Wednesday, April 1, 2026

मुक्ति अथवा भक्ति -1

 मुक्ति अथवा भक्ति -1

         ज्ञान से मुक्ति की अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है, इस बात में किसी प्रकार का कोई संदेह नहीं है । क्या जीवन में मुक्त हो जाना ही पर्याप्त है अथवा उससे आगे भी कोई और यात्रा हो सकती है ? ज्ञान जीवन्मुक्त कर देता है क्योंकि ज्ञान अभाव को नष्ट कर देता है और भाव (सत् ) तक पहुंचा देता है । जीवन्मुक्त हो जाने के उपरान्त भी जिस बात की कमी शेष रह जाती है वह है, प्रेम । प्रेम को उपलब्ध होने के लिए ज्ञान को पीछे छोड़ते हुए उससे भी आगे बढ़ना पड़ता है । मैं तो यहाँ तक कहता हूँ की प्रेम के लिए तो अर्जित किए हुए समस्त ज्ञान को भूलकर ही आगे बढ़ना होता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि ज्ञान की उपयोगिता नहीं है बल्कि इससे अर्थ है ज्ञानी होने के अहंकार को समाप्त करना । एक बार हुआ ज्ञान कभी विस्मृत नहीं होता । ज्ञान को विस्मृत कर देना तो अज्ञान में डूब जाना है । 

            हमने ज्ञान से जो कुछ जाना है, वह जब उपयोग में लिया जाता है तब विवेक प्रकट होता है । विवेक ही जीवन में शान्ति और प्रेम की यात्रा करवाता है । ज्ञान से सबकुछ जानकर मुक्त तो हुआ जा सकता है परन्तु प्रेमरस से सरोबार होने के लिए उस ज्ञान को जीवन में उतारकर उसे अनुभव करना आवश्यक है । 

           प्रसिद्ध कवि स्व. गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की एक कविता ‘स्वदेश’ है जिसमें वे कहते हैं - 

             जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं ।

             वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।

           मनुष्य भावों से भरा है परन्तु सांसारिक उलझनों में घिर कर वह अभाव की स्थिति तक पहुंच गया है । पुनः भावपूर्ण स्थिति को प्राप्त करने के लिए उसे ज्ञान अर्जित करते हुए प्रेम की अवस्था तक पहुंचना ही होगा ।

क्रमशः 

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।