने से महत्वपूर्ण है, इन कथाओं के भाव को ग्रहण करना, जिनके लिए इनकी रचना की गई है।इसलिए इन कथाओं में छिपे संदेश को पकड़ें अन्य अतिशयोक्तियों पर अधिक ध्यान न दें।

कल से नयी श्रृंखला - भक्त शबरी पर

प्रस्तुति – डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||


Tuesday, February 15, 2022

प्रगट भई तपपुंज सही

 प्रगट भई तपपुंज सही 

          गत दिनों जब हम बैठे चर्चा कर रहे थे तब एक सज्जन ने कहा कि सनातन धर्म ग्रंथों में नारी के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया है | नारी भले ही कितनी ही पवित्र हो, उसको अपवित्र करने वाले अथवा दुर्वचन कहने वाले पुरुष प्रथमतः तो साफ छूट जाते हैं अथवा फिर उस पुरुष के साथ नारी को भी प्रताड़ित होना पड़ता है | सीता का उदाहरण देते हुए वे कहने लगे कि रावण के यहाँ एक वर्ष तक अकेले रहने पर भी उसके सतीत्व पर किसी प्रकार की आंच नहीं आयी थी, फिर भी लंका युद्ध के बाद उन्हें अग्नि परिक्षा तक देनी पड़ी | अवध के एक धोबी के द्वारा स्वयं के घर में अपनी पत्नी को सीता को उद्घृत कर कुछ दुर्वचन कहे गए थे | उसके कारण जनकसुता को गर्भावस्था में अकेले ही वनगमन के लिए विवश होना पड़ा था जबकि उस धोबी को अपने द्वारा कहे गए दुर्वचनों के लिए कोई सजा नहीं मिली |

          वे बड़े रोष में दिखलाई पड़ रहे थे | उनको समझाते हुए मैंने कहा कि धर्म ग्रंथों में नारी के सम्मान की बात ही कही गयी है | नारी का अपमान करने का मंतव्य किसी भी धर्मग्रन्थ में नहीं है | हाँ, कुछेक मामलों में आपका कहना एक सीमा तक सत्य हो सकता है लेकिन यह पूर्णतः सत्य नहीं है | जब तक हम किसी वृतांत का समग्रता के साथ अध्ययन नहीं कर लेते और यह नहीं जान लेते कि उस बात के पीछे क्या उद्देश्य था, तब तक सनातन धर्म-ग्रंथों के बारे में ऐसी राय बना लेना उचित नहीं है | 

          मैंने सीताहरण से पहले जनकसुता के द्वारा अग्निप्रवेश करने की बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस सीता का अपहरण रावण ने किया था वह वास्तविक सीता न होकर उसकी छाया मात्र थी | लंका युद्ध के बाद श्री राम ने सबके समक्ष छाया सीता को अग्नि में प्रवेश कराकर वास्तविक सीता को पुनः प्रकट किया गया था | रही बात अयोध्या के धोबी की, तो भगवान् श्रीराम अपनी प्रजा का पालन करने वाले राजा थे और एक राजा का कर्तव्य होता है कि वह प्रजा के हित का ध्यान रखे और साथ ही उसे संतुष्ट भी रखे | धोबी के द्वारा अपनी पत्नी को सीता को इंगित करते हुए कहे गए वचन भगवान् ने सुन लिए थे | धोबी नहीं जानता था कि वास्तविक सीता रावण के यहाँ कभी गयी ही नहीं थी | फिर भी राम ने प्रजा को संतुष्ट करने के लिए सीता का त्याग करना उचित समझा, क्योंकि एक राजा का यही धर्म होता है कि वह प्रजा को निःस्वार्थ भाव से उचित आचरण करते हुए उदाहरण प्रस्तुत करे |

           परन्तु वे सज्जन तो आज कुछ अलग ही सोचकर आये थे | आगे फिर अहिल्या का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उसके सतीत्व भंग के लिए केवल इंद्र दोषी थे, अहिल्या का इसमें कोई दोष नहीं था, फिर भी इंद्र की करतूत का दंड उसके साथ-साथ अहिल्या को भी भोगना पड़ा | ऋषि गौत्तम के श्राप के कारण बेचारी अबला को सूने आश्रम में जडवत होकर कई वर्षों तक रहना पड़ा | मैंने उनको यथासंभव स्पष्ट करते हुए संतुष्ट करने का प्रयास किया परन्तु वे तो जैसे न समझने की शपथ ही लेकर आए थे | खैर, उनके साथ हुए वार्तालाप ने मुझे अहिल्या के बारे में कुछ लिखने को प्रेरित अवश्य कर दिया |   

           रामायण में मुझे केवट-चरित्र के बाद जिसने प्रभावित किया है, वह है शबरी-चरित्र | शबरी के बाद अगर कोई महत्वपूर्ण नारी-चरित्र रामायण में है तो वह अहिल्या-चरित्र है | वैसे अहिल्या का सही नाम अहल्या है जिसका अर्थ है अजोत भूमि अर्थात वह भूमि जो जोती न जा सके या जिसको जोतना कठिन हो | देखा जाये तो रामायण में शबरी, अहिल्या के अतिरिक्त तारा (बाली की पत्नी) और मंदोदरी (रावण की पत्नी), इन दो नारियों के चरित्र भी बड़े प्रभावशाली है | परन्तु आज बात करते हैं, अहिल्या की |

      ब्रह्मपुराण में लिखा है –

       अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा |

       पंचकन्या: स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम् ||ब्रह्मपुराण-3/7/219 ||

     अहिल्या, तारा, मंदोदरी के अतिरिक्त कुंती और द्रौपदी को भी प्रातः स्मरणीय बताया गया है | इनके स्मरण मात्र से ही सभी महापाप नष्ट हो जाते हैं | इन्हें कन्यायें इसलिए बतलाया गया है कि इन्होने कामवासना के अधीन होकर अपने जीवन में कभी भी कोई कार्य नहीं किया था | सभी पतिपरायाणा थी और परमात्मा से उनका अतुलनीय प्रेम था | मंदोदरी भले ही रावण की पत्नी रही हो परन्तु वे जानती थी कि जिस राम से द्वेषभाव उसके पति रख रहे हैं, वे स्वयं परमब्रह्म हैं |  

           तारा अपने पति बाली के वध से क्षुब्ध होकर कुछ समय के लिए विचलित अवश्य हुई थी | इस उद्वेग में उसने श्रीराम को दो श्राप दे डाले थे | पहला श्राप था कि आपने मुझे अपने पति से अलग कर दिया है, अतः इस जीवन में आपकी पत्नी भी भविष्य में आपके साथ न रह सकेगी | इसी श्राप के कारण धोबी के द्वारा कहे गए वचनों के आधार पर श्रीराम को अपनी पत्नी सीता का त्याग करना पड़ा था | दूसरा श्राप तारा ने दिया कि जिस प्रकार छिपकर आपने मेरे पति को बाण से मारा है उसी प्रकार अगले जन्म में आपकी मृत्यु भी किसी के द्वारा छिपकर चलाये गए बाण से होगी | द्वापर के अंत में भगवान् श्रीकृष्ण की मृत्यु भी बाली के द्वारा बहेलिये के रूप में पुनः जन्म लेकर, छिपकर चलाये गए बाण से हुयी थी |  

           श्राप देने के बाद भगवान् श्रीराम के द्वारा प्रदत्त ज्ञान ने तारा की आँखें खोल दी थी | तारा और मंदोदरी रामायण के ही दो पात्र हैं | द्रौपदी और कुंती महाभारत के दो पात्र हैं, उनकी बात फिर कभी | आज अहिल्या के बारे में चिंतन करते हैं | 

       अहिल्या ब्रह्माजी की मानस पुत्री थी | बहुत ही सुन्दर कन्या थी, अहिल्या | जब वह युवा हुयी तब ब्रह्माजी ने उनके लिए उचित वर ढूँढने के लिए एक योग्यता आवश्यक कर दी | वह आवश्यक योग्यता थी कि जो कोई सबसे पहले त्रिलोकी की परिक्रमा पूरी कर लौटेगा उसके साथ ही अहिल्या का विवाह संपन्न कर दिया जायेगा |  

          स्वर्ग का राजा इन्द्र अहिल्या की सुन्दरता पर पहले ही मुग्ध था | उसकी आसक्ति अहिल्या के प्रति इतनी अधिक थी कि वह किसी भी प्रकार उनको प्राप्त करना चाहता था | स्वर्ग लोक भोग का स्थान है | वहां सुख ही सुख है, दुःख लेशमात्र भी नहीं है | इतना सब होते हुए भी मुक्ति/मोक्ष नहीं है | भोग पूरे हो जाने के बाद सभी को फिर से इसी संसार में लौटना पड़ता है |

             स्वर्ग में किसी भी प्रकार के भोग की कोई कमी नहीं है | फिर भी इन्द्र काम-भोग से संतुष्ट नहीं है | सत्य है, आज तक भोगों से कोई संतुष्ट नहीं हुआ है | भोग भोगते भोगते अंततः एक दिन यह शरीर ही भोग बन जाता है परन्तु हम हैं कि जीवन भर विभिन्न भोगों के पीछे भागते रहते हैं | भोगों की अग्नि भोग भोगने से और अधिक प्रज्वलित हो जाती है और नए-नए भोगों की मांग करने लगती है | देवताओं के राजा इन्द्र भी हमसे भिन्न नहीं है |   

          अहिल्या के प्रति आसक्त इन्द्र ने सबसे पहले पृथ्वी त्रिलोकी का चक्कर लगाने के लिए बड़ी तेज दौड़ लगाई | साथ में कई अन्य देवता भी दौड़ रहे थे परन्तु दौड़ पूरी करने में एक मात्र इन्द्र ही सफल हुए | ब्रह्माजी, अहिल्या का विवाह इन्द्र के साथ निश्चित करने ही वाले थे कि नारायण-नारायण करते नारद मुनि वहां पहुँच गए |

              नारदजी भी ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं | उन्होंने आते ही कहा कि ‘पिताजी, तीनों लोकों की परिक्रमा तो सबसे पहले महर्षि गौत्तम ने सम्पूर्ण की है इसलिए आप द्वारा रखी गयी आवश्यक योग्यता उन्होंने इन्द्र से पहले ही अर्जित कर ली है | अतः अहिल्या का विवाह गौत्तमजी के साथ ही होना चाहिए |’ ब्रह्माजी ने पूछा कि ‘ऋषि गौत्तम तो यहाँ आये ही नहीं फिर वे कब त्रिलोकी की परिक्रमा को गए थे ?’ नारदजी ने उत्तर दिया कि ‘उनके आश्रम में एक गाय ने बछड़े को जन्म दिया था और गौत्तम ऋषि उस समय प्रतिदिन की तरह उस गाय की परिक्रमा कर रहे थे | प्रसव करती गाय की परिक्रमा करना तीनों लोकों की परिक्रमा करने के समकक्ष है | प्रसव करती गाय की परिक्रमा ऋषि गौत्तम ने इन्द्र के द्वारा त्रिलोकी की परिक्रमा पूरी करने से पहले ही पूरी कर ली है | अतः अहिल्या का विवाह ऋषि गौत्तम के साथ ही होना चाहिए |’  

          नारदजी की बात ब्रह्माजी को उचित और न्यायसंगत जान पड़ी । उन्होंने ऋषि गौत्तम के साथ अहिल्या का विवाह करने का  निश्चय कर लिया | उचित अवसर पर अहिल्या का विवाह अत्रि के पुत्र ऋषि गौत्तम के साथ कर दिया गया | विवाह उपरांत ऋषि अपनी पत्नी को लेकर आश्रम में चले आये | अहिल्या विवाह के उपरांत अपने पति की सेवा बड़े मनोयोग से करने लगी |

           अहिल्या का विवाह ऋषि गौत्तम के साथ हो जाने का सुनकर इन्द्र को बहुत बुरा लगा | उसने मन ही मन ठान लिया कि वह अहिल्या को किसी भी प्रकार प्राप्त करके ही रहेगा | कामांध व्यक्ति कभी भी किसी बात का भला-बुरा नहीं सोचता | इसी कारण से उस व्यक्ति का एक न एक दिन पतन होना निश्चित है परन्तु यह बात किसी भी कामी के आज तक समझ में नहीं आई है | गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि काम में बाधा पड़ने से क्रोध पैदा होता है | क्रोध से सम्मोह (मूढभाव) पैदा होता है, सम्मोह से स्मृतिभ्रम और स्मृतिभ्रम से बुद्धि का नाश हो जाता है | बुद्धि का नाश होने से मनुष्य पतन को प्राप्त होता है |(2/62-63)।ऐसा ही अब इंद्र के साथ होने जा रहा है। 

          बात उस समय की है जब आज के दरभंगा (बिहार) जिले में गंगा नदी से कुछ ही दूरी पर ऋषि गौत्तम का आश्रम था | ऋषि अपनी पत्नी अहिल्या के साथ वहां एक कुटिया में निवास करते थे | एक दिन इन्द्रदेव ने चन्द्रमा को अपने साथ लिया और पृथ्वी के भ्रमण पर निकल पड़े | ऋषि गौत्तम का आश्रम देखकर उसके भीतर उपस्थित अहिल्या का स्मरण कर उनके मन में काम-वासना जाग उठी | अहिल्या की सुन्दरता पर इन्द्रदेव पहले से ही मुग्ध थे | आज उनको अवसर मिल ही गया | वे अपनी काम-वासना पूरी करने के लिए अहिल्या के पास जाने की युक्ति लगाने लगे | आश्रम के पास आकर उन्होंने देखा कि आश्रम में अहिल्या के साथ तो गौत्तम ऋषि भी शयन कर रहे हैं | तब गौत्तम ऋषि को कुटिया से बाहर भेजने के लिए इन्द्र ने चन्द्रमा के साथ मिलकर एक चाल चली |

          इन्द्र अपनी माया से चन्द्रमा को मुर्गा बनाकर उनसे ऋषि गौत्तम को भोर होने की सूचना देने के लिए बांग दिलाई | ऋषि गौत्तम समझे कि ब्रह्म-मुहूर्त हो गया है | वे प्रतिदिन ब्रह्म-मुहूर्त में गंगा-स्नान करने जाया करते थे | भोर होने वाली है, यह जानकर वे उठे, पृथ्वी को प्रणाम किया और गंगा-स्नान के लिए चल दिए | काम-वासना पूर्ति हेतु उचित अवसर जानकर इन्द्रदेव ने गौत्तम ऋषि का वेश धारण किया और आश्रम में प्रवेश कर गए | चंद्रदेव बाहर खड़े होकर पहरा देने लगे ।  

           इधर कुटिया में ऋषि गौत्तम के रूप में इन्द्र ने अहिल्या को अपनी काम-वासना शांत करने के लिए तैयार कर लिया और उधर ऋषि गौतम गंगा के तट पर पहुँच गए | स्नान करने के लिए ज्योंही वे गंगा की धारा में प्रवेश करने लगे कि मां गंगा प्रकट हो गयी | उन्होंने ऋषि को बताया कि अभी ब्रह्म-मुहूर्त में बहुत समय शेष है | इस समय अर्धरात्रि में स्नान करना वर्जित है | गंगा मां ने बताया कि अहिल्या का सतीत्व भंग करने के लिए इद्रदेव ने यह मायावी चाल चली है | इतना सुनते ही ऋषि के तन-बदन में आग लग गयी | वे क्रोधित होते हुए अपनी कुटिया पर लौटे |

          कुटिया के बाहर चंद्रदेव पहरेदारी कर रहे थे | चंद्रदेव पर दृष्टि पड़ते ही ऋषि ने उसको अपना कमंडल फैंक मारा और शाप दिया कि तुम्हारे ऊपर राहू की सदैव कुदृष्टि रहेगी और अवसर मिलते ही कुछ समय के लिए तुम्हें ग्रस लेगा | पूर्णिमा के दिन होने वाला चंद्रग्रहण उस शाप का ही परिणाम है | कहा जाता है कि चन्द्रमा पर जो दाग दिखलाई पड़ता है, वह दाग ऋषि गौत्तम के द्वारा फैंक कर मारे गए कमंडल की चोट का निशान है | हालाँकि आज विज्ञान ने चंद्रग्रहण का और चन्द्रमा में होने वाले दाग का रहस्य जान लिया है परन्तु एक कथा अगर अपने अन्दर कोई महत्वपूर्ण सन्देश छिपाए हुए है तो कोई भी अतिशयोक्ति स्वीकार्य है |

         इधर इन्द्रदेव को कुटिया के भीतर जब ऋषि गौत्तम की आवाज़ सुनाई दी तो वे बाहर निकलने को दौड़ पड़े | बाहर निकलते समय इन्द्रदेव अपने वास्तविक स्वरुप में आ गये | गौतम ऋषि के वेश में स्वयं इन्द्र थे, यह जानकर अहिल्या अपने पति ऋषि गौत्तम के संभावित क्रोध की कल्पना कर सिहर उठी | दुम दबाकर भागते इन्द्र को गौत्तम ऋषि ने नपुंसक होने का श्राप दे डाला | साथ ही कहा कि आज से न तो कोई इन्द्र को सम्मान की दृष्टि से देखेगा और न ही इसकी कोई पूजा करेगा |

       गौत्तम ऋषि ने जब कुटिया के भीतर प्रवेश किया तो देखा कि सामने खड़ी अहिल्या भय के मारे थर-थर कांप रही है | वह हाथ जोड़े अपने पति से क्षमा याचना का भाव लिए खड़ी है और बार-बार अपने निर्दोष होने का स्पष्टीकरण दे रही है | परन्तु क्रोधित ऋषि ने उसकी प्रत्येक बात को अनसुना कर दिया | क्रोध में व्यक्ति को मूढ़ता घेर लेती है | मूढ़ता से स्मृति भ्रम हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाता है | बुद्धि का नाश होने पर उस व्यक्ति का पतन होना निश्चित है | क्रोधित गौत्तम ऋषि ने अपनी पत्नी को कहा कि “मेरे साथ रहते हुए तुम्हें इतने वर्ष हो गए हैं | क्या तुम मेरे स्पर्श को अभी तक भी नहीं पहचान सकी ? हाँ, मेरे स्पर्श को नहीं पहिचानती तभी तो तू छद्म वेशधारी इन्द्र के स्पर्श को भी न पहिचान सकी | कहीं न कहीं तुम्हारे मन में भी कुछ खोट अवश्य था | इस जगत में केवल जड़ को ही स्पर्शादि इन्द्रियों का ज्ञान नहीं होता इसलिए जा, जडवत हो जा और एक शिला की तरह इस कुटिया के कोने में पड़ी रह |” 

          इस प्रकार ऋषि गौत्तम ने अपने तीनों अपराधियों को श्राप दे डाले | इन्द्र और चन्द्र तो वहां से भाग लिए परन्तु अहिल्या बेचारी भाग कर जाती भी तो कहाँ तक जाती ? अहिल्या ने अपने पति से स्वयं के निष्पाप होने का बार-बार कहा परन्तु एक ब्राह्मण और वह भी तपस्वी ऋषि, उसका दिया हुआ शाप वापिस तो हो नहीं सकता था | 

       क्रोध के कारण ऋषि का तप नष्ट हो चुका था। फिर से तप करने के लिए हिमालय की ओर निकलने से पहले ऋषि ने अपनी पत्नी को इस शाप से मुक्त होने का एक उपाय अवश्य बता दिया | कहा कि त्रेता में जब श्री हरिः दशरथ पुत्र राम के रूप में अवतार लेंगे और विश्वामित्रजी के साथ राक्षसों का वध करते हुए इधर से निकलेंगे तब उनके चरणों की रज से तुम अपने वास्तविक स्वरुप में लौट आओगी | तब तक तुम यहीं पर जड़ बनी तपस्या करती रहो |” इतना कहकर ऋषि गौत्तम आश्रम को छोड़ हिमालय में तप करने निकल पड़े |    

         अहिल्या अपने पति से हुए अलगाव से व्यथित होकर जड़ बन कर रह गयी | ऋषि गौत्तम के श्राप के कारण वह शिला बनकर तपस्या में लीन हो गयी |

            अहिल्या के जडवत होते ही आश्रम प्राणीविहीन हो गया | पशु पक्षी धीरे धीरे आश्रम को छोड़कर चले गए | सूना आश्रम देखकर भय के मारे कोई पथिक भी वहां नहीं रूकता था | एक कामांध पुरुष के कारण सब के साथ-साथ इस आश्रम को भी सजा मिल गयी थी |

      गौत्तम ऋषि के आश्रम को इसी अवस्था में छोड़ तनिक इन्द्र की अवस्था की ओर भी दृष्टिपात कर लेते हैं | ऋषि गौत्तम से नपुंसक होने का शाप मिलते ही इन्द्र के दोनों वृषण (Testes) वहीँ गिर जाते हैं | वाल्मीकिजी रामायण में लिखते हैं –

        गौतमेनैवमुक्तस्य सुरोषेण महात्मना |

        पेततुर्वृषणो भूमौ सहस्राक्षस्य तत्क्षणात् ||बालकाण्ड - 48/28||

    अर्थात रोष से भरे हुए महात्मा गौत्तम के ऐसा कहते ही सहस्राक्ष इन्द्र के दोनों अंडकोष उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़े | इस श्लोक में इन्द्र को सहस्राक्ष अर्थात हजार आँखों वाला बताया गया है |उसे सहस्राक्ष क्यों कहा जाता है, इसको अध्यात्म रामायण में स्पष्ट किया गया है।

      ऋषि गौतम के द्वारा इंद्र को दिए गए शाप का उल्लेख पद्मपुराण और अध्यात्म रामायण में भी मिलता है –

       योनिलम्पट दुष्टात्मन्सहस्रभगवान्भव |

       शप्त्वा तं देवराजानं प्रविश्य स्वाश्रमं द्रुतम् ||अ.रा.-बालकाण्ड-5/26||

     इस श्लोक का अर्थ है कि गौत्तम ऋषि शाप देते हैं कि इन्द्र, तू योनिलम्पट है, इसलिए तेरे शरीरमे एक हजार भग (vulva) हो जायं | ऐसा कहकर ऋषि ने अपने आश्रम में प्रवेश किया |

         दोनों ही ग्रंथों में श्राप का मंतव्य इन्द्र के नपुंसक हो जाने से ही है | आधुनिक विज्ञान के अनुसार किसी पुरुष में उपरोक्त दोनों में से कोई एक प्रकार का भी परिवर्तन हो जाता है तो वह नपुंसक हो जाता है |

       ऋषि के श्राप से तत्काल ही इन्द्र के शरीर पर एक हजार स्त्री-जननांग निकल आये | जिसके कारण उत्पन्न हुई अपनी कुरूपता देखकर उन्होंने ऋषि से इन अंगों को नेत्रों के रूप में बदलने की याचना की | ऋषि द्वारा आग्रह स्वीकार करते ही ये सभी अंग नेत्रों के रूप में बदल गए | इसी कारण से इन्द्र का एक नाम सहस्राक्ष भी है |

        इन्द्र के चाहे दोनों वृषण गिर गए हों अथवा उनके शरीर पर एक हजार भग (vulva) निकल आयी हों, दोनों ही स्थितियों में एक पुरुष नपुंसक हो जाता है | वृषणहीन हो जाने की स्थिति में शरीर में पुरुष-हार्मोन बनना बंद हो जाते है, जिससे पुरुष नपुंसकता को प्राप्त हो जाता है | दूसरी स्थिति में एक ही शरीर में दोनों प्रकार के जननांग हो जाने पर पुरुष और स्त्री दोनों हार्मोंस का आपसी संतुलन बिगड़ जाता है और पुरुष नपुंसक हो जाता है |

      शापित इन्द्र ने अपने लोक में प्रवेश कर देवताओं से कहा कि मैंने आप सबके हित में ऋषि गौत्तम के प्रति अपराध किया है | आप मुझे इस नपुसंकता के शाप से मुक्ति दिलाएं | तब अग्निदेव के सानिध्य में पितृ देवों से प्रार्थना की गयी | पितृ देवताओं ने मेढे के वृषण काटकर इन्द्र के शरीर में यथास्थान लगा दिए और इस प्रकार वे नपुसंकता के शाप से मुक्त हुए | मेढ़े के वृषण लग जाने के कारण इन्द्र का एक नाम मेषवृषण भी है |

        कहा जाता है कि ऋषि गौत्तम ने इतना अधिक तप किया था कि इन्द्रदेव को अपने  सिंहासन पर संकट नज़र आने लगा था | अहिल्या पर वह पहले से ही आसक्त था और इधर ऋषि के तप ने उसकी अपने सिंहासन की सुरक्षा के प्रति चिंता बढा दी थी | अंततः उसने एक तीर से दो शिकार करने की युक्ति निकाली | अहिल्या को भ्रमित कर उसने अपनी काम-वासना शांत की और ऋषि गौतम को क्रोध दिलाकर उनके तप को नष्ट कर दिया | 

       जरा सोचिये, इससे इन्द्र को क्या लाभ हुआ ? सिवाय पतन के अतिरिक्त उसको कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ | सबसे अधिक हानि तो अहिल्या को उठानी पड़ी जो निर्दोष होते हुए भी आश्रम के एक कोने में जडवत होकर इन्द्र के द्वारा किये गए पाप का प्रायश्चित करती रही | वाल्मीकि-रामायण में इंद्र द्वारा कारित इस पाप में अहिल्या को भी सहभागी बताया गया है।

       एक नारी जिसे अबला भी कहा जाता है किसी पुरुष के सामने कितनी विवश हो जाती है, अहिल्या के साथ हुई यह घटना इसका प्रमाण है, फिर चाहे सामने वह पुरुष इंद्र हो या ऋषि गौत्तम अथवा कोई अन्य।पाप इंद्र ने किया और उस पाप में कथित रूप से सहभागी होने का परिणाम इंद्र के साथ अहिल्या को भी भुगतना पड़ रहा है।

            सूने आश्रम में भला कोई जीव भी कब तक निवास कर सकता है ? गौत्तम ऋषि का आश्रम प्राणी-विहीन हो चूका था | न तो वहां पक्षियों का कलरव था और न ही रंभाती गायों की पुकार | वहां था तो केवल एक सन्नाटा और उस सन्नाटे में अबला का जड़ होकर पत्थर हुआ  शरीर, जिसके मुख से कोई बोल तक भी नहीं निकल पाते थे | शिला बन जाने का अर्थ पत्थर बन जाना नहीं है बल्कि चलते फिरते शरीर का जड़वत हो जाना है। 

       पति परित्याग के कारण जड़ हो गई अहिल्या मन ही मन भगवान् का नाम लेकर तप कर रही थी और प्रतीक्षा कर रही थी कि कब राम आयेंगे और कब वह पुनः चेतन अवस्था को प्राप्त होगी |

             भगवान् अंतर्यामी भी है और सर्वत्र भी | एक सूई की नोंक जितना भी स्थान इस ब्रह्मांड में नहीं है जहाँ श्री हरि का वास न हो | प्रभु बड़े दयालु हैं | वे अपने भक्तों पर कृपा करते हैं, इसीलिए उन्हें करुणानिधान कहा जाता है | अपने प्रत्येक भक्त पर उनकी दृष्टि प्रतिक्षण बनी रहती है | ऐसे में भला, वे अहिल्या को कैसे भूल सकते हैं ? विश्वामित्र मुनि के साथ जनकपुरी में सीता स्वयंवर देखने जा रहे है | वे जानते हैं कि वहां जनकपुरी में क्या होना है ? सीता उनका ही वरण करेगी, जानते हैं | फिर भी कोई जल्दी नहीं है | सीता तो जन्म जन्मान्तर की भार्या है, उससे मिलना कठिन नहीं है परन्तु उन्हें पहले अपने भक्त की कामना पूरी करनी है |  

               ऐसा सोचकर वे चल पड़े जनकपुरी के रास्ते से थोडा हटकर,अलग रास्ते से | भक्त की भगवान् से कभी कोई दूरी नहीं होती | आश्रम को सूना और एक कोने में जड़वत बैठी नारी सी प्रतिमा को देखकर श्री राम ने मुनि से उसका कारण पूछ बैठे | मुनि विश्वामित्र जानते हैं कि राम सर्वज्ञ है फिर भी मेरा मान रखने के लिए पूछ रहे हैं | चलो, मैं ही बता देता हूँ | विश्वामित्र कहते हैं –“राम ! यह अहिल्या है | अपने पति ऋषि गौत्तम के शाप से यह जड़ हो गयी है | शिला बनी तप में लीन है | परित्यक्त होकर पत्थर बन गयी है, इस कारण से आपसे आग्रह भी नहीं कर सकती कि आप उसे अपने चरणों से छूकर, उसे अपनी चरण रज देकर उसका उद्धार करें | आपके चरणों के छूने से ही आपके चरणों की रज उसे मिलेगी और यह पुनः अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त होगी |’ विश्वामित्र मुनि कहते हैं कि राम, आगे बढ़ो और अपने चरणों की रज का स्पर्श देकर इस नारी का सम्मान लौटा दो |

         राम कह रहे हैं – “ नहीं गुरूजी, मैं भला पुरुष होकर एक नारी को अपने चरणों से स्पर्श कैसे कर सकता हूँ ? नारी तो सदैव वन्दनीय होती है | मैं तो उनको केवल प्रणाम ही कर सकता हूँ |” अनुकरणीय है उनका ऐसा कहना। ऐसा है भगवान् श्री राम का एक नारी के प्रति सम्मान | आज इसी सम्मान के अभाव में नारी दुराचार की शिकार होती जा रही है | जब तक हम अपने बच्चों को संस्कार नहीं देंगे तब तक नारी-सम्मान वापिस अपनी गरिमामय स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकेगा | कलियुग का प्रभाव है यह | 

        द्वापर में एक नारी के अपमान ने महाभारत रच दिया था फिर इस कलियुग में नारी के साथ जो कुछ भी हो रहा है, वह क्या नहीं करेगा? हाँ, कोई भी युग तभी परिवर्तित हो सकता है जब हम स्वयं अपने आप को परिवर्तित करेंगे |

           श्री राम एक-टक दृष्टि से शिला बनी नारी को निहारते हुए भाव-विह्वल हो उठे | कहा जाता है कि उसी समय वायु का प्रवाह तीव्र गति से हुआ और श्री राम के चरणों को स्पर्श करती हुई रज उड़कर शिला बनी अहिल्या को छू गयी | तत्काल ही वह शिला एक सुन्दर नारी में परिवर्तित हो गयी ।  

           माता अहिल्या को अपने वास्तविक स्वरुप में देखते ही राम-लखन ने आगे बढ़कर उस देवी के चरण छू लिए | राम कहते हैं –‘देवी अहिल्या, सारा दोष इन्द्र का था | वह अपनी करनी भुगत रहा है | आज इन्द्र का वह पहले वाला सम्मान नहीं रहा है और न ही अब कोई उसकी पूजा करता है | चन्द्रमा उसका सहयोगी था, जब तक यह ब्रह्मांड है तब उसको अपने किये की सजा मिलती रहेगी | तुम्हारा कोई दोष नहीं था | तुम्हें बिना कोई अपराध किये सजा मिली थी | ऋषि गौत्तम भी आपसे हुए अलगाव से दुखी हैं | अब आप भी उनके पास चली जाओ | वे आपको सहर्ष स्वीकार कर लेंगे |”

         भगवान् श्री राम की बातें सुनकर अहिल्या गद् गद् हो गयी | वह उनकी स्तुति करने लगी | स्तुति को गोस्वामीजी ने मानस में एक छंद के रूप में बड़े ही भावपूर्ण शब्दों में पिरोया है |  ’परसत पद पवन सोक नसावान प्रगट भई तपपुंज सही |’ अर्थात जो शोक का नाश करने वाले हैं ऐसे आपके चरणों की रज का स्पर्श पाते ही शिला से तपपुंज के रूप में एक नारी प्रकट हो गयी | अहिल्या कह रही है कि ‘प्रभु ! मैं तो आपके दर्शन कर कृतार्थ हो गयी | भला हुआ, जो ऋषि ने मुझे शाप दिया | मेरे पति ने मेरा कितना ध्यान रखा था कि क्रोध में कहे गए वचनों में भी उन्होंने मेरा हित देखा, तभी तो मुझे आपके दर्शन हुए हैं | मुझे कोई भी दुःख-शोक नहीं है कि मेरे पति ने मेरे निष्पाप होने की बात का विश्वास क्यों नहीं किया ? मेरा तो उनके द्वारा दिए गए शाप से भी भला ही हुआ है, जो आपके दर्शन का सौभाग्य मिल सका।   

        अहिल्या को भगवान् ने प्रेमाभक्ति का वरदान दिया और उनको अपने पति ऋषि गौत्तम के पास भेज दिया | भगवान् राम इसके बाद आगे की यात्रा पर निकल पड़े जहाँ सीता उनका इंतजार कर रही है | जनकपुर में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम भेंट होती है, सतानन्द से | सतानन्द, जनकपुरी के राजपुरोहित | श्री राम को देखते ही पूछ बैठते हैं –“प्रभु, क्या आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है ? क्या उन्होंने पुनः अपना वास्तविक स्वरुप प्राप्त कर लिया है ? क्या वह अब मेरे पिता ऋषि गौत्तम के पास चली गयी हैं ?”

         भगवान् श्री राम इन प्रश्नों के उत्तर में केवल मुस्कुरा देते हैं | सतानन्द आगे कह रहे हैं-“भगवन, मैं जानता हूँ आपने सब कार्य सिद्ध कर दिए हैं, तभी आप मुस्कुरा रहे हैं | भगवान् भक्त को कृतार्थ कर ही मुस्कुराते हैं | भक्त के दुःख को भगवान् अपना दुःख मानते हैं | दुखी होकर प्रभु मुस्कुरा नहीं सकते | आज आपने मेरी मां का उद्धार कर दिया है, तभी तो आप इतने अधिक मुस्कुरा रहे हो | मैं आपका बहुत बड़ा उपकार मानता हूँ |” भगवान् श्री राम ने आगे बढकर राजपुरोहित सतानन्द के चरण स्पर्श कर लिए |

            भला, एक भक्त की भगवान् सुध नहीं लेंगे तो कौन लेगा ? इस संसार में भगवान् के अतिरिक्त भक्त का होता ही कौन है ? इस प्रकार आज भगवान् ने एक भक्त को जड़त्व से मुक्त किया है । तभी गोस्वामीजी कहते हैं – “प्रगट भई तपपुंज सही |”

प्रस्तुति- डॉ.प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||