Sunday, August 8, 2021

जीवन-सूत्र - भाग-1

 “जीवन-सूत्र”

             मनुष्य को सभी प्राणियों में बुद्धिमान कहा जाता है | उसका बुद्धिमान होना ही उसको अन्य प्राणियों से विशिष्ट नहीं बनाता बल्कि वह अपनी बुद्धि का उपयोग किस दिशा में करता है वह बनाता है | जिस लक्ष्य के लिए पशु में बुद्धि को बनाया गया है वह केवल उसी दिशा में जा सकता है, अपनी इच्छानुसार नहीं | मनुष्य अपनी दिशा बुद्धि का उपयोग करते हुए निर्धारित कर सकता है, यह उसे स्वतंत्रता परमात्मा ने दी है |

          बुद्धि जड़ तत्व है और उसका जड़ तत्व की ओर आकर्षण होना स्वाभाविक है और फिर मन जैसे जड़ तत्व का साथ मिल जाये तो कहना ही क्या ? जीवन में मन मनुष्य की बुद्धि को भटका देता है और इस भटकाव से बचने का एक ही उपाय है, सही लक्ष्य का ज्ञान होना | भटकता वही है, जिसे लक्ष्य का ज्ञान नहीं है | लक्ष्य व्यक्ति सवयं निर्धारित करता है और उसी दिशा में आगे बढकर उसे पाने का प्रयास करता है | अगर लक्ष्य सही है तो फिर उसके जीवन में भटकाव आ ही नहीं सकता |

         चौरासी लाख प्राणियों के जीवन संकट और अशांति से घिरे हुए रहते हैं | एक छोटी सी लट को भी आप छूने का प्रयास करेंगे तो वह अपने जीवन को बचाने के लिए भागने का प्रयास करेगी | एक छोटे से जीव के जीवन में भी जब इतनी बड़ी अशांति है, फिर मनुष्य जीवन में कितनी अधिक अशांति रहती होगी उसकी आप कल्पना कर सकते हैं  | परमात्मा ने सब जीवों को अपने शरीर की रक्षा करने के लिए साधन दिए हैं परन्तु जीव उन साधनों का उचित समय पर सही रूप से उपयोग करने में विफल रहता है | इसका कारण है, बुद्धि का सही उपयोग नहीं करना | एक चीते से एक मृग अधिक तेज गति से दौड़ सकता है फिर भी मृग उसका शिकार बनता है | क्या कारण हैं, जानते हैं आप ? अगर मृग केवल एक दिशा में ही अपनी शक्ति से दौड़ता रहे तो कभी भी चीता उसे पकड़ नहीं पायेगा | परन्तु मृग करता है इसके विपरीत | वह बार-बार अपनी दौड़ने की दिशा बदलता रहता है जिससे पीछे दौड़ रहे चीते पर नज़र रखी जा सके | ऐसा करने से उसकी गति चीते की गति से मात खा जाती है और वह बड़ी आसानी से उसका निवाला बन जाता है |

                  हम भी अपने जीवन में ऐसा ही करते हैं | दौड़ते हैं, किसी को पाने के लिए और संसार के आकर्षण में भटककर बार-बार दिशाएं बदलते रहते हैं | ऐसे में हमारी दशा “माया मिली न राम” वाली हो जाती है और मृत्यु सिर पर आकर मंडराने लगती है | मनुष्य जीवन के रहते लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाना हमारी विफलता है | अतः आवश्यक है कि हम जीवन के लक्ष्य को पहिचाने और उसको पाने के लिए दिशा निश्चित कर चल पड़ें | जाना कहाँ है, लक्ष्य तो भीतर ही है, पर ऐसा समझने में भी तो समय लगता है | मनुष्य जीवन का क्या लक्ष्य है ? वहां तक किस प्रकार पहुंचा जा सकता है ? कौन-कौन इसमें हमारी सहायता कर सकते हैं ? स्वयं को क्या प्रयास करना होगा ?   

        पशु जीवन से एकदम भिन्न होता है मनुष्य का जीवन | अपने जीवन में पशु चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता वहीँ परमात्मा ने मनुष्य को अपने जीवन में स्वयं की  इच्छानुसार कर्म करने की, सोचने समझने की क्षमता प्रदान की है | यही क्षमता उसे एक पशु से भिन्न बनाती है | क्या मनुष्य अपने जीवन में उस परमात्मा प्रदत्त क्षमता का सही उपयोग कर रहा है ? प्रश्न का उत्तर जितना सरल दिखलाई पड़ता है, उतना सरल है नहीं | हम सभी स्वतन्त्र हैं परन्तु क्या हमने इस स्वतंत्रता का सही मायने में उपयोग किया है ? आइये ! इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास करते हैं |

        संसार में विभिन्न प्रकार के शरीरों की संख्या 84 लाख हैं | इनमें भी मनुष्य ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जिसे सही मायने में चेतन कहा जा सकता है | चेतन होने से अभिप्राय केवल साँस भर लेते रहने से नहीं है बल्कि अपने अस्तित्व का अर्थात अपने होने का जिसको भान होता है, सही अर्थ में वही चेतन कहलाने का अधिकारी है | सभी 84 लाख प्रकार के प्राणी चेतन अवश्य है परन्तु वे चेतन होते हुए भी अचेतन के रूप में जीवन जी रहे हैं | एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो स्व-चेतन है | स्व-चेतन का अर्थ है कि वास्तविक रूप से हम चेतन हैं क्योंकि अपने को मिले इस चैतन्य जीवन को सही रूप से हम जानते और समझते हैं |

            इस अल्पकालीन मनुष्य जीवन में समय मुठ्ठी में भरी रेत की तरह धीरे धीरे सरकता जा रहा है और इस शरीर का कब अंत निकट आ जाये, कहा नहीं जा सकता | समझदार और विवेकी मनुष्य वही है जिसने इस बात को समझा है और स्वयं को उस ओर लगा लिया है जहाँ से उसकी स्व-चेतन अर्थात चैतन्य होने की यात्रा प्रारम्भ होती है | यह स्व-चेतन की यात्रा ही आत्म-बोध की यात्रा है जो उसे परमात्मा तक ले जाती है | इस यात्रा को प्रारम्भ करने के लिए कुछ मन्त्र है, कुछ सूत्र हैं, जिनको आत्मसात कर हम सभी मनुष्य स्व-चेतन को उपलब्ध हो सकते हैं | इन्हीं सूत्रों को यहाँ इस लेख में “जीवन-सूत्र” नाम से कहा गया है |

            जीवन-सूत्र हमें जीवन को सही अर्थ में जीने का मार्ग दिखलाते हैं | ये सूत्र हमें महापुरुषों द्वारा किये गए अनुभव से प्राप्त होते हैं | उन्हें यह अनुभव मिला है, स्वयं की जिज्ञासा से, शास्त्रों से और योग्य गुरु के सानिध्य से | सभी सूत्र अथवा मन्त्र हम पहले से ही जानते हैं और समझते हैं परन्तु उनको जीवन में उतारने में असफल रहते हैं | जब तक इनको जीवन में उतारा नहीं जायेगा अर्थात जब तक इन सूत्रों और मन्त्रों के अनुसार जीवन को जिया नहीं जायेगा तब तक इनका हमें रत्ती भर भी अनुभव नहीं होगा | साथ ही यह बात भी स्मृति में रखें की किसी अन्य के द्वारा किये गए अनुभव का आपके जीवन में कोई भी योगदान नहीं होगा | सब का अनुभव उनके अपने निजी जीवन की तरह ही निजी होगा |

        ऐसे ही अनुभव किये कुछ सूत्रों के बारे में आज से हम चिंतन करना प्रारम्भ करेंगे जिससे हमारा जीवन भी उसी अनुसार बन सके, जैसा अनुभव किये गए महापुरुषों का बना होगा | आवश्यकता इस बात की रहेगी कि केवल इन सूत्रों को हम पढने तक ही सीमित न रखें बल्कि जीवन में उतारने का प्रयास करें | अपने जीवन में उतारने पर ही आपको एक नया अनुभव होगा और आपके लिए महत्त्व भी उसी अनुभव का रहेगा | शास्त्र पढ़ने में सबके लिए एक समान है, गुरु भी सभी को एक समान शिक्षा देता है परन्तु सबके अनुभव में भिन्नता रहेगी | इस प्रकार सबके अनुभव में भिन्नता होते हुए भी सबको अनुभूति सामान होगी अर्थात किया गया अनुभव सभी को स्व-चेतन अर्थात आत्म-बोध यानि परमात्मा तक अवश्य ले जाएगी |

          जीवन में बिना प्रयास के कभी कुछ प्राप्त नहीं किया जा सकता | इस प्रयास का नाम ही पुरुषार्थ है | संसारिकता में रमे रहने के कारण हम स्व-चेतन की अवस्था को पाने का प्रयास तक नहीं करते क्योंकि हमें यह कार्य बोझिल सा लगता है | जबकि वास्तविकता यह है कि मिले हुए इस मनुष्य जीवन को हम व्यर्थ ही गँवा रहे हैं | मनुष्य को अपने जीवन के लक्ष्य का भान तक नहीं है | यही कारण है कि मनुष्य शरीर मिलने के उपरांत भी उसका व्यवहार एक पशु जैसा है | हमें चेतन - स्व-अचेतन (conscious-self unconscious) की पाशविक अवस्था को त्यागना ही होगा और मनुष्य जीवन रहते हुए चेतन - स्व-चेतन (conscious-self-conscious) की अवस्था प्राप्त करनी होगी |

               मनुष्य को क्या आवश्यकता पड़ी है कि वह स्व-चेतन अवस्था को प्राप्त करे | परमात्मा का स्वरुप सच्चिदानंद है अर्थात वह सत भी है और चैतन्य भी है | सत होना तभी संभव है जब वह चैतन्य हो | चैतन्य की अवस्था को उपलब्ध हुए बिना सत तक पहुंचा नहीं जा सकता | चैतन्य होने का अर्थ है स्वयं के होने का ज्ञान होना | कहने को तो समस्त जीव भी चेतन हैं परन्तु चैतन्य अवस्था तक पहुँचने की क्षमता केवल मनुष्य के पास ही है | स्व-चेतन होने की स्थिति प्राप्त कर लेना ही चैतन्य होने का प्रमाण है | चैतन्य होने से ही मनुष्य सच्चिदानंद तक पहुँच सकता है अन्यथा नहीं | इसलिए मनुष्य के लिए केवल चेतन होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे स्व-चेतन भी होना होगा | अपने जीवन में चैतन्य होते ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरुप अर्थात सच्चिदानंद स्वरुप को उपलब्ध हो जाता है |

       जीवन-सूत्र कोई तैयार की गयी घुंटी नहीं है, जिसके पीते ही आप आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो जाओगे | ये सूत्र हमें सनातन शास्त्रों और महापुरुषों से मिले है | कुछ महत्वपूर्ण सूत्र इस श्रृंखला में आयेंगे, जो हमें आत्म-कल्याण के लिए प्रेरणा देंगे | जीवन-सूत्र वे सूत्र हैं जिनसे आपका जीवन आध्यात्मिक होगा और जिनको आत्मसात कर आप परम तक पहुँच सकते हैं | आवश्यकता है कि हम स्वयं के पुरुषार्थ से इन सूत्रों को सिद्ध करें |

        पुरुषार्थ के सम्बन्ध में कबीर ने कितनी सुन्दर बात कही है-

                    जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ |

                     मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||

         कबीर कह रहें हैं कि जिनको कुछ पाने की जिज्ञासा है, ललक है वे तो ज्ञान के सागर में गहरे उतरकर अंततः उसको प्राप्त कर ही लेते हैं | जिनको ज्ञान सागर में गोता लगाने पर डूबने का भय है, वे केवल किनारे पर ही बैठे रह जायेंगे, वे आत्म-ज्ञान को उपलब्ध नहीं हो सकेंगे |

           ज्ञान सागर में ज्ञान गहराई में छुपा होता है | जो डूबने के भय से उस सागर में उतरने से भी डरते हैं, वे केवल किनारे पर बैठे बैठे लहरें ही गिनते रहेंगे | लहरें गिनना ज्ञान का पर्याय नहीं हो सकता | ज्ञान रुपी रत्न तो सागर की गहराई में छुपे पड़े हैं उसमें गहराई तक डूबना होगा तभी आत्म-ज्ञान का अनुभव हो सकता है | संसार को छोड़ना नहीं चाहते और परमात्मा को पाना चाहते हैं तो शास्त्र में समाहित ज्ञान भी आपकी कोई सहायता नहीं कर सकता | फिर तो केवल ज्ञान-सागर के किनारे बैठे बैठे शास्त्रों में समाहित ज्ञान की जुगाली करते रहो | याद रखें जुगाली करने और तृप्त होने में अंतर है | जुगाली करते रहना केवल व्यर्थ का प्रयास है जबकि ज्ञान का अनुभव करना ही आपको तृप्त कर सकता है |   

        दुर्भाग्य है उन लाखों मनुष्यों का, जोकि चेतन होकर भी अचेतन की तरह अपना जीवन जी रहे है, स्व-चेतन की अवस्था को उन्होंने अभी तक प्राप्त नहीं किया है | कैसे पहुंचेंगे, वे इस महत्वपूर्ण अवस्था तक ? इसके लिए कई साधन हैं, जिसमें शास्त्रों का अध्ययन, योग्य गुरु का सानिध्य और स्वयं की जिज्ञासा; इन तीनों की आवश्यकता होगी | आधुनिक युग में अर्थोपार्जन की ललक और जीविका के लिए किये जाने वाले संघर्ष ने मनुष्य को इन तीनों साधनों से लगभग वंचित कर दिया है | यही कारण है कि चेतन होकर भी मनुष्य अचेतन की अवस्था में पड़ा है जबकि उसे स्व-चेतन की अवस्था को प्राप्त हो जाना चाहिए था |

            एक बात सदैव ध्यान में रखें, न तो कोई गुरु और न ही कोई शास्त्र आपको उस परम तक ले जा सकेगा जब तक कि आपकी स्वयं की मुमुक्षा उस तक पहुँचने की न हो | यह मुमुक्षा आपके स्वयं के प्रयास से ही पैदा हो सकती है, गुरु और शास्त्र तो आपके भीतर गहराई में छुपी इस मुमुक्षा को सतह पर लाने का कार्य करते हैं | यह मुमुक्षा आपके भीतर अवश्य ही छुपी हुई रहती है. इसका प्रमाण है आपको मिला यह मनुष्य जीवन क्योंकि एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो चैतन्य हो सकता है |  

              स्व-चेतन की अवस्था ही आत्म-बोध की अवस्था है और परमात्मा को प्राप्त कर लेना भी इसे ही कहते हैं | आदिगुरू शंकराचार्य विवेक चूड़ामणि में कहते हैं कि स्व-चेतन की अवस्था को प्राप्त करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है –

              दुर्लभं        त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम् |

              मनुष्यत्वं, मुमुक्षत्वं और महापुरुष संश्रय ||(3)||

      मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व और महान पुरुषों का संग- ये तीनों ही दुर्लभ हैं | इन तीनों की एक साथ प्राप्ति का कारण केवल और केवल भगवत कृपा ही है |

          कितनी सहजता से शंकराचार्य जी महाराज ने बात कह दी है कि परमात्मा प्राप्ति के लिए केवल इन तीन का होना आवश्यक है-एक मनुष्य होना, दो- आत्म-बोध की मुमुक्षा होना और तीन – महापुरुषों का संग मिलना | इन तीनों की एक साथ प्राप्ति होने का एक मात्र कारण है, भगवत कृपा | बिना भगवत कृपा के इनमें से किसी एक का मिलना भी असंभव है | साथ ही यह भी सत्य है कि इनमें से किसी एक का अगर होना संभव हो गया तो यह भी निश्चित है कि शेष दो का मिलना भी अवश्यम्भावी है | यह हमारी बुद्धि पर पड़े हुए पत्थर ही होंगे जो मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी स्वयं के भीतर की मुमुक्षा को पहचान नहीं पाएं और मिलने वाले महापुरुषों के संग की अवहेलना करते रहें |

              जब भी परमात्मा की ओर चलने की चर्चा होती है तब प्रायः मित्रगण यही बात कहते हैं कि आप तो सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से संपन्न और निश्चिन्त है इसलिए आपके लिए ऐसी बात कहना सरल है | मैं उन्हें कैसे समझाऊं कि अपने संसार में रहते हुए कभी भी निश्चिंत होना संभव ही नहीं है, न कभी संभव हो सकता है | निश्चिन्तता आती है, एक परमात्मा की शरण में जाने से | नदी के पार जाने के लिए उसके किनारे पर बैठकर जल-प्रवाह के थमने की प्रतीक्षा करना मूर्खता ही है | जिस प्रकार नदी में जल का प्रवाह कभी समाप्त नहीं हो सकता, उसी प्रकार संसार की चिंताएं कभी मिट नहीं सकती | हमें इन बातों की परवाह किये बिना ही संसार के पार जाना होगा |

                आदिगुरू शंकराचार्यजी महाराज ने स्पष्ट कर दिया है कि मनुष्य जन्म मिलना इस बात का प्रमाण है कि आप चाहें तो सच्चिदानंद होने की अवस्था तक पहुँच सकते है | यह मनुष्य जीवन भी आपको उस परमात्मा की कृपा से ही मिला है | इस जीवन का एक मात्र उद्देश्य है - स्व-चेतन अर्थात चैतन्य अवस्था को प्राप्त कर सच्चिदानन्द तक पहुँचना | हम अपनी जीवन-यात्रा में सदैव सच्चिदानंद ही हैं परन्तु हमें इस बात का ज्ञान नहीं है | ज्ञान न होने का कारण है कि हम इस संसार के भीतर इतने अधिक डूब गए हैं कि केवल सांसारिक जीवन को ही अपना वास्तविक जीवन समझ बैठे हैं | यह शरीर भी उसी संसार का एक अंग है और शरीर को ही स्वयं होना मान बैठे हैं | शरीर से अलग होना किसी अन्य जीव के लिए संभव नहीं है, केवल मनुष्य ही शरीर से स्वयं को मुक्त कर सकता है |

                मनुष्य शरीर तो परमात्मा की कृपा से मिल गया परन्तु यह क्या ? हम तो शरीर को ही सब कुछ समझ बैठे हैं | अगर शरीर ही सब कुछ है तो फिर एक पशु और मनुष्य में भला क्या अंतर रह जायेगा | “पंचतंत्र” कहती है -

              आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् |

              धर्मो हि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीनाः पशुभि: समाना: ||

        अर्थात आहार, निद्रा, भय और मैथुन-ये मनुष्य और पशु में समान हैं | मनुष्य में विशेष केवल धर्म है, बिना धर्म के व्यक्ति पशुतुल्य है |

           लो जी, पंचतंत्र भी कह रहा है कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये चारों प्रवृतियाँ तो एक पशु में भी मिल जाती है फिर उनसे मनुष्य किस प्रकार भिन्न हुआ ? मनुष्य में भी इनमें से कोई एक भी प्रवृति आपको भिन्न नहीं मिलेगी | मनुष्य को एक पशु से भिन्न केवल एक ही प्रवृति बनाती है, और वह है उसके द्वारा धर्म का पालन किया जाना | मनुष्य जीवन का धर्म क्या है ? इसको जान लेने पर ही हम हम एक पशु से अपने को भिन्न मान सकते हैं | जब तक हमें अपने धर्म का ज्ञान नहीं है, तब तक एक पशु और मनुष्य में कोई अंतर नहीं हो सकता, दोनों एक समान ही माने जायेंगे | चलिए आगे बढ़ते हैं धर्म की ओर, उसे जानने के लिए |

धर्म )Righteousness/Persuasions/Faith/Duty) – Moral values

        भारतीय संस्कृति के मूल में ही धर्म है | मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि धर्म हमारी सनातन संस्कृति का प्राण है |जैसे भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में भौतिक-वाद की प्रधानता है, वैसे ही हमारी संस्कृति में धर्म की प्रधानता है | पश्चिम की संस्कृति में भौतिकता की मुख्यता होने के कारण वह शारीरिक सुख प्राप्त करने के लिए प्रत्येक प्रकार के कर्म करने को कहती है जबकि भारतीय संस्कृति में मुख्यता धर्म की होने के कारण वह आनंद को उपलब्ध होने के लिए धर्मानुसार कर्म करने को प्राथमिकता देती है | पश्चिम में भौतिकता के कारण स्वाद के लिए हिंसा की जा सकती है, यहाँ धार्मिकता के आधार पर स्वाद पर नियंत्रण रख अहिंसा की अनुपालना करने पर जोर दिया जाता है | धर्म हमें यह सिखाता है कि हमें क्या तो करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए | इसीलिए भारतीय संस्कृति को आध्यात्मिक संस्कृति कहा जाता है |

         “धर्म” शब्द की परिभाषा करना बड़ा कठिन है, यह शब्द अपने में विशाल अर्थ समेटे हुए है | ‘धर्म’ संस्कृत के शब्द ‘धातु’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है – धारण करना | ’धारणात धर्ममित्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः’ (महाभारत) अर्थात जिसको धारण (possess) किया जाता है उसको धर्म कहते हैं | इसी प्रकार धर्म प्रजा (subject) को धारण करता है | इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म केवल व्यक्ति ही धारण नहीं करता बल्कि स्वयं धर्म भी व्यक्ति को धारण करता है |

             हमारी सनातन संस्कृति का प्राण धर्म है परन्तु हमारे कथित सभ्य समाज ने इस ‘धर्म’ शब्द को जिस प्रकार समझा है वह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है | आज धर्म को केवल पूजा पाठ और उपासना पद्धति से जोड़ दिया गया है, जबकि इन कर्मकांडों से धर्म का कहीं दूर दूर तक लेना देना नहीं है | आपके कर्मकांड, पूजा पद्धति और इनको विविध प्रकार से समझाती हुई पुस्तकें आपका व्यक्तिगत मामला हो सकता है, धर्म नहीं | यह सब आपकी निजता को अवश्य ही प्रकट करता है परन्तु आपका धर्म निर्धारित नहीं करता |

            एक ही प्रकार की पूजा पद्धति और रहन सहन आपका समाज बना सकती है, वह आपका संप्रदाय निर्धारित कर सकती है परन्तु आपका धर्म नहीं | इस शब्द ‘धर्म’ की आत्मा को जाने और समझे बिना इसका अनुचित प्रयोग करना अनुचित ही नहीं निंदनीय भी है | आज किसी को भी पूछो कि तुम्हारा धर्म क्या है, प्रत्युतर में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि ही सुनने को मिलेगा | वास्तविकता यह है कि ये सभी कथित धर्म; धर्म न होकर सम्प्रदाय मात्र है | संप्रदाय के लोगों की जीवन शैली, पूजा पद्धति और ईश्वरीय विश्वास लगभग एक समान होता है | सभी सम्प्रदायों में चाहे मत विभिन्नता कितनी ही हो परन्तु सबका धर्म एक ही होगा | कोई भी संप्रदाय अगर अपने धर्म को किसी अन्य धर्म से अलग अथवा श्रेष्ठ भी मानता है तो यह आप निश्चित ही मान लीजिये कि वह धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य विषय की बात कर रहा है | सभी सम्प्रदायों का धर्म एक ही होता है, पूजा पद्धति भले ही भिन्न हो | अतः आवश्यकता है कि सर्वप्रथम हम अपने ‘धर्म’ को जानें और सम्प्रदायवाद से ऊपर उठें |

             अगर ‘धर्म’ का सम्बन्ध ईश्वरीय विश्वास, पूजा-पाठ और सम्प्रदाय आदि से नहीं है तो फिर ‘धर्म’ क्या है ? यह प्रश्न पूछना जितना आसान है, उत्तर ढूँढना उतनी ही मुश्किल है | इसका कारण यह है कि हमने विभिन्न सम्प्रदायों के ठेकेदारों द्वारा दी गयी इस शब्द की व्याख्या को कई वर्षों से इतना अधिक आत्मसात कर लिया है कि हम अपने-अपने सम्प्रदायों को ही अपना-अपना धर्म मान बैठे हैं | विभिन्न सम्प्रदाय होने भी आवश्यक है क्योंकि सम्प्रदाय और उनसे जुड़े शास्त्र हमें अपने ‘धर्म’ के बारे में समुचित जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं | सम्प्रदाय के ज्ञानी जन समय-समय पर हमें अपने शास्त्रों से निर्देशित कर सकते हैं | अगर कोई कथित ज्ञानीजन इन पुस्तकों की व्याख्या अनुचित रूप से हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है तो यह उसकी गलती है, संप्रदाय अथवा उससे जुडी पुस्तकों की नहीं | किसी भी सम्प्रदाय के वास्तविक शास्त्र आपको धर्म के बारे में दिग्भ्रमित कर ही नहीं सकते, यह सत्य है | हाँ, वे इनकी व्याख्या अपने स्वार्थ से किसी भी प्रकार से भी कर सकते हैं | अतः ऐसी बातों से सावधान रहना चाहिए और शास्त्रों का स्वयं ही अध्ययन करना चाहिए |

              हमारे सनातन शास्त्रों में धर्म की व्याख्या विभिन्न प्रकार से की गई है | सभी का अनुसन्धान करने पर हम पाते हैं कि सब एक ही प्रकार की सोच रखते हैं | धर्म का अर्थ है - व्यक्ति का कर्तव्य” (Duty as a human being) | जब मनुष्य को परमात्मा ने अपनी ही सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में प्रस्तुत किया है तो उसका कर्तव्य भी शेष सभी प्राणियों से अलग ही होगा | वैशेषिक दर्शन के प्रणेता महर्षि कणाद ने ‘सूत्र-वैशेषिक’ में धर्म के बारे में कहा है – “यतोभ्युदयनि:श्रेयस: सिद्धः स धर्मः” अर्थात जिससे अभ्युदय (सांसारिक सुख ) औए नि:श्रेयस (आध्यात्मिक कल्याण) दोनों ही प्राप्त हो जाये, वही धर्म है | धर्म का यह लक्षण स्पष्ट रूप से भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों पक्षों में समन्वय (Coordination) स्थापित करता है | जो धर्म आध्यात्मिक पक्ष (Spiritual part)  की अवहेलना (Avoid) कर केवल भौतिक उन्नति (Materialistic development) को ही केंद्र में रखता है, वह एकांगी (Unilateral or one sided) है, धर्म नहीं है |

             मनुस्मृति में धर्म के चार स्रोत बताये गए हैं-श्रुति (Revelation), स्मृति (Rememberance), सदाचार (Moral) तथा जो अपनी आत्मा (soul) को प्रिय लगे | धर्म में सबका कल्याण निहित है | सब के कल्याण से इसमें नैतिकता, आदर्श और मूल्य समाहित हो गए हैं |

      गौत्तम ने अपने धर्मसूत्र में कहा है - अथाष्टा वात्मार्गुणा: दया सर्वभूतेषु: क्षान्तिरनसूया शौच मता मासौ मंगलमय कार्यण्य स्पृहति | अर्थात सब प्राणियों पर दया, क्षमा,अनुसूया (आलोचना और ईर्ष्या न करना), शुचिता, निष्कपटता, अतिश्रम वर्जन, शुभ में प्रवृति, दानशीलता तथा निर्लोभता; ये आठ आत्म-गुण हैं अर्थात ये धर्म है |

         धर्म को स्पष्ट करते हुए उपनिषदों में कहा गया है कि धर्म समस्त विश्व का आधार है, क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति के आचरण की सभी वे बुराइयाँ दूर हो जाती हैं, जो विश्व कल्याण में बाधक हैं | कौटिल्य ने धर्म को एक शाश्वत सत्य मन कहा है, जो समस्त संसार पर शासन करता है | बौद्ध धर्म के अनुसार धर्म अच्छे तथा बुरे, सत्य और असत्य में अंतर को स्पष्ट करता है |

          मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बतलाये गए हैं | मनु लिखते हैं

                   धृतिः क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रिनयनिग्रहः |

                   धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ||मनुस्मृति-6/92||

अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, आंतरिक तथा बाह्य शुद्धि, इन्द्रियों को वश में रखना, बुद्धि, शिक्षा, सत्य और क्रोध न करना, ये धर्म के दस लक्षण हैं |

     महाभारत में धर्म को अर्थ और काम का स्रोत माना गया है

              उर्ध्वबाहुर्विरौम्येष्य न च कश्चित शृणोति में |

              धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते ||

         अर्थात भीष्म पितामह कह रहे हैं कि मैं बाँहों को उठाकर जोर-शोर से कह रहाहूँ किन्तु मेरी बात को कोई नहीं सुनता | किन्तु मेरी बात को कोई नहीं सुनताधर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है फिर धर्म का पालन किसलिए नहीं किया जाता ?

            श्री मद्भगवद्गीता में भी धर्म के महत्त्व को स्वीकार किया गया है | गीता के 18 वें अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को धर्म का महत्त्व समझाते हुए कह रहे हैं-

               श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |

               स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम् ||गीता-18/47||

                       अर्थात गुणरहित होने पर भी स्वधर्म पालन करना अच्छा है, चाहे दूसरे का धर्म ( कर्तव्य-कर्म ) चाहे कितना ही अच्छा हो | यदि मनुष्य अपने धर्म का पालन करता है तो वह पाप से सदैव बचा रहता है |

                 स्व-धर्म के बारे में गीता तो यहाँ तक कह देती है कि ‘स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह:’ (गीता-3/35) अर्थात धर्म के पालन के लिए अपने प्राण भी गवां देना दूसरे के धर्म का पालन करने से अच्छा है क्योंकि दूसरे का धर्म भयावह है अर्थात अपरिचित है | जैसे एक चिकित्सक का धर्म है रोगी को रोगमुक्त करना | उसका चिकित्सा सेवा देना ही धर्म है | अगर वह अन्य क्षेत्र में जाकर कार्य करता है, तो वह कार्य उसको नहीं रुचेगा | इसलिए गीता में दूसरे के धर्म को भयावह कहा गया है | यहाँ धर्म का अभिप्राय संप्रदाय से नहीं लेना है |

               धर्म के महत्त्व को पुराणों में भी स्वीकार किया गया है | पुराणों का कहना है कि अधर्मी अर्थात अपने विवेक से च्युत पुरुष यदि काम और अर्थ सम्बन्धी क्रियाएं करता है तो उसका फल बाँझ स्त्री के पुत्र जैसा होता है अर्थात उनसे किसी प्रकार के कल्याण की सिद्धि नहीं होती | जैसे बाँझ स्त्री के पुत्र नहीं हो सकता, उसी प्रकार अपने कर्तव्य कर्म के विरुद्ध कार्य करने वाले का भी कभी कल्याण नहीं हो सकता |

            पद्मपुराण में लिखा है

                  ब्रह्मचर्येण सत्येन तपसा नित्यवर्तनैः |

                  दानेन नियमैश्चापि क्षमा शौचेन वल्लभः ||

                  अहिंसया च शक्त्या वाSस्तेयेनापि प्रवर्तते |

                  एतैर्दशभिरंगैश्च धर्ममेवं प्रसूचयते ||पद्मपुराण-5/89/8-9||

              अर्थात ब्रह्मचर्य (celibacy), सत्य (truth), तप (penance),दान(donation), नियम (principle), क्षमा (forgiveness), शुद्धि (cleanness), अहिंसा (non violence), शांति (peace) और चोरी न करना, इन दस अंगों के धारण करने से ही धर्म की वृद्धि होती है |    

                 श्री मद्भागवत महापुराण के सातवें स्कंध (अध्याय 11 श्लोक- 8 से12) में धर्म के तीस लक्षण बतलाये गए हैं | इसी प्रकार श्री रामचरित मानस के लंकाकांड में (80/5-12) गोस्वामीजी ने धर्म का एक रथ के रूप में वर्णन किया है |

               योगवासिष्ठ के अनुसार धर्म के चार चरण या चार आधार होते हैं | ये धर्म के चरण ही मनुष्य  के कर्तव्य के आधार है | इन चारों चरणों  में विश्वास रखते हुए कर्तव्य करते रहना ही वास्तविकता में धर्म हैं | धर्म के चरण हैं सत्य (truth), अहिंसा (nonviolence) अथवा दया (kindness) , तप (penance) और दान (donation) | इन चारों के विलोम (opposite) अर्थात विपरीत होना अथवा चलना ही अधर्म है | आप किसी भी सम्प्रदाय के साहित्य और शास्त्रों को उठाकर देख लें, आपको मुख्यतः इन्हीं चार बातों का अनुसरण करने का कहा जाता है | हिंसा, असत्य, कलह और असंतोष जैसे अधार्मिक बातों का कोई भी संप्रदाय समर्थन नहीं करता क्योंकि ये सभी अधार्मिकता के अंतर्गत आते हैं | श्री मद्भागवत महापुराण में कहा गया है कि कलियुग में धर्म के चार चरणों में से तीन तो नष्ट हो चुके हैं, केवल एक चरण ‘सत्य’ ही बच रहा है | (भागवत-1/17/24-25)

                     सत्य के मार्ग पर चलना, सभी प्राणियों के प्रति दया का भाव मन में रखना, परमात्मा और सत्य की प्राप्ति के लिए तप करना और असहायों की दान देकर सहायता करना आदि सभी धर्म के अंतर्गत आते हैं और ऐसे धर्म मार्ग पर चलना वर्तमान मानव जीवन में पुरुषार्थ करने से ही संभव है | इसके लिए पूर्वजन्म का पुरुषार्थ यानि दैव, प्रारब्ध किसी उपयोग के नहीं है | संसार में जब मानव जन्म लेता है तब वह किसी भी प्रकार के व्यवहार और आचरण (धर्म) के प्रति सपाट कोरे कागज (blank paper) की तरह होता है | उसमे और अन्य मूक प्राणियों में किसी भी प्रकार का अंतर आपको नज़र नहीं  आएगा | उसमे धर्म का स्फुरण वर्तमान जीवन में होना ही संभव है | यह स्फुरण स्वतः ही होना संभव नहीं है | इसके लिए पुरुषार्थ करने की आवश्यकता है | यही कारण है कि चारों पुरुषार्थ में धर्म एक मुख्य पुरुषार्थ है |

            भगवान् महावीर द्वारा प्रतिपादित जैन धर्म में धर्म को विस्तृत रूप से स्पष्ट किया गया है | जैन धर्म के ग्रन्थ-तत्वार्थ-सूत्र में धर्म के दस लक्षण बताये गए हैं -1.उत्तम क्षमा 2.उत्तम मार्दव - ह्रदय की कोमलता, सरलता, मृदुता 3.उत्तम आर्जव – सीधापन, सहजता 4.उत्तम शौच - भीतर बाहर की शुद्धि 5.उत्तम सत्य 6.उत्तम संयम 7. उत्तम तप 8.उत्तम त्याग 9.उत्तम आकिंचन्य (नगण्यता) और 10 उत्तम ब्रह्मचर्य |

           जैन समाज में इसी आधार पर दस लक्षण व्रत रखे जाते हैं जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से लेकर चतुर्दशी तिथि तक संपन्न होते हैं | प्रत्येक दिन क्रमानुसार (serial) एक एक व्रत का पालन किया जाता है |

          मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ हैं जिनमें महत्वपूर्ण पुरुषार्थ है, धर्म | धर्म से ही काम, अर्थ और मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है | धर्म का पालन जीवन में महत्वपूर्ण है, इसी के अनुसार चलकर मनुष्य स्व-चेतन अवस्था प्राप्त कर सच्चिदानंद स्वरुप तक पहुँच सकता है | चार पुरुषार्थ में काम और अर्थ पुरुषार्थ तो मनुष्य के पूर्वजन्म का परिणाम है जबकि धर्म और मोक्ष इस जीवन में प्राप्त किये जा सकते हैं | इसलिए मनुष्य जीवन मिलने के बाद भी जो केवल काम और अर्थ के पीछे हो लिया और धर्म और मोक्ष की अवहेलना की तो उसका पतन होना निश्चित है | हमें अर्थ और काम के प्रति उपेक्षा का भाव रखते हुए धर्म के प्रति अनुराग पैदा करना होगा | अब प्रश्न उठता है कि हम धर्मानुरागी कैसे बनें ?

            जैसा कि पूर्व लेख में स्पष्ट किया जा चूका है कि प्रत्येक मनुष्य में प्रकृति के तीनों गुण उपस्थित होते हैं | ये गुण हैं सत, रज और तम | व्यक्ति में तीनों गुण जीवन के प्रारम्भ में समान रूप से उपस्थित होते हैं | परन्तु ज्यों ज्यों वह बड़ा होता जाता है त्यों त्यों उसमे किसी एक गुण की प्रधानता होती जाती है | उसी गुण की प्रधानता से उसको सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक प्रकृति का माना जाता है | एक गुण शेष दो गुणों को दबाकर ही बढ़ सकता है | धर्म के मार्ग पर चलना सात्विकता का लक्षण है | अतः मनुष्य को धर्म पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए शेष दो गुण रजस और तमस को दबाकर अपने में सत गुण को बढ़ाना होगा | सत गुण को बढ़ने पर मनुष्य असत्य को त्यागकर सत्य के मार्ग पर चल पड़ता है | हिंसा (violence) से उसका दूर दूर का सम्बन्ध नहीं रहता | परमात्मा में विश्वास (faith) रखकर वह तप करता है और असहायों की सहायता में सदैव ही तत्पर रहता है | 

           सत्व गुण को मनुष्य कैसे बढा सकता है ? इसको बढाने के लिए कई बार परिस्थितियां ऐसी पैदा हो जाती है जो उसे तामसिकता से दूर कर देती है | जैसा कि रत्नाकर (महर्षि वाल्मीकि) और अंगुलिमाल के साथ हुआ था | दोनों ही व्यक्ति अपने जीवनकाल में भयानक डाकू (dacoits) रहे हैं | एक तो श्री राम का अनुरागी बन गया और दूसरा भगवान बुद्ध का शिष्य | तामसिकता और राजसिकता को नकारते हुए सात्विकता की ओर बढ़ना, आपके स्वयं के पुरुषार्थ से ही संभव है | सनातन शास्त्र और गुरु व महान संत आपको केवल मार्ग ही दिखला सकते हैं | उस मार्ग को अपनाकर, उस मार्ग पर चलकर ही आप धर्म को उपलब्ध हो सकते हैं | इसीलिए धर्म को एक पुरुषार्थ कहा गया है |

         धर्म के मार्ग पर चलना ही नैतिक आदर्श (ideal morality) है | धर्म को अपनाकर ही आप शांति का अनुभव कर सकते हैं | धर्म से चाहे आपको सांसारिक वस्तुएं उपलब्ध न हो परन्तु जिस प्रकार की शांति का अनुभव आपको होगा वह अमूल्य है | धर्म की तुलना आप किसी भी अन्य सांसारिक वस्तु से नहीं कर सकते | इसीलिए धर्म का मूल्य मुद्रा में न होकर नैतिकता में निहित है अर्थात धर्म का केवल नैतिक मूल्य (Moral value) है | महत्वपूर्ण यह है कि नैतिक मूल्य सदैव ही मौद्रिक मूल्य (monetary value) से अधिक शक्तिशाली (powerful) होता है |

           अतः यह स्पष्ट है कि धर्म और सम्प्रदाय दोनों अलग अलग है | संप्रदाय अलग अलग हो सकते हैं परन्तु सभी सम्प्रदायों का धर्म लगभग एक ही होता है | कोई भी सम्प्रदाय असत्य भाषण को धर्म नहीं कहता, हिंसा की सभी संप्रदाय आलोचना ही करते हैं और इसी प्रकार सभी सम्प्रदायों में तप करने और दान देने का विशेष महत्त्व है | जो लोग धर्म का नाम लेकर झगड़ते हैं अथवा दंगा फसाद करते हैं वे सभी अधार्मिक लोग हैं | धार्मिक व्यक्ति कभी भी हिंसा में विश्वास नहीं रखता है | आज की आवश्यकता है कि हम सम्प्रदाय को धर्म से अलग समझकर केवल और केवल धर्म की राह पर चलें | धर्म का पालन करना ही हमें इंसान बनाता है अन्यथा एक पशु में और हमारे में कोई अंतर ही नहीं है | धर्म ही हमें पवित्र करता है | धर्म इसी जीवन का पुरुषार्थ है और धर्म पर चलते हुए कर्म करते रहने से ही इसकी उपलब्धि संभव है |

                  इस प्रकार अभी तक हुए चिंतन से मनुष्य जीवन के जो सूत्र निकल कर आये हैं, वे हैं-

1. मनुष्य जीवन मिलना परमात्मा की हम पर असीम कृपा होना है | इस जीवन को पशुवत व्यवहार करके बेकार न जाने दें |

2. मनुष्य जीवन में धर्म के अनुसार चलना ही मनुष्यता है अन्यथा एक पशु और एक मनुष्य में कोई भेद नहीं है |

3. धर्म हमें उस मार्ग पर ले जाता है जहां से सत्य को जाना जा सकता है | सत् को जानना ही आत्म-बोध है और इसे ही परमात्मा को जानना कहा जाता है |

4.धर्म से अर्थ और काम पुरुषार्थ है, काम और अर्थ से धर्म नहीं | काम और अर्थ धर्म से ही अर्जित किये जाएँ और धर्म के लिए ही इनका उपयोग किया जाये |  

           अभी तक हमने धर्म पर बड़ी गंभीर चर्चा की है | धर्म क्या है, इसको जानना बड़ा ही कठिन है और बड़ा सरल भी | कठिन इसलिए है क्योंकि धर्म और अधर्म को एक महीन सी रेखा विभाजित करती है जिससे कई बार हम अधर्म को धर्म समझ बैठते हैं | सरल इस दृष्टि से है कि जो बात हमारे अंतर्मन को सुखद और शास्त्रोक्त लगे, जिस कर्म को करने में हमें कठिनाई और घबराहट नहीं हो उसे निसंकोच किया जा सकता है क्योंकि वही धर्म है | इससे अधिक सरल शब्दों में धर्म को स्पष्ट नहीं किया जा सकता |

                कुछ और जीवन-सूत्र ढूँढने के लिए आगे बढ़ते हैं और पुनः आते हैं, आदिगुरू के कथन पर | उन्होंने विवेक चूड़ामणि में कहा है कि मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व और महापुरुष का सानिध्य भगवत कृपा से ही मिलता है | भगवत कृपा से मनुष्य शरीर मिल गया | एक पशु और एक मनुष्य जीवन में अंतर धर्म ही करता है, यह भी स्पष्ट हो गया है | अब प्रश्न उठता है कि मनुष्य के जीवन में मुमुक्षा (आत्म-ज्ञान को उपलब्ध होने की कामना) कब और कैसे पैदा होगी ?

           इतना तो निश्चित है कि प्रभु कृपा से यह मनुष्य जीवन मिला है तो उस शरीर के भीतर परमात्मा को जानने की जिज्ञासा भी होगी | आवश्यकता है उस मुमुक्षा को भीतर से सतह पर लाने की | मुमुक्षा को सतह पर लाने में निम्न दो की महत्वपूर्ण भूमिकाएं होती है, एक - सांसारिक जीवन की विभिन्न परिस्थितियां और दो - महापुरुष से मिलन |

                 हमारा मनुष्य जीवन केवल आत्म-बोध के लिए है, संसार में रमने के लिए नहीं, लेकिन होता है ठीक इसके विपरीत | हम प्रभु कृपा को भूल जाते हैं और स्वयं के सांसारिक व शारीरिक सुख के लिए अपना एक संसार बना लेते हैं | संसार में हमें सुख मिलता है, विभिन्न प्रकार के भोगों से | जब सांसारिक भोगों से हमें सुख होना प्रतीत होता है, तब भीतर गहराई में छुपी हमारी परमात्मा प्राप्ति की मुमुक्षा उसके नीचे दब कर रह जाती है | हम यह नहीं समझते कि भोग हमें सांसारिक सुख देते प्रतीत भले ही होते हों, एक न एक दिन यही भोग जीवन में हमारे दुःख का कारण बनते हैं | जीवन में आये दुःख के कारण बनी विपरीत परिस्थितियां ही हमारे सांसारिक जीवन में एक मोड़ ला सकती है और हमारी मुमुक्षा उभर कर सामने आ सकती है | यह मुमुक्षा ही हमें दुःख का कारण जानने को प्रेरित करती है और अंततः आत्म-ज्ञान का मार्ग प्रशस्त करती है |  

        मनुष्य के भीतर दबी पड़ी सुषुप्त मुमुक्षा को जाग्रत करने का कार्य करता है, विवेक | यह विवेक भी गुरु और भगवत कृपा से जाग्रत होता है | भगवत कृपा से महापुरुष से मिलन होता है, जो हमारी बुद्धि को तीक्ष्ण बनाते हुए विवेक को उदित कर देता है | यह विवेक हमारी सुषुप्त मुमुक्षा को जाग्रत कर देता है | श्री रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने कहा है –

      बिनु सतसंग बिबेक न होइ | राम कृपा बिनु सुलभ न सोइ ||

      होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा | तब रघुनाथ चरन अनुरागा ||

                  विवेक की भूमिका भोगों की अवहेलना करने में होती है | सांसारिक भोगों को भोगने के लिए तो पर्याप्त बुद्धि प्रत्येक जीव में होती है | मनुष्य ही एक मात्र ऐसा जीव है जो बुद्धि को विवेक में परिवर्तित कर सकता है | विवेक होने से उसे उचित और अनुचित का ज्ञान हो जाता है | इस प्रकार ज्ञान के हो जाने से वह समझ जाता है कि सांसारिक भोग प्रारम्भ में भले ही सुख देते हुए प्रतीत हो रहे हों, अंततः वे भोग ही दुःख के कारण बनते हैं |

          गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं-

               ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते |

               आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः || गीता-5/22 ||

     हे अर्जुन ! जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, विषयी पुरुषों को सुखरूप से अच्छे प्रतीत तो होते हैं, फिर भी यही भोग उसके दुःख के कारण बनते हैं |  ये सभी भोग आदि-अन्त वाले हैं | बुद्धिमान विवेकी पुरुष उन भोगों में नहीं रमता |

          सांसारिक भोगों से विमुख हुआ पुरुष अपने जीवन को परमात्मा की ओर मोड़ देता है क्योंकि वह समझ जाता है कि भोग उसे आवागमन से कभी भी मुक्त नहीं होने देंगे | आवागमन से मुक्त होने की इच्छा ही मुमुक्षा है | इस प्रकार जब मुमुक्षा जाग्रत हो जाती है तब स्व-चेतन अर्थात चैतन्य होने के लिए महापुरुष संश्रय ही शेष रहता है | महापुरुषों का संग भी भगवत कृपा से मिलता है | श्री रामचरितमानस में गोस्वामीजी इसी बात को लेकर कहते हैं –“बिनु हरिकृपा मिलही नहीं संता” |

           सांसारिक जीवन में जब भोग रुपी प्यास बढ़ती है तो उस प्यास को बुझाने के लिए प्यासे को ही कुएं के पास जाना पड़ता है | आध्यात्मिक जीवन में जब आत्म-बोध की मुमुक्षा बढ़ती है तब सांसारिक जीवन के ठीक विपरीत होता है अर्थात अध्यात्मिक जीवन में कुआं ही प्यासे के पास चला आता है | यह ईश्वर कृपा नहीं तो और क्या है ? एक बार इस जीवन में मुमुक्षा को जाग्रत करके तो देखिये, गुरु स्वतः ही मिल जायेंगे | आप यह न सोचिये कि सही गुरु की तलाश करनी है | जिस प्रकार आपको योग्य गुरु से मिलन की आकांक्षा है उसी प्रकार एक गुरु को भी योग्य शिष्य की आकांक्षा रहती है |

           योग्य गुरु केवल मुमुक्षा जाग्रत शिष्य को ही मिलते हों, ऐसा नहीं है | गुरु अपने शिष्य में छिपी मुमुक्षा को पहिचान लेता है | भीतर छिपी मुमुक्षा एक राख के ढेर के तले छिपी चिंगारी की तरह होती है जो जरा सी हवा लगते ही आग के रूप में सतह पर आ जाती है | इसी प्रकार शिष्य के भीतर दबी मुमुक्षा को गुरु हवा देकर सतह पर ला देता है |

         इस संसार में कथित गुरु भी बहुत फिर रहे हैं जो किसी भी सांसारिक भोगों में रत मनुष्य को अपना शिष्य बना लेते हैं | ऐसे गुरु का शिष्य से शिष्य का गुरु से केवल स्वार्थ का सम्बन्ध होता है | स्वार्थ का सम्बन्ध बंधनकारी होता है | योग्य गुरु आपको सभी बंधनों से मुक्त करता है जबकि ऐसे कथित धर्मगुरु शिष्य को स्वयं के साथ बाँध लेता है | ऐसे स्वार्थी गुरुओं से सचेत रहना चाहिए | कबीर ऐसे ही गुरुओं के बारे में कहते हैं-

     गुरु लोभी शिष लालची, दोनों खेले दांव |

     दोनों डूबे बापडे, बैठ पत्थर की नाव ||

          ऐसे गुरु शिष्य से कुछ अर्थ आदि पाने की लालसा रखते हैं और ऐसी ही आशा शिष्य गुरु से करता है | कबीर कहते हैं कि पत्थर की नाव तो केवल डूबा ही सकती है, पार नहीं ले जा सकती |

        हमारे भीतर दबी पड़ी परमात्मा को पाने की मुमुक्षा ही योग्य गुरु का संग दिला सकती है | गुरु रास्ते का वह संकेतक हैजो आपको गोविन्द को पाने का रास्ता बताता है किसी ओर संकेत केवल वही व्यक्ति कर सकता हैजो वहां उस लक्ष्य तक पहुँच चूका होजिस लक्ष्य को आप पाना चाहते हो गुरु आपको उस ओर संकेत करता है, जहाँ आप जाना चाहते हैं चलना आपको हैवह आपके साथ नहीं चलने वाला क्योंकि वह वहां तक पहुँच चूका है | पहुंचे हुए की यात्रा समाप्त हो चुकी होती है गुरु आपको संकेत भर ही नहीं करता बल्कि रास्ते में आने वाली प्रत्येक बात तथा बाधा के प्रति जागरूक भी करता है वह यह भी जानता है कि आप वहां तक पहुँच सकते हो अथवा नहीं इसीलिए वह रास्ते की सभी विशेषताओं और बाधाओं के प्रति आपको जागरूक कर देना चाहता है उस रास्ते पर अग्रसर आपको अकेले ही होना हैगुरु तो समय समय पर आपके रास्ते पर संकेतक के रूप में दृष्टिगोचर होता रहेगा |

                गुरु केवल मार्ग बताता हैचलना शिष्य को ही पड़ता है गुरु इशारों और संकेतों में बात करता है जब तक शिष्य अपने अन्दर मुमुक्षा नहीं रखता तब तक गुरु का संकेत समझना असंभव है गुरु भी अपने शिष्य का चयन उसकी प्यास को देखकर ही करता है जब तक शिष्य की प्यास एक सीमा से अधिक नहीं बढ़ जातीतब तक गुरु उसे मार्ग नहीं दिखा सकता अतः किसी योग्य गुरु के पास जाओतो प्यास लेकर जाओ अन्यथा आप रीते के रीते ही वापिस लौट आओगे प्यास ज्ञान कीप्यास आत्म-बोध की | आप अगर पहले से किसी प्रकार के कथित ज्ञान से भरे हुए होंजो कि वास्तव में देखा जाये तो केवल अपूर्ण और त्रुटिपूर्ण (Imperfect) ज्ञान होता हैतो ऐसे में सच्चा गुरु भी आपकी कोई सहायता नहीं कर सकता एक आदर्श गुरु को पहले आपके इस त्रुटिपूर्ण ज्ञान को मिटाना पड़ता है जो रीता होउसे ही भरा जा सकता हैभरे हुए को क्या भरना पहले अपना मस्तिष्क समस्त प्रकार के ऐसे अपूर्ण और त्रुटिपूर्ण ज्ञान से रिक्त करके आयें और फिर जिस व्यक्ति के पास जाने से आपके हृदय में परमात्मा को पाने के लिए हलचल मच जायेजिस व्यक्ति को सुनकर आपको लगे कि मुझे ऐसे ही किसी ज्ञानी व्यक्ति की खोज हैतो समझ लीजिये आपके लिए वही सच्चा गुरु है |

          योग्य गुरु आपकी मुमुक्षा को पहचानता है | वह आपकी मुमुक्षा को धार देकर और अधिक तीक्ष्ण बनाता है | वह आपको वह रास्ता बता देता है जिस पर चलकर उसने परम को पाया है | वह सब कुछ कर सकता है परन्तु परमात्मा को पाने की यात्रा आपको अकेले ही करनी है | योग्य गुरु के अनुभव आपको मार्ग बतला सकते हैं, लक्ष्य की प्राप्ति का अनुभव आपके साथ बाँट सकते हैं परन्तु आवश्यक नहीं कि उनको जो अनुभव हुआ है, जिस साधन से हुआ है वही साधन आपको वैसा ही अनुभव करा दे | नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता क्योंकि आपके गुरु का समय, उस समय की परिस्थितियां और उनका तथा आपका स्वभाव सभी भिन्न हैं | इसलिए लक्ष्य के बार में जानकारी तो वे सटीक दे सकते हैं परन्तु यात्रा आपको करनी है और वह यात्रा उनकी यात्रा से सर्वथा भिन्न होगी | उनकी ही नहीं आपके समकक्ष और समवय जो भी हैं, सबकी अपनी निजी यात्रायें होगी और भिन्न होंगी | हाँ, सबका लक्ष्य एक ही होगा |

        हमारे सनातन शास्त्र ऐसे ही महापुरुषों के माध्यम से रचे गए हैं | शास्त्र भी उसी समय और परिस्थति के हैं जब वे महापुरुष अपना मनुष्य जीवन जी रहे थे | वह समय, वे परिस्थितियाँ और वे मनुष्य, सब कुछ तो आज परिवर्तित हो गया है | आज शास्त्रों में व्यक्त ज्ञान आपका मार्गदर्शन तो कर सकते हैं परन्तु मार्ग आपको अपना ही नया बनाना होगा | आदिगुरू शंकराचार्य जिस मार्ग से चलकर परम तक पहुंचे थे, वह मार्ग हमें आज ढूंढें भी नहीं मिलेगा क्योंकि उनका समय. उनकी परिस्थितियां आदि सभी कुछ वर्तमान से भिन्न थे | परन्तु जैसा आदिगुरू ने शास्त्रों में लिखा है, वह आज भी सत्य है और अनुकरणीय है | शास्त्रों में समाहित ज्ञान ही हमें अपने लक्ष्य का संकेत करते हैं और उस लक्ष्य पर दृष्टि जमाकर हमें उस लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बनाना पड़ता है |

              अतः आवश्यक है कि हम महापुरुषों और शास्त्रों के संकेतों को समझें और समय और परिस्थितिवश अवरुद्ध हुए मार्ग को खोलकर नया मार्ग बनाने का प्रयास करें | जिस प्रकार एक पक्षी आकाश में उड़ता है तो एक अपने निश्चित मार्ग से उड़ता है | दूसरा जो पक्षी उसके बाद आता है तो उसे यह तो पता रहता है कि पहले वाला पक्षी किस लक्ष्य की ओर गया है परन्तु उसे पहले वाले पक्षी का मार्ग दिखलाई नहीं पड़ता | उसे उसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए परिस्थिति अनुसार अपना अलग मार्ग स्वयं ही बनाना पड़ता है | 

             एक कुम्हार को मिट्टी खोदते हुए अचानक एक चमकीला पत्थर मिल गया | उसने उसे अपने गधे के गले में बांध दिया | एक दिन एक बनिए की नज़र उस पत्थर पर पड़ गयी | उसने उस कुम्हार से उसका मूल्य पूछा | कुम्हार की पत्नी ने कुम्हार से गुड लाने को कहा था | बनिए द्वारा पूछने पर उसे सर्वप्रथम गुड का ही विचार आया | कुम्हार ने तत्काल ही कहा- “सवा सेर गुड़” | बनिए ने कुम्हार से गुड देकर वह पत्थर खरीद लिया |

         वह चमकीला पत्थर वास्तव में एक बहुमूल्य हीरा था | बनिए ने भी उस हीरे को एक चमकीला पत्थर ही समझा और अपनी तराजू की शोभा बढाने के लिए उस पत्थर को उससे बाँध दिया | एक दिन एक जौहरी की दृष्टि तराजू पर बंधे उस चमकीले पत्थर पर पड़ गयी | वह समझ गया कि यह तो बहुमूल्य हीरा है | उसने बनिए से उस पत्थर का मूल्य पूछा | बनिए ने कहा – पांच रूपये | जौहरी थोडा कंजूस और लालची था | हीरे का मूल्य केवल पांच रूपये सुनकर समझ गया कि बनिया इस कीमती हीरे को एक साधारण चमकीला पत्थर ही समझ रहा है | वह उससे मोल-भाव करने लगा और बोला- पांच रूपये तो नहीं, चार रूपये ले लो | बनिए ने मना कर दिया क्योंकि उसने चार रूपये का सवा किलो गुड़ देकर तो उस पत्थर को खरीदा ही था | घाटा उठाकर वह बेचना नहीं चाहता था | जौहरी ने सोचा - “इतनी भी क्या जल्दी है, मुझे ? क्यों व्यर्थ में ही एक रूपया अधिक दूँ ? कल आकर फिर मोल-भाव करूँगा | नहीं माना तो पांच रूपये देकर खरीद ही लूँगा | इतने दिन ही यह नहीं बिका तो फिर एक रात में क्या हो जायेगा ?”

              परन्तु इस जौहरी की सोच ही निम्न थी | होने के लिए एक रात तो क्या, एक पल का समय भी बहुत होता है | संयोग से दो घंटे बाद एक अन्य जौहरी कुछ आवश्यक सामान खरीदने उसी बनिए की दूकान पर आता है | जौहरी तराजू पर बंधे हीरे को देखकर चौंक जाता है | उसने सामान लेने के स्थान पर उस चमकीले पत्थर का मूल्य पूछ लिया | बनिए के मुख से पांच रूपये सुनकर उस जौहरी ने पांच रूपये में उस पत्थर को खरीद लिया और हीरा लेकर ख़ुशी-ख़ुशी चल पड़ा |

       दूसरे दिन वह पहलेवाला जौहरी बनिए के पास आया | पांच रूपये उसके हाथ में थमाते हुए बोला कि लो भाई ये पांच रूपये और वह चमकीला पत्थर मुझे दे दो | बनिया बोला कि वह पत्थर तो कल आपके जाने के कुछ समय बाद ही कोई दूसरा आदमी ले गया | यह सुनकर जौहरी ठगा सा रह गया | अपना दुःख कम करने के लिए वह बनिए से बोला कि मूर्ख है तूं ! वह साधारण पत्थर नहीं था, हीरा था हीरा | उसका मूल्य एक लाख रूपये से कम नहीं था | बनिया बोला – “मुझसे बड़े तो तुम मूर्ख हो | मैं तो जानता नहीं था कि वह चमकीला पत्थर हीरा है परन्तु तुम तो जानते थे ना | मेरी दृष्टि में तो वह साधारण पत्थर था और उसको मैंने चार रूपये का गुड देकर खरीदा और पांच रूपये में बेच दिया | मुझे तो एक रूपये का लाभ ही हुआ | तुम तो जानते थे कि इसकी कीमत एक लाख रूपये से कम नहीं है फिर भी तुमसे वह पांच रूपये में भी खरीदा नहीं गया |”

            इसलिए सच्चे संत मिलते ही पकड़ लीजिये, ज्यादा मोल-भाव न कीजिये | ज्ञान, बुद्धि और अहंकार का समर्पण उनके चरणों में कर दीजिये, यही सच्ची साधना है |

           हम अपने जीवन को आनंदित बनाने के लिए जीवन-सूत्र खोज रहे हैं | अभी तक हुए चिंतन से स्पष्ट है कि जीवन का उद्देश्य जाने बिना हमारा जीवन आनंदमय नहीं हो सकता | हमें इस मनुष्य जीवन को कैसे जीना है, यह चिंतन उसी के लिए कुछ सूत्र दे रहा है | मनुष्य जीवन में धर्माचरण का बड़ा ही महत्व है | धर्म ही हमें सही मार्ग पर अग्रसर करते हुए अपने लक्ष्य तक ले जा सकता है | धर्म के अनुसार हमारा आचरण कैसे हो और जीवन में हमारी आगे की यात्रा किस प्रकार की हो, उसके लिए कुछ सूत्र निकल कर सामने आये हैं –

1. मनुष्य जीवन के साथ साथ हमारे भीतर स्वयं को जानने और निज स्वरुप को पहिचानने के लिए मुमुक्षा भी मिली है |

2. भीतर दबी मुमुक्षा को सतह पर लाने में हमारे समक्ष आने वाली परिस्थितियाँ सहायक होती हैं, विशेषकर विपरीत परिस्थितियाँ |

3.मुमुक्षा को जाग्रत कर तीव्रता प्रदान करने के लिए महापुरुष का संश्रय आवश्यक होता है |

4. महापुरुष संश्रय आपको भगवत कृपा से मिलता है, बस आपको ऐसे महापुरुष को पहिचान लेने की आवश्यकता है | फिर ऐसे महापुरुष के सान्निध्य में रहें |  

5. गुरु से सत्संग करना ही आपको आत्म-बोध के द्वार तक ले जायेगा |

               मनुष्य-जीवन में जब तक हम संसार में आकंठ डूबे रहेंगे, तब तक जीवन बड़ा कठिन लगता रहेगा | सांसारिक जीवन कष्टमय है इसलिए कठिन भी है | कष्ट हमारे कारण से ही है क्योंकि संसार में जैसा हम चाहते हैं ठीक उसी अनुरूप कभी होता ही नहीं और हो सकता भी नहीं | जब हमारे अनुरूप कुछ होता नहीं तब हम सब कुछ जानते हुए भी उसे हमारे अनुकूल बनाने का असफल प्रयास करते रहते हैं और ऐसे ही प्रयास हमें और अधिक उलझा कर रख देते हैं | हरिः शरणम् आश्रम बेलडा हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्दराम शर्मा कहते हैं कि यह संसार कांटो की बाड़ी है जिसमें प्रवेश कर मनुष्य उसी में उलझकर मर जाता है | संसार में रमेंगे तो उलझने के अतिरिक्त कोई और रास्ता भी नहीं रह जाता है | संसार की उलझन से बाहर निकलने का रास्ता मिलता है, हमरी मुमुक्षा से और गुरु के मार्गदर्शन से | जिस दिन हम यह बात समझ लेंगे, तब गुरु का सान्निध्य हमें इन कंटीली झाड़ियों में उलझने से बचा लेगा और जीवन की दिशा और दशा तक परिवर्तित हो जाएगी |

          आदिगुरू शंकराचार्यजी महाराज के विवेक चूड़ामणि में कहे गए कथन पर हमने विस्तृत चर्चा की | प्रभु कृपा से मनुष्य जीवन मिल गया, बड़ी अच्छी बात है | मनुष्य जीवन को हमें धर्म के अनुसार जीना है | हमें कौन बताएगा कि हमारा धर्म क्या है ? धर्म कहते हैं कर्तव्य कर्म को | कर्तव्य कर्म के बारे में केवल शास्त्र ही प्रमाण है इसलिए हमें शास्त्रों के अनुसार ही कर्म करने हैं | गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं-

           यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः |

           न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || गीता-16/23 ||

    जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न तो सिद्धि को प्राप्त होता है, न ही परमगति को और न ही सुख को |

             हमारे शास्त्र उन महापुरुषों के द्वारा लिखे गए हैं, जिन्होंने अपना जीवन आत्म-बोध को उपलब्ध होने के लिए अर्पित कर दिया | ऐसे शास्त्र ही हमें कर्तव्य और अकर्तव्य के बार में ज्ञान दे सकते हैं | इन्हीं शास्त्रों के अनुसार हमें आचरण करना चाहिए | हम इन शास्त्रों को छोड़कर स्वेच्छाचारी बन जायेंगे तो हम अपने जीवन में भटक जायेगे, कहीं के नहीं रहेंगे | न तो हमें सिद्धि ही मिलेगी और न ही सुख | उस परम तक पहुँचने की बात करना तो बेमानी ही होगा |

          भगवान् इसी अध्याय में आगे कहते हैं-

        तस्माच्छास्त्रं प्रमाण ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ |

        ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || गीता-16/24 ||

     कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है | हे अर्जुन ! ऐसा जानकर तू शास्त्रविधि से कर्म करने योग्य है | इस प्रकार यह स्पष्ट है कि धर्म का अर्थ है, कर्तव्य कर्मों को करना | कर्तव्य कर्म हैं, शास्त्रोक्त कर्म करना |

         गीता में भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं – ‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठतेकर्मकृत्त्’ (गीता-3/5) अर्थात इसमें कोई संदेह नहीं है कि कोई भी मनुष्य किसी भी काल में बिना कर्म किये हुए नहीं रह सकता | इसका अर्थ हुआ कि मनुष्य जीवन में कर्म करने ही पड़ते हैं | मनुष्य चाह कर भी कर्म करने से पलायन नहीं कर सकता | कारण कि जो पुरुषार्थ पूर्व मानव जन्म में किये गए थे वे संचित होकर इस जन्म में फल देने को उद्यत हैं और फल कभी कर्म किये बिना नहीं मिल सकते | मनुष्य जन्म के साथ ही प्रकृति के तीन गुणों से ओतप्रोत रहता है और ये गुण ही मनुष्य से कर्म करवाके फल देते हैं |

            अर्जुन युद्धभूमि में स्वजनों को देखकर विषाद करने लगा था और सोच रहा था कि कोई राह मिल जाये जिससे युद्ध जैसा घोर कर्म न करना पड़े | इसके लिए अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण को माध्यम बनाया और उनसे बहुत सारी ज्ञान की बाते कही परन्तु वास्तव में वह ज्ञान नहीं था | हम भी कर्म करने से बचने के लिए ऐसे ही किसी तथाकथित ज्ञान का सहारा लेते हैं और कई बार सफलतापूर्वक कर्म करने से बच भी निकलते हैं | परन्तु अर्जुन का सामना तो साक्षात् परमात्मा से हुआ था | श्री कृष्ण ही परमात्मा है, इस बात का  ज्ञान उसे स्वयं को भी नहीं था | भगवान् श्री कृष्ण उसे बहुत प्रकार से और बार-बार समझाते हैं और धीरे धीरे उसे उसके कर्तव्य का बोध कराते हैं | वे कहते हैं कि –

           स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा |

           कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोSपि तत् || गीता-18/60 ||

   हे कुन्तीपुत्र ! जिस कर्म को तू मोह (अज्ञान) के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी तू पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा |

                मोह (अज्ञान) जब मनुष्य की बुद्धि पर प्रभावी हो जाता है तब उसे वास्तविक ज्ञान विस्मृत हो जाता है | तब वह समक्ष उपस्थित हुई परिस्थति को अपने विपरीत समझने लगता है और कर्म करने से दूर भागने का प्रयास करता है | जीवन में पलायन करना मनुष्य जीवन के उद्देश्य की उपेक्षा और स्वयं के साथ विश्वासघात करने जैसा है | मनुष्य जीवन की यही वास्तविकता अर्थात कर्म करना अथवा कर्म से पलायन करना दोनों ही उसे जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकलने नहीं देती |

        प्रश्न उठता है कि क्या कर्म ही हमें जन्म – मरण के चक्कर में डाले रखता है ? कर्म के बारे में ऐसा कहना शतप्रतिशत सत्य है | गीता के चौथे अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण ने कर्म का विवेचन भलीभांति किया है | कर्म, अकर्म और विकर्म को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं कि विकर्म तो व्यक्ति को करने ही नहीं चाहिए | जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान है,वह योगी है और वह सभी कर्मों को करने वाला है | (गीता-4/18) कर्म करना और उसे अकर्म बना देना इसका अर्थ है बिना कर्ताभाव के, बिना फल की कामना के कर्म करना | अकर्म में कर्म देखना अर्थात कर्तापन और फल की इच्छा का ही त्याग कर देना |

         कर्म अपना फल देने के लिए हजारों वर्षों तक आपका पीछा कर सकते हैं | प्रत्येक कर्म का एक निश्चित परिणाम अवश्य ही होता है, बिना फल दिए कोई कर्म रहता ही नहीं है | समस्त कर्म फल का भोग किये बिना मनुष्य आवागमन से मुक्त नहीं हो सकता | कई लोग इस कथन का विपरीत अर्थ निकाल लेते हैं कि जब कर्म के कारण ही बार-बार शरीर बदलना पड़ता है तो फिर हम कर्म ही क्यों करें ? नहीं, ऐसा सोचना भी अनुचित है | कर्म से पलायन करना भी आपको विभिन्न योनियों में भटकाता रहेगा | मनुष्य कर्म योनि के साथ साथ भोग योनि भी तो है | पूर्व मानव जीवन के कर्म जिन्हें किसी फल की इच्छा से किया गया था वे इस मनुष्य जीवन में फलीभूत होंगे और उस फल को प्राप्त करने के लिए आपको कर्म तो फिर भी करने पड़ेंगे | आप जब तक पूर्व जन्म में शेष रही कामना का फल प्राप्त कर नहीं लेते तब तक आप मुक्त होने की कल्पना नहीं कर सकते |

            इस बात को भगवान् ने अर्जुन को स्पष्ट किया था कि तुम्हारा स्वभाव तुम्हें युद्धभूमि में खींच लायेगा | अर्जुन को अपने पूर्व मानव जन्म के किये गए कर्मों के आधार पर ही क्षत्रिय स्वभाव मिला था | क्षत्रिय का स्वभाव ही युद्ध करना है | अगर अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण के कहने के बाद भी युद्ध भूमि से पलायन कर जाता तो वह पुनः विभिन्न योनियों में भटककर अंततः एक क्षत्रिय के रूप में मनुष्य जन्म लेता और उसे फिर कोई न कोई युद्ध लड़ना पड़ता | बिना युद्ध लड़े वह भी मुक्त नहीं हो पाता |  

        गीता में श्री कृष्ण बार-बार अर्जुन को यही समझाते रहे कि किसी समस्या से पलायन करना उसका उचित समाधान नहीं हो सकता, अतः समस्या का सामना कर उसका निराकरण करना ही उचित है | पलायन आपको कर्म करने से विमुख करता है, जोकि भीतर भय उपजने का संकेत है जबकि भयमुक्त रहकर कर्म करने से किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है | हाँ, यह सत्य है कि प्रत्येक कर्म का फल मिलना निश्चित है फिर भी जीवन में कभी भी स्वाभाविक कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए |

         सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् |

         सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता || गीता-18/48 ||

           हे कौन्तेय ! सम्पूर्ण कर्म धुएं से अग्नि की तरह दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए | जैसे अग्नि प्रज्वलित होती है तो धुआँ भी निकलता है फिर भी अग्नि को प्रज्वलित करना आवश्यक है | धुआं अग्नि में दोष है फिर भी अग्नि का त्याग नहीं किया जा सकता | उसी प्रकार कर्म में केवल एक ही दोष है कि वह फल अवश्य देता है परन्तु इस आधार पर कर्म का त्याग नहीं किया जा सकता | कर्म का त्याग करने से हमारी पूर्वजन्म में अपूर्ण रही कामनाएं पूरी कैसे होगी और अगर उन कामनाओं के लिए किये गए कर्मों के फल को नहीं भोगेंगे तो फिर उन कामनाओं से मुक्त कैसे हो पाएंगे ? इसलिए इस जीवन में स्वभावानुसार किये जाने वाले कर्म का त्याग करना अनुचित है |

             अब प्रश्न यह उठता है कि कर्म दोषयुक्त है, तो हम किस प्रकार के कर्म करें कि दोष न्यूनतम हों अथवा बिलकुल भी न हों | इसका उत्तर भगवान् ने दूसरे अध्याय में ही दे दिया है |

       कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |

       मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोSस्त्वकर्मणि || गीता-2/47 ||

     तेरा कर्म करने में अधिकार है, उसके फल में कभी नहीं | इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु (कारण) मत बन तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो |

       अष्टावक्र गीता हमारा बहुत ही महत्वपूर्ण ज्ञान-ग्रन्थ है | इसमें महाराज जनक को अष्टावक्र मुनि कह रहे हैं-

            सुखदु:खे जन्ममृत्यु दैवादेवेति निश्चयी |

            साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते ||अ.गीता-11/4||

     सुख और दुःख, जन्म और मरण; देवयोग से प्राप्त होते हैं, ऐसा निश्चय करने वाला पुरुष साध्य कर्मों को देखता हुआ और प्रयास रहित कर्मों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता |

          मनुष्य प्रकृति के साथ बंधा हुआ है और प्रकृति भगवान के अधीन है | जगत को सुचारू रूप से चलाने और उससे आनंद प्राप्त करने के लिए परमात्मा ने प्रकृति के कुछ नियम बनाये हैं | उन नियमों के आधार पर ही कर्म हमें फल देते हैं | सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि सभी हमारे ही कर्मों के परिणाम है | अच्छे फलों के प्राप्त होने पर तो हम स्वयं की पीठ थपथपाने लगते हैं और कर्मों का उल्टा परिणाम मिलने पर दूसरों को दोष देने लगते हैं | नहीं, ऐसा कभी हो नहीं सकता कि हमें कोई दूसरा दुखी कर दे अथवा हानि पहुंचा दे | इन सब फलों के लिए हम ही उत्तरदायी हैं | जैसे हम कर्म करेंगे उसका परिणाम हमें वैसा ही भोगना होगा |  

   काहू न कोउ सुख दुःख करि दाता | निज कृत कर्म भोग सबु भ्राता ||मानस-2/92/4||

          जगत में जीव अगर कर्ता बनता है तो फिर उसे भोक्ता भी बनना होगा | परमात्मा न तो कर्ता हैं और न ही भोक्ता | उन्होंने तो केवल प्रकृति को निश्चित नियमों में  ढाल दिया है और हम आसक्तिवश उन नियमों को तोड़कर अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए कर्म करने में लग गए हैं | जिसका परिणाम हमें ही भुगतना होगा, इसके लिए किसी अन्य को दोष नहीं दिया जा सकता |

       श्री रामचरितमानस में भी यही बात वसिष्ठ मुनि भरतजी को कह रहे हैं –

                  सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ |

                  हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ||2/171||

    विधि ही प्रकृति है, जो कर्मों के अनुसार हमें उनका फल देती है | अतः सुख-दुःख, हानि-लाभ, जीवन-मरण जीवन में चलते रहेंगे | भला ! इनसे विचलित होने की हमें आवश्यकता ही कहाँ है ?               

         गीता के दूसरे अध्याय से लेकर 18 वें अध्याय तक भगवान् श्री कृष्ण विविध प्रकार से कर्म के बारे में अर्जुन को ज्ञान देते है फिर भी अर्जुन युद्ध में होने वाले असंख्य मानव वध के पाप के बारे में ही सोचकर उलझा रहता है | अंततः भगवान् उसे कर्म के बारे में अंतिम और सनातन सत्य बतला ही देते हैं | वे कहते हैं -     

     सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

     अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः || गीता-18/66 ||

     सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझ में त्यागकर तू केवल मेरी शरण में आ जा | मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा |

              गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म के बारे में यह अंतिम और निश्चित बात कही है | कई व्यक्ति इस श्लोक के अर्थ का अनर्थ करते हुए इसको कर्तव्य कर्मों के त्याग से ले लेते हैं | वास्तव में भगवान यहाँ कर्मों के त्याग की बात नहीं कह रहे हैं क्योंकि कर्मों के त्याग की बात कहते तो पूर्व में ऐसा क्यों कहते कि सभी प्राणी अपने स्वभाववश कर्म करने को विवश है तथा साथ ही साथ यह भी कहते हैं कि कोई भी मनुष्य कभी भी एक क्षण के लिए भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता | ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज स्पष्ट करते हैं कि इस श्लोक में सभी “धर्मों के आश्रय का त्याग करके एक मेरी शरण में आ जा” का अर्थ है कि जीवन में केवल कर्तव्य कर्मों का आश्रय न ले, अपितु एक मेरा आश्रय लेते हुए सभी कर्तव्य कर्म कर | त्याग तो करना है परन्तु कर्त्तव्य कर्मों का नहीं बल्कि उन कर्मों के आश्रय का त्याग करना है |

             एक परमात्मा का आश्रय लेने से ही धर्म का आचरण हो जाता है | कर्तव्य-कर्म तो करना ही है, चाहे प्रत्येक कर्म में दोष हो परन्तु जब कर्म परमात्मा के आश्रय होकर किये जाते हैं तब वे सभी कर्म अकर्म की श्रेणी में आ जाते है और फिर उनका परिणाम मनुष्य को भुगतना नहीं पड़ता |

            संसार में जितने भी चर-अचर जीव तथा चेतन-अचेतन सृष्टि है, सब कुछ परमात्मा ही है | एक परमात्मा के अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है | ऐसा स्वीकार कर लेने पर प्रथम तो व्यक्तिगत स्वार्थ से कर्म होंगे ही नहीं और जो कुछ भी कर्म होंगे भी वे सभी कर्म शास्त्रोक्त ही होंगे | इस प्रकार कर्म भी परमात्मा के आश्रय में परमात्मा के लिए ही होंगे | फिर सभी कर्म अकर्म ही कहे जायेंगे और व्यक्ति कर्म-बंधन में नहीं फंसेगा | फिर कहाँ रहेगा कोई बंधन ? यही जीवन-मुक्ति है | 

          जीवन-सूत्रों पर चिंतन करते हुए हम ऐसे मोड़ पर आ पहुंचे हैं, जहाँ पर आकर जीवन में कर्म का महत्त्व स्पष्ट हो जाता है | मनुष्य जीवन एक पशु की तरह केवल भोग योनि ही नहीं बल्कि भोग के साथ साथ कर्म/योग योनि भी है | इस कर्म योनि को कर्म के माध्यम से योग योनि में बदल डालना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है | कर्म पर चर्चा करते हुए जीवन के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र सामने आये हैं, जिनको सूक्ष्म रूप से निम्न प्रकार से अभिव्यक्त किया जा सकता है-

1. प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में कर्म करने आवश्यक हैं | चाहकर भी वह कर्म से विमुख नहीं हो सकता | प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में आने वाली अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के लिए स्वयं उत्तरदायी है | किसी अन्य को दोष देना अनुचित है | इसलिए जीवन में किसी से राग-द्वेष न करें |

2. पूर्व जन्म के शेष रहे भोगों के लिए स्वाभाविक कर्म करने से उसे वे भोग प्राप्त होंगे और इस जन्म में धर्म मार्ग पर चलते हुए उसे कर्तव्य कर्म करने चाहिए |

3. केवल भोगों के लिए किये जाने वाले कर्म हमें आवागमन से कभी मुक्त नहीं होने देंगे | इसलिए जीवन में भोगों की इच्छा रखते हुए किसी भी प्रकार का कर्म न करें |

4.कर्तव्य-कर्म कौन कौन से है, इसका उत्तर हमारे शास्त्र दे सकते हैं | अतः जो भी कर्म करें वे शास्त्रोक्त ही होने चाहिए |

5. प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त अवश्य है, ऐसा सोचकर कर्मों से पलायन करना उचित नहीं है | पलायन करना ही है तो कर्मों के आश्रय से पलायन करें अर्थात कर्तव्य कर्मों का आश्रय न लें | केवल परमात्मा का आश्रय लेकर ही कर्म करें | ऐसे किये जाने वाले सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं जो कि फल नहीं देते और हमें मुक्त करने वाले होते हैं |

          कर्मों के बारे में जितनी भी चर्चा की जाये कम ही है | कर्म को समझना बड़ा ही मुश्किल है, ’गहना कर्मणो गतिः (गीता-4/17) | सीधे सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि जिन कर्मों को करने में आपके अंतःकरण को पीड़ा का अनुभव हो, ऐसे कर्मों को करने से बचना चाहिए | हम सबके भीतर परमात्मा अंतर्यामी के रूप में उपस्थित हैं | वे प्रतिपल हमारे द्वारा किये जाने वाले शुभ कर्म के बारे में हमें अनुमति देने और अशुभ कर्म के प्रति हमें सचेत करने की भूमिका निभाते रहते हैं | आवश्यकता है कि भीतर ऐसी ही उठने वाली प्रत्येक आवाज का सम्मान करते हुए अपने द्वारा किये जाने वाले कर्मों की दिशा निश्चित करें |

           यह मनुष्य जीवन संसार में केवल आवागमन के लिए ही नहीं मिला है, यह जीवन मिला है स्वयं को जानने के लिए | जब हम किसी से उसका परिचय पूछते है, तो क्या वह अपना सही परिचय दे सकता है ? वह कहेगा कि मेरा नाम X है, मैं Y का पुत्र हूँ और मैं Z नामक नगर में रहता हूँ | क्या यह उसका वास्तविक परिचय है ? उसका X नाम उसके भौतिक शरीर का नाम है, पिता का नाम Y जो वह बता रहा है, उस व्यक्ति के शरीर का नाम है, जिसके माध्यम से उसने यह शरीर प्राप्त किया है और जिस Z नगर में वह रहता है वह उसका स्थाई निवास नहीं है | देखा जाये तो इससे पहले के जीवन में उसका, उसके पिता का नाम तथा निवास स्थान कोई और ही थे और भावी जीवन में कुछ अन्य होंगे | जो परिचय उसने दिया है वह सही मायने में उसका परिचय नहीं है | वह तो केवल वर्तमान शरीर के इस संसार में रहने तक की अवधि तक का परिचय है |

          सांसारिक व्यवहार की दृष्टि से देखा जाये तो उसका यह दिया गया परिचय अनुचित नहीं है परन्तु जीवन में उस परिचय के अनुसार ही स्वयं को मान लेना गलत है | प्रश्न उठता है कि फिर उसका परिचय कौन सा होना चाहिए ? इसी परिचय की खोज को ही आत्म-बोध की यात्रा कहा जाता है जो कि मनुष्य जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य है | नहीं, केवल महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि एक मात्र उद्देश्य है | अपना वास्तविक परिचय केवल स्वयं को ही जानना है | मनुष्य स्वयं का परिचय भूल चूका है और इस विस्मृति का जिम्मेवार भी  वह स्वयं है | मैं इसे विस्मृति ही कहूँगा क्योंकि अपनी कोई वस्तु कहीं रखकर भूल जाना स्मृति का अस्थायी रूप से लोप हो जाना है | कोई अन्य व्यक्ति आपकी उस वस्तु को ढूँढने में सहायता कर सकता है परन्तु उस खोई हुयी वस्तु को पहिचानना केवल आपके द्वारा ही संभव हो सकता है |

              आप अपना वास्तविक परिचय भूल गए हैं अर्थात आप स्वयं खो गए हैं | आपकी इस विस्मृति को पुनः लौटाने में सहायता करने वाला ही गुरु कहलाता है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि आत्म-बोध में सहायक आपका गुरु है परन्तु आत्म-बोध के लिए आपको ही प्रयास करना है | इसलिए आत्म-बोध की यात्रा आपके स्वयं की यात्रा है. वह आपके गुरु की यात्रा तनिक सी भी नहीं है |

         प्रश्न उठता है कि क्या आत्म-बोध हो जाने से आपका सांसारिक परिचय छूट जायेगा और केवल वास्तविक परिचय शेष रह जायेगा ? नहीं, ऐसा होना इस शरीर के रहते संभव नहीं है क्योंकि आप तो अपना सही परिचय जान चुके हैं परन्तु आपके इस संसार के सम्बन्धी तो आपको सांसारिक परिचय से ही जानेंगे | इसलिए चाहे आप स्वयं को जान चुके हों परन्तु व्यवहार की दृष्टि से आपका परिचय वही रहेगा जिससे यह संसार आपको जानता है | हाँ, आत्म-बोध होने के बाद आपके व्यवहार, रहन-सहन और कथन में परिवर्तन अवश्य आ जायेगा |

        स्वामी रामतीर्थ एक बार भ्रमण पर थे | आत्म-ज्ञान को उपलब्ध यह महापुरुष अपना सांसारिक परिचय लगभग भूल चूका था | बस, याद रहा था तो अपने नाम का केवल एक ही शब्द “राम” | जब वे किसी दूसरे स्थान की यात्रा पर होते तो किसी मित्र अथवा परिचित के यहाँ ठहरते थे | दिन में भ्रमण पर रहते और शाम को लौट आते | एक बार किसी स्थान के भ्रमण पर थे | जब वे भ्रमण से अपने निवास स्थान अर्थात जहाँ पर वे अतिथि बनकर रुके हुए थे लौटते तो लौटकर दिन भर की गतिविधियों के बारे में बात करते हुए कहते थे कि आज राम के साथ यह हुआ आज राम के साथ वह हुआ | आज तो राम के पीछे एक बन्दर पड़ गया | बड़ी मुश्किल से उसने राम का पीछा छोड़ा | ‘आज तो राम को खूब गालियाँ पड़ी’ कहकर हंस पड़ते थे | मेजबान कहते कि सीधे-सीधे ऐसा क्यों नहीं कहते कि गालियाँ आपको पड़ी ? वे हंस देते और कहते ‘गालियां तो राम को ही पड़ी, मैं तो केवल दूर खड़ा देख रहा था’ |

              इसे कहते हैं, संसार में रहते हुए संसार में लिप्त न होना; शरीर में रहते हुए भी शरीर को स्वयं होना न मानना | स्वामी रामतीर्थ वाली स्थिति हो जाती है, आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हुए व्यक्ति की | नाटक में अभिनय करने वाला अभिनेता भले ही नाटक में एक राजा की भूमिका निभा रहा हो परन्तु वह स्वयं के बारे में जानता है कि नाटक के समाप्त होते ही उसे अपने घर लौट जाना है, जहाँ टूटे-फूटे घर में बच्चे साथ में खाना खाने के लिए उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं | नाटक में एक गरीब व्यक्ति द्वारा निभाई गयी राजा की भूमिका से वह वास्तविक जीवन में राजा नहीं हो जाता | परन्तु इस मनुष्य-जीवन के दुर्भाग्य पर क्या कहूँ ? मनुष्य को जिस पात्र का अभिनय करने के लिए उसे इस संसार में भेजा गया है, स्वयं को अभिनीत पात्र ही समझ बैठा है | अरे ! इस जीवन को अभिनय की तरह जीओ और सदैव यह बात स्मृति में रखो कि अभिनय समाप्त होते ही अपने मूल स्थान पर लौटना है | जिस दिन इस बात को स्वीकार कर लेंगे, आपका मनुष्य जीवन सफल हो जायेगा | फिर न किसी से राग होगा और न ही किसी से द्वेष | संसार के रंगमंच पर राजा के परिधान पहनकर भले ही सुखी होना अनुभव करो परन्तु पटाक्षेप होने पर दुखी मत होना कि थोड़ी देर पहले मैं क्या था और अब क्या हो गया हूँ ?

     आत्म-ज्ञान होते ही मनुष्य अपने जीवन में सभी द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है | मनुष्य जीवन निर्द्वंद्व होने से ही आनंदमय हो सकता है | मनुष्य में जो भी विकार आते हैं वे सब सांसारिक (जड़ में) हैं स्वयं का स्वरुप तो विकार रहित (चेतन) है | सांसारिक विकार आपको किसी भी प्रकार कहीं से भी छू नहीं सकते | विकारों से अगर आप प्रभावित होने लग गए तो निश्चित है कि आप पतन की राह पर हैं, आप जड़त्व से मुक्त नहीं होना चाहते | जिस दिन आप यह समझ जायेंगे कि विकार जड़ तत्व में है, चेतन में नहीं, तत्काल ही आप स्व-चेतन की अवस्था को प्राप्त कर लेंगे |

             भय प्रत्येक प्राणी के जीवन की वास्तविकता है | डंडे के भय से पशु से किसी भी प्रकार का कार्य लिया जा सकता है यहाँ तक कि सबसे खूंखार जानवर शेर को भी वश में किया जा सकता है | डंडे के भय से मनुष्य भी सब कुछ करने को विवश हो जाता है | विचारणीय बात तो यह है कि डंडा शरीर को कष्ट दे सकता है, आपको नहीं क्योंकि आप शरीर नहीं है | इसका अर्थ यह भी नहीं है कि आप डंडे खाते रहें और दर्द का अनुभव आपको नहीं हो | आपको डंडे खाने से बचना है क्योंकि यह शरीर भी एक साधन है, परमात्मा को पाने के लिए, स्वयं को जानने के लिए | अतः इसकी सुरक्षा करना आपका दायित्व है | आत्म-ज्ञान आपको भयमुक्त करता है | भयमुक्त हो जाने की अवस्था में डंडे की मार से आपको दर्द का अनुभव तो होगा परन्तु आप उस दर्द को सहन कर लेंगे, हाय-तौबा नहीं करेंगे क्योंकि आपको यह ज्ञान हो चुका है कि डंडा शरीर को पड़ रहा है आपको नहीं |

             मनुष्य जीवन को निष्कंटक बनाना और आनंद के साथ जीना है, तो प्रथम और आवश्यक शर्त है कि आप भय मुक्त हों | व्यक्ति भयग्रस्त रहते हुए अपने जीवन को सही रूप से जी नहीं पाता और सांसारिक दुःख-सुख के चक्कर में इसे व्यर्थ ही गवां डालता है | मनुष्य जीवन यूँही व्यर्थ गंवाने के लिए नहीं है | जीवन में सुख-दुःख आदि आते-जाते रहते हैं, इनसे अपने भीतर भय क्यों मानना ? आप चाहकर ही सुख-दुःख से भाग नहीं सकते, सब कुछ आपको सहन करना ही पड़ेगा | चिंता आर भयमुक्त जीवन जीने के लिए यह आवश्यक है कि शारीरिक सुख-दुःख को सहज रहते हुए सहन करें |

    गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं-

              मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः |

              आगमापायिनोSनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत || गीता-2/14 ||

      हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पति-विनाशशील और अनित्य है, इसलिए हे भारत ! उनको तू सहन कर |

           मनुष्य के सांसारिक जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता आएगी ही, ऐसी परिस्थितियों से बचा नहीं जा सकता | कभी अत्यधिक सर्दी कभी बहुत गर्मी हो जाती है, फिर भी हम उनको अपने जीवन में यह सोचकर सहन करते हैं कि समय पाकर प्रत्येक प्रकार के मौसम में परिवर्तन होना निश्चित है, वैसे ही यह मौसम भी सदैव के लिए नहीं रहेगा | एक न एक दिन यह भी परिवर्तित हो जायेगा | इसी सोच को केंद्र में रखते हुए अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में आये सुख-दुःख को सहन करना है क्योंकि ये भी मौसम की तरह आने जाने वाले हैं | इसलिए किसी भी परिस्थिति में हमें विचलित नहीं होना है | सैद्धान्तिक रूप से (Theoretically) तो हम जानते है कि कोई भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में स्थाई रूप से नहीं रह सकती, एक न एक दिन उसे परिवर्तित होना ही है परन्तु मानसिक रूप से हम इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं | सत्य को स्वीकार नहीं कर पाने के कारण ही हम जरा से सुख में उत्साहित होकर उछलने कूदने लगते हैं और अल्प से दुःख में बहुत अधिक दुखी होकर शोकग्रस्त हो जाते हैं |

        अर्जुन भगवान् श्री कृष्ण के सखा है तो क्या हुआ ? है तो आखिर एक साधारण मनुष्य ही | पारिवारिक मोह में पड़कर भ्रमित हो चूके थे, वे तो भगवान् साथ में थे अन्यथा उनका पतन होना तो निश्चित था | भगवान् ने अर्जुन को इस प्रकार के शोक और मोह से उबारने के लिए ही ज्ञान देना था, जिससे उसकी भावी पीढ़ियों को भी उससे लाभ मिले | गीता के दूसरे अध्याय से वे ज्ञान देना प्रारम्भ करते हैं | प्रारम्भ में वे कह रहे हैं –

        अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे |

        गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः || गीता-2/11 ||

        भगवान् कह रहे हैं कि हे अर्जुन ! तू शोक न करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचन कह रहा है; परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं और जिनके प्राण जाने वाले हैं, उन दोनों के लिए पण्डितजन शोक नहीं करते |

              मनुष्य को अपने जीवन में भय होता है, प्राप्त किये हुए को खोने का | चाहे वह प्राण हो, स्वजन हों अथवा धन | उसे जीवन में सबसे अधिक भय इस शरीर के खोने का ही रहता है | शेष सभी भय आपकी आसक्तियों से सम्बंधित है, चाहे वह धन में हो अथवा परिवार में | मनुष्य के मन में सदैव इनको खो देने का भय बना रहता है | प्रत्येक मनुष्य के मन में चिंता और शोक का एक मात्र कारण यह भय ही है | मनुष्य शरीर को ही सब अमर करना चाहते हैं, यह जानते हुए भी कि यह मरणधर्मा है |

         मनुष्य जीवन में भय का सबसे बड़ा कारण है- शरीर के प्रति आसक्ति | शरीर से ही सम्बंधित अन्य शरीरों और पदार्थों में आसक्ति भी भय पैदा करती है | अगर जीवन में हम किसी के प्रति भी आसक्त नहीं है, तो फिर हम मुक्त हैं, सभी ओर से भय-मुक्त | भय-मुक्त रहना जीवन्मुक्त होने की यात्रा का पहला सोपान है | प्रश्न उठता है कि विभिन्न प्रकार की आसक्तियों का त्याग सर्वप्रथम किस प्रकार की आसक्ति के त्याग करने से प्रारम्भ किया जाए | वैसे सभी आसक्तियां स्वयं के शरीर से सम्बंधित होती है अतः केवल इस शरीर के साथ की आसक्ति को मिटा दिया जाये तो अन्य सभी आसक्तियों से आपको मुक्ति मिल सकती है | शरीर की आसक्ति को छोड़ना सबसे मुश्किल कार्य है | केवल जीवन का कोई कटु अनुभव ही मनुष्य को इस शरीर के रहते हुए ही शरीर से मुक्त करा सकता है |

                शरीर के प्रति हमारा लगाव इतना गहरा है कि जरा से रोग के आगमन के साथ ही हमारा मन-मस्तिष्क विचलित हो जाता है | जीवन की बागडोर हाथ से खिसकती नज़र आने लगती है | परिवार, सगे सम्बन्धी आदि सभी याद आने लगते हैं | याद नहीं आते तो केवल परमात्मा, जिनकी आवश्यकता हमने अपने जीवन में कभी महसूस ही नहीं की | अगर जीवन में कभी उस परम का स्मरण करते और सदैव करते रहते तो रोगग्रस्त होने पर भी केवल उनको ही याद करते | एकमात्र वे ही हैं जो सदैव हमारे साथ रहते हैं, चाहे परिस्थतियाँ हमारे अनुकूल हो अथवा प्रतिकूल |

       खैर ! जो कुछ भी हो, अभी बात चल रही थी आसक्ति की | हमारी असक्तियाँ हमारे शरीर से ही सम्बन्ध रखती है, अप्रत्यक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से | इसलिए शरीर के प्रति  आसक्ति को हटाते ही अन्य आसक्तियों का निवारण स्वयमेव हो सकता है |

          शरीर के प्रति आसक्ति बहुत ही मजबूत आसक्ति है | वैज्ञानिकों द्वारा गत दिनों इस बारे में एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया गया है | एक बंदरिया (मादा बन्दर) को उसके दूध पीते बच्चे के साथ एक कांच के बने बड़े पात्र में रखकर बंद कर दिया गया | उस बर्तन को इस प्रकार बंद किया गया कि बंदरिया स्वयं के प्रयास से किसी भी प्रकार बाहर नहीं निकल सकती | उस बर्तन में पानी भरने के लिए एक नल लगा दिया गया और उस नल का नियंत्रण वाल्व बर्तन के बाहर रखा गया | सब कुछ करने के बाद बर्तन के अन्दर नल से जल प्रवाह शुरू कर दिया गया | धीरे-धीरे जल का स्तर बढ़ने लगा | जब जल का स्तर बंदरिया की कमर तक पहुंचा तो उसने अपने बच्चे को ऊपर उठा लिया | जब जल का स्तर बंदरिया के गले तक पहुंचा तो उसने अपने बच्चे को सिर पर बैठा लिया | धीरे धीरे जल का स्तर बर्तन में बढ़ता ही जा रहा था | जब जल का स्तर बंदरिया की नाक को छूने ही वाला था तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी |

        बंदरिया ने अब स्वयं को बचाने के लिए बच्चे को अपने सिर से उतारकर बर्तन के तल पर बिठा दिया और उस बच्चे पर स्वयं चढ़कर खड़ी हो गयी, जिससे स्वयं डूबने से बच सके | तत्काल ही प्रयोगकर्ताओं ने बर्तन का जल बाहर किया तथा बंदरिया और उसके बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया | इस प्रयोग के परिणाम में कहा जा सकता है कि जब तक बंदरिया को स्वयं के जीवन पर संकट आता महसूस नहीं हुआ तब तक उसके लिए स्वयं के साथ-साथ बच्चे का जीवन बचाना भी महत्वपूर्ण था | हालाँकि मनुष्य के मामले में ऐसे कई अपवाद मिल जायेंगे जिसमें मां ने बच्चे को बचाने के लिए अपने प्राण दे दिए हों | सारांश यह है कि जब तक स्वयं के शरीर पर कोई संकट न हो तब तक तो हमारे संसार के सम्बन्धी और पदार्थ (धन,घर आदि) हमारे लिए महत्वपूर्ण है | परन्तु जब हमारे स्वयं के अस्तित्व पर भी संकट आ जाये तो किसी अन्य की कीमत पर पहले हम स्वयं को सुरक्षित करना चाहेंगे | 

       बंदरिया और उसके बच्चे के मध्य जो आसक्ति का हाल था, लगभग वही हाल हमारा भी है | हमारी आसक्ति शरीर के प्रति सर्वाधिक है और उसके बाद धन, परिवार घर आदि में | मुख्यतः आसक्ति कहाँ और किनमें होती है, उनका गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्री रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है –

        जननी जनक बंधु सुत दारा | तनु धनु भवन सुहृद परिवारा ||48/4 ||

           माता, पिता, भाई-बहिन (सहोदर), पुत्र-पुत्री (संतान), पत्नी (स्त्री), शरीर, धन, भवन, मित्र-सम्बन्धी आदि प्रियजन (सुहृद) और परिवार इन सभी में व्यक्ति की आसक्ति रहती है | जितना अधिक विभिन्न क्षेत्रों में आसक्ति का विस्तार होगा, मनुष्य सांसारिक बंधनों में उतना ही अधिक जकड़ता चला जायेगा | मनुष्य बंधन के लिए स्वयं ही जाल बुनता है और फंस जाता है; फिर जब इनके कारण उसे दुःख मिलता है, तब चिल्लाता है कि कोई मुझे इनसे मुक्त करो | जाल में फंसे आप हैं और इससे बाहर निकलोगे आप ही | साथ ही इस जाल से बाहर निकलने का मार्ग भी भगवान् श्री राम बताते हैं -

     सब कै ममता ताग बटोरी | मम पद मनहिं बाँध बरि डोरी ||

     समदरसी इच्छा कछु नाहीं | हरष शोक भय नहिं मन माहीं ||48/5-6 ||

      इन सभी में आपकी जो ममता है, उन बंधनों के धागों को गूंथकर एक डोरी बना लें और फिर उस डोरी को मन सहित परमात्मा के चरणों में बाँध दें | सभी को आत्मिक रूप से एक समान मानें और देखें | कामना रहित होकर मन में हर्ष-शोक और भय नहीं रखें | भगवान् कहते हैं कि ऐसा मनुष्य मुझको प्राप्त कर लेता है अर्थात वह व्यक्ति मुक्ति का अधिकारी हो जाता है |

           गोस्वामीजी ने जिस प्रकार आसक्ति और उससे मुक्त होने का उपाय बतलाया है, उससे अधिक सरल रूप से समझाना संभव नहीं हो सकता | आवश्यकता इस बात की है कि इस ज्ञान को हम आत्मसात करें और मुक्ति की ओर बढ़ें |  

          अभी तक हम चिंतन करते हुए मानव जीवन के उद्देश्य को पहिचान लेने की अवस्था तक आ पहुंचे हैं | मैं सोचता हूँ कि अब तक तो हम सब जान गए होंगे कि हमारे इस जीवन का उद्देश्य क्या है ? परन्तु हम अभी तक उस उद्देश्य को पाने से इतने दूर क्यों हैं अथवा जीवन के उद्देश्य को क्यों भूल गए हैं, यह जानना अभी भी शेष है | आगे बढ़ने से पहले हम अभी तक के चिंतन से जो नए जीवन-सूत्र निकल कर आये हैं, उनको संक्षेप में जान लेते हैं –

1. हमारा परिचय जो हम सभी को देते हैं वह मात्र सांसारिक परिचय है, वास्तविक परिचय नहीं है |

2. हम शरीर नहीं है, शरीर से अलग हैं | शरीर का परिचय केवल सांसारिक परिचय है |

3. शरीर के प्रति आसक्ति ही हमें अपने वास्तविक परिचय से दूर रखती है |

4 सभी विकारों के मूल में आसक्ति ही है और ये विकार जड़ तत्व (अष्टधा प्रकृति) में है, चेतन में नहीं | हम चेतन है इसलिए विकारों को स्वयं में न मानें |

      हमें अगर अपने वास्तविक परिचय तक पहुँचना है तो प्रत्येक आसक्ति से स्वयं को दूर रखना होगा | आसक्ति ही हमें जड़ता से मुक्त नहीं होने देती | प्रश्न यह उठता है कि आसक्ति पैदा होने का क्या कारण है ? जब तक हम आसक्ति की मूल तक नहीं पहुंचेंगे तब तक अनासक्त होने की अवस्था तक भी नहीं पहुँच पाएंगे | आसक्ति का कारण है – हमारे मन और बुद्धि | पशुओं में, मनुष्य के अतिरिक्त अन्य प्राणियों में मन और बुद्धि इतनी प्रभावशाली नहीं होती की वे मनन और चिंतन कर सकें | उनमें मन और बुद्धि का उपयोग केवल पूर्व मानव जीवन में फल देने से वंचित रहे कर्मों को भोगने तक ही सीमित है | जबकि मनुष्य जीवन में मन और बुद्धि से पूर्व मानव जन्म के शेष रहे कर्म तो भोगे जायेंगे ही, साथ ही साथ इनका उपयोग कर मनुष्य अपने जीवन में नए कर्म भी कर सकता है | विकसित मन के कारण ही हमें मनुष्य नाम मिला है |

          केवल मनुष्य जीवन में ही आसक्ति पैदा हो सकती है, पशु जीवन में नहीं | केवल मनुष्य में ही आसक्ति के पैदा होने का कारण है- मन और बुद्धि का अत्यधिक विकसित होना | मन और बुद्धि का उपयोग हम अगर भोग भोगने में ही करते रहेंगे तो उन भोगों में हमारी आसक्ति हो जाएगी | हम बार बार उन भोगों को प्राप्त करने की कामना करते रहेंगे | इस प्रकार भोगों के प्रति पैदा होने वाला राग ही हमारी उन भोगों में आसक्ति कही जाएगी | कामनाएं पूरी करने और भोग प्राप्त कर उनको भोगने में हमारे शरीर की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है इसलिए प्रत्येक व्यक्ति की सर्वाधिक आसक्ति स्वयं के शरीर के प्रति ही रहती है |

           शरीर और शरीर में स्थित मन, बुद्धि और अहंकार - ये आठ अष्टधा प्रकृति कहलाती है | शरीर में हमारी पाँचों इन्द्रियाँ और पांचों कर्मेन्द्रियाँ भी आ जाती है | यह अष्टधा प्रकृति जड़ है | हम स्वयं इससे अलग हैं, चेतन है | जड़ और चेतन को अलग-अलग जान और समझ लेना ही ज्ञान है | इसी अवस्था को उपलब्ध हो जाना ही स्व-चेतन हो जाना है | स्व-चेतन की अवस्था को पा लेना ही मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य है | जड़ और चेतन दोनों के बारे में शास्त्रों को पढ़कर समझ जाते हैं कि हम शरीर नहीं है बल्कि हमारे में जो चेतन अंश हैं, हम वह हैं | सैधांतिक रूप से समझ लेना मानव जीवन के लिए पर्याप्त नहीं है | जब तक इस ज्ञान को हम अपने जीवन में नहीं उतार लेंगे तब तक यह ज्ञान केवल तोता रटन्त ही बन कर रह जायेगा, ऐसे ज्ञान से हमारा कल्याण नहीं हो पाएगा |

           अष्टधा प्रकृति जड़ प्रकृति है जिसे अपरा प्रकृति भी कहा जाता है और जो चेतन प्रकृति है उसे परा प्रकृति कहा जाता है | परा से ऊपर परम है और सरल शब्दों में कहूँ तो कहा जा सकता है कि परम का अंश ही परा है और फिर परा से अपरा प्रकृति बनी है | समग्र रूप से देखें तो कहा जा सकता है कि सर्वत्र परम ही है, एक परम के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है | जब सब कुछ परम ही है (जो कि सच्चिदानंद है) तो फिर मनुष्य जीवन इतनी अधिक दुविधाओं से क्यों भरा हुआ है ?

              दुविधाओं से भरे जीवन का दोष अंततः हमारी मन-बुद्धि पर ही आ जाता है | मनुष्य जीवन की इन दुविधाओं का दोष मन-बुद्धि पर क्यों है ? आइये ! इसका कारण जानने का प्रयास करते हैं |

         जड़ और चेतन के मध्य में है हमारा मन | जड़ साकार है और चेतन निराकार | मन हालाँकि जड़ तत्व है परन्तु यह इन दोनों तत्वों (जड़-चेतन) को जोड़ने का कार्य भी कर रहा है | गंभीरता से अवलोकन करेंगे तो आप पाएंगे कि निराकार जब साकार रूप से व्यक्त होता है तो दोनों अवस्थाओं के मध्य एक अवस्था और बनती है | उस निराकार और साकार की मध्य अवस्था का नाम है – मन | कहने का अर्थ है कि मन के माध्यम से ही निराकार, साकार रूप में प्रकट होता है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि मन निराकार और साकार दोनों की मध्य अर्थात उभय अवस्था का नाम है | इससे स्पष्ट है कि मन का किसी एक अवस्था में अस्तित्व नहीं है अर्थात उसे न तो साकार कहा जा सकता है और न ही निराकार | ऐसे में प्रश्न उठता है कि अगर मन निराकार है तो फिर वह जड़ क्यों कहलाता है और अगर मन साकार है तो फिर वह दिखलाई क्यों नहीं पड़ता ? इसका स्पष्ट उत्तर है कि मन चंचल है, परिवर्तनशील है, इसलिए जड़ है, भले ही वह साकार रूप से व्यक्त न हो रहा हो |

           मन और बुद्धि में कोई विशेष अंतर नहीं है | मन का शुद्ध रूप ही बुद्धि है | मन की चंचलता को बुद्धि अपने स्तर पर रोक भी सकती है और बढा भी सकती है | मन बुद्धि को भी चंचल बना सकता है और बुद्धि अगर स्थिर रही तो मन भी स्थिर रह सकता है | स्थिर बुद्धि वाले पुरुष को स्थितप्रज्ञ कहा जाता है – स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते (गीता-2/55) | कहने का अर्थ है कि मन और बुद्धि एक दूसरे को प्रभावित करते हैं | इन दोनों को प्रभावित करने वाला भी एक तत्व है- अहम्, जो कि अपरा प्रकृति का सर्वोच्च सोपान है, जिसमें काम निवास करता है जोकि प्रत्येक आसक्ति का परिणाम है | अभी हम मन और बुद्धि की जो चर्चा कर रहे हैं इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दोनों में कौन किसको अधिक प्रभावित करता है ?

क्रमशः

Friday, July 9, 2021

समत्व-योग

 समत्व-योग 

                  “भक्तिरेकैव मुक्तिदा” श्रृंखला में हमने भक्ति पर गहन चर्चा की और सारांश में यह जाना कि केवल अकेली भक्ति भी हमें मुक्त कर सकती है, किसी दूसरे साधन की कोई आवश्यकता नहीं है | इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे साधन जैसे ज्ञान-योग, कर्म-योग, ध्यान-योग, सहज-योग आदि उपयोगी नहीं हैं | वे भी उपयोगी साधन हैं, बस साध्य तक पहुंचने के मार्ग अलग अलग हैं | साधन अलग अलग हो सकते हैं परंतु साध्य एक ही है। अंततः सभी मार्ग आकर भक्ति के मार्ग में मिल जाते हैं | जैसे तिरुपति दर्शन के लिए अलग अलग राशि की टिकटें मिलती हैं, प्रारम्भ में सबकी अलग अलग पंक्तियाँ और मार्ग होते हैं परन्तु अंत में मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करने के बिंदु पर आकर सभी पंक्तियाँ मिलकर एक हो जाती है, उसी प्रकार एक बिंदु पर आकर ये सभी मार्ग भी भक्ति मार्ग में मिल जाते हैं | 

             भक्ति का मार्ग छोटा, आनंददायक और सुगम है इसलिए संतजन इस मार्ग पर चलने की अनुशंसा करते हैं | पूर्व में मैंने भक्ति-योग के अंतर्गत तीन प्रकार की साधना बताई हैं- सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार की साधना | इस श्रृंखला में यह बात उभर कर सामने आई थी कि इन सबमें सगुण साकार की उपासना श्रेष्ठतम है | सगुण साकार की उपासना से निर्गुण निराकार की अवस्था तक पहुँचना सरल है क्योंकि इस उपासना में मन के विचलित होने की सम्भावना सबसे कम है क्योंकि यह साधना एक ऐसी साधना है जिसमें हमें किसी अपरिचित की साधना करना कभी प्रतीत ही नहीं होता बल्कि ऐसा लगता है जैसे हम हमारे जैसे ही एक व्यक्तित्व की उपासना कर रहे हैं | एक दूसरा और महत्वपूर्ण कारण स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज ने बतलाया है | वे कहते हैं कि सगुण साकार के अंतर्गत निर्गुण निराकार आ जाता है परन्तु निर्गुण निराकार में सगुण साकार का कोई स्थान नहीं है | अतः अपने लक्ष्य निर्गुण निराकार को प्राप्त करने के लिए सगुण साकार की भक्ति करना ही अधिक श्रेष्ठ है | 

        “भक्तिरेकैव मुक्तिदा” में हमने भक्ति के बारे में जाना | अब हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि कर्म और ज्ञान मार्ग से भी भक्ति को कैसे उपलब्ध हुआ जा सकता है ? नारदजी अपने “भक्ति-सूत्र” में भक्ति के बारे में कहते हैं – “स्वयं फलरुपतेति ब्रह्मकुमारा:” अर्थात यह भक्ति स्वयं फलरूप है | भक्ति साधन भी है और साध्य भी है अर्थात साधन ही अंततः साध्य बन जाता है |

                  इसी प्रकार एक अन्य भक्ति-सूत्र में नारदजी कहते हैं-

   “त्रिसत्यस्य भक्तिरेव गरीयसी, भक्तिरेव गरीयसी ||”

              अर्थात तीन सत्यों में भक्ति ही प्रधान है; उसी की गरिमा है, उसी की महिमा है |

                 उपरोक्त सूत्र में नारदजी तीन सत्य की बात कर रहे हैं,वे तीन सत्य कौन से हैं ? नारदजी कहते हैं कि ये तीन सत्य हैं - कर्म, ज्ञान और भक्ति | इन तीनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है | ये तीनों सत्य अलग अलग न होकर आपस में एक दूसरे से सम्बंधित है | भक्ति से भी ज्ञान को उपलब्ध हुआ जा सकता है और ज्ञान से भक्ति भी प्राप्त की जा सकती है | ज्ञान से सत्कर्म होते हैं और भक्ति से भी | सत्कर्म करते हुए भी भगवान का भक्त हुआ जा सकता है | 

       केवल एक भक्ति से ही मनुष्य मुक्ति को उपलब्ध हो सकता है क्योंकि भक्ति में न तो किसी प्रकार का कोई परिश्रम करना पड़ता है और न ही परमात्मा के अतिरिक्त किसी अन्य का आश्रय लेना पड़ता है | कर्म और ज्ञान मार्ग में तो अन्यान्य प्रयास करने पड़ते हैं जिसके लिए परिश्रम और किसी न किसी के आश्रय की आवश्यकता होती है | भक्ति में तो केवल एक भगवान का आश्रय लेना ही पर्याप्त है | भगवद् आश्रय लेते ही हम विश्राम की अवस्था को उपलब्ध हो जाते हैं | फिर न तो किसी अन्य के साथ की, न ही किसी के सहयोग की आवश्यकता होती है और न ही किसी प्रकार के परिश्रम करने की |

             भक्ति के बाद अब हम उन्मुख होते हैं; ज्ञान और कर्म की ओर | कर्म और ज्ञान मार्ग पर चलते हुए भी अंततः हमें भक्ति मार्ग पर आना ही पड़ेगा | आज के मनुष्य की कुछ न कुछ करने और सब कुछ जानने के स्वभाव को ध्यान में रखते हुए भी यह आवश्यक है कि हम इन मार्गों पर भी कुछ दृष्टि डालें | कर्म योग और ज्ञान योग हमें समत्व अर्थात समता की ओर ले जाते हैं जबकी भक्ति-योग में समता का प्रादुर्भाव स्वतः ही हो जाता है | इससे स्पष्ट है कि कर्म-योग और ज्ञान योग; दोनों ही हमें समत्व की ओर ले जाते हैं जबकि भक्ति में समत्व स्वयमेव ही होता है | महत्वपूर्ण बात यह निकल कर आ रही है कि कर्म,ज्ञान और भक्ति; इन तीनों का सार तत्व है- समत्व अर्थात समता |

         समता का विलोम शब्द है,विषमता।विषमता से व्यक्ति दुःख को प्राप्त होता है और समता से सुख को। जीवन में विषमता के दो मुख्य कारण हैं-अहंता और ममता | अहंता अर्थात "मैं" और ममता अर्थात "मेरा"। मम का अर्थ है, मेरा | जहां और जिससे हमारा स्वार्थ का सम्बन्ध होता है हम उसे “यह मेरा है” ऐसा कहने लगते हैं | हमारा यह "मेरापन" अथवा "मैं पना" ही उस पदार्थ अथवा शरीर के प्रति हमारी ममता होने का द्योतक है | यही ममता इनके प्रति आसक्ति पैदा करती है | इसी प्रकार जब हम इस शरीर से कोई कर्म करते हैं और कहते हैं कि यह कार्य मैंने किया है अथवा हम यह कहते हैं कि केवल मैं ही यह कार्य कर सकता हूँ | इस कार्य के होने अर्थात करने में घुसा हुआ हमारा “मैं” ही हमारी अहंता है,अहंकार है | 

                महोपनिषद में कहा गया है-

         द्वे पदे बन्ध मोक्षाय न ममेति ममेति च |

         ममेति बध्यते जन्तुर्न ममेति विमुच्यते ||4/72||

             अर्थात बंधन व मोक्ष के दो ही कारण हैं-प्रथम ममता और द्वितीय ममता रहित होना | ममता के द्वारा जीव बंधन में पड़ता है और  ममता से रहित हो जाने पर वही जीव मोक्ष को प्राप्त कर लेता है |

            “मैं” और “मेरा” ही “माया” है | माया ही हमारे बंधन का कारण है और यही माया हमारे संसार का निर्माण करती है | माया हमें संसार से कभी भी मुक्त नहीं होने देती | समता में न “मैं” रहता है और न ही “मेरा”, दोनों का ही लोप हो जाता है | ‘मैं और मेरा” के समाप्त होते ही माया भी समाप्त हो जाती है | माया का आवरण हटते ही हम मुक्त हो जाते हैं, इस शरीर के रहते हुए ही जीवन्मुक्त | आइये ! अब इसी बात का विश्लेषण करने के लिए बात को आगे बढ़ाते हैं और पुनः चलते है भक्ति की ओर | 

         सगुण साकार की भक्ति करते हुए निर्गुण निराकार की अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि सगुण साकार के अंतर्गत निर्गुण निराकार आ जाता है | निर्गुण निराकार की अवस्था को उपलब्ध होने के लिए हमें अपने शारीरिक स्वरुप (स्वयं को शरीर मान लेना) का त्याग करना पड़ता है और साथ ही प्रकृति के तीनों गुणों का भी | ऐसा करने पर ही हम गुणातीत होकर निर्गुण निराकार स्वरुप (वास्तविक स्वरूप) को पा सकते हैं, अन्यथा नहीं |

                    सगुण साकार से निर्गुण निराकार तक पहुँचने के लिए हमें हमारे आकार और गुण, दोनों से ही परे जाना होता है अर्थात उन्हें छोड़ना पड़ता है | हमारा आकार है यह भौतिक शरीर और हमारे गुण है प्रकृति के तीन गुण | देखा जाये तो ये दोनों ही प्रकृति की देन है | भौतिक शरीर के रहते गुण कभी छोड़े नहीं जा सकते । अतः हमें गुणों का त्याग नहीं करना है बल्कि उन गुणों में रहने वाली आसक्ति को छोड़ना है | इन गुणों में आसक्ति का त्याग करते हुए हमें प्रकृति से पुरुष की ओर चलना है और अंततः परम पुरुष तक पहुंचना है | इससे स्पष्ट होता है कि प्रकृति से बंधन समाप्त करने के लिए मनुष्य का गुणातीत होना आवश्यक है | प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर ये गुण क्या हैं और हमें प्रकृति के साथ कैसे बान्ध देते हैं ? इस बात को जान लेने के उपरांत ही हम अपने आकार और गुणों का अतिक्रमण कर पुरुष अर्थात स्वयं को जान पाएंगे | तत्पश्चात परम पुरुष की अवस्था को प्राप्त करना अधिक कठिन नहीं है |

          हमारा शरीर प्रकृति की देन है | इस कारण से शरीर में तीनों गुण भी उपस्थित रहते हैं | प्रकृति को परिवर्तनशील कहा जाता है | प्रकृति के परिवर्तनशील होने का क्या कारण है ? तीनों गुण; सत्व,रज और तम कभी भी निश्चल नहीं रह सकते | तीनों गुण आपस में एक दूसरे से अथवा स्वयं के भीतर भी क्रियाएं करते रहते हैं | ये क्रियाएं हमारे शरीर की अवस्थाएं परिवर्तित करती है | आज का बालक कल युवा होगा | आज का युवा कल वृद्ध होगा और अंततः जीर्ण शीर्ण शरीर छूट जायेगा | प्रकृति का यह नियम सार्वभौमिक सत्य है | हमारा स्वभाव ही ऐसा हो गया है कि हम शरीर की भी अनश्वरता चाहते हैं, यह जानते हुए भी कि एक न एक दिन इस शरीर को छोड़ना ही होगा । इसको विडम्बना ही कहेंगे कि वास्तविक स्वरूप की ओर हमारी दृष्टि नहीं है जो कि सही मायने में अनश्वर है।

           प्रकृति त्रिगुणी है | हमारा शरीर प्रकृति के अंतर्गत आता है | हालाँकि प्रकृति परमात्मा का ही स्वरुप है परन्तु इसमें अवस्थित तीन गुणों के कारण वह हमें अपनी ओर अधिक आकर्षित करती है | आकर्षित करना प्रकृति का स्वभाव है और उसके आकर्षण में फंस जाना मनुष्य का स्वभाव बन गया है। यही कारण है कि मनुष्य परमात्मा को अर्थात निज स्वरूप को भूला देता है | प्रकृति के तीन गुण ही हमें आकर्षित करते हैं जिसके कारण स्वयं का शरीर ही हमें वास्तविक स्वरूप के रूप में दिखलाई देने लगता है | इसका परिणाम यह होता है कि हम अपना अस्तित्व इस शरीर के कारण होना मान लेते हैं | ऐसी सोच हमारे भीतर अहंकार पैदा करती है | हमारा शारीरिक सौष्ठव, शरीर से होने वाली क्रियाएं आदि  ही हमारे भीतर अहंता का बीजारोपण कर देती है जो कि एक दिन अहंकार रूपी वट वृक्ष का कारण बन जाती है |

           हमारे शरीर में उपस्थित गुण आपस में क्रिया करते हैं | इन क्रियाओं से हमें एक प्रकार का शारीरिक सुख मिलने का अनुभव होता है।शारीरिक अहंकारवश हम इन क्रियाओं को स्वयं के द्वारा किया जाने वाला कर्म मान लेते हैं | इस प्रकार हमारे शरीर से होने वाले कर्म और उससे मिलने वाले रस (विषय) के प्रति हम आसक्त हो जाते हैं | यह आसक्ति बार बार उसी रस को प्राप्त करने  के लिए प्रेरित करती है। इस प्रकार व्यक्ति कर्म, रस और भोग के लोभ में पड़कर उनके प्रति आसक्त होकर संसार के बंधन में बंध जाता है।

        अहंता से अहंकार पैदा होता है और ममता से आसक्ति। अहंकार का त्याग करने के लिए मुख्यतः ज्ञान योग उपयोगी है और आसक्ति का त्याग करने के लिए कर्म-योग | वैसे अहंकार और आसक्ति के त्याग में दोनों ही योग अर्थात ज्ञान और कर्म योग की भूमिका रहती है। भक्ति-योग में अहंकार और आसक्ति का त्याग परमात्मा के शरणागत होते ही स्वत: हो जाता है | अहंकार और आसक्ति का त्याग होते ही हम अहंता और ममता का त्याग कर समता में आ जाते हैं | सारांश यह है कि समता में आने के लिए हमें अपने अहंकार और सभी प्रकार की आसक्तियों का त्याग करना है | 

         अहंकार और आसक्ति, दोनों का त्याग करने के लिए मुख्यतः ज्ञान-योग सहायक है | ज्ञान हो जाने पर कर्म भी स्वतः ही निष्काम होने लगते हैं | ज्ञान कहता है कि हमें कर्म भले ही शरीर के द्वारा होते हुए प्रतीत होते हों परन्तु वास्तविकता तो यह है कि कर्म करने में शरीर केवल माध्यम मात्र है | देखा जाये तो शरीर भी वास्तव में एक पदार्थ ही है, इस प्रकृति का एक पदार्थ जिसमें इसके तीन गुण उपस्थित हैं | गुण जब अपने साथ अवस्थित किसी दूसरे गुण से क्रिया करते हैं तब कर्म संपादित होता है | यह कर्म हमें अपने शरीर द्वारा होता प्रतीत अवश्य होता है जबकि वास्तव में यह गुणों की गुणों में हो रही स्वाभाविक क्रिया मात्र है | शरीर के प्रति अहंकार होने के कारण हमें ऐसा प्रतीत होता है, जैसे ये सभी कर्म हम स्वयं कर रहे हैं | 

       'मैं' और 'मेरा',इन सभी संग्रहों का एक समूह है: भय, सुख, अकेलापन, निराशा, अवसाद, चिंता, कष्ट, दर्द, ऊब, आलस्य आदि। इस शरीर को ही "मैं" मान लेने का ही यह परिणाम है। 

        गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -

               प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैःकर्माणि सर्वशः |

                अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || 3/27||

          अर्थात वास्तव में समस्त कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा ही किये जाते है तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी “मैं कर्ता हूँ” ऐसा मानता है | 

                 इस प्रकार यह स्पष्ट है कि प्रकृति के गुणों और उनसे होने वाली क्रियाओं को हम अपने द्वारा कर्म करना न मानें तो हमारा अहंकार समाप्त हो सकता है | इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि इस प्रकार के ज्ञान से गुणों और क्रियाओं का त्याग हो जायेगा | ज्ञान को आत्मसात करने से हमारा अहंकार तो समाप्त होगा ही, साथ ही साथ गुणों के द्वारा होने वाली क्रियाओं को, जिनको हम अपने द्वारा करना मान रहे हैं, उन कर्मों के प्रति हमारी आसक्ति भी नहीं रहेगी | यह तो मान लिया कि ज्ञान से हमारा अहंकार नष्ट हो जाता है परन्तु ज्ञान से कर्मों के प्रति आसक्ति कैसे मिट सकती है ?

           किसी भी व्यक्ति की कर्मों में आसक्ति कभी भी सीधे सीधे नहीं होती | आसक्ति पैदा होती है, कर्म के फल के रूप में प्राप्त विषय भोग में | भोगों में ऐसी आसक्ति ही हमें कर्मासक्त बना देती है जिससे हमारे मन में विभिन्न प्रकार की कामनाएं जन्म लेती है | इन कामनाओं के कारण ही हम नए नए कर्म करने को प्रेरित होते हैं | हाँ, हम अपनी कामनाओं को पूरा करने के लिए कर्म करने का प्रयास कर सकते हैं लेकिन उसका फल तत्काल ही भोगने के लिए मिलेगा,यह कहा नहीं जा सकता। जो भी विषय भोग हमें मिलते है, वे वास्तव में प्रकृति के गुणों की आपस मे की जाने वाली क्रियाओं के कारण मिलते हैं।इस प्रकार स्पष्ट है कि परोक्ष रूप से हम विषयासक्त होकर गुणों के कारण ही कर्म करने के लिए शरीर के साथ बंधे हुए हैं | 

       इस बंधन का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति स्वयं में अहंता और ममता पैदा करके अपने लिए एक संसार का निर्माण कर लेता है । इस प्रकार गुणों का संग उसे अपने द्वारा निर्मित इस संसार के साथ आसक्ति से बाँध देता है | 

            जब तक इस शरीर में जीवन है, तब तक हम प्रकृति के साथ हैं | जब तक हम प्रकृति के साथ है, तब तक उसके गुण भी हमारे साथ रहेंगे | इसीलिए गुणों का त्याग करना असंभव है और जब तक गुण साथ हैं तब तक इस शरीर से कर्म तो होंगे ही | गीता में भगवान् स्वयं कहते हैं कि शरीर के रहते कर्मों का त्याग करना असंभव है। अतः प्रत्येक जीव को कर्म तो करने ही पड़ेंगे | कर्म सकाम न होकर निष्काम हो इसके लिए आवश्यक है कि जीवन में हमारा आचरण समता पूर्वक हो | 

          अब प्रश्न उठता है कि समता में आने के लिए हमें क्या करना होगा ? समता धारण करने के लिए हमें अहंता और ममता का त्याग करते हुए प्रकृति के गुणों से परे चले जाना होगा | गुणों से परे चले जाने का अर्थ है, गुणों की होने वाली क्रियाओं से सदैव अप्रभावित बने रहना। इसके लिए पहले तामसिक और राजसिक गुणों का त्याग करते हुए सात्विक गुणों को अपनाना होगा और फिर सात्विक गुणों का भी अतिक्रमण कर गुणातीत हो जाना होगा | गुणातीत होने का अर्थ है शारीरिक क्रियाओं और कर्मों के प्रति उदासीन हो जाना | 

  भगवान् श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता कह रहे हैं-

         त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |

         निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||2/45||

        अर्थात हे अर्जुन ! वेद तीनों गुणों के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित योग-क्षेम को न चाहने वाला और स्वाधीन अंतःकरण वाला हो |

           यहाँ पर भगवान् ‘भोग और उसके साधन’ अर्थात भोग और भोग प्राप्त करने के लिए किये जाने वाले कर्म, दोनों के प्रति आसक्त न होने का कह रहे हैं | अनासक्त होने पर ही हम सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि द्वंद्वों से परे जा सकते है अन्यथा भोग और कर्म के प्रति आसक्ति हमें कभी द्वंद्व से बाहर ही नहीं निकलने देगी | प्रकृति के तीन गुण ही समस्त भोग और कर्म के आधार हैं | गुणों से परे चले जाने पर अर्थात गुणातीत हो जाने पर न तो भोगों के प्रति आसक्ति होगी और न ही सकाम कर्म करने को उद्यत होंगे । केवल मात्र गुणों की आपस में क्रियाएं रह जाएगी, जिनकी ओर से हम पहले ही उदासीन हो चुके होंगे |  

           प्रश्न उठता है कि गुणातीत किस पुरुष को कहा जा सकता है ? इसको स्पष्ट करते हुए भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं -

          मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो: |

          सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ||14/25||

     अर्थात जो मान और अपमान में सम है, मित्र और शत्रु के पक्ष में भी सम है एवं समस्त आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है |

              गुणातीत पुरुष ही समता में स्थित है, ऐसा कहा जा सकता है | समता का अर्थ भी यही है कि व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में सम रहे, प्रत्येक स्थिति में उसका व्यवहार समान रहे | शारीरिक सुख की कामना पूर्ण होने पर राग पैदा होता है और पूर्ण न हो तो क्रोध और द्वेष | कामना पूर्ण न हो अथवा चाहा गया मान सम्मान न मिला और हम विचलित हो गए तो फिर ऐसे में समता कहाँ रही ? अतः आवश्यक है कि हम अहंकार ममता से मुक्त होकर गुणातीत की अवस्था को उपलब्ध हों, तभी हमारे में समता आ सकती है और इसके लिए भक्ति के अलावा कर्म और ज्ञान योग भी साधन हैं |

             ‘समता’ अपने में एक व्यापक अर्थ समेटे शब्द है | इसको समुचित रूप से स्पष्ट करना किसी ज्ञानी व्यक्ति के लिए ही संभव है, मेरे जैसे अल्पज्ञानी के लिए नहीं | समत्व अर्थात समता, वह साधन है जिसको धारण कर हम साध्य तक पहुँच सकते हैं | भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में सर्वप्रथम योग शब्द समत्व के लिए ही उपयोग में लिया है | वे कहते हैं-

      योगस्थ: कुरु कर्माणि संगं त्यक्त्वा धनञ्जय |

       सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||2/48||

 हे धनञ्जय ! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर | समत्व ही योग कहलाता है |

      भगवान् इस श्लोक में कह रहे हैं कि अर्जुन, तू योग में स्थित होकर समत्व बुद्धि से कर्म कर | किसे कहते हैं योग ? 

        “समत्वं योग उच्यते” अर्थात समत्व ही योग कहा जाता है | प्रश्न उठता है कि योग क्या है ? साधारण भाषा में योग का अर्थ है जोड़ | योग, वह प्रक्रिया अथवा साधन, जिससे आत्मा का परमात्मा के साथ जुड़ना संभव हो सकता है | इस प्रकार योग एक साधन का नाम हुआ | साथ ही भगवान् कहते हैं कि कार्य के सिद्ध अथवा असिद्ध होने का विचार तक मन में न रख और आसक्ति का भाव भी मन में न रख | इस श्लोक के अनुसार यह स्पष्ट है कि सिद्धि असिद्धि का विचार किये बिना और आसक्ति रहित होकर जो पुरुष कर्म करता है वह योग में स्थित है | इसका अर्थ हुआ कि प्रत्येक परिस्थिति में समता में बने रहना ही योग में स्थित होना है | 

           “योग किसे कहते हैं”, इसको स्पष्ट करते हुए "योग दर्शन" में महर्षि पतंजलि कहते हैं-             “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” (अष्टांग-योग,समाधि-पाद-2) अर्थात चित्त की वृत्तियों (Misconceptions) को रोकना ही योग है | चित्त की वृत्तियों के अनुसार ही मनुष्य अपने स्वरुप की कल्पना करता है क्योंकि उसको उस समय तक अपने वास्तविक स्वरुप का ज्ञान नहीं होता है | चित्त की वृत्तियों का निरोध होते ही वह अपने वास्तविक स्वरुप को पा लेता है | प्रश्न उठता है कि चित्त की वृतियों का निरोध करना क्यों आवश्यक है ?

            चित्त की वृतियां चित्त को स्थिर नहीं रहने देती | अस्थिर मन कभी भी व्यक्ति की बुद्धि को स्थिर नहीं रहने देता | अस्थिर बुद्धि के कारण मनुष्य की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है | वह एक निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही विभिन्न प्रकार के विचार करता रहता है और बार-बार मार्ग बदलता रहता है | मन में जो विभिन्न प्रकार के विचार उठते रहते हैं, उनका कारण मन की ये वृतियां ही हैं | जब तक हम मन की इन वृतियों को नहीं समझेंगे तब तक अपने मन को कैसे वश में कर पाएंगे ? मन के वश में होने से ही हमारी बुद्धि समता में स्थिर हो सकती है अन्यथा चंचल मन बुद्धि की भला कैसे सुनेगा ? बिना बुद्धि के स्थिर हुए जीवन में समता का पदार्पण हो ही नहीं सकता |तो

आइये!पहले चित्त की इन वृतियों पर भी संक्षिप्त चर्चा कर लें |

 चित्त-वृत्ति-

           चित्त की वृतियां पांच प्रकार की होती है और प्रत्येक वृत्ति क्लिष्ट और अक्लिष्ट, दो प्रकार की होती है | क्लिष्ट वृतियां अविद्या के कारण होती है और दु:खों को बढाने वाली होती है | चित्त की अक्लिष्ट वृत्तियाँ विद्या जनित है और सुख देने वाली होती है | इनका विस्तार से विवेचन फिर कभी करेंगे |आज केवल इतना जान लेते हैं कि मन की वृत्तियां कौन कौन सी है?

 मन की वृत्तियां पांच प्रकार की हैं-

1.– प्रमाण (Insight)वृत्ति-इस वृत्ति में मन के समक्ष कोई न कोई एक प्रमाण होता है, जिसके आधार पर वह जीवन में हो रहे क्रिया कलापों के बारे में पहले ही समझ और एक प्रकार की सोच बना लेता है | प्रमाण वृत्ति भी तीन प्रकार की होती है –

(अ) प्रत्यक्ष प्रमाण (Direct perception)- संशय रहित ज्ञान | जैसे, आँखों देखी, जीभ का स्वाद आदि |  

(ब) अनुमान प्रमाण (Conclusion) – जैसे धुआँ देखकर अग्नि होने का अनुमान होता है |

(स) आगम प्रमाण (Based on reliable sources)-जैसे वेद, शास्त्र आदि में कही गयी बातों को प्रमाण मानना | 

2.विपर्यय (Error) वृत्ति अर्थात मिथ्या ज्ञान | जैसे मरीचिका में जल का होना मान लेना और रस्सी को सांप मान लेना |

3. विकल्प (Imaginings) वृत्ति अर्थात वस्तु होती नहीं है फिर भी मान्यता के अनुसार मनुष्य उसकी कल्पना कर लेता है | जैसे भूत प्रेत के बारे में सुनी गयी बातों को मानते हुए उसके बारे में विभिन्न प्रकार की कल्पनाएँ करना |

4. निद्रा (Deep sleep) वृत्ति अर्थात विषय का ज्ञान नहीं रहता परन्तु ज्ञान के अभाव की प्रतीति रहती है | जैसे कुछ भी दिखाई न दे परन्तु उसका अभाव मान लेना | 

5.स्मृति (Recollection) वृत्ति अर्थात अनुभव में आये विषयों को न भूलना, इसमें विषयों के संस्कार चित्त में पड़े रहते हैं और कोई न कोई निमित्त पाकर पुनः स्फुरित हो जाते हैं |

           महर्षि पतंजलि ने चित्त की वृत्तियों को रोकने का उपाय बताया है – “अभ्यासवैराग्याभ्यांतन्निरोध (समाधिपाद-12) अर्थात अभ्यास (Assiduousness) और वैराग्य (Imperturbability) से चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है | यही बात गीता में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते हैं | अर्जुन का प्रश्न था कि यह मन बड़ा चंचल है,इसको वश में करना वायु को रोकने की भांति दुष्कर है | श्री कृष्ण कहते हैं-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || गीता-6/35 ||

 मैं जानता हूँ कि मन चंचल है और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु हे अर्जुन ! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में हो जाता है | 

        अभ्यास क्या है ? चित्त अर्थात मन की स्थिरता के लिए जो प्रयास किया जाता है, उसका नाम अभ्यास है | बारम्बार अभ्यास करने से मन स्थिर हो जाता है | और वैराग्य क्या है ? देखे और सुने हुए विषयों में सर्वदा तृष्णा रत रहने वाले चित्त को वश में करने की जो अवस्था है, उसी का नाम वैराग्य है | वैराग्य अर्थात किसी विषय में राग का न होना | अभ्यास और वैराग्य के प्रयास के परिणाम स्वरुप चित्त की वृत्तियों के रूक जाने पर जिस स्थिति में व्यक्ति स्थित हो जाता है उसी का नाम समता है और इसी समता को ही योग कहा जाता है |

            ध्यान-योग के माध्यम से ऐसा अभ्यास संभव हो सकता है जिससे मन को वश में किया जा सकता है | मन में वश में करने का अर्थ है, विषयों का चिंतन न करना | विषय के चिंतन को जबरन रोकने से दिखावे के तौर पर विषय-भोग तो मिट सकते हैं परन्तु मन के भीतर विषय का रस नहीं मिटता | जब तक रस नहीं मिटेगा तब तक वैराग्य संभव नहीं है | वैराग्य के लिए केवल मन को वश में करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि बुद्धि को मन से स्वतन्त्र करना आवश्यक है | स्वतन्त्र बुद्धि को ही समत्व बुद्धि कहा जाता है, जिससे व्यक्ति में समता का पदार्पण हो जाता है ।

          समता का अर्थ है, समत्व बुद्धि | बुद्धि पर मन का प्रभाव अधिक है तो इसका अर्थ है कि मन चंचल है और वह अपने अनुसार बुद्धि को भ्रमित कर शरीर और इन्द्रियों से कार्य लेगा | अगर मन पर बुद्धि का प्रभाव अधिक है तो फिर ज्ञान का आधिपत्य स्थापित हो जाता है और मन बुद्धि और विवेक के अनुसार चलता रहेगा | यही समत्व बुद्धि है, संतुलित बुद्धि है, फिर चाहकर भी मन उसे विचलित नहीं कर सकता | ज्ञान जब विवेक में परिवर्तित हो जाता है तब वह मन की उपेक्षा करने लगता है | चंचल मन को वश में करना भले ही दुष्कर हो परन्तु अगर मन की उपेक्षा करने लग जाएँ तो फिर मन चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता | अतः मन का निग्रह करने के प्रयास में अपना समय और शक्ति व्यय न करें बल्कि परमात्मा के प्रति समर्पित होकर मन की इच्छाओं की, मन में उठ रही कामनाओं की उपेक्षा करते रहें | धीरे-धीरे मन स्वतः ही शांत होता चला जायेगा और बुद्धि भी स्थिर हो जाएगी | इसी समत्व बुद्धि से ज्ञान और विवेक उपजेगा जो आपको प्रकृति से अलग करके स्वयं के पुरुष होने का अनुभव कराएगा |

         इस प्रकार पुरुष का ज्ञान हो जाने से प्रकृति के गुणों में जो तृष्णा का अभाव हो जाता है (गुणातीत अवस्था), वह परम वैराग्य है | इस अवस्था में पुरुष और प्रकृति की पृथकता का ज्ञान हो जाता है और पुरुष सर्वथा आत्म-काम और निष्काम हो जाता है | फिर उसकी प्रकृति के तीनों गुणों के कार्य में आसक्ति नहीं रहती | गुणों में आसक्ति के कारण ही मनुष्य विषयों की ओर आकर्षित होता है और उन्हें प्राप्त करने के लिए कर्म करता है | जब गुणों से दृष्टि दूर हो जाती है तब विषयों का रस भी समाप्त हो जाता है और मनुष्य प्रकृति से स्वयं को सर्वथा अलग कर लेता है |

         अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करने में ज्ञान और कर्म दोनों साधनों की भूमिका रहती है | भक्ति मार्ग पर चलकर भी समता की स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें किसी प्रकार के परिश्रम की आवश्यकता नहीं है अर्थात न अभ्यास के लिए किसी प्रकार के प्रयास की आवश्यकता है और न ही वैराग्य के लिए किसी प्रकार के ज्ञान की |  

           "योग-दर्शन" में चंचल मन को वश में करने को योग कहा गया है, जो कि बड़ा ही दुष्कर कार्य है | इधर भगवान् कह रहे हैं कि समता ही योग है | दोनों बातें साथ कहने का अर्थ है कि समत्व बुद्धि को धारण करने से योगी हुआ जा सकता है और योग में स्थित होकर कर्म करने से भी समता का प्रादुर्भाव हो जाता है | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि योग और समत्व एक दूसरे के पूरक है, दोनों में किसी भी प्रकार की भिन्नता नहीं है | योगी में समता आ जाती है और जिस पुरुष ने समत्व बुद्धि को धारण कर लिया है वह योगी ही है | इसलिए भगवान् अर्जुन को योगी होने का कह देते हैं |

   तपस्विभ्योSधिको योगी ज्ञानिभ्योSपि मतोSधिकः |

   कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन || गीता-6/46|| 

            योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्र ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म करनेवालों से भी योगी श्रेष्ठ है; इसलिए हे अर्जुन ! तू योगी हो जा |

        ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज ने “अप्राप्त की प्राप्ति” को योग कहा है | हम अपने जीवन में किसे अप्राप्त मानते हैं ? सांसारिक वस्तुएं तो सदैव प्राप्त ही हैं क्योंकि हम संसार में रचे बसे हैं। वास्तव में सांसारिक व्यक्ति के लिए अप्राप्त है, परमात्मा, जोकि सांसारिक दृष्टि से अप्राप्त होकर भी आत्मिक दृष्टि से नित्य प्राप्त है | केवल मनुष्य स्वयं को मन के अधीन होना मान लेने से वह अप्राप्त नज़र आता है | मन की उपेक्षा कर समत्व बुद्धि को उपलब्ध होते ही नित्य प्राप्त परमात्मा का अनुभव हो जाता है, यही अप्राप्त की प्राप्ति है और यही योग है | समता को प्राप्त होते ही व्यक्ति योग सिद्ध हो जाता है | मन की चंचलता के कारण व्यक्ति की बुद्धि स्थिर नहीं हो पाती, जिसके कारण उसका सम भाव में रहना कठिन हो जाता है | मन कहता है कि ऐसा कर, मन कहता है कि वैसा कर; ऐसी उहाँपोंह की स्थिति में भला बुद्धि स्थिर कैसे रह सकती है ? अभ्यास और वैराग्य से बुद्धि स्थिर हो जाती है और ‘स्थितप्रज्ञ’ हो जाने की अवस्था प्राप्त हो जाती है | इस स्थिति को प्राप्त करने के बाद पुरुष संसार में रहते हुए, व्यावहारिक आचरण करते हुए भी किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता | समता का अर्थ ही विचलन रहित (Balanced) स्थिति को प्राप्त कर लेना है |

               एक बार भगवान बुद्ध के पास एक व्यथित व्यक्ति आया | अपने वर्तमान जीवन से वह बड़ा ही क्षुब्ध था | कभी वह अपनी पत्नी की शिकायत कर रहा था और कभी वह अपने पुत्रों के द्वारा आदेश की अवहेलना करने की बात कह रहा था | आस-पास के लोगों और रिश्तेदारों से भी उसके सम्बन्ध मधुर नहीं है, इसलिए भी वह व्यथित था | उसने अपने मन की व्यथा भगवान बुद्ध के सामने प्रकट की और कहा कि वह जीवन में कुछ भी निश्चित नहीं कर पा रहा है | वह चाहता था कि भगवान बुद्ध उसे कोई ऐसा सूत्र दे जिसको जीवन में उतार कर वह इस दुविधा से बाहर निकल सके | भगवान बुद्ध ने कहा – “मेरे पास तो ऐसा कोई सूत्र नहीं है | हाँ, पास में ही एक वैश्य रहता है तुलाधार; उसके पास इसका एक सूत्र अवश्य है | है तो वह व्यापारी परन्तु आपकी समस्या के समाधान के लिए उसके पास एक सूत्र अवश्य है | आप चाहें तो उसके पास जाकर वह सूत्र प्राप्त कर सकते है और अपने जीवन में खुशियां भर सकते हैं |”

               तुरंत ही वह व्यक्ति वहां से निकलकर तुलाधार वैश्य के पास पहुंचा | तुलाधार एक व्यवसायी था | वह बड़ा ही प्रसन्न नज़र आ रहा था और अपने पास आये ग्राहकों को सौदा तोल-तोल कर दे रहा था | नवागत व्यक्ति ने तुलाधार को अपने आने का प्रयोजन बताया और कहा कि तथागत ने आपसे वह सूत्र प्राप्त करने को कहा है, जिसको पाकर आप आनंदित अवस्था को उपलब्ध हुए हैं | तुलाधार ने उसे प्रेम पूर्वक अपने पास बिठाया और एक ग्राहक के लिए सामान तोलते हुए कहा कि ‘इस तराजू के कांटे की ओर देखो | इसे सदैव मध्य में बनाये रखने से ही ग्राहक और व्यवसायी के मध्य सामंजस्य बैठ पाता है और दोनों खुश रह सकते हैं अन्यथा नहीं | मैंने तो तराजू के इसी कांटे से सीख ली है कि सदैव मध्य में अर्थात समता में  रहने से ही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सामंजस्य बैठ सकता है। समता में रहने से ही हम आनंद की अवस्था को उपलब्ध हो सकते हैं |’ वास्तव में तुलाधार ने मनुष्य के जीवन को आनंदित बनाने के लिए महत्वपूर्ण सूत्र दिया है | सदैव मध्य में बने रहने की अवस्था का नाम ही समत्व है |

             गृहस्थ जीवन, सदैव अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के मध्य एक दोलक की तरह दोलन करता रहता है, मध्य में रूक नहीं पाता | यह सब मन का खेल है | मन चंचल है, हमें उसको वश में करना है और अपनी बुद्धि में स्थिरता लानी है | ऐसा कर लेने पर साम्य अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है | हमें हमारे डोलते मन को मध्य में लाकर वश में कर लेना है अर्थात रोक देना है | तभी समता की स्थिति आ सकती है अन्यथा नहीं | समता में स्थित होने के कुछ सूत्र प्रस्तुत है-  

प्रथम सूत्र – निष्ठा पूर्वक कर्तव्य कर्म को करते रहना |

दूसरा सूत्र – किसी में भी दोष न देखना |

तीसरा सूत्र – ‘मैं और मेरा’ की भावना का त्याग |

चौथा सूत्र – संतुष्टि पूर्ण जीवन |

पांचवां सूत्र – सहिष्णुता अर्थात स्वयं के प्रति विरोध को सहन करना |

छठा सूत्र – कामनाओं और इच्छाओं पर नियंत्रण रखना |

सातवाँ सूत्र – साक्षी-भाव, दृष्टा बनकर रहना |

                इन सात सूत्रों से एक ही अभिप्राय है, स्वयं के मन पर नियंत्रण | केवल सात ही क्यों, अगर हम अधिक गहराई से और सूक्ष्म रूप से विश्लेषण करें तो कुछ और सूत्र भी निकल कर सामने आ सकते हैं | इनमें से किसी एक सूत्र को आत्म-सात करते हुए आसक्ति और अहंकार से स्वयं को दूर रखा जा सकता है | एक सूत्र से सभी सूत्र जुड़े हुए हैं | किसी भी एक सूत्र को पकड़ लेने से समस्त सातों सूत्र सध जाते हैं, ऐसा मेरा मानना है | एक गृहस्थ को न तो आसक्त होना चाहिए और न ही विरक्त | उसके लिए मध्यम मार्ग ही उपयुक्त है | 

          “तेन त्यक्तेन भुंजीथा”  (ईशावास्योपनिषद-1) अर्थात ईश्वर को साथ रखते हुए त्याग पूर्वक भोगते रहो | त्याग पूर्वक क्या भोगना है ? पूर्व जन्म के संस्कारों से मिलने वाले इन्द्रियों के सुख (विषय भोग) को त्याग-पूर्वक भोगना और फिर उन भोगों के प्रति आसक्त नहीं होना | समस्त इन्द्रियों का समुचित उपयोग करते हुए संसार की सेवा करें और आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हों, यही समत्व योग है |  

             श्रीमद्भगवद्गीता को अगर समत्व-योग का ग्रन्थ कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि समत्व योग के अंतर्गत सभी योग आ जाते हैं | साम्य अवस्था, समत्व आदि शब्दों का प्रयोग इस ग्रन्थ में भगवान् ने बार-बार किया है |

         इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः |

         निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः || गीता-5/19 ||

अर्थात जिसका मन सम में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि परम ब्रह्म निर्दोष और सम है, इससे वे ब्रह्म में ही स्थित है |

            भगवान् श्री कृष्ण का ऐसा कहना सिद्ध करता है कि समत्व भाव का आचरण करने वाला व्यक्ति ब्रह्म के समान ही हो जाता है | इसका अर्थ हुआ कि समता ही ब्रह्म का साक्षात् स्वरुप है | समता में आना बड़ा ही कठिन प्रतीत होता है, परन्तु कठिन है नहीं, केवल कठिन प्रतीत ही होता है |

          जैसा कि हम जानते हैं कि परमात्मा अक्रिय है और उसका दृष्टिगत स्वरुप अर्थात यह प्रकृति क्रियाशील है | समस्या तब उत्पन्न होती है जब पुरुष प्रकृति के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है | प्रकृति के तीन गुण उसको अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और मनुष्य उन गुणों का संग कर उनके अनुसार जीवन में कर्म करने लगता है | इस अवस्था में वह अपने आपको उन कर्मों का कर्ता मान बैठता है | यही वह अवस्था है जब उसमें आसक्ति और अहंकार का जन्म होता है | लेकिन जब वह इन प्राकृतिक तीनों गुणों से मुक्त हो जाता है तब वह उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जो पहले भी थी परन्तु उसको अनुभव में नहीं आ रही थी | 

           जैसे आकाश में बादल हो अथवा न हो, पंछी उड़ रहे हो अथवा नहीं हो, आकाश में आंधी से धूल छा गयी हो, सूर्य चमक रहा हो अथवा नहीं; इनमें से किसी भी अवस्था में आकाश की स्थिरता में कोई अंतर नहीं पड़ता क्योंकि आकाश अपने स्थान पर स्थिर है | ठीक इसी प्रकार समता रुपी तत्व भी स्थिर है, भले ही अंतःकरण में विभिन्न वृत्तियाँ आती-जाती रहती हो ।

          समत्व योग और सहज योग एक ही बात है। इस योग में मनुष्य को दो गतियों के बीच संतुलन बनाकर सहज रहना होता है। सहज अथवा समत्व का अर्थ है, दो के बीच संतुलन बनाये रहकर मध्य में निश्चल बने रहना। इसी को साक्षी भाव भी कहा जाता है। यहाँ कौन से दो के बारे में कहा जा रहा है ? आइये ! इस पर भी विचार करें ।

          ये दो हैं; सुख-दु:ख, मान-अपमान, हानि-लाभ, यश-अपयश, जन्म-मृत्यु आदि।जीवन, जन्म और मृत्यु इन दो के बीच की गति है।महाजीवन जन्म और मृत्यु  इन दो के मध्य की अनंत श्रृंखलाओं की महागति है।जबकि परम जीवन परमात्मा में परमगति अर्थता परम विश्राम है अर्थात पूर्णरूप से शांति की अवस्था है। परम जीवन एक ही है, दो नहीं।इस परम जीवन को समता में रहकर ही पाया जा सकता है अर्थात किन्हीं दो गतियों के मध्य सहज होकर, साक्षी बनकर।

        हमने पूर्व में सगुण साकार और निर्गुण निराकार की भक्ति की चर्चा की थी।सगुण मार्ग में अटकने की और निर्गुण मार्ग में भटकने की संभावना रहती है।सगुण मार्गी प्रायः मंत्र पर,पूजा स्थल,धर्मग्रंथ आदि पर आकर अटक जाते हैं।लेकिन निर्गुण में तो निराकार होता है,वहां पकड़ने के लिए कुछ नहीं होता,वहां अटकना नहीं होता बल्कि भटकना हो सकता है ।निर्गुण निराकार की साधना भटकाव का कारण बन सकती है।सहज योग  इन दोनों के बीच शांत भाव में,आत्मसफूर्त होकर जीने का नाम है।

         सहज योग यानि अपने स्वभाव में जीना।अपने स्वभाव में स्थित होना बड़ा कठिन है क्योंकि हम अपने स्वभाव से पहले ही बहुत दूर निकल आये हैं। हमारा स्वभाव वास्तव में शांत और स्थिर रहना है परंतु हमने अहंकार और आसक्ति में उलझकर अशांत स्वभाव को धारण कर लिया है। पुनः वास्तविक स्वरुप को पाने के लिए हमें सम स्थिति में रहना सीखना होगा। सहज अवस्था ही हमें अपने वास्तविक स्वभाव और स्वरूप तक ले जा सकती है। सहज योग को कबीर ने गोविंद से मिलन का मार्ग बताया है।इसके लिए हमें जीवन में साक्षी बनकर रहना होगा । साक्षी बनकर रहना ही समत्व योग है।

साक्षी-भाव

       हमारी चेतना के दो आयाम है-एक निराकार जहां कोई कंपन नहीं है,परिवर्तन नहीं है,दूसरा है साकार, जहां निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं ।शरीर, साकार का भाग है। दोनों के मध्य में हमारा मन है, तरल जैसा ।साकार और निराकार, दोनों के मध्य रहते हुए भी मन साकार का हिस्सा है क्योंकि मन के तल पर भी सतत परिवर्तन होते रहते हैं।निराकार में कोई परिवर्तन नहीं होता है।जब आप निराकार और साकार दोनों को समभाव से देखने की स्थिति में आ जाते हैं,वह स्थिति साक्षी भाव की है।

         हम इस भावना से बंध गए हैं कि हम इस अस्तित्व से तथा अन्य दूसरों से अलग हैं।इस अलग मानने की धुन में हमारी चेष्टा कुछ विशिष्ट दिखने की होती है।यह अहंकार है और यही दुःख का मूल कारण है।यह हमारी विचार प्रक्रिया का परिणाम है।जब सोच,विचार और चिंतन छूटता है,तभी योग प्रारम्भ होता है।योग ही हमें परमजीवन तक ले जा सकता है।परम जीवन ही आध्यात्मिक जीवन है।परम जीवन की साधना का ही नाम है,अध्यात्म और सहज/समत्व योग।योग मुख्यतः दो प्रकार के हैं,चिद्योग और सहज योग।चिद्योग का अर्थ है,परमात्मा के चैतन्य और निराकार रूप से जुड़ना।चिद्योग (चित् +योग) का आधार साक्षी होता है।

        कर्मयोग से सांख्य योग तक की यात्रा का अर्थ है कि आप चैतन्य और निराकार की खोज में लगे हैं।साक्षी का अर्थ है,अपने भीतर निराकार और अपने से बाहर साकार,दोनों को समान रूप से देखना अर्थात दोनों के प्रति जागरूक होने की दशा का नाम ही साक्षीभाव है।अध्यात्म की यात्रा पूरी करने के लिए जीवन में चिद्योग और सहज योग दोनों का समन्वय होना आवश्यक है।

         परमात्मा तक पहुंचने अर्थात आत्म-बोध की अवस्था को उपलब्ध होने के लिए कई योग-मार्ग उपलब्ध हैं। इसके लिए चाहे हम किसी भी योग-साधना का मार्ग चुनें, समता का महत्व प्रत्येक मार्ग में है। हमें प्रत्येक स्थिति में साक्षी बनना ही होगा।कौन से मार्ग में साक्षी होना कैसे संभव है, एक दृष्टि उधर भी डाल लेते हैं।

कर्मयोग-साक्षी होकर कर्म करना।

तंत्र योग-साक्षी होकर भोग करना।

हठ योग-साक्षी होकर अपनी सांसों का निरीक्षण करना।

भक्तियोग-साक्षी होकर प्रेमपथ पर चलना।

ज्ञान योग -साक्षी होकर ज्ञान/समझ के मार्ग पर चलना।

ध्यानयोग-चुनावरहित जागरूकता में रहना।

सांख्य योग-केवल बोध में जीना सीख लेना।केवल निराकार में,सिर्फ अपने चैतन्य रूप को,अपने बोध रूप मात्र को देख लेना।

        चिद्योग आध्यात्मिक यात्रा का पूर्वार्ध है।चिद्योग की मंज़िल साक्षीत्व है।साक्षीत्व की मंज़िल निराकार है।लेकिन सहज-योग निराकार पर आकर ही नहीं रुकता।सहज-योग ओंकार तक जाता है।परमात्मा के ओंकार स्वरूप से जुड़ता है।सहज-योग आध्यात्मिक यात्रा का उत्तरार्ध है।सहज योग के दो भाग हैं-सुमिरन योग और लय योग।सुमिरन योग का अर्थ है,ओंकार के सुमिरन में जीना।ओंकार एक मात्र मार्ग है,जिस पर चलकर आप गोविंद तक जा सकते हैं।सहज का वास्तविक अर्थ ही ओंकार है क्योंकि ओंकार से जुड़ते ही आपमें सहजता आ जाती है।यही लय योग है।चिद्योग और सहज योग एक दूसरे के पूरक हैं,एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।सहज-योग भोग और दमन,दोनों के पार सहजता की बात करता है।ऐसी सहजता ही समता है।दो के मध्य रहकर बिना विचलित हुए सम रहना।

          समता पर लिखना बहुत ही जटिल कार्य है।  समता को शब्दों के माध्यम से स्पष्ट करना टेढ़ी खीर है | समता जीवन में अनुभव करने का तत्व है | जिसने समता का अनुभव कर लिया, फिर वह इसी जीवन में शरीर के रहते हुए ही मुक्त हो जाता है | इतने विवेचन के बाद प्रश्न उठता है कि समता को प्राप्त करने का सरल उपाय क्या है ? 

            मन को वश में करने के लिए जैसे अभ्यास और वैराग्य की बात कही गयी है, उनकी समता में स्थित होने में महत्वपूर्ण भूमिका है | साथ ही यह भी सत्य है कि अभ्यास दीर्घकालीन प्रयास मांगता है और इस भौतिक संसार में रहते हुए वैराग्य की पूर्ण अवस्था को उपलब्ध होना भी कोई सरल कार्य नहीं है | समता की अवस्था प्राप्त करने के लिए सरलतम और सर्वश्रेष्ठ मार्ग है; केवल और केवल परमात्मा पर दृष्टि रखना | ऐसा करना केवल समत्व बुद्धि से ही संभव हो सकता है | जब तक जीव की दृष्टि उस ओर नहीं है तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि परमात्म-तत्व उपस्थित नहीं है | वह तत्व तो वैसा का वैसा ही है, सदैव ही है केवल आसक्ति और अहंकार के कारण हमें उसका अनुभव नहीं हो रहा है | उसे अनुभव करने के लिए हमें अपनी निर्दोषता की ओर दृष्टि करनी है और कुछ भी करना आवश्यक नहीं है |

            यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता में भले ही भगवान् ने समता को मुख्य स्थान दिया हो परन्तु अंततः अर्जुन को शरणागत हो जाने का ही कहा है | शरणागति ही एक मात्र ऐसी अवस्था है जिसमें दृष्टि मूल तत्व के अतिरिक्त अन्य किसी पर नहीं रहती | शरणागत के लिए फिर अहंकार और आसक्ति का कोई अर्थ नहीं रह जाता | जब सब कुछ भगवान् पर छोड़ दिया गया हो, अपने स्तर पर न तो ज्ञान और न ही कर्म से कार्य लिया जा रहा हो तो स्वतः ही समता और निर्दोषता की स्थिति प्राप्त हो जाती है | शरणागति से सम और निर्दोषता की अवस्था प्राप्त करना इंगित करता है कि आप स्वयं ही ब्रह्म हो गए हो क्योंकि ब्रह्म भी सम और निर्दोष है |  

 सार-संक्षेप-

          समता के बारे में एक बात स्पष्ट है कि यह मन की चंचलता से सम्बंधित है | मन अपनी चंचलता के कारण एक स्थान पर टिक नहीं सकता | मन के इधर-उधर भटकने की प्रवृति के कारण वह बुद्धि को भी विचलित कर देता है | बुद्धि और मन, दोनों जब विचलित अवस्था में रहने लगते हैं तब जीवन में विषमता आ जाती है | विषमता के कारण मनुष्य स्वयं विचलित रहने लगता है | विषमता ही जीवन में अशांति का सबसे बड़ा कारण है | इस विषमता से पार पाने का एक ही उपाय है- मन को स्थिर किया जाये | मन के स्थिर होते ही बुद्धि भी समता में आ जाती है |

            मन की स्थिरता के लिए मुख्यतः दो उपाय बतलाये गए हैं – अभ्यास और वैराग्य | अभ्यास में मन को भटकने की अवस्था में जाने पर बार-बार प्रयास कर स्थिर अवस्था में लाया जाता है | अभ्यास एक दीर्घकालीन साधन है अर्थात इस साधन में समय लगता है | समय भले ही लगे, इस साधन से धीरे-धीरे मन स्थिर अवस्था में आ जाता है और बार-बार भटकने का प्रयास नहीं करता | दूसरे साधन अर्थात वैराग्य में संसार में राग समाप्त करना पड़ता है | राग के कारण ही मन कभी यह करूँ, कभी वह करूँ के मध्य ही भटकता रहेगा | राग के समाप्त होते ही मन समता में आ जाती है |

            गीता में अर्जुन को भगवान् कह रहे हैं-

            मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय |

             निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय ||12/8 ||

            अर्थात मुझ में मन को लगा, मुझ में बुद्धि को लगा; फिर तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है |

        समता में आ जाने पर मनुष्य में सहजता आ जाती है और उसका व्यवहार सबके प्रति समान रहता है, प्रत्येक परिस्थिति में वह सम रहता है | जीवन में कभी भी वह विचलित नहीं हो सकता | इस संसार में उसकी भूमिका एक साक्षी मात्र की ही रह जाती है |

प्रस्तुति –डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||



         


Thursday, June 17, 2021

भक्तिरेकैव मुक्तिदा

 भक्तिरेकैव मुक्तिदा

       मुक्ति का अर्थ है संसार से मुक्ति | संसार से हमें मुक्ति क्यों चाहिए ? हम इस संसार में रहने को विवश हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार में रहना अनुपयुक्त है | जब हम अपने पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण इस संसार में आ ही गए हैं तो चाहकर भी इससे पलायन नहीं कर सकते | प्रायः हम समझते हैं कि एक शरीर के छोड़ने पर यह संसार छूट जाता है और नया शरीर मिलने पर एक नया संसार मिलता है | नहीं, शरीर भले ही बदल जाये, हमारा स्व-निर्मित संसार वही का वही रहता है | स्व-संसार में मोह के कारण से ही तो हम जीर्ण-शीर्ण शरीर त्यागने के समय विचलित हो जाते हैं | यह सांसारिक मोह ही हमारे भीतर मृत्यु का भय पैदा करता है | हम यह नहीं जानते कि भविष्य में मिलने जा रहे नए जीवन में हमारे स्व-निर्मित संसार के लगभग सभी पात्र वही और वैसे के वैसे ही मिलते हैं, बस केवल उनकी भूमिका बदल जाती है | जैसा भाव जिसके प्रति पहले के शरीर में रहा, उसी भाव के अनुसार नए जन्म में उस पात्र को वैसी ही भूमिका मिल जाती है | केवल भूमिका मिल ही नहीं जाती बल्कि वह भूमिका हमें निभानी भी पड़ती है।

              हम सोचते हैं कि संसार से पलायन कर हम संसार से मुक्त हो जायेंगे |  पलायन करना संसार से मुक्त हो जाना नहीं है | जैसे तैसे इस संसार से पलायन कर भी जायेंगे तो भी आखिर इससे बचकर कहाँ तक जा पायेंगे ? संसार हमसे बाहर होता तो पलायन से उससे मुक्त हुआ जा सकता था परन्तु संसार तो हमारे भीतर बैठा है | केवल दिखावे के तौर पर बाहर से पलायन कर उससे मुक्त नहीं हुआ जाता, मुक्त तो भीतर के संसार को त्यागने से ही हुआ जा सकता है | इसलिए संसार से भागने की नहीं सोचें बल्कि इसको भोगकर इससे मुक्त हो जाने का रास्ता ढूंढें | संसार को भोगना तो पड़ेगा ही क्योंकि पूर्व मानव जीवन में हमने उन भोगों को प्राप्त करने के लिए ही तो कर्म किये थे | उन्हीं कर्मों के कारण ही तो हमें यह शरीर मिला है | अतः सर्वप्रथम हमें उन कर्मों का फल भोगना पड़ेगा और अगर फिर इस जीवन में नए भोग प्राप्त करने की कामना से नए कर्म नहीं करेंगे, तभी इस नश्वर संसार से मुक्त होना संभव होगा अन्यथा नहीं | गीता में भगवान श्री कृष्ण ने संसार से मुक्ति के तीन मार्ग बताये हैं- कर्म, ज्ञान और भक्ति | ये तीनों मार्ग ही हमें अपने संसार से मुक्त कर सकते हैं |

            परमात्मा ने सृष्टि का सृजन किया अपने आनंद के लिए और इस आनंद को जिस माध्यम से वे भोग सकते हैं उनमें से एक साधन है-मनुष्य शरीर | इसलिए वे सृष्टि का सृजन कर स्वयं मनुष्य के भीतर प्रवेश कर गए | केवल एक मनुष्य के शरीर में ही नहीं बल्कि सृष्टि के प्रत्येक कण में वे प्रविष्ट है, कण कण में ही क्या, वे स्वयं ही सब कुछ बने बैठे हैं परन्तु जिस शरीर के माध्यम से वे सर्वाधिक आनंद को प्राप्त कर सकते हैं, वह है मानव शरीर। सृष्टि के अन्य साधनों से वे आनंद अवश्य प्राप्त करते हैं परन्तु अपने मूल स्वरुप में उन अन्य साधनों से पहुँच नहीं सकते बल्कि केवल मनुष्य शरीर से ही ऐसा होना संभव हो सकता है | अपने सच्चिदानंद स्वरुप को अनुभव करने का मार्ग उन्हें मनुष्य शरीर के माध्यम से ही मिल सकता है | मनुष्य शरीर में स्थित आत्मा ही परमात्मा है और उसका मनुष्य शरीर को पाने का उद्देश्य भी यही है कि वह अपने मूल स्वरुप तक पहुंच सके | अन्य प्राणियों के शरीर के माध्यम से ऐसा होना असंभव है |

            आत्मा ही परमात्मा है परन्तु आत्मा का जब संयोग शरीर के साथ हो जाता है तब वही आत्मा अपना मूल स्वरुप भूल जाता है | आत्मा का मूल स्वरुप खोता नहीं है बल्कि विस्मृत हो जाता है | इसी आत्मा को जो कि हम स्वयं है, उसे अपने मूल स्वरुप तक जाना है | आत्मा का शरीर के साथ बन्ध जाना ही बन्धन है और इस शरीर से बंधन तोड़ डालना ही उसकी मुक्ति है | इस शरीर के कारण ही मनुष्य के अन्य शरीरों के साथ सम्बन्ध बनते हैं और इस प्रकार एक शरीर का दूसरे शरीरों के साथ सम्बन्ध बनना ही संसार का निर्माण करना है | इसीलिए इस संसार को ही बंधन का कारण बताया गया है | संसार हमें अपने साथ बांधता नहीं है बल्कि हम संसार के साथ बंधते हैं | संसार के साथ बंधने का कारण हमारा शरीर है जो प्रकृति के कारण बना है | प्रकृति त्रिगुणी है और गुण ही एक शरीर को दूसरे शरीर की ओर आकर्षित करते हैं | इस प्रकार एक दूसरे के प्रति आकर्षित हुए शरीर ही आपस में अपना एक संसार बना लेते हैं | गुणों के कारण ही बने समस्त संबंधों को तोड़ डालना ही संसार से मुक्त हो जाना है | इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह भौतिक शरीर ही मुख्य रूप से बंध जाने के लिए उत्तरदायी है |

                      प्रत्येक शरीर विभिन्न प्रकार के पदार्थों के मिलने से बना है | परोक्ष रूप से कहा जा सकता है कि शरीर भी एक प्रकार का पदार्थ ही है | विभिन्न शरीरों के साथ आपस में सम्बन्ध बना लेना इन पदार्थों के गुणों के प्रति हमारी आसक्ति पैदा हो जाना कहलाता है | प्राकृतिक गुण ही हमें इस आसक्ति के कारण पदार्थों के साथ बांधते हैं | आसक्ति के कारण पैदा हुआ बंधन हमें अपने मूल आत्मिक स्वरुप से दूर कर देता है | हम अपना वास्तविक परमात्मिक स्वरुप भूलकर इस सांसारिक शरीर को ही अपना स्वरुप समझ बैठते है | हमारी ऐसी सोच-समझ को “अज्ञान” कहा जाता है | ज्ञान प्राप्त कर जब हम अज्ञान से बाहर निकल जाते हैं तभी हम अपने मूल स्वरुप को देख पाते हैं अन्यथा नहीं | इस प्रकार कहा जा सकता है कि अपने मूल स्वरुप को भूलने का कारण आसक्ति ही है जो हमारे संसार का निर्माण कर हमें उसके साथ बांध देती है | आसक्ति किस के साथ ? भोग और पदार्थ के साथ | संसार के विभिन्न पदार्थ भोग प्रदान करते है और वे भोग पदार्थ (शरीर) के द्वारा ही भोगे जाते है |

           आसक्ति किसे कहते हैं ? प्रत्येक पदार्थ में स्थित प्रकृति के गुणों के कारण ही सभी प्रकार के कर्म होते हैं | उन कर्मों के फल हमें भोग के रूप में मिलते हैं | भोग रूचिकर अथवा अरूचिकर हो सकते हैं | रूचिकर भोगों की ओर जाना अथवा अरूचिकर भोगों से दूर भागना, दोनों ही भोगों के प्रति आसक्ति है | आसक्ति ही नई कामनाओं और कर्मों की जनक है | भोगों की आसक्ति के कारण ही हम इस शरीर और संसार के साथ बन्ध जाते हैं | भोग भी काई प्रकार के होते हैं | प्रारम्भिक जीवन में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ भोगों से हमारा परिचय कराती है | यह भोगों से हुआ परिचय हमारी इच्छाओं को पुष्ट करता है और कई कामनाओं को जन्म देता है | इच्छाएं मान-सम्मान प्राप्त करने की हो (लोकेषणा), धन अर्जित करने की हो (वित्तेष्णा), पुत्र आदि से सेवा की अपेक्षा हो (पुत्रेष्णा) अथवा इस भौतिक शरीर से सम्बंधित अन्य कोई कामना हो, सभी प्रकार की कामनाएं हमें संसार के साथ बांधती है |

          हमारी कामनाएं ही हमारी इन्द्रियों (कर्मेन्द्रियों) को कर्म करने के लिए विवश करती है | सभी प्रकार के कर्म प्रकृति के तीन गुणों के कारण होते हैं | जब कर्म से हमारी कामना पूर्ण होती है तो एक बड़ी भूल हम कर बैठते है | इस कामना का पूर्ण होना हम हमारे द्वारा किये गए कर्मों से संभव होना मान लेते है | हमारा यह कर्ता-भाव हमें उस कर्म के साथ बाँध देता है जबकि वास्तव में कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं और इस कामना के पूर्ण करने में केवल और केवल इन गुणों का ही योगदान है, हमारा किंचित मात्र भी योगदान नहीं है सिवाय इसके कि जिस पदार्थ में उपस्थित रहकर ये गुण आपस में क्रियाएं कर रहे हैं, वह पदार्थ यह शरीर है | इस प्रकार गुणों की क्रियाओं और कर्म की सम्पूर्ण प्रक्रिया को समझ जाने वाला मनुष्य  कर्म के साथ बंधता नहीं है, वह सदैव मुक्त ही है |

                       आइये, जानते हैं कि बंधन क्या है और मुक्ति क्या है ? बंधन उस कारागार की तरह है जिसमें आप एक निश्चित सीमा और वातावरण में कैद होकर रह जाते हैं | मुक्ति ऐसे किसी एकदेशीय वातावरण और निश्चित की गई एक सीमा से मुक्त होकर असीम हो जाना है | बंधन में हमें श्वांस तक लेने में परेशानी होती है और मुक्ति में ऐसी किसी भी परेशानी का नाम तक नहीं होता | हमारे जीवन में ये बंधन कितने प्रकार के होते हैं, आइये ! जरा उस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं |

1.सामाजिक बंधन (Social)- सामाजिक बंधन वे बंधन होते हैं जिनमें हम एक दूसरे व्यक्ति के साथ स्वार्थ वश बन्ध जाते हैं | यह स्वार्थ प्रायः पूर्वजन्म का ही होता है जिसके कारण इस जीवन में हमारा आपस में एक पारिवारिक और सामाजिक सम्बन्ध बन जाता है | किसी एक को किसी दूसरे से कुछ न कुछ लेना अथवा देना होता है | हिसाब चूकता होते ही यह सम्बन्ध भी समाप्त हो जाता है | साथ ही इस जीवन में हम अपने स्वार्थ से नए सम्बन्ध भी बना लेते हैं | इस प्रकार के सम्बंधों का यह क्रम जन्म-जन्मान्तर तक बनता बिगड़ता रहता है |

2.आर्थिक बंधन (Economic)– यह बंधन हमें हमारे व्यवसाय से बांधता है | व्यावसायिक  आधार पर विभिन्न व्यक्तियों से हमारा सम्बन्ध स्थापित होता है | एक दूसरे से आर्थिक लाभ के कारण हम आपस में बन्ध जाते हैं | जब व्यावसायिक लेन देन समाप्त हो जाता है, यह सम्बन्ध भी समाप्त हो जाता है |

3.राजनैतिक बंधन (Political)- एक राजनीति दल का दूसरे दल से सम्बन्ध भी बंधन पैदा करता है | हमें ऐसा प्रतीत होता है कि पक्ष और विपक्ष के नेता एक दूसरे को समाप्त करने के लिए उद्यत बैठे हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है | वे आपस में एक दूसरे से इतने गहरे बंधे हुए हैं कि एक के अभाव में दूसरे का अस्तित्व तक खतरे में पड़ सकता है | ऐसी स्थिति में एक दूसरे को आनंद मिल ही नहीं सकता |  

4.साम्प्रदायिक/धार्मिक बंधन (Religious)– कोई हिन्दू है कोई मुसलमान, कोई सिख और कोई ईसाई | सब अपने अपने सम्प्रदाय के साथ बंधे हुए हैं | सबकी अपने अपने धर्म के प्रति इतनी अधिक आसक्ति है कि उन्हें अपना धर्म ही सर्वोपरि लगता है | वास्तव में देखा जाये तो ऐसा होना धार्मिक होना नहीं है | धार्मिक व्यक्ति वही होता है जो सब धर्मों का सम्मान करे क्योंकि संसार में विभिन्न धर्मों के पथ भले ही अलग अलग हो, पहुँचने का लक्ष्य एक ही है | एक धर्म के प्रति आसक्त होना भी एक बंधन है | आध्यात्मिक व्यक्ति ऐसे किसी भी बंधन से सदैव ही मुक्त रहता है |

5.व्यक्तिगत बंधन (Personal)– ऐसे बंधन के पीछे हमारे स्वयं के कारण होते हैं जैसे हमारी कामनाएं (Desires), महत्वाकांक्षाएं (Ambitions), भय (Fear), शारीरिक सुख (Pleasure) आदि |

       इस प्रकार हमने हमारे संसार के साथ बंधन के कुछ कारणों का संक्षेप में विवेचन किया है | जब हम इन बंधनों के पीछे छुपे कारण को समझ लेंगे, हमारा मुक्त होना सरल हो जायेगा | समस्या यहीं आकर उत्पन्न होती है कि हम बंधन में रहते हुए मुक्ति की कामना करते हैं जिसका कि होना असंभव है | बड़ा ही जटिल लग रहा है, इन बंधनों से छुटकारा पाना | प्रत्येक व्यक्ति ऊपर वर्णित बंधनों में पूर्ण अथवा आंशिक रूप से अवश्य ही बंधा हुआ है | कोई सामाजिक बंधनों में अधिक और राजनैतिक बंधन में कम है तो कोई इसके विपरीत परन्तु प्रायः सभी अपने व्यक्तिगत बंधनों में तो पूर्णरूपेण जकडे हुए अवश्य है | 

              किसी भी प्रकार की आसक्ति और उससे बने बंधन से छूटने के कई मार्ग हैं | कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है, विवाद का विषय हो सकता है क्योंकि मनुष्य का स्वाभाव ही ऐसा है कि वह स्वयं के द्वारा अपनाये गए मार्ग को ही श्रेष्ठ बतलाता है | श्रीमद्भागवत महापुराण में नारद मुनि कहते हैं-

     अलं व्रतैरलं तीर्थैरलं योगैरलं मखै:|

     अलं ज्ञानकथालापैर्भक्तिरेकैव मुक्तिदा || भागवत माहात्म्य-2/21 ||

अर्थात व्रत, तीर्थ, योग, यज्ञ, और ज्ञान चर्चा आदि बहुत से साधनों की कोई आवश्यकता नहीं है; एक मात्र भक्ति ही मुक्ति देने वाली है |

             कलियुग में भक्ति-मार्ग को ही मुक्ति के लिए श्रेष्ठ मार्ग बतलाया गया है | क्यों है, भक्ति का मार्ग ही सर्वश्रेष्ठ मार्ग ?  नारदजी तो इस श्लोक के माध्यम से यहाँ तक कह गए हैं कि जितने भी अन्य साधन हैं, जैसे तीर्थ, व्रत, योग, यज्ञ और ज्ञान इनकी भी कोई आवश्यकता नहीं है केवल एक भक्ति ही पर्याप्त है, संसार से मुक्ति पाने के लिए | जितने भी अन्य साधन हैं, वे गीता के अनुसार कर्म और ज्ञान मार्ग के अंतर्गत आ जाते हैं क्योंकि उनमें कुछ न कुछ करना अथवा जानना पड़ता है | भक्ति मार्ग में न तो कुछ करना आवश्यक है और न ही कुछ जानना बल्कि केवल मात्र मानना पड़ता है | मानना, परन्तु किसको मानना ?

           मानना अर्थात “सर्वशक्तिमान परमात्मा”,  केवल इस एक को ही मानना | मैं यह नहीं कह रहा कि कर्म और ज्ञान मार्ग से परमात्मा को जाना या माना नहीं जा सकता | अंततः उनमें भी ‘एक परमात्मा की ही सत्ता है’ यह मानना होता है परन्तु एक लम्बें, उबाऊ और थकाऊ प्रयास के पश्चात् | भक्ति में बिना किसी प्रयास के सीधे सीधे सरल ह्रदय से, बिना किसी लाग लपेट के परमात्मा को मान लिया जाता है | बिना माने भक्ति होना संभव ही नहीं है चाहे वह कर्म मार्ग हो अथवा ज्ञान मार्ग | इन दोनों मार्गों का संगम भी अंततः भक्ति-मार्ग पर आकर ही होता है | गंगा की तीनो धाराओं का उद्गम हिमालय से होता है | भगीरथी (गंगा), यमुना और सरस्वती तीनों अलग अलग स्रोतों से जन्म लेती है और समुद्र की तरफ चल पड़ती है | प्रयागराज में आकर यमुना और सरस्वती भी अंततः गंगा में आकर मिल जाती है | हम ऐसा समझ सकते हैं कि गंगा भक्ति मार्ग है, यमुना कर्म मार्ग है और सरस्वती ज्ञान मार्ग है | सभी का उद्देश्य सागर तक पहुँच कर उसमें समाहित होना है, जो कि उन सभी नदियों का मूल स्रोत भी है | कहने का अर्थ है कि जो भी मार्ग अपनाएं, सभी हमें एक ही स्थान पर पहुंचाते हैं और लक्ष्य तक पहुँचने से पहले सभी को भक्ति-मार्ग पर आना ही पड़ता है |

                कर्म और ज्ञान मार्ग की हम पहले भी बहुत चर्चा कर चुके हैं, इस लेख में चर्चा करेंगे, केवल भक्ति-मार्ग की |

      गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं-

            ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना |

            अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ||

            अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते |

            तेSपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणा: || गीता-13/24-25 ||

अर्थात उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान के द्वारा अपने ह्रदय में देखते हैं दूसरे अन्य ध्यान योग के द्वारा और दूसरे कितने ही कर्म योग के द्वारा देखते हैं अर्थात परमात्मा को प्राप्त करते हैं | परन्तु इसके विपरीत दूसरे लोग इस प्रकार न जानते हुए दूसरे तत्व को जानने वालों से सुनकर उपासना करते हुए इस संसार सागर से तर जाते हैं | 

           परमात्मा को प्राप्त करने का अर्थ है परमात्मा के साथ भक्त हो जाना अर्थात संसार के सभी बंधनों से मुक्त होकर परमात्मा के साथ जुड़ जाना | कर्म और ज्ञान मार्ग से चलकर भक्ति-मार्ग पर आकर ही परमात्मा तक पहुंचा जा सकता है | कर्म और ज्ञान मार्ग से संसार के बंधनों से मुक्त होना सरल नहीं है | सरल मार्ग पर चलकर मुक्त होना है तो भक्ति-मार्ग सर्वश्रेष्ठ मार्ग है | सरल इस कारण से है कि इस मार्ग में करने और जानने का श्रम नहीं करना पड़ता | श्रम उर्जा का व्यय करता है जबकि विश्राम की अवस्था में उर्जा संचित होती है | भक्ति मार्ग विश्राम का मार्ग है अर्थात करने, सोचने, समझने आदि सभी क्रियाओं से सदैव के लिए विश्राम |

       भक्ति क्या है ? हमारे द्वारा की जाने वाली प्रत्येक क्रिया जो परमात्मा को प्राप्त करने और संसार से मुक्त होने के लिए की जाती है, वह भक्ति कहलाती है | परन्तु यह क्रिया वैसी क्रिया नहीं है जिसमें श्रम करने की आवश्यकता हो | व्यक्ति शिथिल होता है, उर्जा के व्यय से और सर्वाधिक उर्जा का व्यय होता है, सोचने, विचारने से अर्थात मस्तिष्क का अधिक उपयोग करने से | परमात्मा को समर्पण कर देने का नाम ही भक्ति है और जब समर्पण कर दिया जाता है, तो फिर सोचने, विचारने अथवा कुछ करने की भला आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है ?

          मनुष्य इतने सरल मार्ग को अपनाने में भी हिचकिचाता है क्योंकि उसे अनन्त जन्मों से कुछ न कुछ करते रहने की आदत जो पड़ गयी है | बेचारा विभिन्न योनियों में भटकता हुआ आ रहा है जिस कारण से कर्म और भोग उसका स्वभाव बन चूका है | अब वह मनुष्य योनि पाकर भी कर्म करने से अपने आप को मुक्त नहीं कर पा रहा है | कर्म करना भी बुरा नहीं है परन्तु निस्वार्थ भाव से कर्म करना वह कभी का भूल चूका है | इस प्रकार उसके सामने दो ही रास्ते हैं – प्रथम तो वह निष्काम कर्म करते हुए भक्ति में लग जाये जिससे संसार से मुक्त हो सके और दूसरा रास्ता है, भक्ति का, परमात्मा को समर्पित होकर उसकी भक्ति करे, परिणाम स्वरुप शीघ्र ही संसार से मुक्त हो जायेगा |

         संसार से मुक्त होना सरल है अथवा भक्ति करना | सांसारिक कर्मों से निवृत होने की इच्छा रखने वाले प्रायः कहते हैं कि हम तो मुक्त हैं ही | नहीं, मुक्ति इतनी सरल नहीं है अन्यथा अब तक सारे प्राणी मुक्त हो चुके होते | आप कितना ही कर्म और ज्ञान के मार्ग को साध लें, संसार से मुक्त होना है तो अंततः भक्ति-मार्ग पर आना ही होगा | केवल ज्ञान और कर्म मार्ग के द्वारा संसार से मुक्त होना असंभव नहीं है तो आसान भी नहीं है | ज्ञान की उच्चावस्था आपके कर्म सही कर सकती है, निषिद्ध कर्म करने से आपको रोक तो सकती है परन्तु संसार में आपकी आसक्ति को कम नहीं कर सकती | यह कार्य तो केवल और केवल भक्ति ही कर सकती है | इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले शारारिक सुख की क्षमता बड़े बड़े ज्ञानियों को भी एक बार ही नहीं, बार-बार कई बार पस्त कर चुकी है | संसार से मुक्त होने की बात करना तो कल्पना से बहुत परे है |

        प्रश्न यह उठता है कि क्या भक्ति से संसार से मुक्त होना सुगम है ? जी हाँ, सुगम है अगर भक्ति परमात्मा को पूर्ण रूप से समर्पित होकर की जाये | देवर्षि नारद भागवत माहात्म्य में “भक्ति” को कहते हैं –

    अंगीकृतं त्वया तद्वै प्रसन्नोSभूद्धरिस्तदा |

    मुक्तिं दासीं ददौ तुभ्यं ज्ञानवैराग्यकाविमौ || भा.मा.-2/7||

अर्थात हे भक्ति ! तुमसे प्रसन्न होकर श्री हरि ने तुम्हारी सेवा के लिए मुक्ति को तुम्हें दासी के रूप में दे दिया और ज्ञान-वैराग्य को पुत्रों के रूप में |

              मुक्ति, भक्ति की सेवा में होने से उसकी दासी है | भक्ति जब उच्चावस्था को प्राप्त होती है तब मुक्ति स्वतः ही हो जाती है क्योंकि जहाँ भक्ति है वहां उसकी सेवा में मुक्ति का रहना आवश्यक है | इसी प्रकार ज्ञान-वैराग्य भक्ति के पुत्र हैं | जहां भक्ति होगी वहां ज्ञान और वैराग्य का भी स्वतः ही आगमन हो जायेगा | इसीलिए कहा जाता है कि ज्ञान और वैराग्य के साथ अगर भक्ति न हो तो मुक्ति होना असंभव है लेकिन बिना ज्ञान और वैराग्य के भी केवल भक्ति से मुक्ति होना संभव है क्योंकि संसार में प्रत्येक मां (भक्ति) के लिए कुछ भी करना असंभव नहीं है | इसीलिए भागवत माहात्म्य में देवर्षि नारद कहते हैं- ‘भक्तिरेकैव मुक्तिदा’ अर्थात केवल एक भक्ति भी मनुष्य को मुक्त कर सकती है |

देवर्षि नारद कहते हैं-

         नृणां जन्मसह्स्रेण भक्तौ प्रीतिर्हि जायते |

         कलौ भक्तिः कलौ भक्तिर्भक्त्या कृष्णः पुरः स्थितः || भा.मा.-2/19||

             अर्थात मनुष्य का सहस्र जन्मों के पुण्य-प्रताप से भक्ति में अनुराग होता है | कलियुग में केवल भक्ति, हाँ केवल भक्ति ही सार है | भक्ति से तो साक्षात् श्री कृष्ण उपस्थित हो जाते हैं |

         भक्ति से भगवान् श्री कृष्ण साक्षात् उपस्थित हो सकते हैं इसका अर्थ हुआ कि भगवान् भक्ति से भक्त के वश में हो जाते हैं | आवश्यकता है, भक्ति को परमात्मा के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित होकर किया जाये | अनन्य भक्ति का अर्थ भी यही है कि एक परमात्मा के अतिरिक्त मेरा अन्य कोई नहीं है | हम भक्ति के नाम पर नाना प्रकार की क्रियाएं तो बहुत करते है परन्तु जब संसार से मुक्ति की बात आती है तो व्यथित हो जाते हैं और भक्ति पर ही दोषारोपण करने लग जाते हैं | अगर मन लगाकर भक्ति न की जाये और केवल क्रियाओं को ही महत्त्व देते रहे तो ऐसी तथाकथित भक्ति भी सारहीन है |

             एक अकेला भक्ति मार्ग मुक्त कर सकता है | भक्ति में न तो ज्ञान है और न ही कर्म, भक्ति में तो केवल समर्पण है | समर्पण, परमात्मा के प्रति समर्पण, जिसके बाद न तो कुछ जानना शेष रहता है और न ही करना | समर्पण ही भक्ति का मूल मन्त्र है | समर्पण के बाद न तो आपको संसार की परवाह रहती है और न ही परिवार की | समस्त भय, आसक्तियां और कामनाएं आकर समर्पण में समाप्त हो जाती है | भगवान् श्री कृष्ण ‘मुक्त कौन है’, इसको स्पष्ट करते हुए गीता में कहते हैं –“विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः”(गीता-5/28) अर्थात जो व्यक्ति भय, इच्छा और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है | भय, इच्छाएं और क्रोध, इन तीनों का विलीन होना परमात्मा के प्रति पूर्णरूपेण समर्पण से ही संभव है | भय, इच्छा और क्रोध, ये तीन ही मुक्ति में बाधक हैं |

            इच्छा अर्थात कामनाओं को ही क्रोध का जनक कहा गया है | एक कामना पूरी होती है तो दूसरी कामना जन्म ले लेती है और अगर दुर्भाग्यवश कोई कामना पूरी नहीं हो पाती तो क्रोध उत्पन्न होता है | क्रोध किस पर आता है ? क्रोध आता है उस बाधा पर अथवा उस बाधक पर जिसके कारण कामना की पूर्ति न हो सकी | जब आप क्रोध के वशीभूत होकर किसी से द्वेष करने लगते हैं तो आपके भीतर भय पनपने लगता है | भय, उस बाधा अथवा बाधक से, जो आपकी कामना पूर्ति नहीं होने दे रहा | इस प्रकार कामना ही मुक्ति न होने देने में महत्वपूर्ण कारण है | इसीलिए गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है –“जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्” (गीता-3/43) अर्थात अर्जुन | तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल |

        भगवान् ने यह बात कर्म और ज्ञान के सन्दर्भ में कही थी | लेकिन समझाने के बाद भी नहीं समझने पर भगवान् अर्जुन को भक्त होने का कह देते है, “मन्मना भव मद्भक्तो” | परमात्मा के प्रति समर्पित हो जाने से, उनके शरणागत हो जाने से मनुष्य को अपनी कामनाओं की पूर्ति होने अथवा पूर्ति न होने की किसी प्रकार का भय व चिंता आदि नहीं रहते और वह स्वयं को मुक्त होना समझने लगता है | देखा जाये तो भक्ति ही एक ऐसा मार्ग है जिसमें व्यक्ति की समस्त उर्जा एक स्थान पर एकत्रित हो जाती है जिससे वह चिंतामुक्त होकर शांति को उपलब्ध हो जाता है |

           कई लोग इस उर्जा को एक स्थान पर एकत्रित करने के लिए कुण्डलिनी चक्र को जाग्रत करने का अभ्यास करते हैं | कुण्डलिनी जागरण में मूलाधार चक्र से सहस्रार चक्र तक उर्जा को ले जाना होता है | हमारे शरीर में इस प्रकार के सात उर्जा चक्र बतलाये गए हैं | कुण्डलिनी जागरण में उर्जा के प्रवाह को नीचे मूलाधार चक्र से ऊपर सहस्रार चक्र की ओर प्रवाहित करने का प्रयास किया जाता है | अंततः जब उर्जा पूर्ण रूप से सहस्रार चक्र तक पहुँच जाती है, तभी व्यक्ति शांति का अनुभव करते हुए मुक्त होता है |

              बड़ा ही कठिन कार्य है यह तो | मैं कहता हूँ कि व्यर्थ में इतने कठिन प्रयास की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है, जब एक सुगम मार्ग से परमात्मा को समर्पित होकर उनका स्मरण करते हुए उसकी भक्ति से भी वही उपलब्धि प्राप्त की जा सकती हो |

            कुण्डलिनी जागरण की तरह ही महर्षि पतंजलि के योग-दर्शन की बात पर भी कुछ चर्चा कर लेना आवश्यक समझता हूँ | योग का अर्थ संसार से मुक्त होकर परमात्मा के साथ जुड़ना है और भक्ति का अर्थ भी संसार से मुक्त होकर परमात्मा के साथ जुड़ना है | महर्षि पतंजलि ने मुक्त होने के लिए योग के आठ अंग बताये हैं, जिस कारण से इसको अष्टांग योग भी कहा जाता है | योग-दर्शन में चार पाद है, जिनमें समाधि पाद प्रथम और महत्वपूर्ण पाद है | अन्य तीन पाद हैं-साधन-पाद, विभूति-पाद और कैवल्य-पाद | प्रथम पाद, समाधिपाद का दूसरा सूत्र कहता है,”योगश्चित्तवृतिनिरोध” अर्थात चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है | मनुष्य का चित्त उसकी वृत्तियों के कारण स्थिर नहीं रह पाता | जब चित्त की वृत्तियों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया जाता तब मन का भटकना रूक जाता है | मन के भटकने से रूक जाने पर ही व्यक्ति समाधि अवस्था तक पहुँच सकता है | समाधि अवस्था ही मुक्ति की अवस्था कहलाती है |

      महर्षि पतंजलि कहते हैं कि “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” (समाधिपाद-सूत्र-12) अर्थात चित्त वृतियों का निरोध अभ्यास और वैराग्य से होता है | भगवान् श्री कृष्ण गीता में भी अर्जुन को चंचल मन को नियंत्रण में रखने का यही उपाय बतलाते हुए कहते हैं-

           असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् |

           अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते || गीता-6/35 ||

अर्थात हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होनेवाला है, परन्तु हे कौन्तेय ! इसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है |

        कहने का अर्थ है कि मन की वृत्तियों का निरोध महत्वपूर्ण है, मुक्त होने के लिए | मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है | महर्षि पतंजलि इसके बाद सम्प्रज्ञात समाधि से निर्बीज समाधि तक पहुँचने के लिए उपाय बतलाते हैं | निर्बीज समाधि मुक्त होने की अवस्था का नाम है | इतने सारे उपाय और साधना करना एक साधारण व्यक्ति के लिए बहुत कठिन है | ऐसे साधन और उपाय करते करते वह विचलित और भ्रमित भी हो सकता है | विचलन की स्थिति में फिर एक और मानव जन्म और फिर उससे आगे की नई यात्रा का प्रारम्भ | न जाने कब और किस मनुष्य जीवन में जाकर मुक्ति की अवस्था को उपलब्ध हुआ जा सकेगा ?

          अंततः महर्षि पतंजलि ने भी योग की इस कठिन साध्य उपाय को समझा और उन्होंने एक मार्ग और बताया, वह मार्ग सुगम और सरल है | इस मार्ग का नाम है, भक्ति | इस मार्ग के बारे में वे समाधिपाद में कहते हैं –

        “ईश्वर प्रणिधानाद्वा“ (सूत्र-23)

   अर्थात इन साधनों के सिवा एक साधन निर्बीज समाधि का और है जिससे सिद्धि शीघ्र ही हो सकती है, वह है – ईश्वर प्रणिधान (Dedication to God) अर्थात ईश्वर को समर्पण यानि ईश्वर-भक्ति |

           इस प्रकार महर्षि पतंजलि ने भी स्वीकार किया है कि एक अकेली भक्ति भी मनुष्य को मुक्त करने के लिए पर्याप्त है | जब सरल और सुगम मार्ग उपलब्ध हो तो फिर दूसरे कठिन साधनों से प्रयोग क्यों किया जाये ? हाँ, जो कुछ न कुछ करते रहना पसंद करते हैं अथवा करना आवश्यक समझते हैं, उनके लिए ये योग सूत्र अवश्य उपयोगी हैं |  मनुष्य जीवन में मुक्त होने के लिए उसके समक्ष दो प्रकार की साधनाएँ उपलब्ध हैं | प्रथम, स्व-शक्ति साधना और दूसरी पर-शक्ति साधना |

            स्व-शक्ति साधना में मनुष्य अपनी ही शक्ति पर विश्वास रख अपनी चेतना को जाग्रत कर आत्म-बोध को उपलब्ध होता है | स्व-शक्ति साधना में सांख्य और योग, इन दो का प्रमुख स्थान है | ‘योग’ में क्रिया द्वारा “स्व” का ज्ञान होता है जबकि ‘सांख्य’ इस प्रकार की प्रत्येक क्रिया को बंधन मानता है | इस प्रकार योग और सांख्य, दोनों एक दूसरे से विपरीत बात करते हैं | दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि योग क्रिया मार्ग है और सांख्य अक्रिया मार्ग | पतंजलि का योग क्रिया मार्ग है | योगी के लिए आत्मा से भिन्न कोई ईश्वर नहीं है, जिसे वह चित्त वृति निरोध द्वारा जान सकता है | योग के अनुसार चेतना के ज्ञान से प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर है तथा प्रकृति के संयोग से वह जीव कहलाने लगता है | सांख्य भी प्रकृति और पुरुष को मानता है | इसके अनुसार जीव ही अपने भीतर उपस्थित चेतना को प्राप्त कर ईश्वर हो जाता है | 

           महर्षि पतंजलि ने स्वयं स्वीकार किया है कि सम्प्रज्ञात समाधि तक तो क्रियाओं के माध्यम से पहुंचा जा सकता है परन्तु आगे असम्प्रज्ञात समाधि का मार्ग अक्रिया का मार्ग है | यहाँ आकर योग की समस्त क्रियाओं की समाप्ति हो जाती है और सांख्य की आवश्यकता पड़ती है, जिसके लिए किसी योग्य गुरु से मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है | महर्षि मानते हैं कि निर्बीज समाधि तक पहुँचने के लिए “ईश्वर प्रणिधान” महत्वपूर्ण है | इसी बात को गीता में भगवान् श्री कृष्ण ने स्पष्ट किया है | वे कहते हैं कि ज्ञान और कर्म जैसे मार्ग पर चलते हुए स्वयं को परमात्मा के शरणागत कर देना ही सबसे महत्वपूर्ण है |

            जैसा कि मैंने पूर्व में बताया है कि दो प्रकार की साधनाएँ हैं- एक तो स्व-शक्ति साधना और दूसरी पर-शक्ति साधना | स्व-शक्ति साधना के अंतर्गत योग और सांख्य है | इन दोनों को अपनाने के बाद भी स्व-शक्ति साधना से पर-शक्ति साधना पर आना ही पड़ता है | पर-शक्ति साधना का अर्थ है परमात्मा को पूर्णरूपेण समर्पित हो जाना | पर-शक्ति साधना में भक्ति मुख्य है | इसमें ईश्वर को केंद्र में रखा गया है | भक्त कहता है कि ईश्वर हमारे स्वामी हैं; हम तो उसके सेवक मात्र हैं | मनुष्य कभी भी स्वामी का स्थान नहीं ले सकता अर्थात जीव कभी ईश्वर नहीं हो सकता | यह द्वैत है, जहां पर दो सदैव बने रहेंगे, भक्त और भगवान् | साथ ही यह सत्य है कि भक्त कभी भी भगवान् होना नहीं चाहता, उसको सदैव भगवान् की सेवा और दर्शन में ही आनंद मिलता है | वह मोक्ष तक की कामना नहीं करता परन्तु फिर भी वह मुक्ति को उपलब्ध हो जाता है | भगवान् से सम्बन्ध बन जाने के बाद वह संसार के बंधन से पूर्णतया मुक्त हो जाता है | भक्त का भी इस संसार में पुनरागमन नहीं होता अर्थात वह अवागमन से सदैव के लिए मुक्त हो जाता है | इसीलिए कहा जाता है कि केवल एक भक्ति भी मनुष्य को मुक्ति दिला सकती है |

       अभी तक हमने ज्ञान, कर्म मार्ग से भक्ति मार्ग पर आने तथा कुंडलिनी जागरण से और फिर महर्षि पतंजलि के योग सूत्र से होने वाली मुक्ति तथा परमात्मा की भक्ति से होने वाली मुक्ति का तुलनात्मक विवेचन किया है | इतने विवेचन का सारांश यह है कि मुक्ति के लिए परमात्मा की भक्ति करना ही सर्वोत्तम और सुगम मार्ग है | महर्षियों और गुरुओं ने परमात्मा को मुख्य रूप से दो प्रकार से व्यक्त किया है – प्रथम सगुण साकार और दूसरा निर्गुण निराकार | कई मनीषि सगुण के अंतर्गत दो भी मानते हैं हैं- सगुण साकार और सगुण निराकार, जबकि निर्गुण में केवल एक ही हैं- निर्गुण निराकार | हमारे समक्ष मुख्य प्रश्न है कि मुक्ति के लिए किस प्रकार के परमात्मा की भक्ति करना अधिक सुगम होगा ?

           साकार और निराकार, दोनों में से किसी भी एक प्रकार के परमात्मा का होना स्वीकार कर लिया जाये; केंद्र में सदैव परमात्मा की प्राप्ति ही है | परमात्मा को उपलब्ध होना ही मुक्ति कहलाता है | यह सार्वभौमिक सत्य है कि परमात्मा निराकार हैं | निराकार की भक्ति करना थोडा कठिन है जबकि साकार की उपासना करना सरल | ऐसा क्यों है ? आइये ! जरा इस मुख्य विषय पर भी थोडा चिन्तन कर लेते हैं |

             मेरे एक मित्र हैं, शिक्षित हैं, पैशे से वकील हैं, बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं परन्तु उनमें तम्बाकू सेवन की लत है | इसी एक व्यसन के कारण प्रायः मेरी उनसे नोंक-झोंक होती रहती थी | थी, इसलिए क्योंकि उनको मैंने अब कहना ही छोड़ दिया है क्योंकि मैं जानता हूँ कि वे इस जीवन में तम्बाकू सेवन छोड़ नहीं सकते | मेरे कहने से बीड़ी, सिगरेट पीना छोड़ चुके थे परन्तु फिर उसके बदले तम्बाकू चबाना शुरू कर दिया | यह मनुष्य की विडम्बना है कि उसके लिए किसी को त्यागने के लिए पहले कुछ न कुछ पकड़ना आवश्यक है | दूसरे को पकड़ने से पूर्व वह पहले वाले को छोड़ नहीं सकता | सगुण साकार की उपासना कुछ इसी प्रकार एक को त्यागने और दूसरे को पकड़ने की सी है | स्व-निर्मित संसार को छोड़ने के लिए उसे कुछ कुछ वैसा ही पकड़ने के लिए चाहिए और पकड़ने के लिए वैसा ही जो कुछ है, वह है परमात्मा का सगुण सकार स्वरुप |

                   हमें संसार से मुक्त होना है इसलिए हमें किसी को पकड़ना होगा जिससे पूर्व में पकडे हुए को छोड़ सकें | मनुष्य का शरीर प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए इसमें प्राकृतिक गुण भी हैं और इसका एक निश्चित आकार भी है | इसमें आसक्ति छोड़ने के लिए हमें कुछ ऐसा ही आकार और गुण वाला व्यक्तित्व चाहिए जो हमारे लिए एक आदर्श हो | वैसे आदर्श केवल दो ही अवस्था में हो सकते हैं- जीवित अथवा ब्रह्मलीन | जीवित आदर्श की खोज में हमें जो व्यक्तित्व मिलता है वह गुरु कहलाता है | इसलिए हम गुरु की पूजा करते हैं | जो इस संसार में आये थे और ईश्वरतुल्य कार्य कर लौट चुके हैं जैसे राम, कृष्ण, बुद्ध आदि, उनको हम आदर्श मानकर, उनको परमात्मा मानते हुए उनकी उपासना करते हैं | ऐसी भक्ति को सगुण साकार की भक्ति कहा जाता है | एक तीसरा और साधन है, पकड़ने का – धर्म ग्रन्थ अर्थात शास्त्र | हम शास्त्रों का अध्ययन कर उनके आधार पर ज्ञान मार्ग पर चलते हुए भक्ति करते हैं | यहाँ पकड़ने को कोई व्यक्तित्व न होकर शास्त्र होते हैं |

            सगुण साकार भक्ति सर्वाधिक स्वीकार्य भक्ति है क्योंकि इस भक्ति में व्यक्ति का ध्यान संसार से हट कर परमात्मा की ओर हो जाता है, जो कि मुक्ति के लिए वांछनीय है | मूर्तिपूजा का प्रारम्भ होना सगुण साकार भक्ति की महत्वता को पुष्ट करता है | मनुष्य जीवित महापुरुष की सदैव ही आलोचना करता आया है परन्तु उसके चले जाने के बाद उसके गुण उसे प्रभावित करने लगते हैं और वह उसकी मूर्ति बनाकर पूजा करने लग जाता है |

        सगुण साकार की भक्ति में एक ही कमी है | इस प्रकार की भक्ति में एक ही स्थिति में पहुंचकर वहीँ पर अटक के रह जाने की प्रबल सम्भावना है | संसार को छोड़कर मूर्तिपूजा, एक व्यक्तित्व की उपासना और कर्मकांड (Rituals) अथवा धर्मग्रंथों पर आकर अटक जाते हैं, जबकि आवश्यकता इससे आगे बढ़ने की है क्योंकि लक्ष्य तो निराकार तक पहुँचना है | साकार पर अटकने का कारण है कि वह इस स्थिति को तब तक छोड़ना नहीं चाहता जब तक कि उसको कुछ नया पकड़ने को नहीं मिले | इसीलिए सगुण साकार भक्ति में सदैव गुरु की आवश्यकता रहती है | गुरु भक्त शिष्य को कभी भी एक स्थान पर ही अटके नहीं रहने देगा | वह उसे आगे का मार्ग दिखलाता रहेगा जिससे वह अपने उद्देश्य तक पहुँच सके | सगुण साकार पर अटकना हमारे जीवन का उद्देश्य नहीं है | जीवन का उद्देश्य है सगुण साकार के माध्यम से उस अव्यक्त निर्गुण निराकार तक पहुंचना, जहाँ से यह सृष्टि साकार रूप में प्रकट होती है |

         निर्गुण निराकार की भक्ति का मार्ग बड़ा कठिन है क्योंकि इस भक्ति में पकड़ने को कुछ भी नहीं रहता है | इस भक्ति में तो केवल छोड़ना ही छोड़ना है और छोड़ना भी उसको, जिसमें हमारे प्राण बसते हैं, जिसमें हमारी पूर्ण आसक्ति है | संसार और देह की आसक्ति सरलता से छोड़ी नहीं जा सकती | यही कारण है की सगुण साकार भक्ति को निर्गुण निराकार की भक्ति पर संतों ने वरीयता दी है | निर्गुण निराकार भक्ति के लिए  कुण्डलिनी जागरण और योग साधना जैसे अनेकों साधन है | गीता में भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को निराकार भक्ति के बारे में कहते हैं-

            क्लेशोSधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् |

            अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते || गीता-12/5 ||

                   अर्थात उन सच्चिदानंद निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्त वाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है, क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त विषयक गति दुःख पूर्वक प्राप्त की जाती है |

              निर्गुण निराकार भक्ति में साधक की देह के प्रति आसक्ति छूट नहीं पाती है, जिसके कारण उसके मार्ग से भटकने का भय रहता है | जिस प्रकार सगुण साकार भक्ति में एक स्थिति में ही अटकने का भय है उसी प्रकार निर्गुण निराकार की भक्ति में मार्ग से भटकने का भय बना रहता है | हरिः शरणम् आश्रम, बेलडा, हरिद्वार के आचार्य श्री गोविन्द राम शर्मा कहते हैं कि निर्गुण निराकार की भक्ति का मार्ग मरुस्थलीय मार्ग है, रूखा-सूखा मार्ग है जबकि सगुण साकार की भक्ति का मार्ग ऐसा मार्ग है जहाँ चारों ओर हरियाली ही हरियाली है, खिलते हुए पुष्प है और कर्णप्रिय संगीत है | आपको निश्चित करना है कि आप नीरस मार्ग पर चलना चाहते हैं अथवा सरस मार्ग पर |

               इतने विवेचन के बाद स्पष्ट हो जाता है कि सगुण साकार की भक्ति ही श्रेष्ठ है | हालाँकि दोनों प्रकार की भक्ति का उद्देश्य एक ही है, इस संसार के आवागमन से मुक्त होना | मनुष्य की मानसिकता सरल सुगम मार्ग को अपनाना पसंद करने की है | अब प्रश्न उठता है कि सगुण साकार की भक्ति में एक स्थिति में आकर अटकने से कैसे बचा जा सकता है ?

          साकार सगुण का अर्थ क्या है ? जिसका एक निश्चित आकार हो तथा साथ ही उसमें प्रकृति प्रदत्त गुण भी हों, वह साकार सगुण कहलाता है | प्रत्येक पदार्थ का एक निश्चित आकार होता है और उसमें प्रकृति के तीनों गुण भी उपस्थित रहते हैं | शरीर एक पदार्थ है क्योंकि इसका आकार भी है और इसमें गुण भी हैं | साकार सगुण परमात्मा को मानने का अर्थ है कि ऐसे परमात्मा का एक निश्चित आकार है और उसमें प्रकृति के गुण भी हैं | इसी आधार पर भगवान् की कल्पना करते हुए विभिन्न प्रकार की मूर्तियों का निर्माण हुआ और उनकी पूजा प्रारम्भ हुई | जैसे चतुर्भुज रूप धरे विष्णु, सिर पर गंगा, गले में सर्प डाले शिव, चार मुख वाले ब्रह्मा और राक्षस का संहार करते जीभ निकाले हुए काली आदि |

            चूँकि मनुष्य भी साकार सगुण है परन्तु भगवान के व्यक्तित्व की तुलना में वह जरा कमजोर व्यक्तित्व वाला है | इसलिए भगवान् तो स्वामी हुए और मनुष्य उनका सेवक अर्थात भक्त | साकार सगुण भगवान् की भक्ति का उद्देश्य है मनुष्य को उस भगवान् के व्यक्तित्व की ऊँचाइयों तक अपने व्यक्तित्व को ले जाना है | लेकिन होता है इसके ठीक विपरीत | वह सोचता है कि भक्त कभी भगवान् नहीं हो सकता | ऐसा सोचते हुए वह केवल उसकी पूजा अर्चना की दैनिक क्रियाओं (Rituals) में ही अटक कर रह जाता है | वह भगवान् की पूजा इस कामना के साथ प्रारम्भ करता है कि वह भी उन जैसा विकसित होकर उनके पास तक पहुँच सके परन्तु उसके लिए सांसारिक मोह-माया से मुक्त होना मुश्किल हो जाता है | सांसारिक मोह माया से मुक्त होने के लिए उसको सर्वप्रथम अपने गुणों में परिवर्तन करना पड़ता है और सत्व गुण की उच्चावस्था प्राप्त करनी होती है | गुणों की उच्च अवस्था को प्राप्त कर ही तो मनुष्य रूप लेकर श्री राम और श्री कृष्ण भगवान् कहला सके |

               सगुण साकार भक्ति में अटकने का भय इसी कारण से है | जिस किसी भक्त ने अपने चरित्र को भगवान् के स्तर के पास तक ले जाने का प्रयास किया है उसे मुक्ति अवश्य मिली है | वे मूर्तिपूजा करते-करते अपने गुणों में परिवर्तन कर मुक्त हो गए | मीरां बाई, सूरदास, गोस्वामी तुलसीदास, चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज आदि अनेकों भक्तों के उदाहरण हमारे समक्ष है जिन्होंने सगुण साकार भक्ति के माध्यम से परमात्मा को पाया है | सगुण साकार भक्ति से कितने प्रकार की मुक्ति होती है, आइये ! इस पर भी जरा दृष्टि डाल लेते हैं |

                  मुक्ति का अर्थ है स्व-निर्मित संसार से मुक्ति | संसार से बंधन कर्म के कारण होता है | मुक्ति कर्म के बंधन से मोक्ष पाने की स्थिति है | यह स्थिति जीवित रहते हुए ही प्राप्त हो सकती है | सगुण साकार भगवान् की भक्ति से चार प्रकार की मुक्ति होती है- सालोक्य, सामीप्य, सारुप्य और सायुज्य |

सालोक्य मुक्ति- जीव भगवान् के साथ उनके ही लोक में वास करता है | भक्ति की उच्चावस्था में सारा विश्व ही भगवद्मय दृष्टिगत होने लगता है | ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ व्यक्ति सालोक्य मुक्ति को पा चूका है, कहा जा सकता है | भगवान् का निवास बैकुण्ठ को बताया गया है, बैकुण्ठ अर्थात कुंठा रहित होना | जो भक्त कुंठाओं से मुक्ति पा चूका है वह भगवान् की सालोक्य मुक्ति का अधिकारी हो जाता है | ऐसा भक्त बैकुण्ठ में निवास करता है जो कि भगवान् का धाम है |

सामीप्य- जीव भगवान् के सान्निध्य में रहते हुए अपनी कामनाओं का परिणाम भोगता है | भक्त की कामना होती है कि भगवान् की समीपता मिले | वह अपनी इस कामना की पूर्ति के लिए भक्ति करता है और सामीप्य मुक्ति को प्राप्त करता है |

सारूप्य – जीव भगवान् के साम्य रूप (जैसे चतुर्भूज रूप, धनुर्धारी राम-रूप, चक्रधारी कृष्ण रूप आदि ) लिए इच्छाएं अनुभूत करता है | सगुण साकार की भक्ति करते करते भक्त भी उस भगवान् के आकर और रूप को उपलब्ध हो जाता है | ऐसे भक्त की यह सारूप्य मुक्ति कहलाती है |

सायुज्य- भक्त भगवान् में लीन होकर आनंद की अनुभूति करता है | यह प्रत्येक प्रकार की भक्ति की पराकाष्ठा है | भक्त भगवान् में मिल जाना चाहता है | भगवान् से वह क्षण भर के लिए भी अलग नहीं रहना चाहता | अंततः वह भगवान् के साकार रूप में लीन हो जाता है | मीरा बाई द्वारकाधीश की मूर्ति में इस प्रकार की मुक्ति पाकर लीन हो गई थी, जहाँ उनका न तो उनका शरीर रहा और न ही गुण |

                ब्रह्मलीन स्वामी श्री रामसुखदासजी महाराज कहते हैं कि सगुण साकार में निर्गुण निराकार आ जाता है परन्तु निर्गुण निराकार में सगुण साकार नहीं आ सकता | अतः निर्गुण निराकार से सगुण साकार की भक्ति श्रेष्ठ है |

               पूर्व में मैंने भगवान् की भक्ति के तीन साधन बताये थे- सगुण साकार, सगुण निराकार और निर्गुण निराकार | फिर सगुण साकार की भक्ति को सबसे श्रेष्ठ बताया था | तत्पश्चात हमने सगुण साकार भक्ति में अटकने का कारण बताया था और फिर मुक्ति के प्रकार | अब मुख्य बिंदु पर आते हैं कि सगुण साकार भक्ति में अटकें नहीं, तो आगे प्रगति किस प्रकार करनी होगी अथवा करनी चाहिए | जो भगवान् की भक्ति के तीन साधन बताएं हैं वे वातव में तीन सोपान है, जिनमें एक से दूसरे पर चढ़कर सबसे ऊपर के सोपान अर्थात निर्गुण निराकार तक पहुँचना है | भगवान् निर्गुण निराकार है, यह सार्वभौमिक सत्य है और फिर चाहे किसी भी साधन से पहुंचें, जीवन में उन्हीं तक पहुँचने का एक मात्र उद्देश्य होना चाहिए |

            जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, साकार सगुण में आकार भी है और प्रकृति प्रदत्त गुण भी | सगुण निराकार आकार नहीं है परन्तु प्रकृति प्रदत्त गुण है | निर्गुण निराकार में भगवान् आकार और प्रकृति गुण, दोनों से ही परे हैं | जब वह गुणातीत अवस्था को उपलब्ध हो जायेगा तब उसके सामने भगवान् का स्वरुप सगुण निराकार का होगा |

          सगुण निराकार की भक्ति करते हुए उसे अपने आकार अर्थात शरीर के प्रति आसक्ति का भी त्याग करना होगा | जब शरीर की अनुभूति भी नहीं रहेगी तब उस स्थिति में वह राजा जनक की अवस्था को अर्थात विदेह की स्थिति को प्राप्त कर लेगा | इस स्थिति में देह है अथवा नहीं, इसका अनुभव भी समाप्त हो जाता है | यह अवस्था सगुण निराकार की अवस्था है | भक्त को साकार सगुण भगवान् की भक्ति करते हुए पहले सगुण निराकार की अवस्था को प्राप्त करना होगा और फिर अपने प्राकृतिक गुणों में परिवर्तन लाते हुए सत्व गुण की उच्चावस्था को प्राप्त करना होगा | गुण ही हमारे कर्मों का आधार है | जब हम गुणों में परिवर्तन लाते हैं तो हमारे कर्मों में भी सुधार आता है | अंततः उसे सभी गुणों से परे निकल जाना होगा और गुणातीत अवस्था को उपलब्ध होना होगा | गुणातीत अवस्था में भक्त प्रत्येक कर्म बंधन और कामनाओं से मुक्त हो जायेगा | हमारी यह अवस्था निर्गुण निराकार की होगी, जो कि इस मानव जीवन का मूल उद्देश्य है |

          जो भक्त सीधे उच्चतम सोपान अर्थात निर्गुण निराकार की भक्ति करते हैं, उनकी देहासक्ति समाप्त नहीं होती क्योंकि देहासक्ति के त्याग के लिए सर्वप्रथम प्रकृति प्रदत्त गुणों का अतिक्रमण करना आवश्यक है | आकार (शरीर) और गुण, दोनों एक दूसरे से सम्बंधित है क्योंकि दोनों ही प्रकृति के अंतर्गत आते हैं | जब तक शरीर की आसक्ति और गुणों का अतिक्रमण नहीं होगा तब तक निर्गुण निराकार की अवस्था तक नहीं पहुंचा जा सकता | इन दोनों (देहासक्ति और गुणों) के त्याग के लिए परमात्मा के साकार सगुण रूप का चिंतन करते हुए उन तक पहुँचने का प्रयास ही सर्वोत्तम साधन है | साकार सगुण भगवान् के अनुरूप स्वयं को बनाने का प्रयास ही भक्त को गुणातीत अवस्था तक ले जाता है | निर्गुण निराकार भगवान् की भक्ति में पकड़ने के लिए न कोई आकार (शरीर) है और न ही आनंद लेने के लिए प्रकृति के गुण, जबकि भक्त में ये दोनों ही उपस्थित हैं | इससे एक द्वंद्वात्मक स्थिति उत्पन्न होती है जो भक्त को देह और गुणों से मुक्त नहीं होने देती और अगर भक्त इनसे मुक्त हो भी जाता है तो उसे कठिन प्रयास करना पड़ता है जो कि नीरस प्रतीत होता है | इसीलिए निर्गुण निराकार की भक्ति से सगुण साकार की भक्ति को श्रेष्ठ माना गया है | 

             सगुण साकार से सगुण निराकार और फिर उच्चतम अवस्था, निर्गुण निराकार को प्राप्त कर लेने के बाद भक्त की साधना सांसारिक अर्थात भौतिक देह छूटना शेष रहता है | यह देह तब छूटेगी जब उसके सभी प्रारब्ध नष्ट हो जायेंगे | तब तक भक्त सगुण साकार भक्ति में ही अनवरत लगा रहेगा | यहाँ आकर फिर एक प्रश्न खड़ा होता है कि जिस किसी ने सगुण साकार की भक्ति से निर्गुण निराकार की अवस्था को प्राप्त कर लिया है, प्रायः वे पुनः सगुण साकार की भक्ति करते ही क्यों दिखलाई पड़ते हैं ? उनको तो केवल निराकार निर्गुण अवस्था का अनुभव करना चाहिए | चलो, इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर भी खोजते हैं |

        निर्गुण निराकार की अवस्था सायुज्य मुक्ति की अवस्था है | एक बार मुक्ति को उपलब्ध होने के बाद भक्त अपने भौतिक शरीर छूटने तक सगुण साकार की भक्ति में ही तन्मय रहता है | सगुण साकार की भक्ति में ही क्यों ? इसके दो कारण है | प्रथम कारण है कि जिस मार्ग पर चलकर भक्त मुक्त हुआ है, उस मार्ग को वह अपने पीछे इसी उद्देश्य को लेकर चलने वाले को बतलाना चाहता है | भक्त कभी स्वार्थी नहीं होता | उसका उद्देश्य एक ही होता है कि जिस साधन से मैं मुक्त हुआ हूँ उसी साधन को अपनाकर सभी मुक्त हों | ब्रह्मलीन स्वामी रामसुखदासजी महाराज कहते थे कि मैं भी चाहता हूँ कि सभी लोग मुक्त हो जाएँ | कहने का अर्थ है कि जिस किसी ने सगुण साकार की भक्ति करके उस निराकार निर्गुण को प्राप्त किया है वह पुनः उसी भक्ति पर इसलिए आता है जिससे सभी भक्तों को एक प्रेरणा मिले |

          सगुण साकार भक्ति पर भक्त के पुनः लौटने का दूसरा कारण है भक्ति में आनंद की अनुभूति होना, परमात्मा से गहरा प्रेम होना, अनन्त रस का मिलना | निर्गुण निराकार में सगुण साकार की भक्ति जैसा आनंद और रस कहाँ ? निर्गुण निराकार की भक्ति में रस तो मिलता है परन्तु वह अखण्ड होते हुए भी अनन्त रस नहीं होता | सगुण साकार की भक्ति में भक्त के सामने जब भगवान् होते हैं तब जो आनंद उसे मिलता है वह अतुलनीय होता है | यही कारण है कि भक्त मुक्ति पाकर भी निर्गुण निराकार से सगुण साकार की ओर लौटकर उसी की भक्ति में अनवरत लगा रहता है |

        इतने लम्बे विवेचन के बाद भक्ति के इस विषय को यहीं समाप्त कर देना उचित होगा क्योंकि इस भक्ति मार्ग पर चलकर जिस आनंद और रस की अनुभूति होती है उसको व्यक्त करने के लिए सारी व्याकरण और शब्द अपर्याप्त ही रहेंगे | यह भक्ति केवल अनुभव करने के लिए है, पढ़ने, समझने से इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा अवश्य मिल सकती है परन्तु मुक्ति को अनुभव करने के लिए सर्वप्रथम भक्त होना आवश्यक है | भक्ति के सामने अन्य सभी मार्ग बौने हैं, एक अकेली भक्ति ही भक्त को जीवन मुक्त कर सकती है | इसीलिए नारद मुनि ने कहा है – “भक्तिरेकैव मुक्तिदा” |

सार-संक्षेप -

               हम अभी बंधे हुए हैं संसार के साथ | इस संसार के बंधन से मुक्त होकर हमें जुड़ना है परमात्मा के साथ | मुक्त होकर भक्त होना अथवा भक्त होकर मुक्त होना, इसके लिए किए जाने वाले साधन का नाम है “भक्ति” |  भक्ति का अर्थ है, योग, जुड़ना, भक्त होना | किसके साथ ? परमात्मा के साथ जो कि हम स्वयं ही है | हमारे से तनिक भी अलग परमात्मा नहीं है, बस हम ही इस बात की विस्मृति कर चुके हैं, अपने को केवल भौतिक शरीर मानते हुए | हम संसार में रहते हुए स्वयं के स्वरुप को भूल चुके हैं और स्वभाव और संस्कार के अनुसार मिले इस शरीर को ही स्वयं होना मान रहे हैं | परमात्मा ही हमारी शक्ति है, जिसे भूलवश हम अपने शरीर की शक्ति मानने लगे हैं | हमें वापिस वैसे ही उसी शक्ति को प्राप्त करना है जैसी विस्मृत हो चुकी हनुमानजी की शक्ति को जामवंतजी ने याद दिलाई थी | भक्ति, हमें संसार से मुक्त कर वास्तविक शक्ति से परिचित कराने का सुगम मार्ग है |

                 वैसे योग साधना, कुण्डलिनी जागरण, ज्ञान और कर्मों से भी हम स्वयं को जान सकते हैं परन्तु इन सभी में विशेष प्रयास की आवश्यकता रहती है | वैसे इन सभी मार्गों में  “परमात्मा है”, यह मानते हुए उनको जानने का प्रयास किया जाता है परन्तु भक्ति में उस परम को श्रद्धा और विश्वास के साथ मानकर उनकी भक्ति की जाती है | सीधे भक्ति से भी परमात्मा को जाना जा सकता है | इसीलिए भक्ति के बारे में कहा जाता है कि केवल अकेली भक्ति ही व्यक्ति को मुक्ति दिला सकती है |

              भक्ति में सगुण साकार और निर्गुण निराकार की उपासना की जाती है | जीवन का एकमात्र लक्ष्य निर्गुण निराकार की अवस्था को प्राप्त करना है, चाहे सीधे निर्गुण निराकार की उपासना करें अथवा सगुण साकार की उपासना करते हुए निर्गुण निराकार तक पहुंचे | सगुण साकार के अंतर्गत निर्गुण निराकार भी आ जाता है अतः सगुण साकार की उपासना श्रेष्ठ है | सगुण साकार की उपासना सुगम भी है क्योंकि इसके प्रारम्भ से ही हम परमात्मा के स्वरुप में अपना स्वरुप देखने लगते हैं | धीरे धीरे जब ज्ञान प्राप्त होता है तब उसी परमात्मा के निर्गुण निराकार होने की अनुभूति होने लगती है | सार यह है कि हमें भी निर्गुण होना है और अपने शरीर की आसक्ति को त्यागकर जीवन मुक्त होना है | तभी परमात्मा के वास्तविक निर्गुण निराकार स्वरुप को जान पाएंगे | भक्ति से हम निर्गुण निराकार की अवस्था तक तभी पहुँच पाएंगे जब गुणातीत हों और शरीर में आसक्त न रहें | शरीर की आसक्ति से मुक्त होते ही प्रकृति के तीनों गुणों का से अतीत होने की यात्रा प्रारम्भ हो जाती है |

प्रस्तुति- डॉ. प्रकाश काछवाल

|| हरिः शरणम् ||