Friday, November 1, 2024

नेति - नेति

 नेति-नेति

          श्रीमद्भगवद्गीता के स्वाध्याय ने सत्, असत् और उससे परे के बारे में कुछ उलझन की स्थिति पैदा कर दी थी । गीता कहीं पर भी उलझाती नहीं है बल्कि हमारा अज्ञान (अधूरा ज्ञान) ही हमें उलझा देता है ।

      गीता में भगवान कहते हैं कि सत् भी मैं हूँ और असत् भी मैं हूँ (अध्याय 9) । भगवान के विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन भी कह देते हैं कि सत् भी आप है, असत् भी आप हैं और इन दोनों से परे जो कुछ भी हैं वे भी आप ही हैं (अध्याय-11) । फिर भगवान स्वयं कहते हैं कि मुझे न तो सत् कहा जा सकता है और न ही असत् । (अध्याय-13)। ऐसे में शंका उठना स्वाभाविक है कि आख़िर भगवान हैं क्या ?

           एक परमात्मा ही सब कुछ है, वे वर्णनातीत हैं, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता । ऋषियों ने उन्हें ज्ञेय बताते हुए साथ ही साथ “नेति-नेति” भी कहा है अर्थात् ‘न इति - न इति’, वे इतने ही नहीं है, इतने से नहीं है । कारण कि वे ससीम नहीं है, बल्कि असीम है । उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।

             स्वामीजी कहते हैं कि ‘मैं शरीर नहीं हूँ’ इस बात को स्वीकार करें । ऐसे में प्रश्न उठता है कि मैं शरीर नहीं हूँ तो फिर “मैं” कौन हूँ? इस प्रश्न का उत्तर कोई कोई मुमुक्षु ही जानने का प्रयास करता है । मनुष्य देह के रहते-रहते इस प्रश्न का उत्तर खोज लेने से तत्काल ही व्यक्ति विदेह हो जाता है । शरीर को ही “मैं” समझ लेना जीवन की सबसे बड़ी भूल है । शरीर को ही स्वयं का होना मान लेना, केवल इसीलिए सम्भव होता है क्योंकि पूर्वजन्म के संस्कार के कारण प्रत्येक व्यक्ति इस शरीर से सुख चाहता है । इन संस्कारों के अनुरूप ही मनुष्य जीवन का प्रारम्भ होता है । संस्कार के अनुरूप ही मनुष्य का स्वभाव बनता है । अपने मानव जीवन में वह नए संस्कार निर्मित करता है, जिससे उसका स्वभाव परिवर्तित होता है और देह समाप्ति पर इन संस्कारों को अपने साथ लेकर दूसरी देह में चला जाता है । उसे फिर से मानव शरीर के मिलने की प्रतीक्षा में बहुत काल तक विभिन्न देहों में भ्रमण करना पड़ सकता है ।

           इन सब बातों को जानने वाला कौन है ? जो यह सब सही सही जानता है वही “मैं” है । इतना कुछ जानते हुए भी जो केवल शरीर को ही सब कुछ मानता है, वास्तव में वह कुछ नहीं जानता । ऐसा न जानने वाला वह भी “मैं” ही हूँ । फ़र्क़ केवल ‘हूँ’ और ‘है’ का है । ‘हूँ’ से ‘है’ की यात्रा पूरी कर लेना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है ।

          ‘हूँ’ और ‘है’, इन दो शब्दों को देखें तो इनके मध्य की यात्रा बड़ी सुगम प्रतीत होती है परन्तु इतनी सुगम भी नहीं है, जितनी दिखलाई देती है । कई मानव-जन्म लेने पड़ते है, इस यात्रा को पूरी करने के लिए क्योंकि शरीर को अपने से भिन्न मानना जीवन में सबसे कठिन कार्य है । 

           यह यात्रा अति सुगम भी हो सकती है । इसके लिए हमें अपने जीवन में संस्कारों से मुक्ति पानी है । पूर्वजन्म से आए संस्कारों को तो समाप्त करना है और नए संस्कार बनाने नहीं है । यह यात्रा केवल उनके लिए ही सुगम है, जो जीतेजी संस्कारों से मुक्ति पा चुके हैं । संस्कारों से मुक्त होने का अर्थ है, संसार से मुक्त हो जाना । फिर शरीर का होना अथवा न होना, रहना अथवा न रहना कोई मायने नहीं रखता । यह अवस्था जीवन्मुक्त हो जाने की अवस्था है, विदेह हो जाने की अवस्था है ।

           यदि शरीर अलग है और ‘मैं’ उससे भिन्न है, तो फिर यह ‘मैं’ इस शरीर में क्या कर रहा है ? वास्तव में ‘मैं’ कुछ भी नहीं करता है, जो कुछ भी करता है, वह शरीर ही करता है । परन्तु शरीर भी कुछ नहीं कर पाता यदि उसमें ‘मैं’ नहीं हो । कहने का अर्थ है कि ‘मैं’ भले ही अक्रिय हो, परंतु उसकी उपस्थिति में ही शरीर सक्रिय हो सकता है अन्यथा वह निष्क्रिय हो जाता है । आधुनिक विज्ञान की भाषा में इसे उत्प्रेरक (Activator) कहा जाता है । ‘मैं’ की अक्रियता के माध्यम से ही शरीर में जीवन व्यक्त होता है ।

         निष्क्रिय शरीर में केवल इंद्रियों से क्रियाएँ नहीं होती, परन्तु एक पदार्थ होने के कारण उसके भीतर क्रियाएँ सतत चलती रहती है, तभी तो कुछ समय बाद शरीर भी विखंडित हो जाता है । शरीर का पूर्ण रूप से निष्क्रिय हो जाना ही व्यक्ति की मृत्यु कहलाती है । शरीर का समाप्त हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि जीवन समाप्त हो गया । जीवन तो फिर भी चलता रहता है, केवल शरीर बदलते जाते हैं । केवल शरीर की सक्रियता ही जीवन नहीं है बल्कि उसके साथ आ जुड़े ‘मैं’ की अक्रियता ही वास्तविक जीवन है ।

          मेरे एक मित्र कहते हैं कि यह सक्रिय-अक्रिय, मृत्यु के बाद भी जीवन होना इत्यादि का क्या गड़बड़झाला है ? यह गड़बड़झाला केवल उनके लिए है, जो जीवन को एक ही शरीर तक सीमित माने बैठे हैं । जीवन एक शरीर के जन्म-मरण तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन अनेक जन्मों की शृंखला है । केवल शरीर का ही जन्म-मरण होता है, ‘मैं’ का नहीं । जो केवल एक ही शरीर को ही जीवन मानते हैं, उनकी दृष्टि में ‘मैं’ मरता है परंतु उनका ऐसा देखना सही नहीं है ।

           कबीर ने कहा भी है -

                     ‘मन’ मरा न ‘ममता’ मरी, मर मर गए शरीर ।

                      आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर ।।

मन, ममता, आशा और तृष्णा नहीं मरते बल्कि केवल शरीर ही मरता है । जब तक केवल शरीर का मरना ही चलता रहेगा तब तक हम संसार में नए-नए शरीर लेकर आते रहेंगे, उसी एक मन के साथ ।

       कबीर ने कहा है कि हमारा मन, ममता, आशा और तृष्णा नहीं मरते हैं बल्कि केवल शरीर मरता है । यही कारण है कि हम शरीर पर शरीर लेते जा रहे हैं क्योंकि हम मन को नहीं मार पा रहे हैं । जब हम शरीर को ही अपना होना मान लेते हैं तब हम उसी को “मैं” कहने लगते हैं, वास्तव में वह छद्म “मैं” है । यह “मैं” हमारा शरीर होने का अहंकार है । जब शरीर और संसार से विमुख हो जाते है और परमात्मा की ओर उन्मुख हो जाते है तब जिसे हम “मैं” कहते हैं वह वास्तविक “मैं” है । ये दोनों “मैं” वास्तव में एक ही है, केवल दृष्टि का अंतर है । संसार की ओर दृष्टि रहेगी तो वह “मैं” हमारा अहंकार होगा और परमात्मा की ओर दृष्टि रखेंगे तो वही “मैं” हमारा स्वरूप होगा ।

              इसका अर्थ है कि ‘मैं’ ‘हूँ’ भी है और ‘है’ भी है। इस पहेली को सरल करने के लिए आगे इस लेख में ‘मैं’ के स्थान पर संस्कृत शब्द ‘अहम्’ का उपयोग करेंगे । ’अहम्’ से ‘हूँ’ और ‘है’, दोनों स्पष्ट हो जाएँगे । शरीर को अपना मानना छद्म अहम् है । वास्तविक अहम् का शरीर के साथ प्रत्यक्षतः कोई सम्बन्ध नहीं है । शरीर को हम अपना तभी मानते हैं, जब उससे हमारा स्वार्थ सिद्ध हो रहा हो । शरीर से हमारा केवल एक ही स्वार्थ रहता है - सुख प्राप्त करना । अकेला शरीर हमें सुख नहीं दे सकता । उससे सुख प्राप्त करने के लिए हमें दूसरे शरीरों की भी आवश्यकता होती है । वह शरीर किसी जीव का भी हो सकता है और निर्जीव का भी । निर्जीव को हम पदार्थ कह देते हैं और सजीव को प्राणी । गंभीरता से अवलोकन करें तो पाएँगे कि प्रत्येक जीव का शरीर भी एक पदार्थ ही है ।

       जीव के शरीर और निर्जीव के शरीर में केवल अहम् का ही तो अंतर है । अहम् अगर पदार्थ में प्रवेश पा ले तो वह पदार्थ सजीव हो उठता है अन्यथा वह निर्जीव ही बना रहता है । इसीलिए सजीव पदार्थ (शरीर) का “मैं” होता है जबकि निर्जीव का “मैं” होता ही नहीं है । पत्थर कभी भी नहीं कहता कि मैं पत्थर हूँ जबकि शरीर कहता है कि यह मैं हूँ । ऐसा केवल अहम् की अनुपस्थिति अथवा उपस्थिति के कारण ही होना संभव है ।

          पदार्थ के निर्जीव होने का अर्थ यह नहीं है कि उसमें सक्रियता नहीं है । अहम् की उपस्थिति के कारण सक्रियता सजीव के भीतर और बाहर, दोनों ओर दिखलाई पड़ती है जबकि निर्जीव के भीतर अहम् नहीं होने के कारण उसकी सक्रियता बाहर स्पष्ट रूप से दिखलाई नहीं पड़ती । पदार्थ की सक्रियता उसके भीतर सतत चलते रहने वाली क्रियाओं से संभव होती है । ये क्रियाएं पदार्थ के प्राकृतिक गुणों के कारण होती है ।

          प्रकृति के तीन गुण हैं (सत्व, रज और तम), जोकि प्रत्येक पदार्थ में भी रहते हैं । इन गुणों के कारण पदार्थ में होने वाली क्रियाओं से उसकी आंतरिक सक्रियता सदैव बनी रहती है । निर्जीव के भीतर हो रही क्रियाएँ इतनी धीमी गति से होती हैं कि बाहर से उनमें अक्रियता दिखाई देती है परंतु वास्तव में वे अक्रिय नहीं हैं । शरीर चाहे सजीव हो अथवा निर्जीव, उनमें क्रियाओं का लगातार चलना जारी रहता है । इन क्रियाओं के कारण दोनों ही प्रकार के शरीरों (सजीव और निर्जीव) में समय के साथ-साथ परिवर्तन होते रहते हैं । 

           निर्जीव में होने वाले परिवर्तन को सजीव देख सकता है क्योंकि सजीव में ऐसा अनुभव करने की क्षमता उसके पास अहम् के कारण है । परिवर्तन को अनुभव वही कर सकता है, जो अपरिवर्तनशील हो । इसका अर्थ है कि सजीव में आने वाले परिवर्तन को जो अनुभव करता है, वह स्वयं भी अपरिवर्तनशील है । और जो कभी भी बदलता नहीं है, सदैव अपरिवर्तित रहता है, वह है - अहम् । यह अहम् जब शरीर को ही स्वयं का होना मान लेता है, तब वह छद्म (अशुद्ध) अहम् हो जाता है । जो व्यक्ति शरीर में आ रहे परिवर्तन को स्वयं में परिवर्तन होना मानता है, जो शरीर के मरने को अपनी मृत्यु मानता है, वह अपने छद्म अहम् के कारण ऐसा मानता है ।

             छद्म अहम् को असत् कहा जाता है जबकि मूल अहम् सत् है । वैसे अहम् एक ही है, और वह असत न होकर सत् है । वास्तव में अहम् तब तक असत् है, अशुद्ध है जब तक उसने शरीर को अपना आवरण बना रखा है । अहम् के शुद्ध होने का अर्थ है, उसका जीवात्मा में विलीन हो जाना । ऐसा अहम् सत् है । सत् अहम् जब प्रकृति के पदार्थों के साथ संलग्न होकर उनके प्रति आत्मीयता प्रदर्शित करने लगता है तब वह असत् अहम् की श्रेणी में आ जाता है । हम दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखते हैं परन्तु उस प्रतिबिम्ब को ही “मैं” मान लेने का अर्थ है असत् को ही अहम् मान लेना । वास्तविक “मैं” तो दर्पण के बाहर है, उसके भीतर नहीं । दर्पण के भीतर जो “मैं” दिखलाई पड़ता है, वह “मैं” शुद्ध नहीं होकर अशुद्ध “मैं” है क्योंकि वह “मैं” न होकर उस “मैं” का प्रतिबिम्ब है ।

             जब तक हम मूल अहम् को नहीं जानेंगे तब तक परमात्मा तक नहीं पहुँच पाएंगे । अशुद्ध अहम् को शुद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि मूल रूप से अहम् शुद्ध ही है, उसके अशुद्ध होने का कारण तो शरीर के साथ एकता कर लेना है । शरीर और संसार में आसक्त अहम् को वहाँ से निवृत करना है, उनसे विमुख करना है । ऐसा होते ही मूल अहम् स्पष्ट हो जाएगा ।

          प्रश्न उठता है कि अशुद्ध अहम् को शुद्ध अहम् के रूप में कैसे जाना जा सकता है ? स्वामीजी ने इसके लिए तीन उपाय बताए है -

प्रथम - अहम् को बदल देना ।

द्वितीय - अहम् को मिटा देना ।

तृतीय - अहम् को शुद्ध करना ।

         अहम् को कैसे बदला जा सकता है ? इसके लिए यह मानें कि मैं शरीर नहीं हूँ । अगर मैं शरीर नहीं हूँ तो फिर क्या हूँ ? मैं शरीर से भिन्न चेतन हूँ, जोकि शरीर को देख सकता हूँ, उसमें आ रहे परिवर्तन को अनुभव कर सकता हूँ । इसे अहम् को बदलना भी कहते हैं । यह भक्ति-योग है । जब व्यक्ति की अहंता बदल जाती है, तब उसका मूल अहम् स्पष्ट होकर जानने में आ जाता है । बस, करना कुछ भी नहीं है, केवल “मैं भगवान का हूँ” यह मानना है ।

             दूसरा उपाय जो मूल अहम् को जानने का है, वह है - छद्म (अशुद्ध) अहम् को मिटा डालना । अशुद्ध अहम् को मिटा डालना बड़ा मुश्किल है । जब तक यह शरीर और संसार है, तब तक कुछ न कुछ आसक्ति उनके प्रति बनी ही रहती है । स्वामीजी कहते हैं कि जब यह मान ही लिया कि मैं शरीर नहीं हूँ तो अब यह माने कि शरीर मेरा नहीं है । शरीर मेरा नहीं है इसका अर्थ हुआ कि फिर जिसको मैं मेरा मान रहा हूँ वह मुझसे भिन्न है । फिर यह शरीर क्या है ? शरीर तो आत्मा का पहनावा मात्र है जैसे व्यक्ति अलग है और उसकी पोशाक अलग है । अशुद्ध अहम् ने शरीर को अपना मान लिया है । ज्ञान हो जाने पर इस “ मैं” (अशुद्ध अहम्) की व्यक्ति के जीवन में कोई भूमिका ही नहीं रहेगी । फिर व्यक्ति यही कहेगा कि जिसे मैं “मेरा” कह रहा था, उसे “मेरा” कहना मेरी भूल थी ।

              भूल को जब स्वीकार कर लिया जाता है और वही भूल दोहराई नहीं जाती है तब वास्तविकता स्वतः ही प्रकट हो जाती है । दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि भूल वास्तविकता में विलीन हो जाती है । यह ज्ञान-योग है । इसमें वास्तविकता का ज्ञान होते ही छद्म अहम् आस-पास कहीं भी नज़र नहीं आता । इसी को अशुद्ध अहम् को मिटा डालना कहते हैं ।

            अशुद्ध अहम् पहले शुद्ध अहम् में परिवर्तित होता है और फिर यह शुद्ध अहम् परा प्रकृति में विलीन हो जाता है । अहम् के विलीन होते ही परमात्मा का द्वार खुल जाता है । ज्ञान मार्ग से ऐसा होना सम्भव है । केवल अशुद्ध अहम् को ही मिटाया जा सकता है, मूल अहम् को नहीं मिटाया जा सकता । 

               अशुद्ध अहम् को मिटा डालने के लिए भीतर के "मैं" का मिटना ज़रूरी है । एक दृष्टांत के माध्यम से बात को आगे बढ़ाते हैं । एक बार सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे, उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी । वे उसके पास गए और प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा तुम क्यों रो रहे हो ?

             लड़के ने कहा- 'आप ये जो मेरे हाथ में प्याला देख रहे हैं न, मैं उसमें इस समुद्र को भरना चाहता हूँ, पर यह समुद्र मेरे प्याले में समाता ही नहीं है । सुकरात ठहरे दार्शनिक, बच्चे की बात सुनकर वे गहरे विषाद में चले गये और बच्चे के साथ स्वयं भी रोने लगे । सुकरात को रोते देखकर बच्चा चुप हो गया । अब पूछने की बारी बच्चे की थी । 

          बच्चा कहने लगा- ' आप भी मेरी तरह रोने लगे । क्या आपके प्याले में भी समुद्र नहीं समा रहा है ? पर आपका प्याला कहाँ है ?' सुकरात ने जवाब दिया - ' बच्चे ! तुम छोटे से प्याले में समुद्र भरना चाहते हो, और मैं अपनी छोटी सी बुद्धि में परमात्मा के बारे में सारी जानकारी भरना चाहता हूँ । आज तुमने मुझे सिखा दिया कि समुद्र प्याले में नहीं समा सकता है, इतने दिन मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा ।' 

         यह सुनकर बच्चे ने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला- "हे सागर, अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो क्या हुआ, मेरा प्याला तो तुममें समा सकता है ।” समुद्र में प्याले के डूबते ही बच्चा उछल पड़ा - “ लो मेरा प्याला समुद्र में समा गया । अब समुद्र में प्याला है और प्याले में समुद्र ।”

           बच्चे ने समुद्र से कहा कि अगर तुम मेरे प्याले में नहीं समा सकते तो कोई बात नहीं, मेरा प्याला तो तुझमें समा सकता है । इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले,"आज बहुत कीमती सूत्र मेरे हाथ लगा है । हे परमात्मा ! आप तो सारा का सारा मुझ में नहीं समा सकते पर मैं तो सारा का सारा आपमें समा सकता हूँ ।

         ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान् उस बालक में समा गए । सुकरात का सारा अहंकार ध्वस्त हो गया । उनका “मैं” एक झटके में विलीन हो गया । जिस सुकरात से मिलने के लिए सम्राट तक समय लेते थे, वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में दण्डवत होकर लोट गए ।

               सारांश यह है कि ईश्वर जब आपको अपनी शरण में लेते हैं तब आपके अंदर का "मैं" सबसे पहले मिटता है या यूँ कहें जब आपके अंदर का "मैं" मिटता है तभी ईश्वर की कृपा होती है । मनुष्य का “मैं” ही अशुद्ध अहम् है, जिसकी दृष्टि संसार पर जमी है । उसे अपनी क्षमता पर छद्म विश्वास है जो उसके अहंकार का पोषक बनता है । अहंकार के टूटते ही अहम् गल जाता है और आत्म-बोध की दिशा स्पष्ट हो जाती है ।

         सुकरात में परमात्मा को जानने का अहंकार था । परमात्मा ज्ञेय अवश्य है परन्तु बुद्धि की इतनी क्षमता नहीं है कि उसके माध्यम से हम उन्हें जान सके । उनको तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है जिसके लिए सबसे पहले अहम् का मिटना आवश्यक है ।

          स्वामीजी ने जो तीसरा उपाय मूल अहम् तक पहुँचने का बताया है, वह है - अहम् को शुद्ध करना । जिस प्रकार हमने पहले स्वीकार किया कि मैं शरीर नहीं हूँ और फिर स्वीकार किया कि शरीर मेरा नहीं है, उसी प्रकार स्वीकार करना है कि शरीर मेरे लिए नहीं है । शरीर मेरे लिए नहीं है तो फिर यह किसके लिए है ? शरीर संसार का है और उसी की सेवा के लिए है । हमें शरीर मिला है पूर्व जन्म के प्रारब्ध कर्मों के कारण । वे प्रारब्ध कर्म फल देकर ही नष्ट हो सकते हैं । जो कुछ लिया है, इसी संसार से लिया है । अतः संसार से लिया सब कुछ संसार को ही लौटा देना है ।

                 स्वामीजी ने अहम् को शुद्ध करने के लिए भी तीन बातें कही है - पहली - शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है । दूसरी - मुझे कुछ नहीं चाहिए । तीसरी - मुझे अपने लिए कुछ नहीं करना है । शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है, यह ज्ञान योग की बात है । इस बात को स्वीकार करने से मनुष्य की दृष्टि में शरीर गौण हो जाता है । शरीर के गौण होते ही दूसरी बात फलित होती है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए । मनुष्य अपने लिए जो कुछ भी चाहता है, उसके पीछे शरीर के प्रति आसक्ति ही मुख्य कारण है । जब शरीर ही मेरा नहीं है तो फिर मुझे अपने लिए क्या चाहिए ? कुछ नहीं ।

              ‘शरीर सहित कुछ भी मेरा नहीं है’ से 'मुझे कुछ भी नहीं चाहिए’, फलित होता है । मुझे कुछ भी नहीं चाहिए तो फिर मुझे अपने लिए कुछ करने की आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है ? इस प्रकार अंततः ‘मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं करना है’, यह भी फलित हो जाता है । 

            मनुष्य अपने जीवन में कर्म किए बिना नहीं रह सकता, यह सत्य है । जब मनुष्य को अपने लिए कुछ भी नहीं करना है तो फिर वह कर्म किसके लिए करेगा ? वह कर्म संसार की सेवा के लिए करेगा । अतः हमें वर्तमान जन्म के जीवन में यही ध्यान रखना है कि अपने स्वार्थ के लिए कोई कर्म न करें, स्वयं के सुख के लिए कोई कर्म न करें । दूसरों को सुख कैसे मिले, उसके सुख का माध्यम हमें बनना है । ध्यान यही रखना है कि ऐसे कर्मों के करने में हमारी कोई कामना न हो । कामना रखेंगे तो फिर से कर्म-बंधन होगा और संसार के अंतहीन आवागमन से मुक्त नहीं हो पाएँगे । कहने का अर्थ है कि निष्काम कर्म करते हुए सबकी सेवा करें । सेवा से ही अशुद्ध अहम् विलीन होकर शुद्ध अहम् प्रकट होगा ।

              संसार में आकर मनुष्य जो भी कर्म करता है, वे सब शरीर को सुख देने के लिए ही करता है । शरीर मेरा नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए और मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं करना है, ये तीनों बातें मान लेने से स्वयं के लिए कर्म होंगे ही नहीं । मनुष्य कर्म-बंधन में तभी पड़ता है, जब कर्म स्वयं के लिए किए जाते हैं, अन्य कर्म तो बाँधने वाले होते भी नहीं हैं । 

        इस प्रकार स्पष्ट होता है कि अशुद्ध अहम् की असत् के प्रति आसक्ति रहती है और शुद्ध अहम् संसार से विमुख होकर सत् की ओर प्रगति कराता है । इस मूल अहम् के प्रकट होते ही व्यक्ति को आत्मा का ज्ञान हो जाता है । शरीर के छूटने पर यह अहम् मूल परा प्रकृति में विलीन हो जाता है जोकि सत् है । सत् से भी परे क्या है ? असत्, सत् और इनसे परे, इन तीनों को जानने पर ही परमात्मा का अनुभव होगा । ध्यान रखें, उनका केवल अनुभव ही होगा, उन्हें जाना नहीं जा सकेगा ।

            स्वामीजी ने जो तीन बातें मानने के लिए कही है (मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और शरीर मेरे लिए नहीं है) इनको कहने/मानने वाला कौन है ? हमारा आत्मा तो परमात्मा का अंश है, वह तो कुछ करता नहीं है और न ही किसी कार्य में लिप्त होता है । इन तीनों बातों को जो स्वीकार करता है वह हमारा अहम् है । अहम् में भी केवल शुद्ध अहम् यह बात मान सकता है अन्यथा अशुद्ध अहम् के तो संसार और शरीर से विमुख होने का प्रश्न ही नहीं उठता । यही कारण है कि जीवन में सबसे पहले अशुद्ध अहम् का शुद्ध होना आगे की प्रगति के लिए आवश्यक है ।    

            अहम् को शुद्ध करना, मिटा डालना अथवा बदल देना व्यक्ति के स्वभाव और बौद्धिक स्तर पर निर्भर करता है । अहम् को शुद्ध करना कर्म का विषय है जबकि अहम् को मिटाना ज्ञान का । अहम् को शरीर के रहते मिटाना असंभव सा है । इन दोनों की तुलना में अहम् को बदलना कहीं अधिक सुगम है । हमें केवल अपनी दृष्टि में परिवर्तन लाना है । हम जो स्वयं को संसार और शरीर का मान रहें है, उसके स्थान पर परमात्मा का होना मानना है । इस प्रकार अहंता परिवर्तित होते ही संसार से आसक्ति छूट जाती है ।

               कन्या को विवाह से पूर्व अपने पिता का घर ही अपना घर लगता है । जब उसका विवाह हो जाता है, तत्काल ही अपने पति के घर को अपना घर समझने लगती है । फिर पिता के घर की प्रत्येक वस्तु उसके लिए पराई हो जाती है । जब एक कन्या पाणिग्रहण करते ही सुगमता से यह बात स्वीकार कर सकती है तो आत्म-बोध चाहने वाले के लिए भी ऐसा करना असम्भव नहीं है ।

अहम् प्रारम्भ से ही शुद्ध होता है । अहम् में अशुद्धता आती है आसक्ति के कारण । आसक्त अहम् सत् की सत्ता के स्थान पर असत् की सत्ता मानता है क्योंकि उसकी दृष्टि में जो दिखने में आता है वही सत्य है । अहम् ही शरीर के आकार के साथ तादात्म्य स्थापित करता है, जिसके कारण उसको अहंकार नाम मिला है । जब शरीर से तादात्म्य मिट जाता है तब अहंकार दो में विभाजित हो जाता है - अहम् और आकार । इस प्रकार के विभाजन में शरीर (आकार) अलग और अहम् अलग हो जाते हैं । इस अवस्था तक पहुँचने के लिए भगवान ने तीन मार्ग (कर्म, ज्ञान और भक्ति) बतलाए हैं ।

                तीनों मार्ग अलग-अलग भले ही प्रतीत हो रहे हो, अंततः तीनों ही अहम् को परा प्रकृति में विलीन करते हैं । जब तक शरीर रहता है, तब तक अहम् परा के साथ एकाकार नहीं होता बल्कि एकाकार होने के लिए स्वयं को पूर्ण रूप से तैयार अवश्य ही कर लेता है । शुद्ध अहम् सत् है उसके आत्मा (सत्) में लीन होते ही असत् (संसार) की सत्ता मिट जाती है और केवल सत् की सत्ता रह जाती है । परंतु सत् से ऊपर भी एक मूल सत्ता है, जिसमें आत्मा के लीन होने पर वापिस संसार में लौटना नहीं होता ।

               गीता के पन्द्रहवें अध्याय में अपरा को क्षर पुरुष, परा को अक्षर पुरुष और इन दोनों से जो परे हैं उसको उत्तम पुरुष नाम से संबोधित किया है । उत्तम पुरुष ही वह परम सत्ता है, जिसका केवल अनुभव ही किया जा सकता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

                  आइए ! अब दूसरे कोण से इस विषय पर आगे बढ़ते हैं । परमात्मा का व्यक्त हो जाना प्रकृति कहलाता है और उसका अव्यक्त बने रहना पुरुष । अव्यक्त (पुरुष) के बिना व्यक्त (प्रकृति) की सत्ता हो ही नहीं सकती । अव्यक्त ही व्यक्त होता है और यह व्यक्त भी एक दिन पुनः अव्यक्त में लीन हो जाता है । प्रकृति को भी एक दिन परमात्मा में लीन होना पड़ता है । प्रकृति और पुरुष, दोनों से भी जो परे हैं, उसे परम पुरुष अथवा उत्तम पुरुष कहा जाता है । प्रकृति जब पूर्ण क्रियाशील हो जाती है, तब माया कहलाती है । प्रकृति भी दो प्रकार की है - परा और अपरा । परा प्रकृति को विद्या माया कहा जाता है और अपरा को अविद्या माया । अपरा प्रकृति संसार और शरीर के रूप में व्यक्त होती है । परा प्रकृति जीवात्मा है । प्रकृति परमात्मा की अध्यक्षता में सक्रिय होकर जगत् का सृजन करती है, जिसमें सभी चर-अचर जीव आ जाते हैं ।

            इस प्रकार स्पष्ट है कि परमात्मा अर्थात् परम/उत्तम पुरुष से पुरुष और प्रकृति और फिर प्रकृति से संसार का सृजन होता है । प्रकृति को सक्रिय के सापेक्ष अक्रिय कहा अवश्य जाता हैं परंतु अक्रिय प्रतीत हो रही प्रकृति में भी सूक्ष्म क्रियाएं सदैव चलती रहती है । प्रकृति अक्रिय तब प्रतीत होती है, जब उसमें सृष्टि लीन हो जाती है । जैसे हम नींद लेते हैं, तब अक्रिय प्रतीत होते हैं परंतु इस अवस्था में भी शरीर के क्षरण होने की सूक्ष्म क्रिया उसके भीतर ही भीतर चलती रहती है ।

        पूर्व में जिसको अहम् कहकर संबोधित किया गया है, वह पुरुष ही है । यह शुद्ध अहम् है । जब शुद्ध अहम् अपरा प्रकृति (माया) का संग कर लेता है, तब वह अशुद्ध अहम् प्रतीत होता है । शरीर से असंग (detach) होते ही वह पुनः शुद्ध प्रतीत होने लगता है । वास्तव में अहम् अशुद्ध हो ही नहीं सकता क्योंकि अहम् सत् है । सत् अहम् ही असत् प्रतीत होता है । अहम् के असत् से सत् होते ही यह परा प्रकृति अर्थात् आत्मा में विलीन हो जाता है । आत्मा में विलीन होने से अर्थ है अहम् को अपने स्वयं के आत्मा होने का ज्ञान हो जाना ।

          मनुष्य के शरीर में रहते हुए ही पुरुष इस सत्य तक पहुँच सकता है, किसी अन्य शरीर में रहते हुए नहीं । शरीर भी दो प्रकार के होते हैं - स्थूल और सूक्ष्म शरीर । एक तीसरा शरीर जिसे कारण शरीर कहा जाता है, वह हमारे संस्कार है । संस्कारों से निर्मित हुआ कारण शरीर ही हमें भावी जन्म के लिए नए शरीर की ओर ले जाता है । निद्रा की अवस्था में जब स्थूल शरीर लगभग निष्क्रिय हो जाता है तब सूक्ष्म शरीर (मन आदि) अशुद्ध अहम् के साथ अविद्या में लीन हो जाता है । अविद्या से लौटने पर स्थूल शरीर पुनः सक्रिय हो उठता है । इस अवधि में मनुष्य को संसार के बारे में कुछ भी अनुभव नहीं होता । उसे केवल अच्छी और गहरी नींद का ही अनुभव होता है । ऐसा अनुभव मूल अहम् को ही होता है । 

           जब मनुष्य को ज्ञान होना प्रारम्भ होता है तब वह अविद्या माया से विद्या माया में प्रवेश करता है । ‘ज्ञान प्रारम्भ होना’ समझाने की दृष्टि से कहा गया है अन्यथा ऐसा कहना भी उचित नहीं है क्योंकि ज्ञान हमारे भीतर पहले से ही रहता है केवल माया से अच्छादित होने के कारण वह प्रकट नहीं होता । 

             विद्या माया पूर्ण ज्ञान की अवस्था तो नहीं है फिर भी आत्म-बोध (परमात्मा) तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त अवश्य करती है । विद्या माया हमें आत्म-अनात्म का ज्ञान अवश्य करवा देती है । हम जब तक ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था तक नहीं पहुँचेंगे तब तक अहम् का अस्तित्व बना रहेगा । अशुद्ध अहम् तो अविद्या से विद्या में प्रवेश करते ही मूल यानि शुद्ध अहम् में लीन हो जाता है । शुद्ध अहम् ही अपने मूल स्वरूप (परमात्मा) तक पहुँच सकता है ।

           इस बात को समुद्र और उसकी लहर के उदाहरण से समझा जा सकता है । जैसे समुद्र की लहर अशुद्ध अहम् है और समुद्र शुद्ध अहम् । जब तक लहर समुद्र में लीन नहीं होगी तब तक वह समुद्र का अंश होते हुए भी समुद्र नहीं है । लहर के गिरते ही वह समुद्र हो जाती है । इसी प्रकार बूँद भी समुद्र का अंश है परन्तु वह समुद्र नहीं है । समुद्र की एक बूँद अथवा उसकी एक लहर को समुद्र नहीं कहा जा सकता बल्कि उसे समुद्र की लहर ही कहा जाता है । लहर को समुद्र होने के लिए उसे समुद्र में ही लीन होना पड़ता है । लहर में भी जल है और समुद्र में भी जल है । गहराई से देखें तो लहर और समुद्र, दोनों का मूल तत्व जल ही हुआ । इसी प्रकार पुरुष/अहम्/आत्मा को तब तक परमात्मा नहीं कहा जा सकता जब तक कि अहम् मूल प्रकृति में लीन नहीं हो जाता । अहम् के लीन होते ही आत्मा भी परमात्मा हो जाता है, जैसे लहर के गिरते ही लहर समुद्र हो जाती है और इस प्रकार हम इनके मूल तत्व जल तक पहुँच जाते हैं ।

                लहर और समुद्र दोनों में से समुद्र की सत्ता तो प्रतीत होती है परन्तु लहर की नहीं । लहर समुद्र से ही उठती है और उसी में गिर जाती है । यह प्रक्रिया बार-बार होती मिटती रहती है । इस परिवर्तनशीलता के कारण ही लहर की सत्ता स्वीकार्य नहीं होती बल्कि सागर की ही सत्ता प्रतीत होती है । इसी प्रकार शरीर और संसार दिखते अवश्य है परन्तु उनमें हो रहे परिवर्तन उनकी स्वतंत्र सत्ता होने पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं । शरीर की सक्रियता का कारण उसमें उपस्थित जीवात्मा के कारण है जैसे लहर का उठना-गिरना समुद्र के कारण है । इसलिए सत्ता लहर (शरीर) की न होकर समुद्र (आत्मा) की मानी गई है ।

                  जीवात्मा की अनुपस्थिति में शरीर भी निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाता है परन्तु शरीर के मरते ही अकेली जीवात्मा की स्थिति भी व्यक्त से अव्यक्त की हो जाती है । अव्यक्त पर साधारण दृष्टि भला कैसे जा सकती है ? उसकी सत्ता की प्रतीति तो तभी होगी, जब उसे कोई दूसरा शरीर मिल जाए । शरीर और जीवात्मा का अनवरत संयोग-वियोग जिस सत्ता का अनुभव कराता है, वास्तव में वह परमात्मा की सत्ता है । जैसे समुद्र की सत्ता होने की प्रतीति लहर के उठने- गिरने से होती है परन्तु दोनों के संयोग का अनुभव जल के कारण ही संभव होता है । जल है तो समुद्र है और लहर भी है । समुद्र और लहर दोनों में जल है अतः सत्तावान जल हुआ । इसी प्रकार शरीर और जीवात्मा की सत्ता भी उस परम पर टिकी है, जिसका अनुभव ही किया जा सकता है, वर्णन नहीं ।

          समुद्र और लहर के माध्यम से केवल जल की ओर संकेत भर किया गया है । वैसे यह एक उदाहरण भर है अन्यथा तो जल असत् तत्व है और असत् से सत् तक नहीं पहुँचा जा सकता । अतः इसे केवल समझाने की दृष्टि से एक उदाहरण के रूप में लें और लक्ष्य परमात्मा का ही रखें ।

            लहर के समुद्र में समाते ही लहर की सत्ता समाप्त हो जाती है । इसी प्रकार जब कोई बूँद समुद्र में गिरती है, तो बूँद की सत्ता समाप्त हो जाती है । फिर बूँद आपको समुद्र में ढूँढे भी नहीं मिलेगी । कबीर हैरान हो जाते हैं, इस प्रकार बूँद को समुद्र में खोते देखकर । वे कहते हैं -

      हेरत हेरत हे सखि, रहा कबीर हेराय ।

      बूँद समायी समुद्र में, अब क़ित हेरी जाय ।।

         अर्थात् हे सखि ! बूँद को समुद्र में समाते हुए, उसमें खोते देखकर मैं हैरान रह गया । मेरी हैरानी तो तब और बढ़ गई, जब ढूँढते ढूँढते उस बूँद को समुद्र में मैं ढूँढ नहीं सका ।

           समुद्र की अथाह जलराशि में एक बूँद को ढूँढना कोरी मूर्खता ही कही जा सकती । बूँद, लहर और समुद्र तीनों एक ही जल के रूप है । जल है तो बूँद है, बूँद है तो समुद्र है और समुद्र है तो लहर है । तीनों एक ही जल के रूप है, हमने तो केवल विभिन्न आकार देखकर उनके अलग अलग नाम दे दिए हैं । हमारी भौतिक दृष्टि आकार को देखने की अभ्यस्त है। केवल आकार को देखकर ही हम उसकी क्षमता और निर्बलता का आकलन करने लगते हैं । परन्तु हम भूल जाते हैं कि इन आकारों के मूल में भी कोई तत्व है जो उनमें आपसी एकता सिद्ध करता है । जब तक उस मूल की ओर दृष्टि नहीं जाएगी तब तक पूरे जीवन भटकते रहेंगे, तत्व तक नहीं पहुँच पाएँगे । 

           कबीर की परेशानी ने, उनकी हैरानी ने उन्हें सोचने के लिए विवश कर दिया कि समुद्र और बूँद में ऐसी कौन सी समानता है, जिसके कारण समुद्र में बूँद को ढूँढना असम्भव कर दिया । प्रत्येक कार्य असम्भव तब तक है जब तक हमारी दृष्टि स्थूलता की सीमा का अतिक्रमण नहीं कर जाती, उस सीमा के बंधन को तोड़कर उससे पार नहीं चली जाती । स्वामीजी ने इसको ललक (तीव्र इच्छा) कहा है । स्वामीजी कहते हैं कि आत्म-बोध होना, तत्व तक पहुँचना आपकी प्रबल इच्छा के अधीन है । इच्छा के अभाव में तो आप संसार की कोई तुच्छ वस्तु तक प्राप्त नहीं कर सकते, फिर यहाँ तो तत्व-प्राप्ति की बात हो रही है । प्रबल इच्छा के कारण कबीर को भी अंततः तत्व-बोध हो गया । फिर जो उन्होंने अपना नया कथन कहा वह इस प्रकार है - 

           हेरत हेरत हे सखि, रहा कबीर हेराय ।

           समुद्र समाया बूँद में, अब कित हेरी जाय ।।

हे सखि ! समुद्र बूँद में ही तो समाया हुआ है । जब बूंद ही समुद्र है तो फिर वह बूँद कहाँ रही, वह तो खोकर स्वयं ही समुद्र हो गई है । अब उस बूँद को मैं कहां ढूंढू ? बूंद के समुद्र होते ही बूंद खो गई है। उस बूंद को ढूँढते ढूँढते यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया हूं कि इतने दिन मैं व्यर्थ ही दोनों को एक दूसरे से भिन्न मान रहा था । एक बूँद में ही तो पूरा समुद्र समाया हुआ है । बिना बूँद के सागर का अस्तित्व है ही कहाँ ?

           समुद्र को जानना हो तो उसे जल की एक बूँद से भी जाना जा सकता है । कई बूँदों का संगठित रूप ही तो समुद्र है फिर समुद्र में जाकर बूँद को ढूँढने से क्या प्रयोजन ? इसी प्रकार केवल मूल अहम् (आत्मा) को जान लें, बूँद की तरह वह भी तो अपने सागर (परमात्मा) का अंश है ।

         संसार और शरीर असत् है क्योंकि इनके क्रियाशील प्रकृति के अन्तर्गत होने के कारण इनमें निरन्तर परिवर्तन होते रहते हैं । परमपुरुष (परमात्मा) अक्रिय हैं, अतः इनको सत् कहा जाता है । जगत् से लेकर शरीर तक सभी मूल प्रकृति से परमात्मा की अध्यक्षता में सृजित हुए हैं । सक्रिय होने के कारण इस प्रकृति और संसार को असत् कहा गया है और परमात्मा को सत् । ऐसा कहना भी केवल सापेक्षता की दृष्टि से है अन्यथा तो सब कुछ एक परमात्मा ही है । इसी बात को भगवान ने गीता में इस प्रकार स्पष्ट किया है -

                तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णम्युत्सृजामि च ।

                अमृतं चैव मृत्युष्च सदसच्चाहमर्जुन।। गीता - 9/19।।

       अर्थात् हे अर्जुन ! मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, मैं ही जल को ग्रहण करता हूँ और उसे वर्षा के रूप में बरसा देता हूँ । अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ ।

             सूर्य का सृजन परमात्मा की प्रकृति से ही हुआ है । सूर्य सक्रिय है । भगवान कहते हैं कि सूर्य बनकर मैं ही तपता हूँ । अक्रियता-सक्रियता को ध्यान में रखते हुए देखें तो परमात्मा तो सत् हैं और सूर्य असत् । सूर्य की सक्रियता से उत्पन्न होने वाले ताप से जल वाष्प में परिवर्तित होकर सूर्य रश्मियों द्वारा ग्रहण किया जाता है । वही वाष्प बादल बनकर जल के रूप में पृथ्वी पर बरसती है । ये सब कार्य प्रकृति के माध्यम से परोक्ष रूप से परमात्मा ही कर रहे हैं । इस पूरे प्रकरण में (सूर्य के तपने से लेकर जल बरसाने तक) परमात्मा की भूमिका रहती है । इसीलिए भगवान ने कहा है कि सत् भी मैं हूँ और असत् भी मैं हूँ ।  


           असत् का अस्तित्व भी तभी तक है, जब तक सत् की अपेक्षा से सक्रिय-अक्रिय को स्पष्ट करना हो । जब असत् का अस्तित्व ही सत् पर टिका हो तो असत् स्वतन्त्र कहाँ हुआ ? जब असत् स्वतंत्र नहीं है तो फिर सब कुछ सत् ही हुआ । परंतु परमात्मा सत् है, ऐसा कहने से उसकी सापेक्षता में असत् की स्वीकार्यता हो ही जाती है । दोनों के मध्य उत्पन्न हुए भेद को समाप्त करने के लिए ही श्रीकृष्ण ने कहा है कि अमृत-मृत्यु और सत्-असत् भी मैं ही हूँ ।

       सत्-असत् से भी आगे बढ़कर अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के बारे में कहा है -

                       क़स्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् 

                            गरियसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।

                       अनन्त देवेश जगन्निवास 

                             त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ।। गीता -11/37 ।।

            हे महात्मन् ! गुरुओं के भी गुरु और ब्रह्मा के भी आदिकर्ता आपके लिए सिद्धगण नमस्कार क्यों नहीं करे ? क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप अक्षर स्वरूप हैं; आप सत् भी हैं, असत् भी हैं और इनसे पर जो कुछ भी है, वह आप ही हैं ।

            परमात्मा अक्षर स्वरूप हैं । इस संसार में क्षर और अक्षर - ये दो ही प्रकार के पुरुष हैं । क्षर वह पुरुष है जोकि नाशवान है, जिसमें प्रतिक्षण कुछ न कुछ परिवर्तन होता रहता है । संपूर्ण प्राणियों के शरीर क्षर कहे गए हैं । दूसरी प्रकार का पुरुष अक्षर है अर्थात् वह अविनाशी है, जिसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं होता । अक्षर पुरुष हमारी जीवात्मा है जोकि क्षर शरीर में रहते हुए उस शरीर में हो रहे परिवर्तन को अनुभव करती है ।

          प्रश्न उठता है कि क्षर पुरुष में हो रहे सतत परिवर्तन अंततः उसको कहाँ ले जाते हैं ? शरीर का हो रहा क्षरण शरीर का तो नाश कर देता है परन्तु जिन तत्वों से यह शरीर बना है, उन तत्वों का नाश नहीं होता । उन पाँच भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) का नाश नहीं होता क्योंकि ये सभी मूल प्रकृति के तत्व हैं । यह प्रकृति इन तत्वों का पुनः संयोजन कर एक नए शरीर का निर्माण कर देती है । इससे निष्कर्ष निकलता है कि क्षर शरीर है, क्षर पदार्थ हैं परंतु प्रकृति के तत्व क्षर नहीं हैं । ये सभी तत्व तो अपनी मूल प्रकृति के साथ ही परम में लीन होते हैं ।

         स्वर्ण से विभिन्न प्रकार के आभूषण बनाए जाते हैं । आभूषण नाशवान हैं । जब चाहें आभूषण को गलाकर उसके मूल तत्व स्वर्ण को प्राप्त किया जा सकता है । स्वर्ण तत्व वैसे का वैसा ही रहता है , वह बदलता नहीं है केवल आभूषण बन जाने पर वह बदलता प्रतीत होता है ।

         स्वर्ण-आभूषण हमारा शरीर है और स्वर्ण हमारी जीवात्मा । आभूषण परिवर्तनशील है परंतु स्वर्ण में कोई परिवर्तन नहीं होता । शरीर में हो रहे परिवर्तन से शरीर नष्ट हो जाता है परंतु उस शरीर में स्थित जीवात्मा शरीर के साथ नहीं मरता । जिसमें परिवर्तन होते हैं वही सब कुछ करता है । प्रकृति में परिवर्तन होते हैं, वही सब कुछ करती है । जो अपरिवर्तनीय है, भला वह क्या कुछ कर सकता है ? गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को यही बात समझाते हुए कह रहे हैं -

            वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।

            कथं स पुरूष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ।। 2/21।।

अर्थात् हे पृथानन्दन ! जो मनुष्य इस शरीरी को अविनाशी, नित्य, जन्म रहित और अव्यय जानता है, वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये ?

              उपरोक्त श्लोक में भगवान ने जीवात्मा को शरीरी कहा है । शरीर की अपेक्षा से इसे शरीरी कहा गया है । शरीर विनाशशील है, इसके सापेक्ष इसे अविनाशी कहा गया है । शरीर अनित्य है, इसकी अपेक्षा से जीवात्मा को नित्य कहा गया है । शरीर जन्मता-मरता है, इसकी अपेक्षा से शरीरी को जन्म रहित कहा गया है । इसी प्रकार शरीर का सतत क्षय अर्थात् व्यय होता रहता है, जीवात्मा को व्यय की अपेक्षा से अव्यय बताया गया है । कहने का अर्थ है कि जो भी शब्द उस परमात्मा को जनाने के लिए उपयोग में लाए जाते हैं सब सापेक्षता के कारण है अन्यथा उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, वे स्वयं वर्णनातीत हैं ।

            असत् कहने भर को असत् है, परंतु असत् ‘नहीं’ है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता । पत्थर से बनी दीवार हमें दिखलाई पड़ती है, ऐसी स्पष्ट दिखलाई देने वाली वस्तु को ‘नहीं होना’ कैसे कहा जा सकता है ? यदि ‘दीवार नहीं है’ ऐसा मानते हैं, तो जरा अपना सिर उस पर दे मारें । सिर फूट जाएगा और रक्त-धार बहने लग जाएगी । क्या अब भी आप कहेंगे कि यह दीवार असत् है, ‘नहीं’ है ? कम से कम कहने वाले को तो यह ज्ञान होना आवश्यक है कि दीवार के होते हुए भी इसको ‘नहीं’ होना कहने के पीछे क्या कारण है ?

          दीवार जो आज है, कल यह दीवार वैसी नहीं रहेगी । कुछ समय पश्चात्, शायद दस-बीस अथवा पचास वर्ष बाद वह दीवार रहेगी भी नहीं । जो आज है तथा कल नहीं होगी, उसका आज होना भी वास्तव में ‘नहीं होना’ ही है । इसी कारण से दीवार को असत् कहा गया है । वह प्रतिपल नष्ट होती जा रही है । जब इसका स्थायी भाव ही नहीं है तो फिर परिवर्तित होती जा रही वस्तु का कोई नाम भी कहाँ तक और कितने दिन तक टिका रहेगा ? यह दीवार भी कुछ वर्षों बाद गिर कर मलबा हो जाएगी । क्या उस मलबे को दीवार कहा जा सकता है ? नहीं, मलबा दीवार का है अवश्य, पर वह दीवार नहीं है ।

            उस मलबे से पत्थर आदि निकाल कर, फिर से व्यवस्थित तरीक़े से एक नई दीवार बनाई जा सकती है परंतु वह पूर्व वाली दीवार नहीं होगी । नई बनी दीवार भी समय के साथ एक दिन मलबा बन जाएगी और उससे फिर किसी और प्रकार की दीवार बना दी जायेगी । फिर वह दीवार भी ‘होते’ हुए भी ‘नहीं’ ही कहलाएगी क्योंकि उसको भी एक दिन नष्ट होना है । दीवार की भाँति ही प्राणियों के शरीर और उनका संसार हैं । 

             सभी प्राणियों के शरीर पाँच भौतिक तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि,गगन,वायु) से बने हैं । सभी शरीरों के इस जगत् में रहने की अपनी अपनी अवधि है । जगत् बना है, कुछ काल के लिए । उसकी भी रहने की अपनी अवधि है, यह भी एक दिन विलीन हो जाएगा । शरीर के नष्ट होने से जगत् नष्ट नहीं होता क्योंकि जगत् के रहने की अवधि शरीर से कहीं बहुत अधिक है । अवधि अधिक होने का अर्थ यह नहीं है कि जगत् नष्ट नहीं होगा । यह भी एक दिन नाश को प्राप्त होगा और अपने मूल स्रोत में विलीन हो जाएगा । फिर समय पाकर पुनः इसकी रचना होगी और ऐसी ही प्रक्रिया निश्चित समय बाद दोहराई जाएगी ।

             शरीर के नाश का अर्थ यह नहीं है कि पाँच तत्व नष्ट हो जाते हैं । वे नष्ट नहीं होते । पाँचो भौतिक तत्व जगत् के अंश हैं, वे जगत् के विलीन होने पर ही विलीन होंगे और सृष्टि के पुनः सृजन पर सर्वप्रथम प्रकट हो जाएँगे । शरीर के मरते ही उसका विखंडन प्रारंभ हो जाता है और उसके अंतिम संस्कार के साथ ही पाँचो तत्व भी जगत् के तत्वों के साथ एकाकार हो जाते हैं । 

           समय पाकर उन्हीं तत्वों से फिर प्राणी के एक नए शरीर का निर्माण होता है और संबंधित जीवात्मा उसमें प्रवेश करती है । जीवात्मा के प्रवेश करते ही यह शरीर सक्रिय हो जाता है और इस प्रकार नए शरीर के साथ जीवन-यात्रा आगे बढ़ती है । पुनर्ज़न्म के मूल में प्रकृति की यही क्रिया है, जो इस जगत् के रहने तक बार-बार दोहराई जाती है ।

            अभी हमने शरीर के बार-बार मिटने-बनने की प्रक्रिया पर अल्प रूप से विचार किया । प्रश्न उठता है कि शरीर जिस स्थान पर मिटता है, पाँच तत्व उसी स्थान पर गिरते हैं । उन पाँचों तत्वों से ही एक नए शरीर का निर्माण होता है और उस नए शरीर में प्रायः वही संबंधित जीवात्मा प्रवेश करती है, ऐसा क्यों होता है ?

           जीवात्मा ने पूर्व में जिस शरीर को धारण किया था, उस शरीर के साथ बने तादात्म्य ने उसके मन में कई कामनाएँ पैदा की होगी, कई वस्तुओं, व्यक्तियों के प्रति आसक्ति, ममता रही होगी, कइयों से लेन-देन किया होगा । उनमें कुछ कामनाएँ अधूरी भी रही होंगी, कुछ लेन-देन भी शेष रहा होगा, उन कामनाओं को पूरा करने के लिए और जिनमें ममता और आसक्ति रही होगी, उनसे मिलने के लिए उसी स्थान पर जीवात्मा को नए शरीर की आवश्यकता रहती है । यही कारण है कि पुनर्जन्म प्रायः उसी स्थान के आस-पास होता है, जहां उसकी कामना, ममता, आसक्ति आदि और कुछ लेन-देन शेष रह गया हो ।

           इस बात को समझने के लिए एक सेठ का दृष्टांत लेते हैं । सेठजी वृद्ध हो चले थे परन्तु व्यापार, धन में प्रबल आसक्त थे । पुत्र मोह और पौत्र में गाढ ममता से अभी तक छूट नहीं पाए थे । बहुत चाहते थे कि शरीर त्यागने पर वैकुण्ठ मिले, पर …… । एक दिन एक संत का उनके यहाँ आना हुआ । सन्त से उन्होंने अपनी यह इच्छा बताई । सन्त सहर्ष उनको साथ ले जाने को तैयार भी हो गए । परंतु यह क्या ? सेठजी ने तत्काल साथ जाने से मना कर दिया । अभी तो व्यापार लड़के को सम्हलाना है, पौत्र छोटा है, उसका भी ध्यान रखना है । सेठजी ने अगली बार साथ चलने की हामी भर दी ।

               सन्त तो चले गए । वे तो रमते जोगी हैं, आज यहाँ तो कल वहाँ । कई वर्षों बाद फिर उसी स्थान पर उनका आगमन हुआ । सन्तजी को सेठ का स्मरण हो आया । सोचा, चलो अब तो सेठ साथ चलेंगे ही । पहुँच गए उनकी कोठी पर । पता चला कि वे तो दिवंगत हो गए । सन्त ने ध्यान लगाया । अरे ! सेठ ने तो बकरे के रूप में पुनर्जन्म लिया है । सन्त तुरंत ही बकरे के पास पहुँच गए और बोले - ‘ सेठजी ! अब तो चलें ।’ बकरा बना सेठ बोला - ‘ अजी अभी कहाँ ? लड़का जब दुकान बंद कर रात को घर चला जाता है, तब पीछे से कहीं कोई ताला न तोड़ ले । इसलिए रात भर दुकान के आगे बैठकर इसकी रखवाली करता हूँ । जब लड़का किसी चौकीदार की व्यवस्था कर लेगा, तब आपके साथ अवश्य चलूँगा ।’

             सेठ की बात सुन मुस्कुराते हुए सन्त वहाँ से आगे चले गए । वे जानते थे कि सेठ इस जन्म में ही क्या, अगले कई जन्मों तक मुक्त नहीं होगा । इस प्रकार फिर से कई वर्ष बीत गए । सन्त तो अनवरत यात्रा पर गतिमान थे, एक जगह नहीं ठहरते थे । संयोगवश एक बार फिर से सेठ के गाँव आना हुआ । पहुँच गए, सेठ की उसी दुकान पर जहां सेठ बकरा बने चौकीदारी कर रहे थे । परन्तु यहाँ तो बकरा है ही नहीं ।

            सन्त ने ध्यान लगाया, सेठ किस शरीर में है, पता तो चले । बकरा बने सेठ तो मर गए । अब वे कहाँ होंगे ? अरे ! सेठ तो यह रहे, घर की नाली का कीड़ा बने हुए । तुरन्त दुकान से उठे, पहुँच गए घर से निकलने वाली नाली के पास । कीड़ा भी देखते ही सन्त को पहचान गया । सन्त बोले - ‘सेठजी, अब तो चलें ।’

          नाली का कीड़ा बने सेठ ने सन्त की बात का कोई उत्तर नहीं दिया । सन्त फिर से बोले - ‘सेठजी, अब तो चलें ।’ कीड़ा क्रोध से फड़फड़ाया, बोला - ‘आपको जाना है तो जाइए, मैं तो यहाँ सुखी हूँ । देख रहे हो न, भीतर मेरा पोता नहा रहा है । उसका नहाया हुआ जल मेरे शरीर को छू रहा है । मैं उसके स्पर्श से रोमांचित हूँ । ऐसा सुख भला स्वर्ग में भी कहाँ मिलेगा ? आप जाइए, मुझे कहीं नहीं जाना है ।’


               सन्त ने अपने जीवन में सेठ को तीन शरीरों के रहते समझाया परंतु सेठ को बात समझ में नहीं आई । जब मनुष्य शरीर में रहते हुए व्यक्ति को समझ नहीं आती तो दूसरे प्राणियों के शरीर में रहते तो समझ में आने का कोई प्रश्न ही नहीं है । अब सेठ को प्रतीक्षा करनी पड़ेगी, फिर से मानव शरीर मिलने की जोकि सब जन्मों के अन्त में जाकर मिलना है, तब तक चौरासी लाख शरीरों की यात्रा करनी होगी । अभी तो पूर्व मानव जन्म की कामना, ममता और आसक्ति के स्थान पर ही बार-बार चक्कर लगाना पड़ेगा, न जाने तब तक कितने वर्ष/युग बीत जाएँगे ।

           सेठ ने जो कुछ किया, वही तो असत् है । मनुष्य की विडम्बना है कि वह स्वयं सत् होते हुए भी असत् में आसक्त होकर उसी को सत् मान बैठा है । असत् को सत्ता हमने ही दी है । सत्ता देने वाले असत् के पास असत् को सत्ता देने का अधिकार ही नहीं है । दीवार का सत् दिखना तभी स्वीकार्य है, जब उसे चर्म चक्षुओं से न देखकर ज्ञान चक्षुओं से देखा जाए । वास्तव में सत्ता केवल सत् की ही है, चाहे वह हमें असत् के रूप में दिखलाई पड़ रहा हो ।

         सत् परमात्मा और असत् संसार, ये दोनों तो परमात्मा ही हैं परंतु इन दोनों से परे जो कुछ है वह भी परमात्मा है । गंभीरता से चिंतन करें तो अनुभव होगा कि सर्वत्र एक परमात्मा की सत्ता के अतिरिक्त किसी अन्य की सत्ता है ही नहीं । सत्, असत् और इन दोनों से परे कहा जाना केवल सापेक्षता ही दृष्टि से है । यदि हम प्रकृति को असत् मानते हैं तो इसका विलोम सत् भी है, ऐसा मानना होगा । जब सत् भी है, असत् भी है तो फिर इन दोनों अर्थात् सत् और असत् से परे भी कुछ हो सकता है । जो भी भेद है, वह असत् में है । असत् की सत्ता को अस्वीकार करते ही केवल सत् शेष रह जाता है और जब केवल एक सत् ही है तो उसको सत् कहना भी उचित नहीं है । फिर जो कुछ असत् है, जो कुछ सत् है और उससे परे भी जो कुछ है, वे सब एक परमात्मा ही हैं, उनके अतिरिक्त कोई है ही नहीं ।

           असत्-सत् और उससे परे के समाप्त होते ही जो शेष रहता है, वह “है” है । जो “है” है, वही जीवन है । जीवन “है” में है, “नहीं” में नहीं । उसको “है” कहना भी केवल उसका वर्णन करने के उद्देश्य से है जिससे उस एक की ओर लक्ष्य किया जा सके । स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज ने कहा है कि जब तत्व का वर्णन किया जाता है तब अगर दृष्टि वर्णन पर रहेगी तो तत्व खो जाएगा, केवल शब्द ही पकड़ में आएंगे और अगर उसके वर्णन में दृष्टि लक्ष्य पर रहेगी तो वर्णन अपने आप खो जाएगा और केवल तत्व पकड़ में आ जाएगा ।

                परमात्मा वर्णनातीत है, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता । वर्णन करेंगे और दृष्टि केवल शब्दों पर रखेंगे तो प्राप्ति के रूप में हमारे हाथ में कोरे शब्द रह जाएंगे । शब्दों का महत्व तभी तक है जब तक दृष्टि केवल लक्ष्य पर रहती है, मात्र शब्दों पर नहीं । इसलिए दृष्टि तत्व पर रहेगी तो उसको जनाने के लिए किए गए वर्णन से वर्णनातीत का अनुभव हो ही जाएगा ।

         स्वामीजी कहते हैं - “तत्व वास्तव में अनुभवरूप है क्योंकि अनुभव कभी अननुभव (विस्मृत) नहीं होता । वर्णनातीत का वर्णन आपकी स्मृति लौटा सकता है परंतु यह स्मृति कभी भी विस्मृत हो सकती है । स्मृति की विस्मृति हो सकती है परंतु अनुभव की विस्मृति न होकर उससे विमुखता होती है ।” गीता-ज्ञान के समापन पर अर्जुन द्वारा जिसको “स्मृति: लब्धा” कहा गया है वह वास्तव में “है” से हुई विमुखता का पुनः सम्मुखता में परिवर्तित हो जाना है । परमात्मा की विमुखता से पुनः उनका अनुभव हो जाना ही अधिक महत्वपूर्ण है ।

            इतने विवेचन से स्पष्ट है कि असत् की अपेक्षा से उसे सत् कहा गया है । समझाने की दृष्टि से ऐसा कहना आवश्यक है । भगवान ने स्वयं गीता में कहा है - नास्तो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: (गीता -2/16) अर्थात् असत् की तो सत्ता विद्यमान नहीं है और सत् का अभाव विद्यमान नहीं है । असत् को सत्ता सत् के कारण मिली है, इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता । बाह्य दृष्टि से देखने पर हमें असत् की सत्ता दिखलाई पड़ती है क्योंकि असत् नेत्रों से असत् भी सत् ही प्रतीत होता है ।

             अपरा प्रकृति का अंश यह शरीर है । जीवात्मा जोकि परा प्रकृति है, अपरा के साथ तादात्म्य स्थापित कर उसमें मोहित हो जाती है । मोहित जीवात्मा ही शरीर को स्वयं होना मान लेती है । यह परमात्मा से विमुखता है । ज्ञान पुनः परमात्मा का अनुभव कराते हुए हमें संसार और शरीर से विमुख कर देता है । संसार और शरीर से विमुख हो जाना ही परमात्मा के सम्मुख होकर उनका अनुभव कर लेना है । 

                  मोह से मुक्त होते ही वास्तविक सत्ता का ज्ञान हो जाता है और सत् प्रकट हो जाता है । संसार को जानने के लिए संसार से दूर होना आवश्यक है । शरीर की विभिन्न अवस्थाओं जैसे बाल्य, युवा, प्रोढ आदि में शरीर का रूप, रंग तक बदल जाता है । शरीर में हो रहे इन परिवर्तनों को देखने वाला कभी नहीं बदलता तभी तो उसको शरीर में हो रहे बदलावों का अनुभव होता है । इस बात पर गंभीरता से चिंतन करेंगे तो स्पष्ट हो जाएगा कि हम शरीर नहीं हैं बल्कि उससे भिन्न हैं । इस बात को आत्मसात् करते ही शरीर और संसार से मोह समाप्त हो जाता है ।   

                 हम क्रियाओं में इतने उलझे होते हुए भी आत्म-बोध को उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं । क्रियाएँ असत् के कारण होती हैं । इसका अर्थ है कि हम सब सत् को असत् के माध्यम से जानने का प्रयास कर रहे हैं । जबकि वास्तविकता यह है कि असत् से सत् का अनुभव हो ही नहीं सकता । असत् से स्वयं को अलग कर लेने पर ही शरीर की सत्ता खो सकती है और शेष केवल एक सत् की सत्ता रह जाती है । असत् की अपेक्षा से उसे सत् कहा जाता है अन्यथा न तो कहीं सत् है और न ही असत् ।

       गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यही बात समझाते हुए कह रहे हैं -

                ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।

                अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ।। गीता-13/12।।

अर्थात् जो ज्ञेय है, उस परमात्मतत्व को मैं अच्छी प्रकार से कहूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमरता का अनुभव कर लेता है । वह ज्ञेय-तत्व अनादि और परम ब्रह्म है । उसको न तो सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है ।

        परमात्मा ज्ञेय हैं परंतु इसको उस प्रकार नहीं जाना जा सकता जैसे सांसारिक भौतिक वस्तुओं को जाना जाता है । भौतिक वस्तुएँ असत् है, उनको तो असत् अर्थात् इंद्रियों और शरीर के माध्यम से जाना जा सकता है परंतु सत् को तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है । सत् का अनुभव होने पर सत् भी खो जाता है । फिर उसको केवल “है” ही कहा जा सकता है । “है” भी केवल वर्णन करने के लिए उस ओर किए जाने वाला संकेत मात्र है अन्यथा उसका कोई वर्णन नहीं हो सकता । न वह असत् है और न ही सत् । वह वर्णनातीत है इसलिए उसका केवल अनुभव ही हो सकता है, उसके बारे में न तो कहा जा सकता है और न ही कुछ लिखा जा सकता है । कहना और लिखना, केवल परमात्मा की ओर संकेत करने के लिए ही है । 

             मैंने सुना है कि जापान में किसी स्थान पर एक मंदिर है, जिसको अंगुली वाला मंदिर कहा जाता है । उस मंदिर में एक हाथ के पंजे की मूर्ति लगी हुई है । हाथ की तीन अंगुलिया और अंगूठा तो हथेली से लगे हुए हैं और केवल तर्जनी अंगुली सीधी है जो ऊपर की ओर संकेत कर रही है । यह अंगुली उस ओर संकेत कर रही है जिधर देखने पर स्थूल दृष्टि को कुछ भी दिखाई नहीं देता, सिवाय खुले आसमान के ।

           अंगुली संकेत करती है उस ओर, जिधर सत्तावान के उपस्थित होने की कल्पना की जाती है । वह सत्तावान ही “है” है, ऐसा कहा जाता है । उसको जाना नहीं जा सकता, न ही उसका वर्णन किया जा सकता है । हाँ, उसका अनुभव अवश्य ही किया जा सकता है । उसके अनुभव के लिए असत्, सत् आदि सभी नामों से ऊपर उठना होगा । उसको न तो सत् कहा जा सकता है और न ही असत् । जो सत् और असत् से भी परे है, जिसका कोई नाम नहीं है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता उसकी ओर तो केवल संकेत ही किया जा सकता है जैसा कि हाथ वाले मंदिर में अंगुली के माध्यम से किया गया है ।

          “है” के अनुभव के लिए उस अंगुली की पूजा करने से कुछ भी नहीं होना है । हाथ की संकेत करती अंगुली हमारे शास्त्र आदि ही तो है, जिनसे हमने उसको जानने का प्रयास किया है । उस “है” के अनुभव के लिए अंगुली को पीछे छोड़ अर्थात् शास्त्रीय ज्ञान को पीछे छोड़ आगे बढ़ना होगा । आगे बढ़ने के लिए चुप होना होगा । चुप होने से अर्थ है, बाहर भीतर से शान्त, कुछ भी और किसी का भी चिन्तन नहीं । फिर जो अनुभव होगा वह अनुभव अतीन्द्रिय होगा ।

           जैसे अंगुली से जिस दिशा की ओर संकेत किया जाता है उस ओर दृष्टि जाने पर ही हम लक्ष्य को जान सकते हैं । दृष्टि को केवल उस अंगुली पर रखने से तो अंगुली ही दिखाई देगी, लक्ष्य नहीं । लक्ष्य की ओर संकेत करती अंगुली ही लेखन और प्रवचन है अर्थात् वे परमात्मा की ओर मात्र संकेत करते हैं । लिखने से, बोलने से अच्छा लेखक और वक्ता हुआ जा सकता है, लेख पढ़कर, प्रवचन सुनकर अच्छा पाठक और अच्छा श्रोता हुआ जा सकता है परंतु लक्ष्य तक तभी पहुँचा जा सकता है, जब दृष्टि लेख-लेखक; प्रवचन-वक्ता पर न अटककर केवल लक्ष्य पर ही टिकी रहे ।

           लक्ष्य पर दृष्टि टिकाए रखना ही परमात्मा के सम्मुख होना है । फिर लेख-लेखक, प्रवचन-वक्ता खो जाते हैं और परमात्मा (लक्ष्य) का अनुभव हो जाता है । उसका अनुभव होते ही शब्द खो जाते हैं और वाणी/ लेखनी शांत हो जाती है । यह मौन की अवस्था है, जिसमें सब कुछ पाकर भी उसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । स्वामीजी ने इसको चुप साधन कहा है । मौन होकर बैठने पर न तो कोई विचार होता है और न ही किसी का चिंतन । तभी भगवान ने अर्जुन को स्पष्ट किया है कि उसको न तो सत् कहा जा सकता है और न ही असत् ।

             “वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:”(गीता-7/19) अर्थात् ‘सब कुछ वासुदेव ही है’, ऐसा जान लेने वाला वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है । “वासुदेव” तक पहुँच जाने वाला क्या तो बोले और क्या लिखे ? इसलिए वह मौन हो जाता है ।

          हमारे शास्त्र और सन्त ही वह अंगुली है जो लक्ष्य की ओर संकेत करती है । प्रश्न उठता है कि शास्त्र हमें परमात्मा का मार्ग दिखलाते है, उसको जानने की ओर अग्रसर करते हैं फिर हमें उस परम के अनुभव के लिए शास्त्रों को छोड़ना क्यों आवश्यक है ? हमारे शास्त्रों में अथाह ज्ञान भरा पड़ा है । उनको पढ़कर हम ज्ञानी बन सकते हैं, अच्छे वक्ता और लेखक बन सकते हैं परंतु जीवन का जो लक्ष्य है उस तक पहुँचने से दूर ही रह जाते हैं । शास्त्रीय ज्ञान मोह को पैदा करता है और यही मोह सब कुछ जानने का अहंकार पैदा करता है । अहंकार हमें असत् से (शरीर और संसार से) मुक्त नहीं होने देता ।

            यह अहंकार ही अहम् है जिसके विलीन हुए बिना हम परमात्मा का अनुभव नहीं कर सकते । शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान ही तो “नेति-नेति” कहता है अर्थात् वह इतना ही नहीं है । इस ‘इतने ही नहीं है’ को स्वीकार करते ही व्यक्ति शास्त्रों की ओर से चुप होकर शान्त हो जाता है । यही चुप-साधन अर्थात् मौन-साधना है । इस अवस्था को उपलब्ध होने पर शास्त्रीय-ज्ञान का कोई अर्थ नहीं रह जाता ।

         स्वयं भगवान ने गीता में कहा है -

               यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।

               तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: ।। 2/46 ।।

         अर्थात् सब ओर से परिपूर्ण महान जलाशय मिलने पर छोटे गड्ढों में भरे जल में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता, शास्त्रों को तत्त्व से जानने वाले ब्रह्मज्ञानी का संपूर्ण वेदों से उतना ही प्रयोजन रहता है अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता ।


            जब व्यक्ति अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँच जाता है, तब उसे अनुभव होता है कि इतना प्रयास जो उसने इस अवस्था तक पहुँचने के लिए किया वह अधिक उपयोगी नहीं है । ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्या वेद और शास्त्र पढ़ने इतने महत्वपूर्ण नहीं है ? ऐसा नहीं है कि शास्त्रों का अध्ययन महत्वपूर्ण नहीं है । अध्ययन से आत्म-बोध की जो मुमुक्षा पैदा होती है, वही आत्म-बोध का मार्ग भी दिखलाती है । ज्ञान जो शास्त्रों से मिलता है, वही ज्ञान अनुभव कराता है कि परमात्मा को जाना नहीं जा सकता ।

                “परमात्मा है” और हम उसके ही अंश है, ऐसा ज्ञान कराने में शास्त्रों की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता । परन्तु केवल शास्त्र को ही पकड़ कर बैठ जाना आध्यात्मिक प्रगति को रोक देता है । इसलिए शास्त्रों में जो ज्ञान है, उसे आत्मसात् कर आगे बढ़ना आवश्यक है, नहीं तो ये शास्त्र भी एक दिन बोझ बनकर रह जाते हैं । स्वामीजी ने ‘साधक-संजीवनी’ हमारे हाथ में दी है परंतु केवल उसे हाथ में थामे रहने से आत्म-बोध नहीं होने वाला । उसमें संकलित ज्ञान को आचरण में लाने से ही हम उस परमात्मा का अनुभव कर सकते है, जिसकी ओर संकेत करते हुए यह ग्रन्थ लिखा गया है । स्वामीजी के द्वारा कहे गए शब्दों को ही नहीं पकड़ना है बल्कि जिस लक्ष्य को लेकर ये शब्द कहे गए है, उनसे ऊपर उठकर लक्ष्य को पकड़ना है ।

             शास्त्रों को पकड़कर बैठ जाना भी जड़ता है, प्रगति में बाधा है । शास्त्र से तभी तक प्रयोजन रहता है, जब तक आत्म-बोध की दिशा का ज्ञान नहीं हो जाता । दिशा का ज्ञान होते ही शास्त्रों को भी छोड़ना पड़ता है । शास्त्रों को पीछे छोड़े बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता । आगे बढ़ने से ही उस परम का अनुभव होगा जिसकी ओर संकेत करने के लिए शास्त्रों की रचना की गई है ।

           श्रीमद्भागवत महापुराण का सार चार श्लोकों में सिमटा है, जो स्वयं भगवान द्वारा कहे गए हैं । इसे चतुःश्लोकी भागवत भी कहा जाता है । इन चार श्लोकों में परमात्मा स्वयं ने अपना वर्णन किया है । अवर्णनीय का वर्णन करना या तो परमात्मा से ही संभव है या उनके परम भक्तों से । ब्रह्माजी भगवद्धाम जाते हैं तब भगवान उन्हें सृष्टि रचना की आज्ञा देते हैं ।

     ब्रह्माजी कहते हैं कि भगवन् ! आप समस्त प्राणियों के अंतःकरण में साक्षीरूप से विराजमान रहते हैं । आप अपने अप्रतिहत (निर्बाध) ज्ञान से यह जानते ही हैं कि मैं क्या करना चाहता हूँ ? आप कृपा करके मुझ याचक की यह माँग पूरी कीजिए कि मैं रूपरहित आपके सगुण और निर्गुण दोनों ही रूपों को जान सकूँ । आप मायापति है , अपनी माया का आश्रय लेकर इस जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करने के लिए अपने आपको ही अनेक रूपों में प्रकट कर क्रीड़ा करते हैं । आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मैं सजग रहकर सावधानीपूर्वक आपकी आज्ञा का पालन कर सकूँ और सृष्टि की रचना करते समय भी कर्तापन आदि के अभिमान से बंध नहीं जाऊँ ।

          आगे ब्रह्माजी कहते हैं कि प्रभो ! आपने एक मित्र के समान हाथ पकड़ कर मुझे अपना मित्र स्वीकार किया है । अतः जब मैं आपकी इस सेवा / ‘सृष्टि-रचना’ में लगूँ और सावधानी से पूर्वसृष्टि के गुण-कर्मानुसार जीवों का विभाजन करने लगूँ, तब कहीं अपने को जन्म-कर्म से स्वतन्त्र मानकर प्रबल अभिमान न कर बैठूँ ।

      ब्रह्माजी के आग्रह पर भगवान ने उन्हें जो ज्ञान दिया वह भागवतजी के दूसरे स्कन्ध के नवें अध्याय के चार श्लोकों में समाहित है । इन्हीं चार श्लोकों को चतु:श्लोकी भागवत कहा जाता है ।

             भगवान सृष्टि रचना की आज्ञा देते हुए ब्रह्माजी को कह रहे हैं कि मैं तपस्या से ही सृष्टि की रचना करता हूँ, तपस्या से ही इसका धारण-पोषण करता हूँ और तपस्या से ही इसे अपने में लीन कर लेता हूँ । तुम उस समय सृष्टिरचना कर्म करने में किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे, इसी से मैंने तुम्हें तपस्या करने की आज्ञा दी थी । 

         सृष्टिरचना से ब्रह्माजी को कहीं कृतत्वाभिमान न हो जाए इसलिए भागवतजी के दूसरे स्कन्ध के नवें अध्याय में ब्रह्माजी को भगवान उपदेश देते हुए कहते हैं -

         अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् यत् सदसत् परम् ।

         पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।। (1)

          “सृष्टि से पूर्व केवल मैं-ही-मैं था । मेरे अतिरिक्त न स्थूल था, न सूक्ष्म और न ही दोनों का कारण अज्ञान । जहां सृष्टि नहीं है, वहाँ मैं-ही-मैं हूँ और सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं हूँ; और जो कुछ शेष रहेगा, वह भी मैं हूँ ।” (भागवत -2/9/32) 

               सृष्टि का प्रारम्भ कब हुआ, वैज्ञानिक इसे करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ बताते हैं । चाहे जब से सृष्टि का प्रादुर्भाव हुआ हो, भगवान कहते हैं कि उससे पहले भी मैं था । सृष्टि रचना के बाद जो भी स्थूल-सूक्ष्म दृष्टिगत है, वह हमारे अज्ञान के कारण है अन्यथा एक भगवान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । जहां सृष्टि नहीं है, वहाँ भी भगवान है और भगवान ही सृष्टि रूप से प्रतीत हो रहे हैं । सृष्टि के विलीन हो जाने पर जो शेष रहेगा, वह भी वही होंगे । 

         सृष्टि में जो कुछ भी हमें प्रतीत हो रहा है, वह हमारी भेद-दृष्टि के कारण है । इस भेद-दृष्टि का कारण हमारा अज्ञान है । भगवान कह रहे हैं कि मेरे अतिरिक्त न कोई स्थूल है, न कोई सूक्ष्म और न ही इन दोनों का कारण अज्ञान । जो स्थूल और सूक्ष्म का भेद हम करते हैं, वह अज्ञान के कारण करते हैं, अन्यथा सृष्टि में ऐसा भेद कहीं नहीं है । कहने का अर्थ है सृष्टि के आदि से भी पूर्व भगवान थे और सृष्टि के पश्चात् भी भगवान ही रहेंगे । भगवान के अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत हो रहा है, वह हमारे अज्ञान के कारण हो रहा है । 

    ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

    तद्विद्यादात्मानो मायां यथाऽऽभासो यथा तम: ।। (2)

             “ सत्य के रूप में जो प्रतीत हो रहा है, अथवा नहीं प्रतीत हो रहा है, वह सब मेरी माया के कारण हो रहा है । वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अन्यथा विद्यमान होने पर भी आकाश-मण्डल के नक्षत्रों में राहु की भाँति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझनी चाहिए ।” (भागवत -2/9/33 ) 

              जैसे एक आँख पर अंगुली से थोड़ा दबाव डालें तो आकाश में एक चंद्रमा के अतिरिक्त एक और चंद्रमा दिखलाई पड़ता है, जबकि वास्तव में चंद्रमा एक ही है । इसी प्रकार राहु ग्रह की आसमान में प्रतीति नहीं होती जबकि राहु विद्यमान है । भगवान कहते हैं कि दो चंद्रमा न होते हुए भी जो दो होने की प्रतीति होती है, वह मेरी माया है और विद्यमान होने पर जिस राहु की प्रतीति होनी चाहिए थी, उसकी प्रतीति न होना भी मेरी माया है । 

             जो आँखों से दिखलाई पड़ता है, उसको सत्य होना स्वीकार करना पड़ता है परंतु जो दिखलाई नहीं पड़ता, उसको असत्य कहना भी हमारा अज्ञान है । न होते हुए भी प्रतीति होना अथवा होते हुए भी प्रतीत न होना, केवल भगवान की माया ही समझना चाहिए । माया में उलझना इसीलिए होता है क्योंकि जो हमारी दृष्टि की पकड़ में है, उसको तो सत्य समझ लेते हैं और जो दृष्टि के बाहर है उसे असत्य । न कोई सत् है, न असत्; सब कुछ परमात्मा ही है, ऐसा स्वीकार कर लेना ही ज्ञान है ।

            यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।

            प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।। (3)

           जैसे प्राणियों के पञ्चभूत रचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पञ्चमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किए हुए हूँ और आत्मदृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उनमें प्रविष्ट नहीं भी हूँ । (भागवत -2/9/34 ) 

          सृष्टि के रचनाकार ने स्वयं से बाहर जाकर किसी मी रचना नहीं की है । रचनाकार स्वयं ही रचना बना है, केवल भ्रमवश हमें उसका अपनी रचना में प्रवेश करना दिखलाई पड़ता है ।

         प्रत्येक जीव का शरीर पञ्चभूत निर्मित है । वे पाँच महाभूत सूक्ष्म रूप से इस शरीर में प्रवेश करते हैं । लेकिन वे प्रवेश नहीं भी करते क्योंकि पहले से ही वे इस शरीर के कारण रूप से उसमें उपस्थित हैं । इसी प्रकार भगवान स्वयं आत्मा रूप से शरीर में प्रवेश करते हैं और नहीं भी करते क्योंकि सृष्टि का निर्माण उन्होंने स्वयं में किया है, किसी अन्य सामग्री से नहीं । कहने का अर्थ है कि वे ही स्थूल शरीर हैं, वे ही सूक्ष्म शरीर है और उस शरीर के कारण भी वे ही हैं । जीवात्मा भी वे ही हैं । कहने का अर्थ है कि वे ही सब कुछ हैं, फिर चाहे उनको शरीर में प्रवेश किया मानो अथवा उनका शरीर में प्रवेश न करना मानो ।  

      एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मन: ।

      अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा ।। (4)

       यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं - इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है - इस अन्वयकी पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है , वे ही वास्तविक तत्व है । जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है ।” (भागवत - 2/9/35)

                ऋषियों ने सब कुछ समझकर “नेति-नेति” कहा है अर्थात् वे इतने ही नहीं है या यह ब्रह्म नहीं है, यह ब्रह्म नहीं है । उन्हीं ऋषियों ने स्वीकार किया है कि सर्वत्र और सब समय एक परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं । 

            किसी पक्ष को समग्र रूप से जानना हो तो सकारात्मक और नकारात्मक, दो दृष्टि रखकर जाना जा सकता है । नकारात्मक पद्धति को निषेध विधि कहा जाता है और सकारात्मक पद्धति को अन्वयकी विधि । “यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं” यह निषेध विधि है । परमात्मा असीम है, उनको एक सीमा में बाँधने का अर्थ है कि अभी भी हम उनको जानने से बहुत दूर हैं । जिसने परमात्मा को सत् कहा है, उसने असत् को परमात्मा नहीं माना है । निषेध की पद्धति कहती है कि न तो परमात्मा सत् है और न ही असत् । ( न सत्तन्नासदुच्यते - गीता- 13/12) ।

         अन्वयकी पद्धति सकारात्मक विधि है । परमात्मा असीम है, उसका न कोई आदि है और न ही अन्त । सृष्टि का प्रारंभ और अन्त है, परमात्मा का नहीं । परमात्मा स्वयं सृष्टि बने हैं । सृष्टि का आदि-अन्त है, सृष्टि परिवर्तनशील है, इसलिए इसे असत् कहा गया है । परमात्मा को सृष्टि के असत् होने के सापेक्ष सत् कहा जाता है । वास्तव में देखा जाए तो असत् और सत्, दोनों ही परमात्मा हैं । ( सदसच्चाहमर्जुन - गीता - 9/19) 

       असत् और सत्, दोनों ही परमात्मा है, तो इन दोनों से परे कौन है ? वे भी परमात्मा हैं । इससे सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वत्र और सर्वदा है । वे ही वास्तविक तत्व हैं । जो आत्मा और परमात्मा को तत्त्व से जानना चाहते हैं, वे इतना ही जान लें । उनके लिए इतना जान लेना ही पर्याप्त है । तभी अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप दर्शन कर कहा है - “त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्” (गीता -11/27) 

                   इतने विवेचन से स्पष्ट है परमात्मा स्वयं ही सृष्टि रूप में व्यक्त हुए हैं । व्यक्त को हम असत् कह देते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्त में परिवर्तन होना नियम है जबकि अव्यक्त जिसे हम सत् कहते हैं, वह अपरिवर्तनशील है । दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जो अव्यक्त है, वह सत् है और जो अव्यक्त सत् के रूप में व्यक्त हो गया वह असत् है । इससे स्पष्ट होता है कि असत् संसार और शरीर की स्वतंत्र सत्ता नहीं है । असत् की सत्ता सत् के कारण है । सत् के असत् से दूर होते ही असत् खो जाता है और शेष केवल सत् रह जाता है क्योंकि सत् के अभाव में असत् की सत्ता नहीं रहती । अकेले सत् को सत् कहना भी उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि फ़िर उसके सापेक्ष असत् को भी मानना पड़ता है । असत् की अस्वीकार्यता होते ही सत् के स्थान पर भी केवल तत्व रह जाता है । 


           स्वर्ण से बने आभूषण में हमें कड़ा, कण्ठी, अंगूठी आदि दिखाई देते हैं परन्तु उसको गलाने पर केवल एक स्वर्ण तत्व ही शेष रह जाता है उसी प्रकार शरीर भले ही भिन्न-भिन्न प्रतीत हो रहे हों, सबकी सत्ता एक परमात्म-तत्व के कारण ही है । एक परमात्म-तत्व पर ही दृष्टि रखेंगे तो फिर उसको न तो सत् कहा जा सकता है और न ही असत् । न तो सत् है, न ही असत्, केवल एक तत्व ही है, जिसे “है” कहा जा सकता है । यह “है” ही वह तत्व है, जिसका कोई भी वर्णन नहीं किया जा सकता । वह वास्तव में अवर्णनीय है ।

             वर्णन असत् का करेंगे तो केवल असत् को ही जान पाएंगे । सत् को असत् के माध्यम से जानने का प्रयास करना व्यर्थ हैं । हाँ, असत् के माध्यम से वर्णन करते हुए दृष्टि सत् पर रखेंगे, तो सत्-असत् दोनों ही खो जाएंगे और शेष रहेगा वह मूल तत्व “है” ही होगा । अतः वर्णनातीत के वर्णन में शब्दों को नहीं पकड़ना है, बल्कि शब्दों के माध्यम से “है” तक पहुँचना है ।

         भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को कहते हैं - 

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय ।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।। गीता - 7/7 ।।

    हे धनंजय ! मेरे सिवाय इस जगत् का दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी कारण तथा कार्य नहीं है । जैसे सूत की मणियाँ सूत के धागों में पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह संपूर्ण जगत् मुझ में ही ओतप्रोत है ।

             एक लम्बा सूत का धागा लें, उसी धागे की गाँठें लगाते हुए एक माला बना लें । दिखने मे वह एक माला प्रतीत होगी । गंभीरता से अवलोकन करेंगे तो उसमें धागा और मणियाँ पिरोई प्रतीत होगी । अपनी दृष्टि को और सूक्ष्म करेंगे तो देखेंगे कि धागा और मणियाँ, सूत से ही बनी है । फिर उस माला को चाहे जब देख लो, एक सूत के अतिरिक्त कुछ भी नज़र नहीं आयेगा । इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर पहले तो माला खो जाएगी और फिर मणियाँ और धागा भी खो जाएँगे । अंत में केवल सूत ही दिखलाई देगा ।  

          इसी माला की तरह यह संसार है, जिसमें विभिन्न चर-अचर, सजीव-निर्जीव, प्रतीत-अप्रतीत आदि सब मणियाँ हैं । सबके मूल में एक परमात्मा (सूत) है । जितनी भी प्रतीति हो रही है अथवा नहीं भी हो रही है, उन सबका कारण एक परमात्मा ही है, उसके अतिरिक्त कोई अन्य किंचितमात्र भी नहीं है । संपूर्ण जगत् में एक परमात्मा के अलावा कोई दूसरा नहीं है । स्वामीजी कहते हैं कि संपूर्ण संसार में एक सूई की नोक जितनी भी जगह ऐसी नहीं है, जहां परमात्मा न हों ।

                 भगवान ने समझाने की दृष्टि से जो उदाहरण दिया है वह असत् से सत् की ओर संकेत मात्र है । माला, मणियाँ, धागा तो असत् है ही, सूत भी असत् है । सूत से आगे बढ़ें तो कपास का पौधा और पौधे से कपास का बीज और फिर बीज से कपास का पौधा, फिर रूई, धागा, मणियाँ और माला - इस प्रकार एक अंतहीन शृंखला से हमारा सामना हो जाता है । कहने का अर्थ है कि असत् से असत् संसार-चक्र को ही समझा जा सकता है, सत् को नहीं । असत् से तो सत् की ओर मात्र संकेत ही किया जा सकता है ।

            इसी प्रकार परमात्मा की ओर लेखन, प्रवचन के माध्यम से सत् का वर्णन करते हुए उसकी ओर संकेत ही किया जा सकता है । वर्णन करते हुए इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि श्रोता/पाठक केवल शब्दों को पकड़ कर ही न बैठ जाए बल्कि शब्दों के अन्तर्हित संदेश के मर्म को समझें अन्यथा वह शब्दों के मायाजाल में ही उलझकर रह सकता है । आज संसार में यही हो रहा है, सब शब्दों को लिए घूम रहे हैं । लेखक शब्दों को आकर्षक रूप देकर पाठक को परोस रहा है, कथाकार शब्दों को बेच रहा है और श्रोता शब्दों को ख़रीदकर उनकी जुगाली कर रहा है ।

         शब्द रस प्रदान करते हैं और श्रोता उस रस का सेवन करते हुए सुख अनुभव कर रहा है । स्वामीजी ने इसको ‘सत्संग का सुख’ लेना कहा है । शब्द-रस के सेवन से थोड़े समय बाद रस चूक जाता है और फिर जीवन से वे शब्द भी निकल लेते हैं । जब तक जीवन में उन शब्दों में छिपे संकेत को समझकर आगे नहीं बढ़ेंगे तब तक सभी शब्द अर्थहीन हैं । गुरु द्वारा कहे गए शब्दों का निहितार्थ समझने से ही सत् की ओर दृष्टि जाएगी और शब्द ही ब्रह्म समान हो जाएँगे ।

              लेख का मूल विषय है कि क्या परमात्मा सत् भी हैं और असत् भी हैं (गीता - 9/19), या परमात्मा सत् भी हैं, असत् भी हैं और इन दोनों से परे भी हैं (गीता-11/37) अथवा क्या परमात्मा दोनों ही नहीं हैं (गीता-13/12) ? परमात्मा को जानना क्यों इतना कठिन है ? परमात्मा को जानना तब तक कठिन है, जब तक इन्हें हम अपनी बुद्धि के माध्यम से इन्हें जानने का प्रयास करते हैं । इस लेख में पूर्व में भी स्पष्ट किया गया है कि असत् से सत् को नहीं जाना जा सकता क्योंकि असत् ससीम है, बुद्धि ससीम है और सत् असीम है, परमात्मा असीम है ।

           परमात्मा को जानने के प्रयास में ही कभी उसको सत् कहा जाता है, कभी असत्, कभी इनसे परे भी और कभी असत्-सत् दोनों ही नहीं । जब एक परमात्मा से ही पूरी सृष्टि का आविर्भाव हुआ है तो परमात्मा उसके प्रत्येक अवयव में उपस्थित है, किसी भी स्थान को उनसे विहीन नहीं कहा जा सकता । साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना है कि सृष्टि के केवल एक अवयव को देखकर यह भी नहीं कहा जा सकता कि परमात्मा इतने से ही हैं । वह भी परमात्मा है परंतु परमात्मा केवल इतने से भी नहीं है । तभी ऋषियों ने इसको नेति-नेति कहा है ।

          असीम को एक सीमा में नहीं बांधा जा सकता । परमात्मा स्वयं ही सृष्टि बने हैं और सृष्टि का विस्तार कहाँ तक है, वैज्ञानिक अभी तक उसकी सीमा निर्धारित नहीं कर पा रहे हैं । कभी कर भी नहीं पाएंगे क्योंकि जब भी वे सृष्टि की सीमा निश्चित करने वाले होते हैं कि उस सीमा से परे कोई एक अवयव नज़र आ जाता है । अभी गत दिनों ही पृथ्वी से 5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर एक नए तारे को खोजा गया है । 

              अंधों का एक गाँव था । वहाँ के सभी मनुष्य अंधे थे, कोई एक आध ऐसा था जिसको कुछ-कुछ दिखलाई पड़ता था । कोई बीमारी रही होगी वहाँ । कुछ समय पहले तक, जब स्वास्थ्य सेवाओं को व्यापक रूप में विस्तार नहीं मिला था तब भी कई गाँव ऐसे होते थे जहां के निवासियों को रात में ही क्या दिन में भी देखने में मुश्किल होती थी । ऐसे ही कोई गाँव में एक दिन हाथी आ गया ।

           हाथी आ क्या गया था, साधुओं की एक टोली उस हाथी को लेकर वहाँ आ गई थी । हाथी पालतू था । गाँव के व्यक्ति हाथी के बारे में जानते नहीं थे । बड़ी संख्या में वहाँ के निवासी कोतुहलवश चौपाल में आ गये । सबने हाथी को चारों ओर से घेर लिया और अपने हाथ से उसको टटोलने लगे । किसी का हाथ उसकी पूँछ पर था,कोई उसके पैरों को टटोल रहा था, कोई उसकी बल खाती सूंड के साथ हाथ को इधर उधर कर रहा था । कहने का अर्थ है कि सभी अपने-अपने विवेक अनुसार हाथी को अनुभव कर रहे थे ।

           सायंकाल वहाँ का एक निवासी जिसकी आँखें ठीक थी, गाँव लौटा । प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुभव के आधार पर हाथी का वर्णन कर उसको सुना रहा था । कोई हाथी को खंभे (पाँव) जैसा कह रहा था, कोई पतली डोर (पूँछ) के समान बता रहा था । एक ने तो उसको झूले की तरह बता दिया क्योंकि उसने हाथी की सूंड़ का अनुभव किया था । क्या केवल पांव हाथी है या पूँछ हाथी है या केवल उसकी सूँड़ हाथी है ? नहीं सभी अवयव मिलकर हाथी है, कोई अकेला एक अवयव हाथी नहीं हो सकता ।

             हाथी एक, परंतु उसके वर्णन में भिन्नता क्योंकि उसको टटोलने वाले सभी अंधे थे । अंधा अर्थात् अज्ञानी । अज्ञानी कभी असीमता की बात नहीं करता, समग्रता की बात नहीं करता क्योंकि वह अल्प ज्ञान यानि अधूरे ज्ञान पर ही अटक जाता है । कहावत है - 'अध जल गगरी छलकत जाय' । घड़े में थोड़ा सा जल डाल दें और फिर उसको लेकर चलें तो घड़े में से जल छलककर बाहर गिरने लगता है । अज्ञानी की यही स्थिति है । अपने को ज्ञानी समझकर अधूरे ज्ञान को इधर उधर बाँटता रहता है ।

           घड़े को जब पूर्णरूपेण जल से भर दिया जाता है, तब उसको सिर पर रखकर कोसों दूर बिना जल को छलकाए ले जाया जा सकता है, उससे एक बूँद भी बाहर नहीं गिरती । यह ज्ञानी की स्थिति है । ज्ञानी सब कुछ जानकार मौन हो जाता है, क्योंकि उसको ज्ञान हो जाता है कि परमात्मा अगम है । न परमात्मा असत् तक सीमित है और न ही उनको केवल सत् ही कहा जा सकता है । उनके वर्णन के लिए प्रयोग में लिए जाने वाले सभी शब्द एक दूसरे की सापेक्षता से कहे जाते हैं । उन शब्दों को पढ़-सुनकर भ्रमित नहीं होना है । सत्य बात तो यह है कि वे अवर्णनीय हैं ।

          अवर्णनीय का वर्णन केवल शब्दों के माध्यम से उनकी अगमता को समझाने का प्रयास भर है । शब्दों की सीमा में उलझते हुए परमात्मा को ससीम मान लेना केवल अज्ञानता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । उनकी असीमता ही उनको अगम बनाती है ।

           परमात्मा को जब तक समग्र रूप से नहीं जाना जाएगा, तब तक ससीम मानते हुए उनका विभिन्न रूपों में वर्णन किया जाएगा । परमात्मा की समग्रता को पकड़ पाना बुद्धि की बात नहीं है । जिस दिन समग्र रूप से समझ लिया जाएगा तो फिर शब्दों के माध्यम से उनका वर्णन करना असंभव हो जाएगा । प्रत्येक शब्द उनकी विशालता के सामने बौना है । यही कारण है कि अध्यात्म की सर्वोच्च अवस्था तक पहुँचकर साधक मौन हो जाता है, चुप्पी साध लेता है ।

       परमात्मा को असत् संसार के सापेक्ष सत् कहा गया है अन्यथा यह नहीं कहा जा सकता कि असत् परमात्मा नहीं है । असत् भी परमात्मा है क्योंकि वे अपने आनन्द के लिए स्वयं ही असत् बने हैं । असत् भी परमात्मा है, इसका अर्थ यह नहीं है कि परमात्मा असत् तक ही सीमित है । सीमित दृष्टि रखने वाले असत् को ही परमात्मा मान इतिश्री कर लेते हैं तभी तो साधारण व्यक्ति मूर्ति पूजा करते हुए मंदिर से बाहर नहीं निकल पा रहा है । परमात्मा मंदिर तक ही सीमित नहीं है, वे तो संसार के कण-कण में व्याप्त है ।

            परमात्मा सत् हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे केवल सत् तक ही सीमित है । वे न तो असत् तक सीमित है और न ही सत् तक, इसका अर्थ है कि वे सत्-असत् , इन दो तक ही सीमित नहीं है । इन दोनों से परे भी वे हैं । अतः जब वे ही असत् हैं, सत् हैं और इन दोनों से परे भी हैं, इसका अर्थ हुआ कि केवल एक वे ही हैं, उनके अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं । फिर उनको असत्, सत् कहना भी अर्थहीन हैं । उनको सत् और असत्, नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनकी व्यापकता को स्पष्ट करने के लिए प्रत्येक शब्द अर्थहीन है ।

         इतने विवेचन से स्पष्ट है कि एक परमात्मा ही सर्वत्र है, सर्वदा है । संसार के प्रत्येक जीव में परमात्मा है । परम सत्ता एक, नाम रूप अनेक । केवल अपने आनंद के लिए भगवान ने विभिन्न रूप धरे हैं । पासे बनकर वे ही जुआ खेलने वाले बन गए हैं । जुए में हारते भी वही हैं, जीतते भी वही हैं । जब सब कुछ वही हैं तो ऐसा कहना भी अनुचित जान पड़ता है कि कोई जुआ भी है, कोई हारता अथवा जीतता भी है । एक “है” के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । अतः “यह भी है, यह भी है” अथवा “यह नहीं, यह नहीं” कहने में कोई सार नहीं है । केवल एक “ है” ही है । उसी “है” को सबमें देखना है ।

         मूर्ति की पूजा करते हुए उसमें परमात्मा को देखना सही है परंतु केवल मूर्ति ही परमात्मा है, ऐसा देखना सही नहीं है । सभी जीवों में और मूर्ति में समान रूप से परमात्मा को देखना सही देखना है । मूर्ति पत्थर से बनी है, जोकि निर्जीव है । उसमें की गई प्राण-प्रतिष्ठा हमारे भाव को दृढ़ता प्रदान करती है कि इसमें भी सजीव की तरह परमेश्वर है ।

            भागवत जी में भगवान ने कहा है - 

          अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थित: सदा ।

          तमवज्ञाय मां मर्त्य: कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ।। भागवत - 3/29/21 ।।

     अर्थात् मैं आत्मारूप से सभी जीवों में स्थित हूँ, इसलिए जो लोग मुझ सर्वभूत स्थित परमात्मा का अनादर करके केवल प्रतिमा में ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वाँग मात्र है ।

            प्राण-प्रतिष्ठा के बाद पत्थर की मूर्ति को भगवान मान कर उसकी पूजा करते हैं और संसार के जीवों से राग-द्वेष का भाव रखते हैं तो ऐसी मूर्ति-पूजा को भगवान ने आडंबर कहा है । पड़ौस का भाई भूखा है और भगवान की मूर्ति को छप्पन भोग लगाया जा रहा है, ऐसे भोग को परमेश्वर कदापि स्वीकार नहीं करते । उनकी दृष्टि में यह सब दिखावा मात्र है । ऐसी ईश्वरीय पूजा स्वाँग के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । 

           भगवान ऐसी पूजा के बारे में कहते हैं कि -

           यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् ।।

          हित्वार्चां भजते मौढ़्याद्भस्मन्येव जुहोति स: ।। भागवत -3/29/22 ।।

       मैं सबका आत्मा, परमेश्वर सभी भूतों में स्थित हूँ, ऐसी दशा में जो मोहवश मेरी उपेक्षा करके केवल प्रतिमा के पूजन में ही लगा रहता है, वह तो मानो भस्म में ही हवन करता है ।

            बिना अग्नि के हवन कुण्ड में डाली जा रही सामग्री से यज्ञ संपन्न नहीं होता । यज्ञ के लिए तो प्रत्येक प्राणी को परमात्म-स्वरूप देखते हुए उनकी सेवा करनी होती है । आपने उन प्राणियों की तो उपेक्षा कर दी और केवल मूर्ति के पूजन में लगे हुए हो, ऐसी पूजा निष्फल है । प्रतिमा में तभी ईश्वर को देखा जा सकता है, जब सभी चराचर जीवों में परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव हो । जिस दिन ऐसा होने लग जाएगा, उसी दिन सबका परमात्म-प्रतिमा पूजन सफल हो जाएगा ।

            सनातन धर्म में परमात्मा की उपासना करने के विभिन्न तरीक़े हैं । निराकार मानकर भी उनकी उपासना की जाती है और साकार समझकर मूर्ति पूजा भी की जाती है । आदिकाल से संत बताते आए हैं कि साकार और निराकार में कोई भेद नहीं है । ‘केवल मेरी पूजा पद्धति ही श्रेष्ठ है’, ऐसा कहना भी अनुचित है । निराकार को मानने वाले प्रायः साकार पूजा विधि का उपहास उड़ाते हैं । न तो परमात्मा साकार तक सीमित है और न ही वे केवल निराकार हैं । वे निराकार से साकार रूप कभी भी धारण कर सकते हैं । निर्गुण निराकार अपने आनंद के लिए ही सगुण साकार रूप में प्रकट होते हैं । इसलिए निराकार-साकार, निर्गुण-सगुण के द्वन्द्व में उलझने वाला ही अपनी राह से भटकता है ।

         साकार का एक निश्चित आकार है, जिसके कारण व्यक्ति उसमें अटक सकता है । अटका तभी जाता है, जब पकड़ने को कोई आकार मिल जाए और साकार में वह आकार है । यही कारण है कि मूर्ति-पूजा करने वाले मंदिर की मूर्ति पर ही रुक जाते हैं, आगे की यात्रा नहीं करते । निराकार में पकड़ने को कुछ भी नहीं है, अतः उसमें अटकने का डर तो नहीं है परंतु राह से भटकने का डर अवश्य है । ज्ञानी व्यक्ति निराकार को महत्वपूर्ण मानता है जिससे उसके पास पकड़ने को केवल अपना शरीर ही रहता है । शरीर को न छोड़ पाने के कारण (देहासक्ति) अर्थात् शरीर में आसक्त रहने के कारण वह अपनी राह से भटक सकता है । 

        इसलिए सर्वोत्तम मार्ग है - सबमें और सर्वत्र परमात्मा को देखना, जैसे कि एकनाथजी महाराज देखते थे । फिर न तो कहीं अटकने का डर है और न ही भटकने का ।

              कहा जाता है कि यदि गंगोत्री के गंगा-जल से रामेश्वरम् में भगवान का अभिषेक किया जाय तो शंकर भगवान शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं । सदियों से यह परम्परा चली आ रही है । प्रत्येक सनातनी की अपने जीवन में यही इच्छा होती है कि वह उत्तराखण्ड जाकर गंगा-जल लाए और रामेश्वरम् जाकर उस जल से शंकर भगवान का अभिषेक करे । 


                  एकनाथजी महाराज को कौन नहीं जानता । वे भगवान के परम भक्त हुए हैं । एक बार एकनाथजी महाराज साधु-संतों के साथ हिमालय से गंगा-जल लेकर रामेश्वरम् जा रहे थे । उस समय आवागमन के द्रुतगामी साधन थे नहीं, अतः सभी पैदल ही जा रहे थे । सभी संतों ने देखा कि रास्ते में एक गधा नीमबेहोशी की अवस्था में पड़ा तड़फ़ रहा है । ऐसा प्रतीत होता था कि असहनीय गर्मी में प्यास के कारण वह व्याकुल है । प्रत्येक के पास मात्र एक-एक लोटा जल ही तो था । किसी ने उस गधे को जल पिलाना उचित नहीं समझा क्योंकि सब सोच रहे थे अगर इतना सा जल इस गधे को पिला देंगे तो फिर शंकर का अभिषेक किससे करेंगे ?

          एकनाथजी से गधे की व्याकुलता देखी नहीं गई । वे उसे जल पिलाने को तैयार हो गए । एकनाथजी को उनके साथियों ने गधे को जल पिलाने से मना किया और यात्रा पर आगे बढ़ गए । फिर भी एकनाथजी महाराज ने जलपात्र को खोला और गधे को सारा जल पिला दिया । कहते हैं कि जल पीते ही गधे के स्थान पर शंकर भगवान प्रकट हो गए । उन्होंने एकनाथजी को गले लगा लिया और बोले - “पुत्र ! तेरा जलाभिषेक स्वीकार करता हूँ ।” 

        एकनाथजी महाराज ने सबमें परमात्मा को देखा, इसलिए गधे में भी उन्हें शंकर दिखलाई पड़े । अन्य साथी संत केवल रामेश्वरम् में भगवान को देख रहे थे । भगवान केवल रामेश्वरम् तक ही सीमित है, यह मानना सही नहीं है । भगवान तो सर्वव्यापी है । वे प्रत्येक काल में और प्रत्येक स्थान पर हैं । हमें मंदिरों में भगवान को देखकर वहाँ से भी बाहर निकलना होगा क्योंकि केवल मंदिर तक ही भगवान का क्षेत्र सीमित नहीं है । प्रत्येक जीव-निर्जीव का शरीर भी भगवान का मंदिर है । जहां तक दृष्टि जाती है या नहीं भी जाती, सर्वत्र उसकी उपस्थिति है । जहां तक हमारी सोच जाती है, उससे भी आगे भगवान हैं । अतः केवल मंदिर में ही उसे देखकर वहीं पर रूकना नहीं है । स्वामीजी कहते हैं -

             “यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं होई।

              ताँ के परे अगम है सोई॥”

           भगवान को एक सीमित क्षेत्र में देखना सही नहीं है । “यह नहीं, यह नहीं” कहने का अर्थ है कि मंदिर में भगवान को देखना हाथी के एक अवयव को देखने के समान है क्योंकि केवल एक पैर/ पूँछ को जान लेना ही हाथी को जानना नहीं है । इसलिए जहां भी परमात्मा को देखें, उसका वर्णन करने से पहले विचार करें कि “यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं होई” । तो फिर परमात्मा कैसा है ? जैसा कि कहा गया है - “ ताँ के परे अगम है सोई” अर्थात् जहां जहां परमात्मा को देखते हैं उससे भी परे, उससे भी आगे, जिसको हम जान नहीं सकते, जिसका हम वर्णन नहीं कर सकते, वही परमात्मा है ।

            मनुष्य की सबसे बड़ी कमी है कि वह जिसको जानना चाहता है, उसको अपनी बुद्धि के बल से ही जानना चाहता है । बुद्धि की भी एक सीमा है । जहां से मनुष्य को बुद्धि विरासत में मिली है, वह प्रकृति है । अभी तक बुद्धि से प्रकृति की सीमा भी जानी नहीं जा सकी है फिर परमात्मा को जानना तो दूर की कोड़ी है । प्रकृति ने इस जगत् को बनाया, मनुष्य ने इसी जगत् में अलग से अपना एक संसार बसा लिया । संसार में आसक्ति रखकर भी वह अपने रचे संसार के रहस्यों को भी अभी तक जान पाने में असफल रहा है । अगर वह इस क्षेत्र में जरा सा भी सफल हो जाता तो दुःखी नहीं होता । इसीलिए संसार को दुखालय कहा जाता है । संसार को जानने के लिए संसार से अनासक्त होना पड़ता है, उससे दूर होना पड़ता है । दूर होते ही संसार की वास्तविकता प्रकट हो जाती है ।

          स्वरचित संसार टिका है, आपके स्वार्थ पर । केवल आपके ही स्वार्थ पर नहीं बल्कि प्रत्येक सांसारिक प्राणी के स्वार्थ पर । जब आप संसार से अपना स्वार्थपना छोड़ देते हैं अर्थात् संसार से स्वयं को अलग कर लेते हैं, तब प्रत्येक सांसारिक प्राणी को चोट पहुँचती है । फिर देखिए ! वह प्राणी आपसे सांसारिक सम्बन्ध कैसे निभाता है ? सभी सांसारिक सम्बन्ध स्वार्थ पर ही तो टिके है, स्वार्थ पूरा होने की संभावना समाप्त हुई नहीं कि सम्बन्ध समाप्त हुआ । जब तक हम स्वार्थवश संसार से जुड़े हैं, तब तक उसकी वास्तविकता को जान पाना असम्भव है । संसार से दूर होते ही, उससे भिन्न होते ही संसार को जान लेंगे ।

         प्रश्न है कि संसार को तो इस प्रकार जाना जा सकता है परन्तु परमात्मा को जानने के लिए क्या करना होगा ? चलिए ! लेख को समापन की ओर ले जाते हुए इस प्रश्न पर भी विचार कर लेते हैं ।

          परमात्मा को जानने के लिए संसार से सम्बन्ध समाप्त कर लेना ही पर्याप्त है । स्वामीजी कहते हैं कि संसार से भिन्न होकर संसार को जाना जा सकता है और परमात्मा से अभिन्न होकर परमात्मा को । संसार से भिन्न हो जाना ही परमात्मा से अभिन्न होना है । इस ब्रह्मांड में दो ही मुख्य हैं - एक तो प्रकृति और दूसरा पुरुष । प्रकृति से विमुख पुरुष परमात्मा के सम्मुख स्वतः ही हो जाता है । प्रकृति से दूर होकर प्रकृति का वर्णन किया जा सकता है क्योंकि प्रकृति को जानने का साधन स्वयं प्रकृति ने ही आपको दिया है । प्रकृति के दिए साधन से परमात्मा को जाना नहीं जा सकता क्योंकि ये साधन ससीम का वर्णन करने के लिए हैं, असीम का वर्णन करने के लिए नहीं ।

         मनुष्य के नेत्रों की भी एक सीमा है, उससे दूर वह नहीं देख सकती । इसी प्रकार बुद्धि की भी एक सीमा है, वह कल्पना भी केवल उसी की कर सकती है, जिसको उसने अपनी ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से जीवन में कम से कम एक बार अनुभव किया है । आपने पक्षियों को आसमान में उड़ते देखा है, ऐसे में आप कल्पना भी किसी पक्षी की ही कर सकते हैं उससे भिन्न किसी ‘न देखी, न सुनी’ वस्तु/ जीव की कल्पना नहीं कर सकते ।

             परमात्मा का अनुभव अतीन्द्रिय अनुभव है, उसका वर्णन करने को वाणी भी मौन हो जाती है । परमात्मा की कल्पना करते हुए उसका जो भी वर्णन किया जा सकता है, वह हमारे देखे, सुने, छुए, सूंघे अथवा स्वाद के अनुभव पर आधारित होता है । परन्तु क्या परमात्मा इतने से हैं ? नहीं ! परमात्मा इतने से और ऐसे नहीं हो सकते । वे जैसे हैं, वैसे हैं, कैसे भी हैं - कल्पनातीत हैं । इसीलिए उनके बारे में कहा गया है - “ यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं होई” अर्थात् नेति-नेति ।

सार-संक्षेप 

                      “वासुदेव सर्वम्” अर्थात् सब कुछ और सब जगह एक परमात्मा ही है । जब एक परमात्मा ही है तो “सर्वम्” कहने का भी कोई औचित्य नहीं है । कल, आज और कल, सत्, असत् और इन दोनों से परे, जहां तक दृष्टि जाती है अथवा नहीं भी जाती सर्वत्र और सर्वदा एक परमात्मा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । उसको टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट कर देखना सही देखना नहीं है । अलग-अलग रूपों में देखते हुए किसी एक को परमात्मा मान लेने तक का आग्रह ही मनुष्य की बुद्धि में समा सकता है परंतु विवेकवान की दृष्टि में परमात्मा केवल इतने से ही नहीं है । जितनी दूर दृष्टि जाती है, जितनी सीमा तक आपने उस असीम को माना है, वह सब व्यर्थ है क्योंकि भौतिक दृष्टि उनको देखने में सक्षम नहीं है और न ही उनको किसी एक सीमा में बांधा जा सकता है ।

                 उनका जो भी वर्णन किया जाता है, वह उस मूल को जानने की तरफ़ संकेत मात्र है । भरसक प्रयास करने के उपरांत भी उनको जानना संभव नहीं है और न ही कोई वाणी अथवा लेखनी ऐसी है, जो उसका समग्र रूप से वर्णन कर सके । जितना भी उनका वर्णन किया गया है, वह उनके एक छोटे से अंश का ही किया जा सका है, संपूर्ण का नहीं । ज्ञानी व्यक्ति के लिए यह वर्णन संकेत मात्र है, जिससे वह उन्हें उसी प्रकार जान सकता है जैसे जल की एक बूँद से समुद्र को जाना जाता है । फिर भी एक बूँद के वर्णन से समुद्र का वर्णन नहीं हो सकता । आत्मा, परमात्मा का अंश अवश्य है, परंतु वह परमात्मा तभी हो सकती है जब वह स्वयं अपने मूल स्रोत में समा जाए, अपने आपको परमात्मा में विलीन कर दे । जिस दिन ऐसा हो जाएगा, परमात्मा का वर्णन करने के लिए वाणी और लेखनी दोनों ही मौन हो जायेंगी क्योंकि परमात्मा अगम है, असीम है उनका वर्णन नहीं किया जा सकता ।

              इसीलिए संतजन कहते हैं कि -   

                 “यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं होई । 

                             ताँके परे अगम है सोई ।।”

               “नेति - नेति”

         परमात्मा ज्ञेय अवश्य है परन्तु साथ ही अगम भी है अर्थात् वर्णनातीत है । उस असीम और अगम का वर्णन करने में लेखनी भी असमर्थ है । लेखनी की भी वर्णन करने की एक सीमा होती है ।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल

।। हरिः शरणम् ।।

Tuesday, September 3, 2024

मृत्यु-बोध

 मृत्यु - बोध 

    श्री नारायण स्वामी कहते हैं -

        दो बातन को भूल मत, जो चाहत कल्याण ।

         नारायण एक मौत को, दूजो श्री भगवान ।।

                      (अनुराग-रस -81)

अर्थात् अगर अपना कल्याण चाहते हो तो इन दो बातों को कभी न भूलें, एक तो शरीर की होने वाली मृत्यु को और दूसरी परमात्मा को ।

           इस ब्रह्मांड में दो ही सत्य है - एक तो असत् संसार का सत्य अर्थात् शरीर की मृत्यु होना और दूसरा  परमात्मा । इसलिए दोनों को स्मृति में सदैव बनाए रखना आवश्यक है । इसमें से किसी एक का भी बोध हो जाए तो दूसरे का बोध हो जाना सुगम हो जाता है । मृत्यु को सदैव अपनी स्मृति में बनाए रखने से व्यक्ति शरीर और संसार की नश्वरता को कभी नहीं भूलता । व्यक्ति को मृत्यु-बोध हो जाना ही उसे आत्म- बोध की ओर ले जाता है ।

           हम सब इस शरीर की मृत्यु हो जाने की कल्पना मात्र से ही भयग्रस्त हो जाते हैं । जिसने इस संसार में जन्म लिया है, उसका मरना भी निश्चित है । हमारा शरीर भी इस नियम से परे नहीं है । फिर मृत्यु की कल्पना से ही हम क्यों सिहर उठते हैं ?  इसके पीछे हमारा अज्ञान है । वास्तव में केवल शरीर मरता है, हम नहीं । हम अमर हैं । जिस दिन हमें अपनी अमरता और इस शरीर की मृत्यु का ज्ञान हो जाएगा, तब हमारा मृत्यु-भय भी समाप्त हो जायेगा । 

         मृत्यु का सत्य होना संसार की नश्वरता को सिद्ध करता है । यह ज्ञान हो जाने से नश्वर संसार और शरीर में हमारी आसक्ति और ममता समाप्त हो जाएगी और जो शेष रहेगा वह शाश्वत परमात्मा होगा । इससे स्पष्ट होता है कि मृत्यु-बोध ही आत्म-बोध का रास्ता प्रशस्त करता है ।

       अभी गत दिनों की बात है, घर के सामने से एक शव-यात्रा जा रही थी । यात्रा में शामिल सभी एक स्वर में बोलते जा रहे थे - “राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है” । जैसा कि संसार में होता आया है, शाम तक हम लोग उस शव-यात्रा को लगभग भूल चुके थे । पड़ौस के कुछ बच्चे हमेशा की तरह गली में आपस में कोई खेल खेल रहे थे । उनकी माताएँ घर के मुख्य द्वार पर बैठी आपस में बतिया रही थी । तभी चार-पाँच वर्ष का एक बालक तुतलाती आवाज़ में बोल पड़ा - ‘राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है’ । उसकी माता ने तत्काल ही ‘ऐसा नहीं बोलते’ कहकर उसको डाँटकर चुप करा दिया ।

            मैं उसी समय अपने घर के भीतर प्रवेश कर ही रहा था कि बच्चे पर पड़ रही डाँट को सुनकर मुस्कुराने लगा । मुझे मुस्कुराते देखकर उसकी माँ बोल पड़ी कि आप हंसे क्यों ? मैंने कहा कि आपका बच्चा सही ही तो कह रहा था कि राम नाम सत्य है । सही बात कहने पर भी आपने बच्चे को डाँटा, इस कारण से मुझे हंसी आ गई । बच्चे को असत्य बोलने पर तो सभी डाँटते हैं परंतु आपने तो उसको सत्य बोलने पर डाँटा । इतना कहकर मैं घर में प्रवेश कर गया । वह पीछे से बड़बड़ाती रही कि किसी की मृत्यु पर बोले जाने वाले वाक्य को भला कोई साधारण समय में भी बोलता है ?

          एक महिला का ऐसा व्यवहार उसके मृत्यु-भय को प्रदर्शित करता है । सब जानते हैं कि जिसने जन्म लिया है, उसकी एक न एक दिन मृत्यु होनी है, फिर भी कोई मरना नहीं चाहता । कोई भी मृत्यु को सहज भाव से स्वीकार नहीं करता । जिस दिन हमें मृत्यु-बोध हो जाएगा अर्थात् जिस दिन हम मृत्यु को भली भाँति समझ लेंगे, उस दिन हमारे मन से मृत्यु का भय निकल जाएगा और हम किसी भी दिन आने वाली मृत्यु का खुले दिल से स्वागत करेंगे ।

         प्रत्येक जीव की सबसे बड़ी विडम्बना है कि वह एक ही शरीर में सदैव रहना चाहता है, मरना नहीं चाहता । वह जीना चाहता है क्योंकि उसे अपना शरीर सबसे प्रिय लगता है । सुअर भले ही गंदगी में रहता हो, गंदगी खाता हो परंतु शरीर को छोड़ने से वह भी डरता है क्योंकि उसे भी अपना शरीर प्रिय लगता है । शरीर प्रिय इसलिए लगता है क्योंकि इस शरीर के माध्यम से ही वह संसार के समस्त विषय-रस का पान कर रहा है । ये विषय उसे सुखानुभूति कराते हैं । प्रत्येक शरीर के रहने की भी एक निश्चित सीमा होती है, वह सदैव के लिए तो रह नहीं सकता । इस एक शरीर के जीवन को ही सम्पूर्ण जीवन मान लेना ही जीव की सबसे बड़ी भूल है । 

       शरीर की मृत्यु के बाद भी जीवन है, यह वर्तमान शरीर के रहते सुगमता से समझ में नहीं आता । इसका कारण है कि जीव उसी शरीर को ही अपने लिए उपयुक्त पाता है । हमें यह समझना होगा कि जीवन तब तक है, जब तक विभिन्न शरीरों से जन्म लेने की अनंत श्रृंखला समाप्त नहीं हो जाती । जन्म और मृत्यु, ये दो शब्द ऐसे हैं, जो हमारे जीवन से गहरे जुड़े हैं । प्रत्येक शरीर का संसार में आना उसका जन्म लेना है और शरीर का समय पाकर क्षीण होते होते समाप्त हो जाना उसकी मृत्यु है । जीवन केवल एक जन्म के शरीर तक सीमित नहीं है । जीवन तो अनेक शरीरों के माध्यम से चलने वाला शाश्वत सत्य है । इसी प्रकार प्रत्येक शरीर की मृत्यु होना भी एक शाश्वत सत्य है । 

             मनुष्य-जन्म में भी जीवन को दो प्रकार से जिया जा सकता है - सुषुप्त रहकर अथवा चैतन्य होकर । सुषुप्ति का जो जीवन है वह सदैव जीने की इच्छा रखता है । जीव जीवनभर अपने शरीर को सुरक्षित रखने की जुगत में ही लगा रहता है । मनुष्य का शरीर भी अन्य प्राणियों के शरीर से जरा भी भिन्न नहीं है । जैसे संसार के सभी प्राणियों का शरीर एक दिन मृत्यु को प्राप्त होता है, उसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी एक दिन मरेगा ।

        शरीर का मरना जीव का मरना नहीं है, इस बात को कोई सहज ही स्वीकार नहीं करता । वह इस शरीर को अक्षुण बनाए रखना चाहता है, यह जानते हुए भी कि इस शरीर का धीरे-धीरे क्षय ही होना है । मनुष्य के भय का कारण उसकी इस एक शरीर में ही जीते रहने की इच्छा है । जब आपके समक्ष किसी कार्य को पूरा करने की एक निश्चित सीमा होती है, तब आप उस कार्य को जागरूक रहकर निश्चित समय में पूरा कर लेते हैं । इसका अर्थ है कि आप सोए हुए नहीं हो । सदैव जाग्रत रहना ही जीवन में आवश्यक है ।

         दूसरे प्रकार का मनुष्य-जीवन चैतन्य का जीवन है । चैतन्य जीवन केवल वही व्यक्ति जी सकता है, जिसको मृत्यु का बोध हो गया हो । मृत्यु का बोध ही आपको आत्म-बोध के द्वार तक ले जाता है । इस शरीर का एक न एक दिन अन्त होना निश्चित है, जब इस बात का आपको ज्ञान हो जाता है, तब आपके जीवन की दशा और दिशा दोनों ही बदल जाती है । यहीं से आप आत्म-बोध को उपलब्ध होना प्रारम्भ करते हैं । आत्म-बोध का जीवन ही चैतन्य-जीवन है ।

        श्री नारायण स्वामी यही तो कह रहे हैं कि अगर आप अपना कल्याण चाहते हैं तो मौत और भगवान, इन दोनों को कभी भी न भूलें । ये बातें सदैव स्मृति में बनी रहे, उसी को तो बोध होना कहते हैं - मृत्यु-बोध और आत्म-बोध । प्रश्न उठता है कि मनुष्य को अपने जीवन में मृत्यु-बोध क्यों नहीं हो पाता ? मृत्यु-बोध न हो पाने का सबसे बड़ा कारण है - व्यक्ति का अपने अहम् के साथ जीना । शरीर को ही स्वयं का होना मान लेना ही मनुष्य का अहम् है । अहंकारी व्यक्ति सोचता है कि “मैं” ही संसार में सर्वश्रेष्ठ हूँ, दूसरा मेरे समकक्ष तो क्या, कहीं आस-पास तक भी नहीं है । स्थूल शरीर मात्र एक फूंक (प्राण) से संचालित होता है । जिस दिन प्राण-पखेरू उड़ जाएँगे, उस दिन यह केवल मिट्टी बनकर रह जाएगा और सगे-सम्बन्धी तुरन्त ही उसे फूंक (जला) भी आएँगे ।

             विडंबना है कि स्थूल शरीर में आसक्त व्यक्ति इस फूंक (प्राणवायु) के प्रवाह को तो भूल जाता है और एक नई फूंक (अहंकार) पाल बैठता है । स्थूल शरीर में महत्व प्राण का है अर्थात् इस शरीर का महत्व तभी तक है जब तक उसमें प्राण का प्रवाह हो रहा है । यह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है और परमात्मा के ही आश्रित है । अतः शरीर के रहते व्यक्ति को अहम् (आत्मा) का बोध होना आवश्यक है, केवल अहम् (मैं) अर्थात् अहंकार में उड़ते रहना उसकी भयंकर भूल है ।

     आधुनिक विज्ञान इस शरीर के बारे में जितना जानता है, उससे अधिक सूक्ष्मता के साथ हमारे ऋषि-मुनियों ने इसका वर्णन किया है । विडम्बना है कि अभी भी इस शरीर को जानने के लिए आयुर्विज्ञान संस्थान में विद्यार्थी किसी मृत देह का विच्छेदन करते हुए उसकी सूक्ष्म स्थूलता को समझने का प्रयास ही कर रहे हैं । आयुर्विज्ञान यह नहीं जानता कि स्थूल शरीर के अतिरिक्त दो शरीर और भी होते हैं - सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर । सूक्ष्म-शरीर में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार आते हैं, जो अंतःकरण चतुष्ट्य कहलाते हैं । बाह्य करण में स्थूल शरीर की दस इंद्रियाँ आती हैं । कारण शरीर हमारे वे संस्कार है, जोकि नया स्थूल शरीर प्राप्त कराने में कारण बनते है । मनुष्य जीवन का उद्देश्य तो इन तीनों शरीरों से भी परे चले जाना है ।

           तीनों शरीरों से भी अधिक सूक्ष्मता की बात करें तो ऋषियों ने शरीर  के पाँच कोश बताए हैं - अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनन्दमय कोश । इन पाँच कोशों को जो जीवन देता है वह परमात्मा है । जीवात्मा परमात्मा का ही अंश है जो इन पाँचों कोशों में तरंगों के रूप में सतत प्रवाहित होती रहती है । परमात्मा इस तरंग (जीवात्मा) का मूल स्रोत है । इन पांचों कोशों से मुक्त हो जाना केवल मनुष्य जीवन में ही संभव है ।

          अन्न से स्थूल शरीर का निर्माण होता है, प्राण से उस शरीर का संचालन होता है । मन और बुद्धि सूक्ष्म शरीर (मनोमय और विज्ञानमय कोश) के अन्तर्गत है, जिनका उपयोग कर जीव सुख-दुःख का भोग करता है । वहीं विवेक का सदुपयोग कर मनुष्य आनन्दमय कोश के माध्यम से आनन्द को उपलब्ध होता है ।

            हमारा यह लेख चूँकि स्थूल शरीर की मृत्यु का विवेचन कर रहा है अतः इस लेख में हम सीमा का अतिक्रमण नहीं करेंगे अर्थात् केवल शरीर की मृत्यु तक ही विवेचन को सीमित रखेंगे । मृत्यु जो होती है वह स्थूल शरीर की होती है और यह स्थूल शरीर प्राण पर आश्रित रहता है, इसलिए प्राणमय कोश की अल्प रूप से चर्चा करना आवश्यक है । जिस दिन प्राण स्थूल शरीर का साथ छोड़ जाते हैं, तत्काल ही उसकी मृत्यु हो जाती है । प्राण को वायु भी कहा जाता है । प्राण पाँच प्रकार के हैं, जो इस शरीर के प्रत्येक कोश में विचरण करते हुए उसे जीवन्त बनाए रखते हैं । ये पाँच प्राण हैं - प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान । इन प्राणों में होने वाले विकार ही शरीर में व्याधि पैदा करते हैं । प्राण (वायु/फूंक) की इस स्थूल शरीर में क्या भूमिका है ?

           आइए ! एक दृष्टान्त के माध्यम से चर्चा को आगे बढ़ाते हुए इसे समझने का प्रयास करते हैं । एक विरक्त त्यागी सन्त थे । उनका एक शिष्य था । गुरु से ज्ञान प्राप्त कर शिष्य बहुत आगे बढ़ गया । कहने का अर्थ है कि गुरु गुड़ ही रहा और चेला शक्कर हो गया । जीवन में धन के अहंकार के बाद ज्ञान का अहंकार दूसरा सबसे बड़ा अहंकार है । इस शिष्य को भी अपने ज्ञान का अहंकार हो गया । गुरु ने ज्ञान को जिया था जोकि उनके आचरण में स्पष्ट झलकता था, परन्तु शिष्य ऐसे आचरण से कोसों दूर था । निश्चित है कि शब्दों का मायाजाल बुनने में शिष्य अपने गुरु से चार कदम आगे ही रहा होगा । 

              जो शब्दों से श्रोताओं को बाँधने की क्षमता रखते हैं, जगत् उसकी प्रशंसा करता ही है । इस प्रकार उस शिष्य के व्याख्यान की भी भूरि भूरि प्रशंसा होने लगी । कोरे शब्द बंधन पैदा करते हैं, अतः प्रत्येक प्रकार के शब्द-जाल से भी मुक्त होना आवश्यक है । गुरु ने शिष्य को बहुत समझाया कि जब तक ज्ञान को आचरण में नहीं लाया जाएगा तब तक कहे जाने वाले सभी शब्द अर्थहीन होंगे । कोरे शब्दों से श्रोताओं के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाया जा सकता । जब तक तत्व-बोध नहीं हो जाता तब तक व्याख्यान देना उचित नहीं है । व्याख्यान देना कोई अच्छी चीज नहीं है और न ही कोई बड़ी बात है । व्याख्यान देना व्यक्ति में ज्ञानी होने का अहंकार ही पैदा करता है । ऐसे अहंकार से कोई कोई ही बचता है ।

      शिष्य ने सोचा कि गुरु मेरी प्रशंसा को पचा नहीं पा रहे हैं । वास्तविकता यह है कि अपने शिष्य की प्रगति को देखकर प्रत्येक गुरु को प्रसन्नता ही होती है, जलन होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता । हाँ, शिष्य की ज्ञान के क्षेत्र में वास्तविक प्रगति होनी चाहिए । गुरु के समझाने का शिष्य पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ा । उसने गुरु का सान्निध्य छोड़ कहीं दूर चले जाने का निश्चय किया । मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही होती है कि वह चूहे की भाँति हल्दी की छोटी सी गाँठ मिलते ही अपने आपको पंसारी समझने लगता है । ज्ञान अनन्त है और उसकी पूर्णता तक पहुँचने के लिए कई मानव जीवन भी छोटे पड़ जाते हैं ।

          शिष्य अपने आपको गुरु से अधिक ज्ञानी समझने लगा था । गुरु से दूर चले जाना उसने उचित समझा । यह सोचकर एक दिन अपने गुरु को वहीं छोड़ वह शिष्य दूसरी जगह जाकर व्याख्यान देने लगा । उसमें वाक्-चातुर्य तो था ही, उससे प्रभावित होकर आस-पास के सब लोग सुनने के लिए उसके पास आने लगे । व्याख्यान सुनने के लिये बड़े-बड़े धनी लोग यहाँ तक कि स्वयं राजा भी वहाँ आते और प्रभावित होते । सभी उसके व्याख्यान की भूरि-भूरि प्रशंसा करते थे । ऐसा होना कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि वाक् चातुर्य किसी को भी अपने जाल में उलझा सकता है ।

          चारों ओर शिष्य की प्रशंसा हो रही थी । गुरु तक भी इस बात की खबर पहुँची । बाबाजी को अपने शिष्य पर बड़ी दया आई कि इस प्रकार तो मेरा शिष्य फँस जाएगा । वे सोच रहे थे - “कहाँ तो वह अपने कल्याण की राह पर अग्रसर था और कहाँ अब शब्दों के जाल में उलझता जा रहा है । व्याख्यान तो शब्दों को रोचक तरीक़े से श्रोताओं के समक्ष परोसने की एक कला मात्र है । व्याख्यान देने का मनुष्य के कल्याण से प्रत्यक्ष रूप से कोई सम्बन्ध नहीं है । जैसे तैसे कैसे भी हो, शिष्य को पुनः सही मार्ग पर लाना ही होगा ।” किसी भी गुरु का अपना कोई निजी स्वार्थ नहीं होता । गुरु तो संसार के प्रत्येक जीव का कल्याण चाहते हैं, फिर वह तो उनका शिष्य था ।

        ऐसा सोचकर एक दिन बाबा जी अपने शिष्य के पास पहुँच गए । शिष्य ने देखा तो बोल पड़ा – “अरे ! हमारे गुरु महाराज पधारे हैं ।”  उसने उठकर गुरु को साष्टांग प्रणाम किया । लोगों ने सुना तो सब बड़ी संख्या में इकट्ठे हुए । उनका बड़ा आदर हुआ, प्रशंसा हुई, महिमा गाई गई कि हमारे महाराज के गुरुजी हैं । देखो, कितने बड़े सन्त हैं ? जब उनका शिष्य ही व्याख्यान देने में इतना पारंगत है तो गुरुजी तो बहुत पहुँचे हुए होंगे । हमारा सौभाग्य है कि एक महान संत हमारे यहाँ पधारे हैं । सभी गुरु और शिष्य दोनों की प्रशंसा कर रहे थे । गुरु को अपनी हो रही प्रशंसा से कोई लेना-देना नहीं था, उन्हें तो केवल अपने शिष्य को सही मार्ग पर लाना था । व्यक्ति को अगर गुरु से सही मार्गदर्शन मिल जाए तो उसकी दशा और दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है । ये गुरु भी अपने शिष्य के जीवन को परिवर्तित करने का कार्य करने जा रहे थे ।

        एक दिन गुरुजी के सम्मान में बड़ी सभा बैठी । उसमें राजा भी आये हुए थे । अचानक बाबाजी के मन में न जाने क्या आई कि उठकर राजा के पास गये और जोर से ‘भर्र ........’ करके अपानवायु छोड़ दी । लोगों ने देखा कि बाबाजी को तो हम ज्ञानी समझ रहे थे, परन्तु इनमें तो सभा में बैठने तक की सभ्यता नहीं है । ऐसा सोचते हुए सभी लोग उठ गए कि बाबाजी में कुछ आना-जाना नहीं है । हम बाबाजी के बारे में कितना अच्छा सोच रहे थे, ये तो हमारी सोच के ठीक विपरीत निकले । चेला तो बहुत अच्छा है, पर गुरु में दम नहीं है । लोग बड़े नाराज हुए, राजा भी नाराज हुए ।

               प्रतिदिन सभा में गुरु और शिष्य दोनों ही बैठते परन्तु सब शिष्य को ही देखते रहते, गुरु की तरफ़ उचटती दृष्टि भी नहीं डालते । अब लोग केवल शिष्य का प्रवचन सुनते, उनके गुरु की तरफ़ कोई झांकता तक नहीं था । कई दिनों तक बाबाजी की इसी प्रकार उपेक्षा होती रही । एक दिन गुरुजी ने वहाँ से जाने की इच्छा प्रगट की । शिष्य के प्रवचन के बीच ही बाबाजी ने कहा कि आज हम यहाँ से चले जाएँगे । उनके जाने की बात सुनकर लोग मन में बड़े प्रसन्न हुए कि अच्छी बात है, आफत मिटी । महाराज के गुरुजी हैं, इसलिए जाते-जाते उनका थोड़ा आदर तो कर दें । ऐसा समझकर बहुत से लोग बाबाजी को गांव की सीमा तक पहुँचाने उनके साथ चलने लगे । 

               गुरु को विदा करने शिष्य और गाँव वाले कुछ दूर उनके साथ चले जा रहे थे । रास्ते में एक मरी हुई चिड़िया पड़ी थी । बाबा जी ने उस चिड़िया को अपनी अँगुलियों से पकड़कर ऊपर उठा लिया और सबको दिखाने लगे । लोग देखने लगे कि देखें ! बाबाजी इस मरी चिड़िया का क्या करते हैं ? बाबाजी ने एक फूँक मारी तो चिड़िया ‘फुर्र .......’ करके उड़ गयी । 

            जब साधक सिद्ध की अवस्था तक पहुँचता है, तब उसके जीवन में ऐसी कई सिद्धियाँ आती है । जो इन सिद्धियों का दुरुपयोग करने लगता है, वह मान-सम्मान तो पा जाता है परंतु आत्म-बोध से चूक जाता है । परंतु गुरु तो प्रत्येक मान-सम्मान से परे थे, उनको तो अपने शिष्य को सही राह दिखानी थी ।

                बाबाजी के फूंक मारते ही इधर तो चिड़िया का उड़ना हुआ और उधर उनके जो कट्टर आलोचक थे, वही लोग वाह-वाह करने लगे कि ये तो बड़े सिद्ध महात्मा हैं । हमने तो इनको कुछ भी नहीं समझा था । वाक़ई ये तो शिष्य से भी बहुत आगे हैं । अब तो चारों तरफ बाबा जी की जय-जयकार होने लगी । जयकारे लगाती भीड़ में खड़ा शिष्य स्वयं को उपेक्षित अनुभव कर रहा था । 

          सांसारिक भीड़ तो चमत्कारों की ग़ुलाम होती है । उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि चमत्कार के प्रदर्शन का तत्व-ज्ञान से कोई नाता नहीं है । चमत्कार तो आधुनिक विज्ञान के पास भी कम नहीं है, फिर भी वह भौतिक जगत् से अभी तक बाहर कहाँ निकल पाया है ? जीवन में आत्म-बोध के लिए ऐसे चमत्कारों की दुनियाँ को पीछे छोड़ कहीं आगे निकलना होगा नहीं तो इस माया की भूलभुलैया में यहीं इसी संसार में भटकते रह जाएंगे ।

           जयजयकार के मध्य बाबाजी ने शिष्य को अपने पास बुलाया और कहा कि तू कुछ समझा कि नहीं ? शिष्य बोला – ‘इसमें क्या समझना है महाराज ?’  बाबाजी बोले – “इस दुनिया की क्या कीमत समझी है तूने ? यह सब दुनिया केवल एक फूँक की है । एक फूँक मारने (भर्र….) से लोग दूर भाग जाय और एक फूँक मारने (फ़ुर्र……) से पास आ जाय । जो पल में तोला पल में माशा हो ऐसी फूँक की क्या इज्जत है ? इसमें कोई तत्व नहीं है । इसलिये मान-बड़ाई की फूंक में न फँसकर भगवान् का भजन करो । ऊँचे आसन पर बैठने से, व्याख्यान देने से कोई बड़ा नहीं हो जाता । शरीर की वाक् इंद्रिय से मिली वाक् पटुता को लेकर इतने अहंकारी भी न बनो कि कल्याण के मार्ग से भटक जाओ ।” 

             अहंकार की फूंक व्यक्ति को शरीर के साथ बांध देती है । वह नश्वर देह को ही सर्वस्व समझने लगता है । शरीर का मोह उसे भय की ओर ले जाता है । भय से मुक्ति तभी हो सकती है, जब हमें शरीर की नश्वरता का ज्ञान हो । संसार में प्रतिदिन लाखों लोग शरीर छोड़ते हैं । कुछ की देह को हम स्वयं शमशान तक पहुँचाने भी जाते हैं, फिर भी कुछ नहीं समझते । फूंक (प्राण) निकलते ही फुंक (जल) जाना इस देह की नियति है । अतः इस देह और इंद्रियों की दिखाई पड़ रही विशेषताओं में कभी भी आसक्त नहीं होना चाहिए ।

           आकर्षक शब्दों से मान-सम्मान प्राप्त करना अलग बात है और शब्दों से लोगों के भीतर परिवर्तन लाना अलग । श्रोता, वक्ता के आचरण का अनुकरण करते हैं न कि उसके द्वारा कहे गए शब्दों का । गुरु की बात सुनकर शिष्य समझ गया कि ज्ञान को आचरण में लाए बिना केवल प्रवचन देने से लोगों में परिवर्तन नहीं लाया जा सकता । वह दिन-रात आचरण के स्तर पर अपनी और अपने गुरु की तुलना करता रहता । उसे गुरु बड़े सौम्य और शांत प्रतीत होते, वे किसी भी बात पर तनिक से भी विचलित नहीं होते । गुरु की तुलना में उसे कभी-कभी अस्थिर मानसिक दशा का सामना करना पड़ता था । उसको जरा-जरा सी बात पर हर किसी पर क्रोध आ जाता था, जिससे बेवजह वह अपने साथ वालों से झगड़ पड़ता था । छोटी सी बात को लेकर उसकी रातों की नींद उड़ जाती थी । कहने का अर्थ है कि गुरु उससे ठीक विपरीत अवस्था में स्थिर चित्त और बहुत शान्त थे ।  

             विद्वता के स्तर पर भले ही दोनों एक समान हों परंतु आचरण के स्तर पर गुरु-शिष्य में रात-दिन का अन्तर था । इस अन्तर का कारण विद्वता को ज्ञान में परिवर्तित करने की क्षमता में छिपा है । शास्त्रों को पढ़कर विद्वान कोई भी हो सकता है परन्तु ज्ञानी वही होता है जिसके आचरण से विद्वता झलकती हो । हम पुस्तकें पढ़ते हैं, संतों का सान्निध्य भी लेते हैं फिर भी वह विद्वता हमारे आचरण में दिखलाई नहीं पड़ती । इसका कारण है कि हमने पुस्तकें पढ़ी अवश्य हैं परंतु उनमें लिखी बातों को अपने जीवन में उतारा नहीं है । उनको जीवन में उतारते ही व्यक्ति का आचरण बदल जाता है । अनुकरण उसी व्यक्ति का किया जाता है, जिसका आचरण विद्वता के अनुरूप हो ।

         आज के समय प्रवचन के माध्यम से ज्ञान बाँटने वाले गली-गली घूम रहे हैं, फिर भी संसार के लोग व्यथित ही नज़र आ रहे हैं । कारण यही है कि आधुनिक बाबा केवल धन-जन को ही अपने साथ जोड़ने में लगे हैं । जिसने धन और संसार की आसक्ति नहीं छोड़ी वह इस सम्बन्ध में कितना ही ज्ञान क्यों न दे दे, वह ज्ञान अपना प्रभाव नहीं छोड़ सकता । वक्ता को पहले स्वयं को परिवर्तित करना होगा, तभी श्रोताओं से परिवर्तन की आशा की जा सकती है ।

        बाबाजी अपने शिष्य को वापस तो ले आए परन्तु शिष्य को स्वयं में सुधार करने का कोई मार्ग दिखलाई नहीं पड़ रहा था । गुरु भी शिष्य को तभी ज्ञान देता है, जब उसे शिष्य में ज्ञान प्राप्त करने की ललक दिखलाई पड़े । इसके लिए शिष्य को ही गुरु के पास जाकर, उन्हें प्रणाम कर इस सम्बन्ध में पहल करते हुए प्रश्न पूछना होगा ।

               एक दिन एकांत पाकर शिष्य ने गुरु से उनके शान्त रहने का रहस्य पूछ ही लिया । प्रश्न सुनकर कुछ समय के लिए गुरु मौन हो गए । अचानक उन्होंने शिष्य को कहा कि तनिक अपना हाथ तो दिखाओ । हाथ देखते समय गुरु के चेहरे पर परिवर्तित हो रहे भाव को शिष्य अनुभव कर रहा था । बाबाजी ने हाथ देखना छोड़कर दुःखी होते हुए शिष्य को कहा कि कल सुबह तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । मृत्यु ! वह भी इतनी जल्दी कि कुछ करने का समय तक हाथ में नहीं । इतना सुनकर शिष्य हतप्रभ रह गया । वह समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहे, क्या करे ? मरी चिड़िया को अपनी एक फूंक से उड़ा देने वाला गुरु ऐसे समय क्या अपने शिष्य की तनिक भी सहायता नहीं कर सकता ?

          गुरु से अपने शिष्य के मनोभाव छिपे नहीं रह सके । उन्होंने शिष्य को समझाते हुए कहा- “ पुत्र ! इस संसार में जिसने जन्म लिया है, उसको एक दिन मरना अवश्य है । जीवन में साधना से सिद्धियाँ प्राप्त कर लेना कोई कठिन कार्य नहीं है । परंतु उन सिद्धियों का दुरुपयोग करना अथवा सिद्धियों को पाकर वहीं ठिठक कर खड़े रह जाना इस मनुष्य जीवन का उद्देश्य नहीं है । उस दिन मरी चिड़िया को फूंक से उड़ा देने का उद्देश्य तुम्हें मनुष्य-जीवन और इस संसार की वास्तविकता से परिचय कराना था, सिद्धियों का दुरुपयोग करना तो क़तई नहीं था ।” इतना कहकर बाबाजी मौन हो गए ।

          शिष्य समझ गया कि गुरुजी अपनी सिद्धियों का दुरुपयोग कर उसकी संभावित मृत्यु को टालना नहीं चाहते । प्रकृति का जो विधान है, वह अटल है । किसी की मृत्यु को टालना संभव ही नहीं है । मृत्यु ही इस शरीर का एक मात्र सत्य है अन्यथा तो यह शरीर और संसार सब कुछ असत् है । शिष्य विद्वान तो था ही, मृत्यु के भय से उसमें ज्ञान का उदय होने लगा था । उसके सामने एक ही प्रश्न था कि वह अपने शरीर की संभावित मृत्यु के आने तक क्या करे ? सोच विचारकर उसने अपना अंतिम समय उस घर में परमात्मा का स्मरण करते हुए बिताने का निर्णय किया, जिसको कुछ समय पूर्व उसने सबसे लड़झगड़ कर छोड़ा था और बाबाजी के पास चला आया था ।

            उसने पक्का निर्णय किया, गुरु से आज्ञा ली और अपने घर लौट आया । घरवाले अचानक इस प्रकार उसके लौट आने पर विस्मित हुए परंतु पूर्व के तनाव को याद कर किसी ने उससे बात नहीं की । उसने अपने सभी परिवार जनों से मिलकर पूर्व में अपने द्वारा किए गए व्यवहार के लिए क्षमा माँगी । उसका अहंकार कहाँ तिरोहित हो गया, वह भी नहीं जान सका । घर के एक कोने में बने कमरे में गया और उसमें शान्त-चित्त होकर बैठ गया । तत्काल ही वह हरि: स्मरण में इतना लीन हो गया कि उसको समय और स्थान तक का ज्ञान भी नहीं रहा । प्रातःकाल होते ही उसकी देह छूटनी है, यह निश्चित जानकर उसने एक पल भी परमात्मा के स्मरण बिना व्यर्थ नहीं गँवाया । 

          इधर दूसरे दिन अपनी कुटिया में बाबाजी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संध्यावंदन से निवृत हो सूर्य की पहली किरण के साथ ही शिष्य के घर पहुंच गए । उन्होंने शिष्य के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया । दरवाज़ा खोलते ही अपने गुरु को देखकर शिष्य बाहर आकर उनके चरणों में गिर पड़ा । उसके नयनों से प्रेम की जलधारा लगातार बहती जा रही थी । उसने अपने गुरु का आभार व्यक्त किया । गुरुजी के कारण उसका एक ही दिन में हृदय परिवर्तित हो गया था ।

          बाबाजी ने अपने शिष्य को प्रेम से उठाकर गले लगा लिया । बोले -“पुत्र ! तुम्हारी अभी कोई मृत्यु नहीं होनी है । मैंने केवल तुम्हें शांत होने का उपाय बताने के लिए ऐसा कहा था । अब तो तुम समझ गए होंगे कि जिस दिन व्यक्ति मृत्यु को जान लेता है, उसका साक्षात्कार कर लेता है फिर उसके लिए संसार निरर्थक हो जाता है । यह मृत्यु-बोध ही मनुष्य की मुक्ति का मार्ग खोलता है । संसार और शरीर में रहते हुए सदैव मृत्यु को याद रखना सबसे महत्वपूर्ण है । इसलिए जीवन में सदैव मृत्यु को अपनी स्मृति में बनाए रखो, फिर संसार से विरक्त अपने आप हो जाओगे । संसार से विरक्ति ही आत्म-बोध तक ले जाती है । पिछले एक दिन में तुम्हें संसार का ध्यान एक पल के लिए भी नहीं आया न, यही संसार से मुक्ति है । मृत्यु-बोध होने से व्यक्ति संसार से मुक्त होकर परमात्मा के साथ योग कर लेता है ।” गुरु के ज्ञान ने शिष्य को संसार से मुक्त कर दिया । उसका अहंकार एक दिन में ही तिरोहित हो गया । 

        शरीर और संसार से आसक्ति का हट जाना ही जीवन्मुक्त होना है । संसार को स्मृति से बाहर निकाल फैंकना लगभग असम्भव है । संसार और उसके भोगों का रस हमें परमात्मा के आनन्दमय रस से वंचित कर देता है । इसीलिए संसार की नश्वरता का ज्ञान होना आवश्यक है । संसार और शरीर के साथ जुड़ जाना ही हमारे में अहंकार पैदा करता है । इस अहंकार का परिणाम भला अभिमन्यु पुत्र परीक्षित से बेहतर कौन जानता है ?

          राजा परीक्षित को ऋषि शमिक के पुत्र शृंगी ने सात दिन बाद तक्षक नाग के काटने से मृत्यु हो जाने का श्राप दिया था । परीक्षित का अपराध - ऋषिकुमार शृंगी के पिता शमिक ऋषि के गले में उन्होंने मृत सर्प डाल दिया था, जब वे समाधि की अवस्था में थे । राजा परीक्षित ने उनसे जल माँगा था । पद के मद में राजा परीक्षित समझ नहीं सके थे कि ऋषि ध्यानावस्था में हैं । स्वर्ण मुकुट सिर पर हो तो बड़े बड़ों का दिमाग़ घूम  हो जाता है, सोचने-समझने की क्षमता उसका साथ छोड़ जाती है ।

           किसी को पता चले कि सात दिन में उसकी मृत्यु होनी है तो क्या वह भयग्रस्त नहीं होगा ? शरीर का छूटना और शरीर को छोड़ना, दोनों विपरीत बातें हैं । मृत्यु के भय से शरीर छूटता है और शान्त रहकर शरीर छोड़ा जाता है । शरीर का छूटना आपके बिना चाहे होता है क्योंकि सभी प्रयास करने के बाद भी उसको जाने से आप रोक नहीं सकते । शांतिपूर्वक शरीर को छोड़ना, तभी सम्भव होता है जब आपको उसकी नश्वरता का ज्ञान हो गया हो । शरीर नश्वर है, इसको एक दिन जाना है, यह ज्ञान ही मृत्यु-बोध है । 

          मृत्यु के भय ने परीक्षित को व्यथित कर दिया । राज-पाट में उनका मन बिलकुल भी नहीं लग रहा था । उन्होंने अपना राज्य पुत्र जनमेजय को सौंप दिया । परीक्षित के लिए तो उस व्यथा से निकल कर शांत होने का उपाय जानना आवश्यक था क्योंकि ब्राह्मण ऋषिकुमार का दिया श्राप तो अटल है । मृत्यु-भय से मुक्त होने का एक मात्र उपाय है, मृत्यु-बोध । मृत्यु-बोध के लिए संत के सान्निध्य से परमात्मा की शरण में चले जाना होगा । परीक्षित ने राज-पाट त्याग दिया और वन को प्रस्थान कर गए । चलते-चलते गंगा किनारे पहुँच गए । शुकदेव महाराज भी आ गए, भागवत सुनाने और सुनने के लिए असंख्य ऋषि-मुनि भी । 

            मृत्यु को भले ही टाला न जा सकता हो परंतु मृत्यु का शान्त रहकर वरण तो किया ही जा सकता है । अशांत रहकर किया गया देह-त्याग ही मनुष्य को अनेक शरीरों में भटकाता है । इसलिए मृत्यु-भय और मृत्यु-बोध के अंतर को समझना आवश्यक है । भय की अवस्था में भी संसार से विरक्ति हो जाती है और बोध में भी । अंतर केवल इतना है कि भय में विरक्ति अस्थाई होती है, जिसे मसानिया वैराग कहा जाता है । मसानिया वैराग वह वैराग्य होता है जो मृत्यु-भय से केवल कुछ समय के लिए ही पैदा होता है । यह आग के उस भभके की तरह है जो घी डालने से कुछ समय के लिए ऊपर उठता है और तत्काल ही शान्त हो जाता है । बार-बार कितनी भी बार आग में घी डालें, भभका स्थाई रूप से उठ ही नहीं सकता । इसी प्रकार मौत से बार-बार सामना होने पर भी मृत्यु की वास्तविकता जानने में हम विफल हो जाते हैं ।

         प्रतिदिन नाते-रिश्तेदारियों में, मित्रों के परिवार में, आस-पड़ौस आदि में कोई न कोई मरता रहता है । जिनकी शवयात्रा में प्रायः साल में एकाध बार जाने का अवसर सबको मिला है । शमशान में अंतिम क्रिया पूरी होने में थोड़ा समय लगता ही है, उतने समय में देह की नश्वरता के बारे में जो गंभीर चिंतन वहाँ चलता है, उसको सुनने से प्रतीत होता है जैसे सभी के सभी अभी से ही राग-द्वेष से मुक्त हो चुके हैं । स्थाई वैराग्य उनमें आकार ले चुका है । शमशान से निकलते ही न जाने वह वैराग्य कहाँ चल जाता है ?  बाहर निकलते ही फिर से वही घोड़ा और वही मैदान ।

                इस अस्थाई वैराग्य का कारण है भय, मृत्यु का भय । शव देखकर संसार की असारता का जो भाव उठता है, वह समुद्र में उठी लहर के समान होता है । ज्वार के बाद लहर को वापस समुद्र में समाना होता ही है, उसी प्रकार तात्कालिक वैराग्य को भी संसार अपने में पुनः खींच लेता है । शमशान की सारी बात शव के जलते ही समाप्त । फिर से संसार के भोगों में लग जाना ही मनुष्य की नियति बन चुका है । 

              इस मरणधर्मा शरीर का कोई एक मात्र सत्य है तो वह है - मृत्यु । मृत्यु-भय एक अस्थाई भाव है । संसार में लौटने पर मृत्यु की विस्मृति हो जाती है । मृत्यु-बोध स्थाई भाव है, जिसमें मृत्यु सदैव स्मृति में बनी रहती है । संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक शरीर की मृत्यु होना निश्चित है । यह बात हम सभी जानते हैं ।

           क्या मृत्यु का इतना ज्ञान हो जाने के उपरांत हमारे जीवन में कोई परिवर्तन आया है ? गंभीरता से अवलोकन करेंगे तो पता चलेगा कि मृत्यु के सत्य ने जीवन में भय को ही पैदा किया है, बोध को नहीं । भय पैदा होने का एकमात्र कारण है कि इस संसार में शरीर धारण कर आने वाला कोई मरना ही नहीं चाहता ।

           यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न पूछा था कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है ? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया - “प्रतिदिन प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, फिर भी शेष प्राणी अनंतकाल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं । इससे बढ़कर दूसरा आश्चर्य क्या हो सकता है ?” यही हाल है सबका । जब कोई परिचित मरता है, तब क्षणिक वैराग्य अवश्य अवतरित होता है परन्तु फिर वही व्यक्ति सोचता है कि मैं अभी कहाँ मरने वाला ? वह समझ नहीं रहा है कि एक दिन उसे भी जाना है । वह दिन और समय, आज और अभी भी तो आ सकता है ।  

           गुरु के सान्निध्य ने तो शिष्य को मृत्यु-भय से उबारकर तत्काल ही मुक्ति-बोध को उपलब्ध करा दिया  परंतु सभी को तो शास्त्रों और गुरु का सान्निध्य नहीं मिल सकता । वे सदैव मृत्यु-भय में जीते रहते हैं और उनको बोध तक पहुँचने के लिए गुरु का दीर्घक़ालीन सान्निध्य चाहिए । परीक्षित राजा था । ऋषिकुमार के श्राप ने मृत्यु-भय के पाश में उसे बांध दिया था । उन्हें मृत्यु-बोध कराने के लिए शुकदेव मुनि से बढ़कर दूसरा कौन गुरु मिल सकता था ?

             शुकदेव महाराज ने परीक्षित को मृत्यु-बोध ही तो कराया था । मृत्यु उनकी भी नहीं टली थे क्योंकि कोई कितना ही पहुँचा हुआ ज्ञानी गुरु हो, शरीर की मृत्यु को टाल नहीं सकता । तक्षक ने सात दिन बाद आकर परीक्षित को डस लिया था । उसी के ज़हर से उनकी देह छूटी थी परंतु अंत समय में वे शान्त बने रहे थे । सब जानना चाहते हैं कि मृत्यु-भय से अशांत परीक्षित आख़िर अन्त समय में आकर शान्त कैसे हो गए ? आइए ! इसको भी जान लेते हैं ।

                सात दिन तक शुकदेवजी ने उन्हें भागवत कथा सुनाई थी । पांच दिन बीत चुके थे और छठा दिन बीतने को था, फिर भी परीक्षित का मृत्यु-भय नहीं गया था । तब छठे दिन के समापन से पूर्व मुनि ने उन्हें एक कथा सुनाई । शुकदेव मुनि राजा परीक्षित को कथा सुना रहे हैं - “राजन् ! एक राजा अपने राज्य में एक दिन शिकार खेलने के लिए जंगल में निकला । मृगया में रत राजा को दिन ढलने का पता ही न चला । एक हरिण का पीछा करते-करते वे घने जंगल में प्रवेश कर गए । अंधेरा घिर आया था । हरिण उनकी दृष्टि से ओझल हो गया था । थकहारकर राजा ने उसका पीछा करना छोड़ दिया और जंगल से बाहर निकलने के लिए वापिस मुड़ा । रात के गहराते साये में घने जंगल के हिंसक पशुओं की आवाज़ें उन्हें स्पष्ट सुनाई दे रही थी । राजा बाहर निकलने का मार्ग भूल गया । हिंसक पशुओं की दहाड़ धीरे-धीरे निकट आती जा रही थी ।

                  जीव को भय उस प्रत्येक बात का हो सकता है, जो शरीर को संकट में डाल दे । मृत्यु कभी समय देखकर नहीं आती परंतु उसकी विस्मृति रहने से जीव को वह दिखलाई नहीं पड़ती । शरीर पर आसन्न संकट कुछ समय के लिए मृत्यु की याद करा देता है । राजा के साथ भी यही हो रहा है । उसे केवल रात भर के लिए एक सुरक्षित स्थान मिल जाए, ऐसा सोचते हुए राजा इधर उधर बड़ी व्यग्रता से देखता हुआ अश्व को दौड़ा रहा था ।

          तभी राजा को पास ही एक स्थान पर दीपक का प्रकाश दिखलाई पड़ा । उसने रात भर के लिए आश्रय पाने के लिए अपने अश्व का रुख़ उस ओर कर दिया । निकट पहुँचकर राजा ने देखा कि वहाँ एक टूटी-फूटी झोंपड़ी है, जहां से छनकर प्रकाश बाहर आ रहा है । उसने झोंपड़ी का द्वार खटखटाया । एक बूढ़े बहेलिए ने द्वार खोला । राजा ने उससे रातभर का आश्रय माँगा ।

              राजा के आश्रय मांगने पर  बहेलिए ने कहा कि मैं वृद्ध हूँ । हिंसक पशुओं के भय से रात को बाहर नहीं निकलता । इसी कारण से मुझे झोंपड़ी में ही मल-मूत्र का त्याग करना पड़ता है । दूसरी बात - शिकार कर मारे गये हरिणों की खाल भी भीतर लटक रही है, जिससे वे वातावरण को और अधिक दुर्गन्धमय बना रही है । आपका यहाँ रुकना आपको ही परेशान कर सकता है ।

          बहेलिया आगे कहने लगा - ‘राजन् ! इससे भी बड़ी एक विचित्र बात और है । इतना दुर्गन्धयुक्त वातावरण होते हुए भी जो एक रात के लिए यहाँ ठहर जाता है, वह दूसरे दिन यहाँ से लौटने को मना कर देता है । इसलिए क्षमा करें, मैं आपको भीतर नहीं आने दूँगा ।’ राजा चिंतित हो गया । हिंसक पशुओं की चहल-पहल बढ़ने लगी थी । भय उसके भीतर कहीं गहरे में बढ़ने लगा था । उसने बहेलिए से हाथ जोड़कर विनती करते हुए रात भर के लिए आश्रय माँगा और उसे आश्वस्त किया कि भोर होते ही वह यह झोंपड़ी छोड़कर चला जाएगा ।

              बहेलिए ने राजा पर विश्वास कर उन्हें अपनी झोंपड़ी के भीतर बुला लिया । एक गंदे से बिस्तर पर राजा सो गया । थोड़ी देर तो उसे अटपटा लगा, फिर थका होने के कारण शीघ्र ही नींद आ गई । सुबह हुई । बहेलिए ने राजा को जाने के लिए कहा । राजा ने झोंपड़ी छोड़ने से मना कर दिया । राजा को रात की गहन निद्रा से जो सुख मिला, उसको वह बार-बार अनुभव करना चाहता था । इतनी कथा सुनाकर शुकदेव मुनि मौन हो गए । परीक्षित उस कहानी को इससे भी आगे सुनना चाहता था । परंतु इससे आगे तो कथा थी ही नहीं, वहाँ से आगे तो केवल ज्ञान था जो किसी जिज्ञासु के प्रश्न करने पर ही मिल सकता था । शुकदेव महाराज भी परीक्षित के मुख से कोई प्रश्न की आशा कर रहे थे।

             कथा सुनकर परीक्षित के मन में प्रश्न उठा कि भला ऐसा कौन राजा हो सकता है जो महलों की सुख-सुविधा छोड़कर एक बहेलिए की दुर्गन्ध मारती, टूटी-फूटी झोंपड़ी में ही रहने की ज़िद्द पाले बैठा है । मुनि को मौन देखकर परीक्षित का धैर्य समाप्त हो गया । अंततः वह पूछ ही बैठा कि गुरुदेव वह राजा कौन था ? क्या उसने बहेलिए की झोंपड़ी को छोड़ दिया था ? मुनि को तो परीक्षित से ऐसे ही प्रश्न की अपेक्षा थी । शुकदेव महाराज ने कहा - ‘राजन् ! वह राजा आप हो ।’ उत्तर सुन परीक्षित सन्न रह गए । सोचने लगे कि शुकदेवजी ने मुझमें ऐसा क्या देखा जिसके कारण कथा का राजा मुझे ही बता रहे हैं । अंततः पूछ ही बैठे -‘कैसे महाराज ?’

                शुकदेवजी बोले - ‘राजन् ! यह शरीर ही वह जीर्ण-शीर्ण होती झोंपड़ी है । यह स्थूल शरीर अपने जीवन-काल में मल-मूत्र का निर्माण और उसके उत्सर्जन करने के अतिरिक्त करता ही क्या है ?  हमारी इस शरीर में आसक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है क्योंकि इससे एक बार मिले सुख को और अधिक भोगने की आशा सदैव बनी ही रहती है । यह सुख जिस दिन दुःख में परिवर्तित हो जाता है, हम पुनः उस सुख को प्राप्त करने के प्रयास में लग जाते हैं । इस जीवन में शरीर का अन्त आ जाता है, परन्तु सुख नहीं आता । इसलिए भलाई इसी में है कि इस शरीर में मोह का त्याग कर दो । शरीर में ममता रखना पशुबुद्धि है । पशु ही शरीर में आसक्त रहते हुए सदैव उसी में रमण करते रहना चाहते हैं ।

             शुकदेव मुनि परीक्षित को आगे कह रहे हैं कि कल तुम्हें तक्षक नाग डसेगा, परंतु अभी भी तुम्हारी देहासक्ति छूटी नहीं है । राजन् ! तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो, देह में आसक्ति छोड़ दो, मृत्यु का आनंदपूर्वक वरण करो क्योंकि इस संसार में केवल मृत्यु ही सत्य और अटल है ।”  परीक्षित समझ गए कि संभावित मृत्यु को देखकर वे भयग्रस्त हो गए थे । उन्हें अभी भी देह के छूटने का भय सता रहा था । मृत्यु अटल होते हुए भी उसको स्वीकार करना बड़ा कठिन है । प्रत्येक व्यक्ति यही सोचता है कि ऐसे-वैसे-कैसे भी हो, शरीर की मृत्यु टल जाए । कथा सुनकर परीक्षित का मृत्यु-भय समाप्त हो गया ।

         यह है सन्त के सान्निध्य का प्रभाव । छठे दिन ही मुनि ने परीक्षित के मृत्यु-भय को मृत्यु-बोध में बदल दिया । अब परीक्षित भयमुक्त हो चुका था । उसने भगवान को अपने हृदय की गहराई में बिठा लिया और उनका सतत स्मरण करने लगा । मृत्यु-बोध आपका स्वयं से परिचय कराता है । मनुष्य को इस अवस्था तक पहुँचकर ही अनुभव होता है कि संसार असार है, वह स्वयं तो उससे भिन्न परमात्मा का अंश है । शरीर समाप्त हो सकता है, जीवन नहीं । जीवन तो इस शरीर के मर जाने के बाद भी चलता रहेगा । 

          सातवें दिन तक्षक के आने पर परीक्षित तनिक भी विचलित नहीं हुए । तक्षक तो उन्हें डसने के लिए ही आया था, परन्तु उसके डसने से पूर्व ही परीक्षित देहमुक्त हो गए थे । शरीर में अहंता और ममता रखना व्यक्ति को बंधन में डाल देता है । यह बंधन मृत्यु-भय पैदा करता है । शरीर से अहंता और ममता के छूटते ही मृत्यु-भय, मृत्यु-बोध में बदल जाता है । 

          मृत्यु-भय केवल शरीर और संसार को बचाए रखने की जुगत मात्र है, जबकि मृत्यु-बोध व्यक्ति को जीवन्मुक्त  करता है । संसार का प्रत्येक प्राणी आहार, निद्रा, भय और मैथुन में रत है, यह सब शरीर को बचाने के उपाय ही तो है । इन सबके मूल में मृत्यु का भय ही है ।   

           जो मृत्यु के भय से मुक्त हो चुका है, उसके लिए ये चारों स्वतः ही महत्वहीन हो जाते हैं । जरा आप किसी जीवन्मुक्त महात्माओं का जीवन देखिए ! उनका आहार और निद्रा सीमित दायरे के होते हैं । किसी भी प्रकार का भय उनमें नहीं होता और मैथुन में रत रहने का तो प्रश्न ही नहीं है ।

        मृत्यु-भय का कारण है - शरीर में अहंता और ममता रखना । शरीर की मृत्यु होना शाश्वत सत्य है । जिसने इस संसार में शरीर का अधिग्रहण किया है, वह अविनाशी है, केवल उसका यह शरीर ही नाशवान है । शरीर के मरने पर भी व्यक्ति नहीं मरता । 

             शरीर तो जन्म लेने के साथ ही मरना प्रारम्भ कर देता है । पैदा होना, बढ़ना, रहना, युवा होना, क्षरण  होना और मरना, ये सब शरीर में होते हैं । कहने का अर्थ है कि जो शरीर परिवर्तनशील है और उसकी परिवर्तनशीलता को अनुभव करने वाला शाश्वत है । इस बात को जो समझ लेता है, समझ लो उसको मृत्यु-बोध हो गया है ।

            मृत्यु-भय से जो व्यक्ति विचलित होता है, वह दिन-रात अपने शरीर को बचाए रखने के प्रयास में ही लगा रहता है, यह जानते हुए भी कि इस शरीर को एक न एक दिन जाना है । वह जानता अवश्य है, परंतु इस सत्य को स्वीकार नहीं करता । सत्य को स्वीकार इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि उसकी शरीर में ममता है । ममता उसे शरीर के साथ बांधे रखती है । मृत्यु शैया पर आ जाने के बाद भी वह शरीर से मोह छोड़ नहीं पाता । इस मोह के कारण ही उसे नए-नए शरीरों के साथ जन्म पर जन्म लेना पड़ता है । 


               स्मरण रहे, शरीर का जन्म होता है व्यक्ति का नहीं लेकिन शरीर में आसक्त होने के कारण वह इसे अपना ही जन्म समझता है । अविनाशी और नाशवान के अंतर को तथा आत्मा और अनात्मा को जान लेना ही सत्य तक पहुँच जाना है । इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही मृत्यु-बोध होना है ।

           मृत्यु-बोध का अर्थ है - नाशवान और अविनाशी को अलग अलग जान लेना । इसे जान लेने के पश्चात् व्यक्ति कामनाओं में नहीं फँसता । उसके द्वारा कर्म तो होते हैं परंतु सभी कर्म संसार की सेवा के लिए होते हैं । जब मनुष्य संसार में जन्म लेता है, उस समय अपने साथ कुछ भी लेकर नहीं आता । वह सब कुछ इस संसार से ही लेता है । यहाँ कोई भी वस्तु उसकी अपनी नहीं है, यहाँ तक कि उसके संबंधी और मित्र भी । अतः किसी को भी अपना और अपने लिए मानना अनुचित है । जो कुछ भी पदार्थ, धन-सम्पत्ति यहाँ आकर संसार से उपार्जित की है, उसे अपने साथ कोई नहीं ले जा सकता । सब ख़ाली हाथ आए हैं और ख़ाली हाथ ही जाएंगे । अतः जो कुछ भी यहाँ आकर लिया है, सब संसार से ही लिया है । उसको संसार को ही लौटा देना है अर्थात् उनको संसार की सेवा में लगा देना है ।

          यहाँ आए हैं, बिना कुछ लिए और जो यहाँ आकर लिया है, सब यहीं छोड़कर चले जाना है । लिया यहाँ से ही है तो छोड़कर जाने से पहले सब कुछ संसार को ही लौटा देना चाहिए । जितना उनको अपना और अपने लिए मानेंगे उतना ही उसके साथ बंधते चले जाएँगे । जो कुछ मिला है, सब एक दिन खो जाएगा । यह बंधन ही व्यक्ति में उस वस्तु के खोने का भय पैदा करता है । इसलिए सदैव मृत्यु को ध्यान में रखते हुए कुछ भी बचाकर अपने पास न रखें, निरंतर उनका त्याग करते रहें । फिर जीवन में कोई भय नहीं सताएगा । भय-मुक्त जीवन ही शान्त-जीवन है और जीवन में शान्ति त्याग से ही आती है । 

         पूर्व में हमने राजा परीक्षित के दृष्टांत पर चर्चा की थी । श्रीमद्भागवत महापुराण वेद व्यासजी ने लिखी है, उनके पुत्र शुकदेव मुनि ने परीक्षित को भागवत कथा सुनाई थी । भागवत कथा को सुनकर राजा परीक्षित सात दिन में ही देह की ममता से मुक्त हो चुके थे । मृत्यु-बोध हो जाने पर इस शरीर के साथ क्या होता है, व्यक्ति के लिए कोई मायने नहीं रखता । संसार के सब सुख-दुःख शरीर तक ही सीमित है, आत्मा तक वे पहुँच ही नहीं सकते । इससे स्पष्ट होता है कि शरीर की मृत्यु आत्मा को तनिक भी प्रभावित नहीं करती । इस अवस्था को उपलब्ध व्यक्ति अपनी देह के मरने को भी साक्षी-भाव से देखता है । 

        परीक्षित की देह तक्षक नाग के काटने से छूटनी थी । ऋषिकुमार शृंगी के श्राप के कारण उनकी देह को जीवित रहने के लिए मात्र सात दिन ही मिले थे । परीक्षित को कम से कम यह तो पता था न कि सात दिन बाद उनकी मृत्यु होनी है । उन सात दिनों के मृत्यु-भय ने उनको मृत्यु-बोध करा दिया जिसके कारण वे संसार से मुक्त हो गए । हमें तो यह भी पता ही नहीं है कि हमारी मृत्यु कब होगी ?  गुरु ने शिष्य का हाथ देखकर कह दिया था कि कल उसकी मृत्यु हो जाएगी । उससे भी उसको एक दिन में ही मृत्यु-बोध हो गया । सप्ताह में सात दिन ही होते हैं । उन सात दिनों में से किसी एक दिन हमारे शरीर की भी मृत्यु होनी है । इस बात को स्वीकार कर लें तो हम भी उस शिष्य की तरह मृत्यु- बोध को उपलब्ध हो सकते हैं । 

            शरीर और आत्मा को जोड़ने वाली कड़ी अंतःकरण कहलाती है । बाह्यकरण इस भौतिक शरीर की इंद्रियाँ है - पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ । इन इंद्रियों को हमारा अंतःकरण नियंत्रित करता है । इस अंतःकरण में अहंकार, बुद्धि, चित्त और मन आ जाते हैं । स्व अर्थात् आत्मा को शरीर से जोड़े रखने में मन की भूमिका विशेष है । मन ही इंद्रियों को नियंत्रित करता है । मन के अनुसार ही इंद्रियाँ विषयों की और विचरने लगती है । बुद्धि का मन पर नियंत्रण हट जाने से मन भी इंद्रियों को स्वच्छंद विचरने के लिए छोड़ देता है ।

           शरीर में इंद्रियाँ है, शरीर में ही मन है और शरीर में ही चेतन तत्व है । जब चेतन तत्व शरीर,मन और इंद्रियाँ के माध्यम से बाहर की यात्रा करता है तो हमें संसार और उसके पदार्थों अर्थात् अनात्मा का बोध होता है । जब यही चेतन तत्व शरीर, मन और इंद्रियों को छोड़ भीतर प्रवेश करता है तो वह अपदार्थ अर्थात् आत्मा को जानता है । पदार्थ और संसार का बोध मृत्यु-भय पैदा करता है जबकि आत्मा का ज्ञान मृत्यु-भय से मुक्त करता है । चेतन तत्व के भीतर की यात्रा अपने मूल स्रोत की यात्रा है, जिसमें मन और शरीर की कोई भूमिका नहीं रहती । इसका अर्थ है कि मूल स्रोत की यात्रा में हमारा मन भी अमन हो जाता है । मन के अमन हुए बिना भीतर की यात्रा हो ही नहीं सकती । मन के अमन होने को मन का मरना कहते हैं और यह मन जीतेजी मर जाए, अच्छा है । फिर व्यक्ति की सभी कामनाएँ और विकार तिरोहित हो जाते हैं और मृत्यु का भय भी समाप्त हो जाता है । यही मृत्यु-बोध है ।

         अष्टांग योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने मृत्यु-भय को अभिनिवेश कहा है । अभिनिवेश पाँच क्लेशों में से एक क्लेश है । क्लेश मनुष्य जीवन की वे बाधाएँ है, जो उसे आत्म-ज्ञान से वंचित कर देती है । ये पाँच क्लेश हैं - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश । इस श्रृंखला में हम अभिनिवेश अर्थात् मृत्यु-भय पर विचार कर रहे हैं । अभिनिवेश का कारण अविद्या ही है । अविद्या के कारण ही शेष चार क्लेश अस्तित्व में आते हैं । अविद्या से बाहर निकल जाने पर मृत्यु-भय भी समाप्त हो जाता है । मृत्यु-भय समाप्त होने का अर्थ मृत्यु-बोध से है ।

        मृत्यु-भय से मुक्त होने के लिए महर्षि पतंजलि ने तीन साधन बताए हैं - तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान । तप का अर्थ है - स्वधर्म का पालन करने में जो शारीरिक, मानसिक आदि कष्ट प्राप्त हों, उनको सहन करना । स्वाध्याय का अर्थ है - जिन शास्त्रों के अध्ययन से अपने कर्तव्य-अकर्तव्य का बोध हो, उनका पठन-पाठन करना । ईश्वर-प्रणिधान से अर्थ है, ईश्वर के शरणागत होना, उनसे अतिशय प्रेम करना । उपरोक्त तीनों साधनों से मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है क्योंकि ये अविद्या का नाश करते हैं । इनके अतिरिक्त महर्षि ने मृत्यु-भय से मुक्त होने के लिए ध्यान को भी एक साधन बताया है ।

              महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग के आठ अंग इस क्रम में है - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि । यम जहां सामाजिक नैतिकता है वहीं नियम व्यक्तिगत नैतिकता है, जिनका पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए । आसन और प्राणायाम स्थूल शरीर के स्वास्थ्य से संबंधित है । प्रत्याहार, धारणा और ध्यान मानसिक शान्ति के लिए आवश्यक अंग है जबकि समाधि आध्यात्मिकता को पुष्ट करती है । समाधि का अर्थ है आत्मा से जुड़ना । यह परम चैतन्य की अवस्था होती है ।

       स्थूल शरीर तभी स्वस्थ रह सकता है जब आसन और प्राणायाम  के साथ-साथ यम- नियम का भी पालन किया जाय । पाँच यम, जो सामाजिक नैतिकता से संबंधित हैं, वे हैं - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ।  पाँच नियम, जो व्यक्तिगत नैतिकता से संबंधित है, वे हैं -  शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान । यम-नियम का पालन करने से व्यक्ति समाज का आदर्श नागरिक बनता है ।

          हम मृत्यु- भय से मुक्त होने की बात कर रहे हैं । मृत्यु- भय से मुक्त होने के लिए तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान, इन तीनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । ये तीनों अष्टांग-योग के दूसरे अंग ‘नियम’ के अन्तर्गत है । महर्षि पतंजलि के अनुसार मनोयोग से इनका पालन करने से व्यक्ति मृत्यु-भय से मुक्त हो मृत्यु-बोध को उपलब्ध हो सकता है ।

             तप का अर्थ है प्रत्येक परिस्थिति में स्वयं को अनुशासित रखना । मनुष्य के जीवन में अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती जाती रहती है, उनको सहन करने से व्यक्ति विचलित नहीं होता । इस संसार में जिस किसी से संयोग होता है, उससे एक न एक दिन वियोग होना निश्चित है । जिस किसी से संयोग होता है, उससे मनुष्य को सुखानुभूति होती है जिससे मनुष्य में उसके प्रति ममता बढ़ती है । ममता के कारण उसी संयोगजन्य सुख को बार-बार प्राप्त करने की कामना जाग्रत होती है ।

         कामना के वशीभूत होकर व्यक्ति कर्म करता है । कर्म का फल इच्छा के अनुरूप मिल जाए तो लोभ पैदा होता है और अगर फल विपरीत हो तो क्रोध उत्पन्न होता है । तप के माध्यम से मनुष्य क्रोध और लोभ को बढ़ने नहीं देता, उनको नियंत्रण में रखता है । इसे ही अनुशासन में रहना कहते हैं ।

        शरीर सम्बन्धी तप के अन्तर्गत गुरु और जीवन्मुक्त महात्माओं का पूजन और सम्मान करना, आंतरिक और बाह्य शुद्धि रखना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और किसी के प्रति हिंसा न करना है । दूसरा तप वाणी का तप है । जो किसी को उद्विग्न न करने वाला, सत्य और प्रिय तथा हितकारी भाषण है, वह वाणी सम्बन्धी तप है । अपनी वाक् इंद्रिय से स्वाध्याय और अभ्यास अर्थात् प्रभु का नाम-स्मरण, कीर्तन आदि भी वाणी के तप में आते हैं । तीसरा तप है मानसिक तप । मन की प्रसन्नता, मननशीलता, मन का निग्रह और भाव शुद्धि आदि सभी मानसिक तप कहे गए हैं ।

          शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप से मृत्यु- भय का नाश होता है । गीता में भगवान ने तप के तीन और प्रकार भी बतलाए हैं - सात्विक, राजसिक और तामसिक तप । जो तप कामना रहित होकर किया जाता है, वह सात्विक तप है । जो तप मान-सम्मान प्राप्त करने की इच्छा से अथवा प्रदर्शन के लिए किया जाता है वह राजसिक तप है । जो तप मूढ़ता अर्थात् अज्ञान से, अपने को पीड़ा देकर और दूसरों को कष्ट देने के लिए तथा हठपूर्वक किया जाता है, ऐसा तप तामसिक श्रेणी में आ जाता है ।

          शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप का सात्विक रूप से पालन करने से व्यक्ति शांति को उपलब्ध होता है जिससे व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है । अशांत जीवन भय का जनक है जबकि शान्त जीवन सभी प्रकार के भय से मुक्त करता है ।

            दूसरा नियम स्वाध्याय है, जिसके पालन से भी व्यक्ति भय-मुक्त हो सकता है । स्वाध्याय से अर्थ है, शास्त्रों का अध्ययन और सत्संग करते हुए आत्मचिंतन करना । शास्त्रों का अध्ययन करते हुए उनमें लिखी बातों का सतत चिंतन, मनन करते रहने से भय से मुक्त हुआ जा सकता है । शास्त्र बनते हैं, महापुरुषों के अनुभव से । जिस राह पर चलकर महापुरुष मृत्यु- बोध, आत्म-बोध को उपलब्ध हुए हैं, निश्चित ही उनकी वाणी हमारा सही मार्गदर्शन करती है । इसलिए शास्त्रों का अध्ययन कर, उस पर चिंतन, मनन करते हुए सत्संग से संसार और शरीर की नश्वरता को समझा जा सकता है ।

             अष्टांग योग के दूसरे अंग नियम का एक महत्वपूर्ण सूत्र है - ईश्वर-प्रणिधान । ईश्वर-प्रणिधान अर्थात् ईश्वर के प्रति पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण समर्पण । ईश्वर अर्थात् परमात्मा जिसके हम एक अंश हैं । हमारा स्वरूप उससे जरा सा भी भिन्न नहीं है । जब हमारा संपर्क संसार और शरीर के साथ हो जाता है, तब अपना स्वरूप भूल जाते हैं और शरीर को ही स्वयं होना मान लेते हैं । शरीर को संसार के विषयों से जो सुखानुभूति होती है, उसके वशीभूत होकर मनुष्य संसार का आश्रय ले लेता है । 

          शरीर और संसार में परिवर्तन होते रहते हैं । इसे मनुष्य की विडंबना ही कह सकते हैं कि वह इन परिवर्तनों को स्वयं में होना समझता है । ऐसा समझने से शरीर की सम्भावित मृत्यु को वह अपनी मृत्यु होने की कल्पना कर सदैव भयग्रस्त बना रहता है । संसार का आश्रय कभी व्यक्ति को मृत्यु- भय से मुक्त नहीं कर सकता । मृत्यु-भय से मुक्त होने के लिए केवल एक परमात्मा का आश्रय ही चाहिए । ईश्वर-प्रणिधान में परमात्मा के प्रति पूर्ण श्रद्धा रखते हुए उनकी शरण में जाना होता है । एक उसकी शरण ही सभी प्रकार के भय से मुक्त कर देती है । 

           संसार आकर्षक है क्योंकि उसमें सतत परिवर्तन होने के कारण उसके भिन्न-भिन्न रूप प्रकट होते हैं । शरीर भी इसी प्रकार व्यवहार करता है । बाल्यावस्था से युवावस्था तक तो ठीक है परन्तु जब शरीर का क्षरण होना प्रारम्भ होता है तब मृत्यु-भय मनुष्य को विचलित कर देता है । इस भय से मुक्त होने के लिए संसार के आश्रय का त्याग कर परमात्मा के आश्रय में चले जाना ही श्रेयस्कर है ।

       इस प्रकार मृत्यु- भय से मुक्ति के लिए अर्थात् मुक्ति-बोध होने के दो प्रकार के साधन हैं - ईश्वर की शरण और तप, स्वाध्याय । दोनों ही साधन आपको मृत्यु- बोध तक ले जाते हैं । दोनों में मूल रूप से एक ही अंतर है । तप-स्वाध्याय में मृत्यु को शान्त भाव से अनुभव किया जाता है जबकि ईश्वर प्रणिधान में स्वयं को शरीर से अलग रखते हुए अपने भीतर प्रवेश किया जाता है । 

        एक बार एक वायुयान आसमान में वायु- भँवर में फँसकर बुरी तरह हिचकोले खाने लगा । भीतर बैठे हुए यात्री संभावित दुर्घटना की कल्पना कर चिल्लाने लगे । विमान में बैठे केवल दो ही यात्री विचलित नहीं हुए - एक साधु और दूसरी पाँच वर्ष की बालिका । साधु शान्त भाव से मौन होकर बैठे थे, ऐसा लग रहा था जैसे उनको विमान के डोलने का कुछ भी अनुभव नहीं हो रहा हो । बालिका विमान के हिचकोलों से खुश होकर तालियाँ बजा रही थी । उसको ऐसा अनुभव हो रहा था मानो वह कोई झूला झूल रही हो ।

             थोड़ी देर बाद विमान उस भँवर से निकल कर अपनी नियंत्रित गति से गंतव्य की ओर आगे की यात्रा पर चलने लगा । सभी यात्रियों ने राहत की सांस ली । सभी यात्री परमात्मा का धन्यवाद करने लगे । वह बात और थी कि कुछ समय पहले तक वे केवल चिल्ला रहे थे, परमात्मा को कोई बिरला ही याद कर रहा था । थोड़े समय बाद विमान अपने गंतव्य स्थान पर पहुँच गया । विमान परिचारिका ने इस अवधि में सभी यात्रियों से उनके अनुभव पूछे ।

            आसमान में वायुयान का हवा के भँवर में फँस जाना प्रायः होता रहता है, पर उस दिन तो विमान दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बचा था । परिचारिका ने जब यात्रियों से उस अवधि के अनुभव पूछे तो प्रायः सभी ने मृत्यु-भय होने को स्वीकार किया । साधु ने कहा कि जब विमान भँवर में फँसा तो कुछ समय के लिए तो मैं शान्त होकर बैठा रहा और फिर अपने भीतर चला गया, जहां गहरी शांति थी । मुझे विमान कितनी देर भँवर में फँसा रहा, इसका मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है । 

         जो भी परिस्थितियों बनती बिगड़ती है, वे सब वृत्त की परिधि पर होती है । परिधि पर होने वाले परिवर्तन ही मन को भयग्रस्त और अशांत करते हैं । इसके विपरीत केंद्र तो सदैव निश्चल और शान्त बना रहता है । समुद्र की गहराई में शांति है जबकि उसकी सतह सदैव तरंगित बनी रहती है ।

          कहा जाता है कि जो ईश्वर की शरण होते हैं उनका व्यवहार एक मासूम बच्चे की तरह (बालसुलभ) होता है । विमान में सवार बालिका को विपरीत परिस्थिति में हुआ अनुभव इस बात को स्पष्ट करता है । बालिका को विमान के हिचकोले भी उसे झूले में झूलने का आनंद दे रहे थे । बालिका नहीं जानती थी कि विमान दुर्घटनाग्रस्त भी हो सकता है । कहने का अर्थ है कि मृत्यु-भय उसी को होता है जिसने स्वयं को संसार से जोड़ रखा है । संसार में रमे व्यक्ति को ही प्रत्येक परिवर्तन विचलित करता है ।

          जिसका मृत्यु-भय समाप्त हो चुका है, वह डरता नहीं है बल्कि उसे सहर्ष स्वीकार करता है । मृत्यु-बोध ही आत्म-बोध है जिसमें व्यक्ति स्वयं को शरीर की तरह जन्मने-मरने वाला नहीं मानता । फिर तो मीरा की तरह उसे विष का प्याला स्वीकारने तक में कोई हिचक नहीं होती ।

           ईसापूर्व यूनान में एक दार्शनिक हुए थे - सुकरात । सुकरात के दर्शन (philosophy) से उस समय की धार्मिक व्यवस्था प्रसन्न नहीं थी । संसार में जितने भी संत हुए हैं, जिन्होंने भी लोगों को मृत्यु-बोध कराया है, निर्भय किया है ; तात्कालिक सत्तासीनों ने उनको कभी भी स्वीकार नहीं किया है । यही रीति आज भी चली आ रही है । सुकरात के साथ भी यही हुआ । उन्हें धर्म का विरोधी मानते हुए अनुयायियों सहित कारागार में डाल दिया गया । झूठे मुक़दमें लगाकर अंततः उन्हें मृत्यु दण्ड की सजा सुना दी गई । 

    उन दिनों मृत्युदण्ड के लिए एक प्रकार के पौधे की कुछ पत्तियों का रस पिलाया जाता था । हेमलॉक (Hemlock) नामक इस पौधे की पाँच-सात पत्तियों का रस ही एक व्यक्ति को मारने के लिए पर्याप्त होता है । इसका ज़हर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है, जिससे कुछ ही समय पश्चात् व्यक्ति मर जाता है । इसी के रस  का प्याला सुकरात को पिलाया गया ।

        ज़हर को पीकर भी सुकरात शांत बने रहे । उन्होंने रो रहे अपने अनुयायियों को अपनी मृत्यु का अनुभव सुनाना प्रारम्भ किया । वे कह रहे हैं -“ मेरे दोनों पैर सुन्न होकर ठण्डे पड़ गए हैं । अब हाथ भी शक्तिहीन हो रहे हैं । अहा ! कितनी गहरी शांति है, मेरा मस्तिष्क सुन्न हो रहा है, बहुत आनन्द है । मृत्यु भी कितनी आनन्ददायक होती है ?” इतना कहकर सुकरात ने सदैव के लिए आँखें मूँद ली । मृत्यु-भय से मुक्त व्यक्ति ही इस प्रकार सहर्ष मृत्यु का वरण कर सकता है अन्यथा तो मृत्यु-दण्ड पाए व्यक्ति सब कुछ जानते हुए भी अन्त समय तक मृत्यु से बचने का असफल प्रयास करते हैं ।   

      जीवन में आने वाली विभिन्न परिस्थितियां मनुष्य को विचलित करती रहती है, विशेष रूप से प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण ऐसा होता है । परिस्थितियों का आना-जाना समय-चक्र के अनुसार चलता रहता है क्योंकि ये सब प्रकृति के अधीन है । परिवर्तनशीलता प्रकृति का प्रमुख गुण है । आज जो अनुकूलता है, वह कल प्रतिकूलता में परिवर्तित होगी ही और इसी प्रकार इसके विपरीत होना भी निश्चित है । जो प्रकृति की नश्वरता को अपना नाश होना मान लेता है, वह मृत्यु-भय से सदैव ग्रस्त रहता है । शरीर को ही स्वयं होना मान लेना अज्ञान के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है ।

          जीवन की अक्षुणता में केवल शरीर बदलते हैं, जीवन एक ही चलता है । शरीर के बदलने और स्वयं के अपरिवर्तित रहने को जो समझ लेता है वह मृत्यु-भय से मुक्त हो जाता है । यह ज्ञान की अवस्था है जिसमें व्यक्ति प्रकृति की नश्वरता से स्वयं को अलग कर अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है । फिर वह प्रत्येक भय से मुक्त हो आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो जाता है ।

          भक्ति में सब कुछ भगवान को समर्पित कर दिया जाता है । भगवान के प्रति समर्पण से जीवन में आ रहे उतार-चढ़ाव से मनुष्य विचलित नहीं होता । शरीर की होने वाली मृत्यु की वह तनिक भी चिंता नहीं करता । ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए”, परमात्मा का आश्रय लेने से ऐसी सोच जिस दिन हमारी हो जाएगी, तत्काल ही हम मृत्यु-भय से मुक्त होकर आत्म-बोध को उपलब्ध हो जाएंगे ।

         इतने विवेचन से एक महत्वपूर्ण बात निकलकर आई है कि मृत्यु-भय का कारण हमारी संसार और शरीर के प्रति आसक्ति है । जिस दिन हम इस आसक्ति से मुक्त हो जाएंगे मरने का भय भी चला जाएगा और मृत्यु-बोध भी हो जाएगा । मृत्यु-बोध से आत्म-बोध की यात्रा सुगम हो जाती है । मृत्यु-भय से मुक्त होने के सभी उपाय इस शरीर को केन्द्र में रखकर किए जाते हैं । विडम्बना है कि इतना सब कुछ करने के बाद भी कई बार मृत्यु-भय पुनः लौट आता है । स्वामीजी ने शरीर को लेकर तीन महत्वपूर्ण बातें कही हैं, जिनको आत्मसात कर आत्म-बोध होने तक सुगमता से पहुँचा जा सकता है ।

         शरीर से सम्बन्धित ये तीन सूत्र हैं - मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं है और शरीर मेरे लिए नहीं है । “मैं शरीर नहीं हूँ”, इसका अर्थ है शरीर अलग है और मैं शरीर से अलग हूँ । जो शरीर में परिवर्तन होना (जन्म लेना, बढ़ना, रहना, क्षरण होना, वृद्ध होना और मरना) देखता है वह वास्तविक “मैं” अविनाशी है । “शरीर मेरा नहीं है” तो फिर यह शरीर किसका है । शरीर विनाशशील प्रकृति (संसार) का है । इसका अर्थ है कि शरीर मरता है, “मैं” नहीं मरता क्योंकि मैं तो अविनाशी हूँ । “शरीर मेरे लिए नहीं है”, इसका अर्थ है शरीर से मुझे कुछ नहीं लेना है, इससे मुझे कुछ भी नहीं चाहिए । यह शरीर संसार की सेवा के लिए है । अतः जब तक यह शरीर है, तब तक इसे संसार की सेवा में ही लगाए रखना है ।

          इस प्रकार स्वामीजी के द्वारा दिए गए तीनों सूत्र बड़े ही महत्वपूर्ण है, जिनको धारण कर हम मृत्यु-भय से मुक्त हो आत्म-बोध को उपलब्ध हो सकते हैं । मृत्यु-बोध के लिए इन सूत्रों को सदैव स्मृति में बनाए रखना आवश्यक है ।        

सार-संक्षेप 

       जन्म-मृत्यु जीवन रूपी सिक्के के दो पहलू है । जीवन तब तक चलता रहता है, जब तक संसार से मुक्त नहीं हो जाते । संसार में आसक्त जीव का जीवन विभिन्न शरीरों के माध्यम से अनन्त यात्रायें करता है । इस यात्रा की समाप्ति के लिए ही हमें मनुष्य जीवन मिला है । हमने मनुष्य शरीर के रूप में जन्म लिया अवश्य है परन्तु उसमें जीवन जीते हुए आहार, निद्रा, भय और मैथुन में रत रहकर उसे खोना नहीं है । ये सब असत् हैं और आत्मा से इनका कोई लेना-देना नहीं है । संसार और शरीर में मोह रखने से केवल मृत्यु-भय ही उपहार में मिलता है । प्रत्येक भय व्यक्ति को आत्म-बोध से वंचित कर देता है ।

         आत्म-बोध के लिए मृत्यु-बोध होना आवश्यक है । परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग मृत्यु-भय से मुक्त होकर ही पाया जा सकता है । मृत्यु-भय से मुक्त तभी हुआ जा सकता है, जब मृत्यु-बोध हो जाये । मृत्यु-बोध ज्ञान को उपलब्ध होने से ही संभव है । अतः हमें अनात्म और आत्म का ज्ञान होना आवश्यक है । संसार विनाशशील है और हम अविनाशी है । इस ज्ञान को अपने भीतर की गहराइयों में उतारना है, इसी ज्ञान में हमें जीना है । जब इस ज्ञान से मृत्यु-बोध हो जाता है, तो फिर परमात्मा का ज्ञान भी हो जाता है । परमात्मा का ज्ञान होने से उनके शरणागत होकर हम संसार की आसक्ति से मुक्त हो जाते हैं और तत्काल ही शान्ति को उपलब्ध हो जाते है । मृत्यु-बोध होना जीवन में शान्ति उपलब्ध कराता है और परमात्मा के द्वार तक ले जाता है । निश्चय ही गुरु का सान्निध्य हमें मृत्यु-भय से मुक्त कर मृत्यु-बोध कराएगा जिससे हम परमात्मा की ओर सतत आगे बढ़ेंगे ।

     इसीलिए नारायण स्वामी ने कहा है - 

           दो बातन को भूल मत, जो चाहत कल्याण ।

           नारायण एक मौत को, दूजो श्री भगवान ।।

।। हरिः शरणम् ।।

प्रस्तुति - डॉ. प्रकाश काछवाल